शाक्त पीठ पर बलि और बलि पशु की गति

शाक्त तीर्थ पीठों पर बलि के सिद्धांत पर टिप्पणियाँ।

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The notes
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01

तंत्र ऊर्जाओं का विषय है: एकत्र करना, प्रक्षेपित करना, फल पाना

जिस ढाँचे में बलि को समझना है

· Reviewed Sep 14, 2026 · 00:05–01:06

वक्ता कहते हैं कि तंत्र का पूरा विषय ऊर्जाओं का विषय है और उसके केवल तीन अंग हैं: किसी एक ऊर्जा को एकत्र करना, उस एकत्र की हुई ऊर्जा को अपनी कामना के अनुसार प्रक्षेपित करना, और फल प्राप्त करना। वे कहते हैं कि सामान्य व्यक्ति किसी जीव की बलि देखकर बस यही सोचता है कि जीव की हत्या हो रही है और रक्त से कोई देवी-देवता प्रसन्न नहीं होते, और जो बलि चढ़ाने वाला केवल अपनी कामना सोचता है वह भी उतना ही सीमित है। वे कहते हैं कि दोनों दृष्टियाँ ऊपर ही रुक जाती हैं और बलि के पीछे का यथार्थ विषय इसी ऊर्जा-ढाँचे पर समझना होगा।

02

बलि को दर्शन-सिद्धांत से न समझा जा सकता है, न रोका जा सकता है

दर्शन से संतुष्टि नहीं, अंकुश की अपनी हानि

· Reviewed Sep 14, 2026 · 01:07–01:17

वक्ता कहते हैं कि बलि के पीछे का विषय कभी दर्शन-सिद्धांत का विषय नहीं हो सकता: तंत्रोक्त विषय दर्शन के माध्यम से समझे ही नहीं जा सकते, और जो ऐसा करेगा उसकी संतुष्टि कभी नहीं होगी। वे कहते हैं कि दर्शन-सिद्धांत के द्वारा कोई भी इन विषयों पर किसी प्रकार का अंकुश नहीं लगा सकता; ऐसा करने की अपनी हानि है, और हर विषय को "ऐसा क्यों हो रहा है" कहकर उठाने से कोई संतुष्ट नहीं हो सकता। वे जोड़ते हैं कि इस विषय का अपना भेद है और अपनी हानि है, और वे आगे बताते हैं कि हानि किस जगह होती है।

03

जहाँ बलि चढ़ती है, ऐसे सिद्ध पीठों से किन्हें दूर रहना चाहिए

देवी का दर्शन कीजिए, बलि-स्थान पर मत जाइए

· Reviewed Sep 14, 2026 · 01:18–01:49

वक्ता कहते हैं कि जिसे ये विषय घृणा के, बहुत अधिक कठोरता या क्रूरता के लगते हैं, उसे इन विषयों में पढ़ना ही नहीं चाहिए और ऐसे तीर्थ-क्षेत्रों, सिद्ध पीठ आदि पर भी नहीं जाना चाहिए जहाँ शाक्त परंपरा, शैवागम और अघोर के नियम का पालन होता है और बलि चढ़ती है। वे कहते हैं कि इस प्रक्रिया में लगे साधक, चाहे किसी भी गुण से युक्त हों, अपना निज मत रखते हैं जो परंपरा के अनुसार चलता है। जिनके हृदय में ऐसा देखकर विदारक पीड़ा होती है, उनसे वे कहते हैं कि देवी का दर्शन कीजिए पर बलि-स्थान पर न जाइए न देखिए, क्योंकि वह उनका विषय नहीं होना चाहिए; और जो उसे विषय बनाता है उसे मानना होगा कि उसकी अपनी परंपरा है।

04

कालिका पुराण में महिषासुर को दिया गया वरदान

पुराणों में बलि की चर्चा कहाँ है

· Reviewed Sep 14, 2026 · 01:50–02:09

वक्ता कहते हैं कि जो पुराणों का अध्ययन करेगा वह कालिका पुराण को ले, जहाँ बलि को लेकर इन विषयों की बहुत चर्चा है। वहाँ, वे कहते हैं, यह पढ़ने को मिलेगा कि भगवती ने महिषासुर को क्यों और कैसे यह आशीर्वाद दिया कि तुम्हारी पूजा सम्यक रूप से मेरे साथ होगी, तुम मेरे साथ पूजे जाओगे।

