तांत्रिक बंधन में बँधे कुलदेवी-देवता को मुक्त कैसे करें
बँधे हुए कुल देवता को पहचानने और मुक्त करने का मार्गदर्शन।
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घर के देवता बंधन में हों तो परिवार की पूजा का क्या होता है
नकारात्मक ऊर्जा पूजा खा जाती है; जितनी पूजा, उतनी परेशानी
वक्ता वह स्थिति सामने रखते हैं जहाँ घर में पूजित देवी-देवताओं को किसी मंत्र विद्या, किसी सिद्धि, किसी वचन या किसी लाग के द्वारा बाँध दिया गया हो, और पूछते हैं कि तब उस परिवार को सेवा-पूजा कैसे करनी चाहिए। बंधित देव शक्ति, वे कहते हैं, कभी ठीक से कृपा नहीं कर पाती। बंधन के बाद वहाँ जो भी नकारात्मक ऊर्जा प्रवेश करती है, वह आपकी पूजा स्वयं ग्रहण कर लेती है, आपका पूजन-पाठ फलीभूत होना बंद हो जाता है, और उल्टा परेशानी शुरू हो जाती है। व्यक्ति तब सोचता है कि पूजन-पाठ व्यर्थ है: जितनी पूजा करता है, उतनी ही विपरीत परिस्थिति बनती है।
वक्ता विषय को इस प्रकार रखते हैं: यदि घर में उपस्थित पूजित देवी-देवताओं का किसी मंत्र विद्या या सिद्धि के द्वारा, किसी वचन के द्वारा, किसी लाग के द्वारा बंधन कर दिया जाए, तो उस घर के सेवकों को, उस परिवार को, सेवा-पूजा किस प्रकार करनी चाहिए?\n\nयह इसलिए महत्वपूर्ण है, वे कहते हैं, क्योंकि बंधित हुई देव शक्ति कभी सही से कृपा नहीं कर पाती। ऐसी अवस्था में, बंधन के बाद, वहाँ जो भी नकारात्मक ऊर्जा प्रवेश करती है वह देवता के स्थान पर आपकी पूजा ग्रहण कर लेती है, और आपका पूजन-पाठ फलीभूत होना बंद कर देता है। उल्टा आपको परेशानी होने लगती है।\n\nऐसी अवस्था में, वे कहते हैं, व्यक्ति सोचने लगता है कि पूजन-पाठ करना व्यर्थ है — जितना पूजन-पाठ कर रहे हैं, उतनी ही विपरीत परिस्थिति उत्पन्न हो रही है।
देवता बाँधे जा सकते हैं, इसके पौराणिक प्रमाण: मेघनाद द्वारा हनुमान, मल्ल-मणि द्वारा महाकाली
शिव को मार्तंड भैरव अवतार क्यों लेना पड़ा
जो लोग इस बात पर हँसते हैं कि देवी-देवता को भला कोई कैसे बाँध सकता है, उन्हें वक्ता पौराणिक आख्यानों से उत्तर देते हैं: देखिए हनुमान जी को मेघनाद ने कैसे बंधन में बाँधा था, और भगवती महाकाली को मल्ल और मणि नामक तांत्रिकों ने कैसे अपने यंत्र में कैद करके बंधन में डाल दिया था — जिस कारण भगवान शिव को मार्तंड भैरव का, अघोर स्वरूप का अवतार लेना पड़ा। इन्हीं चरित्रों जैसा कुछ, वे कहते हैं, कलिकाल में भी उन देव शक्तियों और अंशात्मक योगिनियों के साथ चलता है जो कुल में उपस्थित होकर परिवार के पालन-पोषण और रक्षण का दायित्व निभाती हैं।
