शनि महामाला मंत्र: संपूर्ण अनुष्ठान विधि
शनैश्चर महामाला मंत्र अनुष्ठान की विधि
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कर्मों के न्यायाधीश शनि: उनकी दशा से भय क्यों
कोई प्रिय-अप्रिय नहीं, उसी अनुपात में फल
वक्ता कहते हैं कि लोग शनैश्चर महाग्रह से, खासकर उनकी महादशा-अंतर्दशा में, इसलिए डरते हैं क्योंकि वे न्यायाधीश हैं: अपने समय में वे प्रबलतम दंड देकर कुकर्मों का नाश करते हैं और उनसे बने प्रारब्ध को साफ करते हैं। उनकी दृष्टि में कोई प्रिय या अप्रिय नहीं; जैसा कर्म, वैसा फल। सत्कर्म करने वालों को उनकी दशा में कोई विशेष बाधा नहीं होती; जिन्होंने अच्छे समय में किसी को कष्ट दिया, धन हड़पा, शरीर से हानि पहुँचाई या मानसिक प्रताड़ना दी, वे उनके समय में उसी अनुपात में भुगतते हैं।
वक्ता कहते हैं कि भगवान शनैश्चर महाग्रह से सभी लोग बहुत भयभीत रहते हैं, विशेषकर उनकी महादशा, अंतर्दशा आदि में। कारण, वे कहते हैं, यह है कि शनि न्यायाधीश हैं। जब भी उनकी महादशा, सूक्ष्म दशा या अंतर्दशा चलती है, वे हमारे कर्मों के अनुसार प्रबलतम दंड देकर हमारे सभी कुकर्मों का विनाश करते हैं। उन कर्मों से जो प्रारब्धपूर्व कर्मों द्वारा पहले से गतिमान भाग्य का वह अंश — साधना व सत्कर्म इसकी तीव्रता को घटा सकते हैं, किंतु पूर्णतः मिटा नहीं सकते। बनता है उसे साफ करने का पूरा विधान उन्हीं के द्वारा होता है; इसीलिए जब भी उनका समय आरंभ होता है, वे न्याय प्रदान करते हैं।\n\nवे न्याय के देवता कहे जाते हैं, और उनकी दृष्टि में कोई व्यक्ति न प्रिय है, न अप्रिय। कैसा भी कर्म किया हो, उसी के अनुसार फल मिलता है। जो सत्कर्म करते हैं, वक्ता कहते हैं, उन्हें उनकी महादशा-अंतर्दशा में कभी कोई विशेष बाधा नहीं होती।\n\nलेकिन अगर जीवन के अच्छे समय में हम कोई गलत काम कर देते हैं — किसी को कष्ट पहुँचाते हैं, किसी का धन हड़प लेते हैं, शरीर से किसी को हानि पहुँचाते हैं, किसी को मानसिक रूप से प्रताड़ित करते हैं — तो जब भी उनकी महादशा-अंतर्दशा आएगी, उसी अनुपात में फल भुगतने पड़ते हैं।
चार लग्न जिन्हें जीवन भर शनि साधना करनी ही चाहिए
मकर, कुंभ, वृषभ, मिथुन — दशा चले या न चले
वक्ता कहते हैं कि लग्न कुंडली के अनुसार मकर, कुंभ, वृषभ या मिथुन लग्न के सभी स्त्री-पुरुषों को अपने जीवन में शनैश्चर महाग्रह की साधना-उपासना अवश्य करनी ही चाहिए। किन्हीं के वे लग्नेश हैं, किन्हीं के भाग्येश; वे शरीर के कारक हैं और भाग्य के कारक भी बन जाते हैं, इसलिए उनका समय चल रहा हो या नहीं, उनकी पूजा अनिवार्य है। सबसे सरल विधान, वे कहते हैं, उनके पौराणिक मंत्र का नित्य जप है।