05

देवी के परिकर की हर शक्ति सात्विक नहीं; कुछ की तृप्ति रक्त से ही होती है

दैत्यों का रक्त पीने वाली योगिनियाँ आज भी पीठों में हैं

· Reviewed Sep 14, 2026 · 02:10–02:45

वक्ता कहते हैं कि यह स्पष्ट जान लीजिए कि भगवती अपने पूर्ण मंडल, अपने पूरे परिवार के साथ विराजती हैं, और उनकी अन्य शक्तियों तथा उनके परिकर का स्वभाव सबका सात्विक नहीं है। जो योगिनी भगवती के साथ प्रकट हुईं, उन्होंने दैत्यों का रक्त पिया, उनके विनाश के लिए उनका मांस खींचकर चबा डाला, और वही शक्तियाँ आज भी सिद्ध पीठ और शक्ति पीठ में उपस्थित हैं। उनकी तृप्ति, वे कहते हैं, उन्हीं चीज़ों से होती है, और इसीलिए वहाँ बलि चढ़ती है।

06

बलि कहाँ मान्य है: प्राचीन सिद्ध और शक्ति पीठ, नया बनाया स्थान नहीं

बलि की हानि वास्तव में कहाँ होती है

· Reviewed Sep 14, 2026 · 03:08–03:37

वक्ता कहते हैं कि बलि की हानि एक निश्चित जगह होती है। जिस सिद्ध पीठ या शक्ति पीठ पर यह प्रथा पौराणिक काल से चली आ रही है, पुराणों में जिसकी चर्चा है और तंत्र आगम में जिसका निर्देशन दिया गया है, वहाँ सब वैसे ही चल रहा है और कोई विषय नहीं है। पर यदि कोई स्वतंत्र रूप से किसी अन्य स्थान पर अपना नया पीठ बनाकर वहाँ प्रेत, पिशाच, ब्रह्मराक्षस या dakini के निमित्त बलि करता है, तो वे कहते हैं कि वह अनिष्टकारक है और कहीं न कहीं गड़बड़, विपरीत परिणाम देने वाला हो जाता है।

07

जाग्रत पीठ पर बलि दिए गए जीव को उस योनि से मुक्ति क्यों मिलती है

बकरा, भेड़, मुर्गा यक्ष-कुल के जीव हैं जिनकी गति धीमी है

· Reviewed Sep 14, 2026 · 03:38–04:18

वक्ता कहते हैं कि सिद्ध पीठ में बलि के नियम के अनुसार वह पीठ जाग्रत पीठ होता है जहाँ यह पहले से चला आ रहा है, इसलिए वहाँ जिस भी जीव की बलि जाती है उसकी कहीं न कहीं उस योनि से भी मुक्ति हो जाती है। वे कहते हैं कि बकरा, भेड़ा और मुर्गा यक्ष कुल के ऐसे जीव हैं जिनकी गति बहुत जल्दी नहीं हो पाती; कहा जाता है कि मृत्यु के बाद वे पुनः-पुनः उसी योनि में उत्पन्न होते हैं और कई बार उनकी गति बाधित होती है। बलि के माध्यम से, वे कहते हैं, उनकी गति हो जाती है, और वहाँ उपस्थित भगवती के परिकर और सहायक शक्तियाँ, जिनकी तृप्ति रक्त से ही होती है, इन यक्ष-कुल के जीवों के रक्त से संतुष्ट भी हो जाती हैं।

08

बलि की ऊर्जा-प्रक्रिया: संकल्प से जीव की ऊर्जा कामना से बँधती है

काम होने पर बलि की मन्नत भी इसी सिद्धांत पर

· Reviewed Sep 14, 2026 · 04:19–05:21

वक्ता कहते हैं कि जिन प्रमुख शक्तियों के द्वारा भक्तों का सहयोग होता है, चाहे धर्मयुक्त हो या अधर्मयुक्त, वे शक्तियाँ हैं, और ऊर्जा का विषय अलग है: ऊर्जा एकत्र की जाती है, संरक्षित की जाती है, कामना के निमित्त प्रक्षेपित की जाती है, और फिर फल प्राप्त होता है। बलि में, वे कहते हैं, जीवात्मा की ऊर्जा को संकल्प मंत्र के द्वारा बलि देने वाले की कामनाओं की ऊर्जा से बाँध दिया जाता है; बलि के बाद उस पीठ की प्रमुख कार्यकारिणी शक्ति, जो कामना स्वीकार कर पूर्ण करती है, वह ऊर्जा पा लेती है और वह प्रक्षेपित हो जाती है, और कामना पूर्ण होकर मिल जाती है, चाहे वह षट्कर्म की हो, पौष्टिक कर्म की या किसी अन्य कामना की। वे कहते हैं कि पहले से मानी गई मन्नत, कि काम सिद्ध होने पर बलि चढ़ाएँगे, ठीक इसी तरह काम करती है।