वक्ता उन लोगों को संबोधित करते हैं जो इस विषय पर मन में प्रफुल्लित हो रहे हैं कि भला देवी-देवता को कोई कैसे बाँध सकता है, यह तो बेकार का विषय है। वे कहते हैं कि उन्हें पहले चैनल का पूर्व वीडियो सुन लेना चाहिए कि एक शक्ति दूसरी शक्ति को किस प्रकार बंधन में डालती है, और यहाँ संक्षेप में बताते हैं।\n\nपौराणिक आख्यान देखिए, वे कहते हैं: हनुमान जी मेघनादरावण के पुत्र, जिन्हें इंद्रजीत भी कहा जाता है — पौराणिक कथाओं में भगवान हनुमान को बांधने वाले के रूप में उल्लिखित, यह दर्शाता है कि सिद्ध अनुष्ठानिक विधि से दिव्य स्वरूप भी बंधनयुक्त हो सकते हैं। के द्वारा कैसे बंधन में बंधे थे। और ठीक उसी प्रकार यह भी देखिए कि भगवती महाकाली को मल्ल और मणि नामक तांत्रिकों ने कैसे अपने यंत्र में कैद कर लिया था — उन्हें बंधन में डाल दिया था — और क्यों भगवान शिव को मार्तंड भैरव का, अघोर स्वरूप का अवतार लेना पड़ा।\n\nयहाँ जो चरित्र दिखाए गए हैं, वे कहते हैं, इन्हीं का कुछ वैकल्पिक — या कहिए इन्हीं जैसा कुछ — विषय कलिकाल में चलता है: जो देव शक्तियाँ, अंशात्मक योगिनी कुल में उपस्थित होकर परिवार के पालन-पोषण और रक्षण का दायित्व निभाती हैं, वहाँ इसी प्रकार के विषय चलते हैं।
कुल देवता कैसे बाँधे जाते हैं: रस्सी से नहीं, मंत्र से दी गई सौगंध से
द्वेषी साधक अपनी सिद्ध शक्ति को आगे कर दुहाई देता है
वक्ता कहते हैं कि जिस व्यक्ति ने किसी शक्ति को सिद्ध किया है, वचन में लिया है, वह दूसरी शक्ति को उसी प्रकार के वचन और दुहाई से बाँध सकता है जैसी सबर मंत्र में दी जाती है। बंधने का अर्थ रस्सी से बाँधना नहीं: कुछ ऐसे मंत्र हैं जिनका प्रयोग करके सौगंध दे दी जाती है और देवता रुक जाते हैं। उदाहरण: यदि हनुमान जी कुल के देवता हैं तो उन्हें राम जी की शपथ दे दी जाती है — bajrang-baan में भी शपथ दी जाती है, "आपको शपथ है कि हमारा कार्य सिद्ध करें"। कोई साधक जो स्वयं हनुमान जी की सेवा करता हो, बहुत जप-तप कर चुका हो, हनुमान जी के किसी वीरगण की या किसी और देवता की सिद्धि कर चुका हो, और आपसे द्वेष रखता हो, उन्हें आगे करके अपने वचन, मंत्र और सेवा-पूजा से आपके घर की दिव्य ऊर्जाओं को रोक लगा देता है: "इस परिवार की बातों पर ध्यान न दें, न सुनें, जब तक हम मुक्त न कर दें"। इस तरह देवी-देवता सामान्य तरीके से वचन में बंधित हो जाते हैं। उपदेव श्रेणी की शक्तियों के लिए, वे जोड़ते हैं, विषय अलग है और उस पर अलग वीडियो है।
तंत्र यह है, वक्ता कहते हैं: कोई एक व्यक्ति जिसने किसी शक्ति को सिद्ध किया है, वचन में लिया है, वह दूसरी शक्ति को उसी प्रकार का वचन देता है — जैसा आप सबर मंत्र में देखते हैं, वचन दिया जाता है, दुहाई दी जाती है। ऐसी ही कुछ विद्याएँ हैं जिनसे देवताओं का बंधन किया जाता है, और वे उनसे बँध जाते हैं।\n\nबंधने का अर्थ, वे जोर देकर कहते हैं, यह नहीं कि उन्हें रस्सी से बाँधा गया है। कुछ ऐसे मंत्र हैं जिनका प्रयोग करके सौगंध दे दी जाती है और वे रुक जाते हैं। उदाहरण के लिए: यदि घर में हनुमान जी पूजित हैं, हनुमान जी कुल के देवता हैं, तो हनुमान जी को राम जी की शपथ दे दी जाती है। bajrang-baan में भी, वे बताते हैं, शपथ दी जाती है — "भाई, आपको शपथ है कि हमारे कार्य को आप सिद्ध करें"।