पापांकुशा एकादशी व्रत कथा

लोहार की धौंकनी, और पापों पर अंकुश

Papankusha Ekadashi Vrat Katha · 14 min

कथा का आधार पद्म पुराण, उत्तरखण्ड 61 निर्णयसिन्धु 1.11
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शुरुआत

लोहार की दुकान में एक धौंकनी होती है। चमड़े की, जो फूलती है, पिचकती है, फूलती है, पिचकती है… दिन भर साँस लेती रहती है। पर क्या वो ज़िंदा है? नहीं। श्रीकृष्ण कहते हैं, कुछ लोग भी ठीक ऐसे ही जीते हैं। साँस चलती रहती है, दिन आते हैं, जाते हैं… पर वो सच में जीते नहीं। कौन हैं वो लोग? और इस धौंकनी से बाहर कैसे निकलें? ये बात आज की एकादशी की कथा में छुपी है।

और एक बात और, जो सुनकर बहुत लोगों को राहत मिलती है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि ये एकादशी अगर कोई सच्चे मन से नहीं, बस किसी बहाने से भी रख ले, तो भी उसका फल जाता नहीं। बहाने से भी! कैसे? वो भी आगे सुनेंगे।

बैठिए, दीया जला लीजिए

तो आइए, आराम से बैठिए। अगर भगवान विष्णु के सामने एक दीया जला सकें तो जला लीजिए, और अगर काम के बीच में हैं, रास्ते में हैं, या रसोई में हैं, तो भी कोई बात नहीं। कथा सुनना अपने आप में पूजा है।

आज की एकादशी का नाम है पापांकुशा एकादशी। अंकुश आप जानते हैं? वो लोहे का छोटा-सा काँटा, जिससे महावत इतने बड़े हाथी को भी क़ाबू में रखता है। तो पापांकुशा का मतलब हुआ, पापों पर अंकुश। हमारे पाप, जो कभी-कभी उस मदमस्त हाथी की तरह हमें जहाँ चाहें खींच ले जाते हैं, उन पर लगाम।

इस साल पापांकुशा एकादशी है गुरुवार, बाईस अक्टूबर को। एकादशी तिथि उस दिन दोपहर पौने तीन बजे तक है, और सूर्योदय के समय एकादशी होने से व्रत इसी दिन रखा जाएगा। और पारण, यानी व्रत खोलना, अगले दिन शुक्रवार, तेईस अक्टूबर की सुबह, नई दिल्ली के हिसाब से लगभग साढ़े छह बजे से पौने नौ बजे के बीच। आपके शहर में सूर्योदय थोड़ा आगे-पीछे हो, तो समय भी थोड़ा खिसकेगा।

ये आश्विन महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी है, यानी दशहरे के ठीक बाद वाली एकादशी।

युधिष्ठिर का प्रश्न

ये बात भी श्रीकृष्ण और युधिष्ठिर के बीच की है। युधिष्ठिर ने पूछा, हे मधुसूदन, कृपा करके बताइए, आश्विन के शुक्ल पक्ष की एकादशी का क्या नाम है?

और श्रीकृष्ण बोले, हे राजेन्द्र, सुनो, मैं इसका पाप नाश करने वाला माहात्म्य कहता हूँ।

पापाङ्कुशेति विख्याता सर्वपापहरा परा। पद्मनाभाभिधानं मां पूजयेत्तत्र मानवः ॥
पद्म उत्तर 61.3

यानी, ये पापांकुशा नाम से प्रसिद्ध है, श्रेष्ठ है, और सब पापों को हर लेती है। और उस दिन मनुष्य मेरी पूजा पद्मनाभ के नाम से करे।

पद्मनाभ, यानी जिनकी नाभि से कमल निकला है, वही कमल जिस पर बैठकर ब्रह्मा जी ने सृष्टि रची। तो इस एकादशी पर भगवान विष्णु को उनके उस रूप में याद कीजिए, जिनकी नाभि से पूरी सृष्टि का कमल खिला। पूजा करते समय बस इतना कह दीजिए, "ॐ पद्मनाभाय नमः"।

एक प्रणाम का फल

अब श्रीकृष्ण एक के बाद एक ऐसी बातें कहते हैं, कि सुनकर मन हल्का हो जाता है।

वो कहते हैं, एक मुनि, जो अपनी इन्द्रियों को वश में रखकर लंबे समय तक कठोर तप करता है, उसे जो फल मिलता है, वो फल गरुड़ की ध्वजा वाले विष्णु को बस प्रणाम करने से मिल जाता है। सोचिए, सालों का तप एक तरफ़, और सच्चे मन का एक प्रणाम दूसरी तरफ़।

