रमा एकादशी व्रत कथा
व्रत की रात गए शोभन, और एक पत्नी का बचपन का व्रत
Rama Ekadashi Vrat Katha · 23 min
शुरुआत
एक राजकुमार था, जो अपनी ससुराल आया हुआ था, और उसी रात एकादशी का व्रत रखते-रखते, सूरज निकलते ही उसके प्राण चले गए। अब आप सोचेंगे कि ये कैसी कथा है, जिसमें व्रत रखने वाला ही चला गया, और फिर भी इस एकादशी को शास्त्र चिन्तामणि और कामधेनु जैसा बताते हैं। तो सुनिए, क्योंकि कहानी यहाँ ख़त्म नहीं होती, यहीं से शुरू होती है।
और एक बात और। इस कथा में एक पूरे नगर की नींव हिल रही थी, और उसे थामा किसी राजा ने नहीं, किसी देवता ने नहीं, बल्कि एक लड़की के उस छोटे से व्रत ने, जो उसने आठ साल की उम्र के बाद से कभी नहीं छोड़ा था। वो कैसे, ये कथा के आख़िर तक आते-आते खुलेगा।
बैठिए, दीया जला लीजिए
तो आइए, आराम से बैठ जाइए। अगर पूजा के पास हैं तो भगवान विष्णु के सामने एक दीया जला लीजिए, और अगर रसोई में काम कर रहे हैं, रास्ते में हैं, या बस थककर लेटे-लेटे सुन रहे हैं, तो भी कोई बात नहीं, क्योंकि ये कथा सुनने की कथा है। ख़ुद श्रीकृष्ण इसके आख़िर में कहते हैं कि जो एकादशी का माहात्म्य सुनता है, उसके भी पाप छूट जाते हैं। तो सुनना ही अपने आप में आधी पूजा है।
आज जिस एकादशी की बात हो रही है, उसका नाम है रमा एकादशी। और रमा किसका नाम है, जानते हैं? रमा लक्ष्मी जी का ही एक नाम है। और ये एकादशी आती भी कब है? ठीक दीपावली से पहले। इस साल रमा एकादशी गुरुवार, पाँच नवम्बर को है, और इसका पारण, यानी व्रत खोलने का समय, अगले दिन शुक्रवार, छह नवम्बर की सुबह है, नई दिल्ली के हिसाब से लगभग साढ़े छह बजे से पौने नौ बजे तक। और छह नवम्बर कौन सा दिन है? धनतेरस। यानी जिस सुबह आप रमा का व्रत खोलेंगे, उसी सुबह से लक्ष्मी जी के पाँच दिन के उत्सव की शुरुआत होगी। कितना सुन्दर संयोग है, है ना?
एक छोटी सी बात और, ताकि कोई उलझन न रहे। पुराण इस एकादशी को कार्तिक के कृष्ण पक्ष की एकादशी कहता है। उत्तर भारत में, जहाँ महीना पूर्णिमा पर बदलता है, ये कार्तिक कृष्ण एकादशी ही कहलाती है। और जहाँ महीना अमावस्या पर बदलता है, जैसे महाराष्ट्र या गुजरात में, वहाँ इसी दिन को आश्विन कृष्ण एकादशी कहते हैं। नाम का महीना अलग है, पर दिन एक ही है, दीपावली से तीन दिन पहले वाली एकादशी।
युधिष्ठिर का प्रश्न
ये कथा श्रीकृष्ण ने राजा युधिष्ठिर को सुनाई थी। युधिष्ठिर एक-एक करके साल की सारी एकादशियों के बारे में पूछ रहे थे, और जब कार्तिक के कृष्ण पक्ष की बारी आई, तो उन्होंने बड़े प्रेम से कहा, हे जनार्दन, मुझ पर कृपा करके बताइए, इस एकादशी का नाम क्या है?