\n\nतो मान लीजिए कोई साधक जो स्वयं हनुमान जी की ही सेवा करता हो, और किसी कारणवश उसे आपसे द्वेष हो गया हो, वह आपका अहित चाहता हो। वह इतना जप-तप कर चुका है, या हनुमान जी के किसी वीरगण की सिद्धि कर चुका है, या कोई देवता उसे सिद्ध है। वह उनको आगे करके अपने वचन, मंत्र और सेवा-पूजा के द्वारा आपके घर में उपस्थित दिव्य ऊर्जाओं पर रोक लगा देता है: "ऐसा है कि आप इस परिवार की बातों पर न ध्यान दें, न सुनें, जब तक कि हम आपको मुक्त न कर दें।" और देवी-देवता सामान्य तरीके से वचन में बंधित हो जाते हैं।\n\nदूसरा, वे जोड़ते हैं, उपदेवप्रमुख देवताओं से निम्न श्रेणी के गौण दिव्य प्राणियों की एक श्रेणी — पितरों को इसी श्रेणी में वर्गीकृत किया जाता है। श्रेणी की जो शक्तियाँ होती हैं उनके लिए विषय अलग है; उस पर पूरा वीडियो चैनल पर है, उसे पहले सुन लें।
बंधित देवता का पहला उपाय: सहायक शक्ति की शरण, बंधित देवी के लिए भैरव
निकट सिद्ध पीठ के भैरव, फिर वही घर पर
जैसे ही पता चले या अनुभूति हो कि देवी-देवता बंधन में हैं, वक्ता कहते हैं, सबसे पहला कार्य यह है कि उस देवता की सहायक शक्ति — सहायक शक्तियों — की शरणागति लें। यदि घर में देवी पूजित हैं — भगवती का कोई भी स्वरूप, कोई अंशात्मक योगिनी, कोई devi-tattva — तो भैरव जी की शरण लें, उनका अनुष्ठान करें, उनका आवाहन करें। परिस्थिति बहुत विपरीत हो तो अपने पास के जिस भी सिद्ध पीठ के भैरव हों उनका अनुष्ठान करें: कोलकाता में, जहाँ कालीघाट में भगवती काली विराजित हैं, वहाँ के भैरव नकुलेश्वर भैरव हैं। वहाँ जाकर भैरव स्तोत्र, शतनाम, कवच का पाठ और उनके निमित्त दीपदान करके प्रार्थना करें। कुछ समय वहाँ करने के बाद यही प्रक्रिया घर पर भी करें, तो बंधन टूटेगा।
यह, वक्ता कहते हैं, वह वीडियो है जिसमें आपको पता चल चुका है कि हाँ, हमारे देवता बंधित हैं, अब क्या करना है। इसका उत्तर, इसका निराकरण, इस प्रकार होगा: जैसे ही हमें यह पता चले, जैसे ही यह अनुभूति हो जाए कि देवी-देवता बंधन में हैं, तो सबसे पहला कार्य यह करना चाहिए कि संबंधित देवी-देवता की जो भी सहायक शक्तियाँ (सहायक शक्ति) हैं उनकी शरणागति लें।\n\nसहायक शक्ति का अर्थ: यदि आपके घर में देवी पूजित हैं — भगवती का कोई भी स्वरूप, कोई भी अंशात्मक योगिनी आदि, devi-tattva — तो आपको भैरव जी की शरणागति लेनी चाहिए। भैरव जी का अनुष्ठान करें; उनका आवाहन करें।