शरीर पर सवारी आने लगे तो क्या करें — कंफर्मेशन, गुरु, साधना और दरबार के नियम
जिन साधकों के शरीर पर देवी-देवता की सवारी आने लगती है, उनके लिए एक प्रवचन।
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सवारी किसकी है, यह कंफर्म करना
शरीर पर देवी-देवता की सवारी आना आरंभ हो जाए तो सबसे पहला काम क्या है?
वक्ता कहते हैं कि जिस साधक-साधिका पर सवारी आना आरंभ हुई है, उनके परिवार वालों को सर्वप्रथम इस बात की 100% कंफर्मेशन करनी है कि शरीर पर आने वाली सवारी वही है जो वह स्वयं को बता रही है। देवी-देवता की सवारी आएगी तो अपना परिचय देगी, इसलिए सबसे पहले यही पता करना है कि सवारी किसकी है।
किसी भी देवी-देवता की, किसी शुभ शक्ति की सवारी जब शरीर पर आनी आरंभ करती है तो साधक-साधिका को क्या करना चाहिए — इस प्रश्न पर वक्ता सबसे पहले कंफर्मेशन की बात रखते हैं। वे कहते हैं कि जिन जातकों पर, जिन साधकों पर सवारी आने आरंभ हो जाती है, उनके परिवार के जनों को सर्वप्रथम इस चीज़ की 100% कंफर्मेशन करानी है — कि शरीर पर आने वाली सवारी वही है जो वह बोल रही है। देवी-देवता की सवारी आएगी तो अपना परिचय स्वयं देगी। यानी सबसे पहले यह पता करें कि सवारी किसकी है। आपके कुल (कुल देवता) के देवी-देवता की है, आपके क्षेत्र-स्थान के किसी देवी-देवता की है, या किसी तीर्थ क्षेत्र में आप गए थे और वहाँ से कोई शक्ति चली आई है और शरीर पर उनका आवेश आना आरंभ हो गया है। वक्ता कहते हैं कि जब यह चीज़ पूरी तरीके से पता कर लेंगे, तभी जाकर आप आगे कुछ कार्य कर पाएँगे।
नया स्थान और पूजन विधि की आवश्यकता
आने वाली शक्ति के लिए नया स्थान और पूजन विधि चाहिए या नहीं?
वक्ता कहते हैं कि यदि वह शक्ति पहले से ही आपके घर में उपस्थित हैं और उनका स्थान पहले से है, तो नया पूजा कुछ नहीं करना है। यदि कोई बाहरी शक्ति आई हैं, या किसी तीर्थ क्षेत्र की शक्ति आई हैं, या पूर्वकाल में कभी पूजित रही शक्ति अब जागृत हुई हैं, तो उनके लिए कौन-सा स्थान बने, कहाँ स्थान देना है, उनकी पूजा विधि, भोग, तिथि और समय — इन सबकी विस्तारपूर्वक जानकारी होनी चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि जब यह पता चल जाए कि सवारी किसकी आ रही है, तो अगला स्टेप यह है: यदि वह शक्ति पहले से ही आपके घर में उपस्थित हैं, उनका स्थान पहले से है, तो नया पूजा कुछ नहीं करना है। अगर कोई बाहरी शक्ति आई हैं, या किसी तीर्थ क्षेत्र की शक्ति आई हैं, या पूर्वकाल में कभी पूजित रही शक्ति अब जागृत हो गई हैं — और वे आपके कुल (कुल शक्ति) की ही हो सकती हैं — तो फिर उनके लिए कौन-सा स्थान बनना चाहिए, किस जगह उनको स्थान देना है, उनकी पूजा विधि क्या होगी, किस प्रकार से उनका पूजन होगा, यह बताया जाएगा। उनके नाम का क्या-क्या पूजन, भोग इत्यादि रहेगा, तिथि क्या होगी, समय क्या होगा — वक्ता कहते हैं कि इन सभी के विषय में आपको विस्तारपूर्वक जानकारी होनी चाहिए।
परिवार की सहमति और सम्मानपूर्वक विसर्जन
घर में शक्ति को स्थान देने से पहले परिवार की सहमति आवश्यक है?
