पंचानन, अष्टमूर्ति और अर्धनारीश्वर — वे तीन स्वरूप, जिनके बिना सृष्टि नहीं होती

शिव महापुराण का एक सत्र, भगवान शिव के पाँच तांत्रिक स्वरूपों पर।

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01

शिव महापुराण का अगला चरण क्यों आरंभ किया जा रहा है

स्वरूप को जानने से पहले से चल रहे जप में प्रगाढ़ता आती है

· 01:15–02:20

वक्ता कहते हैं कि शिव महापुराण के इस अगले चरण को सुनकर अब तक आप जो जप-तप करते आए हैं उसमें बहुत प्रगाढ़ता बढ़ जाएगी — क्योंकि हर स्वरूप का अपना विशेष महत्व है और अपना फल है, वह सब यहाँ जानने को मिलेगा। विभिन्न अवतारों की चर्चा रहेगी, और भक्तों की कथाओं को सुनकर-देखकर मनोबल भी ऐसे ही बढ़ता है।

02

कथा आरंभ करने से पहले किन गणपति का स्मरण किया जाता है?

श्री महागणपति, हर विनायक विग्रह के अधिपति

· 02:21–03:12 · Also a question

श्री महागणपति, जिनकी दस भुजाएँ हैं और जो एकादश रुद्र विनायक तथा छप्पन विनायकों के अधिपति हैं। हर अवतार और हर स्वरूप के साथ गणपति जी का अलग तांत्रिक विग्रह है, और उन सबके राजा महागणपति ही हैं; उनके स्मरण मात्र से हर विनायक प्रसन्न हो जाते हैं और हर अशुभ कार्य शुभ हो जाता है।

03

रुद्र संहिता का आरंभ करने वाला प्रश्न कौन पूछते हैं?

शौनक जी सूत जी से पूछते हैं, सूत जी नंदीश्वर जी को दोहराते हैं

· 03:13–04:02 · Also a question

शौनक जी सूत जी से कहते हैं कि भगवान शिव के उन विभिन्न अवतारों के विषय में बताइए जिन्हें ग्रहण करके शिव जी ने अनेक सज्जन व्यक्तियों का कल्याण किया। सूत जी कहते हैं कि इंद्रियों को वश में करके, मन लगाकर, भक्तिपूर्वक इन कथाओं को सुनिए — और वे वही कह रहे हैं जो पूर्वकाल में सनत कुमार जी के पूछने पर नंदीश्वर जी ने कहा था।

04

कल्प कितने हैं, और इस समय हम किस कल्प में हैं?

कल्प अनेक हैं; यह श्वेतवाराह कल्प है

· 04:03–04:22 · Also a question

नंदीश्वर जी कहते हैं कि कल्प विविध हैं, अनेक हैं। अभी हम लोग श्वेतवाराह कल्प में हैं। ऐसे अनेक कल्पों में भगवान शिव ने अनेक प्रकार के अवतार लिए, असंख्य अवतार लिए — फिर भी उनमें से कुछ का वर्णन वे अपनी बुद्धि के अनुसार कर रहे हैं।

नंदीश्वर जी कहते हैं कि कल्प विविध हैं — वे अनेक हैं। अभी हम लोग श्वेतवाराह कल्प में हैं। ऐसे अनेक कल्पों में भगवान शिव ने अनेक प्रकार के अवतार लिए, असंख्य अवतार लिए। फिर भी उनमें से, वे कहते हैं, अपनी बुद्धि के अनुसार कुछ का मैं वर्णन कर रहा हूँ।

05

मंदिर के चारों ओर का शिव क्षेत्र क्या है, और उसे जानना क्यों आवश्यक है?

सौ धनुष की त्रिज्या, और वहाँ कौन-सा स्वरूप अधिपति है

· 04:23–05:30 · Also a question

वक्ता अपने पिछले लाइव की ओर संकेत करते हैं, जिसमें पाँच तांत्रिक विग्रहों और शिव क्षेत्र की चर्चा हुई थी — वह क्षेत्र जो शिवलिंग या शिव मंदिर के पास से सौ धनुष की त्रिज्या में होता है। उसे जान लेने पर, वे कहते हैं, एक-एक पग पर पता चलता है कि आप किस क्षेत्र में जा रहे हैं, वहाँ किसकी दृष्टि पड़ती है और वहाँ कौन-सा स्वरूप अधिपति है।

06

पंचाक्षरी मंत्र वास्तव में किस चीज़ से बना है?

पाँच अक्षर, पाँच कल्प, पाँच अवतारों का सायुज्य रूप

· 05:31–07:04 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि जिस पाँच अक्षर के मंत्र का आप जप करते हैं — अधिकार के अनुसार चाहे "नमः" बाद में लगाइए या पहले — वह भगवान के पाँच कल्पों में हुए पाँच प्रमुख अवतारों का सायुज्य रूप है। पंचानन स्वरूप ही भगवान शिव का मूल स्वरूप है, परब्रह्म परमेश्वर का स्वरूप है।

07

उन्नीसवाँ कल्प श्वेत लोहित, जिसमें प्रथम अवतार सद्योजात हुआ

श्वेत लोहित कल्प और प्रथम अवतार सद्योजात

· 07:05–07:25

उन्नीसवें कल्प का नाम श्वेत लोहित है। उसी कल्प में भगवान शिव का प्रथम अवतार हुआ — सद्योजात अवतार। उस कल्प में ब्रह्मा जी उत्पन्न हो चुके हैं, प्रस्तुत हैं, और वे ब्रह्म के ध्यान में अवस्थित हैं।

नंदीश्वर जी इनमें से पहले कल्प की बात करते हैं — उन्नीसवाँ कल्प, जिस कल्प का नाम श्वेत लोहित है। उस कल्प में, जानना चाहिए, भगवान शिव का प्रथम अवतार हुआ है: सद्योजात अवतार। उस कल्प में ब्रह्मा जी उत्पन्न हो चुके हैं, ब्रह्मा जी प्रस्तुत हैं, और वे ब्रह्मा जी ब्रह्म के ध्यान में अवस्थित हैं।

08

ब्रह्मा जी और ब्रह्म में क्या अंतर है?

ब्रह्मा जी परब्रह्म परमेश्वर के अंश हैं

· 07:26–07:44 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि परब्रह्म परमेश्वर ही ब्रह्म हैं; ब्रह्मा जी उनके अंश हैं — वह स्वरूप, जिसे यह उत्तरदायित्व सौंपा गया कि आप सृष्टि का सृजन कीजिए, सृष्टि को उत्पन्न कीजिए।

09

सद्योजात स्वरूप किस प्रकार प्रकट हुआ?

ब्रह्मा जी की शिखा से श्वेत-लोहित वर्ण का कुमार

· 07:45–08:32 · Also a question

जब ब्रह्मा जी परब्रह्म के ध्यान में अवस्थित थे, तब उन्हीं की शिखा से श्वेत और लोहित वर्ण वाला एक कुमार उत्पन्न हुआ। ब्रह्मा जी देखते ही पहचान गए कि ये ब्रह्म स्वरूप ईश्वर हैं, और हाथ जोड़कर प्रणाम किया। उस कल्प में प्रकट हुए भगवान शिव के इस स्वरूप का नाम सद्योजात है।

10

ब्रह्मा जी ने सद्योजात शिव की स्तुति किस मंत्र से की?

सद्योजात प्रपद्यामि — सद्योजात शिव की स्तुति का मंत्र

· 08:33–09:02 · Also a question

सद्योजात प्रपद्यामि आदि मंत्र से ब्रह्मा जी ने भगवान शिव की स्तुति की और उसी का जप किया।

तो यहाँ सद्योजात शिव के लिए भगवान ब्रह्मा जी ने सद्योजात प्रपद्यामि आदि मंत्र से भगवान शिव की स्तुति की, और उसी का जप किया।

11

पंचानन मंत्रों के विनियोग और न्यास तंत्रों में स्वतंत्र रूप से दिए गए हैं

विनियोग और न्यास तंत्र में स्वतंत्र रूप से

· 09:03–09:11

वक्ता कहते हैं कि और भी वर्णन मिलता है — कितना जप किया गया, और उसका पूरा विनियोग-न्यास कैसा है; वह तंत्र में, महाकाल तंत्र आदि में स्वतंत्र रूप से दिया गया है।

और भी वर्णन मिलता है, वक्ता कहते हैं, जिसमें बताया गया है कि कितना जप किया गया, और उसका पूरा विनियोग तथा न्यास कैसे हैं। वह तंत्र में स्वतंत्र रूप से है — महाकाल तंत्र आदि में उसका वर्णन है। वह भी उपलब्ध है।

12

श्वेत लोहित कल्प में ब्रह्मा जी की सहायता के लिए सुनंदन, नंदन, विश्वनंदन और उपनंदन उत्पन्न हुए

सुनंदन, नंदन, विश्वनंदन और उपनंदन

· 09:12–09:39

जब ब्रह्मा जी ने सद्योजात प्रपद्यामि मंत्र से सद्योजात शिव की स्तुति-पूजा और ध्यान किया, तब सृष्टि के कार्य में सहयोग के लिए परब्रह्म परमेश्वर के स्वरूप वाले श्वेत वर्ण के अनेक कुमार उत्पन्न हुए। उनके नाम सुनंदन, नंदन, विश्वनंदन और उपनंदन थे।

