महालक्ष्मी व्रत कथा

एक माला, जिसके गिरते ही लक्ष्मी चली गईं

Mahalakshmi Vrat Katha · 30 min

कथा का आधार नारद पुराण, पूर्वभाग 117 विष्णु पुराण 1.9 ब्रह्म पुराण 137 निर्णयसिन्धु 2.17
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शुरुआत

एक बार लक्ष्मी जी पूरे स्वर्ग को छोड़कर चली गई थीं। सिर्फ़ स्वर्ग नहीं, तीनों लोकों को छोड़कर, और इसकी वजह न कोई युद्ध था, न कोई पाप, वजह थी फूलों की एक माला, जो एक हाथी ने सूँघकर ज़मीन पर फेंक दी थी।

और एक बात और, जो बहुत कम लोग जानते हैं। महालक्ष्मी व्रत के आख़िरी दिन, आधी रात को, जब चाँद निकलता है, तो पहला अर्घ्य लक्ष्मी जी को नहीं, चन्द्रमा को दिया जाता है। क्यों? ये राज़ इसी कथा के अंदर छिपा है, और कथा के आख़िर में खुलेगा।

बैठिए, दीया जला लीजिए

तो आइए, आराम से बैठ जाइए। अगर आप पूजा के पास बैठे हैं तो एक दीया जला लीजिए, और अगर कहीं रास्ते में हैं, गाड़ी में हैं, या रसोई में काम करते हुए सुन रहे हैं, तो भी कोई बात नहीं, क्योंकि लक्ष्मी जी की कथा का नियम ये नहीं है कि आप कहाँ बैठे हैं, नियम ये है कि आपका मन कहाँ बैठा है।

आज हम महालक्ष्मी व्रत की कथा सुनेंगे, लेकिन थोड़े अलग ढंग से। आमतौर पर व्रत कथा का मतलब होता है कि पंडित जी ने दस मिनट में एक कहानी सुनाई, आपने हाथ में चावल लिए, अंत में चढ़ा दिए, और प्रसाद लेकर उठ गए। हम आज ये करेंगे भी, पर साथ में ये भी समझेंगे कि ये व्रत आया कहाँ से, शास्त्र इसके बारे में क्या कहते हैं, ये सोलह की गिनती बार-बार क्यों आती है, और सबसे बड़ी बात, लक्ष्मी जी रूठती क्यों हैं और लौटती कैसे हैं। क्योंकि सच कहूँ तो हम सबको लक्ष्मी जी का आना तो बहुत अच्छा लगता है, पर उनके जाने की वजहों पर कोई बात ही नहीं करना चाहता।

व्रत क्या है: सोलह का खेल

पहले ये जान लीजिए कि ये व्रत है क्या। नारद पुराण में बारहों महीनों की अष्टमी के व्रत गिनाए गए हैं, और वहाँ भादों के महीने की शुक्ल अष्टमी के बारे में लिखा है कि इसी दिन से महालक्ष्मी का सोलह दिन का व्रत शुरू होता है, जो सब तरह की सम्पत्ति को बढ़ाने वाला है। यही वो दिन है जिस दिन राधा अष्टमी भी पड़ती है, तो भादों की वो अष्टमी अपने आप में बड़ी शुभ है, एक तरफ़ राधा रानी, दूसरी तरफ़ महालक्ष्मी।

और ये व्रत चलता है सोलह दिन, उसी अष्टमी से लेकर आगे की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तक। अब आप ध्यान दीजिए, इस व्रत में सोलह की गिनती आपका पीछा नहीं छोड़ती। सोलह दिन, हाथ में बाँधा जाने वाला डोरा सोलह तारों का, उसमें गाँठें सोलह, पूजा सोलह उपचारों से, आख़िरी दिन सोलह सुहागिनों को भोजन, और जो सामान दान में दिया जाता है वो भी हर चीज़ सोलह-सोलह। मुझे तो लगता है कि लक्ष्मी जी को गणित बहुत पसंद है, और शायद इसीलिए जिनके घर में हिसाब-किताब ठीक रहता है, वहाँ वो टिकती भी हैं।

और एक बात सुनकर आप चौंक जाएँगे। निर्णयसिन्धु, जो व्रत-त्योहारों के नियम तय करने वाला ग्रन्थ है, कहता है कि ये व्रत सिर्फ़ सोलह दिन का नहीं, सोलह साल तक चलने वाला व्रत है, और एक बार शुरू कर दिया तो बीच में छोड़ा नहीं जाता। यानी जो लोग साल-दर-साल ये व्रत रखते आए हैं, वो असल में एक लंबी साधना कर रहे हैं, सोलह साल की।

तो पहले दिन क्या होता है? स्नान करके, लक्ष्मी जी के सामने बैठकर, व्रत रखने वाला संकल्प लेता है। नारद पुराण में ये संकल्प बहुत सीधे, बहुत प्यारे शब्दों में है, जैसे कोई बच्चा माँ से कहे कि मैं ये काम करूँगा, बस तुम साथ रहना। सुनिए:

करिष्येऽहं महालक्ष्मीव्रतं ते त्वत्परायणः । तदविघ्नेन मे यातु समाप्तिं त्वत्प्रसादतः ॥
नारद पुराण, पूर्वभाग 117.55

मतलब, हे माँ, तुम्हारे भरोसे, तुम्हारी शरण में रहकर मैं तुम्हारा महालक्ष्मी व्रत करूँगा, और तुम्हारी कृपा से ये बिना किसी रुकावट के पूरा हो जाए। देखिए, इसमें कोई माँग नहीं है, न धन की, न गाड़ी की, न मकान की। पहले दिन बस इतना कहा जाता है कि मुझे निभाने की ताक़त देना।

और फिर दाहिने हाथ में वो सोलह तार और सोलह गाँठों वाला डोरा बाँधा जाता है, और सोलह दिन तक रोज़ चन्दन, फूल, धूप, दीप से महालक्ष्मी की पूजा होती है। अब ये डोरा याद रखिएगा, क्योंकि कथा के आख़िर में ये डोरा फिर लौटकर आएगा, और तब आपको समझ आएगा कि इसे बाँधने का असली मतलब क्या है।

कथा, पहला भाग: दुर्वासा और फूलों की माला

अब चलते हैं कथा की तरफ़। ये कथा विष्णु पुराण में है, और विष्णु पुराण खुद इसके बारे में एक बड़ी बात कहता है, वो मैं आपको थोड़ी देर बाद बताऊँगा।

बहुत पुरानी बात है। धरती पर एक ऋषि घूम रहे थे, जिनका नाम सुनकर ही देवताओं के पसीने छूट जाते थे, महर्षि दुर्वासा। विष्णु पुराण कहता है कि दुर्वासा भगवान शंकर के अंश थे, और उन दिनों वो एक अजीब व्रत पर थे, जिसमें वो पागलों की तरह रहते थे, जानबूझकर, जैसे दुनिया की किसी चीज़ से कोई लेना-देना ही न हो।

घूमते-घूमते उन्होंने एक विद्याधरी को देखा, यानी स्वर्ग के आसपास रहने वाली एक सुंदर स्त्री, और उसके हाथ में एक माला थी, सन्तानक के दिव्य फूलों की। उस माला की ख़ुशबू ऐसी थी कि पूरा जंगल महक उठा था, और जंगल में रहने वाले सब जीव उस सुगंध से मगन हो रहे थे। दुर्वासा ने वो माला माँगी, और उस विद्याधरी ने बड़े आदर से, झुककर, माला उनके हाथ में दे दी। दुर्वासा ने माला सिर पर रख ली, और उसी मस्ती में आगे चल पड़े।

अब सामने से कौन आ रहे हैं? तीनों लोकों के राजा, देवराज इन्द्र, अपने ऐरावत हाथी पर बैठे, देवताओं के साथ, पूरी शान से। दुर्वासा ने अपने सिर से वो माला उतारी, जिस पर भौंरे मँडरा रहे थे, और उसी पागलपन वाले अंदाज़ में इन्द्र की तरफ़ उछाल दी।

अब यहाँ ध्यान दीजिए, इन्द्र ने माला पकड़ी तो सही, पर अपने गले में नहीं डाली, उसे ऐरावत के सिर पर रख दिया। शायद सोचा होगा कि हाथी भी सजा हुआ अच्छा लगेगा। और ऐरावत, जो उस समय मद में था, उसकी आँखें मद से लाल थीं, उसने उस माला की ख़ुशबू से खिंचकर सूँड़ से उसे सूँघा, और फिर उठाकर ज़मीन पर फेंक दिया।

बस। इतनी सी बात। एक माला ज़मीन पर गिरी।

और दुर्वासा का गुस्सा आसमान पर। उन्होंने इन्द्र से कहा कि ऐश्वर्य के घमंड ने तुम्हारा दिमाग़ ख़राब कर दिया है। मैंने तुम्हें ये माला दी, जो लक्ष्मी का घर है, और तुमने न झुककर कहा कि कितनी कृपा हुई, न इसे ख़ुशी से अपने सिर पर रखा। अब जैसे तुमने मेरी दी हुई माला को ज़मीन पर गिरने दिया, वैसे ही तुम्हारे तीनों लोकों की लक्ष्मी नष्ट हो जाएगी।

इन्द्र घबराकर हाथी से कूदे और दुर्वासा को मनाने लगे, हाथ जोड़े, पैरों पड़े। और अब दुर्वासा ने जो कहा, वो सुनने लायक है। उन्होंने कहा, इन्द्र, मैं नरम दिल वाला नहीं हूँ, माफ़ी मेरे स्वभाव में ही नहीं है। वो दूसरे ऋषि होंगे, गौतम और वसिष्ठ जैसे, जो दया से भरे हैं और तुम्हारी तारीफ़ कर-करके तुम्हें फुला देते हैं, इसीलिए तुम इतने घमंडी हो गए हो। मुझे जान लो, मैं दुर्वासा हूँ। यानी साफ़ बोल दिया कि मैं वो वाला ऋषि नहीं हूँ, ग़लत आदमी से पंगा ले लिया है तुमने। और इतना कहकर दुर्वासा चले गए।