वक्ता कहते हैं कि आने वाली शक्ति को घर में स्थान देना है या नहीं, इस पर परिवार वालों का साथ होना ज़रूरी है, और इस विषय को लेकर आपस में बहस भी हो जाती है। यदि स्थान नहीं देना है तो किसी देवी तीर्थ स्थान पर सम्मानपूर्वक विसर्जन करें, या उनके धाम लौट जाने का विधि-विधान करवा दें, ताकि वे परेशान न करें और आपको कोई दोष भी न लगे।
वक्ता कहते हैं कि पूरा विषय यही है कि सवारी किसकी है और उनको घर पर स्थान देना है कि नहीं। साथ ही परिवार वालों का भी साथ होना ज़रूरी है कि जो शक्ति आ रही हैं, उनको घर में स्थान देना है कि नहीं देना है। वे बताते हैं कि इस विषय को लेकर आपस में बहस भी हो जाती है — कि नहीं, हम इनकी पूजा क्यों करें, यह तो बाहरी शक्ति हैं, इनको कहीं विसर्जन कर दिया जाए। तो यह चीज़ पहले ही पूरी तरीके से कंफर्म कर लेनी है कि जो शक्ति आ रही हैं, उनकी सेवा-पूजा विधि क्या होगी। तभी जब आप किसी जानकार व्यक्ति की सहायता ले रहे हों, तो उनसे यह बात बताएँ कि हम इनको घर में स्थान देना चाहते हैं। या यदि आप नहीं चाहते, तो उनको किसी देवी तीर्थ स्थान इत्यादि में सम्मानपूर्वक विसर्जन करें, वहाँ उनका स्थान दे दें, या उनके धाम को लौट जाने का जो विधि-विधान है वह करवा दें — ताकि वे फिर आपको परेशान न करें और आपको भी कोई दोष न लगे। वक्ता कहते हैं कि यह सम्मानपूर्वक होना चाहिए।
योग्य व्यक्ति के माध्यम से गुरु धारण, श्रेष्ठ हो कुल के गुरु
शक्ति को रखने का निर्णय हो जाए तो गुरु किसे बनाना चाहिए?
वक्ता कहते हैं कि जब यह तय हो जाए कि सवारी को स्थान देंगे और उनकी सेवा-पूजा करेंगे, तब किसी योग्य जानकार व्यक्ति के माध्यम से गुरु बनाना चाहिए और उनके द्वारा पूरे विधि-विधान जानने चाहिए। सबसे उचित यह है कि आपके कुल के कोई गुरु हों; अन्यथा कोई सही व्यक्ति, जिन पर आप विश्वास कर सकें और जो आपको किसी प्रकार की हानि न पहुँचाएँ।
वक्ता कहते हैं कि जब यह कंफर्म हो जाए — हाँ, जो सवारी आ रही है उनको हम स्थान देंगे, उनकी सेवा-पूजा करेंगे, उनके द्वारा अपने परिवार का कल्याण करेंगे — तब आपको किसी योग्य जानकार व्यक्ति के माध्यम से गुरु बनाना चाहिए। गुरु बनाकर उनके द्वारा इन पूरे विधि-विधानों को जानना चाहिए। उसके लिए सबसे उचित होता है कि अगर आपके कुल के कोई गुरु (कुलगुरु) हों तो सर्वश्रेष्ठ है। अन्यथा कोई सही व्यक्ति, जिन पर आप विश्वास कर सकें, जो आपको किसी प्रकार की हानि नहीं पहुँचाएँगे — वैसे व्यक्ति के सामने अपने इस विषय को खोलना चाहिए। वक्ता कहते हैं कि इसका ढिंढोरा नहीं पीटना चाहिए कि मेरे शरीर के ऊपर सवारी आने आरंभ हो गई है, मेरे पास तो यह शक्ति-सामर्थ्य है।
असंतुलित ऊर्जा और फूला हुआ मस्तिष्क
यदि कोई गुरु के पास जाए ही नहीं तो क्या होता है?
वक्ता कहते हैं कि आप गुरु के पास न भी जाएँ तो भी वह शक्ति सामर्थ्य की प्राप्ति तो करा ही देंगी, लेकिन वह असंतुलित होगा, और आपके मस्तिष्क पर उनकी ऊर्जा का ऐसा प्रभाव रहेगा कि आप समझ नहीं पाएँगे। आपको लगेगा कि संसार के सबसे बलिष्ठ व्यक्ति आप ही हैं, और इसी कारण आप बहुत सी छोटी-मोटी गलतियाँ कर देंगे जो कालांतर में जीवन में बहुत बड़ी हानि उत्पन्न कर देंगी।
वक्ता कहते हैं कि आप अगर गुरु के पास नहीं भी जाएँगे तो भी आपको सामर्थ्यता की प्राप्ति वह शक्ति करा ही देंगी — लेकिन वह असंतुलित होगा, और आपके मस्तिष्क के ऊपर उनकी ऊर्जा का ऐसा प्रभाव रहेगा कि आप समझ नहीं पाइएगा। आपको लगेगा कि संसार के सबसे बलिष्ठ व्यक्ति आप हैं। जिसके कारण से आप बहुत सारी छोटी-मोटी गलतियाँ कर देंगे, जो कालांतर में आपके जीवन में बहुत बड़ी हानि उत्पन्न कर देंगी। इसलिए, वे कहते हैं, योग्य मार्गदर्शक की शरण में जाएँ — कोई विशेष व्यक्ति जिनको आप गुरु धारण करें — और गुरु धारण करने के पश्चात सबसे पहले उनके बताए गए मार्ग पर चलना चाहिए।
गलत गुरु से शक्ति को कष्ट, और शक्ति से आपको कष्ट
यदि चुने हुए गुरु ही गलत निकल जाएँ तो क्या होगा?
