शाक्त पीठ पर बलि और बलि पशु की गति
शाक्त तीर्थ पीठों पर बलि के सिद्धांत पर टिप्पणियाँ।
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तंत्र ऊर्जाओं का विषय है: एकत्र करना, प्रक्षेपित करना, फल पाना
जिस ढाँचे में बलि को समझना है
वक्ता कहते हैं कि तंत्र का पूरा विषय ऊर्जाओं का विषय है और उसके केवल तीन अंग हैं: किसी एक ऊर्जा को एकत्र करना, उस एकत्र की हुई ऊर्जा को अपनी कामना के अनुसार प्रक्षेपित करना, और फल प्राप्त करना। वे कहते हैं कि सामान्य व्यक्ति किसी जीव की बलि देखकर बस यही सोचता है कि जीव की हत्या हो रही है और रक्त से कोई देवी-देवता प्रसन्न नहीं होते, और जो बलि चढ़ाने वाला केवल अपनी कामना सोचता है वह भी उतना ही सीमित है। वे कहते हैं कि दोनों दृष्टियाँ ऊपर ही रुक जाती हैं और बलि के पीछे का यथार्थ विषय इसी ऊर्जा-ढाँचे पर समझना होगा।
वक्ता आरंभ में कहते हैं कि तंत्र का पूर्ण विषय ऊर्जाओं का विषय है। वे इसके तीन अंग गिनाते हैं: किसी एक ऊर्जा को एकत्र करना, उस एकत्र की हुई ऊर्जा को अपनी कामना के अनुसार प्रक्षेपित करना, और फल की प्राप्ति करना। यही तीन विषय, वे कहते हैं, पूरा तंत्र है। फिर वे बताते हैं कि लोग किसी जीव की बलि को कैसे देखते हैं। एक सरल सामान्य मनुष्य, वे कहते हैं, यही सोचता है कि उस जीव की हत्या हो रही है और किसी के रक्त या हत्या से कोई देवी-देवता प्रसन्न नहीं होने वाले। वे मानते हैं कि यह किसी का अपना विचार हो सकता है, पर श्रोता से कहते हैं कि इस विचार को और आगे ले जाइए। वे कहते हैं कि बलि चढ़ाने वाला भी उतना ही सीमित है यदि वह केवल यही सोचता है कि "हमारी कामना पूरी हो" और चली आ रही परंपरा से बलि देकर देवता को प्रसन्न करना चाहता है। इसके पीछे का यथार्थ विषय, वे कहते हैं, इन दोनों ऊपरी दृष्टियों से कहीं गहरा है, और आगे की पूरी बात वे इसी ऊर्जा-ढाँचे पर रखते हैं।
बलि को दर्शन-सिद्धांत से न समझा जा सकता है, न रोका जा सकता है
दर्शन से संतुष्टि नहीं, अंकुश की अपनी हानि
वक्ता कहते हैं कि बलि के पीछे का विषय कभी दर्शन-सिद्धांत का विषय नहीं हो सकता: तंत्रोक्त विषय दर्शन के माध्यम से समझे ही नहीं जा सकते, और जो ऐसा करेगा उसकी संतुष्टि कभी नहीं होगी। वे कहते हैं कि दर्शन-सिद्धांत के द्वारा कोई भी इन विषयों पर किसी प्रकार का अंकुश नहीं लगा सकता; ऐसा करने की अपनी हानि है, और हर विषय को "ऐसा क्यों हो रहा है" कहकर उठाने से कोई संतुष्ट नहीं हो सकता। वे जोड़ते हैं कि इस विषय का अपना भेद है और अपनी हानि है, और वे आगे बताते हैं कि हानि किस जगह होती है।
वक्ता कहते हैं कि यथार्थ रूप से बलि के पीछे का विषय दर्शन-सिद्धांत का विषय नहीं हो सकता। तंत्रोक्त विषयों को, वे कहते हैं, दर्शन के माध्यम से समझा ही नहीं जा सकता; जो ऐसा करेगा उसकी संतुष्टि कभी नहीं होगी। आगे इसी बात पर लौटते हुए वे कहते हैं कि दर्शन-सिद्धांत के द्वारा इन विषयों पर कभी किसी प्रकार से अंकुश नहीं लगाया जा सकता, और ऐसे अंकुश की अपनी हानि है। हर विषय को यह कहकर उठाना कि "यह एक विषय है, ऐसा क्यों हो रहा है" — इससे कोई संतुष्ट नहीं हो सकता। इस विषय का अपना भेद है और अपनी हानि है। वे कहते हैं कि यह भी समझ लीजिए कि हानि किस जगह होती है, और फिर प्राचीन पीठ तथा नए बने स्थान के भेद से उसे समझाते हैं।