\n\nपरिस्थिति बहुत विपरीत हो तो अपने पास जो भी सिद्ध पीठ हो, वहाँ के जो भैरव हों उनका अनुष्ठान करें। उनका उदाहरण: मान लीजिए आप कोलकाता शहर के रहने वाले हैं, जहाँ कालीघाट में भगवती काली विराजित हैं; वहाँ के भैरव नकुलेश्वर भैरवकोलकाता स्थित कालीघाट में देवी काली के रक्षक भैरव — किसी देवता के निकटतम सिद्ध पीठ पर उनके स्थानीय रक्षक भैरव की शरण लेकर बंधन-मुक्ति हेतु उदाहरण रूप में उद्धृत। हैं। तो यदि आपके घर में कोई देवी तत्व बाँध दिया गया है, आप कुछ कार्य नहीं कर पा रहे, परेशानी दिन-प्रतिदिन बढ़ रही है, और आप समझ गए हैं कि बंधन में है — तो आपको नकुलेश्वर भैरव जी के पास जाकर भैरव जी का स्तोत्र, शतनाम का पाठ, कवच का पाठ और उनके निमित्त दीपदान आदि करके प्रार्थना करनी चाहिए।\n\nऔर यही प्रक्रिया जब आप वहाँ कुछ समय तक कर लेते हैं, तब घर पर आकर भी करनी चाहिए। उससे, वे कहते हैं, वह बंधन टूटेगा।
बंधित हनुमान जी को राम के माध्यम से मुक्त करना: जप, राम रक्षा स्तोत्र, रामचरितमानस और हवन
हनुमान राम की सुनते हैं; राम की दुहाई ही उपाय
यदि हनुमान जी पूजित हैं और बाँध दिए गए हैं, वक्ता कहते हैं, तो उपाय राम जी के माध्यम से बनता है, क्योंकि हनुमान जी राम जी की सुनते हैं और राम जी की दुहाई से ही वहाँ विषय बनेगा। भगवान श्री रामचंद्र जी महाराज का नाम जप करें, उनके निमित्त राम रक्षा स्तोत्र आदि का पाठ करें, रामायण जी और रामचरितमानस जी का पाठ करें, और कुछ चौपाइयों और मंत्रों का हवन आदि करें, जिससे श्री राम जी प्रसन्न होकर बंधन से मुक्त करें।
यदि हनुमान जी पूजित हैं, वक्ता कहते हैं, तो वे राम जी की सुनते हैं; राम जी की दुहाई से ही वहाँ विषय बनेगा।\n\nतो आपको भगवान श्री रामचंद्र जी महाराज का नाम जप करना चाहिए; उनके निमित्त राम रक्षा स्तोत्र आदि का पाठ; रामायण जी का पाठ, रामचरितमानस जी का पाठ; और कुछ चौपाइयों का, मंत्रों का हवन आदि करना चाहिए — जिससे श्री राम जी प्रसन्न होकर हनुमान जी को बंधन से मुक्त करें।
देवता का बंधन और शरीर (सवारी) का बंधन दो अलग विषय हैं
केवल सच्ची सवारी — आज 95 प्रतिशत नौटंकी है
वक्ता दो स्थितियाँ अलग करते हैं। एक वह जहाँ किसी के शरीर पर बंधन किया गया हो — ऐसा व्यक्ति जिस पर पहले किसी देवता की शुभ शक्ति की, बिल्कुल यथार्थ शक्ति की सवारी आती थी, और उसे बाँध दिया गया। दूसरी वह जहाँ देवता को ही बाँधकर रोका गया है। दोनों अपनी-अपनी जगह महत्वपूर्ण हैं और दोनों का विषय अलग है; यह वीडियो, वे कहते हैं, केवल देवताओं के बंधन पर है। वे जोड़ते हैं कि यहाँ किसी भूत-प्रेत या किसी नौटंकी की बात नहीं हो रही — यह सर्वविदित है कि आज के समय में 95 प्रतिशत लोग नौटंकी ही करते हैं।