वक्ता कहते हैं कि गुरु का सही होना बड़ा ज़रूरी है। अगर उचित गुरु न मिलें और आप हड़बड़ी में किसी को भी गुरु बना लें तो भी दिक्कत है: वे गलत मार्गदर्शन कर देंगे तो जो शक्ति आपके साथ आ रही हैं उनको भी दिक्कत और कष्ट होगा, और तब वे आपको भी कष्ट देंगी ही देंगी। वे कहते हैं कि यहाँ का सबसे विशिष्ट, सबसे सेंसिटिव पॉइंट यही है — सही व्यक्ति का चयन।
वक्ता कहते हैं कि गुरु का सही होना बड़ा ज़रूरी है। अगर आपको उचित गुरु नहीं प्राप्त होते हैं, और आप हड़बड़ी में किसी को भी गुरु बना लिए, तो भी दिक्कत है। अगर वे गलत मार्गदर्शन कर देंगे तो जो शक्ति आपके साथ आ रही हैं, उनको भी दिक्कत होगी और उनको कष्ट होगा — तो फिर वे आपको भी कष्ट देंगी ही देंगी। यानी यहाँ पर पूरे का पूरा सबसे विशिष्ट, उनके शब्दों में सबसे सेंसिटिव पॉइंट यही है कि सही व्यक्ति का चयन यहाँ होना चाहिए।
गोपनीयता और साधना की अनिवार्यता
यदि गुरु मिलें ही नहीं तो क्या करना चाहिए?
वक्ता कहते हैं कि यदि गुरु की प्राप्ति नहीं हो रही है और शरीर पर सवारी आ रही है, तो कभी भी यह नहीं करना चाहिए कि बहुत अधिक ऊर्जा है, हम तो यह कर देंगे, वह कर देंगे। अगर सवारी बोल भी रही हैं तो भी इन सभी बातों को गुप्त रखते हुए साधना आरंभ करनी चाहिए। बिना साधना के इन शक्तियों का संतुलन संभव नहीं है — यह 100% जान लीजिए, वे कहते हैं; असंतुलित ऊर्जा किसी न किसी दिन तबाह करके रख देती है।
वक्ता कहते हैं कि अगर कोई नहीं मिल रहे हैं, गुरु की प्राप्ति नहीं हो रही है और आपके शरीर के ऊपर सवारी आ रही है, तो कभी भी आपको यह नहीं करना चाहिए कि बहुत अधिक ऊर्जा है, हम तो यह कर देंगे, वह कर देंगे। अगर वह सवारी बोल भी रही हैं तो भी इन सभी बातों को गुप्त रखते हुए साधना आरंभ करनी चाहिए। बिना साधना के इन सभी शक्तियों का संतुलन संभव नहीं है — यह 100% जान लीजिए, वे कहते हैं। असंतुलित ऊर्जा जो होती है वह किसी न किसी दिन तबाह करके रख देती है। इसलिए गुरु अगर नहीं हैं तो स्वयं से आपको इन सभी विषयों की जानकारी लेकर साधनाएँ करनी चाहिए।
कुल परंपरा, अन्यथा भगवान दत्तात्रेय, फिर गणपति और भैरव
गुरु न हों तो सबसे पहले कौन-सी साधना आरंभ करनी चाहिए?
