भगवान दत्तात्रेय से देव दीक्षा — गृहस्थ के लिए पूरा विधान, पूर्णिमा से पूर्णिमा तक

भगवान दत्तात्रेय से देव दीक्षा लेने का पूरा विधान।

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01

किसी भी महीने की पूर्णिमा या कोई शुभ पर्व काल — पूर्णिमा से पूर्णिमा तक सर्वोत्तम

भगवान दत्तात्रेय के देव दीक्षा विधान को किस दिन किया जा सकता है?

· Reviewed Sep 2026 · 00:16–00:32 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि यह विधान किसी भी महीने की पूर्णिमा को किया जा सकता है, अथवा किसी भी शुभ पर्व काल में। यदि आप पूर्णिमा से पूर्णिमा तक इस साधना को करते हैं तो अत्यंत उत्तम होता है। चूँकि किसी गुरु परंपरा से आपको मंत्र प्राप्ति नहीं होगी, इसलिए, वे कहते हैं, आपको एक मास का यह विधान करना चाहिए।

02

एक दिन वाला रूप, और देख लेने योग्य सामग्री

एक दिन का विधान भी संभव है, और आरंभ से पहले पूरी सामग्री देख लेनी है।

· Reviewed Sep 2026 · 00:33–00:40

वे कहते हैं कि यदि आप एक दिन का भी विधान करेंगे तो उसका क्या-क्या विधान है, यह आगे के वीडियो में बताया जाएगा — हर एक चीज बताई जाएगी। फिर वे दर्शक से कहते हैं कि जो-जो सामग्री लगेगी, उन सभी चीजों को अच्छे प्रकार से देख लीजिए।

यदि आप एक दिन का भी विधान करेंगे, वक्ता कहते हैं, तो उसका क्या-क्या विधान है वह वे आगे के वीडियो में बताएँगे — हर एक चीज समझाएँगे। फिर वे सामग्री की ओर मुड़ते हैं: जो-जो सामग्री लगेगी, उन सभी चीजों को अच्छे प्रकार से देख लीजिए।

03

फोटो या श्री विग्रह, जीवन पर्यंत के लिए

दत्तात्रेय का फोटो या श्री विग्रह, यथाशक्ति जितना बड़ा हो सके — उन्हें जीवन पर्यंत सद्गुरु माना जा रहा है, इसलिए यह अवश्य होना चाहिए।

· Reviewed Sep 2026 · 00:41–00:52

भगवान दत्तात्रेय का फोटो, जिसमें उतने ही पुष्प सजाए गए हों जितने दिखाए गए हैं। वक्ता कहते हैं कि यथाशक्ति आप फोटो को बड़ा रख सकते हैं, या श्री विग्रह रख सकते हैं। चूँकि जीवन पर्यंत इनको सद्गुरु माना जा रहा है, इसलिए, वे कहते हैं, इनका श्री विग्रह या फोटो अवश्य होना चाहिए।

भगवान दत्तात्रेय का फोटो चाहिए, जिसके चारों ओर उतने पुष्प सजाए गए हों जितने प्रदर्शन में सजाए गए हैं। यथाशक्ति, वक्ता कहते हैं, आप फोटो को बड़ा रख सकते हैं, या श्री विग्रह रख सकते हैं। चूँकि जीवन पर्यंत इनको सद्गुरु माना जा रहा है, इसलिए इनका श्री विग्रह या फोटो अवश्य उपस्थित होना चाहिए।

04

कलश, पूर्ण पात्र, अक्षत, दूब, तुलसी, बिल्व, पान और पीला वस्त्र

कलश, पूर्ण पात्र, अक्षत, दूब, तुलसी, बिल्व, पान, सुपारी, लौंग और इलायची, तथा गुरु वरण हेतु पीला पीतांबरी धोती और गमछा।

· Reviewed Sep 2026 · 00:53–01:10

कलश का सामान: कलश, उसके ऊपर का पूर्ण पात्र, चावल अक्षत और दूब। फिर तुलसी पत्र, बिल्व पत्र, पान का पत्ता, सुपारी, लौंग और इलायची; और इन सभी के साथ गुरु वरण के हेतु एक वस्त्र — जो धोती होगा, पीला पीतांबरी वस्त्र। पीली धोती और गमछा आपके पास अवश्य हो।

05

दक्षिणा, दूर्वा, फल-मिठाई, दो भोजपत्र, नया गोमुखी और असली रुद्राक्ष माला

दक्षिणा, दूर्वा, फल और मिठाई, दो छोटे भोजपत्र, नया गोमुखी, और जीवन पर्यंत जप के लिए असली रुद्राक्ष की माला।

· Reviewed Sep 2026 · 01:11–01:36

दक्षिणा के लिए कुछ पैसे; दूर्वा घास, फल, फूल और मिठाई। दो छोटे भोजपत्र चाहिए होंगे। एक गोमुखी — नया गोमुखी — और नई रुद्राक्ष की माला। रुद्राक्ष की माला असली हो, सही हो, वक्ता कहते हैं, क्योंकि जीवन पर्यंत उसी पर जप करना है। कालांतर में यदि आपकी इच्छा हो तो तंत्रोक्त रुद्राक्ष की माला भी आप ले सकते हैं।

06

मंडल के लिए सुपारी; अष्टगंध, केसर, कुमकुम, गोरोचन, चांदी का तार और दो कवच

गौरी गणेश का मंडल बनाने के लिए सुपारी; स्याही के लिए अष्टगंध, केसर, कुमकुम और गोरोचन; चांदी का एक तार और दो कवच खोल।

· Reviewed Sep 2026 · 01:37–02:02

गौरी गणेश के लिए, मंडल बनाने के लिए सुपारी इत्यादि भी आपके पास हो। फिर अष्टगंध चाहिए होगा, तथा स्याही बनाने के लिए केसर, कुमकुम और गोरोचन, चांदी का एक तार, और दो कवच — वही कवच खोल जो गले में पहनते हैं। इन सभी सामग्रियों की व्यवस्था करने के पश्चात, वक्ता कहते हैं, आप इस साधना को आरंभ करेंगे।

07

कर्म साक्षी दीपक प्रज्वलित करना

अनुष्ठान का आरंभ कर्म साक्षी दीपक प्रज्वलित करके होता है — "दीप और ज्योतिर नमस्तुते"।

· Reviewed Sep 2026 · 02:03–02:19

इस पूरे अनुष्ठान का आरंभ कर्म साक्षी दीपक को प्रज्वलित करके किया जाता है — "दीप और ज्योतिर नमस्तुते"। सामान्य सरल विधान से करें, वक्ता कहते हैं; जिन लोगों को पूरी विधि विधान आती है, वे उस अनुसार कर सकते हैं।

इस पूरे अनुष्ठान का आरंभ, वक्ता कहते हैं, हम कर्म साक्षी दीपक को प्रज्वलित करके करेंगे। वे बोलते हैं: दीप और ज्योतिर नमस्तुते। आप सामान्य सरल विधान से करें, वे कहते हैं। जो विधान वे यहाँ बता रहे हैं, उसके विषय में — जिन लोगों को पूरी विधि विधान आती है, वे उस अनुसार कर सकते हैं।

08

साधना में एकदम नए सामान्य गृहस्थ

यह विधि उन सामान्य गृहस्थों के लिए है जो साधना में एकदम नए हैं, इसमें कोई विशेष क्लिष्ट मंत्र नहीं।

· Reviewed Sep 2026 · 02:20–02:38

वक्ता कहते हैं कि वे बिल्कुल सामान्य वर्ग के लोगों के लिए विधि बता रहे हैं, जो गृहस्थ हैं और साधना में एकदम नए हैं; इसलिए वे अपने शब्द बिल्कुल सरल रखेंगे और किसी विशेष क्लिष्ट मंत्र का प्रयोग नहीं करेंगे। घी का दीपक प्रज्वलित करते हैं, उसे कुमकुम इत्यादि से तिलक करके सुगंधित करते हैं, और पहले की तरह चारों तरफ जल छिड़क देते हैं।