दशा के अलावा, वक्ता कहते हैं, नित्य जीवन का एक नियम है जो लग्न कुंडली से आता है। जिनकी कुंडली मकर लग्न की हो, उसके साथ-साथ कुंभ लग्न, वृषभ लग्न या मिथुन लग्न की हो — इन चार लग्नों के जितने भी व्यक्ति हैं, स्त्री हों या पुरुष — उन सभी को अपने जीवन में भगवान शनैश्चर महाग्रह की साधना-उपासना अवश्य करनी ही चाहिए। उनकी कृपा की प्राप्ति इनके लिए अत्यंत आवश्यक हो जाती है।\n\nकारण वे यह देते हैं: किन्हीं के शनि लग्नेश हैं, किन्हीं के भाग्येश, इसलिए उनकी साधना आवश्यक है। उनका समय चल रहा हो या न चल रहा हो, उनकी पूजा अनिवार्य है, क्योंकि वे आपके शरीर के कारक हैं और कहीं-कहीं आपके भाग्य के कारक बन जाते हैं।\n\nसबसे सरलतम विधान, वे कहते हैं, उनके पौराणिक मंत्र का नित्य जप है।
शनि महामाला मंत्र का अनुष्ठान कब करना चाहिए और उससे किन कष्टों से राहत बताई गई है
साढ़ेसाती, ढैया, झूठे केस, हड्डी की पीड़ा, संतान बाधा
वक्ता कहते हैं कि चार शनि-लग्नों के लोग, और जिन्हें शनि से बहुत अधिक पीड़ा हो — झूठा मुकदमा, कारावास, हड्डियों का रोग, कमर या जोड़ों में बहुत पीड़ा, सिर की चोट से बाधा — और कुंडली में उनकी अंतर्दशा, सूक्ष्म दशा, शनि साढ़े साती या शनि ढैया चल रही हो, वे उनके शरणागत होकर शनैश्चर महामाला मंत्र का अनुष्ठान करें। वे कहते हैं कि इससे उस ग्रह से जनित हर कष्ट में, प्रारब्ध के कारण हो तब भी, तत्काल राहत और मार्ग मिलता है — कारण अभिचार, प्रेत-पिशाच, शत्रु या झूठा केस कुछ भी हो — क्योंकि ग्रहों को भगवान ने ही कर्मफल देने का अधिकार दिया है और वे सबसे जल्दी रिएक्ट करते हैं। इष्ट की सेवा तो करनी ही है, पर कुंडली के अनुसार ग्रहों की भी, और शनि का विशेष प्रभाव हो तो उनकी अवश्य। शनि की तीसरी दृष्टि पंचम भाव पर पड़ने से संतान बाधा हो तो भी यह करें।
वक्ता कहते हैं कि अगर इन चार लग्नों के लोग, या कोई भी, शनैश्चर महाग्रह से बहुत अधिक पीड़ित हो — झूठे मुकदमे में फँस गए हों, किसी को कारावास की सजा हो गई हो, बहुत अधिक कष्ट हो, हड्डियों के रोग हो गए हों, कमर में बहुत पीड़ा हो, हड्डियों के जोड़ों में बहुत तकलीफ हो, सिर पर चोट से संबंधित कोई बाधा हो — और जन्म कुंडली का विश्लेषण करवाने पर कहा जाए कि शनि की अंतर्दशा, सूक्ष्म दशा चल रही है, शनि साढ़े साती या शनि ढैया चल रही है, तो उस समय उनके शरणागत होकर शनैश्चर महामाला मंत्र का अनुष्ठान करना चाहिए।