जब लक्ष्मी चली गईं

अब देखिए उसके बाद क्या हुआ, क्योंकि यही असली बात है। विष्णु पुराण कहता है कि उस दिन से तीनों लोक, इन्द्र समेत, श्रीहीन हो गए। पेड़-पौधे और बेलें सूखने लगीं। यज्ञ बंद हो गए, तपस्वियों ने तप करना छोड़ दिया, और लोगों का मन दान-धर्म से हट गया। और सबसे ध्यान देने वाली बात, लोगों के मन में लालच घुस गया, और वो छोटी-छोटी चीज़ों के लिए भी तरसने लगे।

सोचिए, लक्ष्मी के जाने का पहला असर ये नहीं बताया गया कि ख़ज़ाने ख़ाली हो गए। पहला असर ये बताया गया कि मन छोटा हो गया। आदमी दान करना भूल गया, छोटी चीज़ों पर झगड़ने लगा। आपने कभी ग़ौर किया है, कि जिस घर में लक्ष्मी रूठ जाती हैं, वहाँ सबसे पहले पैसा नहीं जाता, सबसे पहले बरकत जाती है, मन की शांति जाती है, और भाई-भाई में दस रुपये के लिए बहस होने लगती है।

और फिर विष्णु पुराण एक बहुत गहरी बात कहता है। जहाँ बल है, वहाँ लक्ष्मी है, और बल आता है समृद्धि से। जिसके पास लक्ष्मी नहीं, उसके पास बल कहाँ से आएगा, और बल नहीं तो गुण कहाँ से टिकेंगे? और जिसके पास न बल है, न हिम्मत, उसे हर कोई कुचलकर निकल जाता है, और कुचला हुआ आदमी, चाहे कितना भी नामी हो, अपनी समझ भी खो बैठता है।

और ठीक यही हुआ। देवता कमज़ोर हुए तो दैत्यों ने हमला कर दिया, और देवता हार गए। हारे हुए देवता, अग्निदेव को आगे करके, ब्रह्मा जी के पास पहुँचे। ब्रह्मा जी ने सारी बात सुनी और कहा, मेरे पास इसका हल नहीं है, चलो भगवान विष्णु की शरण में चलते हैं, वही तुम्हारा भला करेंगे। और सब मिलकर क्षीरसागर के उत्तरी किनारे पर पहुँचे, और भगवान विष्णु की स्तुति करने लगे।

पर अभी एक बात बाकी है। लक्ष्मी जी गईं कहाँ थीं? और लौटीं तो किस रूप में? वो बात सबसे सुंदर है।

समुद्र-मन्थन: पहले चाँद, फिर लक्ष्मी

भगवान विष्णु प्रकट हुए, शंख, चक्र, गदा लिए, और उन्होंने देवताओं से कहा, घबराओ मत, मैं तुम्हारा तेज लौटाऊँगा। जाओ, दैत्यों के साथ मिलकर सब तरह की औषधियाँ लाओ और क्षीरसागर में डालो, मन्दर पर्वत को मथानी बनाओ, वासुकि नाग को रस्सी बनाओ, और अमृत के लिए समुद्र को मथो। और दैत्यों को मीठी बातों से मना लेना, कहना कि फल में बराबर का हिस्सा मिलेगा। और फिर धीरे से ये भी कहा, कि चिंता मत करो, मैं ऐसा इंतज़ाम करूँगा कि अमृत उन्हें न मिले, उन्हें सिर्फ़ मेहनत में हिस्सा मिलेगा।

तो मन्थन शुरू हुआ। और यहाँ भी एक मज़ेदार बात है। भगवान ने देवताओं को वासुकि की पूँछ की तरफ़ खड़ा किया, और दैत्यों को मुँह की तरफ़। अब वासुकि की साँसों से आग जैसी गरमी निकल रही थी, जिसने दैत्यों का सारा तेज झुलसा दिया, और उन्हीं साँसों से बादल उड़कर पूँछ की तरफ़ गए और देवताओं पर ठंडी बारिश करने लगे। यानी एक तरफ़ लू चल रही है, दूसरी तरफ़ फुहार पड़ रही है। सोचिए, दैत्य बेचारे गरमी में पसीना-पसीना, और देवता बारिश में भीगकर तरोताज़ा।

और भगवान विष्णु खुद कछुए का रूप लेकर समुद्र के बीच में मन्दर पर्वत के नीचे आधार बनकर बैठ गए, एक रूप में देवताओं के साथ रस्सी खींच रहे थे, एक रूप में दैत्यों के साथ, और एक विशाल रूप में, जिसे कोई देख भी नहीं पा रहा था, ऊपर से पर्वत को दबाए हुए थे।

अब समुद्र से एक-एक करके रत्न निकलने लगे। सबसे पहले कामधेनु, सुरभि गाय। फिर वारुणी देवी। फिर पारिजात का पेड़, जिसकी ख़ुशबू से संसार महक उठा। फिर अप्सराएँ। और फिर ठंडी किरणों वाला चन्द्रमा निकला, जिसे भगवान शंकर ने अपने सिर पर धारण कर लिया।