जहाँ बलि चढ़ती है, ऐसे सिद्ध पीठों से किन्हें दूर रहना चाहिए
देवी का दर्शन कीजिए, बलि-स्थान पर मत जाइए
वक्ता कहते हैं कि जिसे ये विषय घृणा के, बहुत अधिक कठोरता या क्रूरता के लगते हैं, उसे इन विषयों में पढ़ना ही नहीं चाहिए और ऐसे तीर्थ-क्षेत्रों, सिद्ध पीठ आदि पर भी नहीं जाना चाहिए जहाँ शाक्त परंपरा, शैवागम और अघोर के नियम का पालन होता है और बलि चढ़ती है। वे कहते हैं कि इस प्रक्रिया में लगे साधक, चाहे किसी भी गुण से युक्त हों, अपना निज मत रखते हैं जो परंपरा के अनुसार चलता है। जिनके हृदय में ऐसा देखकर विदारक पीड़ा होती है, उनसे वे कहते हैं कि देवी का दर्शन कीजिए पर बलि-स्थान पर न जाइए न देखिए, क्योंकि वह उनका विषय नहीं होना चाहिए; और जो उसे विषय बनाता है उसे मानना होगा कि उसकी अपनी परंपरा है।
वक्ता कहते हैं कि यदि किसी को ये विषय घृणा के, बहुत अधिक कठोरता या क्रूरता के लगते हैं तो उसे इन विषयों में पढ़ना ही नहीं चाहिए। ऐसे व्यक्ति को उन तीर्थ-क्षेत्रों, सिद्ध पीठ आदि पर भी नहीं जाना चाहिए जहाँ विशेषकर शाक्तउस परंपरा से संबंधित जो शक्ति को परम तत्त्व मानती है। परंपरा, शैवागम और अघोर के नियम का पालन होता है और जहाँ बलि आदि चढ़ती है। इस प्रक्रिया में लगे साधक, वे कहते हैं, चाहे किसी भी प्रकार के गुणों से भरे हों, अपना निज मत रखते हैं, और वह मत परंपरा के अनुसार चलता है। आगे वे इन्हीं लोगों पर लौटते हैं: जिनके हृदय में ऐसा देखकर हृदय-विदारक पीड़ा होती है, उन्हें इन स्थानों पर जाकर बलि का दर्शन नहीं करना चाहिए। उनका निर्देश है — देवी का दर्शन कीजिए, बलि-स्थानों पर मत जाइए, मत देखिए, क्योंकि वह आपका विषय नहीं होना चाहिए। यदि कोई उसे अपना विषय बनाता ही है, वे कहते हैं, तो उसकी अपनी परंपरा है और वही परंपरा उस पर चलती है।
कालिका पुराण में महिषासुर को दिया गया वरदान
पुराणों में बलि की चर्चा कहाँ है
वक्ता कहते हैं कि जो पुराणों का अध्ययन करेगा वह कालिका पुराण को ले, जहाँ बलि को लेकर इन विषयों की बहुत चर्चा है। वहाँ, वे कहते हैं, यह पढ़ने को मिलेगा कि भगवती ने महिषासुर को क्यों और कैसे यह आशीर्वाद दिया कि तुम्हारी पूजा सम्यक रूप से मेरे साथ होगी, तुम मेरे साथ पूजे जाओगे।
वक्ता श्रोता को पुराणों की ओर भेजते हैं। कालिका पुराण को लीजिए, वे कहते हैं: बलि को लेकर वहाँ इन विषयों की बहुत चर्चा की गई है। वहाँ, वे कहते हैं, यह पढ़ने को मिलेगा कि भगवती ने महिषासुर को क्यों और कैसे आशीर्वाद दिया कि तुम्हारी पूजा सम्यक रूप से मेरे साथ भी होगी, तुम मेरे साथ पूजे जाओगे। देवी के परिकर का स्वरूप समझाने से पहले वे इसे शास्त्रीय आधार के रूप में रखते हैं।
देवी के परिकर की हर शक्ति सात्विक नहीं; कुछ की तृप्ति रक्त से ही होती है
दैत्यों का रक्त पीने वाली योगिनियाँ आज भी पीठों में हैं