\n\nइस माला मंत्र के प्रभाव से, वे कहते हैं, उस ग्रह से जनित जितने भी कष्ट-विपत्ति हों — आपके प्रारब्धपूर्व कर्मों द्वारा पहले से गतिमान भाग्य का वह अंश — साधना व सत्कर्म इसकी तीव्रता को घटा सकते हैं, किंतु पूर्णतः मिटा नहीं सकते। के कारण ही सही — उनमें तत्काल राहत मिलती है, मार्ग मिलता है। चाहे आप पर अभिचार बाधा हो गई हो, प्रेत-पिशाच की बाधा हो, आप शत्रु पक्ष से बहुत पीड़ित हों, झूठा केस हो गया हो, या किसी और कारण से बहुत प्रताड़ित हो रहे हों — कारण कुछ भी हो, उस समय यह अनुष्ठान ज़रूर करना चाहिए। उनका तर्क: ग्रहों को भगवान ने ही हमारे कर्मों के अनुसार फल देने का अधिकार दिया है, वे सबसे जल्दी रिएक्ट करते हैं और सबसे अधिक प्रभाव देते हैं।\n\nअपने इष्ट-आराध्य की सेवा-पूजा तो करनी ही चाहिए, वे कहते हैं, लेकिन जन्म कुंडली के अनुसार ग्रहों की साधना-पूजा भी करनी चाहिए, और शनैश्चर महाग्रह की उपासना तब अति अनिवार्य हो जाती है जब उनका विशेष प्रभाव हमारे जीवन पर पड़ रहा हो। वे उदाहरण देते हैं: अगर शनि की दृष्टि — मान लें तीसरी दृष्टि — पंचम भाव, संतान के भाव, पर पड़ रही हो, या किसी और कारण से वे यहाँ-वहाँ बैठे हों और संतान प्राप्ति में बाधा हो रही हो, तो उन्हें भी यह माला मंत्र का अनुष्ठान करना चाहिए।
शनि महामाला मंत्र अनुष्ठान के आरंभ दिन, अवधि, नित्य संख्या, आसन और दिशा
मकर संक्रांति या शनि का दिन; 7 से 21 दिन; 27 से 108 पाठ
वक्ता कहते हैं कि अनुष्ठान मकर संक्रांति से आरंभ करना सर्वोत्तम है; कृष्ण पक्ष के शनिवार, शनिश्चरी अमावस्या या शनि जयंती से भी शुरू कर सकते हैं। यह कम से कम 7 और अधिक से अधिक 21 दिन चलता है, प्रतिदिन माला मंत्र का कम से कम 27 और अधिक से अधिक 108 पाठ, कुश आसन पर बैठकर। इस विधान में गृहस्थ पश्चिम की ओर मुख रखें (तंत्र में सामान्यतः दक्षिण होती है); पश्चिम की व्यवस्था न हो तो पूर्व भी चलेगा।
आरंभ के समय पर वक्ता कहते हैं कि मकर संक्रांतिसूर्य का मकर राशि में प्रवेश, जिससे उत्तरायण आरंभ होता है और अनेक अनुष्ठानों का काल गिना जाता है। अति उत्तम, श्रेष्ठ और दिव्य काल है, उस दिन से अनुष्ठान आरंभ कर सकते हैं। आगे वे बाकी आरंभ दिन जोड़ते हैं: कृष्ण पक्ष का शनिवार, शनिश्चरी अमावस्या का दिन, या शनि जयंती। इन सभी दिनों से अनुष्ठान शुरू किया जा सकता है।\n\nअनुष्ठान कम से कम सात दिन और अधिक से अधिक 21 दिन का करना है। प्रत्येक दिन कम से कम 27 बार और अधिक से अधिक 108 बार पाठ। पाठ के लिए कुश आसन पर बैठना है।\n\nदिशा पर वे कहते हैं कि तंत्र विधान में सामान्यतः दक्षिण की ओर रखी जाती है, लेकिन शनि के इस विधान में गृहस्थों को पश्चिम की ओर मुख रखना चाहिए। पश्चिम की व्यवस्था न हो तो पूर्व की ओर मुख करके भी जाप कर सकते हैं।
शनि महामाला मंत्र में सफेद वस्त्र, और काला या नीला क्यों नहीं बताया गया
सावधानी: शनि मारकेश हो तो काला कोई प्रभाव नहीं देता