और फिर कहते हैं, जो मनुष्य मोह में पड़कर बहुत बार पाप कर बैठता है, वो भी अगर सब पाप हरने वाले हरि को प्रणाम कर ले, तो नरक नहीं जाता। धरती पर जितने तीर्थ हैं, जितने पवित्र मन्दिर हैं, उन सबका फल विष्णु के नाम के कीर्तन से मिल जाता है। और जो शार्ङ्ग धनुष धारण करने वाले जनार्दन की शरण में आ जाते हैं, उन्हें यमलोक की यातना कभी नहीं होती।

यानी इस एकादशी का पहला संदेश ही ये है, कि दरवाज़ा कभी बंद नहीं होता। चाहे कितनी भी ग़लतियाँ हुई हों, एक प्रणाम, एक नाम, और रास्ता खुल जाता है।

शिव और विष्णु

और अब इसी अध्याय में श्रीकृष्ण एक ऐसी बात कहते हैं, जो आज भी बहुत ज़रूरी है। बहुत घरों में ये बहस होती है, शिव बड़े या विष्णु? और कभी-कभी ये बहस कड़वी भी हो जाती है।

श्रीकृष्ण साफ़ कहते हैं, जो वैष्णव होकर शिव की निन्दा करता है, वो विष्णुलोक नहीं पाता। और जो शैव होकर विष्णु की निन्दा करता है, उसके लिए भी वही कठोर बात कही गई है। यानी विष्णु का भक्त होने का पहला नियम है, शिव का अपमान मत करो। और शिव का भक्त होने का पहला नियम है, विष्णु का अपमान मत करो।

कितनी सुन्दर बात है ना? ख़ुद विष्णु के अवतार श्रीकृष्ण, विष्णु की एकादशी की कथा सुनाते हुए, सबसे पहले शिव का सम्मान सिखाते हैं।

न गंगा, न गया, न काशी

फिर श्रीकृष्ण इस एकादशी की तुलना करते हैं। वो कहते हैं, हज़ारों अश्वमेध यज्ञ और सैकड़ों राजसूय यज्ञ, एकादशी के व्रत के सोलहवें हिस्से के बराबर भी नहीं। संसार में एकादशी जैसा कोई व्रत नहीं है।

और फिर कहते हैं, हे राजन्, न गंगा, न गया, न काशी, न पुष्कर, और न कुरुक्षेत्र, कोई भी हरि के दिन से ज़्यादा पवित्र नहीं है।

सोचिए, जिन तीर्थों तक पहुँचने के लिए लोग पूरी ज़िंदगी पैसे जोड़ते हैं, लंबी यात्राएँ करते हैं, श्रीकृष्ण कहते हैं कि एकादशी का दिन उन सबसे बढ़कर है। और ये दिन हर पंद्रह दिन में अपने आप आपके घर आता है। न टिकट, न सफ़र, न भीड़। बस मन चाहिए।

बहाने से भी

अब वो बात, जो शुरू में कही थी। श्रीकृष्ण कहते हैं:

व्याजेनापि कृता यैश्च न ते यान्ति हि भास्करिम्। स्वर्गमोक्षप्रदा ह्येषा शरीरारोग्यदायिनी ॥
पद्म उत्तर 61.15

यानी, जो लोग इसे बहाने से भी कर लेते हैं, वो सूर्य के पुत्र यम के पास नहीं जाते। ये स्वर्ग भी देती है, मोक्ष भी, और शरीर को आरोग्य भी।

बहाने से भी। किसी के कहने पर रख लिया, घर में सब रख रहे थे तो रख लिया, डॉक्टर ने हल्का खाने को कहा था तो उसी दिन एकादशी मान ली, ऐसा भी चलेगा। श्रीकृष्ण इतने दयालु हैं कि कहते हैं, नीयत पूरी न भी हो, शुरुआत तो हुई। और पहले ही इसी अध्याय में वो कह चुके थे, कि प्रसंगवश, यानी किसी और कारण से भी एक एकादशी कर ली, तो भी यम की यातना नहीं होती।

और इसी के साथ वो गिनाते हैं कि ये एकादशी क्या-क्या देती है: अच्छा जीवन-साथी, धन, और अच्छे मित्र। यानी सिर्फ़ परलोक नहीं, इसी जीवन की ज़रूरी चीज़ें भी।

घरों में सुनाई जाने वाली कथा

अब एक कथा, जो पापांकुशा एकादशी पर बहुत घरों में सुनाई जाती है। ये कथा हमारे पद्म पुराण के इस अध्याय में नहीं है, लोग इसे परम्परा से सुनाते आए हैं, इसलिए मैं इसे वैसे ही, घरों की कथा कहकर सुना रहा हूँ।