आरंभिक साधना के विषय में वक्ता कहते हैं: यदि आपके घर में गुरु परंपरा (गुरु परंपरा) रही है, कोई दीक्षित रहे हैं, साधक रहे हैं, तो वे जिस परंपरा में थे उसके अनुसार कीजिए। अन्यथा किसी भी महाशक्ति की उपासना, या भगवान दत्तात्रेय की — गुरु स्वरूप, जिन्हें वे पूरे संसार के सबसे समर्थशाली गुरु, दिव्य गुरु कहते हैं — उनकी साधनाएँ आरंभ में करके तत्पश्चात गणपति साधना, भैरव साधना इत्यादि एक-एक करके करनी होंगी।
आरंभिक साधना के विषय में वक्ता कहते हैं कि अगर आपके घर में गुरु परंपरा (गुरु परंपरा) रही है, कोई दीक्षित (दीक्षा) रहे हैं, साधक रहे हैं, तो वे किस परंपरा में थे उसके अनुसार कीजिए। अन्यथा कोई भी महाशक्ति की उपासना; या भगवान दत्तात्रेय, जो गुरु स्वरूप हैं — पूरे संसार के सबसे समर्थशाली गुरु भगवान दत्तात्रेय, दिव्य गुरु हैं। उनकी साधनाएँ आरंभ में करके तत्पश्चात आप जाकर गणपति (गणेश) साधना, भैरव साधना इत्यादि करके तब इन सभी चीज़ों को एक-एक करके करेंगे। वे कहते हैं कि यह आपको करना ही होगा, अगर आप चाहते हैं कि जीवन में इन शक्तियों का साथ आपको सही प्रकार से, संतुलित होकर मिले।
सवा-सवा लाख के पाँच अनुष्ठान, फिर अन्य मंत्र और रक्षा कवच
गुरु मंत्र को चैतन्य कैसे किया जाता है, और उसके बाद क्या?
वक्ता कहते हैं कि गुरु मिल जाएँ तो उनके द्वारा प्रदत्त मंत्र को चैतन्य करना है। न मिलें तो स्वयं से किसी महाशक्ति का आश्रय लेकर — गुरु दक्षिणामूर्ति, भगवान दत्तात्रेय, या भगवान शिव के किसी भी स्वरूप का — गुरु स्वरूप में उनकी उपासना करनी चाहिए। गुरु मंत्र के सवा-सवा लाख के पाँच अनुष्ठान कीजिए, साल भर तक अनुष्ठान करते हुए। फिर जो अन्य मंत्र करना है — भगवती का, हनुमान जी का, भैरव जी का — उनका क्रमगत अनुष्ठान कर लें, और रक्षा कवच का भी, यानी स्वयं को पहले पूर्ण सुरक्षित कर लें।
वक्ता कहते हैं कि जब गुरु मिल जाते हैं तो उनके द्वारा प्रदत्त मंत्र को चैतन्य करना है। नहीं मिलते हैं तो स्वयं से ही किसी महाशक्ति का आश्रय लेकर — गुरु दक्षिणामूर्ति, भगवान दत्तात्रेय, या भगवान शिव के किसी भी स्वरूप का — गुरु स्वरूप में उनकी उपासना करनी चाहिए। मंत्रों को चैतन्यदेवता के प्रकट होने से पूर्व पढ़े गए विशेष स्तोत्रों के पाठ से जागृत होने वाली उनकी पूर्ण चैतन्य व सजीव उपस्थिति। करना चाहिए। गुरु मंत्र के सवा-सवा लाख के पाँच अनुष्ठानएक दीर्घ अनुष्ठान — जिसमें अपने कड़े नियम होते हैं। कीजिए। साल भर तक अनुष्ठान करके गुरु मंत्र को अच्छे प्रकार से चैतन्य करें। चैतन्य मंत्र मिल गया और कोई अन्य मंत्र करना है — भगवती का कोई मंत्र, हनुमान जी का, भैरव जी का — तो पहले क्रमगत उनका अनुष्ठान कर लें। रक्षा कवच इत्यादि का अनुष्ठान कर लें। यानी सबसे पहले स्वयं को पूर्ण सुरक्षित कर लें — वे कहते हैं कि यह ज़रूरी है।
त्रिनेत्र सिद्धि के बाद — वीरों का परिवार और कुल के पूर्वज
त्रिनेत्र की संतुलित सिद्धि के बाद ही गुरु अपने स्थान पर बैठकर साधक को उसकी शक्तियों से परिचित कराते हैं