वक्ता कहते हैं कि इस जाप में सामान्य, एक ही रंग के सफेद वस्त्र पहनें, जिनकी कोर हल्दी से हल्की पीली रंगी जा सकती है — शनि के सात्विक स्वरूप के लिए। नीला या काला हर किसी के लिए उचित नहीं: उसे धारण करना अलग विषय है, और अगर शनि आपके मारकेश हों और आप काले वस्त्र में जाप करें तो प्रभाव न पॉजिटिव होगा न नेगेटिव — यह उनके बलाबल और भाव पर निर्भर करेगा। वीडियो में सबके लिए कॉमन जानकारी दी जा रही है, इसलिए, वे कहते हैं, सफेद ही सुरक्षित है।
पाठ के समय के वस्त्र पर वक्ता कहते हैं कि सामान्य सफेद वस्त्र ही धारण करें — सफेद भी एकदम एक रंग का। उसकी कोर को हल्दी से रंगकर हल्का पीला कर सकते हैं। सफेद वस्त्र में ही करें, वे कहते हैं, और शनि के सात्विक स्वरूप के लिए शुभ्र वस्त्र धारण करें।\n\nनीला या काला क्यों नहीं, यह वे समझाते हैं: नीला वस्त्र, काला वस्त्र हर किसी के लिए उचित नहीं होगा; उसे धारण करना अलग विषय हो जाता है। अगर शनि आपके मारकेश हों और आप काले, कृष्ण वर्ण के वस्त्र पहनकर जाप करें, तो प्रभाव न पॉजिटिव होगा, न नेगेटिव — और यह उनके बलाबल पर और वे किस भाव में बैठे हैं इस पर निर्भर करेगा।\n\nइस वीडियो में सबके लिए कॉमन जानकारी दी जा रही है, वे कहते हैं, इसलिए श्वेत वस्त्र ही धारण कर लें; उसमें कोई दिक्कत नहीं होगी।
शनि महामाला मंत्र से पहले पूजन का क्रम और विनियोग-न्यास कौन करे
पहले गुरु, गणपति, सूर्य और छाया
वक्ता कहते हैं कि सबसे पहले गुरु और गणपति का पूजन करें, फिर भगवान सूर्य नारायण का पाठ या कम से कम स्मरण, साथ में शनि की माता छाया का स्मरण; दोनों के स्मरण के बाद माला मंत्र का पाठ करें। मंत्र के साथ विनियोग और न्यास का विधान है: जो यज्ञोपवीत धारण करते हैं वे जप से पहले इन्हें करें; स्त्रियाँ, जिन लड़कों का यज्ञोपवीत अभी नहीं हुआ, और जो पुरुष यज्ञोपवीत धारण ही नहीं करते, वे इन्हें छोड़कर सीधे माला मंत्र का पाठ करें।
वक्ता क्रम बताते हैं। सर्वप्रथम गुरु और गणपति का पूजन करें। उसके बाद भगवान सूर्य नारायण का पाठ, या कम से कम उनका स्मरण अवश्य करें, और साथ में उनकी माता छाया का भी स्मरण करें। इन दोनों के स्मरण के बाद माला मंत्र का पाठ करें।\n\nमाला मंत्र में, वे कहते हैं, विनियोग और न्यास का विधान दिया गया है। जो लोग यज्ञोपवीतवैदिक कर्मों में दीक्षा का प्रतीक यज्ञोपवीत (जनेऊ) संस्कार — पीढ़ियों तक न होने पर, इसे पुनः आरंभ करने से पहले हर ज्ञात पीढ़ी के लिए प्रायश्चित आवश्यक है। धारण करते हैं वे विनियोग और न्यास की प्रक्रिया करेंगे, उसके बाद माला मंत्र का जप करेंगे। स्त्रियाँ विनियोग-न्यास नहीं करेंगी। जिन लड़कों का अभी यज्ञोपवीत नहीं हुआ है, और जो पुरुष यज्ञोपवीत धारण ही नहीं करते, वे भी विनियोग और न्यास नहीं करेंगे; वे सीधे माला मंत्र का पाठ करेंगे।
शनि के लिए सात नींबू के दीपक: दीपदान कैसे बनता और चढ़ता है