और श्रीकृष्ण मुस्कुराकर बोले:
श्रूयतां राजशार्दूल कथयामि तवाग्रतः। कार्तिके कृष्णपक्षे तु रमा नाम सुशोभना ॥
यानी, हे राजाओं में सिंह जैसे युधिष्ठिर, सुनो, मैं तुम्हें बताता हूँ, कार्तिक के कृष्ण पक्ष में रमा नाम की एक बहुत सुन्दर एकादशी है। और फिर कृष्ण कहते हैं कि ये बड़े-बड़े पापों को हरने वाली है, और मैं इसका माहात्म्य तुम्हें एक प्रसंग के साथ सुनाता हूँ। तो आइए, उस प्रसंग में चलते हैं।
राजा मुचुकुन्द का नगर
बहुत पहले मुचुकुन्द नाम के एक राजा थे। और ये कोई साधारण राजा नहीं थे। पुराण कहता है कि इनकी मित्रता स्वर्ग के राजा इन्द्र से थी, मृत्यु के देवता यम से थी, जल के देवता वरुण से थी, धन के देवता कुबेर से थी, और लंका के विभीषण से भी इनकी दोस्ती थी। सोचिए, जिसके दोस्तों की सूची में स्वर्ग, पाताल और लंका तीनों हों, उसका रुतबा क्या होगा।
पर इन सबसे बड़ी बात ये थी कि राजा मुचुकुन्द भगवान विष्णु के भक्त थे और अपनी बात के पक्के थे। जो कह दिया, वो कर दिया। और उनके राज्य में कोई काँटा नहीं था, यानी न कोई चोर-डाकू, न कोई अशान्ति। सब कुछ सुचारु चलता था।
राजा की एक बेटी थी, जिसका नाम था चन्द्रभागा। चन्द्रभागा एक पवित्र नदी का भी नाम है, और पुराण ख़ास तौर पर कहता है कि उसका नाम नदियों में श्रेष्ठ एक नदी के नाम पर रखा गया था। चन्द्रभागा का विवाह हुआ शोभन से, जो राजा चन्द्रसेन के बेटे थे। यानी दोनों ही राजघरानों के बच्चे।
दशमी का नगाड़ा
तो एक बार ऐसा हुआ कि शोभन अपनी ससुराल आए। ससुराल में दामाद की ख़ूब आवभगत होती है, आप जानते ही हैं। पर संयोग ऐसा बना कि उन्हीं दिनों एकादशी का व्रत आ गया।
अब चन्द्रभागा के मन में चिन्ता होने लगी। वो सोचने लगी, हे भगवान, अब क्या होगा? मेरे पति बहुत दुबले-पतले हैं, कमज़ोर हैं, वो भूख बिल्कुल सहन नहीं कर पाते। और मेरे पिताजी का शासन बहुत कड़ा है। हमारे यहाँ तो दशमी आते ही पूरे नगर में नगाड़ा बजवाया जाता है।
और उस नगाड़े पर क्या घोषणा होती थी? सुनिए:
न भोक्तव्यं न भोक्तव्यं संप्राप्ते तु हरेर्दिने।
हरि का दिन आ गया है, कोई न खाए, कोई न खाए!
सोचिए, पूरे नगर में ढोल बज रहा है, और हर गली, हर घर में ये आवाज़ गूँज रही है। और शोभन ने भी ये नगाड़ा सुना। उन्होंने घबराकर अपनी पत्नी से पूछा, प्रिये, अब मैं क्या करूँ? तुम ही बताओ, मुझे सलाह दो।
चन्द्रभागा ने जो जवाब दिया, वो सुनने लायक़ है। उसने कहा, स्वामी, मेरे पिता के घर में आज के दिन कोई भी भोजन नहीं करता। न हाथी खाते हैं, न घोड़े, न उनके छोटे बच्चे, न कोई और पशु। हरि के दिन यहाँ घास, अन्न और पानी तक नहीं दिया जाता। तो फिर मनुष्य हरि के दिन कैसे खा सकते हैं?