कहते हैं, विन्ध्य पर्वत पर क्रोधन नाम का एक बहेलिया रहता था, यानी शिकारी। नाम की तरह ही स्वभाव भी, ग़ुस्सैल, कठोर, और पूरी ज़िंदगी बुरे कामों में बीती। जब बुढ़ापा आया, तो एक रात उसे सपने में यमराज के दूत दिखे, जो कह रहे थे, कल तुम्हारा अंतिम दिन है।

डर के मारे वो भागा, और जंगल में अंगिरा ऋषि के आश्रम पहुँचा। उनके पैरों में गिरकर बोला, महाराज, मैंने पूरी ज़िंदगी पाप किए हैं, अब मेरा क्या होगा? कोई ऐसा रास्ता बताइए, जिसमें न बहुत धन लगे, न बहुत समय, क्योंकि मेरे पास दोनों नहीं हैं।

ऋषि ने कहा, आश्विन के शुक्ल पक्ष की पापांकुशा एकादशी आ रही है। उसका व्रत करो, और भगवान पद्मनाभ की पूजा करो। क्रोधन ने वैसा ही किया, और कथा कहती है कि उस व्रत के प्रभाव से वो सब पापों से छूटकर विष्णुलोक गया।

ये कथा परम्परा की है, पर इसका भाव ठीक वही है जो श्रीकृष्ण पद्म पुराण में कहते हैं: बचपन हो, जवानी हो या बुढ़ापा, एकादशी का व्रत करके पापी भी दुर्गति नहीं पाता। देर कभी नहीं होती।

लोहार की धौंकनी

और अब वो बात, जिससे हमने शुरुआत की थी। अध्याय के आख़िर में श्रीकृष्ण एक बहुत तीखा, बहुत सच्चा उदाहरण देते हैं:

यस्य पुण्यविहीनानि दिनान्यायान्ति यान्ति च। स लोहकारभस्त्रेव श्वसन्नपि न जीवति ॥
पद्म उत्तर 61.23 + 61.24

यानी, जिसके दिन बिना किसी पुण्य के आते और चले जाते हैं, वो लोहार की धौंकनी जैसा है, साँस लेते हुए भी जीवित नहीं।

अब ये सुनकर डरना नहीं है, सोचना है। पुण्य मतलब कोई बहुत बड़ा काम नहीं। श्रीकृष्ण अगली ही पंक्ति में कहते हैं, दरिद्र भी अपने हर दिन को सफल बनाए, अपनी शक्ति के अनुसार, स्नान, दान, जप, ध्यान से। यानी किसी भूखे को एक रोटी, किसी परेशान को दो मीठे शब्द, सुबह भगवान का एक नाम, बस इतना भी दिन को धौंकनी से जीवन बना देता है।

और दान की बात करते हुए वो कुछ ख़ास चीज़ें गिनाते हैं: सोना, तिल, भूमि, गाय, अन्न और जल, और साथ में जूते, छाता और वस्त्र। ये आख़िरी तीन चीज़ें ध्यान देने लायक़ हैं। जूते, छाता, कपड़े, यानी वो चीज़ें जो किसी ग़रीब को धूप और रास्ते की तकलीफ़ से बचाती हैं। इस एकादशी पर अपनी शक्ति से किसी ज़रूरतमन्द को इनमें से कुछ भी दे सकें, तो ज़रूर दीजिए।

तीस पीढ़ियाँ

और श्रीकृष्ण एक और बात कहते हैं, जो परिवार वालों के लिए बहुत प्यारी है। जो हरि के दिन उपवास करता है और रात में जागरण करता है, वो बिना ज़्यादा परिश्रम के विष्णु का पद पाता है। और वो अकेला नहीं जाता। माता के पक्ष के दस पुरुष, पिता के पक्ष के दस पुरुष, और पत्नी के पक्ष के दस पुरुष, इन सबका भी उद्धार होता है।

और वो कैसे जाते हैं, ये भी बताया है: चार भुजाओं वाले, दिव्य रूप में, गरुड़ की ध्वजा लिए, गले में माला और पीले वस्त्र पहने, भगवान के धाम की ओर। यानी एक व्यक्ति का व्रत, तीन परिवारों के लिए रोशनी।

व्रत कैसे रखें

अब आते हैं व्रत के विधान पर। ये सब हमारे पुराणों और धर्मशास्त्रों में लिखा है।

एकादशी से एक दिन पहले, दशमी को, इस बार बुधवार इक्कीस अक्टूबर को, एक ही बार, सादा भोजन करें, बिना नमक और तीखे-खारे के, हविष्य जैसा। रात में संयम रखें।

