शिव महापुराण के अनुसार पंचाक्षरी मंत्र सिद्धि की सरलतम विधि
शिव महापुराण के अनुसार श्रावण मास में पंचाक्षरी मंत्र के पुरश्चरण की पूरी दैनिक विधि।
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पंचाक्षरी मंत्र क्या है, और यह कहाँ से प्रकट हुआ?
प्रणव का स्थूल स्वरूप, शिव के पाँच मुखों से प्रकट
वक्ता कहते हैं कि भगवान शिव का सबसे प्रसिद्ध मंत्र पंचाक्षरी मंत्र है, जिसके अनेक माहात्म्य शिव महापुराण में मिलते हैं। जब शिव ने प्रथम बार अपना साकार, पंचवक्त्र स्वरूप प्रकट किया, तो उनके पाँचों मुख से गायत्री प्रकट हुईं और साथ में प्रणव; प्रणव के दो रूप हैं — सूक्ष्म ओंकार है, और स्थूल, साक्षात स्वरूप यही पंचाक्षरी है, जो सद्योजात, वामदेव, अघोर, तत्पुरुष आदि पाँच स्वरूपों से प्रकट हुआ। इसलिए इसका जप करने वाले साधक को पाँचों महास्वरूपों की कृपा मिलती है, उनके तत्व उसके आभामंडल में उपस्थित हो जाते हैं, और चारों पुरुषार्थ सिद्ध होते हैं — इसीलिए यह महामंत्र है। शिव महापुराण में यह भी कहा गया है, वे जोड़ते हैं, कि महाशिवरात्रि के परम दिव्य काल में शिव ने गुरु रूप में और जगदंबा ने गुरु-माता रूप में विष्णु और ब्रह्मा को इसी मंत्र की दीक्षा दी। वे शुरू में कहते हैं कि मनुष्य जन्म पाकर अगर किसी मंत्र का पुरश्चरण नहीं किया और महाशक्तियों की कृपा नहीं पाई, तो यह जीवन व्यर्थ है — कष्ट-परेशानी के कारण ही सही, करना चाहिए।
वक्ता शुरू में कहते हैं कि मनुष्य जन्म पाने के बाद अगर हम किसी भी मंत्र का पुरश्चरण नहीं कर रहे, महाशक्तियों की कृपा नहीं पा रहे, तो यह मनुष्य जीवन व्यर्थ है; कष्ट-परेशानियों के कारण ही सही, हमें किसी न किसी महाशक्ति के मंत्र का पुरश्चरण करना चाहिए। उसी क्रम में, आने वाले श्रावण या किसी भी मास के लिए, वे सबसे प्रचलित और सबसे तीव्र प्रभाव देने वाले मंत्र को लेते हैं — उसका माहात्म्य, सिद्ध करने की विधि, कौन करेगा, कितना और कैसे। मंत्र, वे कहते हैं, भगवान शिव का सबसे प्रसिद्ध पंचाक्षरी मंत्र है, जिसके अनेक माहात्म्य शिव महापुराण में मिलते हैं। इसका परिचय यह है: जब भगवान शिव ने प्रथम बार अपना साकार स्वरूप, पंचवक्त्र स्वरूप प्रकट किया, तो उनके पाँचों मुख से गायत्री प्रकट हुईं, और गायत्री के साथ प्रणव। प्रणव — ओंकार, ॐ — दो प्रकार का कहा गया है, स्थूल और सूक्ष्म। सूक्ष्म स्वरूप ओंकार है; स्थूल स्वरूप, साक्षात स्वरूप, भगवान शिव का यह पंचाक्षरी मंत्र है। यह पाँचों मुखों — सद्योजात, वामदेव, अघोर, तत्पुरुष आदि — से ही प्रकट हुआ है। तो अगर कोई साधक पंचाक्षरी का जप करता है, तो उसे शिव के इन पाँच महास्वरूपों की कृपा मिलती है, और हमारे शरीर के आभामंडल में पाँचों स्वरूपों के तत्व उपस्थित हो जाते हैं — इसीलिए यह महामंत्र है। इसकी कृपा से, इसकी साधना से चारों पुरुषार्थ सिद्ध होते हैं। वे जोड़ते हैं कि शिव महापुराण में महाशिवरात्रि के विषय में पढ़ेंगे तो कहा गया है कि महाशिवरात्रि के उस परम दिव्य काल में भगवान शिव ने गुरु स्वरूप में और भगवती जगदंबा ने गुरु-माता के स्वरूप में विष्णु जी और ब्रह्मा जी को इसी मंत्र की दीक्षा दी। तो इस मंत्र का परिचय, वे कहते हैं, अति बृहद, दिव्य और अलौकिक है।
शास्त्र क्या कहता है
Śiva's Praṇava (Oṃkāra) is the seed from which the five-syllabled Pañcākṣara mantra unfolds, and from the Pañcākṣara's own mother-letters the Gāyatrī and, from that, the Veda itself are said to spring.