13

एक पूरा कल्प पंचानन के एक ही मुख में स्थित है — वह सद्योजात स्वरूप, जो ब्रह्मा जी के सृष्टि न कर पाने पर धारण हुआ

एक पूरा कल्प पंचानन का एक मुख है

· 09:40–10:05

उन्नीसवें कल्प में, जिसका नाम श्वेत लोहित है, ब्रह्मा जी के स्तुति करने पर और सृष्टि की रचना में समर्थ न होने पर भगवान शिव ने अपना प्रथम स्वरूप — सद्योजात — धारण किया। वक्ता कहते हैं, सोचिए: एक पूरे कल्प का सारा स्वरूप भगवान पंचानन के एक ही रूप में स्थित है।

14

उत्पन्न हुए गण और कुमार शिव जी के शिष्य हुए और ब्रह्मलोक में रहे, उन्हीं के सहयोग से ब्रह्मा जी को सृष्टि उत्पन्न करनी थी

ब्रह्मलोक में शिव जी के शिष्य, और सृष्टि का सामर्थ्य

· 10:06–10:32

जो प्रमुख गण और कुमार उत्पन्न हुए थे, वे सभी शिव जी के शिष्य हुए और ब्रह्मलोक में उनकी उपस्थिति हुई। उनके सहयोग से शिव जी ने ब्रह्मा जी को यह ज्ञान दिया कि इनकी सहायता से आप सृष्टि उत्पन्न करिए, और उसे उत्पन्न करने का सामर्थ्य भी दिया।

उसके पश्चात, वक्ता कहते हैं, जो प्रमुख गण उत्पन्न हुए, जो कुमार उत्पन्न हुए, वे सभी उनके शिष्य हुए और ब्रह्मलोक में उनकी उपस्थिति हुई। उनके सहयोग से भगवान शिव जी ने ब्रह्मा जी को यह ज्ञान दिया — कि इनके सहयोग से आप सृष्टि उत्पन्न करिए — और उसको उत्पन्न करने का सामर्थ्य भी दिया। यह एक कल्प में।

15

पंचाक्षरी के एक निश्चित जप से ब्रह्मा जी का पद प्राप्त होने का वर्णन

इतना जप, जिससे ब्रह्मा जी का पद मिले

· 10:33–10:54

वक्ता शिव पुराण के आरंभ में हुई पंचाक्षरी की महिमा की चर्चा याद दिलाते हैं, जिसमें वर्णन आया था कि कितने पंचाक्षरी जप कर लेने से ब्रह्मा जी का पद प्राप्त हो जाता है — और साथ में सृष्टि की रचना करने का उत्तरदायित्व भी मिलता है।

16

बीसवाँ कल्प रक्त, और उसमें प्रकट हुए रक्त वर्ण के परब्रह्म

रक्त कल्प और रक्त वर्ण के परब्रह्म

· 10:55–11:23

बीसवें कल्प का नाम रक्त है। उसमें ब्रह्मा जी ने रक्त वर्ण धारण किया, जबकि पिछले श्वेत लोहित कल्प में उन्होंने श्वेत रूप धारण किया था। इस बार भी जब वे सृष्टि की रचना में समर्थ नहीं हुए, तब परब्रह्म परमेश्वर पुनः प्रकट हुए — रक्त नेत्र वाले, रक्त वर्ण की माला और रक्त वस्त्र से सुसज्जित।

17

सद्योजात और वामदेव का ध्यान किस वर्ण में करना चाहिए?

सद्योजात के लिए श्वेत, वामदेव के लिए रक्त वर्ण

· 11:24–11:56 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि जिस स्थान पर बैठकर आप सद्योजात स्वरूप का ध्यान-पूजन करेंगे, उस समय आपको श्वेत वर्ण के शिव जी का ध्यान करना है। और जब आप वामदेव शिव नामक स्वरूप का ध्यान करेंगे, तब वे रक्त वर्ण के हैं — भगवान शिव लाल वर्ण का वस्त्र पहने हैं, लाल वर्ण की माला है, नेत्र भी लाल हैं और आभूषण भी लाल; ऐसे कुमार स्वरूप में वे उत्पन्न हुए हैं।

18

रक्त कल्प में विरजा, विवाह, विशोक और विश्वभावन उत्पन्न हुए, और वामदेव ने सृष्टि की शक्ति दी

विरजा, विवाह, विशोक और विश्वभावन

· 11:57–12:25

ब्रह्मा जी ने हाथ जोड़कर उस रक्त वर्ण के स्वरूप को प्रणाम किया, जिनका नाम वामदेव शिव है। उनके कृपा करने के पश्चात पुनः चार पुत्र उत्पन्न हुए — ब्रह्मा जी के मानसिक पुत्र, जिनके नाम विरजा, विवाह, विशोक और विश्वभावन हैं। वामदेव शिव ने ही ब्रह्मा जी को ज्ञान दिया और सृष्टि उत्पन्न करने की शक्ति भी पुनः प्रदान की।

19

इक्कीसवाँ कल्प पीतवासा, और पीतांबर धारी शिव

पीतवासा कल्प और पीतांबर वस्त्रधारी शिव

· 12:26–12:48

इक्कीसवें कल्प का नाम पीतवासा है। इस कल्प में ब्रह्मा जी पीत वर्ण के हैं और पीत वस्त्र धारण करते हैं। इस समय भी जब वे सृष्टि की रचना में समर्थ नहीं हुए, तो पुनः इसी कामना से ध्यान किया — तब भगवान शिव पीतांबर वस्त्रधारी, महातेजस्वी, महाबाहु स्वरूप में अवतरित हुए।

इक्कीसवें कल्प में, जिसका नाम पीतवासा कल्प है, इस कल्प में भी ब्रह्मा जी पीत वर्ण के हैं और पीत वस्त्र धारण करते हैं। इस समय भी जब वे सृष्टि की रचना में समर्थ नहीं हुए, तो पुनः इसी कामना से उन्होंने ध्यान किया। तब भगवान शिव पीतांबर वस्त्रधारी, महातेजस्वी, महाबाहु स्वरूप में अवतरित हुए।

20

शिव गायत्री के जप में किस स्वरूप का ध्यान किया जाता है?

तत्पुरुषाय विद्महे के लिए स्वर्ण जैसे पीत वर्ण के तत्पुरुष

· 12:49–13:11 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि यह पीतांबर स्वरूप ही तत्पुरुष स्वरूप है। जो भगवान शिव के गायत्री मंत्र तत्पुरुषाय विद्महे आदि का जप करते हैं, उन्हें उस समय तत्पुरुष शिव का ध्यान करना चाहिए: पीत वर्ण के शिव जी, पीत वस्त्र, पीत माला — पीला वस्त्र, पीली माला, स्वर्ण के समान पीला स्वरूप — ऐसे स्वरूप का ध्यान करते हुए जप करना चाहिए।

21

पीतवासा कल्प में तत्पुरुष शिव ने दिव्य कुमार प्रकट किए और सृष्टि का सामर्थ्य दिया

दिव्य कुमार और पुनः सृष्टि रचना का सामर्थ्य

· 13:12–13:37

भगवान ब्रह्मा जी ने इस शिव गायत्री मंत्र का अनेकानेक जप किया। उससे प्रसन्न होकर भगवान शिव ने यहाँ भी अनेक दिव्य कुमार प्रकट किए, और उस कल्प के तत्पुरुष शिव ने सृष्टि की रचना के लिए सामर्थ्य प्रदान किया।

इस समय, जब भगवान शिव तत्पुरुष स्वरूप में प्रकट हुए, तब भगवान ब्रह्मा जी ने पुनः इस शिव गायत्री मंत्र का अनेकानेक जप किया। उससे भगवान शिव ब्रह्मा जी पर प्रसन्न होकर यहाँ भी अनेक दिव्य कुमार प्रकट किए। और शिव जी ने — उस कल्प के तत्पुरुष शिव जी ने — सृष्टि की रचना के लिए सामर्थ्य प्रदान किया।

22

रक्त और श्वेत लोहित कल्प के मंत्र पुनः बताए जाते हैं

वामदेव का मंत्र और सद्योजात का मंत्र

· 13:38–13:56

वक्ता उन्हें पुनः बताते हैं। रक्त कल्प में, जिसमें ब्रह्मा जी ने तपस्या की, प्रमुख मंत्र वामदेव शिव का मंत्र रहा है: वामदेवाय नमः श्रेष्ठाय नमः जेष्ठाय नमः। उससे पहले, जब भगवान का स्वरूप सद्योजात था, तब मंत्र सद्योजात प्रपद्यामि रहा है।

23

शिव नामक कल्प, जिसमें सारा जगत जलमग्न था और ब्रह्मा जी दुखी हुए

बाईसवाँ कल्प, जलमग्न जगत और ब्रह्मा जी का दुख

· 13:57–14:29

इस क्रम में चौथा कल्प शिव नामक कल्प है। उसमें हज़ारों दिव्य वर्ष बीत गए और सारा जगत जलमग्न हो गया था। ब्रह्मा जी सृष्टि नहीं कर पा रहे थे, दुखी होकर सोचने लगे। वक्ता पहले इसे इक्कीसवाँ कहते हैं और फिर स्वयं सुधार करते हैं कि यह बाईसवाँ कल्प है।

24

अघोर स्वरूप के वर्णन से पहले सावधानी — यही स्वरूप सबसे अधिक भ्रांति और दुरुपयोग का विषय है

अघोर स्वरूप के प्रति आकर्षण, भ्रांति और अनाधिकृत प्रयोग

· 14:30–14:45

वक्ता कहते हैं कि यह सबसे प्रमुख स्वरूप है, और इस स्वरूप के प्रति सभी का आकर्षण बढ़ा रहता है। इस स्वरूप को लेकर अनेक प्रकार की भ्रांतियाँ भी हैं, और लोग इसका गलत प्रयोग-दुरुपयोग भी करते हैं, अनाधिकृत रूप से भी प्रयोग करते हैं — जो, वे कहते हैं, नहीं करना चाहिए।

25

अघोर स्वरूप का वर्णन कैसा है?