यहाँ, वक्ता कहते हैं, एक विषय यह भी आ जाता है: यदि किसी के शरीर के ऊपर बंधन किया गया हो, तो देवी-देवता बंधित हैं या शरीर बंधित है? ये दोनों विषय अलग हैं।\n\nआप यह बिल्कुल न समझें, वे कहते हैं, कि जब किसी के शरीर को बाँध दिया गया — ऐसा व्यक्ति जिस पर पहले किसी देवता की शुभ शक्ति की, बिल्कुल यथार्थ शक्ति की सवारी आती थी — तो वही बात हो रही है। यहाँ किसी भूत-प्रेत या किसी नौटंकी की बात नहीं हो रही। आज के समय में, वे कहते हैं, यह सर्वविदित है कि 95 प्रतिशत लोग नौटंकी ही करते हैं।\n\nयथार्थ रूप से किसी पर देव शक्ति आती थी और उसका बंधन कर दिया गया, यह एक विषय है; और देवता को बाँधकर रोका गया है, यह अलग विषय है। दोनों अपनी-अपनी जगह महत्वपूर्ण हैं और दोनों का विषय अलग होता है। यहाँ चर्चा, वे कहते हैं, देवताओं के बंधन की है।
कम से कम एक मंडल: बंधित देवता और सहायक देवता की 41 दिन संयुक्त पूजा
परेशानी बहुत हो तो संकल्प लेकर
यदि बहुत ज्यादा परेशानी रहती हो, वक्ता कहते हैं, तो व्यक्ति को कम से कम एक मंडल की पूजा करनी चाहिए, उसका संकल्प लेकर; एक मंडल का अर्थ है कम से कम 41 दिन। इसमें आपकी जो भी शक्तियाँ हैं — आपके घर के जो भी देवी-देवता हैं — और जिनकी आप सहायता ले रहे हैं, उन दोनों की संयुक्त पूजा करेंगे।
पहली शरणागति के आगे, वक्ता कहते हैं, यदि बहुत ज्यादा परेशानी रहती है तब आदमी को यहाँ कम से कम एक मंडल की पूजा करनी चाहिए। एक मंडल का संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। लें; एक मंडल का अर्थ है कम से कम 41 दिन।\n\nइसमें आपकी जो भी शक्तियाँ हैं — आपके घर के जो भी देवी-देवता हैं — और आप जिनकी सहायता ले रहे हैं, उन दोनों की संयुक्त पूजा करेंगे।
शिव की शपथ से रुके प्रचंड कुल देवता: रुद्राभिषेक और 14 दिन बिल्व हवन
साक्षात वीरभद्र-भद्रकाली भी भक्त के वचन की मर्यादा रखते हैं
ऐसे परिवार का उदाहरण लेकर जिसके कुल देवी-देवता सोखा बाबा और बन्नी माता हैं, वक्ता कहते हैं कि लोग ऑफेंडेड हो जाते हैं — उन्हें भला कौन बाँध सकता है? — पर पुनः पुनः कहते हैं कि शिव जी की शपथ और दुहाई से ये दोनों शक्तियाँ भी रुकेंगी। यदि लगे कि आपके कुल देवताओं में जो प्रचंड शक्तियाँ हैं — साक्षात वीरभद्र, भद्रकाली — उन्हें भी कोई रोक रहा है, तो इसलिए कि वे भक्तों के वचन की मर्यादा रखती हैं: किसी ने लाग लगाकर कह दिया "प्रभु, आप मत सुनें", तो वे नहीं सुनेंगी। तब महादेव की शरणागति लें: रुद्राभिषेक करें, या द्वादश ज्योतिर्लिंग के नामों से अभिषेक, और महादेव के अष्टोत्तर शतनाम, तत्पुरुष मंत्र, या यज्ञोपवीत धारण करते हों तो गायत्री के साथ शिव के वैदिक मंत्रों से — जो बन पड़े — बिल्व की समिधा पर घी और तिल की आहुति प्रतिपदा से चतुर्दशी तक, 14 दिन, प्रतिदिन कम से कम 108 आहुति। ऐसे देवता बंधन से खुल जाएँगे; किसी पर सवारी आती थी तो फिर आएगी; और बंधन का संकेत मिला था तो पुनः संकेत मिलेगा कि वे मुक्त हो चुके हैं, और परिवार का कल्याण होगा।