वक्ता कहते हैं कि यह स्पष्ट जान लीजिए कि भगवती अपने पूर्ण मंडल, अपने पूरे परिवार के साथ विराजती हैं, और उनकी अन्य शक्तियों तथा उनके परिकर का स्वभाव सबका सात्विक नहीं है। जो योगिनी भगवती के साथ प्रकट हुईं, उन्होंने दैत्यों का रक्त पिया, उनके विनाश के लिए उनका मांस खींचकर चबा डाला, और वही शक्तियाँ आज भी सिद्ध पीठ और शक्ति पीठ में उपस्थित हैं। उनकी तृप्ति, वे कहते हैं, उन्हीं चीज़ों से होती है, और इसीलिए वहाँ बलि चढ़ती है।
वक्ता कहते हैं कि जो बलि चढ़ती है और यह विषय कहा जाता है, उसमें एक बात स्पष्ट जान लीजिए: भगवती का एक पूर्ण मंडल है और वे अपने पूरे परिवार के साथ विराजती हैं। भगवती की जो अन्य शक्तियाँ हैं और उनके जो परिकर हैं, वे कहते हैं, सबका स्वभाव सात्विक नहीं है। वे उन योगिनी का वर्णन करते हैं जो भगवती के साथ प्रकट हुईं: उन्होंने दैत्यों का रक्त पिया, और दैत्यों के विनाश के लिए उनका मांस खींच लिया, चबा गईं, विनष्ट कर दिया। वे शक्तियाँ, वे कहते हैं, वस्तुतः आज भी भगवती के सिद्ध पीठ और शक्ति पीठ में उपस्थित हैं। उनकी तृप्ति, वे कहते हैं, उन्हीं चीज़ों से होने वाली है। वे फिर जोड़ते हैं कि यह दर्शन का विषय नहीं हो सकता और कोई दर्शन-सिद्धांत इस पर अंकुश नहीं लगा सकता।
बलि कहाँ मान्य है: प्राचीन सिद्ध और शक्ति पीठ, नया बनाया स्थान नहीं
बलि की हानि वास्तव में कहाँ होती है
वक्ता कहते हैं कि बलि की हानि एक निश्चित जगह होती है। जिस सिद्ध पीठ या शक्ति पीठ पर यह प्रथा पौराणिक काल से चली आ रही है, पुराणों में जिसकी चर्चा है और तंत्र आगम में जिसका निर्देशन दिया गया है, वहाँ सब वैसे ही चल रहा है और कोई विषय नहीं है। पर यदि कोई स्वतंत्र रूप से किसी अन्य स्थान पर अपना नया पीठ बनाकर वहाँ प्रेत, पिशाच, ब्रह्मराक्षस या dakini के निमित्त बलि करता है, तो वे कहते हैं कि वह अनिष्टकारक है और कहीं न कहीं गड़बड़, विपरीत परिणाम देने वाला हो जाता है।
यह कहने के बाद कि बलि के विषय की अपनी हानि है, वक्ता बताते हैं कि हानि किस जगह होती है। किसी सिद्ध पीठ या शक्ति पीठ पर बलि प्रथा, वे कहते हैं, पौराणिक काल से चली आ रही है; उसकी चर्चा पहले से है, और तंत्र आगमतांत्रिक शास्त्रोक्त विधि-विधानों का समूह (जैसे शिवागम), जो पूजा के नियम निर्धारित करता है, यह भी कि बलि कहाँ व कैसे विहित है — मात्र स्वाद या भोग हेतु इसके नियमों का उल्लंघन किसी भी उच्च आध्यात्मिक प्राप्ति को असंभव बना देता है। में उसका विषय और निर्देशन दिया गया है। वहाँ, वे कहते हैं, सब वैसे ही चल रहा है और कोई विषय ही नहीं है। समस्या, वे कहते हैं, तब है जब कोई स्वतंत्र रूप से किसी अन्य स्थान पर अपना नया-नया पीठ बनाकर वहाँ प्रेत, पिशाच, ब्रह्मराक्षस या dakini के निमित्त बलि करता है। वह, वे कहते हैं, अनिष्टकारक होता है, और कहीं न कहीं गड़बड़ बनकर उस व्यक्ति को विपरीत परिणाम देने वाला हो जाता है।
जाग्रत पीठ पर बलि दिए गए जीव को उस योनि से मुक्ति क्यों मिलती है
बकरा, भेड़, मुर्गा यक्ष-कुल के जीव हैं जिनकी गति धीमी है