09

जहाँ परंपरा है, उन शाक्त पीठों पर बलि अनिवार्य है, और उसे रोकना कल्याणकारी नहीं

वहाँ स्थापित शक्तियाँ अन्य क्षेत्रों की रक्षा करती हैं

· Reviewed Sep 14, 2026 · 05:22–05:42

वक्ता कहते हैं कि जिन शाक्त पीठों पर यह परंपरा चली आ रही है वहाँ बलि अनिवार्य है। ऐसे स्थानों पर, वे कहते हैं, भगवती के माध्यम से, जो भी उनकी लीला रही हो, वैसी शक्तियों को स्थापित किया ही गया है; वे शक्तियाँ उसी स्थान पर रहती हैं और उसी स्थान के द्वारा अन्य क्षेत्रों की रक्षा करती हैं। इन सब पर रोक लगाना, वे कहते हैं, किसी के लिए कभी कल्याणकारी नहीं हो सकता।

10

बलि का जिह्वा के स्वाद से कोई संबंध नहीं

स्वाद के भाव से बलि का मांस खाने वाला उसी योनि में जन्मता है

· Reviewed Sep 14, 2026 · 06:03–06:23

वक्ता कहते हैं कि इस विषय में कहीं भी बलि को खान-पान या जिह्वा के स्वाद से नहीं जोड़ा जा रहा है। जो लोग इसे स्वाद से जोड़कर देखते हैं कि खाने को मांस मिलेगा, उनके लिए वे उतना ही स्पष्ट कहते हैं कि जो इस भाव से बलि का मांस खाता है, अगले पशु-बलि की उसी योनि में उसका जन्म भी होता है।

11

तांत्रिक तर्पण में मदिरा: देवता के लिए शोधित, पीने की छूट नहीं

प्रसाद कहकर चार बोतल

· Reviewed Sep 14, 2026 · 06:24–07:06

वक्ता कहते हैं कि भगवती या देवताओं के तांत्रिक पूजन में तर्पण के लिए जहाँ मदिरा का प्रयोग होता है, वहाँ उसे पहले पंचपात्र और पात्र-साधना की विधि से शोधित किया जाता है, और शोधन के बाद ही तर्पण होता है; वह प्रयोग धर्मयुक्त है, उस शक्ति के तर्पण, पूजन और प्रसन्नता के लिए है। अंश मात्र प्रसाद लेना अलग विषय है, वे कहते हैं, पर भैरव जी को एक बोतल चढ़ाकर चार बोतल खुद पी लेना, प्रसाद कहकर अति करना — यह भाव ही ऐसे लोगों के विनाश का कारण बनता है, और उनकी कभी गति नहीं हो सकती।

12

तंत्र शास्त्र में मुक्ति के लिए बताई गई वस्तुओं का भोग के लिए प्रयोग नहीं

आगमोक्त नियम का उल्लंघन, सद्गति नहीं

· Reviewed Sep 14, 2026 · 07:07–07:31

वक्ता कहते हैं कि तंत्र शास्त्र में जिन चीज़ों का प्रयोग मुक्त होने के लिए बताया गया है, यदि कोई व्यक्ति उन्हीं चीज़ों का प्रयोग अपने स्वाद या भोग की संतुष्टि के लिए करता है, तो वह कहीं न कहीं आगम और शास्त्र के नियमों-आदेशों का उल्लंघन कर रहा है, और ऐसा उल्लंघन करके उसकी कभी सद्गति नहीं हो सकती। वे कहते हैं कि इस विषय में निश्चिंत रहें, और वर्तमान समय में लोग इसी तरह अपनी दुर्गति कर भी रहे हैं।

13

तंत्र और उसके पीठ गुप्त क्यों रखे गए और शाक्त अपनी साधना क्यों नहीं दिखाते

जितना लोग देखेंगे, उतनी निंदा, उतनी सबकी हानि

· Reviewed Sep 14, 2026 · 07:32–08:08

वक्ता कहते हैं कि लोगों की दुर्गति देखकर बाकी लोग चिंतित होते हैं कि गलत विषय हो रहा है; पर जो यथार्थ विषय के अनुसार चले उसके लिए यह कभी नहीं होता, और इसीलिए तंत्र का विषय गुप्त कहा गया है और तंत्र के पीठ गुप्त रखे गए हैं। वे कहते हैं कि शाक्त का मार्ग शांत, सौम्य, भीतर रहने का मार्ग है: शाक्त एक्सट्रोवर्ट नहीं होते, दिखाते नहीं, क्योंकि जितना लोग देखेंगे उतनी निंदा करेंगे, और हानि शाक्तों से अधिक उन्हीं लोगों की होगी। वे श्रोताओं से कहते हैं कि ऐसी निंदा के विषयों से बचिए।