कृष्ण वर्ण — काला वस्त्र, मुकुट, यज्ञोपवीत और चंदन

· 14:46–15:07 · Also a question

इस स्वरूप में दोनों कृष्ण वर्ण के हैं: ब्रह्मा जी भी कृष्ण वर्ण का स्वरूप धारण किए हैं और शिव जी भी यहाँ कृष्ण वर्ण वाले हैं, बहुत पराक्रमी, महा पराक्रमी। वे काला वस्त्र पहने हैं, मुकुट भी काला है, यज्ञोपवीत भी काला है, पगड़ी भी काली है, और कृष्ण वर्ण के ही सुगंधित चंदन का अनुलेपन किए हुए हैं। यही कृष्ण-पिंगल वर्ण युक्त अद्भुत स्वरूप अघोर स्वरूप है।

26

अघोरेभ्यो मंत्र, और उस स्वरूप से उत्पन्न चार कृष्ण वर्ण के महात्मा

अघोरेभ्यो मंत्र और चार कृष्ण वर्ण के महात्मा

· 15:08–15:42

उस स्वरूप को देखकर ब्रह्मा जी ने परब्रह्म के अघोर स्वरूप का ध्यान किया, और अघोर मंत्र अघोरेभ्योथ घोरेभ्यो अघोर अघोर तरेभ्य आदि से स्तुति की। उस तांत्रिक विग्रह के द्वारा कृष्ण वर्ण के भगवान शिव ने चार महात्माओं को उत्पन्न किया, जिनके नाम कृष्ण, कृष्ण सिख, कृष्णास्य और कृष्ण कंठद्रिक हैं।

27

पंचाक्षरी के पूजन में किन स्वरूपों का ध्यान करना चाहिए?

पाँचों स्वरूपों का ध्यान, और अपना स्तर धीरे-धीरे बढ़ाना

· 15:43–16:12 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि जब आप पंचाक्षरी मंत्र का पूजन करें, तो उसमें इन पाँचों स्वरूपों का ध्यान करें। जो जुड़े हुए हैं वे अपना-अपना स्तर धीरे-धीरे बढ़ाएँ; जो यथार्थ में साधक हैं और अब तक पंचाक्षरी का जप करते आ रहे हैं तथा पंचानन स्वरूप का ध्यान करते हैं, वे ध्यान दें।

28

चारों वर्णों का ध्यान किस क्रम में करना है?

सद्योजात श्वेत, वामदेव रक्त, तत्पुरुष पीत, अघोर कृष्ण

· 16:13–16:40 · Also a question

पहले श्वेत वर्ण में भगवान सद्योजात; उसके पश्चात रक्त वर्ण में वामदेव स्वरूप; तत्पश्चात भगवान शिव का तीसरा स्वरूप तत्पुरुष, जिसमें शिव गायत्री होती है, पीत वर्ण में; और फिर चौथा, अघोर स्वरूप, जिसमें कृष्ण वर्ण के शिव जी का ध्यान करेंगे।

29

विश्वरूप कल्प, जिसमें सरस्वती जी प्रकट हुईं और ईशान स्वरूप प्रकट हुआ

सरस्वती जी का प्राकट्य और ईशान स्वरूप

· 16:41–17:21

विश्वरूप नामक कल्प में ब्रह्मा जी ने पुनः शिव जी का ध्यान और स्तुति की। इस कल्प में भगवान शिव जी ने पहले सरस्वती जी को प्रकट किया; और फिर स्फटिक के समान कांति वाले, सभी आभूषणों से अलंकृत परमेश्वर भगवान शिव ईशान के रूप में प्रकट हुए। ईशान स्वरूप ने चार सुंदर बालकों को उत्पन्न किया और ब्रह्मा जी को सृष्टि उत्पन्न करने का सामर्थ्य भी प्रदान किया।

30

पाँच स्वरूप कौन-से हैं, और पंचाक्षर का अधिकार किसे है?

ब्रह्म संज्ञा वाली पाँच मूर्तियाँ और मंत्र का अधिकार

· 17:22–17:51 · Also a question

पाँच प्रमुख स्वरूप हैं — ईशान, तत्पुरुष, अघोर, वामदेव और सद्योजात। ये पाँच मूर्तियाँ ब्रह्म संज्ञा से इस जगत में प्रख्यात हैं, और इन्हीं पाँचों के एकत्रीकरण से पंचानन महादेव बनते हैं। इन पाँचों स्वरूपों में से हर स्वरूप के एक-एक अक्षर से पंचाक्षरी मंत्र बनता है — और इसके लिए, वक्ता कहते हैं, हर वर्ण का हर व्यक्ति और हर स्त्री अधिकृत है, केवल यह ध्यान रखते हुए कि नमः कैसे लगाना है, जिसका वर्णन कई बार किया जा चुका है।

31

पंचाक्षरी का फल गायत्री की तुलना में क्या है?

जिन्हें गायत्री का अधिकार नहीं, उनके लिए गायत्री समकक्ष फल

· 17:52–18:03 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि यह कोई सामान्य मंत्र और सामान्य विषय नहीं है। इसका फल गायत्री के समकक्ष है; जिनको गायत्री करने का अधिकार नहीं है, वे इसी मंत्र का जप करते हैं।

तो यह कोई सामान्य मंत्र और सामान्य विषय नहीं है, वक्ता कहते हैं। फल गायत्री के समकक्ष है। जिनको गायत्री करने का अधिकार नहीं है — वे इसी मंत्र का जप करते हैं।

32

पंचानन स्वरूपों की फल श्रुति क्या है?

नित्य वंदना से भोग और मोक्ष; कथा सुनने से परम गति

· 18:04–18:40 · Also a question

यहाँ फल श्रुति यह है कि अपने कल्याण की कामना करने वाला जो भी पुरुष हो, उसे शिव जी के इन पंचानन स्वरूपों की नित्य वंदना करनी चाहिए। इन पंचानन स्वरूपों की वंदना करने मात्र से भगवान शिव प्रसन्न होकर हर प्रकार का भोग और मोक्ष प्रदान करते हैं। और जो कोई सद्योजात आदि की उत्पत्ति की कथा सुनता या पढ़ता है, वह संपूर्ण भोगों को भोगकर परम गति को प्राप्त होता है।

33

कौन-सा अक्षर किस ब्रह्म को धारण करता है, यह जान लेने पर जन्म से सुनी हुई पंचाक्षरी बदल जाती है

परिचित मंत्र से लेकर यह जानने तक कि कौन-सा अक्षर किस ब्रह्म को धारण करता है

· 18:41–19:17

लोग पंचाक्षरी को जन्म से सुनते आए हैं — गाने में, भजन में — पर उसकी यथार्थ महिमा नहीं जानते: कौन-सा स्वरूप कैसे जुड़ा है, और एक-एक अक्षर ब्रह्म के एक-एक स्वरूप को कैसे धारण कर लेता है। यह सुन लेने पर, वक्ता कहते हैं, आपका इंटेंशन और क्लियर हो जाएगा, समर्पण और बढ़ जाएगा; और जब आप आसन पर बैठकर इन पाँच स्वरूपों का ध्यान करेंगे तो आपका मंत्र मन से जुड़कर और भी विराट रूप धारण करेगा।

34

भूत-प्रेत की सिद्धियों के पीछे भटकने की जगह स्वयं भूतेश्वर को सिद्ध क्यों न करें?

आप साक्षात भूतेश्वर के लिए अधिकृत हैं — फिर कहाँ भटक रहे हैं

· 19:18–19:56 · Also a question

वक्ता कहते हैं, अंतर देख लीजिए: इन पाँच स्वरूपों की इतनी महिमा है और ये इतने सामर्थ्यवान हैं कि सृष्टि उत्पन्न करने की क्षमता देते आए हैं — इनके बिना सृष्टि की रचना ही नहीं — और ऐसे स्वरूप के लिए आप अधिकृत हैं। फिर आप भूत, प्रेत, पिशाचों के लिए कहाँ यहाँ-वहाँ भटक रहे हैं, यह सिद्धि कर लो, वह सिद्धि कर लो? साक्षात भूतेश्वर को ही सिद्ध कीजिए, उनकी शरण में रहिए; शास्त्र में लिखे विषय से कभी मत भागिए।

35

आठ मूर्तियों का शुक्राचार्य और महामृत्युंजय से क्या संबंध है?