और फिर उसने एक बहुत मानवीय बात कही। उसने कहा, प्रिय, अगर आप खाएँगे, तो लोग आपकी निन्दा करेंगे, बातें बनाएँगे। तो ये सोचकर अपने मन को पक्का कर लीजिए।
अब यहाँ एक पल रुककर सोचिए। ये एक पत्नी है, जो अपने कमज़ोर पति के लिए डरी हुई भी है, और साथ ही पिता के घर की मर्यादा भी समझ रही है। दोनों तरफ़ से खिंची हुई। हममें से बहुत लोग इस हालत को जानते हैं, जब घर का नियम एक तरफ़ हो और अपनों की तकलीफ़ दूसरी तरफ़।
शोभन ने कहा, प्रिये, तुम सच कहती हो। मैं उपवास करूँगा। जो भाग्य में लिखा है, वही होगा।
वो रात
और शोभन ने पक्का निश्चय करके व्रत का नियम ले लिया। पर दिन चढ़ते-चढ़ते भूख ने उनके शरीर को तोड़ना शुरू कर दिया। वो बहुत दुखी हो गए। वो ये सोच ही रहे थे कि कैसे ये दिन कटेगा, कि सूरज ढल गया।
और अब पुराण एक बहुत गहरी बात कहता है। वो कहता है कि वही रात, जो विष्णु के भक्तों का आनन्द बढ़ाती है, जो हरि की पूजा और जागरण में मन लगाने वालों को सुख देती है, वही रात शोभन के लिए बहुत दुख भरी हो गई। एक ही रात, एक ही नगर, और दो लोगों के लिए बिल्कुल अलग-अलग। किसी के लिए भजन-कीर्तन की रात, और किसी के लिए हर पल भारी।
और सूरज निकलने के समय शोभन के प्राण निकल गए।
राजा मुचुकुन्द ने राजा के योग्य लकड़ियों से अपने दामाद का अन्तिम संस्कार करवाया। और यहाँ पुराण एक बात बिल्कुल साफ़ लिखता है, जो अक्सर सुनाते समय छूट जाती है: चन्द्रभागा ने पति के साथ अपने शरीर को नहीं जलाया। उसने पति का अन्त्येष्टि कर्म पूरा किया, और फिर अपने पिता के घर में ही रहने लगी।
तो यहाँ तक कहानी सुनकर लगता है कि सब कुछ ख़त्म हो गया। एक युवक चला गया, एक युवती अकेली रह गई। पर रुकिए, क्योंकि श्रीकृष्ण अभी कथा का असली हिस्सा सुनाने वाले हैं।
मन्दराचल का देवनगर
पुराण कहता है कि रमा एकादशी के व्रत के प्रभाव से शोभन को मन्दराचल पर्वत की ढलान पर एक सुन्दर देवनगर मिला। और उस नगर का वर्णन ऐसा है कि आँखों के सामने तस्वीर बन जाए।
वो नगर अनुपम था, ऐसा कि उसकी कोई बराबरी न हो। उसे कोई जीत नहीं सकता था। उसमें अनगिनत गुण थे। महलों के खम्भे सोने के थे, और उन पर रत्न और वैदूर्य जड़े हुए थे। स्फटिक के, यानी पारदर्शी क्रिस्टल जैसे, तरह-तरह के आकार के भवन चमक रहे थे।
और उस नगर के बीच में, सिंहासन पर, सफ़ेद छत्र के नीचे, दोनों ओर चँवर डुलते हुए, शोभन बैठे थे। सिर पर मुकुट, कानों में कुण्डल, गले में हार, बाँहों में बाजूबन्द। गन्धर्व उनकी स्तुति गा रहे थे और अप्सराएँ उनकी सेवा में थीं। पुराण कहता है कि वहाँ शोभन ऐसे शोभित हो रहे थे जैसे कोई दूसरा कुबेर हो।
सोचिए, जिसे लोग सोच रहे थे कि भूख से चला गया, वो कहीं पहाड़ों के बीच एक सोने के नगर का राजा बना बैठा था।
सोमशर्मा की तीर्थयात्रा
अब राजा मुचुकुन्द के नगर में सोमशर्मा नाम के एक ब्राह्मण रहते थे। वो तीर्थयात्रा पर निकले हुए थे, एक तीर्थ से दूसरे तीर्थ घूमते-घूमते मन्दराचल की तरफ़ पहुँच गए। और वहाँ उन्होंने इस अद्भुत नगर को देखा, और सिंहासन पर बैठे शोभन को भी।
उन्होंने पहचान लिया, अरे, ये तो हमारे राजा के दामाद हैं! और वो उनके पास गए। शोभन ने भी सोमशर्मा को आते देखा, तो तुरन्त अपने आसन से उठ खड़े हुए और उस श्रेष्ठ ब्राह्मण को प्रणाम किया।
और फिर, जैसे कोई परदेस में अपने गाँव का आदमी मिल जाए, शोभन ने एक-एक करके सबका हाल पूछा। मेरे ससुर राजा कैसे हैं? मेरी प्रिया चन्द्रभागा कैसी है? और नगर में सब कुशल है?