ये बात याद रखिएगा, चन्द्रमा लक्ष्मी जी से पहले निकले। उसी समुद्र से, उसी मन्थन से।

फिर धन्वन्तरि भगवान निकले, सफ़ेद वस्त्रों में, हाथ में अमृत से भरा कलश लिए। और फिर, सबसे अंत में, वो पल आया जिसके लिए सारा संसार तरस रहा था। समुद्र के जल से, खिले हुए कमल पर बैठी, हाथ में कमल लिए, अपनी सुंदरता से चमकती हुई, श्री देवी प्रकट हुईं।

और विष्णु पुराण कहता है कि बड़े-बड़े महर्षि आनंद से भर गए और उन्होंने श्रीसूक्त से उनकी स्तुति की। वही श्रीसूक्त, जो आज भी हर लक्ष्मी पूजा में पढ़ा जाता है। तो आइए, एक पल के लिए हम भी उन ऋषियों के साथ खड़े हो जाते हैं।

हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्णरजतस्रजाम् । चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो ममा वह ॥
श्रीसूक्त, ऋचा 1

सोने जैसे रंग वाली, सोने और चाँदी की मालाएँ पहने, चाँद जैसी शीतल, सुनहरी लक्ष्मी को, हे अग्निदेव, मेरे पास ले आओ। देखिए, पहली ही ऋचा में लक्ष्मी जी को "चन्द्रा" कहा गया, चाँद जैसी। ये संयोग नहीं है, और ये बात भी कथा के आख़िर में काम आएगी।

फिर गन्धर्व गाने लगे, अप्सराएँ नाचने लगीं, गंगा और सारी नदियाँ अपना जल लेकर उनके स्नान के लिए आईं, और दिशाओं के हाथी, यानी दिग्गज, सोने के कलशों में पवित्र जल भरकर देवी को नहलाने लगे। अब आप अपने पूजाघर में लगी गजलक्ष्मी की तस्वीर याद कीजिए, जिसमें दोनों तरफ़ हाथी सूँड़ से लक्ष्मी जी पर जल डाल रहे हैं। वो तस्वीर यही पल है।

और अब कथा का सबसे सुंदर मोड़ सुनिए। क्षीरसागर खुद शरीर धारण करके आया और उसने देवी को कभी न मुरझाने वाले कमलों की माला पहनाई। याद है, ये सारी मुसीबत किस चीज़ से शुरू हुई थी? एक माला से, जो ज़मीन पर फेंक दी गई थी, और जिसके फूल मिट्टी में मुरझा गए होंगे। और कथा का अंत हो रहा है एक ऐसी माला से, जो कभी मुरझाती ही नहीं। जो माला अनादर से गिरी, उसकी जगह आदर से पहनाई गई माला आई। और विश्वकर्मा ने उन्हें गहनों से सजाया, और सब देवताओं के देखते-देखते लक्ष्मी जी भगवान विष्णु के वक्षःस्थल पर जाकर विराजमान हो गईं।

बीच में एक बात आपसे

अब आपसे एक छोटी सी बात। आप यहाँ तक आ गए हैं, तो आधी कथा पर उठकर मत जाइएगा, क्योंकि आधी सुनी कथा अधूरा फल देती है, और इस कथा का सबसे ज़रूरी हिस्सा, वो वरदान जो लक्ष्मी जी ने ख़ुद दिया था, और आधी रात के चाँद का राज़, वो अभी आगे है। अगर कथा अच्छी लग रही है तो चैनल को सब्सक्राइब कर लीजिए, ताकि अगली कथा आप तक अपने आप पहुँचे। अब आगे चलते हैं।

इन्द्र की स्तुति और लक्ष्मी का वरदान

लक्ष्मी जी ने जैसे ही भगवान के वक्ष से देवताओं की तरफ़ देखा, देवता उसी पल परम आनंद से भर गए। और दैत्य, जिन्होंने भगवान से मुँह मोड़ रखा था, लक्ष्मी जी ने उन्हें छोड़ दिया, और वो उदास हो गए। फिर उन्होंने धन्वन्तरि के हाथ से अमृत का कलश छीना, भगवान ने मोहिनी का रूप धरकर उसे वापस लेकर देवताओं को दे दिया, देवताओं ने अमृत पिया, उनमें बल लौटा, और दैत्य हारकर भाग गए।

फिर विष्णु पुराण बताता है कि सूरज फिर से साफ़ चमकने लगा, तारे अपने रास्ते पर चलने लगे, अग्नि ऊँची लपटों से जलने लगी, और सब प्राणियों का मन धर्म की तरफ़ मुड़ गया। तीनों लोकों में फिर से श्री लौट आई।

और अब इन्द्र, जिनके घमंड से ये सब शुरू हुआ था, फिर से अपने सिंहासन पर बैठे, पर इस बार वो इन्द्र बदले हुए थे। इस बार उन्होंने सिर झुकाया, और कमल धारण करने वाली देवी की स्तुति की। उस स्तुति की पहली पंक्ति सुनिए:

नमस्ये सर्वलोकानां जननीमब्जसम्भवाम् । श्रियमुन्निद्रपद्माक्षीं विष्णुवक्षःस्थलस्थिताम् ॥
विष्णु पुराण 1.9.117

मैं श्री को प्रणाम करता हूँ, जो सब लोकों की माता हैं, कमल से जन्मी हैं, जिनकी आँखें खिले हुए कमल जैसी हैं, और जो भगवान विष्णु के वक्ष पर रहती हैं।

और इस स्तुति में इन्द्र ने एक बात कही, जो मुझे लगता है आज के हर आदमी को सुननी चाहिए। उन्होंने कहा, हे देवी, आप जिसे छोड़ देती हैं, उसे बल, सच्चाई, पवित्रता और अच्छा आचरण, सब उसी पल छोड़ देते हैं। और जिस पर आपकी नज़र पड़ जाती है, वो गुणहीन भी हो, तो उसमें अच्छा स्वभाव, सब गुण, कुल और ताक़त आ जाते हैं। और फिर इन्द्र ने हाथ जोड़कर कहा, हमें कभी मत छोड़ना, न हमारा ख़ज़ाना, न हमारी गौशाला, न हमारा घर, न हमारा परिवार।

लक्ष्मी जी प्रसन्न हुईं और बोलीं, इन्द्र, मैं तुम्हारी इस स्तुति से बहुत ख़ुश हूँ, जो चाहो वर माँग लो। अब देखिए इन्द्र ने क्या माँगा, क्योंकि इस बार इन्द्र ने अपने लिए नहीं माँगा। पहला वर माँगा कि आप तीनों लोकों को कभी मत छोड़ना। और दूसरा वर माँगा कि जो भी इस स्तुति से आपकी स्तुति करे, उसे आप कभी मत छोड़ना। यानी इन्द्र ने हम सबके लिए माँग लिया।

और लक्ष्मी जी ने कहा, मैं तीनों लोकों को नहीं छोड़ूँगी, और जो मनुष्य सुबह और शाम इस स्तुति से मेरी स्तुति करेगा, मैं उससे कभी मुँह नहीं मोड़ूँगी।

और अब वो बात, जो मैंने शुरू में कहा था कि बाद में बताऊँगा। विष्णु पुराण इस कथा के अंत में ख़ुद कहता है कि जो लक्ष्मी जी के जन्म की ये कथा सुनता है या पढ़ता है, उसके घर से तीन पीढ़ियों तक लक्ष्मी नहीं जातीं। और जिन घरों में ये स्तुति पढ़ी जाती है, वहाँ झगड़े की जड़, दरिद्रता, टिकती ही नहीं। तो आप अभी जो सुन रहे हैं, वो सिर्फ़ एक कहानी नहीं है। शास्त्र के अपने शब्दों में, इसे सुनना ही पूजा है।

पर अभी एक बात बाकी है। लक्ष्मी जी टिकती कहाँ हैं, और जाती कहाँ से हैं? इस पर एक बार बड़ा मज़ेदार झगड़ा हुआ था, और वो झगड़ा था दो बहनों का।

लक्ष्मी और दरिद्रा का झगड़ा

ये कथा ब्रह्म पुराण में है, और इसे ब्रह्मा जी खुद नारद जी को सुना रहे हैं। बहुत पहले लक्ष्मी और दरिद्रा, यानी ग़रीबी की देवी, इन दोनों में झगड़ा हो गया कि बड़ी कौन है। और झगड़ा भी ऐसा कि दोनों एक-दूसरे से लड़ते हुए पूरे ब्रह्मांड में घूम आईं। तीनों लोकों में कोई चीज़ ऐसी नहीं बची जिसे इन दोनों ने छुआ न हो। एक कहे, बड़ी मैं हूँ, दूसरी कहे, नहीं, बड़ी मैं हूँ। और दरिद्रा ने ज़ोर देकर कहा, पहले तो मैं पैदा हुई थी।

अब दरिद्रा की दलीलें सुनिए, क्योंकि वो बेवक़ूफ़ नहीं थी, उसकी बातों में दम था। उसने कहा, जहाँ मैं रहती हूँ, वहाँ काम, क्रोध, लोभ, मद और ईर्ष्या नहीं टिकते। वहाँ डर नहीं होता, घमंड नहीं होता। और फिर उसने लक्ष्मी जी पर सीधा वार किया। कहा, लक्ष्मी, तुम्हें शर्म नहीं आती ख़ुद को बड़ी कहते हुए? तुम पर भरोसा करने वालों को तुम धोखा देती हो। तुम्हें पाने की ख़ुशी उतनी नहीं होती, जितना तुम्हारे जाने के बाद पछतावा होता है। और फिर एक बात कही, जो सुनकर हँसी भी आती है और सोचने पर मजबूर भी करती है। कहा, शराब भी आदमी को उतना नशा नहीं देती, जितना तुम्हारे पास आ जाने भर से पढ़े-लिखों को चढ़ जाता है। और ये बात तो हम सबने देखी है, कि कुछ लोगों के पास चार पैसे आते ही उनकी चाल बदल जाती है, फ़ोन उठाने का अंदाज़ बदल जाता है।