काशी में शुक्राचार्य की स्तुति और महामृत्युंजय के पीछे की कृपा

· 19:57–20:33 · Also a question

वक्ता याद दिलाते हैं कि कुछ ही दिन पहले इसी श्रावण मास में चर्चा हुई थी कि शुक्राचार्य ने वाराणसी के अभिमुक्त क्षेत्र में, काशी में महामृत्युंजय मंत्र का सामर्थ्य प्राप्त किया, और उस समय उन्होंने आठों स्वरूपों की स्तुति की थी। महामृत्युंजय की पूर्ण सफलता, वे कहते हैं, शुक्राचार्य और उस अष्टमूर्ति शिव की कृपा के बिना संभव नहीं है — जो आज के समय में स्किप्ड है।

36

यह कथा केवल स्वाध्याय के लिए प्रेरित करने को चल रही है, यह व्यास गद्दी की कथा नहीं है

व्यास गद्दी की कथा नहीं, स्वाध्याय की प्रेरणा

· 20:34–21:11

वक्ता कहते हैं कि शिव महापुराण की यह कथा केवल इसलिए चल रही है कि लोग स्वयं स्वाध्याय करने को प्रेरित हों। यह व्यास गद्दी की कोई कथा नहीं है — इसमें वैसे नीति-नियम और वैसी मर्यादा नहीं है, इसीलिए व्यास गद्दी की कथा तो रात्रि काल में हो ही नहीं सकती। यह केवल सनातन धर्म को जागरूक करने के लिए है, और वे कहते हैं कि भगवद गीता के एकादश अध्याय का माहात्म्य पढ़ लीजिए, तब पता चलेगा कि वे इतना प्रयास क्यों करते हैं।

37

भगवान शिव की आठ मूर्तियाँ कौन-सी हैं?

सर्व, भव, रुद्र, उग्र, भीम, पशुपति, ईशान, महादेव

· 21:12–21:24 · Also a question

भगवान शिव की प्रमुख आठ मूर्तियाँ, अष्टमूर्ति शिव, ये हैं — सर्व, भव, रुद्र, उग्र, भीम, पशुपति, ईशान और महादेव।

भगवान शिव की जो प्रमुख आठ मूर्तियाँ हैं, अष्टमूर्ति शिव हैं, वे हैं — सर्व, भव, रुद्र, उग्र, भीम, पशुपति, ईशान और महादेव। ये आठ मूर्तियाँ हैं।

38

वे डेडिकेटेड कथाकार नहीं हैं, इसलिए कहते हैं कि उनके कहने पर निर्भर रहने की जगह स्वयं स्वाध्याय कीजिए

डेडिकेटेड कथाकार नहीं; स्वाध्याय स्वयं कीजिए

· 21:25–21:51

वे कहते हैं कि अनेकानेक मंत्र, पाठ, जप और सब कुछ करने के पश्चात भी इस समय अस्थिरता ही रहती है — कि यह न छूट जाए, वह न छूट जाए। हम डेडिकेटेड कथाकार तो नहीं हैं, वे कहते हैं, तो मुझसे 19-20 हो सकता है; आप स्वाध्याय करके इसको और अच्छे से समझिएगा।

39

आठ मूर्तियाँ किन आठ तत्वों का प्रतिनिधित्व करती हैं?

पाँच महाभूत, क्षेत्रज्ञ, सूर्य और चंद्रमा

· 21:52–22:22 · Also a question

ये आठ मूर्तियाँ आठ तत्वों का प्रतिनिधित्व करती हैं: उनमें भूमि, जल, अग्नि, पवन और आकाश तो हैं ही; इसके सिवाय छठा स्वरूप पशुपतिनाथ का है, और वह पशुपति स्वरूप इस पूरे संसार के समस्त क्षेत्र का क्षेत्रज्ञ है; ईशान स्वरूप सूर्य का है; और महादेव चंद्रमा के हैं। या यह कह लीजिए, वक्ता कहते हैं, कि वही इन रूपों में उपस्थित हैं।

40

पहली सात मूर्तियों में से हर एक का कार्य

सर्व धारण करते हैं, भव जीवन देते हैं, रुद्र भरण-पोषण करते हैं, उग्र सामर्थ्य देते हैं

· 22:23–23:06

अष्टमूर्ति में से पहला, सर्व, समस्त विश्व को धारण करता है। भव समस्त संसार को जीवन प्रदान करते हैं। रुद्र भरण-पोषण करते हैं। उग्र भरण-पोषण के पश्चात उनमें सामर्थ्य देते हैं। भीम सभी को सुख देने वाले हैं, हर जगह उपस्थित रहते हैं, अवकाश देते हैं, और पंच महाभूतों का भेदन करने वाले हैं। जो सभी क्षेत्रों का निवास स्थान हैं, उन सबके अधिपति पशुपति हैं। और ईशान समस्त जगत को प्रकाशित करते हैं।

41

आठवीं मूर्ति महादेव क्या हैं?

आठवाँ रूप ही आत्मा है

· 23:07–23:48 · Also a question

आठवीं मूर्ति महादेव को सबसे प्रमुख स्वरूप माना गया है: यह आठवाँ रूप ही आत्मा है। हमारे भीतर जो वह अंश है, भगवान शिव का वह कण, जिसके कारण हम बोल पा रहे हैं, चल पा रहे हैं — वही यह आठवाँ रूप है। इसीलिए कहा गया है कि समस्त चराचर जगत ही शिव का स्वरूप है।

42

जड़ में जल डालने से शाखाएँ पुष्ट होती हैं — संसार की सेवा ही अष्टमूर्ति शिव का पूजन है

जड़ को सींचने से शाखाएँ पुष्ट होती हैं

· 23:49–24:11

यहाँ कहा गया है कि जैसे वृक्ष के मूल में, जड़ में जल डाला जाए, सींचा जाए, तो उससे उसकी शाखाएँ पुष्ट होती हैं — उसी प्रकार यह समस्त संसार अष्टमूर्ति शिव का ही शरीर है। जब हम इनका शिवार्जन करते हैं, यानी संसार में सुख पहुँचाते हैं, तो इसी से शिव जी प्रसन्न होते हैं।

43

जैसे पुत्र-पौत्र के सुख से पिता और दादा प्रफुल्लित होते हैं, वैसे ही किसी प्राणी को सुख देने पर शिव प्रसन्न होते हैं

पुत्र के सौभाग्य पर प्रसन्न होते पिता और दादा

· 24:12–24:40

जिस प्रकार इस लोक में पुत्र-पौत्र आदि के प्रसन्न होने पर पिता प्रफुल्लित हो जाते हैं। आपकी नौकरी लग गई, आपका अच्छा विवाह हो गया, आप सुखी हो गए — तो आपके पिताजी, आपके दादाजी बड़े प्रसन्न होंगे कि मेरा बच्चा प्रसन्न है, मेरा कुटुंब प्रसन्न है, मेरा वंश प्रसन्न है। ठीक उसी प्रकार, जब यह संसार प्रसन्न होता है तो भगवान शिव प्रसन्न होते हैं।

44

किसी भी प्राणी को कष्ट देने पर क्या होता है?

किसी शरीरधारी को कष्ट देना अष्टमूर्ति शिव का ही अनिष्ट है

· 24:41–25:08 · Also a question

वक्ता यह पंक्ति उद्धृत करते हैं — कृते यस्य कस्यापि देहिनो यदि निग्रह — यदि किसी के द्वारा किसी भी शरीरधारी को कष्ट दिया जाता है, तो मानो अष्टमूर्ति शिव का ही अनिष्ट किया गया है; इसमें संशय नहीं है। शरीरधारी को कष्ट देना यानी उसी अष्टमूर्ति शिव को कष्ट देना है। और जब आप इस समस्त संसार के प्राणियों की सेवा करते हैं, तो उससे अष्टमूर्ति शिव ही प्रसन्न और संतुष्ट होते हैं।

45

उनका कहा हुआ उद्देश्य — शास्त्रोक्त बातें सरल रूप से रखना, भगवान शिव की सेवा के रूप में, किसी का मनोबल तोड़े बिना

शास्त्रोक्त बातें सरलता से, ताकि मनोबल न टूटे

· 25:09–25:54

वे कहते हैं कि मेरा उद्देश्य भी यही है — हम इस प्रकार से आपकी सेवा कर रहे हैं; और जब आपका मैसेज आता है कि हाँ भैया, हमने ऐसा किया तो यह हुआ, तो यह सब भगवान शिव की सेवा ही है। वे कहते हैं कि हम अन्य लोगों जैसे संत भी नहीं हैं, सिद्ध भी नहीं, सामर्थ्यवान भी नहीं; मनुष्य हैं, हमसे त्रुटि हो सकती है — लेकिन प्रयास यही रहता है कि बातें शास्त्रोक्त हों और सरल तरीके से रखी जाएँ, ताकि आपका मनोबल पुष्ट हो और आप टूटें नहीं।