वक्ता कहते हैं कि सिद्ध पीठ में बलि के नियम के अनुसार वह पीठ जाग्रत पीठ होता है जहाँ यह पहले से चला आ रहा है, इसलिए वहाँ जिस भी जीव की बलि जाती है उसकी कहीं न कहीं उस योनि से भी मुक्ति हो जाती है। वे कहते हैं कि बकरा, भेड़ा और मुर्गा यक्ष कुल के ऐसे जीव हैं जिनकी गति बहुत जल्दी नहीं हो पाती; कहा जाता है कि मृत्यु के बाद वे पुनः-पुनः उसी योनि में उत्पन्न होते हैं और कई बार उनकी गति बाधित होती है। बलि के माध्यम से, वे कहते हैं, उनकी गति हो जाती है, और वहाँ उपस्थित भगवती के परिकर और सहायक शक्तियाँ, जिनकी तृप्ति रक्त से ही होती है, इन यक्ष-कुल के जीवों के रक्त से संतुष्ट भी हो जाती हैं।
वक्ता सिद्ध पीठ में बलि का नियम समझाते हैं। ऐसा पीठ, वे कहते हैं, जाग्रत पीठ होता है, और वहाँ यह पहले से चला आ रहा है। वहाँ जिस भी जीव की बलि जाती है, वे कहते हैं, उस जीव की कहीं न कहीं उस योनि से भी मुक्ति हो जाती है। फिर वे जीवों के नाम लेते हैं। बकरा, भेड़ा और मुर्गा, वे कहते हैं, यक्ष कुल के ऐसे जीव हैं जिनकी गति बहुत जल्दी नहीं हो पाती। कहा जाता है, वे बताते हैं, कि मृत्यु के पश्चात वे पुनः-पुनः उसी योनि में उत्पन्न होते हैं, और कई बार उनकी गति बाधित होती है। बलि के माध्यम से, वे कहते हैं, उनकी भी गति हो जाती है। साथ ही, वे कहते हैं, पीठ पर उपस्थित भगवती के परिकर और सहायक शक्तियाँ, जिनकी तृप्ति रक्त से ही होने वाली है, यक्ष-कुल के इन जीवों के रक्त से संतुष्ट भी हो जाती हैं।
बलि की ऊर्जा-प्रक्रिया: संकल्प से जीव की ऊर्जा कामना से बँधती है
काम होने पर बलि की मन्नत भी इसी सिद्धांत पर
वक्ता कहते हैं कि जिन प्रमुख शक्तियों के द्वारा भक्तों का सहयोग होता है, चाहे धर्मयुक्त हो या अधर्मयुक्त, वे शक्तियाँ हैं, और ऊर्जा का विषय अलग है: ऊर्जा एकत्र की जाती है, संरक्षित की जाती है, कामना के निमित्त प्रक्षेपित की जाती है, और फिर फल प्राप्त होता है। बलि में, वे कहते हैं, जीवात्मा की ऊर्जा को संकल्प मंत्र के द्वारा बलि देने वाले की कामनाओं की ऊर्जा से बाँध दिया जाता है; बलि के बाद उस पीठ की प्रमुख कार्यकारिणी शक्ति, जो कामना स्वीकार कर पूर्ण करती है, वह ऊर्जा पा लेती है और वह प्रक्षेपित हो जाती है, और कामना पूर्ण होकर मिल जाती है, चाहे वह षट्कर्म की हो, पौष्टिक कर्म की या किसी अन्य कामना की। वे कहते हैं कि पहले से मानी गई मन्नत, कि काम सिद्ध होने पर बलि चढ़ाएँगे, ठीक इसी तरह काम करती है।
वक्ता कहते हैं कि जो प्रमुख शक्तियाँ हैं, जिनके द्वारा ही भक्तों का सहयोग किया जाता है, चाहे वह धर्मयुक्त हो या अधर्मयुक्त, वे शक्तियाँ हैं; ऊर्जा का विषय अलग है। जैसा उन्होंने आरंभ में कहा, ऊर्जा को एकत्र किया, संरक्षित किया, अपनी कामना के निमित्त प्रक्षेपित किया, और उसके पश्चात फल प्राप्त किया। जो बलि दी जा रही है, वे कहते हैं, उसमें जीवात्मावर्तमान भौतिक शरीर को सक्रिय करने वाली व्यष्टि आत्मा — जो मूलतः निराकार व निर्लिंग आत्मा से भिन्न प्रतीत होती है। की ऊर्जा को संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। मंत्र आदि के द्वारा बलि देने वाले की कामनाओं की ऊर्जा के साथ आबद्ध कर दिया जाता है। बलि के पश्चात वहाँ की प्रमुख