तांत्रिक आक्रमण आप पर कौन करवाना चाहता है — कवच का मज़ाक उड़ाने वाले, गुप्त रूप से सुरक्षित लोग, और अपनी सुरक्षा अपने हाथ
कौन चाहता है कि आप तांत्रिक आक्रमण से असुरक्षित रहें: कवच का मज़ाक उड़ाने वाले पर स्वयं गुप्त रूप से सुरक्षित लोग, अपनी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी स्वयं लेना, कवच लेने से पहले विश्वास दृढ़ करना, अनुभव का लालच, और दस राय सुनकर कोई कवच न कर पाने पर वक्ता की बात।
10 notes, in the order they are taught. Jump to any one.
1 also answer a common question
Questions this answers
1 of the notes below are questions in their own right. Scroll for more.
तांत्रिक आक्रमण से सुरक्षा आपके अपने हाथ में है: विरोध करने वाले और न मानने वाला
पूजा का सबसे बड़ा विरोधी प्रायः गुप्त रूप से सुरक्षित बैठा है
वक्ता पूछते हैं कि क्या आप अभिचार और तांत्रिक आक्रमण से सुरक्षित हैं, और कहते हैं कि जिनके घर के देवी-देवता मजबूत हैं और जिनके पास सुरक्षात्मक कवच है, वही लोग इस विषय की चर्चा मात्र से आपको ढोंगी, पाखंडी, अंधविश्वासी घोषित कर देते हैं; यदि कोई रिश्तेदार या इष्ट मित्र पूजन-पाठ का सबसे बड़ा विरोधी है, तो जान लें कि वह गुप्त रूप से कहीं न कहीं अपनी सुरक्षा करके बैठा है और नहीं चाहता कि आप इन विषयों को जानें, समझें, करें। इसीलिए आपकी सुरक्षा आपके हाथ में है। वे जोड़ते हैं कि अति आधुनिक व्यक्ति तब तक इसे नहीं मानता जब तक वह स्वयं या उसका कोई अति प्रियजन — धर्मपत्नी, प्रेमिका, बच्चे — इससे बुरी तरह प्रताड़ित न हो जाए; तब तक यह उसके लिए काल्पनिक और अंधविश्वास का विषय रहता है। जब कोई कवच, साधना, मंत्र, सिद्धि, हवन, पूजन को सिरे से बेकार कहे, तो दो में से एक बात है: या तो उसने कभी देखा नहीं (ऐसे लोग अब कम हैं), या वह बहुत सयाना है, स्वयं की सुरक्षा कर रखी है, आपसे ईर्ष्या करता है और आपको सुरक्षित होने देने के बजाय गिरते देखना चाहता है। वक्ता का आग्रह: अपनी, अपने बच्चों और अपने परिवार की सुरक्षा की जिम्मेदारी अपने हाथ में लें।
क्या आप सुरक्षित हैं, वक्ता पूछते हैं — अभिचार से, तांत्रिक आक्रमण से, हर प्रकार से? वे कहते हैं कि जैसे ही इस विषय की चर्चा होती है, सबसे पहले जो लोग आपको ढोंगी, पाखंडी, अंधविश्वासी घोषित करते हैं वे वही हैं जिनके घर के देवी-देवता मजबूत हैं और जिनके पास सुरक्षात्मक कवच है। वे कभी नहीं चाहते कि आप सुरक्षित हो पाएँ। विशेषकर यदि आपके परिवार में कोई ऐसा व्यक्ति हो जो पूजन-पाठ का सबसे अधिक विरोध करता हो, ऐसे रिश्तेदार, ऐसे इष्ट मित्र हों, तो जान लें कि अप्रकट, गुप्त रूप से वह कहीं न कहीं अपनी सुरक्षा करके बैठा है। लेकिन वह नहीं चाहता कि आप इन विषयों को जानें, समझें, करें, इसीलिए जब भी आप उसके सामने चर्चा करते हैं वह आपको अंधविश्वासी, पाखंडी, ढोंगी कहता है, और इन विषयों पर चर्चा करने वाले लोग तो सबसे बड़े पाखंडी हो जाते हैं। इसीलिए, वे कहते हैं, आपकी सुरक्षा आपके हाथ में है। न मानने वाला। वे आगे कहते हैं कि यह सर्वविदित है कि अति आधुनिक व्यक्ति तब तक इस विषय को मानने को तैयार नहीं होता जब तक वह स्वयं ऐसे आक्रमण की चपेट में आकर भुक्तभोगी न बन जाए; आप सुरक्षित हैं या नहीं, आपकी दशा यह निर्धारित करती है। जिसने जीवन में ऐसे अभिचारिक आक्रमण न देखे हों, ऐसी चीजों का सामना न