46

नंदीश्वर जी अंत में कहते हैं कि अष्टमूर्ति रूप से सारे विश्व में व्याप्त रुद्र शिव का सर्व भाव से नित्य भजन सब मनुष्यों को करना चाहिए

रुद्र शिव का सर्व भाव से भजन; सब मनुष्यों के लिए नित्य उपासना

· 25:55–26:14

अष्टमूर्ति रूप से सारे विश्व को व्याप्त करके सर्वतो भावेन स्थित परम कारण रुद्र शिव का सर्व भाव से भजन कीजिए। नंदीश्वर जी कहते हैं कि मैंने भगवान शिव के आठ स्वरूपों का वर्णन किया; इनकी उपासना सब मनुष्यों को नित्य करनी चाहिए।

अष्टमूर्ति रूप से सारे विश्व को व्याप्त करके सर्वतो भावेन स्थित परम कारण रुद्र शिव — उनका सर्व भाव से भजन कीजिए। इस प्रकार यहाँ नंदीश्वर जी कहते हैं कि मैंने भगवान शिव के आठ स्वरूपों का वर्णन किया। इनकी उपासनाइष्ट देवता की निरंतर आराधना, जिसे साधक वर्षों तक नियमपूर्वक निभाता है। सब मनुष्यों को नित्य करनी चाहिए।

47

आठों रूपों को नाम देने वाला मूल श्लोक लिखकर दिया जा रहा है, ताकि नित्य पूजन के लिए कंठस्थ हो जाए

नित्य पूजन के लिए अष्टमूर्ति का मूल श्लोक

· 26:15–26:45

वक्ता कहते हैं कि पूरा पीडीएफ बन रहा है, जिसमें भगवान शिव का मूल श्लोक दिया जाएगा: सर्वो भवस्तथा रुद्रो गो भीमा पशुपति ईशानश्च महादेवो मृत्याश्च विश्रुता। यह इसलिए लिखकर दिया जा रहा है कि आप इसे कंठस्थ कर लें और नित्य पूजन में लाते जाएँ।

48

पाँच तांत्रिक विग्रहों और अष्टमूर्ति के आगे वह उत्तम स्वरूप है, जिसके बिना इस संसार की सृष्टि हो ही नहीं सकती

ब्रह्मा जी की समस्त मनोकामनाएँ पूर्ण करने वाला उत्तम स्वरूप

· 26:46–27:12

पाँच तांत्रिक विग्रहों और अष्टमूर्ति शिव के पश्चात वक्ता एक और, सबसे प्रमुख स्वरूप की ओर आते हैं, जिसके बिना इस संसार की सृष्टि नहीं हो सकती। नंदीश्वर जी कहते हैं कि अब हम ब्रह्मा जी की संपूर्ण मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाले शिव जी के सबसे उत्तम स्वरूप का वर्णन करेंगे; और वक्ता कहते हैं कि इससे पता चलता है कि आप जिस भी देवी-देवता की उपासना कर रहे हैं, उनसे आपका संबंध कैसा है।

49

देवता तो उत्पन्न हो चुके थे पर मनुष्यों की सृष्टि नहीं हुई थी, और प्रजा का विस्तार नहीं हो रहा था

देवता थे, मनुष्य नहीं; मैथुनी सृष्टि की आकाशवाणी

· 27:13–27:34

इससे पहले ब्रह्मा जी ने जो सृष्टि उत्पन्न की, उसमें देवता हो गए, वैसे सभी दिव्य स्वरूप उपस्थित हो गए, लेकिन मनुष्यों की सृष्टि नहीं हुई थी। ब्रह्मा जी के द्वारा उत्पन्न समस्त प्रजाओं का विस्तार नहीं हो रहा था, इससे उन्हें बड़ा दुख हुआ, वे बहुत व्याकुल हो गए। तब आकाशवाणी हुई कि आप मैथुनी सृष्टि कीजिए।

50

देवताओं में जिस प्रेम का वर्णन है, क्या वह मैथुनी सृष्टि ही है?

दिव्य देवताओं के प्रेम का वर्णन सांकेतिक है, मैथुनी नहीं

· 27:35–28:09 · Also a question

नहीं। वक्ता स्पष्ट रूप से कहते हैं कि दिव्य देवताओं का एक-दूसरे के प्रति प्रेम को लेकर जो भी आप पढ़ते हैं, वह सांकेतिक रहता है — उनकी सृष्टि मैथुनी सृष्टि नहीं है। मैथुनी सृष्टि अब उत्पन्न हो रही है, और यह मनुष्यों के निमित्त है। इसीलिए, वे कहते हैं, कहा जाता है कि गुरु के सान्निध्य में सुनिए, पढ़िए, जानिए; पार्वती गीता में भगवती ने इसे बहुत अच्छे से बताया है, और माया से विमोहित व्यक्ति जब इसे नहीं समझता तो देवताओं पर ही आक्षेप लगाता है।

51

स्त्रियों के होने से पहले ब्रह्मा जी ने शिव और पार्वती का संयुक्त ध्यान करते हुए तपस्या की

सृष्टि में स्त्री का हस्तक्षेप नहीं था; ब्रह्मा जी तप को उद्धत हुए

· 28:10–28:29

उस समय तक सृष्टि में स्त्री का हस्तक्षेप नहीं था — स्त्रियाँ थीं ही नहीं। जब ब्रह्मा जी ने समझा कि इसी कारण प्रजा की वृद्धि नहीं हो रही है, तब वे तप करने को उद्धत हुए, और भगवान शिव का तथा साथ में भगवती पार्वती का संयुक्त रूप से ध्यान करते हुए तपस्या करने लगे।

52

शिव जी ब्रह्मा जी के समक्ष अर्धनारीश्वर स्वरूप में — आधी नारी, आधे नर — प्रकट हुए

अर्धनारीश्वर स्वरूप — अर्धनारी और अर्धनर

· 28:30–28:48

बहुत थोड़े ही समय में शिव जी उन पर प्रसन्न हो गए। वे ऐसे स्वरूप में प्रकट हुए कि अपनी पूर्ण चैतन्यमयी, ऐश्वर्यशालिनी, सर्वकामप्रदायिनी मूर्ति में प्रविष्ट होकर, अर्धनारी और नर का रूप धारण करके ब्रह्मा जी के पास गए — अर्धनारीश्वर स्वरूप में प्रकट हुए।

बहुत थोड़े ही समय में शिव जी उन पर प्रसन्न हो गए। और वे ऐसे स्वरूप में प्रकट हुए कि अपनी पूर्ण चैतन्यमयी, ऐश्वर्यशालिनी, सर्वकामप्रदायिनी मूर्ति में प्रविष्ट होकर, अर्धनारी और नर का रूप धारण करके ब्रह्मा जी के पास गए। वे अर्धनारीश्वर स्वरूप में प्रकट हुए।

53

शक्ति क्यों आवश्यक है — देवी जी का क्या काम?

रक्त माता से, अस्थि पिता से — शक्ति के बिना कुछ नहीं चलता

· 28:49–29:13 · Also a question

जो कहते हैं कि देवी जी का क्या काम, सन्यासियों का क्या काम — उनसे वक्ता इसी स्वरूप की ओर संकेत करते हैं: यहाँ भगवान शिव साक्षात अर्धनारीश्वर स्वरूप में हैं, और उनके बिना, शक्ति के बिना क्या कुछ चल सकता है? शरीर में रक्त माता के कारण होता है और अस्थि पिता के कारण होती है, वे कहते हैं; तो अगर माता ही न हो, तो देवी जी का क्या काम — कैसे चलेगा?

54

शिव जी ब्रह्मा जी से कहते हैं कि मैं तुम्हारा मनोरथ जान गया हूँ और वर दे रहा हूँ

हे महाभाग, हे मेरे पुत्र — मैं तुम्हारा मनोरथ जान गया हूँ

· 29:14–29:38

जब ब्रह्मा जी ने भगवान शिव का यह स्वरूप देखा, तो दंडवत प्रणाम करके स्तुति करने लगे। भगवान शिव, महेश्वर, प्रसन्न होकर उनसे कहते हैं: हे महाभाग, हे मेरे पुत्र, पिता हम हैं; मैं तुम्हारे समस्त मनोरथ को यथार्थ रूप से जान गया हूँ। प्रजाओं की वृद्धि के लिए तुमने इस समय तपस्या की है; इस तपस्या से मैं संतुष्ट हूँ और तुम्हें इच्छित वर दे रहा हूँ।

55

पार्वती जी शिव जी से पृथक कैसे हुईं?

वाम भाग से देवी पार्वती का पृथक होना

· 29:39–29:56 · Also a question

ऐसा कहकर भगवान शिव अपने वाम भाग से देवी पार्वती को अलग कर देते हैं, और अब वे दो स्वरूपों में प्रकट हो जाते हैं — एक ओर भगवान शिव, और उनके बाएँ भाग में भगवती पार्वती, शक्ति, साक्षात रूप में पृथक होकर प्रकट हो जाती हैं।

ऐसा कहकर भगवान शिव अपने वाम भाग से देवी पार्वतीहिमालय की पुत्री और शिव की पत्नी; तंत्र का बहुत सा उपदेश उन्हीं के प्रश्नों पर कहा गया है। को अलग कर देते हैं। अब वे दो स्वरूपों में प्रकट हो जाते हैं। एक ओर भगवान शिव; और उनके बाएँ भाग में भगवती पार्वती, शक्ति, साक्षात रूप में पृथक होकर प्रकट हो जाती हैं।

56

क्या क्रोध भैरव की उपासना घर में हो सकती है?