कार्यकारिणी शक्ति, जो कामना को स्वीकार करेगी और पूर्ण करेगी, वह ऊर्जा प्राप्त कर लेती है, और वह प्रक्षेपित हो जाती है। चाहे वह षट्कर्म का विषय हो, पौष्टिक कर्म का हो, या किसी अन्य कामना-पूर्ति का, वे कहते हैं, वह पूर्ण होकर उस व्यक्ति को मिल जाता है। वे जोड़ते हैं कि कई बार लोग पहले जाकर मन्नत करते हैं कि हमारा यह कार्य सिद्ध होगा तब हम बलि चढ़ाएँगे; वह भी, वे कहते हैं, उसी प्रकार का विषय है। वे श्रोता से कहते हैं कि इन विषयों को ठीक इसी तरीके से समझिए।
जहाँ परंपरा है, उन शाक्त पीठों पर बलि अनिवार्य है, और उसे रोकना कल्याणकारी नहीं
वहाँ स्थापित शक्तियाँ अन्य क्षेत्रों की रक्षा करती हैं
वक्ता कहते हैं कि जिन शाक्त पीठों पर यह परंपरा चली आ रही है वहाँ बलि अनिवार्य है। ऐसे स्थानों पर, वे कहते हैं, भगवती के माध्यम से, जो भी उनकी लीला रही हो, वैसी शक्तियों को स्थापित किया ही गया है; वे शक्तियाँ उसी स्थान पर रहती हैं और उसी स्थान के द्वारा अन्य क्षेत्रों की रक्षा करती हैं। इन सब पर रोक लगाना, वे कहते हैं, किसी के लिए कभी कल्याणकारी नहीं हो सकता।
वक्ता स्पष्ट कहते हैं कि जिन शाक्तउस परंपरा से संबंधित जो शक्ति को परम तत्त्व मानती है। पीठों पर यह परंपरा चली आ रही है वहाँ बलि अनिवार्य है। उन स्थानों पर, वे कहते हैं, भगवती के माध्यम से, जो भी उनकी लीला रही हो, वैसी शक्तियों को स्थापित किया ही गया है। वे शक्तियाँ उसी स्थान पर हैं, और उसी स्थान के द्वारा अन्य क्षेत्रों की रक्षा करती हैं। इन सब पर रोक लगाना, वे कहते हैं, रोक लगाने वाले के लिए कभी कल्याणकारी नहीं हो सकता।
बलि का जिह्वा के स्वाद से कोई संबंध नहीं
स्वाद के भाव से बलि का मांस खाने वाला उसी योनि में जन्मता है
वक्ता कहते हैं कि इस विषय में कहीं भी बलि को खान-पान या जिह्वा के स्वाद से नहीं जोड़ा जा रहा है। जो लोग इसे स्वाद से जोड़कर देखते हैं कि खाने को मांस मिलेगा, उनके लिए वे उतना ही स्पष्ट कहते हैं कि जो इस भाव से बलि का मांस खाता है, अगले पशु-बलि की उसी योनि में उसका जन्म भी होता है।
तांत्रिक तर्पण में मदिरा: देवता के लिए शोधित, पीने की छूट नहीं
प्रसाद कहकर चार बोतल
वक्ता कहते हैं कि भगवती या देवताओं के तांत्रिक पूजन में तर्पण के लिए जहाँ मदिरा का प्रयोग होता है, वहाँ उसे पहले पंचपात्र और पात्र-साधना की विधि से शोधित किया जाता है, और शोधन के बाद ही तर्पण होता है; वह प्रयोग धर्मयुक्त है, उस शक्ति के तर्पण, पूजन और प्रसन्नता के लिए है। अंश मात्र प्रसाद लेना अलग विषय है, वे कहते हैं, पर भैरव जी को एक बोतल चढ़ाकर चार बोतल खुद पी लेना, प्रसाद कहकर अति करना — यह भाव ही ऐसे लोगों के विनाश का कारण बनता है, और उनकी कभी गति नहीं हो सकती।