किया हो, जिसके शरीर पर ऐसा कोई प्रतिघात न हुआ हो, वह इन विषयों को कभी पूरी तरह सत्य नहीं मानता — उसके लिए यह काल्पनिक, अविश्वसनीय, पाखंड और अंधविश्वास का विषय रहता है, जब तक वह स्वयं न भुगत ले या उसका कोई अति विश्वासी, अति प्रिय व्यक्ति — धर्मपत्नी, प्रेमिका, बच्चे — ऐसे विषयों से गुजरकर बुरी तरह प्रताड़ित न हो जाए। जिससे उसका मोह है वह जब भुगत लेगा तब वह बोलेगा: हाँ भाई, यह चीज सत्य होती है। दो प्रकार के विरोधी। ऐसे लोग भी हैं जिनकी चर्चा वे पहले कर चुके हैं, जो स्वयं को और अपने परिवार को सुरक्षित कर रखे हैं लेकिन आपको इस विषय पर कभी सकारात्मक बात नहीं बोलेंगे; वे आपको सदैव नकारात्मक करते रहेंगे, और आप अपने परिवार की सुरक्षा का कोई प्रयास ही नहीं कर पाएँगे। जब आप कवच, साधना, मंत्र, सिद्धि, हवन, पूजन की चर्चा करें और कोई एक पैर पर खड़ा हो जाए कि 'ये बेकार की चीजें हैं', तो जान लें कि दो में से एक है: या तो उसने जीवन में यह कभी देखा नहीं और एक ही पहलू पर अटका है — ऐसे लोग, वे कहते हैं, आज कम हो गए हैं — या वह बहुत होशियार, सयाना व्यक्ति है जिसने स्वयं की सुरक्षा कर रखी है, आपको कभी सुरक्षित नहीं होने देना चाहता, और कहीं न कहीं आपसे ईर्ष्या करता है। ऐसा नहीं कि वह आप पर अभिचार कर देगा; लेकिन वह जानता है कि कभी न कभी यह भी गिरेगा, तो हम क्यों इसे सुरक्षित होने दें। समाज में ऐसी मानसिकता बनी हुई है, वे कहते हैं, और वे बस यही कहना चाहते हैं: अपनी सुरक्षा की, अपने बच्चों की, अपने परिवार की सुरक्षा की जिम्मेदारी अपने हाथ में लीजिए।
पंडित के पास जाने या कवच सिद्धि शुरू करने से पहले अपना विश्वास दृढ़ करना
उसकी दुकान पर तुम्हें किसी ने नहीं बुलाया; पहले तथ्य परखो
वक्ता कहते हैं कि लोगों के कहने में आकर अपनी साधनाएँ न छोड़ें; यदि आप किसी भी माध्यम से — पढ़कर, सुनकर, उन्हें या किसी और को देखकर — कन्विंस हुए हैं कि कवच आदि की सिद्धि कर लेनी चाहिए, तो कर लें। वे उस आदत पर बरसते हैं जिसमें लोग पंडितों को ढोंगी, पैसे लूटने वाला कहते हैं और फिर भी उनके पास जाते हैं: तुम्हें किसी ने बुलाया नहीं, वह अपनी दुकान खोलकर बैठा है, मत जाओ। किसी के बहकावे में न आएँ; ओरिजिनैलिटी देखें, तथ्यों को परखें, पढ़ें, जानें, समझें, उचित लगे तभी जाएँ, अपना विश्वास दृढ़ करके — वरना हाल उस व्यक्ति जैसा होगा जिसने खटाल जैसे स्कूल में सिम्बायोसिस जैसी सुविधा के वादे पर एडमिशन लिया और फिर कहा गया कि गोबर साफ करना ही तुम्हारी फीस है। दृढ़ विश्वास से जाएँ ताकि कभी यह कहने का अवसर न मिले कि 'मेरा विश्वास खंडित हो गया' या 'हमने कुछ किया और परिणाम नहीं मिला'; इन विषयों की सूक्ष्मता आसान नहीं, और कुछ लोग जल्दी समझ जाते हैं क्योंकि उनके साथ घटनाएँ हो चुकी हैं।
लोगों के कहने में आकर अपनी साधनाएँ मत छोड़ दीजिए, वक्ता कहते हैं। यदि आप कहीं से कन्विंस हुए हैं — किसी भी माध्यम से, पढ़कर, सुनकर, उन्हें या किसी अन्य को देखकर — कि हाँ भाई, हमें कवच आदि की सिद्धि कर लेनी चाहिए, तो कर लो। जब तक आप दूसरों पर निर्भर रहेंगे, वे कहते हैं, यह बात वे सदैव बोलते हैं: आप कहते हो कि पंडित ढोंगी है, पाखंडी है, सही से नहीं करता, गलत करता है, पैसे लूटता है। तो क्यों पंडितों के पास जाते हो? मत जाओ — तुम्हें किसी ने बुलाया? वह अपनी दुकान खोलकर बैठा है; तुम मत जाओ। तुम कमेंट