09

हाथ में अक्षत-पुष्प, और स्थान, राज्य व गोत्र का नाम

हाथ में अक्षत और पुष्प लेकर संकल्प में अपना स्थान, राज्य और गोत्र बोला जाता है।

· Reviewed Sep 2026 · 02:39–03:00

हाथ में अक्षत और पुष्प लेकर भगवान दत्त को गुरु स्वरूप में वरण करने हेतु संकल्प लिया जाता है। संकल्प में आप अपने स्थान का नाम, राज्य का नाम, अपने गोत्र इत्यादि का नाम लेंगे। वक्ता उदाहरण स्वरूप उसका उच्चारण कर देते हैं, जिसे सुनकर श्रोता लिख भी सकते हैं।

अब, हाथ में अक्षत और पुष्प लेकर, भगवान दत्त को गुरु स्वरूप में वरण करने हेतु संकल्प लिया जाता है। संकल्प में, वक्ता कहते हैं, आप अपने स्थान का नाम, अपने राज्य का नाम, अपने गोत्र का नाम इत्यादि लेंगे। उदाहरण स्वरूप वे यहाँ उसका उच्चारण कर देते हैं, और श्रोता उसे सुनकर लिख भी सकते हैं।

10

उदाहरण का संकल्प — कल्प, मन्वंतर, स्थान, गोत्र और प्रयोजन

उदाहरण का संकल्प कल्प और मन्वंतर से लेकर तिथि, गोत्र और दत्तात्रेय को सद्गुरु स्वरूप में वरण करने के प्रयोजन तक चलता है।

· Reviewed Sep 2026 · 03:01–04:04

वक्ता एक उदाहरण का संकल्प बोलते हैं: हरि ओम विष्णु विष्णु विष्णु, श्रीमद् भगवान महापुरुष का स्मरण करते हुए, श्री श्वेतवाराह कल्प, वैवस्वत मन्वंतर, 28वाँ, कलियुग के प्रथम चरण में, भूलोक जंबू द्वीप, भारतवर्ष के अंतर्गत सिक्किम नामक राज्य, गुवाहाटी नामक स्थान, कामरूप कामाख्या पीठ के पास अपने गृह स्थान पर, मार्गशीर्ष शुभ मास में, शुक्ल पक्ष पंचमी तिथि के दिन, प्रातः काल में — विश्वनाथ गोत्र में उत्पन्न रुद्रांशु — भगवान दत्तात्रेय को सद्गुरु स्वरूप में वरण करने हेतु पूजन पाठ तथा देव दीक्षा विधान को पूर्ण करने का संकल्प।

11

शिष्य रूप में स्वीकार किए जाने की प्रार्थना, और समापन मंत्र

संकल्प का समापन शिष्य रूप में स्वीकार किए जाने और जीवन पर्यंत मार्गदर्शन की प्रार्थना से होता है, "श्री दत्तात्रेय गुरुदेवाय नमः" के साथ।

· Reviewed Sep 2026 · 04:05–04:36

वे प्रार्थना करते हैं: भगवान दत्त मुझ पर कृपा करें, मुझे अपने शिष्य रूप में स्वीकार करें, और जीवन पर्यंत मुझ पर अपनी कृपा दृष्टि डालते हुए सदैव एक पुत्र के रूप में, पुत्री के रूप में, अपने शिष्य के रूप में मेरा मार्गदर्शन करें। यह संकल्प भगवान दत्त को समर्पित किया जाता है: ओम विष्णवे नमः विष्णवे नमः विष्णवे नमः श्री दत्तात्रेय गुरुदेवाय नमः। फिर पुष्प श्री चरणों में समर्पित कर देते हैं और संकल्प पूर्ण होता है।

12

गौरी गणपति पूजन, और हिंदी में बोलने की छूट

सबसे पहले गौरी गणपति का पूजन होता है, और जिन्हें मंत्रोच्चारण नहीं आता वे सरल भाव से हिंदी में बोलते हुए पूजन कर सकते हैं।

· Reviewed Sep 2026 · 04:37–05:02

संकल्प के पश्चात गौरी गणपति का पूजन किया जाता है। संकल्प में स्पष्ट हो गया, वक्ता कहते हैं, कि गौरी गणपति और कलश पूजन इत्यादि सब कुछ भगवान दत्तात्रेय से दीक्षा प्राप्ति के निमित्त किया जा रहा है। अब मंत्रोच्चारण आरंभ होगा — और यदि मंत्रोच्चारण नहीं आता, वे कहते हैं, तो बिल्कुल सरल भाव से हम हिंदी में बोलते हुए करेंगे।

13

दो सुपारी, आवाहन, और चार बार जल

दो सुपारी गणेश और पार्वती के रूप में; पुष्प से दोनों का आवाहन, और चार बार जल — पैर, हाथ, आचमन, स्नान।

· Reviewed Sep 2026 · 05:03–05:37

एक सुपारी गणेश जी हैं, दूसरी सुपारी माँ भगवती पार्वती हैं। पुष्प लेकर उनका आवाहन किया जाता है — आप जहाँ कहीं भी हों, यहाँ आकर प्रतिष्ठित हो जाइए — और फिर पुष्प चढ़ा देते हैं। इसके बाद दोनों के ऊपर चार-चार बार जल डाला जाता है: पहले उनके पैर धुलने के लिए, फिर हाथ धुलने के लिए, फिर आचमन के लिए, और फिर स्नान के लिए।

14

वस्त्र के रूप में मौली, हर बार तीन बार जल, और यह विधान किसके लिए है

मौली धागा ही वस्त्र और उपवस्त्र का काम करता है, हर समर्पण के बाद तीन बार जल आचमन हेतु — और यह विधान स्त्री-पुरुष दोनों के लिए है।

· Reviewed Sep 2026 · 05:38–06:26

स्नान के पश्चात वस्त्र और उपवस्त्र चढ़ाए जाते हैं — मौली धागा तोड़कर, यह बोलते हुए कि "हे श्री गणेश, आप वस्त्र स्वीकार करें", और फिर तीन बार जल गिरा देते हैं; वैसे ही माँ पार्वती को भी। वस्त्र, उपवस्त्र और यज्ञोपवीत चढ़ाने के बाद तीन बार जल अवश्य डालना चाहिए, आचमन के लिए। वक्ता कहते हैं कि यह विधान इतने सामान्य और सरल तरीके से बताया जा रहा है कि यह हर किसी के लिए है — स्त्री-पुरुष दोनों इसे कर सकते हैं।

15

अष्टगंध, सिंदूर और अक्षत, एक-एक करके

अष्टगंध, फिर सिंदूर, फिर अक्षत — हर बार पुष्प में लगाकर पहले गणपति जी को, फिर माँ पार्वती को।

· Reviewed Sep 2026 · 06:27–07:04

अष्टगंध का तिलक किया जाता है: पुष्प में हल्का सा गंध लेकर गणपति जी को चढ़ाएँ, फिर थोड़ा सा गंध लेकर माँ पार्वती को चढ़ाएँ। फिर सिंदूर का तिलक, पुष्प में सिंदूर लगाकर पहले गणपति जी को और फिर माँ पार्वती को। फिर दोनों को अक्षत चढ़ाया जाता है। वक्ता कहते हैं कि पूरा विधान धीरे-धीरे, एक-एक करके दिखाया जा रहा है ताकि सामान्य व्यक्ति देखकर कर सके।

16

पंचोपचार, नैवेद्य, और पान पत्ता जो अवश्य चढ़ाना चाहिए

दोनों को नैवेद्य, और पान के पत्ते का अग्र भाग काटकर उस पर सुपारी, दो लौंग और एक इलायची — दोनों को अलग-अलग।