वक्ता कहते हैं कि इसके पश्चात ही आगे बढ़ने पर — कुछ अनुष्ठान करवाने के बाद, जब त्रिनेत्र (दिव्यदृष्टि) इत्यादि की सही प्रकार से संतुलित सिद्धि प्राप्त हो जाएगी — तब गुरु अपने स्थान पर बैठकर आपको आपकी शक्तियों से परिचित करवाएँगे। केवल एक ही शक्ति नहीं होतीं: कोई भगवती, कोई योगिनी या कोई देवता आते हैं तो उनके साथ चलने वाली कई अन्य शक्तियाँ और कई वीर होते हैं।
वक्ता कहते हैं कि इसके पश्चात ही जब आगे बढ़ेंगे, और अगर आपको गुरु प्राप्त हुए हैं, तो कुछ अनुष्ठानएक दीर्घ अनुष्ठान — जिसमें अपने कड़े नियम होते हैं। करवाने के बाद जब आपको त्रिनेत्र (दिव्यदृष्टि) इत्यादि की सही प्रकार से संतुलित सिद्धि प्राप्त हो जाएगी, तब गुरु अपने स्थान पर बैठकर आपको आपकी शक्तियों से परिचित करवाएँगे। केवल एक ही शक्ति नहीं होती हैं। अगर कोई भगवती, कोई योगिनी आ रही हैं या कोई देवता आ रहे हैं, तो उनके पूरे साथ में चलने वाली कई अन्य शक्तियाँ होंगी, कई वीर होंगे। उनकी पूरी जानकारी आपको गुरु जी के द्वारा दी जाएगी — कि हाँ, तुम्हारे साथ यह देवी हैं, ये इनकी अगवानी करने वाले वीर हैं, ये साथ चलने वाले वीर हैं। किसी भी जगह जब आप किसी को भेजोगे तो यही वीर जाकर जानकारी लाएँगे। ये इनके साथ की शक्तियाँ हैं। और आपके कुल में जो पूर्वज इस प्रकार से मृत हुए थे, वे भी इनके साथ में चलते हैं, इनकी सेवा में रहते हैं। वक्ता कहते हैं कि इन सभी विषयों की जानकारी आपको आपके गुरु के द्वारा दी जाएगी कि इस प्रकार की पूरी शक्ति है।
पूर्णिमा या अमावस्या का खप्पर, शराब, और भोग देने का स्थान
किसी को पूर्णिमा तो किसी को अमावस्या का खप्पर, अलग-अलग प्रकार की शराब, और हर शक्ति के भोग का नियत स्थान
वक्ता कहते हैं कि तत्पश्चात उनके भोगों के विषय में बताया जाएगा कि किसको किस प्रकार से भोग दिया जाएगा। बहुत सी ऐसी शक्तियाँ होती हैं जिनको पूर्णिमा के दिन खप्पर चढ़ता है, किसी को अमावस्या के दिन; किसी को शराब की धार लगती है, किसी को सादा शराब, किसी को कच्ची। किन्हीं को घर से बाहर भोग देना है, किन्हीं को चौखट पर, किन्हीं को पूजन स्थान में, किन्हीं को पानी रखने वाले स्थान में, किसी को तुलसी जी में, किसी को नदी या सरोवर के किनारे जाकर।
वक्ता कहते हैं कि तत्पश्चात उनके भोगों के विषय में बताया जाएगा — कि इनको इस-इस प्रकार से भोग दिया जाएगा। बहुत सी ऐसी शक्तियाँ होती हैं जिनको पूर्णिमा के दिन खप्पर चढ़ रहा है, किसी को अमावस्या के दिन खप्पर चढ़ रहा है; किसी को शराब की धार लग रही है, किसी को सादा शराब की धार, किसी को कच्ची — ये सभी विषय वहाँ बताए जाएँगे। किन्हीं को घर से बाहर भोग देना है, किन्हीं को चौखट पर भोग देना है, किन्हीं को पूजन स्थान में, किन्हीं को आपके पानी रखने वाले स्थान में, किसको तुलसी जी में, किसको नदी के किनारे, सरोवर के किनारे जाकर भोग देना है। वे कहते हैं कि अगर आप विधिवत चलना चाहते हैं तो इन सभी विषयों को आपके गुरु जी बताएँगे — किस समय, और दीपावली इत्यादि के समय में कब किसको कैसे भोग देना है। योगिनी की पूरी अगर सेना है तो उनको कैसे भोग देना है। यह सारा विषय आपको बताया जाएगा।
दरबार, प्रोफेशन और नीयत पर गुरु का प्रश्न
साधक शक्ति को अपने घर तक सीमित रखे या दरबार लगाए?