The chunk telescopes this into a single moment; the chapter's own sequence is staged (Oṃkāra at 10:22, Pañcākṣara at 10:29, Gāyatrī at 10:31) rather than simultaneous.
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सर्गादिपञ्चकृत्यस्य लक्षणं ब्रूहि नौ प्रभो।
हे प्रभो, हम दोनोंको सृष्टि आदि पाँच कार्योंका लक्षण बताइए।
मत्कृत्यबोधनं गुह्यं कृपया प्रब्रवीमि वाम्। सृष्टिः स्थितिश्च संहारस्तिरोभावोऽप्यनुग्रहः। पञ्चैव मे जगत्कृत्यं नित्यसिद्धमजाच्युतौ॥ २
मेरे कार्योंका ज्ञान गूढ़ है, फिर भी कृपा करके मैं तुम दोनोंको बताता हूँ। हे ब्रह्मा और अच्युत, मेरे जगत्-सम्बन्धी कार्य पाँच ही हैं: सृष्टि, स्थिति, संहार, तिरोभाव और अनुग्रह भी। ये नित्यसिद्ध हैं।
सर्गः संसारसंरम्भस्तत्प्रतिष्ठा स्थितिर्मता। संहारो मर्दनं तस्य तिरोभावस्तदुत्क्रमः॥ ३
संसारकी रचनाका आरम्भ सर्ग है। उसका टिके रहना स्थिति कही गयी है। उसका नाश संहार है। उसका उत्क्रमण तिरोभाव है।
तन्मोक्षोऽनुग्रहस्तन्मे कृत्यमेवं हि पञ्चकम्। कृत्यमेतद्वहत्यन्यस्तूष्णीं गोपुरबिम्बवत्॥ ४
उससे छुटकारा अनुग्रह है। सो इस प्रकार मेरा कार्य पाँच प्रकारका ही है। दूसरा इस कार्यको चुपचाप वहन करता है, गोपुरके प्रतिबिम्बकी तरह।
सर्गादि यच्चतुःकृत्यं संसारपरिजृम्भणम्। पञ्चमं मुक्तिहेतुर्वै नित्यं मयि च सुस्थिरम्॥ ५
सृष्टि आदि जो चार कार्य हैं, वे संसारका विस्तार हैं। पाँचवाँ निश्चय ही मोक्षका कारण है, और वह सदा मुझमें अचल भावसे स्थिर है।
तदिदं पञ्चभूतेषु दृश्यते मामकैर्जनैः। सृष्टिर्भूमौ स्थितिस्तोये संहारः पावके तथा॥ ६
यह कार्य मेरे अपने जनोंद्वारा पाँच भूतोंमें देखा जाता है। सृष्टि पृथ्वीमें, स्थिति जलमें और संहार अग्निमें है।
तिरोभावोऽनिले तद्वदनुग्रह इहाम्बरे। सृज्यते धरया सर्वमद्भिः सर्वं प्रवर्धते॥ ७
तिरोभाव वायुमें है, वैसे ही अनुग्रह यहाँ आकाशमें है। पृथ्वीसे सब उत्पन्न होता है। जलसे सब बढ़ता है।
अर्द्यते तेजसा सर्वं वायुना चापनीयते। व्योम्नानुगृह्यते सर्वं ज्ञेयमेवं हि सूरिभिः॥ ८
अग्निसे सब जला दिया जाता है और वायुसे दूर ले जाया जाता है। आकाशसे सब अनुगृहीत होता है। विद्वानोंको ऐसा ही जानना चाहिये।
पञ्चकृत्यमिदं वोढुं ममास्ति मुखपञ्चकम्। चतुर्दिक्षु चतुर्वक्त्रं तन्मध्ये पञ्चमं मुखम्॥ ९
इन पाँच कार्योंको वहन करनेके लिये मेरे पाँच मुख हैं। चारों दिशाओंमें चार मुख हैं, और उनके बीचमें पाँचवाँ मुख है।