· Reviewed Sep 2026 · 07:05–07:44

जितना उपचार का पूजन आपको आता हो उतना करना चाहिए; पंचोपचार भी कर सकते हैं, या जैसा यहाँ किया जा रहा है वैसा भी। पहले दोनों को नैवेद्य चढ़ाया जाता है। वक्ता कहते हैं कि संसाधनों की कुछ कमी के कारण यहाँ पान पत्ता उपलब्ध नहीं हो पाया, पर आप सभी पान पत्ता अवश्य चढ़ाएँ — पत्ते का अग्र भाग काटकर, जैसा उन्होंने दूसरे वीडियो में दिखाया है। पान पत्ते के ऊपर सुपारी, दो लौंग और एक इलायची दोनों को अलग-अलग चढ़ाना चाहिए। फिर भोग लगाकर धूप-दीप दिखाया जाता है।

17

दूर्वा और पुष्प आरंभ में; धूप केवल गणपति को

दूर्वा और पुष्प आरंभ में ही चढ़ा लेने चाहिए, और धूप केवल गणपति को दिखाई जाती है, भगवती को नहीं।

· Reviewed Sep 2026 · 07:45–08:11

वक्ता कहते हैं कि जो दूर्वा घास छूट गई थी वह आप आरंभ में भी चढ़ा सकते हैं — दूब घास, पुष्प इत्यादि यह सब आरंभ में ही चढ़ा लें। प्रदर्शन में उस समय पुष्प और घास आया नहीं था, इसलिए अभी चढ़ाया जा रहा है। वे कहते हैं कि भगवती को धूप नहीं चढ़ाना है, धूप सिर्फ गणपति को चढ़ाना है। तत्पश्चात आरती की जाती है।

18

आरती तीन, पाँच या सात बार, चारों ओर जल, और दक्षिणा

आरती तीन, पाँच या सात बार दिखाई जाती है, उसके चारों ओर जल डालकर दक्षिणा समर्पित की जाती है — इसी से गौरी गणपति पूजन पूर्ण होता है।

· Reviewed Sep 2026 · 08:12–08:52

इस प्रकार गणेश अंबिका यानी गौरी गणपति का पूजन पूर्ण होता है। आरती पाँच बार दिखा देनी चाहिए — तीन बार, पाँच बार या सात बार। आरती दिखाने के पश्चात आरती के चारों ओर जरा सा जल डाल देना चाहिए। फिर दक्षिणा समर्पित की जाती है, इन शब्दों के साथ: हम जो भी पूजन किए हैं उसका पूर्ण फल प्राप्त हो, इस हेतु हे गणपति, हे अंबिका, मैं आपको यथाशक्ति द्रव्य दक्षिणा समर्पित करता हूँ।

19

कलश भरना, नदियों का मंत्र, स्वस्तिक, दूर्वा, सुपारी और सिक्का

कलश में जल भरकर सभी नदियों का स्मरण किया जाता है, उस पर स्वस्तिक और मौली, और उसमें दूर्वा, सुपारी तथा एक सिक्का।

· Reviewed Sep 2026 · 08:53–09:27

वरुण देवता के पूजा हेतु कलश को सजाकर जल भर लेते हैं, और उसके ऊपर हाथ रखकर सभी नदियों का स्मरण करते हैं, इस मंत्र से: गंगा च यमुना च यो गोदावरी सरस्वती नर्मदा सिंधु कृष्णा कावेरी जलस्निध्यम कुरु — अथवा इन सभी नदियों का नाम लेते हैं। उस पर स्वस्तिक बनाया जाता है और कंठ पर मौली धागा लपेटा जाता है। उसमें पहले दूर्वा, फिर सुपारी और कुछ द्रव्य दक्षिणा डालते हैं — यहाँ तांबे का सिक्का, यद्यपि कोई भी सिक्का डाला जा सकता है।

20

सिंदूर लगे पाँच, सात या नौ आम के पत्ते, और प्लेट में अखंडित चावल

सिंदूर लगाए हुए पाँच, सात या नौ आम के पत्ते कलश के ऊपर रखे जाते हैं, और पूर्ण पात्र अखंडित चावल से भरी प्लेट है।

· Reviewed Sep 2026 · 09:28–10:04

उसके पश्चात कलश में पंच पल्लव डाले जाते हैं: आम के पत्ते, पाँच, सात या नौ, जिन पर सिंदूर लगाकर उन्हें कलश के ऊपर रख देते हैं। यह कलश स्थापना की सामान्य विधि है, जो यहाँ बिना किसी मंत्र के बताई जा रही है ताकि हर कोई कर पाए। पूर्ण पात्र चावल से भरी प्लेट है — चावल अखंडित हो; वक्ता कहते हैं कि उनके पास जो उपलब्ध था उससे दिखा रहे हैं, और लोग अच्छे चावल का प्रयोग करें जो टूटा हुआ न हो।

21

जटा वाला भाग ऊपर और आपकी ओर

नारियल चावल के ऊपर इस प्रकार रखा जाता है कि जटा वाला भाग ऊपर की ओर और आपकी ओर हो।

· Reviewed Sep 2026 · 10:05–10:36

चावल पर थोड़ा सा पुष्प और दूर्वा रखकर तब नारियल रखा जाता है — नारियल पूर्ण फल है। ध्यान रखें, वक्ता कहते हैं, कि नारियल का जटा वाला भाग ऊपर की ओर हो और आपकी ओर हो। इस प्रकार नारियल कलश के ऊपर स्थापित होता है, और यहाँ वरुण देवता कलश स्थापना विधि पूर्ण होती है। फिर उनका पंचोपचार पूजन किया जाता है।

22

कर्म साक्षी दीप, संकल्प, गणेश अंबिका, कलश स्थापना

कर्म साक्षी दीप, संकल्प, गणेश अंबिका, फिर कलश स्थापना — और सभी देवताओं का आवाहन कलश में ही होता है।

· Reviewed Sep 2026 · 10:37–10:59

वक्ता क्रम दोहराते हैं: सर्वप्रथम कर्म साक्षी दीप प्रज्वलित किया, फिर संकल्प लिया, उसके पश्चात गणेश अंबिका का पूजन किया, और गणेश अंबिका के पूजन के पश्चात वरुण देवता के हेतु कलश स्थापना की। अब वरुण देवता के कलश का पूजन होगा। कलश में ही सभी देवी-देवताओं का आवाहन होगा, और उसी पर अन्य देवों का पूजन होगा।

23

पुष्प से आवाहन, और चार बार जल

पुष्प लेकर वरुण देवता का आवाहन उनके पूरे परिवार और आयुधों सहित, फिर चार बार जल।

· Reviewed Sep 2026 · 11:00–11:29

हाथ में पुष्प लेकर बोलेंगे: हे वरुण देवता, मैं आपका आवाहन करता हूँ; आप पूरे परिवार के साथ और सभी आयुधों के साथ यहाँ उपस्थित होकर कलश में विराजमान हों और मेरे पूजन को स्वीकार करें। उसके पश्चात उनके पैर धुलने के लिए जल, फिर कुल्ला करने के लिए, फिर आचमन के लिए, और फिर स्नान के लिए — इस प्रकार चार बार जल गिरा देंगे।

24

वस्त्र-उपवस्त्र के रूप में मौली, और यज्ञोपवीत या रक्त सूत्र

मौली ही वस्त्र और उपवस्त्र है, हर बार तीन बार जल; यज्ञोपवीत नारियल में लपेटा जा सकता है, या उसके स्थान पर रक्त सूत्र।

· Reviewed Sep 2026 · 11:30–11:57

वस्त्र के रूप में मौली धागा, कलावा, समर्पित किया जाता है, फिर तीन बार जल गिराते हैं; फिर उपवस्त्र के लिए पुनः एक धागा चढ़ाकर तीन बार जल डालते हैं। यज्ञोपवीत आप नारियल में लपेट सकते हैं, या रख सकते हैं, या उसके स्थान पर रक्त वस्त्र, रक्त सूत्र उसी प्रकार समर्पित कर सकते हैं। प्रदर्शन में यह नारियल में पहले से लपेटा हुआ है इसलिए अलग से नहीं चढ़ाया जा रहा, पर वक्ता कहते हैं कि आप चढ़ा सकते हैं।