अब लक्ष्मी जी ने जवाब दिया, और उनका जवाब भी उतना ही तीखा था। उन्होंने कहा, जिसे मैं सजाती हूँ, उसका हर जगह सम्मान होता है। और ग़रीब आदमी, चाहे शिव जैसा गुणवान हो, उसे सब नीचा दिखाते हैं। और फिर एक बहुत गहरी बात कही। कहा, जैसे ही आदमी किसी से कहता है "दे दो", उसी पल उसके शरीर में रहने वाले पाँच देवता उसे छोड़कर चले जाते हैं: बुद्धि, श्री, लज्जा, शांति और कीर्ति। आदमी में गुण और इज़्ज़त तभी तक हैं, जब तक वो किसी से माँगता नहीं।

तो अब फ़ैसला कौन करे? दोनों ब्रह्मा जी के पास पहुँचीं। और ब्रह्मा जी ने, जो सृष्टि के रचयिता हैं, बड़ी समझदारी से मामला टाल दिया। उन्होंने कहा, धरती मुझसे पुरानी है, और जल उससे भी पुराना है, और फिर बोले कि स्त्रियों का झगड़ा स्त्रियाँ ही समझ सकती हैं, दूसरे नहीं। तो जाओ, गौतमी गंगा के पास जाओ, वही फ़ैसला करेंगी। यानी ब्रह्मा जी भी इस झगड़े में पड़ना नहीं चाहते थे, और सच कहूँ तो कौन पड़ना चाहेगा।

तो लक्ष्मी और दरिद्रा, धरती और जल को साथ लेकर, गौतमी नदी, यानी गोदावरी, के पास पहुँचीं। धरती और जल ने दोनों की बातें गौतमी को सुनाईं। और गौतमी गंगा ने जो फ़ैसला दिया, वो इस पूरी कथा का दिल है। उन्होंने कहा, वेद-ज्ञान की शोभा, तप की शोभा, यज्ञ की शोभा, यश, विद्या, बुद्धि, सरस्वती, स्मृति, लज्जा, धैर्य, क्षमा, सफलता, संतोष, शांति, जल और धरती, रात और चाँदनी, जो कुछ भी इस संसार में है, सब लक्ष्मी से भरा हुआ है। किसी में भी जो कुछ सुंदर है, जो कुछ उत्तम दिखता है, वो सब लक्ष्मी ही है। लक्ष्मी के बिना कुछ भी नहीं।

और फिर गंगा ने दरिद्रा से कहा, जाओ, जाओ। और ब्रह्म पुराण कहता है कि उसी दिन से गंगा का जल दरिद्रा का दुश्मन है।

अब ज़रा सोचिए, इस कथा से क्या निकला। हम लक्ष्मी को सिर्फ़ पैसा समझते हैं, नोट, सोना, बैंक का बैलेंस। पर गंगा ने जो सूची दी, उसमें धैर्य है, लज्जा है, क्षमा है, संतोष है, शांति है, विद्या है, और चाँदनी भी है। यानी जिस घर में धीरज है, जिस घर में बड़ों का लिहाज़ है, जिस घर में संतोष है, वहाँ लक्ष्मी पहले से बैठी हैं, चाहे तिजोरी कितनी भी छोटी हो। और दरिद्रा की बात में भी एक सच छिपा था, कि लक्ष्मी अगर घमंड लेकर आएँ तो नशा बन जाती हैं। इन्द्र के साथ यही तो हुआ था।

घरों में सुनाई जाने वाली कथा: गान्धारी, कुन्ती और ऐरावत

अब एक और कथा, जो आपने शायद अपनी दादी-नानी से सुनी हो। ये कथा हमें किसी पुराण के श्लोकों में नहीं मिली, ये लोक की कथा है, जो पीढ़ियों से महालक्ष्मी व्रत के दिन घरों में माँएँ सुनाती आई हैं। मैं इसे वैसे ही सुना रहा हूँ, जैसे घरों में सुनाई जाती है।

कहते हैं, हस्तिनापुर में महालक्ष्मी व्रत का दिन था। गान्धारी जी ने बड़ी धूमधाम से पूजा रखी, नगर की सारी स्त्रियों को बुलाया, पर कुन्ती जी को नहीं बुलाया। और उनके सौ बेटों ने मिट्टी का एक बहुत बड़ा हाथी बनाया, ताकि उस पर बैठी लक्ष्मी जी की पूजा हो। पूरा नगर गान्धारी जी के महल की तरफ़ जा रहा था।

और कुन्ती जी अपने घर में उदास बैठी थीं। न कोई बुलावा, न पूजा का सामान, न इतने बड़े हाथी का इंतज़ाम। तब अर्जुन ने माँ को उदास देखा और पूछा कि क्या बात है। और कहते हैं कि अर्जुन ने अपने पिता इन्द्र से प्रार्थना की, और स्वर्ग से असली ऐरावत हाथी को अपनी माँ की पूजा के लिए ले आए।