नहीं — पहले वह कीजिए जिसका अधिकार हर मनुष्य को है

· 29:57–30:39 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि घर में बैठकर क्रोध भैरव की उपासना नहीं होती; भैया, वे कहते हैं, हम अभी वहाँ तक पहुँच ही नहीं सकते। पहले वह कीजिए जिसका अधिकार मनुष्य योनि में आए हर संसारी जीव को है। सामर्थ्यवान बन जाइए, तब क्रोध भैरव की सेवा में जाइएगा। वैसे तो आप मानेंगे नहीं, वे जोड़ते हैं, तो बात अलग है।

तो भैया, वे कहते हैं, हम अभी वहाँ तक पहुँच ही नहीं सकते। घर में बैठकर क्रोध भैरव की उपासना नहीं होती है। पहले वह कीजिए जिसका अधिकार मनुष्य योनि में आए हर संसारी जीव को है। सामर्थ्यवान बन जाइए; तब क्रोध भैरव की सेवा में जाइएगा। वैसे तो आप मानेंगे नहीं, वे कहते हैं, तो बात अलग है।

57

ब्रह्मा जी भगवती को "शिवे" कहकर संबोधित करते हैं

शिव और शिवा — संबोधन "शिवे"

· 30:40–31:05

जब दोनों पृथक होकर प्रकट हुए, तब ब्रह्मा जी भगवती से बोले। भगवान शिव को शिव कहते हैं और भगवती पार्वती को शिवा — शिवे, शिवा। तो ब्रह्मा जी कहते हैं: हे शिवे, आपके पति देवाधिदेव शिव जी ने सृष्टि के आदि में मुझे उत्पन्न किया, और उन्हीं परमात्मा शिव ने सभी प्रजाओं को नियुक्त किया।

58

ब्रह्मा जी कहते हैं कि मेरे पास नारी तत्व ही नहीं है, तो नारियों की सृष्टि कैसे करूँ

नारी तत्व नहीं, इसलिए नारी कुल की सृष्टि का सामर्थ्य नहीं

· 31:06–31:37

ब्रह्मा जी कहते हैं कि मैंने भी अपने मन से सभी देवताओं की सृष्टि की — यह मानसी सृष्टि है — किंतु बार-बार सृष्टि करने पर भी प्रजाओं की वृद्धि नहीं हो रही है; इसलिए अब मैथुन से होने वाली सृष्टि करके ही मैं अपनी समस्त प्रजाओं की वृद्धि करना चाहता हूँ। पर आपसे पहले शिव जी के शरीर से स्त्रियों का अविनाशी समुदाय उत्पन्न ही नहीं हुआ, इसलिए मैं उस नारी कुल की सृष्टि करने में असमर्थ रहा। नारी तत्व ही जब मेरे पास नहीं है, वे कहते हैं, तो मैं भला नारियों की सृष्टि कैसे करूँगा?

59

यह क्यों कहा जाता है कि शक्ति के बिना शिव भी शव हैं?

शक्ति के बिना शिव भी शव हैं

· 31:38–32:00 · Also a question

सभी शक्तियाँ आपसे ही उत्पन्न होती हैं, ब्रह्मा जी भगवती से कहते हैं — शक्ति के बिना शिव भी शव हैं। इसलिए, वे कहते हैं, मैं परम शक्ति स्वरूपा, आप अखिलेश्वरी से यह प्रार्थना कर रहा हूँ कि सृष्टि के चराचर जगत की वृद्धि के लिए नारी कुल की रचना का सामर्थ्य प्रदान कीजिए, हे शिवे; और प्रिय, आपको नमस्कार है।

60

ब्रह्मा जी दूसरा वर माँगते हैं — कि भगवती दक्ष की कन्या के रूप में अवतरित हों

दक्ष की कन्या के रूप में अवतरित होने की प्रार्थना

· 32:01–32:31

ब्रह्मा जी एक और वर की प्रार्थना करते हैं: हे अंबिके, हे सर्वगे, इस चराचर जगत की वृद्धि के लिए आप अपने सर्वसमर्थ रूप से मेरे पुत्र दक्ष की कन्या के रूप में अवतरित हो जाइए।

61

भगवती को बलि प्रिया क्यों कहा जाता है?

जगदंबा ने अपने ही शरीर की बलि दी, और अपना ही पिंड स्थापित किया

· 32:32–33:06 · Also a question

वे कहते हैं कि यदि भगवती दक्ष की कन्या के रूप में प्रकट न हुई होतीं, तो इस संसार में न इतने शक्तिपीठ होते, न इस प्रकार का संतुलन। सोचिए, वे कहते हैं, जगदंबा ने अपने ही शरीर की बलि दे दी। लोग बोलते हैं कि वे बलि प्रिया नहीं हैं — अरे, जो अपने ही शरीर की बलि दे दीं, कि मनुष्य का कल्याण हो, जगह-जगह प्रतिष्ठित होने के लिए। साक्षात अपने ही पिंड को जगह-जगह स्थापित किया; ऐसा नहीं कि पाषाण रूप में जगह-जगह प्रकट हुईं। इस जगत के लिए उनका बहुत बड़ा बलिदान है, इसीलिए वे हम सभी की जगत माता कही जाती हैं।

62

भगवती ब्रह्मा जी को शक्ति देती हैं, और अपनी भौंहों के मध्य से दूसरी शक्ति का सृजन करती हैं

आज्ञा चक्र से दूसरी शक्ति

· 33:07–33:35

ब्रह्मा जी की याचना पर भगवती परमेश्वरी ने उन्हें शक्ति प्रदान की, जिससे वे सृष्टि की रचना में और स्त्रियों की रचना में समर्थ हुए। और भगवान शिव की परम शक्ति, स्त्री-पुरुषात्मिका शिवा देवी ने अपनी भौंहों के मध्य से — यानी आज्ञा चक्र से — अपने ही समान कांति वाली एक दूसरी शक्ति का सृजन किया।

63

शिव जी ने नई प्रकट हुई शक्ति से कहा कि ब्रह्मा ने तपस्या से आपकी आराधना की है, अतः उनके मनोरथ पूर्ण कीजिए

प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी के मनोरथ पूर्ण कीजिए

· 33:36–33:58

उस शक्ति को देखकर भगवान शिव हँसते हुए जगन्माता से कहने लगे: हे देवी, परमेष्ठी ब्रह्मा ने तपस्या के द्वारा आपकी आराधना की है; अतः आप प्रसन्न हो जाइए और प्रेमपूर्वक उनके सारे मनोरथ पूर्ण कीजिए। तब उन देवी ने परमेश्वर शिव जी की आज्ञा स्वीकार करके, ब्रह्मा जी की प्रार्थना के अनुसार दक्ष पुत्री होना स्वीकार कर लिया।

64

भगवती सती कौन हैं, और उनका प्राकट्य कहाँ से हुआ?

भगवती सती — उन्हीं की कांति और सामर्थ्य वाली

· 33:59–34:11 · Also a question

जो भगवती की भृकुटियों के मध्य से, भौंहों के मध्य से प्रकट हुईं, वे साक्षात जगन्माता के स्वरूप से प्रकट हुईं; उन्हीं की कांति के समान, उन्हीं के स्वरूप और सामर्थ्य को धारण करने वाली — वे भगवती सती हैं।

जो भगवती की भृकुटियों के मध्य से, भौंहों के मध्य से प्रकट हुई हैं, वे साक्षात जगन्माता के स्वरूप से प्रकट हुईं। उन्हीं की कांति के समान, उन्हीं के स्वरूप और सामर्थ्य को धारण करने वाली — वे भगवती सती हैं।

65

मैथुनी सृष्टि अंततः किस प्रकार आरंभ हुई?