25

पुष्प में अष्टगंध और कुमकुम, फिर पुष्प माला

पुष्प में लगाकर अष्टगंध और कुमकुम चढ़ाया जाता है, फिर कलश के ऊपर पुष्प की माला।

· Reviewed Sep 2026 · 11:58–12:24

तिलक के लिए अष्टगंध पुष्प में लगाकर चढ़ाया जाता है; फिर उसी तरीके से पुष्प में लगाकर कुमकुम चढ़ाते हैं। इसके पश्चात श्री वरुण देवता के कलश पर माला चढ़ानी है — पुष्प की माला कलश के ऊपर चढ़ाकर उन्हें पहना देते हैं।

तत्पश्चात तिलक के लिए अष्टगंध पुष्प में लगाकर चढ़ाएँगे। फिर इसी तरीके से पुष्प में लगाकर कुमकुम चढ़ाएँगे। इतना होने के पश्चात अब श्री वरुण देवता के कलश पर माला चढ़ानी है। पुष्प की माला कलश के ऊपर इस तरीके से चढ़ा देंगे, और इस प्रकार उनको पहना देंगे।

26

पान पत्ते का समर्पण, दो बार अलग-अलग गिनती के साथ बोला गया

पान के पत्ते पर सुपारी, दो लौंग और एक इलायची भोग के साथ चढ़ाई जाती है।

· Reviewed Sep 2026 · 12:25–12:45

पुष्प माला के पश्चात भोग लगाया जाता है। वक्ता कहते हैं कि पान पत्ते के ऊपर दो लौंग, एक इलायची और सुपारी भी अवश्य चढ़ाएँ — यह यहाँ रह गया था, और वे वीडियो में बता दे रहे हैं ताकि आप सभी अवश्य चढ़ाएँ। फिर वे यही सूची भिन्न रूप में दोहराते हैं: पान पत्ता, एक सुपारी, दो इलायची, दो लौंग, एक इलायची।

27

ब्रह्मा विष्णु महेश, सभी नदियाँ और सागर, इंद्र, वरुण, यम और कुबेर

धूप दिखाते समय ब्रह्मा, विष्णु, महेश, सभी नदियाँ-सागर, इंद्र, वरुण, यम और कुबेर कलश में उपस्थित माने जाते हैं।

· Reviewed Sep 2026 · 12:46–13:14

नैवेद्य के बाद दीप दिखाया जाता है, और दीप के पश्चात पूरे कलश में धूप दिखाई जाती है। क्योंकि सभी देवी-देवता कलश में आकर उपस्थित होते हैं, वक्ता कहते हैं — ब्रह्मा, विष्णु, महेश, सभी नदियाँ, सभी सागर, सभी की उपस्थिति वहाँ होती है, इंद्र, वरुण, यम, कुबेर — उनका स्मरण करते हुए कलश में धूप दिखाई जाती है। उसका मंत्र भी होता है, वे बताते हैं, पर यहाँ सामान्य रूप से किया जा रहा है।

28

कपूर की आरती तीन, पाँच या सात बार, तीन बार जल, फिर दक्षिणा

कपूर की आरती तीन, पाँच या सात बार, उसके चारों ओर तीन बार जल, फिर वरुण देवता को दक्षिणा।

· Reviewed Sep 2026 · 13:15–13:52

उसके पश्चात कपूर प्रज्वलित करके आरती करनी है। आरती तीन बार, पाँच बार या सात बार उतारनी चाहिए; वरुण देवता का स्मरण करते हुए कलश की आरती उतार देते हैं। फिर आरती के चारों ओर तीन बार जल छिड़क लेना है — यह, वक्ता कहते हैं, कर्मकांड की एक सामान्य विधि होती है। फिर वरुण देवता को यथाशक्ति दक्षिणा समर्पित की जाती है, यहाँ सांकेतिक रूप से, और तीन बार जल चढ़ाया जाता है।

29

नवग्रहों के बीज नामों के साथ एक पुष्प

कलश पर नवग्रहों के नामों के साथ एक पुष्प चढ़ाया जाता है, सुम सूर्याय नमः से केम केतवे नमः तक।

· Reviewed Sep 2026 · 13:53–14:20

कलश पर ही नवग्रहों का स्मरण करते हुए पुष्प चढ़ाया जाता है। एक पुष्प लेकर बोलेंगे: सुम सूर्याय नमः, सोम सोमाय नमः, मम मंगलाय नमः, बुम बुधाय नमः, ब्रिम बृहस्पते नमः, सुम शुक्राय नमः, संग शनैश्चराय नमः, राम राहवे नमः, केम केतवे नमः — नवग्रह इत्यादि सूर्य इत्यादि नवग्रह प्रसन्न भवतु। फिर पुष्प चढ़ा देते हैं और तीन बार जल चढ़ाते हैं।

30

हर समूह के लिए एक पुष्प और तीन बार जल

षोडश मातृका, पंच लोकपाल और दस दिक्पाल — हर एक को एक पुष्प और तीन बार जल।

· Reviewed Sep 2026 · 14:21–14:49

षोडश मातृकाओं के नाम से "षोडश मातृकाभ्यो नमः" बोलकर एक पुष्प चढ़ाया जाता है और तीन बार जल चढ़ाया जाता है। फिर पंच लोकपाल के नाम से "पंच लोकपालभ्यो नमः" बोलकर पुष्प रखते हैं और तीन बार जल चढ़ाते हैं। फिर दस दिक्पाल के नाम से "दस दिक्पालभ्यो नमः" बोलकर पुष्प चढ़ाकर जल चढ़ाते हैं। इस तरीके से संक्षिप्त विधि से सभी देवताओं का पूजन हो जाता है।

31

जयंती मंगला काली श्लोक और योगिनी मातृका नमः

64 योगिनियों का पूजन "जयंती मंगला काली" श्लोक और "चसु षष्ठी योगिनी मातृकाभ्यो नमः" से होता है।

· Reviewed Sep 2026 · 14:50–15:10

64 योगिनियों के नाम से वक्ता बोलते हैं: जयंती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमस्तुते। फिर: चसु षष्ठी योगिनी मातृकाभ्यो नमः, श्री भगवती 64 योगिनी प्रसन्न भवतु।

64 योगिनी के नाम से वे बोलते हैं: जयंती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमस्तुते। फिर: चसु षष्ठी योगिनी मातृकाभ्यो नमः, श्री भगवती 64 योगिनी प्रसन्न भवतु।

32

पुष्प की तीन ढेरियाँ — अनुसूया, दत्तात्रेय, महर्षि अत्रि

पुष्प की तीन ढेरियाँ बनाई जाती हैं — भगवती अनुसूया, बीच में दत्तात्रेय, और महर्षि अत्रि — हर एक पर कुमकुम और एक दीपक।

· Reviewed Sep 2026 · 15:11–16:01

अब प्रमुख महामुनि, महर्षि, महाशक्ति भगवान दत्तात्रेय का पूजन होता है। उनके स्थान के सम्मुख पुष्प की तीन ढेरियाँ बनाई जाती हैं: पहली ढेरी भगवती अनुसूया के नाम से, जो भगवान दत्तात्रेय की माता हैं; बीच वाली भगवान दत्तात्रेय के नाम से; और उसके बगल वाली महामुनि अत्रि, अत्रि ऋषि के नाम से। फिर तीनों ढेरियों पर कुमकुम डाला जाता है और हर एक के ऊपर दीपक को स्थान दिया जाता है।