फिर क्या था, जब नगर में ख़बर फैली कि कुन्ती जी के आँगन में स्वर्ग का ऐरावत खड़ा है, तो सारा नगर उधर चल पड़ा, और कुन्ती जी ने जीवित ऐरावत पर विराजमान लक्ष्मी जी की पूजा की।

अब ज़रा इस कथा को उस विष्णु पुराण वाली कथा के साथ रखकर देखिए, क्योंकि यहाँ एक बहुत सुंदर संयोग है। विष्णु पुराण में ऐरावत वही हाथी है, जिसकी सूँड़ से माला गिरी, और लक्ष्मी तीनों लोकों से चली गईं। और लोक-कथा में वही ऐरावत लक्ष्मी पूजा में लाया जा रहा है, एक ऐसे घर में जहाँ घमंड नहीं, बस एक उदास माँ और एक बेटे का प्यार है। एक जगह इन्द्र के घमंड ने लक्ष्मी को भगाया, दूसरी जगह इन्द्र के बेटे की भक्ति लक्ष्मी को घर ले आई।

और इस लोक-कथा की सीख भी साफ़ है, जो हमारी माँएँ इसीलिए हर साल सुनाती थीं। पूजा में किसी को छोड़ना नहीं चाहिए। जो पूजा किसी का दिल दुखाकर की जाए, उसकी धूमधाम चाहे जितनी हो, लक्ष्मी उस धूमधाम से नहीं, दिल से आती हैं।

उद्यापन, और आधी रात के चाँद का राज़

अब लौटते हैं व्रत पर, उसके आख़िरी दिन पर, कृष्ण अष्टमी पर, जिस दिन उद्यापन होता है। नारद पुराण में इसका पूरा विधान है। कपड़े का एक छोटा सा मण्डप बनाया जाता है, सर्वतोभद्र मण्डल पर कलश स्थापित किया जाता है, और दीपक जलाया जाता है। फिर वो डोरा, जो सोलह दिन से हाथ में बँधा था, उसे बाँह से उतारकर कलश के नीचे रख दिया जाता है। फिर महालक्ष्मी की मूर्तियों को जल और पंचामृत से स्नान कराकर सोलह उपचारों से पूजा होती है, और रात भर गीत और बाजों के साथ जागरण होता है।

और फिर आती है आधी रात। जब अमृत जैसी किरणों वाला चन्द्रमा उदय होता है। और उस समय, लक्ष्मी जी से पहले, चन्द्रमा को अर्घ्य दिया जाता है, इन शब्दों के साथ:

क्षीरोदार्णवसंभूत महालक्ष्मीसहोदर । पीयूषधाम रोहिण्याः सहितोऽर्घ्यं गृहाण मे ॥
नारद पुराण, पूर्वभाग 117.63

हे क्षीरसागर से जन्मे, महालक्ष्मी के भाई, अमृत के घर, रोहिणी के साथ मेरा अर्घ्य स्वीकार करो।

अब समझ आया? चन्द्रमा लक्ष्मी जी का भाई है। दोनों एक ही समुद्र से निकले, उसी मन्थन से, और चन्द्रमा पहले निकले, यानी बड़े भाई। अब आप ही सोचिए, जब हम किसी के घर जाते हैं, तो पहले बड़ों को प्रणाम करते हैं न? तो लक्ष्मी जी के घर बुलाने से पहले, उनके बड़े भाई का सम्मान होता है। और नारद पुराण यहाँ एक बात और कहता है, कि महालक्ष्मी उस समय चन्द्रमण्डल में विराजमान रहती हैं। इसीलिए व्रत का नियम है, निर्णयसिन्धु के अनुसार, कि वही अष्टमी ली जाती है जो चन्द्रमा के उदय के समय मौजूद हो, क्योंकि पूजा उसी समय की बताई गई है। और याद है, श्रीसूक्त की पहली ऋचा में लक्ष्मी जी को "चन्द्रा" कहा गया था। चाँद की शीतलता और लक्ष्मी की कृपा, दोनों एक ही घर की हैं।

फिर चन्द्रमण्डल में बैठी महालक्ष्मी को वो डोरा अर्पित किया जाता है, और उनसे कहा जाता है, हे कमला, क्षीरसागर से जन्मी, कमल में रहने वाली, विष्णु के वक्ष पर रहने वाली, मेरी सब कामनाएँ पूरी करो। फिर सुहागिनों का चन्दन, महावर और काजल से सम्मान होता है, उन्हें भोजन कराया जाता है, हवन होता है, सोलह-सोलह चीज़ें नए सूप में रखकर, दूसरे सूप से ढककर दान दी जाती हैं, और ये कहा जाता है कि क्षीरसागर से जन्मी, चन्द्रमा की बहन, विष्णु की प्रिया लक्ष्मी इस व्रत से प्रसन्न हों। और अंत में चार ब्राह्मणों और सोलह सुहागिनों को मीठा भोजन कराकर, दक्षिणा देकर विदा किया जाता है, और फिर व्रती अपने प्रियजनों के साथ बैठकर भोजन करता है।