14

शाक्त पीठ पर अधिकार केवल शाक्तों का

किसी का आहार छीनने का अधिकार किसी को नहीं

· Reviewed Sep 14, 2026 · 08:09–08:43

वक्ता कहते हैं कि किसी का भोजन, किसी का आहार छीनने का अधिकार किसी को नहीं है। मुख्य विषय, वे कहते हैं, यही है कि मनुष्य देवताओं को तर्पित करे, पूजित करे, संतुष्ट करे, और देवता मनुष्य की कामनाओं की पूर्ति करें; इसका विधान सबके नियम और परंपरा के अनुसार अलग-अलग है, अपनी परंपरा के नियम से चलना चाहिए, और इसमें किसी का विरोध या रोक नहीं होनी चाहिए। वे कहते हैं कि शाक्त पीठ पर शाक्तों का अधिकार होना चाहिए, न वैष्णवों का, न बौद्धों का, न किसी अन्य अधर्मियों का; जहाँ जो विषय चला आ रहा है, वहाँ उसी प्रकार चलना चाहिए।

15

प्राचीन बलि-परंपरा में हस्तक्षेप करने वाले सुधारकों को चेतावनी

जहाँ शिव का दूध से अभिषेक है, वहाँ कोई रक्त नहीं माँगता

· Reviewed Sep 14, 2026 · 08:44–09:48

वक्ता कहते हैं कि जिन्हें दर्शन-सिद्धांत बहुत अच्छा लगता है और जो कहते हैं कि हम आज लोगों के भीतर सुधार करना चाहते हैं, उनकी मानसिकता पहले देख लीजिए; वे खुद ही दुर्बुद्धि, मलबुद्धि दिखाई देंगे, तो दूसरों का क्या करेंगे। आधा विषय इधर का और आधा कहीं और का लेकर नहीं चला जा सकता, वे कहते हैं; ऐसा करके इन चीज़ों को रोकने से पूरे भारतवर्ष के समस्त पीठों की शक्तियों का कोप ही मिलेगा, भला कुछ नहीं होगा। उनकी तुलना: जहाँ शिव का दूध से अभिषेक होता है वहाँ कोई रक्त से अभिषेक की माँग नहीं कर सकता, वैसे ही जहाँ बलि का मंडप दीर्घ काल से बना है, पुराणों में व्याख्या है, तंत्र के आगम में वर्णन है, पद्धतियाँ और akhara चल रहे हैं, वहाँ किसी को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए, नहीं तो शक्तियों, अपने लोक-देवताओं और कुल-शक्तियों के कोप का भाजन बनना पड़ता है।

16

अपने बनाए स्थान या घर में बलि, काली के नाम पर भी, घृणित है

स्वतंत्र रूप से सिद्ध की गई मसानिक शक्ति को काली माई कहना

· Reviewed Sep 14, 2026 · 09:49–10:31

वक्ता कहते हैं कि जब कोई व्यक्ति स्वतंत्र रूप से तंत्र-विद्या सीखकर कोई पैशाचिक, तामसिक या मसान शक्ति स्वतंत्र रूप से सिद्ध कर लेता है और उसके निमित्त, उसे काली माई बोलकर या किसी बाबा से बोलवाकर, अपने स्थान पर उसका बलि-पूजन करवाता है, तो वह भी घृणित है। उसके माध्यम से, वे कहते हैं, उसकी कुल-परंपरा में दिक्कत होगी, और जो लोग वहाँ पूजा देंगे उन्हें भी दिक्कत हो सकती है। वे कहते हैं कि ऐसे स्थानों पर बलि के लिए वे स्वयं मना करते हैं; पीठों की, सिद्ध पीठ और शाक्त पीठों की बात अलग है, पर किसी के निज स्थान पर ऐसी बलि हो रही है, आपके घर में कोई आकर बलि दे रहा है और फिर बैठकर खा रहा है, तो यह कहीं न कहीं आपको डुबाने वाला होता है।

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यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।

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