विषय बड़ा अलग है, वक्ता कहते हैं, पर वे सरल रूप से प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहे हैं। मान लीजिए किसी के कुल के देवी-देवता में सोखा बाबा और बन्नी माता हैं। यहाँ यह विषय भी उठेगा — कुछ लोग ऑफेंडेड हो जाते हैं: उन्हें भला कौन बाँध सकता है? वे पुनः पुनः कहते हैं कि शिव जी की शपथ और दुहाई से ये दोनों शक्तियाँ भी रुकेंगी।\n\nतो यदि ऐसा प्रतीत हो कि आपके कुल के देवी-देवताओं में प्रचंड शक्तियाँ हैं — साक्षात वीरभद्र हैं, भद्रकाली हैं — और इनको भी कोई रोक रहा है, तो इसलिए कि वे भक्तों के वचन की मर्यादा रखती हैं। किसी ने लाग लगा दिया, कह दिया "प्रभु, आप मत सुनें", तो वे नहीं सुनेंगी। यह ऐसा विषय है।\n\nऐसी अवस्था में आपको भी इसी चीज का प्रयोग करना है: महादेव की शरणागति लेनी है। महादेव का रुद्राभिषेक करें, या द्वादश ज्योतिर्लिंग के नामों से उनका अभिषेक करें। साथ ही महादेव के अष्टोत्तर शतनाम आदि से, या तत्पुरुषपंचानन शिव का पूर्वाभिमुख मुख, जो तिरोधान से संबद्ध है। मंत्र से, या — यज्ञोपवीत धारण करते हों तो — भगवान शिव के वैदिक मंत्रों से उनकी गायत्री आदि के साथ, या जो आपसे बन पड़े, बिल्वभगवान शिव से संबद्ध पवित्र बेल वृक्ष — इसके नीचे साधना की जाती है, इसकी लकड़ी बंधन-मुक्ति अनुष्ठान में घी व तिल की आहुति के लिए हवन-सामग्री के रूप में प्रयुक्त होती है, तथा इसका त्रिदल पत्र (बिल्वपत्र) शिव को अर्पित किया जाने वाला मुख्य द्रव्य है। वृक्ष की समिधा पर घी और तिल की आहुति देते हुए प्रतिपदापक्ष की प्रथम तिथि, जिससे नवरात्र के अनुष्ठान आरंभ होते हैं। से चतुर्दशी तिथिचंद्र पंचांग की एक तिथि — कुछ प्रतिमाओं (जैसे शिवलिंग) को प्रतिदिन स्नान आवश्यक है, जबकि अन्य को केवल अपने निर्धारित साप्ताहिक दिन या तिथि पर। तक, 14 दिन, प्रतिदिन कम से कम 108 आहुति करें।\n\nतब आपके घर में उपस्थित देवी-देवता यदि इस प्रकार के होंगे तो वे भी बंधन से खुल जाएँगे। किन्हीं पर सवारी आती होगी तो वह फिर आएगी। और यदि वे बंधन में थे और आपको संकेत मिला था, तो पुनः संकेत मिलेगा कि वे बंधन से मुक्त हो चुके हैं — और परिवार का कल्याण भी होगा।
देवता बँधने के बाद प्रेत-पिशाच उत्पात: अपामार्ग पर बजरंग बाण और महाभैरव हवन
उस स्थान पर हवनात्मक प्रयोग ही; जानकार उत्तम पर अनिवार्य नहीं
यदि बंधन के बाद घर में पैशाचिक बाधा उपस्थित कर दी गई हो — जहाँ घर के देवी-देवता थे वहाँ प्रेत-पिशाच तांडव मचा रहे हों — तो वक्ता कहते हैं कि उसी स्थान पर हवनात्मक प्रयोग ही करना चाहिए। bajrang-baan का नित्य पाठ करें; 21 पाठ करते हों तो कम से कम 3 पाठ से अपामार्ग की लकड़ी पर हवन करें। भैरव जी का पाठ करते हों तो महाभैरव सबसे अकाट्य है: कम से कम 5 पाठ करें और 1 पाठ से शाम के समय हवन करें। इन सबका — हनुमान चालीसा सहित — हवन करने पर यह बंधन भी कटेगा और भूत-प्रेत बाधा भी हटेगी; साथ में क्षेत्रपाल निकाय आदि का प्रयोग करें। जानकार का सहयोग अति उत्तम है, पर वे कहते हैं कि आज लोग प्रायः जानकार से संतुष्ट नहीं होते, और आप स्वयं यह प्रयोग करके कुल देवता को मुक्त कर अपनी पूजा उन तक पहुँचा सकते हैं। यही, वे कहते हैं, सरल विधान है।