सोमशर्मा ने कहा, राजन्, वहाँ सब कुशल है। पर यहाँ तो कमाल का आश्चर्य है। ऐसा विचित्र और सुन्दर नगर तो किसी ने कहीं नहीं देखा। बताइए, ये आपको कहाँ से मिला? सच-सच बताइए।
श्रद्धा के बिना किया व्रत
और अब शोभन ने जो कहा, वो इस पूरी कथा की सबसे गहरी बात है। ध्यान से सुनिए।
शोभन बोले, हे द्विजश्रेष्ठ, कार्तिक के कृष्ण पक्ष की रमा एकादशी का व्रत करके मुझे ये नगर मिला है। पर विप्र, मैंने ये उत्तम व्रत श्रद्धा के बिना किया था, इसलिए मैं इस नगर को अस्थिर मानता हूँ। ये टिकेगा नहीं, हिल रहा है।
अब ज़रा सोचिए। शोभन ने व्रत क्यों रखा था? नगाड़े के डर से, ससुराल की मर्यादा के लिए, लोग क्या कहेंगे इस डर से। मन से नहीं, मजबूरी में। और फिर भी, देखिए शास्त्र कितना दयालु है, वो व्रत बेकार नहीं गया। उसका फल मिला, और इतना बड़ा फल कि सोने का नगर मिल गया। पर वो फल पक्का नहीं था, स्थिर नहीं था।
ये बात हम सबके काम की है। कई बार हम कोई व्रत, कोई पूजा, बस इसलिए कर लेते हैं कि घर में सब कर रहे हैं, या कोई टोकेगा। तो क्या वो बेकार है? नहीं। ये कथा कहती है कि उसका भी फल है। पर जब वही काम श्रद्धा से, मन लगाकर होता है, तब उसका फल टिकता है, गहरा होता है।
और फिर शोभन ने सोमशर्मा से कहा, ये नगर स्थिर कैसे होगा, वो भी सुन लो। राजा मुचुकुन्द की बेटी चन्द्रभागा है। हे द्विज, जाकर उसके सामने ये सारी बात सुनाना।
चन्द्रभागा तक ख़बर
सोमशर्मा लौटकर मुचुकुन्द के नगर आए और चन्द्रभागा के सामने सारा वृत्तान्त सुनाया। उन्होंने कहा, शुभे, मैंने तुम्हारे पति को अपनी आँखों से देखा है, और उनका इन्द्र जैसा अजेय नगर भी देखा है। पर उन्होंने ख़ुद उसे अस्थिर बताया है। अब जिससे वो स्थिर हो, वो तुम करो।
अब सोचिए, चन्द्रभागा के मन पर क्या बीती होगी। जिस पति को उसने अपने हाथों विदा किया था, वो कहीं जीवित है, राजा बना बैठा है। उसकी आँखों में जो चमक आई होगी, उसका अन्दाज़ा लगाइए।
उसने तुरन्त कहा, हे विप्रर्षि, मुझे वहाँ ले चलिए। मैं अपने पति को देखने के लिए तड़प रही हूँ। और मैं अपने व्रत के पुण्य से उस नगर को स्थिर कर दूँगी। और फिर उसने एक बहुत सुन्दर बात कही: ऐसा कीजिए कि हम दोनों का मिलन हो जाए, क्योंकि बिछड़े हुओं को मिलाने से बड़ा पुण्य मिलता है।
वामदेव का आश्रम
सोमशर्मा चन्द्रभागा को साथ लेकर मन्दराचल के पास ऋषि वामदेव के आश्रम में पहुँचे। अब यहाँ एक सवाल उठता है, कि एक जीवित स्त्री देवनगर में कैसे जाएगी? पुराण इसका जवाब देता है: ऋषि वामदेव के मन्त्रों के प्रभाव से, और विष्णु के दिनों के, यानी एकादशियों के, उसके अपने व्रतों के प्रभाव से, चन्द्रभागा का शरीर दिव्य हो गया, और उसे दिव्य गति मिल गई।
तो देखिए, यहाँ दो चीज़ें मिलकर काम करती हैं। एक ऋषि का मन्त्र, और दूसरा चन्द्रभागा का अपना जमा किया हुआ पुण्य। अकेले मन्त्र नहीं, अकेले पुण्य नहीं, दोनों साथ।