वक्ता कहते हैं कि जब सारा विधि-विधान हो जाए और मंत्र के जप से सिद्धि प्राप्त हो जाए, तब गुरु जी पूछेंगे कि आप स्वयं के अपने घर तक कल्याण करने तक सीमित रहना चाहते हो या दरबार इत्यादि लगाना चाहते हो। यदि आप चाहते हैं कि लोग आपके स्थान पर आएँ, तो आपका प्रोफेशन क्या है, आप पढ़ाई-लिखाई कर रहे हैं, आगे जीवन में क्या करना है, और घर के लोग कितने सहयोगी होंगे — यह सब देखकर ही निर्णय लेना चाहिए, और यह भी कि आप यह कार्य उचित प्रकार से करना चाहते हो या केवल फेमस होने के लिए।
वक्ता कहते हैं कि तत्पश्चात जब यह सब विधि-विधान हो जाएगा और मंत्र इत्यादि के जप से आपको सिद्धि इत्यादि की प्राप्ति हो जाएगी, तब गुरु जी इस चीज़ के लिए पूछेंगे: तुम स्वयं के अपने घर तक कल्याण करने तक सीमित रहना चाहते हो, चाहती हो, या आप दरबार इत्यादि लगाना चाहते हो। अगर आपकी इच्छा है कि हाँ, लोग आपके स्थान पर आएँ, आप दरबार इत्यादि लगाएँ, तो आपका क्या प्रोफेशन है, आप पढ़ाई-लिखाई कर रहे हैं, आपको आगे जीवन में क्या करना है — इन सभी चीज़ों को देखकर ही तब यह निर्णय लेना चाहिए। आपके घर के लोग इसमें कितने सहयोगी होने वाले हैं; और आप यह कार्य सही प्रकार से, उचित प्रकार से करना चाहते हो या केवल फेमस होने के लिए — आजकल की जैसी ये सभी चीज़ें, मुंडी घुमाना और यह कर देंगे, वह कर देंगे, हम यह शक्ति हैं, मेरा यह सामर्थ्य है। वे कहते हैं कि नहीं, यह वह नहीं है।
सवा साल, पाँच साल या बारह साल का निषेध
दरबार लगाने से पहले साधक को कितनी अवधि प्रतीक्षा करनी होती है?
वक्ता कहते हैं कि अगर विधिवत करना हो तो गुरु जी से बोलिए कि हम अच्छे प्रकार से सीखकर यह सब करना चाहते हैं, तो वे आपको विधि-विधान सिखाएँगे — और उसमें कम से कम सवा साल का, पाँच साल तक का, या बारह-बारह साल तक का निषेध होता है, जिसमें आप शक्ति को केवल जागृत करेंगे।
वक्ता कहते हैं कि अगर विधिवत करना हो, सही तरीके से करना हो, तब आप गुरु जी से बोलिए कि हाँ, हम अच्छे प्रकार से सीखकर यह सब कुछ करना चाहते हैं — तो वे आपको विधि-विधान सिखाएँगे। और उसमें कम से कम सवा साल का, पाँच साल तक का, या बारह-बारह साल तक का निषेध होता है, जिसमें आप शक्ति को केवल जागृत करेंगे। वे कहते हैं कि एक बात याद रखिएगा — शरीर पे खेल करके हमेशा प्रतिदिन खेलना, यह वह नहीं है।
प्रतिदिन सवारी के विरुद्ध वचन, और महीने के नियत दिन
क्या सवारी का प्रतिदिन आना सही है?
वक्ता कहते हैं कि शक्ति को जागृत करके जब वचन में (वचनबद्ध) लिया जाता है, तो गुरु इस चीज़ के लिए वचन करवाते हैं कि रोज़ प्रतिदिन नहीं आना है। वे साफ़ कहते हैं कि प्रतिदिन सवारी आ रही है तो भैया आप एकदम लेवल ज़ीरो पे हो; और जब चाहे तब बुला लेते हो और सवारी आ जाती है तो बहुत गड़बड़ है। वचन के समय ही तय होता है कि महीने में एक बार अष्टमी, चतुर्दशी, अमावस्या या पूर्णिमा के दिन दरबार लगे, और उसी दिन तथा उनके पर्व काल में देवी या देवता शरीर पर आएँगे।
वक्ता कहते हैं कि शक्ति को जब जागृत कर लिया जाता है और वचन में (वचनबद्ध) लिया जाता है — शरीर पे सवारी आ रही होती है — तो गुरु इस चीज़ के लिए वचन करवाते हैं कि रोज़ प्रतिदिन नहीं आना है। प्रतिदिन सवारी अगर आ रही है तो, वे कहते हैं, भैया आप एकदम लेवल ज़ीरो पे हो। अगर आप जब चाहे तब बुला लेते हो और सवारी आ जाती है तो बहुत गड़बड़ है। तो यह कभी नहीं होना चाहिए। इसके लिए जब वचन होता है तब उसी समय बताया जाता है: हाँ, महीने में एक बार अष्टमी को, चतुर्दशी को, अमावस्या या पूर्णिमा के दिन दरबार लगे, और उस दिन आपके शरीर पे देवी आएँगी या देवता आएँगे। उनका जो पर्व काल इत्यादि का समय है, उसमें वे आएँगे। ये सभी चीज़ें फिक्स होंगी और उसके बाद ही यह विषय आगे बढ़ेगा — इस प्रकार संतुलित होकर।
राजा स्वयं काम नहीं करता — उतारा साथ चलने वाली शक्तियों के नाम से
क्या प्रमुख देवी स्वयं उतारा करेंगी?