33

लंबी बाती वाला घी का दीपक — खड़ी बाती नहीं

घी का दीपक लंबी बाती के साथ; इस पूजन में खड़ी बाती का प्रयोग नहीं करना है।

· Reviewed Sep 2026 · 16:02–16:32

घी का दीपक हो और लंबी बाती हो; इस पूजन में खड़ी बाती का प्रयोग न करें, वक्ता कहते हैं। तीनों दीपक यहाँ तीनों देवताओं के नाम से, तीनों महाशक्तियों के नाम से, सजकर तैयार हो गए। अब उन्हें एक-एक करके प्रज्वलित किया जाएगा।

घी का दीपक हो, वक्ता कहते हैं, और लंबी बाती हो। इस पूजन में खड़ी बत्ती का प्रयोग न करें। तीनों दीपक यहाँ सजकर तैयार हो गए — तीनों देवताओं के नाम से, तीनों महाशक्तियों के नाम से। अब इन्हें एक-एक करके प्रज्वलित करेंगे।

34

पहले अनुसूया, फिर दत्तात्रेय, फिर महर्षि अत्रि

पहले अनुसूया का दीपक, फिर दत्तात्रेय का, फिर महर्षि अत्रि का — और यदि आता हो तो "शुभं करोतु कल्याणम्" का पाठ।

· Reviewed Sep 2026 · 16:33–17:01

सर्वप्रथम भगवती अनुसूया का दीपक प्रज्वलित होगा, फिर भगवान दत्तात्रेय का, और फिर भगवान दत्त के पिता महर्षि अत्रि का। मंत्र पाठ कर सकते हैं यदि आता हो: शुभं करोतु कल्याणम् आरोग्यम् सुख संपदम् शत्रु बुद्धि विनाशम् च दीप पुर ज्योति नमस्तुते, दीपो ज्योति परम ब्रह्म दीपो ज्योति जनार्दन दीपो हरतु मे पापम् संध्या दीपम् नमस्तुते या दीपम् ज्योति नमस्तुते।

35

स्मरण करते हुए प्रज्वलित करें, फिर सभी दीपकों पर जल छिड़कें

जिन्हें मंत्र न आता हो वे केवल भगवान का स्मरण करते हुए दीप जलाएँ, फिर पुष्प से सभी दीपकों पर जल छिड़कें।

· Reviewed Sep 2026 · 17:02–17:27

जो मंत्र आपको आता है वह आप पाठ कर सकते हैं, वक्ता कहते हैं, अथवा भगवान का स्मरण करते हुए दीप प्रज्वलित करें। यहाँ सभी दीपकों पर पुष्प से जल लेकर अवश्य प्रक्षण करते हुए उन्हें रख देना चाहिए। सभी दीपक अच्छे से सजाए हुए हैं ताकि वे दिव्य और आकर्षक लगें, और भगवान जब उपस्थित हों तो प्रसन्न हों।

36

आवाहन, आसन, और चार बार जल

पुष्प लेकर अनुसूया के पुत्र के रूप में दत्तात्रेय का आवाहन, फिर आसन, फिर पैर, हाथ, आचमन और स्नान के लिए जल।

· Reviewed Sep 2026 · 17:28–18:15

हाथ में पुष्प लेकर आवाहन किया जाता है: हे भगवान दत्तात्रेय, अनुसूया माता के पुत्र, आप इन तीनों लोकों में जहाँ कहीं भी हों, मैं आपका आवाहन करता हूँ; आप यहाँ उपस्थित हों एवं मेरे इस पूजन विधान को स्वीकार कर मुझ पर प्रसन्न हों — आवाहन के हेतु मैं पुष्प समर्पित कर रहा हूँ। फिर पुनः पुष्प लेकर आसन प्रदान करते हैं, और पैर धुलने, हाथ धुलने, आचमन और स्नान के लिए जल समर्पित करते हैं।

37

वस्त्र-उपवस्त्र के रूप में धोती या रक्त सूत्र, फिर यज्ञोपवीत

धोती या रक्त सूत्र ही वस्त्र और उपवस्त्र है, फिर यज्ञोपवीत, और हर बार के बाद आचमन के लिए जल।

· Reviewed Sep 2026 · 18:16–18:59

स्नान के पश्चात वस्त्र समर्पित करते हैं — आप धोती इत्यादि भी दे सकते हैं, या जैसा यहाँ किया जा रहा है, रक्त सूत्र अर्पित करते हुए "हे प्रभु, आप इसे स्वीकार करें" बोलकर तीन बार जल डालते हैं। वस्त्र के बाद आचमन हेतु जल डाला जाता है; फिर उपवस्त्र के लिए पुनः रक्त सूत्र समर्पित करके तीन बार जल। तत्पश्चात यज्ञोपवीत समर्पित करके उनके समक्ष रख देते हैं, और आचमन के लिए तीन बार जल देते हैं।

38

चंदन, फिर अष्टगंध या कुमकुम, फिर पुष्प और माला

पहले चंदन का तिलक, फिर अष्टगंध या कुमकुम, फिर सुगंधित पुष्प और माला — पूरी विधि हिंदी में, भाव पूर्वक।

· Reviewed Sep 2026 · 19:00–19:34

वक्ता कहते हैं कि सारी विधि हिंदी में भाव पूर्वक बताई जा रही है और भाव पूर्वक ही करनी है — प्रभु अवश्य प्रसन्न होकर कृपा करेंगे, उनकी महिमा अनंत है। फिर चंदन का तिलक पुष्प में लगाकर समर्पित करते हैं: प्रभु, आप मस्तक पर चंदन के तिलक का लेपन करें। फिर अष्टगंध या कुमकुम का तिलक। फिर सुंदर सा सुगंधित पुष्प समर्पित करते हैं, फिर पुष्प और पुष्प माला, और उसके पश्चात पुनः आचमन हेतु जल।

39

बिल्व पत्र और तुलसी पत्र सहित मिठाई-फल, और पाँच बार जल घुमाना

वही मिठाई जिससे आपके हृदय को प्रसन्नता आए, उसमें बिल्व और तुलसी पत्र, और नैवेद्य के चारों ओर पाँच बार जल।

· Reviewed Sep 2026 · 19:35–20:14

जब भगवान का श्रृंगार हो जाएगा तब नैवेद्य निवेदित करेंगे: सुंदर सी मिठाई, जिस मिठाई से आपके हृदय को प्रसन्नता का भाव आए। फल और मिठाई दोनों भोग लगा सकते हैं, और मिठाई में बिल्व पत्र और तुलसी पत्र दोनों डाल सकते हैं। भगवान दत्त के सम्मुख रखते हुए फिर नैवेद्य के चारों ओर पाँच बार जल घुमाकर डालेंगे। मंत्र आता हो — प्राणाय स्वाहा, व्यानाय स्वाहा — तो वह कर सकते हैं; नहीं तो सामान्य रूप से भगवान का नाम लेते हुए और भगवती अन्नपूर्णा का स्मरण करते हुए। फिर भगवान की आरती उतारते हैं।

40

स्मरणगामिता — दत्त ने दनादन मुनि से क्या कहा

जीवित गुरु के बिना भी दत्तात्रेय यह दीक्षा दे देते हैं, ऐसा क्यों कहा जाता है?