वक्ता मदिरामदिरा, जो कुछ भैरव और वामाचार विधियों में अर्पित होती है और अन्य में वर्जित है। पर आते हैं। भगवती या देवताओं के तांत्रिक पूजन में तर्पणहवन व मार्जन के साथ किया जाने वाला जल आदि द्वारा देवता या पितरों को अर्पित तर्पण। के लिए जहाँ उसका प्रयोग होता है, वे कहते हैं, वहाँ पहले उसका शोधन होता है: पंचपात्रतांत्रिक पूजा में देवी अथवा देवता को तर्पण रूप में मदिरा अर्पित करने से पूर्व उसे शुद्ध करने की पारंपरिक विधि व पात्र। आदि के द्वारा, पात्र-साधना की विधि के द्वारा शोधन किया जाता है, और शोधन के पश्चात ही तर्पण आदि होता है। जो ऐसा करते हैं, वे कहते हैं, वह धर्मयुक्त हो गया; वह उस शक्ति के तर्पण के लिए है, पूजन के लिए है, उनकी प्रसन्नता के लिए है। प्रसादअर्पण के पश्चात् देवता से लौटा हुआ अंश, जिसे त्यागा नहीं अपितु ग्रहण किया जाता है। कहकर अंश मात्र स्वीकार करना अलग विषय है, वे कहते हैं। लेकिन पीने के लिए, "चलो चार बोतल खुद पी लें; भैरव जी को एक बोतल चढ़ गया, चार बोतल खुद चढ़ा लेते हैं," प्रसाद कहकर अति करना और इस प्रकार का भाव रखना — वह भाव ही, वे कहते हैं, इनके विनाश का कारण बनता है। ऐसे लोगों की, वे कहते हैं, कभी गति नहीं हो सकती।
तंत्र शास्त्र में मुक्ति के लिए बताई गई वस्तुओं का भोग के लिए प्रयोग नहीं
आगमोक्त नियम का उल्लंघन, सद्गति नहीं
वक्ता कहते हैं कि तंत्र शास्त्र में जिन चीज़ों का प्रयोग मुक्त होने के लिए बताया गया है, यदि कोई व्यक्ति उन्हीं चीज़ों का प्रयोग अपने स्वाद या भोग की संतुष्टि के लिए करता है, तो वह कहीं न कहीं आगम और शास्त्र के नियमों-आदेशों का उल्लंघन कर रहा है, और ऐसा उल्लंघन करके उसकी कभी सद्गति नहीं हो सकती। वे कहते हैं कि इस विषय में निश्चिंत रहें, और वर्तमान समय में लोग इसी तरह अपनी दुर्गति कर भी रहे हैं।
वक्ता एक सामान्य नियम रखते हैं। तंत्र शास्त्र में जिन चीज़ों का प्रयोग मुक्त होने के लिए बताया गया है, वे कहते हैं, यदि कोई व्यक्ति उन चीज़ों का प्रयोग अपने स्वाद की संतुष्टि के लिए, भोग की संतुष्टि के लिए कर रहा है, तो वह कहीं न कहीं आगमतांत्रिक शास्त्रोक्त विधि-विधानों का समूह (जैसे शिवागम), जो पूजा के नियम निर्धारित करता है, यह भी कि बलि कहाँ व कैसे विहित है — मात्र स्वाद या भोग हेतु इसके नियमों का उल्लंघन किसी भी उच्च आध्यात्मिक प्राप्ति को असंभव बना देता है। और शास्त्र में दिए गए नियमों और आदेशों का उल्लंघन कर रहा है। ऐसा उल्लंघन करके, वे कहते हैं, उस व्यक्ति की कभी सद्गतिदिवंगत प्राणी की शुभ गति, जो पितृ कर्म और तर्पण का उद्देश्य है। नहीं हो सकती; इस विषय में निश्चिंत रहें। वे जोड़ते हैं कि आज के समय में, वर्तमान परिप्रेक्ष्य में, यह हो भी रहा है, और लोग दुर्गति ही कर रहे हैं।
तंत्र और उसके पीठ गुप्त क्यों रखे गए और शाक्त अपनी साधना क्यों नहीं दिखाते
जितना लोग देखेंगे, उतनी निंदा, उतनी सबकी हानि
वक्ता कहते हैं कि लोगों की दुर्गति देखकर बाकी लोग चिंतित होते हैं कि गलत विषय हो रहा है; पर जो यथार्थ विषय के अनुसार चले उसके लिए यह कभी नहीं होता, और इसीलिए तंत्र का विषय गुप्त कहा गया है और तंत्र के पीठ गुप्त रखे गए हैं। वे कहते हैं कि शाक्त का मार्ग शांत, सौम्य, भीतर रहने का मार्ग है: शाक्त एक्सट्रोवर्ट नहीं होते, दिखाते नहीं, क्योंकि जितना लोग देखेंगे उतनी निंदा करेंगे, और हानि शाक्तों से अधिक उन्हीं लोगों की होगी। वे श्रोताओं से कहते हैं कि ऐसी निंदा के विषयों से बचिए।