मिलन, और वो आठ साल
और फिर वो पल आया। ख़ुशी से खिली हुई आँखों के साथ चन्द्रभागा अपने पति के पास पहुँची। शोभन ने अपनी प्रिया को आते देखा तो उनकी ख़ुशी का ठिकाना न रहा। उन्होंने उसे पास बुलाया और आदर से अपने बाईं ओर बिठाया।
और तब चन्द्रभागा ने बड़े प्रेम से अपने पति को अपने पुण्य की बात बताई। उसने कहा, प्रिय, सुनिए, मेरे पास जो पुण्य है, उसकी बात। जब से मैं अपने पिता के घर में आठ साल से बड़ी हुई, तब से मैंने एकादशी का व्रत किया है। उस पुण्य के प्रभाव से ये नगर अब प्रलय तक स्थिर रहेगा, और सब इच्छाओं से भरा-पूरा रहेगा।
अब यहाँ एक बहुत सुन्दर बात जुड़ती है। हमारे धर्मशास्त्र, जैसे निर्णयसिन्धु, एकादशी के व्रत की उम्र बताते हैं: आठ साल से ऊपर और अस्सी साल से कम। यानी चन्द्रभागा ठीक उसी उम्र से व्रत करने लगी थी, जिस उम्र से शास्त्र इसकी शुरुआत बताता है। बचपन से जो छोटी-छोटी एकादशियाँ उसने रखी थीं, वो सब जुड़ते-जुड़ते एक पूरे नगर की नींव बन गईं।
और यही है उस सवाल का जवाब, जो शुरू में आपसे कहा था। एक नगर की नींव हिल रही थी, और उसे थामा एक लड़की के बचपन से चले आ रहे व्रत ने। शोभन ने एक बार, मजबूरी में व्रत किया, तो नगर मिला पर हिलता हुआ। चन्द्रभागा ने सालों तक, मन से व्रत किया, तो वही नगर पक्का हो गया।
श्रीकृष्ण कहते हैं कि फिर चन्द्रभागा दिव्य रूप, दिव्य आभूषण और दिव्य भोगों के साथ अपने पति के संग आनन्द से रहने लगी, और दिव्य शरीर वाले शोभन भी रमा व्रत के प्रभाव से मन्दराचल की ढलान पर उसके साथ आनन्द से रहने लगे।
सफ़ेद गाय और काली गाय
और फिर श्रीकृष्ण युधिष्ठिर से कहते हैं, हे राजा, रमा नाम की ये एकादशी चिन्तामणि जैसी है, या कामधेनु जैसी। चिन्तामणि वो मणि, जो जो सोचो वो दे दे, और कामधेनु वो गाय, जो जो माँगो वो दे दे।
और फिर कृष्ण एक बहुत प्यारी बात कहते हैं, जो इस कथा के आख़िर में आती है। बहुत लोग सोचते हैं कि शुक्ल पक्ष की एकादशी बड़ी होती है और कृष्ण पक्ष की छोटी। कृष्ण कहते हैं, नहीं, दोनों पक्षों की एकादशी में कोई भेद मत करो। जैसी कृष्ण, वैसी शुक्ल। और फिर उदाहरण देते हैं:
सेवितैकादशी नृणां भुक्तिमुक्तिप्रदायिनी। धेनुः श्वेता यथा कृष्णा उभयोः सदृशं पयः ॥
यानी, जिस एकादशी का व्रत किया जाए, वो मनुष्य को भोग भी देती है और मोक्ष भी। गाय सफ़ेद हो या काली, दोनों का दूध एक जैसा होता है। वैसे ही दोनों एकादशियाँ एक जैसा फल देती हैं।
कितना सीधा उदाहरण है ना? गाँव का हर आदमी समझ जाए। गाय का रंग अलग है, पर दूध तो दूध है। पक्ष अलग है, पर एकादशी तो एकादशी है। और रमा तो ख़ुद कृष्ण पक्ष की एकादशी है, तो कृष्ण जैसे इसी के लिए ये बात कह रहे हैं।
व्रत कैसे रखें: दशमी से द्वादशी तक