शक्ति शिव के शरीर में प्रविष्ट हुईं, और सृष्टि कर्म में स्त्रियों को भाग मिला

· 34:12–34:37 · Also a question

वहाँ मूल स्वरूप में प्रकट हुई भगवती पार्वती — वह शक्ति ब्रह्मा जी को अपार शक्ति प्रदान करके शिव जी के शरीर में प्रविष्ट हो गईं, और प्रभु शिव भी अंतर्ध्यान हो गए। तब उस समय से इस लोक के सृष्टि कर्म में स्त्रियों को भाग प्राप्त हुआ। और तब ब्रह्मा जी प्रसन्न होकर सृष्टि की रचना करने लगे — मैथुनी सृष्टि की रचना की — और तब जाकर इस संसार का विस्तार हुआ।

66

अर्धनारी प्रसंग की फल श्रुति

पढ़ने या सुनने से सब सुख और परम गति

· 34:38–34:52

शिव जी के इस अत्यंत उत्तम और सज्जनों को परम मंगल प्रदान करने वाले अर्धनारी तथा अर्धनर रूप के जो वर्णन किया गया है — जो इस निष्पाप कथा को पढ़ता अथवा सुनता है, वह इस लोक में सभी सुखों को भोगकर परम गति को प्राप्त करता है।

तो शिव जी के इस अत्यंत उत्तम और सज्जनों को परम मंगल प्रदान करने वाले अर्धनारी तथा अर्धनर रूप का जो वर्णन किया गया है — जो इस निष्पाप कथा को पढ़ता अथवा सुनता है, वह इस लोक में सभी सुखों को भोगकर परम गति को प्राप्त करता है।

67

तीन प्रमुख स्वरूप, जिनके बिना सृष्टि नहीं होती, संसार के कण-कण में और हमारे भीतर भी स्थित हैं

तीन स्वरूप, जिनके बिना सृष्टि नहीं होती

· 34:53–35:26

वक्ता कहते हैं कि आज ऐसे तीन प्रमुख स्वरूपों की चर्चा हुई, जिनके बिना इस संसार की सृष्टि नहीं हो सकती और जो संसार के कण-कण में स्थित हैं — आपके-हमारे भीतर भी और प्रत्येक जीव में भी। वे आशा करते हैं कि अब जो आप नित्य सेवा-पूजा करेंगे उसमें भगवान शिव और जगदंबा के प्रति आपका समर्पण और निष्ठा और बढ़ जाएगी, और आपका ध्यान अब और स्पष्ट रहेगा।

68

शिव-शक्ति की उपासना का अधिकार किसे है?

शास्त्र जिसकी अनुमति सबको देता है, वही विस्तार से रखा जाएगा

· 35:27–35:44 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि शिव की उपासना के बिना कुछ प्राप्त नहीं हो सकता — भगवान शिव और शक्ति की उपासना तो करनी ही है, और वही चीज़ है जिसके लिए सबको अधिकार है। हम यह पूछने नहीं जाएँगे कि तुम्हारी दीक्षा हुई कि नहीं, तुम्हारा यह-वह पवित्र हुआ कि नहीं, वे कहते हैं; लेकिन जब शास्त्र ने आदेश दिया है कि सब कोई कर सकता है, तो उन चीज़ों को और विस्तार से आपके समक्ष रखेंगे।

69

आगे की कथा व्यासों और अट्ठाईसवें युग तक के शिव अवतारों की है, जिसे याद करना पड़ेगा

व्यास और अट्ठाईसवें युग तक के शिव अवतार

· 35:45–36:43

वक्ता कहते हैं कि आज तीन प्रमुख स्वरूपों — पंचानन, अष्टमूर्ति और अर्धनारीश्वर — की चर्चा हुई, और आगे थोड़ी क्लिष्टता वाली कथाएँ रहेंगी, चीज़ों को याद करना पड़ेगा। आगे के लाइव में सरल करके वे बताएँगे कि वाराह कल्प के प्रथम से नवम द्वापर तक व्यास और शिव अवतार कैसे चले — कितने शिव अवतार हुए और कितने व्यास जी हुए — और वर्तमान श्वेतवाराह कल्प के अट्ठाईसवें युग में कौन-सा स्वरूप है।

70

सुबह सबसे पहले शिवलिंग के साथ क्या करना चाहिए?

सबसे पहले निर्मल्य उतारकर एक बार अभिषेक

· 36:44–37:31 · Also a question

यह पूछे जाने पर कि अभिषेक के बाद शिवलिंग को अरघी से उठाकर पोंछना चाहिए या नहीं, वक्ता पहले सुबह का क्रम बताते हैं। मान लीजिए आज सेवा-पूजा-श्रृंगार हो गया; तो कल भोर में जब आप सूर्योदय से पहले या जैसी आपकी अवस्था हो तब पूजन करें, तो सबसे पहले यही करना चाहिए कि निर्मल्य आदि उतार कर वहीं उसी समय एक राउंड अभिषेक कर दीजिए — जो भी चंदन, भस्म आदि श्रृंगार लगा था, वह सब नहला दीजिए — बाकी सब तैयारी के बिना।

71

क्या सभी देवी-देवताओं पर जल छिड़कना चाहिए?

सभी देवी-देवताओं पर जल न छिड़कें

· 37:32–37:38 · Also a question

नहीं — वक्ता कहते हैं कि सभी देवताओं, देवी-देवताओं के ऊपर आप जल मत छिड़कियेगा। वे कहते हैं कि यह विशेष करके श्रावण आदि के नियम को लेकर कह रहे हैं; सरल सामान्य जन जो देव विधान से करते हैं, उनका विषय उनके अपने अनुसार होना चाहिए, जैसा वे करते हैं।

सभी देवताओं, देवी-देवताओं के ऊपर आप जल नहीं छिड़कियेगा, वक्ता कहते हैं। यह वे विशेष करके सावन आदि के नियम को लेकर कह रहे हैं। सरल सामान्य जन के लिए, जो देव विधान से करते हैं, उनका विषय अपने अनुसार होना चाहिए, जैसा वे करते हैं।

72

शिवलिंग को स्नान कराने के बाद उनके शीश पर क्या रहना चाहिए?

मुकुट, या अखंडित चावल, या बेल पत्र — शीश खाली नहीं

· 37:39–37:50 · Also a question

निर्मल्य हटाकर स्नान करा देने के बाद उनके सिर पर मुकुट अवश्य रहे। यदि आप मुकुट नहीं रखते, तो अखंडित चावल पुनः रख दीजिएगा, या बेल पत्ते को धोकर, या नया बेल पत्ता उनके शीश पर अवश्य चढ़ा दीजिएगा। ऐसे खाली मत रखिएगा।

तो निर्मल्य हटाकर, उनको एक बार स्नान आदि कराकर, उनके सिर पर मुकुट अवश्य रहे। मुकुट नहीं रखते हैं तो अक्षतअखंडित कच्चे चावल के दाने, संकल्प लेते समय जल व पुष्प के साथ हाथ में लिए जाते हैं।, अखंडित चावल, पुनः रख दीजिएगा। या बिल्वभगवान शिव से संबद्ध पवित्र बेल वृक्ष — इसके नीचे साधना की जाती है, इसकी लकड़ी बंधन-मुक्ति अनुष्ठान में घी व तिल की आहुति के लिए हवन-सामग्री के रूप में प्रयुक्त होती है, तथा इसका त्रिदल पत्र (बिल्वपत्र) शिव को अर्पित किया जाने वाला मुख्य द्रव्य है। को धोकर, या नया बेल पत्ता उनके शीश पर अवश्य चढ़ा दीजिएगा। ऐसे मत रखिएगा, वे कहते हैं।

73

शिवलिंग के पहले स्नान के बाद पूजन का क्रम क्या है?

पूजन का क्रम पूरा कीजिए, फिर अभिषेक और श्रृंगार

· 37:51–38:07 · Also a question

उसके पश्चात आप अपना पूरा पूजन का क्रम पूर्ण कीजिए — आगे का गौरी-गणपति पूजन आदि जो-जो आप करते हैं। और फिर जब पुनः शिव जी का अभिषेक करेंगे, तब दूध से, दही से, जैसे भी आप अभिषेक करते हैं, अभिषेक और श्रृंगार कीजिए।

उसके पश्चात आप अपना पूरा पूजन का क्रम पूर्ण करते हैं — आगे का गौरी-गणपति पूजन आदि, जो-जो आप करते हैं। और फिर, जब आप पुनः शिव जी का अभिषेक करेंगे, तब दूध से, दही से, जैसे भी आप अभिषेक करते हैं, अभिषेक-श्रृंगार आदि कीजिए।

74

भस्म लगाने से पहले लिंग को पोंछना आवश्यक है क्या?

अगरु, गुलाब जल और इत्र से पोंछने की आवश्यकता नहीं रहती

· 38:08–38:34 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि स्नान के पश्चात यदि आपको लगता है कि भस्म आदि के लेपन के लिए उन्हें पोंछना चाहिए, तो आप उठाकर पोंछ सकते हैं — लेकिन हमको पोंछना नहीं पड़ता, हम पोंछते नहीं हैं। अभिषेक के बाद गृह पूजित विग्रहों पर अगरु, गुलाब जल, इत्र आदि का लेपन करने से वे ऐसे ही बहुत अच्छे से सुगंधित हो जाते हैं, और उसमें भस्म और त्रिपुंड भी बढ़िया बन जाता है, वे सुंदर श्रृंगारित हो जाते हैं। थोड़े बड़े हों तो और आसानी होती है।

75

श्रृंगार के लिए पोंछने की अनुमति है, पर अभिषेक हो जाने के बाद लिंग को दोबारा उठाना उनके मन को नहीं भाता

अभिषेक के बाद उन्हें फिर से उठाना उनके हृदय को स्वीकार नहीं

· 38:35–39:10

वे कहते हैं कि यदि आपको लगता है कि श्रृंगार के लिए पोंछना आवश्यक है तो आप पोंछ सकते हैं — लेकिन मेरा मन नहीं मानता। एक बार शिव जी का अभिषेक हो गया, फिर हम देखते हैं कि लोग हाथ में लेकर सलाका आदि से पूरा त्रिपुंड बनाते हैं, अलग-अलग डिज़ाइन बनाते हैं। अभिषेक हो जाने के बाद उनको फिर से उठाइए, फिर अरघी पर रखिए — यह मेरे हृदय को थोड़ा नहीं भाता। आप करते हैं तो आप कीजिए, वे कहते हैं; हम नहीं करते। यह मेरा और आपका अलग-अलग विषय हो गया।