वक्ता कहते हैं कि जब लोग इस तरह दुर्गति करते हैं तो बाकी लोग देखकर चिंतित होते हैं: "अरे ऐसा हो रहा है, यह गलत विषय है।" पर जो यथार्थ विषय के अनुसार चले, वे कहते हैं, उसके साथ ऐसा कभी नहीं होता। इसीलिए, वे कहते हैं, तंत्र का विषय गुप्त कहा गया है, और इसीलिए तंत्र के पीठ गुप्त रखे गए हैं। शाक्तउस परंपरा से संबंधित जो शक्ति को परम तत्त्व मानती है। का मार्ग, वे कहते हैं, शांत, सौम्य, भीतर रहने का मार्ग है। ये एक्सट्रोवर्ट नहीं होते; ये दिखाते नहीं हैं। क्योंकि यदि ये दिखेंगे तो लोग जितना जानेंगे उतनी निंदा करेंगे, और लोगों की हानि अधिक होगी। शाक्तों की तो होगी ही, वे कहते हैं, पर लोगों की और भी अधिक होगी। इसीलिए वे श्रोता से कहते हैं कि इन निंदा करने के विषयों से बचिए।
शाक्त पीठ पर अधिकार केवल शाक्तों का
किसी का आहार छीनने का अधिकार किसी को नहीं
वक्ता कहते हैं कि किसी का भोजन, किसी का आहार छीनने का अधिकार किसी को नहीं है। मुख्य विषय, वे कहते हैं, यही है कि मनुष्य देवताओं को तर्पित करे, पूजित करे, संतुष्ट करे, और देवता मनुष्य की कामनाओं की पूर्ति करें; इसका विधान सबके नियम और परंपरा के अनुसार अलग-अलग है, अपनी परंपरा के नियम से चलना चाहिए, और इसमें किसी का विरोध या रोक नहीं होनी चाहिए। वे कहते हैं कि शाक्त पीठ पर शाक्तों का अधिकार होना चाहिए, न वैष्णवों का, न बौद्धों का, न किसी अन्य अधर्मियों का; जहाँ जो विषय चला आ रहा है, वहाँ उसी प्रकार चलना चाहिए।
प्राचीन बलि-परंपरा में हस्तक्षेप करने वाले सुधारकों को चेतावनी
जहाँ शिव का दूध से अभिषेक है, वहाँ कोई रक्त नहीं माँगता
वक्ता कहते हैं कि जिन्हें दर्शन-सिद्धांत बहुत अच्छा लगता है और जो कहते हैं कि हम आज लोगों के भीतर सुधार करना चाहते हैं, उनकी मानसिकता पहले देख लीजिए; वे खुद ही दुर्बुद्धि, मलबुद्धि दिखाई देंगे, तो दूसरों का क्या करेंगे। आधा विषय इधर का और आधा कहीं और का लेकर नहीं चला जा सकता, वे कहते हैं; ऐसा करके इन चीज़ों को रोकने से पूरे भारतवर्ष के समस्त पीठों की शक्तियों का कोप ही मिलेगा, भला कुछ नहीं होगा। उनकी तुलना: जहाँ शिव का दूध से अभिषेक होता है वहाँ कोई रक्त से अभिषेक की माँग नहीं कर सकता, वैसे ही जहाँ बलि का मंडप दीर्घ काल से बना है, पुराणों में व्याख्या है, तंत्र के आगम में वर्णन है, पद्धतियाँ और akhara चल रहे हैं, वहाँ किसी को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए, नहीं तो शक्तियों, अपने लोक-देवताओं और कुल-शक्तियों के कोप का भाजन बनना पड़ता है।
वक्ता उन लोगों को संबोधित करते हैं जिन्हें दर्शन-सिद्धांत बहुत अच्छा लगता है और जो कहते हैं, "हम आज के समय में लोगों के भीतर सुधार करना चाहते हैं।" ऐसे लोगों की मानसिकता पहले देख लीजिए, वे कहते हैं; उनके विषयों को परख लीजिए। वे खुद ही दुर्बुद्धि, मलबुद्धि दिखाई दे देंगे; दूसरों का वे क्या करेंगे? आधा विषय इधर का सुनकर और आधा विषय कहीं और का लेकर, वे कहते हैं, नहीं चला जा सकता। ऐसे में, वे कहते हैं, पूरे भारतवर्ष के समस्त पीठों की जो शक्तियाँ हैं, उन सबका जो