यदि बंधन के पश्चात घर में पैशाचिक बाधा उपस्थित कर दी गई हो — प्रेत-पिशाचों का तांडव मच रहा हो, ऐसा लगे कि घर के देवी-देवताओं के स्थान पर प्रेत-पिशाच उत्पात मचा रहे हैं — तो ऐसे समय में, वक्ता कहते हैं, आपको उस स्थान पर हवनात्मक प्रयोग ही करना चाहिए।\n\nवहाँ bajrang-baan का नित्य पाठ करें। यदि 21 पाठ कर रहे हैं तो कम से कम 3 पाठ से हवन करें, अपामार्ग की लकड़ी पर। यदि भैरव जी का पाठ कर रहे हैं तो महाभैरव इसमें सबसे अकाट्य होता है: महाभैरव का कम से कम 5 पाठ करें और 1 पाठ से हवन कर दें, शाम के समय।\n\nइस तरीके से जब हवन आदि करेंगे — हनुमान चालीसा हुआ, इन सभी का — तो यह बंधन भी कटेगा और भूत-प्रेत की जो बाधा है वह भी हटेगी। साथ में क्षेत्रपाल निकाय आदि का प्रयोग करें।\n\nयदि कोई ऐसा जानकार व्यक्ति मिल जाए जो आपका सहयोग करे तो अति उत्तम है, वे कहते हैं; पर कई बार जानकार व्यक्ति के सहयोग से लोग संतुष्ट नहीं होते, क्योंकि आज के समय में यह सब विषय बहुत अलग हो चुका है। ऐसे में आप स्वयं भी यह प्रयोग करके अपने कुल के देवी-देवताओं को बंधन से मुक्त और पुनः पूजित करा सकते हैं, और अपनी पूजा उन तक पहुँचा सकते हैं। यही, वे कहते हैं, सरल विधान है।
सावधानी: देवता बाँधने-खोलने के सीधे मंत्र भगतवाल का विषय हैं, जानकार के बिना प्रयोग न करें
अपने ही देवता बँध सकते हैं, या बँधा प्रेत खुल सकता है
सरल विधान के सिवाय, वक्ता कहते हैं, बहुत से ऐसे मंत्रोक्त विधान भी हैं जिनमें सीधे मंत्र चलाया जाता है और बंधित देवता खुल जाते हैं, और ऐसे मंत्र भी हैं जिनसे देवताओं को बाँधा जाता है — पर यह भगतवाल का विषय है, और उनके अनुसार आप YouTube-Facebook पर ये मंत्र देख भी लें, जान भी लें, तब भी बिना किसी जानकार व्यक्ति के सान्निध्य में रहे इनका प्रयोग नहीं करना चाहिए। नहीं तो गलती से भी आपके अपने देवता, आपके आराध्य से जुड़ी शक्तियाँ बंधित हो गईं तो वे आपको नाच नचा देंगी, मानेंगी भी नहीं, परेशान करके रख देंगी — और जो दोष लगेगा वह अलग। और बंधन खोलने में हो सकता है पता चले कि कोई प्रेत-पिशाच बंधन में था और आपकी विधि से वह भी खुल गया; जानकारी न हो तो उसमें दिक्कत हो जाएगी। इसलिए सीधे मंत्रों के बजाय ऐसे मंत्रों का प्रयोग करें जिनसे कोई नकारात्मक प्रभाव न पड़े: महाभैरव आदि, या हनुमान चालीसा, bajrang-baan, काली चालीसा, दुर्गा चालीसा।