करते हो कि लोगों की दुकानदारी चल रही है; 'मुझे तो छोड़ दो — मेरे पास बहुत कम आते हैं, क्योंकि वैसे विषय मैं उठाता नहीं' — लेकिन जिन-जिन के पास जाकर तुम कमेंट करते हो, किसने तुम्हें कहा? कन्विंस मत हो। ओरिजिनैलिटी देखो, तथ्यों को परखो, पढ़ो, जानो, समझो; उचित लगे तब जाओ, अपने विश्वास को दृढ़ करके। आधी-अधूरी जानकारी पर जाने का उनका चित्र: 'हाँ भैया, देखने में भले खटाल का स्कूल लग रहा है, लेकिन अंदर सिम्बायोसिस जैसी सुविधा मिलेगी, यहाँ एडमिशन ले लो' — और एडमिशन के बाद कहा जाता है, 'भैया जाओ, गाय का गोबर साफ करो, यही तुम्हारी फीस है, यही करना पड़ेगा, फोकट का नहीं है।' तब तो, वे कहते हैं, कांड हो गया। क्यों जाते हो आधी-अधूरी जानकारी लेकर? पूरा विश्वास दृढ़ करके तब इस मार्ग पर जाइए ताकि कभी यह बोलने का अवसर न मिले कि 'मेरा विश्वास खंडित हो गया' या 'हमने कुछ ऐसा किया जिसका परिणाम नहीं मिला'। इन विषयों की सूक्ष्मता समझना इतना आसान नहीं: जिसके साथ कुछ प्रायोगिक घटनाएँ हो चुकी हैं वह थोड़ा जल्दी समझ जाता है; कुछ लोग समझ ही नहीं पाते।
रत्न, माला, यंत्र या कवच दृढ़ विश्वास से ही लें; अन्यथा मना करें और विधान स्वयं सीखें
दस विधानों में इस बार चार, अगली बार पाँच; साल भर में सब
वक्ता कहते हैं कि जब कोई आपको रत्न, माला, यंत्र या कवच दे, तो या तो उसे लेकर आपका विश्वास दृढ़ हो और फिर उसे विधिवत नियम से करें, या — यदि सामने वाला केवल कन्विंस कर रहा है और आपको विश्वास नहीं — तो मत लें और साफ कहें कि मेरा विश्वास दृढ़ नहीं है। उसके बजाय उसकी जानकारी करें: वे अपने वीडियो में कवच की रचना और अभिमंत्रण इसीलिए बताते हैं कि आप स्वयं करें, बाहरी सहायता को अंतिम विकल्प रखें। करने के प्रयास में ही सीखते हैं: दस विधानों में चार कर पाएँगे, अगली बार पाँच, और छह महीने-साल भर में सब सीख जाएँगे, क्योंकि हर चीज का एक विधि-विधान है।
वक्ता कहते हैं कि जब भी आप किसी के पास जा रहे हों और वह आपको किसी प्रकार का रत्न दे रहा हो, माला दे रहा हो, यंत्र दे रहा हो, कवच आदि दे रहा हो — तो या तो उसे लेकर आपका विश्वास दृढ़ हो और फिर विधिवत नियम अनुसार उस चीज को करें; या, यदि आपके पास यह विषय आ रहा है कि 'नहीं, हमें विश्वास नहीं है, सामने वाला कन्विंस कर रहा है' — तो मत लीजिए। बोलिए: नहीं, हम यह नहीं ले सकते, मेरा विश्वास दृढ़ नहीं है। उसके बजाय उसके विषय में जानकारी कीजिए। जैसे वे अपने वीडियो में बताते हैं कि किस-किस प्रकार से कवच की रचना होती है और कैसे उसे अभिमंत्रित किया जाता है — वे इन विषयों को इसीलिए बोलते हैं कि आप स्वयं करें। पूरा विषय रख देते हैं कि आप अपने से करें। अंतिम विकल्प रखिए कि नहीं हो पा रहा है तो किसी की सहायता लें। करने के प्रयास में ही सीखेंगे। दस विधान होंगे तो दस नहीं कर पाएँगे; चार कर पाएँगे। अगली बार पाँच होंगे; ऐसे करते-करते छह महीने, साल भर में आप सारी चीजें सीख जाएँगे। सारी चीज का एक विधि-विधान है।
सूक्ष्म शरीर पर स्वयं का प्रयास बनाम स्थूल शरीर पर ऑपरेशन
सीमा के भीतर सौम्य शक्तियों के विधान स्वयं किए जा सकते हैं