युवाभ्यां तपसा लब्धमेतत्कृत्यद्वयं सुतौ। सृष्टिस्थित्यभिधं भाग्यं मत्तः प्रीतादतिप्रियम्॥ १०
हे पुत्रो, तुम दोनोंने तपस्यासे सृष्टि और स्थिति नामक ये दो कार्य प्राप्त किये। यह अत्यन्त प्रिय सौभाग्य प्रसन्न हुए मुझसे मिला।
तथा रुद्रमहेशाभ्यामन्यत्कृत्यद्वयं परम्। अनुग्रहाख्यं केनापि लब्धुं नैव हि शक्यते॥ ११
इसी तरह रुद्र और महेश्वरने दूसरे दो श्रेष्ठ कार्य पाये। पर अनुग्रह नामक कार्य निश्चय ही किसीसे भी पाया नहीं जा सकता।
तत्सर्वं पौर्विकं कर्म युवाभ्यां कालविस्मृतम्। न तद् रुद्रमहेशाभ्यां विस्मृतं कर्म तादृशम्॥ १२
तुम दोनोंने वह सारा पुराना कर्म समयके साथ भुला दिया। रुद्र और महेश्वरने वैसा कर्म नहीं भुलाया।
रूपे वेषे च कृत्ये च वाहने चासने तथा। आयुधादौ च मत्साम्यमस्माभिस्तत्कृते कृतम्॥ १३
इसी कारण मैंने उन्हें मेरी समानता दी है: रूप और वेषमें, कार्यमें, वाहन तथा आसनमें, और आयुध आदिमें।
मद्ध्यानविरहाद्वत्सौ मौढ्यं वामेवमागतम्। मज्ज्ञाने सति मैवं स्यान्मानं रूपं महेशवत्॥ १४
हे वत्सो, मेरे ध्यानके अभावसे तुम दोनोंमें इस प्रकार मूढ़ता आ गयी है। मेरा ज्ञान रहनेपर ऐसा न होता: महेशके समान अभिमान और रूप न रहता।
तस्मान्मज्ज्ञानसिद्ध्यर्थं मन्त्रमोंकारनामकम्। इतः परं प्रजपतं मामकं मानभञ्जनम्॥ १५
इसलिये मेरे ज्ञानकी सिद्धिके लिये अबसे आगे तुम दोनों मेरे अपने ओंकार नामक मन्त्रका जप करो। यह अभिमानको तोड़नेवाला है।
उपादिशं निजं मन्त्रमोङ्कारमुरुमङ्गलम्। ॐकारो मन्मुखाज्जज्ञे प्रथमं मत्प्रबोधकः॥ १६
मैंने अपने महामंगलकारी मन्त्र ओंकारका उपदेश किया। ओंकार सबसे पहले मेरे मुखसे प्रकट हुआ। वह मेरा बोध करानेवाला है।
वाचकोऽयमहं वाच्यो मन्त्रोऽयं हि मदात्मकः। तदनुस्मरणं नित्यं ममानुस्मरणं भवेत्॥ १७
यह वाचक है और मैं वाच्य हूँ। यह मन्त्र मेरा स्वरूप ही है। उसका नित्य स्मरण मेरा ही स्मरण होता है।
अकार उत्तरात् पूर्वमुकारः पश्चिमाननात्। मकारो दक्षिणमुखाद् बिन्दुः प्राङ्मुखतस्तथा॥ १८
पहले उत्तरवर्ती मुखसे अकार और पश्चिम मुखसे उकार निकला। दक्षिण मुखसे मकार तथा पूर्ववर्ती मुखसे बिन्दु निकला।
नादो मध्यमुखादेवं पञ्चधासौ विजृम्भितः। एकीभूतः पुनस्तद्वदोमित्येकाक्षरोऽभवत्॥ १९
मध्यवर्ती मुखसे नाद निकला। इस प्रकार यह पाँच रूपोंमें फैला। फिर उसी प्रकार एक होकर यह ओम् इस रूपमें एक अक्षर बन गया।