· Reviewed Sep 2026 · 20:15–20:43 · Also a question

यहाँ भगवान दत्तात्रेय का यथाविधि यथाशक्ति पूजन पूर्ण हो रहा है, और वक्ता कहते हैं कि यह पूजन पूरे भाव के साथ करें। इस गुण को वे स्मरणगामिता कहते हैं: वे बार-बार बता चुके हैं कि दत्त भगवान ने स्वयं दनादन मुनि से कहा है कि जो कोई भी उनका स्मरण करता है, जिस भाव से करता है, वे तुरंत उपस्थित होते हैं। तो इतने भाव से जब आप इस विधि से पूजन करेंगे, वे कहते हैं, तो वे उपस्थित होकर अवश्य अप्रत्यक्ष रूप से आपको वह दीक्षा प्रदान करेंगे और अपना शिष्य स्वीकार करेंगे।

41

दक्षिणा, मंत्र पुष्पांजलि, और पूरी पूजा का समर्पण

द्रव्य दक्षिणा, फिर मंत्र पुष्पांजलि, और पूरी पूजा भी उनके श्री चरणों में समर्पित।

· Reviewed Sep 2026 · 20:44–21:13

पूर्ण पूजा के पूर्ण फल की प्राप्ति हेतु भगवान को यथाशक्ति द्रव्य दक्षिणा चढ़ाई जाती है, और दक्षिणा चढ़ाकर पुनः जल समर्पित करते हैं। फिर पुष्पांजलि देते हैं: हाथ में पुष्प लेकर, भगवान का स्मरण करते हुए, भगवान दत्त का नाम लेते हुए मंत्र पुष्पांजलि समर्पित करेंगे। और पूरी पूजा भी उनके श्री चरणों में समर्पित कर देंगे — जो भी पूजा यथाविधि की, वह आपको समर्पित है, भगवान आप प्रसन्न हों।

42

पीला वस्त्र, उस पर पुष्प, अक्षत, दूर्वा और दक्षिणा

पीले पीत वस्त्र पर पुष्प, अक्षत, दूर्वा और दक्षिणा रखकर दत्तात्रेय से उसी दिन से परम गुरु और सद्गुरु बनने की प्रार्थना।

· Reviewed Sep 2026 · 21:14–22:10

गुरु वरण के लिए आपके पास एक वस्त्र होना चाहिए — पीले रंग की धोती या गमछा, पीत वस्त्र। उसके ऊपर आप पुष्प, अक्षत, दूर्वा घास और कुछ दक्षिणा रखेंगे। फिर पूरे भाव के साथ भगवान दत्त का स्मरण और आवाहन करते हुए बोलेंगे: मैं आज से आपको गुरु स्वरूप में स्वीकार करता हूँ; आप मेरे परम गुरु बनिए, सद्गुरु बनिए, तथा मेरा सदैव कल्याण कीजिए; इस हेतु देव दीक्षा के इस विधान के अंतर्गत दक्षिणा सहित आपको गुरु स्वरूप में स्वीकार करते हुए गुरु दक्षिणा भेंट करता हूँ — कृपा करके आप प्रसन्न हों और मुझे अपना शिष्य स्वीकार करें।

43

वस्त्र पर रखी सामग्री के समर्पण के साथ होने वाला उद्घोष

दत्तात्रेय किस क्षण आपके सद्गुरु बनते हैं?

· Reviewed Sep 2026 · 22:11–22:33 · Also a question

वस्त्र के ऊपर जो अक्षत, पुष्प, दक्षिणा इत्यादि था, उसे इस प्रकार भगवान के श्री चरणों में समर्पित कर देना है; और इसी समर्पण के साथ, वक्ता कहते हैं, यह उद्घोष हो जाता है कि आप भगवान दत्त को मानसिक रूप से देव दीक्षा स्वरूप अपना सद्गुरु स्वीकार करते हैं — और भगवान दत्त आपके सद्गुरु हुए।

वस्त्र के ऊपर जो अक्षत, पुष्प, दक्षिणा इत्यादि था, वह इस प्रकार भगवान के श्री चरणों में समर्पित कर देना है। और इसी समर्पण के साथ, वक्ता कहते हैं, यह उद्घोष हो जाता है कि आप भगवान दत्त को मानसिक रूप से, देव दीक्षा स्वरूप, अपना सद्गुरु स्वीकार करते हैं; और भगवान दत्त आपके सद्गुरु हुए।

44

दत्त से अभीष्ट और शिष्य स्वीकृति का निवेदन

पूजन के बाद पाँच मिनट तक दत्त से अपने अभीष्ट की पूर्ति और शिष्य रूप में स्वीकार किए जाने का निवेदन, क्योंकि वे इसी विधि से उपस्थित हैं।

· Reviewed Sep 2026 · 22:34–23:04

पूजन का यह विधान जब आप पूर्ण कर लेंगे, उसके पश्चात अगले 5 मिनट तक भगवान दत्त का स्मरण करते हुए आप अपने अभीष्ट की पूर्ति हेतु उनसे निवेदन करेंगे: हे भगवान दत्त, मैं आज आपको गुरु स्वरूप में धारण किया हूँ, यह विधान पूर्ण किया हूँ; कृपा करके आप मुझे अपना शिष्य स्वीकार करें। भगवान ने स्वयं कहा है कि जो कोई भी उनका चिंतन करता है उसके अभीष्ट की पूर्ति वे आकर करते हैं, वक्ता कहते हैं, और आपने तो पूरे विधि विधान से उनका आवाहन कर लिया है, तो अब वे आपके अभीष्ट की पूर्ति के लिए वहाँ उपस्थित हैं।

45

गुरु के मुख से न मिला मंत्र — गोपनीयता, भोजपत्र, स्याही और चांदी की कलम

बीज मंत्र को साधक को स्वयं ही क्यों सिद्ध करना पड़ता है, और उसके लिए क्या-क्या चाहिए?

· Reviewed Sep 2026 · 23:05–23:46 · Also a question

क्योंकि प्रथम मंत्र, बीज मंत्र, आपको किसी गुरु के मुख से प्राप्त नहीं हुआ है, वक्ता कहते हैं, इसलिए स्वयं ही उस विधान को करके उनके बीज मंत्र को जागृत करना है। इस मंत्र को आप सदैव गुप्त रखेंगे — मुख से उच्चारण नहीं करना है। विधान के लिए दो भोजपत्र लगेंगे, और एक छोटी सी पीतल की कटोरी में अष्टगंध, गोरोचन, केसर इत्यादि रखकर उसमें गंगाजल और गुलाब जल मिलाकर स्याही तैयार करनी है, तथा चांदी के तार की एक कलम चाहिए।

46

दो उल्टे त्रिकोण — मूल प्रकृति और परम पुरुष — बीच में बीज

दोनों भोजपत्र पर एक दूसरे के ऊपर दो उल्टे त्रिकोण — मूल प्रकृति और परम पुरुष — और उनके बीच में दत्तात्रेय का बीज मंत्र।

· Reviewed Sep 2026 · 23:47–24:27

यंत्र दोनों भोजपत्र पर बनाना है: एक दूसरे के ऊपर दो उल्टे त्रिकोण। ये दोनों, वक्ता कहते हैं, मूल प्रकृति और परम पुरुष के प्रतीक हैं। इनके बीच में भगवान दत्तात्रेय के बीज मंत्र का अंकन करना है। वे कहते हैं कि पूरा विधि विधान — कौन सा, कैसे, क्या करना है — बताया नहीं जा सकता; सामान्य सरल तरीका बताया जा रहा है, और उसी अनुसार अपने हिसाब से कर लीजिए।

47

एक व्यक्ति के लिए दो भोजपत्र; दत्त के चरणों में प्रतिष्ठा

एक व्यक्ति के लिए दो भोजपत्र, और प्रतिष्ठा केवल उन्हें दत्त के श्री चरणों में रखकर एक-एक पुष्प चढ़ाने से — अलग से कोई तंत्रोक्त विधान नहीं चाहिए।

· Reviewed Sep 2026 · 24:28–25:13

एक व्यक्ति के लिए दो भोजपत्र लगेंगे — इसका ध्यान रखें। दोनों पर लिखकर उन्हें भगवान दत्त के पास समर्पित कर देंगे। प्रतिष्ठा विधि के लिए सर्वप्रथम उन्हें भगवान दत्त के श्री चरणों में रखेंगे; प्रतिष्ठा विधि के लिए अलग से कोई तंत्रोक्त विधान करने की आवश्यकता नहीं है — यदि आती है तो करें, और यदि नहीं भी करेंगे तो चलेगा। केवल वहाँ रखकर, भगवान का स्मरण करते हुए और भगवान दत्त को बोलते हुए, दोनों पर एक-एक पुष्प समर्पित करना है।