वक्ता इस आपत्ति का पहले ही उत्तर देते हैं कि ऑपरेशन तो स्वयं सीखकर नहीं किया जा सकता: वह विषय अलग है — वह आयुर्वेद और चिकित्सा विभाग है, यह अध्यात्म है। चीड़-फाड़ दोनों जगह होती है — वहाँ स्थूल शरीर की, यहाँ सूक्ष्म शरीर की — लेकिन सूक्ष्म शरीर के लिए आप स्वयं प्रयास कर सकते हैं क्योंकि इसका विधि-विधान है और एक सीमा तक आप जा सकते हैं, जबकि ऑपरेशन में रिस्क नहीं ले सकते क्योंकि वहाँ तत्काल हानि होने लगेगी। जितनी सौम्य शक्तियाँ हैं, उनसे संबंधित जितने प्रयोग-विधान एक सीमित सीमा में रहकर करने को कहे जाते हैं, वे कहते हैं, आप कर सकते हैं, कोई दिक्कत नहीं। लेकिन यदि आप केवल लोगों का 'ढोंग है, पाखंड है' सुनकर दिमाग घुमाते रहें और करना ही न चाहें, तो, वे कहते हैं, आप खत्म, कहानी खत्म।
वक्ता एक उदाहरण उठाते हैं जो कोई उन्हें दे सकता है: शरीर में बीमारी हो, ऑपरेशन करना हो, तो स्वयं ऑपरेशन सीखकर तो नहीं कर सकते। वह विषय, वे कहते हैं, अलग है। यह अध्यात्म है और वह आयुर्वेद है; वहाँ कहीं न कहीं चिकित्सा विभाग है। चीड़-फाड़ यहाँ भी हो रही है, वहाँ भी — यहाँ सूक्ष्म शरीर की, वहाँ स्थूल शरीर की। सूक्ष्म शरीर के लिए आप स्वयं भी प्रयास कर सकते हैं, क्योंकि इसके लिए विधि-विधान है; एक सीमा तक आप जा सकते हैं। वहाँ, ऑपरेशन में, आप रिस्क नहीं ले सकते, क्योंकि वहाँ तत्काल हानि होने लगेगी। यहाँ जितनी सौम्य शक्तियाँ हैं, उनसे संबंधित जितने प्रयोग, विधि-विधान हैं, जो एक लिमिट में, सीमित सीमा में रहकर करने को कहे जा रहे हैं — वे आप कर सकते हैं; उसमें कोई दिक्कत नहीं। लेकिन यदि आप करना ही न चाहें, केवल लोगों का 'ढोंग है, पाखंड है' सुनकर अपना दिमाग घुमाते रहें, तो, वे कहते हैं, आप खत्म — कहानी खत्म। यह, वे कहते हैं, एक पहलू हुआ; दूसरा पहलू वह व्यक्ति है जो कन्विंस तो है पर करता नहीं।
समस्या से कन्विंस होकर भी साधना न करने वाला व्यक्ति
चालीस दिन को देवी-देवताओं पर एहसान समझना
वक्ता दूसरा पहलू बताते हैं: आपको कोई दूसरा हतोत्साहित नहीं कर रहा, आप स्वयं कन्विंस हैं कि यही आपकी समस्या है, फिर भी साधना करना ही नहीं चाहते। जब सामने वाला कहता है कि इतने दिन की यह साधना करो, तो चार दिन बाद आप उसी को गाली देने लगते हैं — 'कुछ नहीं होता, कुछ नहीं होता' — और यह सब जगह है। वे ऐसे लोग देखते हैं जो एक, दो, यहाँ तक कि तीन साल में एक भी साधना पूर्ण नहीं कर पाते, और जो कर लेते हैं वे देवी-देवताओं पर एहसान जैसा करने लगते हैं: 'हम 40 दिन कर लिए, कुछ क्यों नहीं हो रहा?' देखो अपना जीवन कैसे बिताया है, वे कहते हैं, और अब ऐसे बोल रहे हो जैसे 40 दिन में देवी-देवता तुम्हारे गुलाम बन जाएँगे।
दूसरा पहलू, वक्ता कहते हैं: आपको कोई दूसरा कन्विंस नहीं कर रहा — कोई दूसरा व्यक्ति बोलने वाला नहीं है — लेकिन आप स्वयं साधना करना ही नहीं चाहते। किसी की बात सुनकर कन्विंस तो हो जाते हैं, मान लेते हैं कि हाँ भैया, यही समस्या है, यही परेशानी है; लेकिन जब सामने वाला कहता है कि 'इतने दिन की यह साधना करो', तो चार दिन बाद उसी को गाली देना शुरू कर देते हैं। सब जगह है: 'अरे यार, कुछ नहीं होता, कुछ नहीं होता।' वे कहते हैं कि वे ऐसे-ऐसे लोगों को देख रहे हैं जिनका लगभग साल-दो साल — कुछ का तीन साल — हो गया और एक भी साधना पूर्ण नहीं कर पाते। और यदि पूर्ण कर लेते हैं तो देवी-देवताओं पर एहसान जैसा करने लगते हैं: 'हम 40 दिन कर लिए, कुछ क्यों नहीं हो रहा, कुछ क्यों नहीं हो रहा?' उनका उत्तर: अरे, जीवन किस प्रकार बिताया है तुमने, और अब किस प्रकार बोल रहे हो — कि 40 दिन में तुम्हारे गुलाम बन जाएँगे?