वक्ता इसे क्षुद्र प्रकार की क्रिया बताते हैं और कहते हैं कि यह गलत है। अगर प्रमुख देवी, राजा ही काम करने लगेंगी, तो उसके इतने सारे नौकर-चाकर सेवकों का क्या काम? जो देवी आपके शरीर पे आ रही है वही देवी उतारा भी कर रही है और काट (तंत्र काट) भी कर रही है, तो साथ में चलने वाली बाकी सभी शक्तियों का क्या काम? गुरु बताएँगे कि साथ चलने वाली शक्तियों के नाम से उतारा देना है; प्रमुख शक्ति सिर्फ़ आदेश करेगी।
वक्ता कहते हैं कि उसके पश्चात अगर कोई काम करना है, किसी के शरीर में कोई रोग की उपस्थिति है, तो गुरु बताएँगे कि रोग का उतारा कौन से देवता के नाम से और किस-किस प्रकार से किया जाएगा। ये नहीं कि देवी आईं, घुमा करके नींबू फेंक दी, घुमा करके ऐसे ही उतार दी, कुछ भी किए जा रहे हैं — नहीं। प्रमुख देवी, राजा ही अगर काम करने लगेगा तो फिर उसके इतने सारे नौकर-चाकर सेवक हैं, उनका क्या काम? आप कितने क्षुद्र प्रकार की क्रिया कर रहे हो कि जो देवी आपके शरीर पे आ रही है वही देवी उतारा भी कर रही है, वही देवी काट (तंत्र काट) भी कर रही है — तो फिर साथ में चलने वाली बाकी सभी शक्तियों का क्या काम, भाई? राजा स्वयं काम कब करता है? वे कहते हैं कि यह गलत है — आपको जानकारी नहीं है, आप फिर हवाबाजी कर रहे हो, सीधी सी बात है। गुरु आपको बताएँगे कि साथ में चलने वाली इन शक्तियों के नाम से आपको ऐसे उतारा देना है। किसी को धन की समस्या है तो कौन शक्ति वहाँ कार्य करेगी, किसी का देखना-सुनना है तो कौन सी शक्ति काम करेगी। प्रमुख शक्ति सिर्फ़ आदेश करेगी। मस्तक के ऊपर सवारी की जो प्रमुख शक्ति है वह सदैव विराजमान नहीं होती है। अगर आप इस भुलावे में हो कि जब आप बुलाते हो तब शक्ति शरीर पे, मस्तक पे आ जा रही है और आप खेल ले रहे हो — तो भाई, आप बिल्कुल ज़ीरो लेवल में हो, आपके साथ छल हो रहा है, आप आज नहीं तो कल गर्त में गिरोगे ही गिरोगे।
मुख भराई, गद्दी बंधन, आगंतुकों के नियम, और स्थान की सफाई
मुख भराई, गद्दी बाँधना, आने वालों के नियम, और उतारे के बाद स्थान को खाली करना
वक्ता कहते हैं कि गुरु ही आगे बताएँगे कि दरबार लगाने के लिए पहले मुख भराई होगी, गद्दी बाँधी जाएगी — यानी स्थान दिया जाएगा। वे बताएँगे कि जिस स्थान पे दरबार लगाएँगे उसकी सुरक्षा किस प्रकार होगी, वहाँ आने वाले लोगों का क्या नियम होगा, उनको किस प्रकार आना है, उनका किस प्रकार वचन होगा, और उतारा हो जाने के बाद अपने स्थान को खाली कैसे करना है — क्योंकि आप जो प्रेत उतार रहे हैं वह अन्यथा वहीं रह जाएगा और आपके लिए दिक्कत बन जाएगा।
