विष्णु सहस्रनाम · 108 दिन · दिन 15 / 108 · पंद्रहवें श्लोक के आठ नाम

कुछ बहुत बड़ा, डरावना सामने है?

वो जाना-पहचाना रूप लेते हैं

Today’s talk is being recorded — the verse and the whole talk are below to read.

लोकाध्यक्षः सुराध्यक्षो धर्माध्यक्षः कृताकृतः । चतुरात्मा चतुर्व्यूहश्चतुर्दंष्ट्रश्चतुर्भुजः ॥ १५॥

लोकाध्यक्ष सुराध्यक्ष धर्माध्यक्ष कृताकृत चतुरात्मा चतुर्व्यूह चतुर्दंष्ट्र चतुर्भुज

लोकाध्यक्ष, सुराध्यक्ष, धर्माध्यक्ष, कृताकृत; चतुरात्मा, चतुर्व्यूह, चतुर्दंष्ट्र, चतुर्भुज।

आज की साधना

  1. 1. आज का सत्संग सुनें।
  2. 2. आज का श्लोक एक बार ख़ुद गाइए।
  3. 3. मन हो तो — पूरा पाठ, गाया हुआ (52 मिनट) — बैठकर, आँखें बंद करके।
दिन लगातार

Kept on this device.

आज का सत्संग, पढ़कर

कुछ बहुत बड़ा… डरावना सामने खड़ा है? और मन बस इतना चाहता है… कि कोई जाना-पहचाना चेहरा दिख जाए?

कल हमने कहा था — विराट रूप देखकर अर्जुन डर गया था… और उसने भगवान से बस एक चीज़ माँगी। वो चीज़… पंद्रहवें श्लोक के आख़िरी नाम में है। पहले… ज़रा गाकर सुनाता हूँ।

लोकाध्यक्षः सुराध्यक्षो धर्माध्यक्षः कृताकृतः । चतुरात्मा चतुर्व्यूहश्चतुर्दंष्ट्रश्चतुर्भुजः ॥ १५॥

जय श्री कृष्ण। विष्णु सहस्रनाम… एक सौ आठ दिन की यात्रा। आज पंद्रहवाँ दिन। आज के आठ नाम।

पहले कल का हाल — कल किसी बच्चे की हँसी सुनी? मन में सर्वगः कहा? श्लोक एक बार गाया? तो आज आपकी माला में… पंद्रहवाँ मनका।

पहले तीन नाम — लोकाध्यक्ष, सुराध्यक्ष, धर्माध्यक्ष। अध्यक्ष यानी — जो देखरेख करता है। लोकों की, देवताओं की… और धर्म की।

फिर — कृताकृत। जो बना है, और जो अभी बना नहीं… दोनों वही।

और फिर चार-चार के नाम। चतुरात्मा — चार रूपों वाली आत्मा। चतुर्व्यूह — जो चार रूपों में प्रकट होते हैं — वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध। चतुर्दंष्ट्र — चार दाँतों वाले।

और आख़िरी नाम… जिसका कल वादा किया था — चतुर्भुज। चार भुजाओं वाले।

अब कुरुक्षेत्र चलिए। अर्जुन ने कहा था — "मुझे अपना असली रूप दिखाइए।" और कृष्ण ने दिखाया — विराट रूप।

अनगिनत मुँह… अनगिनत आँखें… अनगिनत भुजाएँ। आकाश को छूता हुआ… चमकता हुआ… विकराल दाँत।

अर्जुन काँप गया। वही अर्जुन… जो बड़े-बड़े योद्धाओं के सामने नहीं डरा था… आज काँप रहा था। बोला — "आपको ऐसे देखकर… मुझे न धीरज मिल रहा है… न शान्ति।"

और तब उसने बस एक चीज़ माँगी। "हे देव… मुझे अपना वही रूप दिखाइए। मुकुट पहने, हाथ में गदा और चक्र लिए… उसी चार भुजाओं वाले रूप में हो जाइए।"

और कृष्ण ने बड़े प्यार से कहा — "मेरा यह भयंकर रूप देखकर व्याकुल मत हो। डर छोड़ो… और प्रसन्न मन से फिर मेरा वही रूप देखो।"

गीता कहती है — कृष्ण फिर से अपने सौम्य रूप में आ गए… और डरे हुए अर्जुन को धीरज दिया।

अर्जुन ने चैन की साँस ली — "हे जनार्दन… आपका यह सौम्य रूप देखकर… अब मेरा मन स्थिर हुआ।"

तो जिस डर से हमने शुरू किया था — कि कुछ बहुत बड़ा सामने है… वो जो पूरे ब्रह्माण्ड जितना बड़ा है… वही आपके लिए चार हाथों वाला, जाना-पहचाना रूप भी लेता है। बस माँगना पड़ता है।

तो आज घर ले जाने के लिए… तीन बातें।

पहली — भगवान का विराट रूप डरा सकता है। अर्जुन भी डरा था।

दूसरी — डर में जाना-पहचाना रूप माँगना… कोई कमज़ोरी नहीं।

तीसरी — चतुर्भुज। वो आपके लिए छोटे हो जाते हैं।

और आज के लिए एक छोटी-सी बात। आज भगवान की कोई चार भुजाओं वाली तस्वीर… दो पल शान्ति से देखिए। कुछ माँगिए मत। बस देखिए… और मन में कहिए — चतुर्भुजः।

और रोज़ की तरह — आज का श्लोक एक बार गाइए, और हो सके तो पूरा सहस्रनाम सुनिए। कमेंट में लिखिए — गाया… या सुना।

कल — सोलहवाँ श्लोक। एक ऋषि ने भगवान की छाती पर लात मारी थी। और भगवान ने जो किया… वो कल का नाम है। कल।

चतुर्भुज… जाना-पहचाना रूप।

जय श्री कृष्ण। अब ये श्लोक… मेरे साथ गाइए।

लोकाध्यक्षः सुराध्यक्षो धर्माध्यक्षः कृताकृतः । चतुरात्मा चतुर्व्यूहश्चतुर्दंष्ट्रश्चतुर्भुजः ॥ १५॥

आज घर ले जाने के लिए

  1. 1.भगवान का विराट रूप डरा सकता है। अर्जुन भी डरा था।
  2. 2.डर में जाना-पहचाना रूप माँगना… कोई कमज़ोरी नहीं।
  3. 3.चतुर्भुज। वो आपके लिए छोटे हो जाते हैं।