कुब्जिका कवच: लगभग दो घंटे का छोटा दैनिक कवच पाठ, जिसे भी लोग नहीं करते
चौबीस में दो घंटे अपने देवता को; अपना स्टैंड खुद लो
वक्ता कहते हैं कि कुछ लोगों को दस-ग्यारह दिन की साधना, जैसे नवरात्रि की साधना, में भी नानी याद आ जाती है। वे कुब्जिका कवच का उदाहरण देते हैं, जो बहुत छोटा कवच है — लगभग चार श्लोक का मंत्र — जिसका प्रतिदिन एक पाठ सवा-डेढ़ घंटे का विषय है, और नया व्यक्ति भी दो घंटे में आराम से कर लेता है। तुम्हें शर्म आनी चाहिए, वे कहते हैं, कि 24 घंटे में से दो घंटे भी अपने देवी-देवता को नहीं दे सकते, दो घंटे का जाप नहीं कर सकते, और फिर बैठकर कहते हो कुछ नहीं होता; ऐसे लोगों का कुछ होगा भी नहीं। स्वयं करोगे नहीं, जो करते हैं उन्हें पाखंडी कहोगे, किसी से करवाओगे नहीं, तो लाभ आसमान से नहीं टपकेगा। यह तुम्हारा विषय है, स्टैंड खुद लो: यदि चाहते हो कि दो रुपये भी खर्च न हों, तो स्वयं कर लो — करके देखो।
कुछ ऐसे लोग हैं, वक्ता कहते हैं, जिन्हें दस दिन, ग्यारह दिन की साधना, नवरात्रि आदि की साधना करने में भी नानी याद आ जाती है। मान लो उन्हें कहा जाए: प्रतिदिन यह छोटा सा चार श्लोक का मंत्र है — जैसे कुब्जिका का कवच। कुब्जिका कवच बहुत छोटा है। प्रतिदिन एक पाठ सवा घंटे, डेढ़ घंटे का विषय है; नया व्यक्ति भी करेगा तो दो घंटे में आराम से हो जाएगा। तुम्हें शर्म आनी चाहिए, वे कहते हैं, कि 24 घंटे में से दो घंटे भी अपने देवी-देवता को नहीं दे सकते, दो घंटे का जाप नहीं कर सकते, और उसके बाद यहाँ बैठकर उल्टी-सीधी बातें बोलते हो — 'कुछ नहीं होता, कुछ नहीं होता'। तुम्हारे जैसे लोगों का कुछ होगा भी नहीं। जब करना ही नहीं चाहते तो कहाँ से होगा? स्वयं करोगे नहीं; दूसरा करेगा तो वह पाखंडी है; किसी से कुछ करवाना नहीं चाहते — तो लाभ कहाँ से होगा? आसमान से थोड़ी टपकेगा। यह तुम्हारा विषय है, वे कहते हैं; तुम्हें खुद स्टैंड लेना पड़ेगा। अगर चाहते हो कि तुम्हारे दो रुपये भी खर्च न हों, तो स्वयं ही कर लो। करके देखो।
अनुष्ठान में पैसे क्यों लगते हैं: स्वयं करो, वक्ता का 99% पक्ष
"कुछ नहीं होता" के पीछे का असली कारण
जो लोग पूछते हैं कि अनुष्ठान आदि में इतने पैसे क्यों लगते हैं, उनसे वक्ता कहते हैं कि उन्हें स्वयं करना चाहिए — और वे इसी बात के पक्षधर हैं: सदैव कहते हैं किसी से मत करवाओ; 99% वे बोलते हैं स्वयं करो, क्योंकि पूरा विधि-विधान एक-एक चीज सामने रख दिया जाता है। केवल एकाध विशेष विषय में कहते हैं कि यदि न हो तो जरूरत पड़ने पर बोल देना। समस्या, वे कहते हैं, यह है कि करने में लोगों की फट जाती है, और फिर दूसरों को उल्टा-सीधा बोलना, डिमोरलाइज करना और सबके सामने कहना कि कुछ नहीं होता। उस 'कुछ नहीं होता' के पीछे कारण यह है कि तुम करना नहीं चाहते, तुमसे नहीं हुआ, तो दूसरों से भी न हो — ऐसा तुम चाहते हो — जबकि सामने वाला, बहुत अच्छा अनुष्ठान कर रहा है और उसे 'अनुभव' से कोई सरोकार नहीं।
