विष्णु सहस्रनाम · 108 दिन · दिन 14 / 108 · चौदहवें श्लोक के नौ नाम

भगवान बहुत दूर लगते हैं?

वो यहीं हैं

Today’s talk is being recorded — the verse and the whole talk are below to read.

सर्वगः सर्वविद्भानुर्विष्वक्सेनो जनार्दनः । वेदो वेदविदव्यङ्गो वेदाङ्गो वेदवित् कविः ॥ १४॥

सर्वग सर्वविद्भानु विष्वक्सेन जनार्दन वेद वेदवित् अव्यङ्ग वेदाङ्ग कवि

सर्वग, सर्वविद्भानु, विष्वक्सेन, जनार्दन; वेद, वेदवित्, अव्यङ्ग, वेदाङ्ग, वेदवित्, कवि।

आज की साधना

  1. 1. आज का सत्संग सुनें।
  2. 2. आज का श्लोक एक बार ख़ुद गाइए।
  3. 3. मन हो तो — पूरा पाठ, गाया हुआ (52 मिनट) — बैठकर, आँखें बंद करके।
दिन लगातार

Kept on this device.

आज का सत्संग, पढ़कर

भगवान बहुत दूर लगते हैं? मंदिर में… आसमान में… पर यहाँ, मेरे पास नहीं?

कल हमने कहा था — आज एक माँ की कहानी होगी… जिसने अपने बच्चे के मुँह में पूरा ब्रह्माण्ड देखा। उस कहानी का नाम… चौदहवें श्लोक में है। पहले… ज़रा गाकर सुनाता हूँ।

सर्वगः सर्वविद्भानुर्विष्वक्सेनो जनार्दनः । वेदो वेदविदव्यङ्गो वेदाङ्गो वेदवित् कविः ॥ १४॥

जय श्री कृष्ण। विष्णु सहस्रनाम… एक सौ आठ दिन की यात्रा। आज चौदहवाँ दिन। आज के नौ नाम।

पहले कल का हाल — कल आँखें भर आईं तो… रोका तो नहीं? मन में रुद्र कहा? श्लोक एक बार गाया? तो आज आपकी माला में… चौदहवाँ मनका।

और आज का पहला नाम ही वो है — सर्वग। सर्व — सब। ग — जाने वाला। सर्वग — जो हर जगह पहुँचे हुए हैं। कोई जगह ऐसी नहीं… जहाँ वो न हों।

अब कहानी सुनिए — भागवत की। गोकुल में कृष्ण छोटे थे। खेलते-खेलते बाक़ी बच्चे दौड़कर यशोदा माँ के पास आए — "माँ! कन्हैया ने मिट्टी खाई है!"

यशोदा ने कृष्ण का हाथ पकड़ा… और डाँटा — "अरे नटखट! छिपकर मिट्टी क्यों खाई?" डर के मारे छोटे कृष्ण की आँखें इधर-उधर घूम रही थीं।

बोले — "माँ, मैंने नहीं खाई! ये सब झूठ बोल रहे हैं। यक़ीन न हो… तो ख़ुद मेरा मुँह देख लो।"

यशोदा बोलीं — "अच्छा? तो खोल मुँह।" और कृष्ण ने मुँह खोल दिया।

और यशोदा ने देखा… आकाश। दिशाएँ। पहाड़, द्वीप, समुद्र। हवा, आग, चाँद, तारे। और उसी के भीतर… पूरा व्रज। और उस व्रज में… ख़ुद अपने आप को।

यशोदा घबरा गईं। और तब भगवान ने उन पर फिर से माँ का प्रेम फैला दिया। यशोदा सब भूल गईं… बेटे को गोद में उठाया… और दिल फिर से उसी ममता से भर गया।

भागवत कहती है — जिस हरि की महिमा वेद और उपनिषद गाते हैं… उसे यशोदा ने बस अपना बेटा माना।

तो जिस सवाल से हमने शुरू किया था — कि भगवान दूर हैं? जो पूरे ब्रह्माण्ड में हैं… वो एक छोटे-से बच्चे में भी थे। सर्वग — हर जगह। आपके पास भी।

इसी श्लोक में और नाम भी हैं। सर्वविद्भानु — सब जानने वाला सूर्य। विष्वक्सेन — जिनकी सेना हर दिशा में है। जनार्दन — जो लोगों को सही राह पर चलने के लिए जगाते हैं। गीता में अर्जुन बार-बार उन्हें इसी नाम से पुकारता है।

फिर वेद के नाम — वेद, वेदवित्, वेदाङ्ग। जो ख़ुद वेद हैं, वेद को जानने वाले हैं… और वेद जिनके अंग हैं। अव्यङ्ग — जिनमें कोई कमी नहीं। और कवि — जिनकी दृष्टि पर कभी बादल नहीं छाता।

तो आज घर ले जाने के लिए… तीन बातें।

पहली — सर्वग यानी… कोई जगह ऐसी नहीं जहाँ वो न हों।

दूसरी — जो ब्रह्माण्ड जितने बड़े हैं… वो एक बच्चे जितने छोटे भी बन सकते हैं।

तीसरी — यशोदा ने उन्हें भगवान नहीं… बेटा माना। प्रेम सबसे पास ले आता है।

और आज के लिए एक छोटी-सी बात। आज किसी बच्चे को देखें… या किसी बच्चे की हँसी सुनें — एक पल रुकिए… और मन में कहिए — सर्वगः।

और रोज़ की तरह — आज का श्लोक एक बार गाइए, और हो सके तो पूरा सहस्रनाम सुनिए। कमेंट में लिखिए — गाया… या सुना।

कल — पंद्रहवाँ श्लोक। कुरुक्षेत्र में अर्जुन ने भगवान का विराट रूप देखा… और डर गया। तब उसने भगवान से बस एक चीज़ माँगी। क्या? कल।

सर्वगः… यहाँ भी।

जय श्री कृष्ण। अब ये श्लोक… मेरे साथ गाइए।

सर्वगः सर्वविद्भानुर्विष्वक्सेनो जनार्दनः । वेदो वेदविदव्यङ्गो वेदाङ्गो वेदवित् कविः ॥ १४॥

आज घर ले जाने के लिए

  1. 1.सर्वग यानी… कोई जगह ऐसी नहीं जहाँ वो न हों।
  2. 2.जो ब्रह्माण्ड जितने बड़े हैं… वो एक बच्चे जितने छोटे भी बन सकते हैं।
  3. 3.यशोदा ने उन्हें भगवान नहीं… बेटा माना। प्रेम सबसे पास ले आता है।