तिल का तेल, काली बाती, संकल्प, शाम को पाठ के बाद प्रज्वलन
वक्ता कहते हैं कि अनुष्ठान के हर दिन चार कच्चे, थोड़े हरे नींबू काटकर सात आधे खाली किए जाते हैं, उनमें शुद्ध तिल का तेल (या सरसों का तेल और थोड़ा काला तिल) भरा जाता है और हर एक में काले सूती कपड़े की दो बाती — सात दीप, चौदह बाती। पाठ सुबह भी हो सकता है पर शाम सर्वश्रेष्ठ; पहले पाठ, फिर दीपदान। 21 दिन के अनुष्ठान में रोज़ नींबू न मिले तो कम से कम शनिवार को; 7 दिन में हर शाम। दीप शमी वृक्ष के पास, या घर के पूजन स्थान या हनुमान जी की ध्वजा के पास गोबर से लीपी जगह पर सजाए जाते हैं; हाथ में अक्षत, काला तिल और ₹1 का सिक्का लेकर शनि की पूर्ण कृपा, शुभ फल और उनकी क्रूर दृष्टि से मुक्ति के लिए सात दीपदान का संकल्प लिया जाता है, अक्षत प्लेट में रखकर सातों दीप जलाए जाते हैं। पाठ के साथ यह विधि, वे कहते हैं, बहुत तीव्र लाभ देती है, क्योंकि शनि धीरे देते हैं पर उनका प्रभाव लंबा रहता है।
वक्ता सामग्री गिनाते हैं। चार कच्चे नींबू, थोड़े हरे — पीले नहीं। सात दिन का अनुष्ठान कर रहे हैं तो रोज़ नींबू चाहिए। चार नींबू काटें तो आठ हो जाएँगे। उनमें से सात के भीतर का गूदा निकालकर थोड़ा खाली कर दें और उनमें शुद्ध तिल का तेल भरें; अच्छा तिल का तेल न मिले तो सरसों का तेल भर दें। काला सूती कपड़ा लाकर उसे फाड़-फाड़कर पतली-पतली काली बाती बनाएँ; हर नींबू में दो-दो बाती, जोड़े में, लगाएँ। यानी सात नींबू, चौदह काली बाती, तिल का तेल। सरसों का तेल डाल रहे हों तो सभी में थोड़ा-थोड़ा काला तिल डाल दें। इस तरह सात दीप बन जाते हैं।\n\nसमय का भी ध्यान रखें, वे कहते हैं। सुबह-सुबह बिल्कुल कर सकते हैं, पर शाम के समय अति उत्तम — शाम सर्वश्रेष्ठ है। पहले पाठ आदि कर लें, तब शनैश्चर महाग्रह के लिए यह दीपदान विधि करें। रोज़ न कर पाएँ — मान लें 21 दिन का अनुष्ठान है और मौसम न होने से नींबू नहीं मिल रहे — तो कम से कम शनिवार को ज़रूर करें; पर सात दिन का अनुष्ठान कर रहे हैं तो हर दिन शाम को दीपदान करें।\n\nदीपदान की विधि बस इतनी है कि इन्हें एक जगह अच्छे से सजा दें। घर में शमीउपाय-अनुष्ठानों में प्रयुक्त एक पत्ता — परंपरागत रूप से शनिवार को नहीं तोड़ा जाता; शनिवार के अनुष्ठान हेतु आवश्यक हो तो इसे पूर्व शुक्रवार को तोड़ लिया जाता है। का वृक्ष हो तो वहाँ; न हो तो कोई दिक्कत नहीं: घर पर अपने पूजन स्थान के पास, या बाहर लगा रहे हों तो हनुमान जी की ध्वजा के पास — वहाँ चौका पूरकर, यानी थोड़ा गोबर से लीपकर जगह साफ कर लें, और सातों नींबू के दीपक वहाँ सजाएँ।\n\nहाथ में ज़रा-सा अक्षतअखंडित कच्चे चावल के दाने, संकल्प लेते समय जल व पुष्प के साथ हाथ में लिए जाते हैं।