जो लोग बोलते हैं कि 'अनुष्ठानएक दीर्घ अनुष्ठान — जिसमें अपने कड़े नियम होते हैं। आदि में इतने पैसे क्यों लगते हैं?' — उन्हें स्वयं करना चाहिए, वक्ता कहते हैं। और इसीलिए वे इसी चीज के पक्षधर भी हैं। वे सदैव बोलते हैं: किसी से मत करवाओ। कभी उन्हें कुछ और कहते सुना है? हाँ, एकाध विशेष विषय में बोल देते हैं, 'ठीक है भैया, अगर नहीं होगा तो जरूरत पड़े तो बोल देना।' लेकिन वे पूरे पक्षधर हैं: 99% वे बोलते हैं स्वयं करो। विधि-विधान युक्त पूरा आपके सामने रखा हुआ है; एक-एक चीज सामने रख देते हैं। करो, और करके उसका लाभ लो। लेकिन करने में, वे साफ कहते हैं, भैया फट जाती है। और उसके बाद: दूसरों को उल्टा-सीधा बोलना, दूसरों को डिमोरलाइज करना, और सबके सामने यह रखना कि कुछ नहीं होता। उस 'कुछ नहीं होता' के पीछे कारण यह है कि तुम करना नहीं चाहते; तुमसे नहीं हुआ; तो दूसरों से भी न हो — ऐसा तुम चाहते हो। सामने वाला बहुत अच्छा अनुष्ठान कर रहा है; उसे 'अनुभव' से कोई सरोकार नहीं।
वर्षों की साधना के बाद भी मुझे अनुभव क्यों नहीं होता?
अनुभव का लालच, और पाप के लिए पेट की गैस का दृष्टांत
वक्ता कहते हैं कि आजकल की दुनिया एक ही जगह अटकी है — 'हम तीन साल साधना कर लिए, अनुभव क्यों नहीं हुआ?' — जबकि एक समय लोगों के जीवन साधना में बीत जाते थे और कोई अनुभव नहीं होता था। साधना किसलिए कर रहे हो, वे पूछते हैं; तुच्छ अनुभव के लिए शर्म आनी चाहिए। सुगंध आए, देवी की पायल छनके, देवी सामने प्रकट हों — तब साधना करोगे? यह लालच है, यह व्यवसाय है, कुछ अर्जित करने की कामना। 'लाभ नहीं तो साधना क्यों करें' पर वे कहते हैं: तो मत करो — पर किसने कहा लाभ नहीं है? भगवान का नाम एक बार भी लिया जाए तो लाभ होता है; लेकिन तुम्हारे पाप इतने भरे पड़े हैं, उन्हें भी तो देखो। उनका दृष्टांत: पेट में कीटाणु भरे हों जिनसे गैस बन रही हो, तो डॉक्टर पहले गैस कम करने का इंजेक्शन देता है, चाकू से पेट फाड़कर गैस नहीं निकालता वरना फट कर मर जाओगे; केवल गैस से हार्ट, बीपी, कमर और रीढ़ का दर्द — एक छोटी जड़, ढेरों समस्याएँ। तुम्हारे साथ भी वही: जो कीड़ा काटता है, 'कुछ नहीं होता, कुछ नहीं होगा, कुछ मिल नहीं रहा, क्यों कर रहे हो', वही तुम्हारी बर्बादी की जड़ है।
आजकल की दुनिया, वक्ता कहते हैं, एक ही जगह अटकी पड़ी है: 'अगर हम तीन साल साधना कर लिए तो अनुभव क्यों नहीं हुआ?' यहाँ एक समय लोगों के जीवन बीत जाया करते थे और कोई अनुभव नहीं होता था। लेकिन तुम साधना किसलिए कर रहे हो? तुच्छ से अनुभव के लिए — शर्म आनी चाहिए। क्या होना चाहिए अनुभव में? सुगंध आए, देवी की पायल छनके, देवी सामने प्रकट हो जाएँ — तो तुम साधना करोगे? यह तुम्हारा लालच है। धिक्कार है ऐसी साधना करने वाली मानसिकता पर। तुम साधना नहीं, कहीं न कहीं बिजनेस, व्यवसाय करना चाहते हो। कुछ अर्जित करना चाहते हो; यह तुम्हारी कामना है — और बोलते हो कि हाँ, अर्जित करना तो ध्येय है: 'अगर कोई लाभ ही नहीं तो हम क्यों करें साधना?' तो मत करो। कौन बोला कि साधना करने से लाभ नहीं है? भगवान का नाम एक बार भी लिया जाए तो उसका लाभ होता है। लेकिन तुम्हारे पाप इतने भरे पड़े हैं — उन्हें भी तो देख लो। तो वह बोलेगा, 'पाप की चर्चा कहाँ से होगी?' क्यों बेटा, पाप की चर्चा