48

तीन बार उच्चारण, और जीवन पर्यंत प्रतिष्ठा की घोषणा

लिखे हुए बीज का तीन बार उच्चारण करके उसे जीवन पर्यंत अपने प्राण, आत्मा और मन में गुरु मंत्र के समान प्रतिष्ठित घोषित किया जाता है।

· Reviewed Sep 2026 · 25:14–26:03

हाथ में पुष्प लेंगे — लाल पुष्प, पीला पुष्प या श्वेत भी ले सकते हैं। फिर भगवान दत्त का स्मरण करते हुए, जो बीज मंत्र आपने बीच में लिखा है उसका मात्र तीन बार उच्चारण करना है। उसके पश्चात यह बोलना है: आज से जीवन पर्यंत यह मेरे लिए गुरु मंत्र के समान है; हे प्रभु, आप इसमें सदैव के लिए प्रतिष्ठित हों; मेरे प्राण में, मेरी आत्मा में, मेरे मन में यह बीज मंत्र गुरु स्वरूप में सदैव के लिए प्रतिष्ठित हो। यह बोलकर दोनों के ऊपर एक-एक पुष्प समर्पित कर देना है।

49

पीले धागे में गुथी रुद्राक्ष माला और पीला गोमुखी

पीले धागे में गुथी रुद्राक्ष की माला और पीला गोमुखी, तथा अलग से बताई गई प्राण प्रतिष्ठा विधि से माला को चैतन्य करना।

· Reviewed Sep 2026 · 26:04–26:29

जप करने के लिए माला रुद्राक्ष की रहेगी। वह पीले धागे में गुथी हुई होनी चाहिए, और सुंदर सा पीला गोमुखी रहेगा। प्राण प्रतिष्ठा की विधि, वक्ता कहते हैं, इसी चैनल पर मिल जाएगी, और इस वीडियो के डिस्क्रिप्शन में भी वे लिंक दे देंगे — जिसमें रुद्राक्ष की माला को कैसे चैतन्य करना है उसकी विधि बताई गई है।

50

लकड़ी की माला नहीं; तंत्रोक्त रुद्राक्ष माला विशेष सिद्धि चाहने वालों के लिए

कौन सी माला वर्जित है, और तंत्रोक्त माला का प्रयोग कौन कर सकता है?

· Reviewed Sep 2026 · 26:30–26:55 · Also a question

माला असली होनी चाहिए, सही होनी चाहिए; लकड़ी वाली माला नहीं लेंगे, वक्ता कहते हैं। जो व्यक्ति विशेष साधना मार्ग पर चलना चाहते हैं, जिनको विशेष सिद्धि और कृपा चाहिए, जिनको आगे चलकर तंत्र-मंत्र सीखना है और जो भगवान दत्त से विशेष अनुग्रह की अपेक्षा रखते हैं — वैसे व्यक्ति तंत्रोक्त रुद्राक्ष की माला का प्रयोग कर सकते हैं, और उसके हेतु टेलीग्राम पर संपर्क कर सकते हैं, जहाँ वे पूरा विधान बता देंगे। सामान्य जो नए लोग हैं वे सामान्य माला से बिल्कुल कर सकते हैं; बस माला असली होनी चाहिए।

51

पूर्णिमा से पूर्णिमा तक; केवल पूर्णमासी, या शिवरात्रि और नवरात्रि का पर्व काल

दीक्षा विधान केवल पूर्णमासी को, अथवा शिवरात्रि और नवरात्रि के पर्व काल में; जप पूर्णिमा से पूर्णिमा तक चलता है।

· Reviewed Sep 2026 · 26:56–27:10

जप पूर्णिमा से पूर्णिमा तक करना है। यह विधान, दीक्षा का विधान, वक्ता कहते हैं, आपको किसी भी महीने की पूर्णमासी के दिन ही करना चाहिए; या फिर शिवरात्रि और नवरात्रि के विशेष समय में, विशेष दिनों में, जो दिव्य काल और पर्व काल होते हैं, उसमें आप इस विधान को कर सकते हैं।

जप पूर्णिमा से पूर्णिमा तक करना है। यह विधान, दीक्षा का विधान, आपको किसी भी महीने की पूर्णमासी के दिन ही करना चाहिए, वक्ता कहते हैं। या फिर शिवरात्रिप्रत्येक मास आने वाली शिव की चतुर्दशी रात्रि, जो वार्षिक महाशिवरात्रि से भिन्न है। और नवरात्रि के विशेष समय में, विशेष दिनों में — जो दिव्य काल और पर्व काल होते हैं — उसमें आप इस विधान को कर सकते हैं।

52

दोनों में से केवल एक काम में आएगा; एक वहीं रखा रहना चाहिए

एक दिन वाले रूप में दोनों यंत्रों में से केवल एक ही काम में आता है; दूसरा वहीं रखा रहना चाहिए।

· Reviewed Sep 2026 · 27:11–27:25

मान लीजिए आपने एक ही दिन की साधना की, एक ही दिन की दीक्षा का विधान किया — तो जो दो यंत्र बनेंगे उनमें से केवल एक ही आपके काम में आएगा। एक वहीं रखा रहना चाहिए।

अब इसमें यह है, वक्ता कहते हैं: मान लीजिए आपने एक ही दिन की साधना की, एक ही दिन की दीक्षा का विधान किया। तो जो दो यंत्र बनेंगे, उनमें से केवल एक ही आपके काम में आएगा। एक वहीं रखा रहना चाहिए।

53

परम सिद्धि के लिए 5 लाख, कम से कम सवा लाख, अन्यथा एक दिन में 108 माला

5 लाख जप से बीज परम सिद्ध होता है, कम से कम सवा लाख, और वह भी न हो तो एक दिन में 108 माला।

· Reviewed Sep 2026 · 27:26–27:39

यह बीज मंत्र, वक्ता कहते हैं, 5 लाख जप करने से परम सिद्ध होता है। लेकिन कम से कम आपको सवा लाख जप तो करना ही चाहिए। यदि सवा लाख भी नहीं करेंगे तो कम से कम एक दिन में 100 माला जप, 108 माला जप कर लीजिए; और करके फिर उस यंत्र को चांदी के खोल में डालकर पहन लीजिए — यदि आप एक दिन का विधान कर रहे हैं तो।

54

पहले दिन 108 माला, फिर यंत्र धारण, फिर प्रतिदिन 108 माला

पहले दिन 108 माला, फिर यंत्र को चांदी या तांबे के कवच में डालकर धारण, और अगली पूर्णिमा तक प्रतिदिन 108 माला।

· Reviewed Sep 2026 · 27:40–28:01

यदि आप एक महीने वाला विधान कर रहे हैं, तो पहले दिन जप इत्यादि करने के पश्चात — मान लीजिए पहले दिन आपने 108 माला की — 108 माला करके, आरती इत्यादि करके, समर्पण के पश्चात फिर उस यंत्र को चांदी के खोल में, या तांबे के कवच में भी, डालकर गले में पीले धागे में पहन लेंगे। उसके पश्चात अगली पूर्णिमा तक नित्य प्रति आपका 108 माला का जप चलता रहेगा।

55

लगभग 3 लाख जप पूर्ण, और दूसरे कवच के लिए चांदी का खोल

अगली पूर्णिमा तक लगभग 3 लाख जप पूर्ण हो जाते हैं, और तब दूसरा कवच सुंदर चांदी के खोल में डालकर जीवन पर्यंत धारण किया जाता है।