एकादशी, गुरुवार बाईस अक्टूबर। सुबह जल्दी उठकर स्नान करें, और उत्तर की ओर मुख करके, हाथ में जल लेकर संकल्प करें। शास्त्र का संकल्प-मन्त्र बहुत छोटा है:

एकादश्यां निराहारः स्थित्वाहमपरेऽहनि। भोक्ष्यामि पुण्डरीकाक्ष शरणं मे भवाच्युत ॥
निर्णयसिन्धु 1.11.19 →

यानी, हे कमल जैसे नेत्रों वाले भगवान, मैं एकादशी को बिना भोजन के रहकर अगले दिन भोजन करूँगा। हे अच्युत, आप मेरी शरण बनिए।

फिर दिन भर भगवान पद्मनाभ की पूजा, नाम-जप, कथा-श्रवण। विष्णु सहस्रनाम का पाठ कर सकें तो बहुत अच्छा। और रात को, जितना हो सके, भगवान के सामने जागरण। श्रीकृष्ण ख़ुद इस अध्याय में उपवास के साथ जागरण की बात कहते हैं।

जो पूरा उपवास न कर सकें

जो बीमार हैं, बुज़ुर्ग हैं, दवाइयाँ लेते हैं, उनके लिए शास्त्र बहुत दयालु हैं। नारद पुराण कहता है, कमज़ोर व्यक्ति कन्द-मूल, फल, दूध और जल ले सकता है। और जो उपवास बिल्कुल न कर सके, वो दिन में एक बार खाकर, या सिर्फ़ रात में खाकर, या दान करके भी एकादशी निभा सकता है।

और वो प्रसिद्ध श्लोक, जो महाभारत, अग्नि पुराण और धर्मसिन्धु तीनों में है: ये आठ चीज़ें व्रत नहीं तोड़तीं: जल, कन्द-मूल, फल, दूध, घी, ब्राह्मण की इच्छा, गुरु का वचन, और दवा।

तो दवा ज़रूर लीजिए। व्रत शरीर को सज़ा देने के लिए नहीं है। और याद रखिए, श्रीकृष्ण ने आज ही कहा है, बहाने से भी किया हुआ व्रत व्यर्थ नहीं जाता, तो जितना कर सकें, उतना मन से कीजिए।

पारण

द्वादशी, शुक्रवार तेईस अक्टूबर, सुबह साढ़े छह से पौने नौ के बीच पारण। भगवान को भोग लगाएँ, उसमें तुलसी ज़रूर मिलाएँ, और वही तुलसी वाला प्रसाद खाकर व्रत खोलें। हो सके तो किसी को भोजन कराएँ, कुछ दान करें। और द्वादशी के दिन दिन में सोना, दूसरों का दिया अन्न, दो बार भोजन, शहद, काँसे के बर्तन, मांस और तेल से बचें।

कथा का फल, और विदा

श्रीकृष्ण अध्याय को एक बहुत सीधी बात से ख़त्म करते हैं: यहाँ ज़्यादा कहने से क्या? अधर्म से लोग नीचे गिरते हैं, और धर्म से ऊपर उठते हैं, इसमें सोचने की कोई बात ही नहीं। और फिर मुस्कुराकर युधिष्ठिर से पूछते हैं, हे निष्पाप राजा, तुमने जो पूछा, मैंने पापांकुशा का माहात्म्य कह दिया, अब और क्या सुनना चाहते हो?

तो आज आपने सुना, अंकुश वाली एकादशी के बारे में, जो पापों के हाथी को क़ाबू में करती है। पद्मनाभ की पूजा, एक प्रणाम का फल, शिव और विष्णु का सम्मान, बहाने से भी किया व्रत, तीस पीढ़ियों का उद्धार, और लोहार की वो धौंकनी, जिससे बाहर निकलने का रास्ता है हर दिन का एक छोटा-सा पुण्य।

अगर आप ये व्रत रख रहे हैं, तो नीचे कमेंट में "ॐ पद्मनाभाय नमः" लिख दीजिए। और अगली एकादशी, रमा एकादशी, पाँच नवम्बर को है, दीपावली से ठीक पहले। उसकी पूरी कथा हमारे चैनल पर है, ज़रूर सुनिए।

भगवान पद्मनाभ आपके हर दिन को धौंकनी नहीं, जीवन बना दें।

जय श्री हरि।

इस कथा के श्लोक

पद्म उत्तर 61.3 पद्म उत्तर 61.15 पद्म उत्तर 61.23 + 61.24 निर्णयसिन्धु 1.11.19 →

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