क्यों न होगी? तुम्हारे पेट में अगर ऐसे कीटाणु भरे हों जिनके चलते गैस बन रही हो, वात बन रही हो, और तुम डॉक्टर के पास गए, तो वह पहले तुम्हें गैस कम करने के लिए इंजेक्शन देगा। क्या सीधे पेट फाड़कर गैस निकाल देगा? ऐसा तो नहीं करेगा — चाकू लेकर भोंककर निकाल दिया। फट जाओगे, मर जाओगे। केवल गैस की वजह से हार्ट की प्रॉब्लम, बीपी की प्रॉब्लम, कमर दर्द, पीठ का दर्द, रीढ़ की हड्डी का दर्द — यह सब होता है न? समस्या केवल इतनी कि उसके पेट में वात बन गया, और समस्याएँ इतनी सारी हो गईं। तुम्हारे साथ भी वही होता है। जो एक कीड़ा काटता है — 'कुछ नहीं होता, कुछ नहीं होगा, कुछ मिल नहीं रहा, तुम क्यों कर रहे हो?' — यही कीड़ा तुम्हारी बर्बादी की जड़ है। और तुम बर्बाद होते हो।
साधना के प्रति नकारात्मक करने वाले लोगों से दूरी रखना
रिश्तेदार, सहकर्मी, चाय की दुकान और शादी-ब्याह के परिचित
वक्ता श्रोताओं से कहते हैं कि ऐसे नकारात्मक लोगों को सुनना बंद करें। जो भी आपको नकारात्मक करे — आस-पास के लोग, रिश्तेदार, साथ काम करने वाले सहकर्मी, बाजार के दोस्त, जहाँ चाय पर बैठते हैं वहाँ के लोग, शादी-ब्याह में मिलने वाले — उनसे दूरी बनाएँ। नहीं तो, वे कहते हैं, आप भौतिक जीवन में भी प्रगति नहीं कर पाएँगे, और आध्यात्मिक जीवन तो भूल ही जाइए।
लोगों का सुनना बंद कीजिए, वक्ता कहते हैं — ऐसे नकारात्मक लोगों के विषयों को सुनना बंद कीजिए। चाहे वे आपके आस-पास हों, आपके रिश्तेदार हों, आपके साथ काम करने वाले सहकर्मी हों, आपके बाजार के दोस्त हों, आप कहीं चाय पर बैठते हों वहाँ के लोग हों, शादी-ब्याह में मिलने वाले हों — जो आपको नकारात्मक करें, उनसे दूरी बनाइए। नहीं तो आप भौतिक जीवन में भी प्रगति नहीं कर पाएँगे; आध्यात्मिक जीवन में तो भूल ही जाइए।
साधना गुप्त क्यों रखी जाती है: दस राय हर कवच को खारिज कर देती हैं
देवी-देवताओं या दूसरों पर दोष लगाने से पहले भीतर झाँको
वक्ता कहते हैं कि इसीलिए साधना को गुप्त रखने को कहा गया है: लोग हल्ला करते हैं और दस जगह से निर्णय लेते हैं। वे पूरी शृंखला दिखाते हैं — फलाने बाबा ने कहा हनुमान चालीसा से फल मिलेगा; कोई और कहता है चालीसा से कुछ नहीं हो सकता, 'हम दस साल से कर रहे हैं, कुछ न हुआ, तेरा भी कुछ न होगा'; बजरंग बाण नहीं करना चाहिए क्योंकि हनुमान जी गुस्सा हो जाते हैं; दुर्गा कवच, चंडी कवच मत करना क्योंकि उसमें भैरू जी बंध जाते हैं, जबकि भैरव को बाँधने की बात देवी स्वयं कर रही हैं; कामाख्या कवच — 'कामाख्या की पूजा घर में नहीं होती, किस बेवकूफ ने कहा'; बैरी नाशन या कालिका कवच — 'नहीं नहीं, बहुत उग्र शक्ति है'; पंचमुखी हनुमान कवच — 'ब्रह्मचर्य पालन करना पड़ेगा, पूरी तरह शुद्ध रहना पड़ेगा, पॉसिबल नहीं, लड़कियों के बारे में उल्टा-सीधा सोचे बिना कैसे रहें' — और इस तरह कोई कवच हो ही नहीं सकता। वे इस स्थिति को दयनीय, पशु से भी गिरी हुई कहते हैं: जो अपनी मानसिक अवस्था शुद्ध नहीं रख सकता, स्वयं को एक जगह स्थित नहीं रख सकता, जिसका अपने पर नियंत्रण नहीं, और फिर देवी-देवताओं पर लांछन लगाता है। उनका अंतिम आग्रह: आप कहाँ सुरक्षित हैं, कहाँ नहीं, यह मंथन अपने भीतर करें — तांत्रिक आक्रमण से बचाव कैसे होगा, कौन से कवच की सिद्धि करेंगे, किस विधि और किन नियमों से, और कौन आपको नकारात्मक करता है, बाहर के लोग, भीतर के, या आप स्वयं; आत्म-मंथन से निर्णय लें, दूसरों पर दोषारोपण से पहले भीतर झाँकें, मार्ग पर चलें, और न दूसरों को नकारात्मक करें, न स्वयं नकारात्मक बनें।