· Reviewed Sep 2026 · 28:02–28:32

अगली पूर्णिमा को जब आपका जप पूर्ण हो जाएगा, आप उसे भगवान को समर्पित कर देंगे; लगभग मानकर चलिए कि उसमें 3 लाख जप हो गया रहेगा। उसके पश्चात जो कवच आपने भगवान दत्तात्रेय के पास, उनके श्री चरणों में रखा हुआ था, उसे एक सुंदर चांदी के खोल में डालना है — बहुत अच्छा सा चौकोर सुंदर चांदी का खोल बनवाएँ, उस पर भगवान दत्त का श्री विग्रह बना हो तो बहुत अच्छा है, या फिर ओम लिखवा दें, देखने में आकर्षक हो — क्योंकि जीवन पर्यंत इस कवच को गले में धारण करना है।

56

गुरु मंत्र, जिसमें दत्तात्रेय की सारी शक्तियाँ हैं, वज्र कवच की भाँति कार्य करता है

बीज में दत्तात्रेय की सारी शक्तियाँ समाहित हैं और वह जीवन पर्यंत गुरु मंत्र तथा वज्र कवच के रूप में कार्य करता है।

· Reviewed Sep 2026 · 28:33–29:00

यह आपका गुरु मंत्र है, वक्ता कहते हैं, और यही दिव्य मंत्र आपको सदैव साथ देने वाला है। बीज मंत्र होने के कारण इसमें भगवान दत्तात्रेय की जितनी भी शक्तियाँ हैं, सभी समाहित और उपस्थित रहती हैं। यही बीज मंत्र आपके लिए गुरु मंत्र के जैसा, वज्र कवच के जैसा, हर जगह कार्य करेगा। तो एक सुंदर सा कवच बनवाइए, और जब अगली पूर्णिमा आएगी, जिस दिन आप अपना समापन करेंगे, उस दिन इस यंत्र को उस कवच में डालकर गले में धारण कर लेंगे।

57

चांदी की चैन, पीला धागा या स्वर्ण; और जीवन की पहली साधना

चांदी की चैन में, पीले धागे में, या सामर्थ्य हो तो स्वर्ण में धारण करें — यह गुरु साधना है और जीवन की पहली साधना होनी चाहिए।

· Reviewed Sep 2026 · 29:01–29:23

या तो चांदी की चैन में कर सकते हैं, या पीले धागे में भी कर सकते हैं; और यदि आपका सामर्थ्य सोने का, स्वर्ण का है, तो स्वर्ण का ही छोटा सा खोल बनवाकर, सुंदर सा ओम इत्यादि लिखवाकर, उसमें डालकर सोने की चैन में पहन सकते हैं। इस साधना को करने पर, वक्ता कहते हैं, यह गुरु साधना हो गया — और यह जीवन की पहली साधना होनी चाहिए।

58

प्रतिदिन भोजन कराना, और कभी नुकसान न पहुँचाना

साधना के दौरान प्रतिदिन गाय और कुत्तों को भोजन कराना है, और उन्हें कभी नुकसान नहीं पहुँचाना — जीवन पर्यंत, पर इन तीस दिनों में विशेष रूप से।

· Reviewed Sep 2026 · 29:24–29:39

जब तक यह साधना चलेगी, वक्ता कहते हैं, प्रतिदिन गाय को भोजन जरूर कराएँ और कुत्तों को भोजन जरूर कराएँ। गाय, गौ वंश और कुत्तों को कभी भी नुकसान न पहुँचाएँ। जीवन पर्यंत नुकसान नहीं पहुँचाना है, वे कहते हैं, लेकिन ये 30 दिन आपको बहुत अच्छे से रहना है।

जब तक यह साधना चलेगी, वक्ता कहते हैं, प्रतिदिन आप गाय को भोजन जरूर कराएँ। कुत्तों को भोजन जरूर कराएँ। गाय और गौ वंश को, तथा कुत्तों को कभी भी आप नुकसान न पहुँचाएँ। जीवन पर्यंत नुकसान नहीं पहुँचाना है, वे कहते हैं — लेकिन ये 30 दिन आपको बहुत अच्छे से रहना है।

59

पूर्ण ब्रह्मचर्य, और मंत्र कभी बोलकर नहीं

पूरे समय ब्रह्मचर्य का पालन, और मंत्र का कभी मुख से उच्चारण नहीं — साथ करने वाले को संशय हो तो लिखकर बताएँ, बोलकर नहीं।

· Reviewed Sep 2026 · 29:40–30:01

ब्रह्मचर्य का पूरा पालन अच्छे से करना है। यह मंत्र और यह विधि किसी को कभी नहीं बतानी है — यह आपके लिए परम गोपनीय होना चाहिए। इस मंत्र का बोलकर उच्चारण नहीं करना है। यदि कोई और व्यक्ति आपके साथ इस विधान को कर रहा है और उसे कोई संशय है, तो भी इस मंत्र को लिखकर बताएँ, बोलकर न बताएँ। गुरु मंत्र, वक्ता कहते हैं, सदैव गुप्त रखते हैं।

60

ऐच्छिक दैनिक घी की आहुति, मानसिक उच्चारण और स्वाहा के साथ

प्रतिदिन घी की आहुति ऐच्छिक है, जिसमें बीज का मानसिक उच्चारण करते हुए स्वाहा बोला जाता है।

· Reviewed Sep 2026 · 30:02–30:22

उस मंत्र का हवन भी होगा, वक्ता कहते हैं। यदि आप में सामर्थ्य है, इच्छा है, तो प्रतिदिन — चाहें तो प्रतिदिन — भगवान दत्तात्रेय के इस बीज मंत्र का मानसिक उच्चारण करते हुए स्वाहा बोलकर आप आहुति भी कर सकते हैं; घी से अति उत्तम होगा। वे कहते हैं कि इस विधान को अलग से भी कभी और विस्तृत रूप से बता देंगे, यद्यपि यहाँ काफी अच्छे से बता चुके हैं।

61

दत्त की गुरु रूप में जीवन पर्यंत सेवा, और उनकी कृपा से भौतिक गुरु

विधान पूर्ण होने पर जीवन पर्यंत दत्त की गुरु रूप में सेवा — और उनकी कृपा से आगे भौतिक गुरु की प्राप्ति भी हो सकती है।

· Reviewed Sep 2026 · 30:23–30:52

इस प्रकार से, वक्ता कहते हैं, भगवान दत्तात्रेय का यह देव दीक्षा विधान पूर्ण होगा, और आप जीवन पर्यंत भगवान दत्त की सेवा करेंगे, उन्हें गुरु स्वरूप में स्वीकार किए हैं। उनकी कृपा से, वे कहते हैं, यदि वे चाहें तो आगे जीवन में आपको भौतिक गुरु की भी प्राप्ति अवश्य हो जाएगी।

इस प्रकार से, वक्ता कहते हैं, भगवान दत्तात्रेय का यह देव दीक्षा विधान पूर्ण होगा। और आप जीवन पर्यंत भगवान दत्त की सेवा करेंगे, उनको गुरु स्वरूप में स्वीकार किए हैं। उनकी कृपा से, यदि वे चाहें, तो आगे जीवन में आपको भौतिक गुरु की भी प्राप्ति अवश्य हो जाएगी।

62

साधना की अवधि तक उनके अपने नाम से जलाया गया घी का दीपक

साधना की अवधि तक वक्ता के नाम से घी का एक दीपक जलाने को कहा गया है, ताकि दोनों के बीच ऋणानुबंध न बने।

· Reviewed Sep 2026 · 30:53–31:09

ऋण दोष के हेतु, वक्ता कहते हैं, जब कभी भी आप भगवान दत्त का यह विधान करें, जब तक साधना करें, तब तक उनके नाम से घी का एक दीपक जरूर प्रज्वलित करें — ताकि उन दोनों के बीच ऋणानुबंध न हो, और भगवान दत्तात्रेय उन पर भी कृपा करें। वे यह आशा करते हुए समाप्त करते हैं कि सनातनी इससे लाभ अवश्य लेंगे।

Indexed, not endorsed as instruction

यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।

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