नारद पुराण कहता है कि जो ये व्रत विधि से करता है, वो इस लोक में मनचाहे सुख भोगता है, और फिर बहुत समय तक लक्ष्मीलोक में रहता है। और जिस दिन ये व्रत पूरा होता है, उस दिन को अशोकाष्टमी कहते हैं, यानी शोक को मिटाने वाली अष्टमी।

डोरा और माला

और अब वो डोरा, जिसके बारे में मैंने शुरू में कहा था कि वो लौटकर आएगा।

मुझे लगता है, ये सोलह गाँठों वाला डोरा उसी माला का जवाब है। इन्द्र को एक माला मिली थी, उन्होंने उसे गले में नहीं डाला, हाथी के सिर पर रख दिया, और वो ज़मीन पर गिर गई। हम सोलह दिन तक अपने हाथ में एक डोरा बाँधे रखते हैं, उसे गिरने नहीं देते, रोज़ उसके साथ पूजा करते हैं, और आख़िरी रात बड़े आदर से उसे लक्ष्मी जी को लौटा देते हैं। जो चीज़ भगवान की तरफ़ से आए, उसे सँभालकर रखना, यही तो इस पूरी कथा की सीख है। इन्द्र ने ये सीख तीनों लोक गँवाकर सीखी, हमें ये सीख एक डोरे से मिल जाती है।

घर ले जाने के लिए तीन बातें

तो आज की कथा से घर ले जाने के लिए तीन बातें।

पहली, लक्ष्मी अनादर से जाती हैं। इन्द्र ने न कोई चोरी की, न कोई पाप, बस एक दी हुई चीज़ का आदर नहीं किया। आपके घर में जो कुछ आया है, अन्न, धन, रिश्ते, उनका आदर कीजिए, उन्हें ज़मीन पर मत गिरने दीजिए।

दूसरी, लक्ष्मी सिर्फ़ पैसा नहीं हैं। धैर्य, लज्जा, क्षमा, संतोष और शांति, ये सब लक्ष्मी के ही रूप हैं, गौतमी गंगा ने यही फ़ैसला दिया था। जिस घर में ये हैं, वहाँ लक्ष्मी पहले से बैठी हैं।

और तीसरी, लक्ष्मी स्तुति से लौटती हैं, और ख़ुद उन्होंने वादा किया है कि जो सुबह और शाम उनकी स्तुति करेगा, वो उससे मुँह नहीं मोड़ेंगी। रोज़ दो पल, सुबह और शाम, बस इतना।

समापन

तो ये थी महालक्ष्मी व्रत की कथा। एक माला जो गिरी, एक समुद्र जो मथा गया, एक चाँद जो पहले निकला, एक देवी जो कमल पर बैठकर लौटीं, और एक वादा जो उन्होंने इन्द्र के ज़रिए हम सबसे किया।

अब आपसे एक सवाल, कमेंट में ज़रूर बताइए: अगर आप इन्द्र की जगह होते, और दुर्वासा आपकी तरफ़ माला उछालते, तो आप क्या करते? और अगर कुछ लिखने का मन न हो, तो बस इतना लिख दीजिए, जय माँ लक्ष्मी।

और हाँ, विष्णु पुराण का वो वचन याद रखिएगा, कि जो ये कथा सुनता है, उसके घर से तीन पीढ़ियों तक लक्ष्मी नहीं जातीं। आपने आज ये कथा सुनी है।

अब हाथ जोड़िए, और मन में बस इतना कहिए, हे माँ, कभी मत छोड़ना।

जय माँ महालक्ष्मी।

तीन बातें याद रखिए

  1. 1.लक्ष्मी अनादर से जाती हैं। इन्द्र ने न कोई चोरी की, न कोई पाप, बस एक दी हुई चीज़ का आदर नहीं किया। आपके घर में जो कुछ आया है, अन्न, धन, रिश्ते, उनका आदर कीजिए, उन्हें ज़मीन पर मत गिरने दीजिए।
  2. 2.लक्ष्मी सिर्फ़ पैसा नहीं हैं। धैर्य, लज्जा, क्षमा, संतोष और शांति, ये सब लक्ष्मी के ही रूप हैं, गौतमी गंगा ने यही फ़ैसला दिया था। जिस घर में ये हैं, वहाँ लक्ष्मी पहले से बैठी हैं।
  3. 3.लक्ष्मी स्तुति से लौटती हैं, और ख़ुद उन्होंने वादा किया है कि जो सुबह और शाम उनकी स्तुति करेगा, वो उससे मुँह नहीं मोड़ेंगी। रोज़ दो पल, सुबह और शाम, बस इतना।

इस कथा के श्लोक

नारद पुराण, पूर्वभाग 117.55 श्रीसूक्त, ऋचा 1 विष्णु पुराण 1.9.117 नारद पुराण, पूर्वभाग 117.63

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