नामरूपात्मकं सर्वं वेदभूतकुलद्वयम्। व्याप्तमेतेन मन्त्रेण शिवशक्त्योश्च बोधकः॥ २०
नाम और रूपवाला सब कुछ और वेदमें बताये प्राणियोंके दोनों कुल इस मन्त्रसे व्याप्त हैं। और यह शिव और शक्तिका बोध करानेवाला है।
अस्मात् पञ्चाक्षरं जज्ञे बोधकं सकलस्य तत्। अकारादिक्रमेणैव नकारादि यथाक्रमम्॥ २१
इससे पंचाक्षर मन्त्र उत्पन्न हुआ। वह सकल रूपका बोध करानेवाला है। वह अकारादि क्रमसे ही और क्रमशः नकारादि क्रमसे प्रकट हुआ।
अस्मात् पञ्चाक्षराज्जाता मातृकाः पञ्चभेदतः। तस्माच्छिरश्चतुर्वक्त्रात्त्रिपाद्गायत्रिरेव हि॥ २२
इस पंचाक्षर मन्त्रसे पाँच भेदोंसे मातृका वर्ण उत्पन्न हुए। उससे शिरोमन्त्र निकला, और निश्चय ही चार मुखोंसे त्रिपदा गायत्री ही प्रकट हुई।
वेदः सर्वस्ततो जज्ञे ततो वै मन्त्रकोटयः। तत्तन्मन्त्रेण तत्सिद्धिः सर्वसिद्धिरितो भवेत्॥ २३
उससे सम्पूर्ण वेद प्रकट हुआ, और उससे ही करोड़ों मन्त्र निकले। उस-उस मन्त्रसे उस-उस कार्यकी सिद्धि होती है, पर इससे सम्पूर्ण सिद्धि होती है।
अनेन मन्त्रकन्देन भोगो मोक्षश्च सिद्ध्यति। सकला मन्त्रराजानः साक्षाद्भोगप्रदाः शुभाः॥ २४
इस मूलमन्त्रसे भोग और मोक्ष सिद्ध होते हैं। सकल रूपसे जुड़े मन्त्रराज साक्षात् भोग देनेवाले और शुभ हैं।
पुनस्तयोस्तत्र तिरः पटं गुरुः प्रकल्प्य मन्त्रं च समादिशत् परम्। निधाय तच्छीर्ष्णि कराम्बुजं शनै- रुदङ्मुखं संस्थितयोः सहाम्बिकः॥ २५
फिर अम्बिकाके साथ गुरुने वहाँ उत्तराभिमुख बैठे हुए उन दोनोंके लिये ओटके लिये वस्त्र लगाया। उनके मस्तकपर धीरे-धीरे करकमल रखकर उन्होंने उत्तम मन्त्रका उपदेश दिया।
त्रिरुच्चार्याग्रहीन्मन्त्रं यन्त्रतन्त्रोक्तिपूर्वकम्। शिष्यौ च तौ दक्षिणायामात्मानं च समार्पयत्॥ २६
यन्त्र-तन्त्रमें बतायी विधिके अनुसार तीन बार उच्चारण करके उन्होंने मन्त्र ग्रहण कराया। और उन दोनों शिष्योंने गुरुदक्षिणाके रूपमें अपने-आपको समर्पित कर दिया।
प्रबद्धहस्तौ किल तौ तदन्तिके तमूचतुर्देववरं जगद्गुरुम्॥ २७
तब वे दोनों हाथ जोड़े हुए उनके समीप देवश्रेष्ठ जगद्गुरुसे बोले।
नमो निष्कलरूपाय नमो निष्कलतेजसे। नमः सकलनाथाय नमस्ते सकलात्मने॥ २८
निष्कलरूपको नमस्कार है। निष्कल तेजवालेको नमस्कार है। सबके स्वामीको नमस्कार है। सबके आत्मा आपको नमस्कार है।
नमः प्रणववाच्याय नमः प्रणवलिङ्गिने। नमः सृष्ट्यादिकर्त्रे च नमः पञ्चमुखाय ते॥ २९
प्रणवके वाच्यको नमस्कार है। प्रणवरूप लिंगवालेको नमस्कार है। सृष्टि आदि करनेवालेको नमस्कार है। और पाँच मुखवाले आपको नमस्कार है।