इसीलिए, वक्ता कहते हैं, किसी भी साधना के लिए कहा गया है: गुप्त रखना। आप लोग हल्ला करते हैं, दस जगह से निर्णय लेते हैं। वे इसे खेलकर दिखाते हैं। 'फलाने बाबा का वीडियो सुने; उन्होंने कहा हनुमान चालीसा करने से ऐसा होगा।' 'भैया, हनुमान चालीसा से क्या हो सकता है? कुछ नहीं हो सकता। हम तो कर रहे हैं, दस साल से कर रहे हैं, कुछ न हुआ; तेरा भी कुछ न होगा।' 'भैया, बजरंग बाण के बारे में सुने कि करना ही नहीं चाहिए — बजरंग बाण करने से हनुमान जी गुस्सा हो जाते हैं।' 'हाँ यार, सही बात है, मत करो — छोड़ देंगे।' 'दुर्गा कवच, चंडी कवच — चंडी कवच मत करना, भैरू जी बंध जाते हैं उसमें' — जबकि भैरू जी को बाँधने की बात देवी स्वयं कर रही हैं। 'अच्छा, ठीक है, वह भी नहीं करना।' 'अच्छा, कामाख्या कवच कर दें।' 'कामाख्या की पूजा घर में नहीं की जाती; कामाख्या कवच करने को किस बेवकूफ ने बोला? बिल्कुल मत करना।' 'बैरी नाशन कर लें, कालिका कवच कर लें।' 'काली कवच — नहीं नहीं नहीं, काली कवच मत करना, बहुत उग्र शक्ति है; ऐसा हो जाएगा, वैसा हो जाएगा।' 'हनुमान जी का पंचमुखी हनुमान कवच, हनुमान कवच।' 'ब्रह्मचर्यकिसी दीर्घ अनुष्ठान के दौरान आवश्यक कठोर ब्रह्मचर्य। पालन करना पड़ेगा; पूरी तरह शुद्ध रहना पड़ेगा।' 'अरे हाँ, यह तो पॉसिबल नहीं — भैया, लड़कियों के बारे में उल्टा-सीधा सोचे बिना हम कैसे रह सकते हैं?' तो यह कवच भी नहीं कर सकते। देखो तुम्हारी स्थिति कितनी दयनीय है, वे कहते हैं — पशु से भी गिरे हुए व्यक्ति, कि तुम कोई कवच नहीं कर सकते क्योंकि तुम्हारी मानसिक अवस्था शुद्ध नहीं रह सकती। तुम अपने आप को किसी एक जगह स्थित नहीं रख सकते। तुम्हारी मानसिक अवस्था कितनी गिरी हुई है; तुम कितने नीच हो जिनका अपने ऊपर नियंत्रण नहीं — और उसके बाद देवी-देवताओं पर लांछन लगाना। उनका अंतिम आग्रह: आप कहाँ सुरक्षित हैं, कहाँ नहीं — इस विषय की चर्चा अपने स्वयं के भीतर करो; मंथन करो; निर्णय लो और आगे बढ़ो। दूसरों पर दोषारोपण करने से पहले स्वयं के भीतर झाँको। तांत्रिक आक्रमण से बचाव कैसे होगा? कौन से कवच की सिद्धि करोगे? किस प्रकार से? विधि युक्त होकर करना है — किन नियमों का पालन करना है, कैसे करना है, कैसे नहीं — और कौन से लोग तुम्हें नकारात्मक करते हैं: बाहर के, भीतर के, या तुम स्वयं ही वैसे व्यक्ति हो? इसका निर्णय आत्म-मंथन करके स्वयं लो और फिर इस मार्ग पर चलो। दूसरों को नकारात्मक न करो, न स्वयं नकारात्मक बनो। वे आशा करते हैं कि इस वीडियो से श्रोताओं का सही पोस्टमार्टम होगा, वे सही विषय समझेंगे और साधना के मार्ग पर अच्छे से चलेंगे; बाकी भगवती की इच्छा।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।