, काला तिल और दक्षिणागुरु अथवा आचार्य को दी जाने वाली भेंट, जिससे अनुष्ठान पूर्ण होता है; इसके बिना कर्म अपूर्ण माना जाता है। के रूप में ₹1 का सिक्का लेकर संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। लें: "मैं अपनी जन्म कुंडली में उपस्थित शनैश्चर महाग्रह की पूर्ण कृपा के हेतु, शुभ फल के हेतु, उनकी क्रूर दृष्टि से स्वयं को मुक्त करने और उनकी कृपा दृष्टि की प्राप्ति के हेतु, आज शनैश्चर महाग्रह की प्रसन्नता के हेतु सात दीप दान करने का संकल्प लेता/लेती हूँ।" यह बोलकर अक्षत आदि किसी एक प्लेट में वहाँ रख दें और सातों दीप प्रज्वलित कर दें।\n\nपाठ के साथ-साथ यह दीपदान विधि करके देखिए, वे कहते हैं: बहुत तीव्र गति से लाभ देगी, क्योंकि शनैश्चर बहुत धीरे अपना प्रभाव देते हैं पर बहुत समय तक उनका प्रभाव रहता है, और यह विधान करने पर वे तुरंत प्रसन्न होते हैं।
दीपदान के समय पुराने अपराध स्वीकार कर शनि से क्षमा माँगना
प्रायश्चित और दोबारा गलती न करने की सामर्थ्य की प्रार्थना
वक्ता कहते हैं कि दीपदान के साथ जो भी अपराध याद हों उनका प्रायश्चित्त भी करना है — दुनिया में किसी को पता न हो, पर आपको अपनी गलती ज़रूर पता होगी। दीपदान के समय हाथ जोड़कर शनि से क्षमा याचना करें कि प्रभु, जो अपराध हुआ है क्षमा कर दीजिए, और प्रार्थना करें कि भविष्य में कभी ऐसी गलती न हो, मन न भटके — इसकी आत्मिक सामर्थ्य भी उनसे माँगें।
जब यह विधान करेंगे, वक्ता कहते हैं, तो शनि तुरंत प्रसन्न होंगे — लेकिन साथ में एक काम आपको करना है। जो भी अपराध आपने किया हो, जो आपको स्मरण हो कि "मुझसे यह गलती हुई है", चाहे किसी भी तरह की हो — दुनिया में किसी को पता न हो, पर आपको अपनी गलती ज़रूर पता होगी।\n\nउसके लिए आप प्रायश्चित्तकिसी भारी कर्म — जैसे शत्रु की मृत्यु में परिणत होने वाला षट्कर्म — के कर्मभार को संतुलित करने हेतु किया जाने वाला प्रायश्चित्त अनुष्ठान। भी करेंगे। दीपदान के समय हाथ जोड़कर उनसे क्षमा याचना करें: "प्रभु, मुझसे जो अपराध हुआ है, क्षमा कर दीजिए।" और भविष्य में कभी कोई गलती न करूँ, इस संकल्प के लिए भी उनसे माँगें कि मुझे आत्मिक सामर्थ्य दीजिए कि ऐसी गलती कभी न हो, मेरा मन न भटके। इसके लिए भी, वे कहते हैं, उनसे प्रार्थना करके सामर्थ्य की प्राप्ति माँगें।
अनुष्ठान के बाद जीवन भर शनि महामाला मंत्र का नित्य पाठ
दिन में कम से कम एक बार; सिद्ध मंत्र अनेक प्रभाव देता है
वक्ता कहते हैं कि सात या 21 दिन की साधना पूरी होने के बाद प्रतिदिन कम से कम एक बार इसका पाठ आजीवन करें; कोई दिक्कत नहीं होगी। भगवान शनैश्चर का यह माला मंत्र उनकी कृपा से सिद्ध हो जाए तो, वे कहते हैं, अनेकों प्रभाव देने वाला होता है।