सामर्थ्य है, इन सब चीज़ों को रोकने पर कहीं न कहीं उनका कोप-भाजन ही आपको मिलने वाला है। उससे कुछ भला नहीं होने वाला। वे एक तुलना देते हैं। जहाँ भगवान शिव का अभिषेकजल और अन्य निर्धारित द्रव्यों से देवता की प्रतिमा या प्रतीक का विधिवत स्नान कराना। दूध से होता है, वहाँ ऐसा नहीं है कि कोई बोले "नहीं, हम रक्त से अभिषेक करेंगे"; सामर्थ्य हो तो अपने रक्त से करो, वे कहते हैं। उसी प्रकार जहाँ बलि का मंडप बना है, दीर्घ काल से चला आ रहा है, पुराणों में उसकी व्याख्या है, तंत्र के आगमतांत्रिक शास्त्रोक्त विधि-विधानों का समूह (जैसे शिवागम), जो पूजा के नियम निर्धारित करता है, यह भी कि बलि कहाँ व कैसे विहित है — मात्र स्वाद या भोग हेतु इसके नियमों का उल्लंघन किसी भी उच्च आध्यात्मिक प्राप्ति को असंभव बना देता है। ग्रंथों में उस विषय का वर्णन है, पद्धतियाँ चल रही हैं, akhara चल रहे हैं, वहाँ किसी को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। उचित नहीं होता, वे कहते हैं, और शक्तियों का, अपने लोक-देवताओं का, अपनी कुल-शक्तियों का, सबके कोप का भाजन बनना पड़ता है।
अपने बनाए स्थान या घर में बलि, काली के नाम पर भी, घृणित है
स्वतंत्र रूप से सिद्ध की गई मसानिक शक्ति को काली माई कहना
वक्ता कहते हैं कि जब कोई व्यक्ति स्वतंत्र रूप से तंत्र-विद्या सीखकर कोई पैशाचिक, तामसिक या मसान शक्ति स्वतंत्र रूप से सिद्ध कर लेता है और उसके निमित्त, उसे काली माई बोलकर या किसी बाबा से बोलवाकर, अपने स्थान पर उसका बलि-पूजन करवाता है, तो वह भी घृणित है। उसके माध्यम से, वे कहते हैं, उसकी कुल-परंपरा में दिक्कत होगी, और जो लोग वहाँ पूजा देंगे उन्हें भी दिक्कत हो सकती है। वे कहते हैं कि ऐसे स्थानों पर बलि के लिए वे स्वयं मना करते हैं; पीठों की, सिद्ध पीठ और शाक्त पीठों की बात अलग है, पर किसी के निज स्थान पर ऐसी बलि हो रही है, आपके घर में कोई आकर बलि दे रहा है और फिर बैठकर खा रहा है, तो यह कहीं न कहीं आपको डुबाने वाला होता है।
वक्ता अंत में निज स्थान वाले मामले पर आते हैं। कोई भी व्यक्ति, वे कहते हैं, जो स्वतंत्र रूप से तंत्र-विद्या सीखकर कोई पैशाचिक शक्ति, कोई तामसिक शक्ति, मसान शक्ति स्वतंत्र रूप से सिद्ध कर लेता है, और उसके निमित्त, काली माई बोलकर, चाहे कोई भी बाबा बोलकर, अपने स्थान पर उसका बलि-पूजन करवाता है, वह भी घृणित होने वाला है। उसके माध्यम से, वे कहते हैं, उसकी कुल-परंपरा में दिक्कत होगी, और जो लोग वहाँ पूजा देंगे उन्हें भी दिक्कत हो सकती है। सबका विषय अपना स्वतंत्र हो सकता है, वे कहते हैं, पर वहाँ दिक्कत होगी। ऐसे स्थानों पर बलि के लिए, वे कहते हैं, "हम भी मना करते हैं": ऐसी जगहों पर बलि आदि न दिया करें। पीठों की बात अलग है, सिद्ध पीठ और शाक्तउस परंपरा से संबंधित जो शक्ति को परम तत्त्व मानती है। पीठों की बात अलग है। लेकिन किसी के निज स्थान पर ऐसी बलि हो रही है, आपके घर में कोई आकर बलि दे रहा है और फिर बैठकर खा रहा है, तो यह कहीं न कहीं आपको डुबाने वाला होता है।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।