अब आते हैं उस हिस्से पर, जो आप में से बहुत लोग जानना चाहते हैं, कि रमा एकादशी का व्रत रखें कैसे। और ये सब मैं अपनी तरफ़ से नहीं, हमारे पुराणों और धर्मशास्त्रों में जो लिखा है, वही बता रहा हूँ।
पहला दिन, दशमी, यानी इस साल बुधवार, चार नवम्बर। पद्म पुराण कहता है कि दशमी के दिन मन को शुद्ध रखकर, दृढ़ निश्चय के साथ, सिर्फ़ एक बार भोजन करें। और निर्णयसिन्धु बताता है कि वो भोजन सादा हो, नमक और तीखी-खारी चीज़ों के बिना, हविष्य जैसा। रात में संयम रखें।
दूसरा दिन, एकादशी, गुरुवार, पाँच नवम्बर। सुबह जल्दी उठकर स्नान करें, और फिर व्रत का संकल्प लें। शास्त्र कहता है कि उत्तर की ओर मुख करके, हाथ में जल से भरा ताँबे का पात्र लेकर, या केवल जल लेकर, संकल्प करें। और संकल्प का मन्त्र भी शास्त्र देता है, बहुत छोटा और बहुत सुन्दर:
एकादश्यां निराहारः स्थित्वाहमपरेऽहनि। भोक्ष्यामि पुण्डरीकाक्ष शरणं मे भवाच्युत ॥
यानी, हे कमल जैसी आँखों वाले भगवान, मैं एकादशी को बिना भोजन के रहकर अगले दिन भोजन करूँगा। हे अच्युत, आप मेरी शरण बनिए।
देखिए, इस संकल्प में कोई बड़ा-भारी वादा नहीं है, बस इतना कि आज नहीं खाऊँगा, कल खाऊँगा, और भगवान, आप मुझे सँभालिए। यही "शरणं मे भवाच्युत" वाली बात सबसे ज़रूरी है।
फिर दिन भर भगवान विष्णु की पूजा, नाम-जप, कथा-श्रवण, जैसे आप अभी कर रहे हैं। और रात को, जितना हो सके, भगवान के सामने जागरण करें, भजन-कीर्तन करें। याद है ना, पुराण ने कहा था कि यही रात भक्तों का आनन्द बढ़ाने वाली होती है।
जो पूरा उपवास न कर सकें
अब एक बहुत ज़रूरी बात, ख़ासकर उनके लिए जो बीमार हैं, बुज़ुर्ग हैं, दवाइयाँ लेते हैं, या शरीर से कमज़ोर हैं। शोभन की कथा सुनकर किसी के मन में डर नहीं बैठना चाहिए। हमारे शास्त्र इस बारे में बहुत दयालु हैं।
नारद पुराण साफ़ कहता है कि जो कमज़ोर हैं, उनके लिए अनुकल्प है, यानी दूसरा रास्ता: वो कन्द-मूल, फल, दूध और जल ले सकते हैं। और मार्कण्डेय और कूर्म पुराण कहते हैं कि जो उपवास न कर सके, वो दिन में एक बार खाकर, या सिर्फ़ रात में खाकर, या जो बिना माँगे मिल जाए वो खाकर, या दान करके भी ये व्रत निभा सकता है, पर एकादशी को ख़ाली न जाने दे।
और एक श्लोक तो इतना प्रसिद्ध है कि वो महाभारत में भी है, अग्नि पुराण में भी, और धर्मसिन्धु में भी। वो कहता है, ये आठ चीज़ें व्रत को नहीं तोड़तीं: जल, कन्द-मूल, फल, दूध, हवि यानी घी, ब्राह्मण की इच्छा, गुरु का वचन, और औषध, यानी दवा।
तो अगर आपको डॉक्टर ने दवा दी है, तो दवा ज़रूर लीजिए। ये मैं नहीं कह रहा, शास्त्र ख़ुद कह रहा है कि दवा से व्रत नहीं टूटता। व्रत शरीर को सज़ा देने के लिए नहीं, मन को भगवान से जोड़ने के लिए है।
द्वादशी का पारण