जब आप सात दिन या 21 दिन की साधना कर लें, वक्ता कहते हैं, उसके बाद प्रत्येक दिन कम से कम एक बार इसका पाठ आजीवन करें; कोई दिक्कत नहीं होगी।\n\nभगवान शनैश्चर का यह माला मंत्र अगर उनकी कृपा से सिद्ध हो जाए, वे कहते हैं, तो वह आपको अनेकों प्रभाव देने वाला होता है।
तीर्थों में शनि महामाला मंत्र को बल देना: नवग्रह और काली मंदिर, कृष्ण की नगरी और शनि के स्थान
लाल फूल पर पाठ कर समर्पण; जाप करते हुए परिक्रमा
वक्ता कहते हैं कि किसी भी तीर्थ में नवग्रह मंदिर या भगवती काली का स्थान हो — महाकाली, काली, भद्रकाली, जगदंबा का कोई भी स्वरूप — तो एक रक्त वर्ण का पुष्प लेकर उस पर इस माला मंत्र का पाठ करके उनके चरणों में समर्पित करें, तो यह मंत्र और प्रभाव देने लगता है; नवग्रह मंदिर में भी, और विशेषकर जहाँ शनि अपनी माता छाया के साथ हों। कृष्ण शनि के गुरु हैं, इसलिए कृष्ण की नगरी में, जैसे गोवर्धन परिक्रमा के समय, इस माला मंत्र का जाप करने से तत्काल लाभ मिलता है, हालाँकि वहाँ कृष्ण की सेवा-पूजा पहले है। शनि के अपने स्थान — शनि शिंगणापुर या वृंदावन के पास कोकिला वन — में माला मंत्र जपते हुए 5–6 किलोमीटर की परिक्रमा करने से उनकी विशेष कृपा मिलती है।
वक्ता कहते हैं कि कभी भी तीर्थ क्षेत्र में जाएँ और वहाँ नवग्रह मंदिर हो या भगवती काली का स्थान हो — जगदंबा के किसी भी स्वरूप में, महाकाली, काली, भद्रकाली — तो एक रक्त वर्ण का पुष्प लेकर उस पर इस माला मंत्र का पाठ करके उनके चरणों में ज़रूर समर्पित करके आएँ। यह माला मंत्र और प्रभाव देने लगेगा। विशेषकर नवग्रह मंदिर आदि हो तो वहाँ भी करें। और अगर कहीं शनि का उनकी माता छाया के साथ मंदिर मिल जाए और वहाँ यह समर्पण करें, तो यह विशेष प्रभाव देने वाला हो जाता है।\n\nकृष्ण जी शनि के गुरु हैं, वे कहते हैं, इसलिए भगवान कृष्ण की नगरी में कभी जाएँ और वहाँ इस माला मंत्र का अनुष्ठान-जाप करें — जैसे गोवर्धन परिक्रमा के समय — तो तत्काल लाभ मिलेगा। हालाँकि वहाँ भगवान कृष्ण की सेवा-पूजा करनी चाहिए; लेकिन विशेष तंत्रोक्त अनुष्ठान के रूप में आपकी इच्छा हो और यह भी करें, तो अवश्य ही विशेष कृपा मिलेगी।\n\nभगवान शनैश्चर के स्थान पर — जैसे शनि शिंगणापुर, या वृंदावन के पास कोकिला वन, जहाँ शनि देव साक्षात विराजमान माने जाते हैं — परिक्रमा होती है; वहाँ इस माला मंत्र का जाप करते हुए 5–6 किलोमीटर की परिक्रमा कर सकते हैं, उससे भी शनि देव की विशेष कृपा मिलती है। इन सभी तीर्थ क्षेत्रों में जाएँ तो, वे कहते हैं, इस प्रकार के कार्य अवश्य करें और जीवन में शनि की विशेष कृपा प्राप्त करें।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।