वक्ता कहते हैं कि गुरु ही आपको आगे यह भी बताएँगे कि किस प्रकार से दरबार लगाने के लिए पहले मुख भराई होगी, गद्दी बाँधी जाएगी — यानी स्थान दिया जाएगा। जिस स्थान पे आप दरबार लगाएँगे उसकी सुरक्षा किस प्रकार से होगी; वहाँ जब लोग आएँगे तो उनका क्या नियम होगा, किस प्रकार से उनको आना है, किस प्रकार से उनका वचन होगा। जब उनका सारा उतारा या जो भी चीज़ है वह कर लेंगे, तब अपने स्थान को खाली कैसे करना है? अब लोगों की मलामत — आप खुद प्रेत उतारकर अपने स्थान पे रख रहे हैं या भेज रहे हैं; वह चीज़ वहीं रह जाएगी तो आपको दिक्कत है। उसके लिए भी गुरु ही बताएँगे कि फिर उसकी सफाई कैसे होगी, निकारी (क्षेत्रपाल निकारीक्षेत्रपाल को अर्पित एक विसर्जन-अनुष्ठान — सुरक्षा तथा क्षेत्र में निवास करने वाली दुष्ट शक्तियों (डाकिनी, शाकिनी, भूत, प्रेत, पिशाच, वेताल) की शांति हेतु प्रार्थना, जो घर की देहरी पर व्याप्त दुष्ट ऊर्जाओं को कम-से-कम 24 घंटे हेतु शुद्ध कर देती है।) कैसी की जाती है, आपके स्थान को कैसे सुरक्षा देनी है, और किन देवताओं के स्थान पे उतारा करना है। उसके पश्चात आपके परिवार की सुरक्षा — कि इसका दुष्प्रभाव किसी के ऊपर न पड़े। वे कहते हैं कि ये सारी चीज़ें आपके गुरु के द्वारा बताई जाएँगी।
गलती खोजने से पहले ही बर्बादी शुरू हो जाती है
सवारी शुरू हुई, हल्ला मचा, और चार-पाँच दिन में दरबार तथा झाड़-फूँक शुरू — बर्बादी गलती खोजने से पहले ही आरंभ हो जाती है
वक्ता उस ढर्रे के विरुद्ध चेतावनी देते हैं जिसमें आज सवारी आना शुरू हुआ, हल्ला हुआ कि फलाना देवी आनी शुरू हो गईं, और चार दिन, पाँच दिन, महीने भर के बाद आप दरबार लगा रहे हैं, झाड़-फूँक (झाड़ा) कर रहे हैं, लोगों को राहत हो जा रही है, आपका नाम हो गया। जब पूरा मैटर बिगड़ चुका होता है — दुष्ट शक्तियाँ हावी हो चुकी होती हैं, शुभ शक्ति मलिनता या किसी अन्य कारण से दूर हो चुकी होती है और आपकी बर्बादी शुरू हो चुकी होती है — तब आप खोजना शुरू करते हैं कि गलती कहाँ की। इसलिए, वे कहते हैं, गलती न करें।
वक्ता कहते हैं कि सवारी आने पे इन सभी विषयों पर ध्यान रखना चाहिए जिनके बारे में चर्चा की गई है, और तदनुसार इन सभी विषयों को सीखकर ही आगे की प्रक्रिया करनी चाहिए। ये नहीं कि आज सवारी आना शुरू हुआ, हल्ला हुआ रे फलाना देवी आनी शुरू हो गईं, और आप खेलना शुरू किए; और चार दिन, पाँच दिन, महीने भर के बाद आप दरबार लगा रहे हैं, झाड़-फूँक (झाड़ा) कर रहे हैं, लोगों को राहत हो जा रही है, नाम हो गया आपका, कुछ भी किए जा रहे हैं। जब यह पूरा मैटर बिगड़ चुका होता है, जब दुष्ट शक्तियाँ आपके ऊपर हावी हो चुकी होती हैं, जो शुभ शक्ति होती है वह मलिनता के कारण, किसी अन्य कारण से दूर हो चुकी होती है, आपकी पूरे तरीके से बर्बादी शुरू हो चुकी होती है — तब आप खोजना शुरू करते हैं कि हम गलती कहाँ किए हैं। इसलिए, वे कहते हैं, गलती न करें। जब भी शक्तियाँ आनी आरंभ होती हैं तो विधिवत तरीके से, नियम से संभालते हुए, स्वयं को बचाते हुए, परिवार को बचाते हुए इन विधानों को आगे करें, ताकि सुरक्षात्मक रूप से आप जीवन में इस उद्देश्य को लेकर आगे चल सकें। अंत में वे आशा करते हैं कि इस विषय से सभी साधक-साधिकाएँ लाभ उठाएँगे।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।