76

दुर्गा सप्तशती महायंत्र का आवरण पूजन लेने से पहले अपनी वर्तमान पूजा-पाठ के विषय में लिखकर बताइए

क्लिष्ट और लंबा पूजन — देने से पहले वे पूछते हैं कि आप क्या करते हैं

· 39:11–39:47

श्री दुर्गा सप्तशती महायंत्र के आवरण पूजन वाली वीडियोज़ के विषय में प्रखर के पूछने पर वक्ता कहते हैं: पहले एक बार मैसेज कर लीजिए या मेल कर लीजिए। वे जानना चाहते हैं कि पूजन-पाठ के विषय में आप क्या करते हैं, क्योंकि देख कर करने पर यह क्लिष्ट विषय है और लंबा है — तब पता चलेगा कि आप कर पाएँ या न कर पाएँ।

77

यदि गोरैया बाबा पहले से पूजित हैं, तो क्या कोई नया पूजन शुरू करना चाहिए?

बंदी माता अलग हैं; गोरैया बाबा के लिए नया पूजन मत जोड़िए

· 39:48–40:05 · Also a question

नागेश जी को उत्तर देते हुए, जिन्होंने कहा कि इसको लेकर बड़ा कंफ्यूजन रहता है, वक्ता कहते हैं कि बंदी माता अलग हैं, माँ बन्नी अलग — और जहाँ गोरैया बाबा पूजित हैं, वहाँ गोरैया बाबा ही हैं; अब उनके लिए अलग से कोई नया पूजन मत कीजिए।

लाइव में बंदी माता को लेकर उठे प्रश्न पर वक्ता कहते हैं कि बंदी माता अलग हैं; माँ बन्नी; गोरैया बाबा पूजित हैं। नागेश जी से वे कहते हैं कि इसको लेकर बड़ा कंफ्यूजन रहता है। जहाँ गोरैया बाबा ही पूजित हैं, तो गोरैया बाबा ही हैं — अब उनके लिए अलग से कोई और नया पूजन मत कीजिए।

78

मूल रूप में माँ काली हैं या भद्रकाली?

जो स्वरूप प्राप्त होता है वह भद्रकाली और वीरभद्र का है

· 40:06–40:17 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि इसको वे कई बार स्पष्ट कर चुके हैं: भद्रकाली और वीरभद्र जी का ही स्वरूप प्राप्त होता है।

यह पूछे जाने पर कि मूल रूप में माँ काली हैं या भद्रकाली, वक्ता कहते हैं: देखिए, इसको तो हम कई बार स्पष्ट कर चुके हैं। भद्रकाली और वीरभद्र जी का ही स्वरूप प्राप्त होता है।

79

शिव जी पर रोली चढ़ानी चाहिए, और क्या नहीं चढ़ाना चाहिए?

रोली और हरिद्रा चंदन हाँ; शिवलिंग पर सिंदूर कभी नहीं

· 40:18–40:51 · Also a question

वक्ता एक बार फिर स्पष्ट करते हैं: शिव जी के ऊपर रोली बिल्कुल चढ़ाई जा सकती है, और हरिद्रा चंदन भी बिल्कुल चढ़ाया जा सकता है। नहीं चढ़ाना चाहिए तो सिंदूर। जो लाल, कत्था, जो भी सिंदूर आता है, वह शिव जी पर, शिवलिंग के ऊपर नहीं चढ़ाना चाहिए; वह पार्वती जी को चढ़ाइए। उनके अनुसार अर्घ्य पर भी न चढ़ाएँ। लेकिन कुमकुम, रोली — ये सब आप चढ़ा सकते हैं, हरिद्रा चंदन चढ़ा सकते हैं।

80

लिंग पर कुमकुम और चंदन का प्रमाण क्या है?

आदि शंकराचार्य जी का लिंगाष्टकम, और आगे आने वाली वायवीय संहिता

· 40:52–41:11 · Also a question

वक्ता कुमकुम चंदन लेपित लिंगम पंक्ति देते हैं — यह आपने आदि शंकराचार्य जी के लिंगाष्टकम में पढ़ा होगा। और प्रमाण, वे कहते हैं, शिव महापुराण में आगे हम लोगों को मिलेगा: जब उपमन्यु जी का व्याख्यान आएगा और वायवीय संहिता का स्वाध्याय करेंगे, तब यह सब वर्णन भी उसमें आ जाएगा।

कुमकुम चंदन लेपित लिंगम — यह, वक्ता कहते हैं, आप पढ़े होंगे; यह आदि शंकराचार्य जी का लिंगाष्टकम है। और प्रमाण तो शिव महापुराण में अभी आगे हम लोगों को मिलेगा। जब इन सब की चर्चा आगे होगी, जब उपमन्यु जी का व्याख्यान आएगा और वायवीय संहिता का हम लोग स्वाध्याय करेंगे, तब यह सब वर्णन भी उसमें आ जाएगा।

81

क्या हनुमान जी का बड़वानल कर सकते हैं?

हाँ, बड़वानल किया जा सकता है

· 41:12–41:14 · Also a question

इस विषय में पूछे जाने पर वक्ता सीधे कहते हैं: बिल्कुल, आप हनुमान जी का बड़वानल कीजिए।

एक श्रोता के प्रश्न पर वक्ता कहते हैं: बिल्कुल, आप हनुमान जी का बड़वानल कीजिए।

82

सोलह उपचारों में अभिषेक किस स्थान पर आता है?

स्नान के स्थान पर अभिषेक, फिर आगे का पूजन

· 41:15–41:41 · Also a question

जिग्नेश जी के इस प्रश्न पर कि पाद्य, अर्घ्य, आचमन के पश्चात स्नान के स्थान में ही अभिषेक होगा ना — वक्ता कहते हैं, बिल्कुल। एक तो यह होता है कि सोलह उपचार पूजन पहले कर लिया; लेकिन जब आपको विशेष अभिषेक करना है, तो स्नान के समय, स्नान के बाद आप अभिषेक करेंगे और तब उसके आगे का पूरा विषय करेंगे। कई लोग इसको दो-दो बार करते हैं, वे कहते हैं, लेकिन उचित यही रहता है कि स्नान के समय ही अभिषेक हो और तब जाकर आगे का पूजन हो।

83

शिवालय में प्रतिदिन सरल रूप से क्या-क्या चढ़ाना चाहिए?

जल से अभिषेक, एक बिल्व पत्र या शमी पत्र या कमल, अक्षत, और त्रिपुंड

· 41:42–42:13 · Also a question

शिवालय मंदिर में प्रतिदिन सरल रूप से क्या चढ़ाना चाहिए, इस प्रश्न पर वक्ता कहते हैं कि सबसे पहले तो और कुछ नहीं तो जल से अभिषेक करने के पश्चात शिव जी के ऊपर एक भी बिल्व पत्र, या शमी जी का पत्र, या कमल का पुष्प — जो आपको प्राप्त हो जाए — चढ़ा देना चाहिए। और अखंडित चावल चढ़ा देना चाहिए। इतना; और यदि संभव हो तो साथ में उनका त्रिपुंड भस्म से बना दीजिए या चंदन से बना दीजिए। यह कर देना चाहिए, चंदन आदि से लेपन कर देना चाहिए।

84

श्रावण मास की अमावस्या को पितरों के लिए क्या करना चाहिए?

शिव पूजन से पितर प्रसन्न होते हैं; दूध से रुद्राभिषेक, और पंचबली

· 42:14–43:03 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि पितरों के लिए अनेक विषय चैनल पर पहले से उपस्थित हैं। श्रावण मास की अमावस्या में विशेष करके कुछ करना चाहते हैं, तो भगवान शिव के पूजन से पितर प्रसन्न होते ही हैं। दूध से रुद्राभिषेक कीजिए। भगवान का "सताचन" कीजिए। और पितरों के निमित्त अलग से बृहत रूप से करना चाहें तो पंचबली कीजिए।

85

क्या शिव जी पर दूर्वा चढ़ाई जा सकती है?

दूर्वा बिल्कुल चढ़ाई जा सकती है

· 43:04–43:10 · Also a question

यह पूछे जाने पर कि शिव जी पर दूर्वा चढ़ा सकते हैं या नहीं, वक्ता कहते हैं कि बिल्कुल चढ़ा सकते हैं।

यह पूछे जाने पर कि शिव जी पर दूर्वादेवताओं — विशेषकर गणेश जी — को अर्पित की जाने वाली पवित्र घास, नए स्थान पर जाने से पूर्व देवता को औपचारिक निमंत्रण देने की सामग्री में सम्मिलित होती है। चढ़ाई जा सकती है या नहीं, वक्ता कहते हैं कि बिल्कुल चढ़ा सकते हैं।

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यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब लाइव वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।

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