सरल विधान के सिवाय, वक्ता कहते हैं, बहुत सारे ऐसे मंत्रोक्त विधान भी हैं जिनमें सीधे मंत्र चलाया जाएगा और बंधित देवी-देवता खुल जाएँगे। और ऐसे भी मंत्र हैं जिनसे देवी-देवताओं को बाँधा भी जाता है।\n\nयह, वे कहते हैं, भगतवाल का विषय हो जाता है। उनके अनुसार, आप YouTube-Facebook कहीं से इन मंत्रों को देख लें, जान भी लें, तो भी बिना किसी जानकार व्यक्ति के सान्निध्य में रहे इनका प्रयोग नहीं करना चाहिए।\n\nनहीं तो गलती से भी यदि आपके अपने देवता बंधित हो गए — आपके अपने आराध्य से संबंधित शक्तियाँ बंधित हो गईं — तो फिर वे आपको नाच नचा देंगी; मानेंगी भी नहीं; परेशान करके रख देंगी। और उसका जो दोष लगेगा वह अलग। तथा बंधन खोलने का भी विषय है तो हो सकता है पता चले कि कोई प्रेत-पिशाच उस बंधन में था, और आपने कुछ ऐसी विधि की कि प्रेत-पिशाच भी खुल गया। यह विषय आपको जानकारी न हो तो उसमें दिक्कत हो जाएगी।\n\nइसलिए, वे कहते हैं, इस प्रकार के मंत्रों का सीधे-सीधे प्रयोग न करके हमें ऐसे मंत्रों का प्रयोग करना चाहिए जिनसे कोई नकारात्मक प्रभाव न पड़े — जैसे महाभैरव आदि, या हनुमान जी का चालीसा (हनुमान चालीसा), bajrang-baan, काली चालीसा, दुर्गा चालीसा। इन सभी का प्रयोग कर सकते हैं।
बंधन खोलने वाला हवन: अपामार्ग की लकड़ी, गोबर के उपले, सरसों और लाल गुंजा, 41 दिन
बलि से बँधा बंधन भी टूटता है; बची बलि स्वप्न में बताई जाती है
वक्ता कहते हैं कि सुरक्षित मार्ग — महाभैरव, हनुमान चालीसा, बजरंग बाण, काली चालीसा या दुर्गा चालीसा — का प्रयोग अपामार्ग की लकड़ी पर हवन के रूप में करें: अपामार्ग की लकड़ी, गाय के गोबर के उपले, साथ में सरसों और लाल गुंजा; इन्हें मिलाकर आहुति देंगे तो बंधन आदि खुलेगा। 41 दिन एक मंडल कर लें तो, वे कहते हैं, ऐसा हो ही नहीं सकता कि बंधन न टूटे, चाहे कितनी भी बलि आदि देकर बाँधा गया हो। और यदि बलि का लाग नहीं छूट रहा हो तो स्वप्न आदि के माध्यम से बार-बार आदेश हो जाएगा कि इस जगह, इस स्थान पर जाकर यह बलि चढ़ा दें — तो वह बंधन भी कट जाएगा।
जिन पाठों से कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ता — महाभैरव, हनुमान चालीसा, बजरंग बाण, काली चालीसा, दुर्गा चालीसा — उनका प्रयोग, वक्ता कहते हैं, अपामार्गअपामार्ग (Achyranthes aspera) — एक पौधा जिसकी लकड़ी को धूनी में जलाकर घर से गंभीर नकारात्मक या तांत्रिक बाधाओं को दूर किया जाता है। की लकड़ी पर हवन के रूप में करें। अपामार्ग की लकड़ी हो, गाय के गोबर का उपला हो, साथ में सरसों और लाल गुंजालाल घुंघची के बीज — घर या दुकान के बाहर उच्चाटन क्रिया हेतु फेंके जाते हैं, अथवा उसी प्रभाव के निवारण हेतु पीली सरसों के साथ धूनी में जलाए जाते हैं।। इनको मिलाकर आहुति देंगे तो बंधन आदि खुलेगा।\n\n41 दिन एक मंडल कर लेंगे तो, वे कहते हैं, ऐसा हो ही नहीं सकता कि बंधन न टूटे, चाहे वह कितनी भी बलि आदि देकर बाँधा गया हो।\n\nयदि बलि का लाग नहीं छूट रहा है, वे कहते हैं, तो स्वप्न आदि के माध्यम से बार-बार यह आदेश हो जाएगा कि इस जगह, इस स्थान पर जाकर आपको यह बलि चढ़ा देनी चाहिए। तो वह बंधन भी कट जाएगा।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।