तीसरा दिन, द्वादशी, शुक्रवार, छह नवम्बर, धनतेरस की सुबह। इस दिन व्रत खोला जाता है, जिसे पारण कहते हैं। और पारण का भी समय होता है। इस साल नई दिल्ली में पारण सुबह लगभग छह बजकर छत्तीस मिनट से आठ बजकर सैंतालीस मिनट तक है। आपके शहर में सूरज निकलने का समय अलग हो, तो समय भी थोड़ा आगे-पीछे होगा।
पारण से पहले भगवान को भोग लगाएँ, और शास्त्र कहता है कि उस भोग में तुलसी ज़रूर मिलाएँ, और फिर वही तुलसी मिला प्रसाद खाकर व्रत खोलें। हो सके तो किसी ज़रूरतमन्द को या ब्राह्मण को भोजन कराएँ, दक्षिणा दें।
और पारण के समय भगवान से एक छोटी सी प्रार्थना है, जिसका भाव ये है: हे केशव, मैं अज्ञान के अँधेरे में अन्धा हूँ, इस व्रत से आप मुझ पर प्रसन्न होइए, और मुझे ज्ञान की दृष्टि दीजिए। ज़रा सोचिए, व्रत के बाद माँगा क्या जा रहा है? धन नहीं, सोना नहीं, बस देखने की आँख।
द्वादशी के दिन कुछ चीज़ें शास्त्र मना करता है: दिन में सोना, दूसरे का दिया अन्न, दो बार भोजन, शहद, काँसे के बर्तन में खाना, मांस और तेल। तो उस दिन सादा, सात्त्विक भोजन, एक बार, और दिन में सोइए नहीं।
रमा, लक्ष्मी और दीपावली
अब एक आख़िरी बात, जो इस एकादशी को इतना ख़ास बनाती है। इसका नाम रमा है, यानी लक्ष्मी। और कथा में शोभन को जो मिला, वो क्या था? सोने के खम्भों वाला, रत्नों से जड़ा, कुबेर जैसा वैभव। और वो वैभव टिका किस पर? श्रद्धा पर, और लगातार किए गए व्रत पर।
तो जब आप तीन दिन बाद दीपावली पर लक्ष्मी जी का स्वागत करेंगे, तो ये कथा याद रखिएगा। लक्ष्मी जी आती तो कई रास्तों से हैं, पर टिकती वहीं हैं, जहाँ श्रद्धा पक्की हो। शोभन को लक्ष्मी मिली, पर हिलती हुई। चन्द्रभागा की श्रद्धा ने उसे स्थिर कर दिया।
और अगर आपने हमारी महालक्ष्मी व्रत कथा नहीं सुनी है, जिसमें बताया गया है कि एक बार लक्ष्मी जी तीनों लोक छोड़कर क्यों चली गई थीं, तो वो भी ज़रूर सुनिए, दीपावली से पहले उससे अच्छी कथा नहीं।
कथा का फल, और विदा
श्रीकृष्ण इस कथा के अन्त में कहते हैं कि जो मनुष्य एकादशी व्रतों का माहात्म्य सुनता है, वो सब पापों से छूटकर विष्णुलोक में सम्मान पाता है। तो आज आपने रमा एकादशी की पूरी कथा सुनी, शोभन और चन्द्रभागा की कथा, मुचुकुन्द के नगाड़े की, मन्दराचल के सोने के नगर की, और उस छोटे से बचपन के व्रत की, जिसने एक नगर को प्रलय तक थाम लिया।
अगर आप ये व्रत रख रहे हैं, तो नीचे कमेंट में "जय श्री हरि" या "रमा" लिख दीजिए, ताकि बाक़ी व्रती भी आपके साथ जुड़ सकें। और अगर किसी अपने को इस कथा की ज़रूरत है, कोई जो व्रत रखता है, या कोई बुज़ुर्ग जो कथा सुनना चाहते हैं, तो उन्हें ज़रूर भेजिए।
अगली बड़ी एकादशी है देवउठनी एकादशी, बीस नवम्बर को, जिस दिन भगवान विष्णु अपनी योगनिद्रा से जागते हैं। उसकी कथा भी हम लेकर आएँगे।
तब तक के लिए, भगवान विष्णु और माँ लक्ष्मी आपके घर में श्रद्धा भी दें, और वैभव भी, और वो वैभव चन्द्रभागा के नगर की तरह स्थिर रहे।
जय श्री हरि। जय माँ लक्ष्मी।