पञ्चब्रह्मस्वरूपाय पञ्चकृत्याय ते नमः। आत्मने ब्रह्मणे तुभ्यमनन्तगुणशक्तये॥ ३०
पंचब्रह्मस्वरूप, पाँच कार्य करनेवाले आपको नमस्कार है। आत्मा, ब्रह्म, अनन्त गुण और शक्तिवाले आपको नमस्कार है।
सकलाकलरूपाय शम्भवे गुरवे नमः। इति स्तुत्वा गुरुं पद्यैर्ब्रह्मा विष्णुश्च नेमतुः॥ ३१
सकल और निष्कल रूपवाले गुरु शम्भुको नमस्कार है। इस प्रकार पद्योंसे गुरुकी स्तुति करके ब्रह्मा और विष्णुने प्रणाम किया।
वत्सकौ सर्वतत्त्वं च कथितं दर्शितं च वाम्। जपतं प्रणवं मन्त्रं देवीदिष्टं मदात्मकम्॥ ३२
हे वत्सो, मैंने तुम दोनोंको सारा तत्त्व कहा और दिखाया। तुम दोनों देवीद्वारा उपदिष्ट प्रणव मन्त्रका जप करो, जो मेरा ही स्वरूप है।
ज्ञानं च सुस्थिरं भाग्यं सर्वं भवति शाश्वतम्। आर्द्रायां च चतुर्दश्यां तज्जप्यं त्वक्षयं भवेत्॥ ३३
ज्ञान और स्थिर भाग्य, सब सदाके लिये स्थायी हो जाता है। और आर्द्रा नक्षत्रमें चतुर्दशीको उसका जप तो अक्षय होता है।
सूर्यगत्या महार्द्रायामेकं कोटिगुणं भवेत्। मृगशीर्षान्तिमो भागः पुनर्वस्वादिमस्तथा॥ ३४
सूर्यकी गतिसे आनेवाली महा-आर्द्रामें एक बारका जप करोड़गुना हो जाता है। मृगशिराका अन्तिम भाग तथा पुनर्वसुका आदि भाग
आर्द्रासमं सदा ज्ञेयं पूजाहोमादितर्पणे। दर्शनं तु प्रभाते च प्रातःसङ्गवकालयोः॥ ३५
पूजा, होम, तर्पण आदिमें सदा आर्द्राके समान जानना चाहिये। और मेरा दर्शन प्रभातमें, प्रातः और संगव कालमें करना चाहिये।
चतुर्दशी तथा ग्राह्या निशीथव्यापिनी भवेत्। प्रदोषव्यापिनी चैव परयुक्ता प्रशस्यते॥ ३६
तथा लेनी चाहिये वह चतुर्दशी जो निशीथव्यापिनी हो, और प्रदोषव्यापिनी भी। अगली तिथिसे युक्त चतुर्दशी प्रशंसित है।
लिङ्गं वेरं च मे तुल्यं यजतां लिङ्गमुत्तमम्। तस्माल्लिङ्गं परं पूज्यं वेरादपि मुमुक्षुभिः॥ ३७
मेरा लिंग और मेरी मूर्ति समान हैं, फिर भी पूजा करनेवालोंके लिये लिंग श्रेष्ठ है। इसलिये मुमुक्षुओंको मूर्तिसे भी बढ़कर लिंगको पूजना चाहिये।
लिङ्गमोङ्कारमन्त्रेण वेरं पञ्चाक्षरेण तु। स्वयमेव हि सद्द्रव्यैः प्रतिष्ठाप्यं परैरपि॥ ३८
लिंगको ओंकार-मन्त्रसे और मूर्तिको पंचाक्षर मन्त्रसे स्थापित करना चाहिये। उत्तम द्रव्योंसे स्वयं ही स्थापना करे अथवा दूसरोंसे करवाये।
पूजयेदुपचारैश्च मत्पदं सुलभं भवेत्। इति शास्य तथा शिष्यौ तत्रैवान्तर्हितः शिवः॥ ३९
उपचारोंसे पूजा करे, तो मेरा पद सुलभ हो जाता है। इस प्रकार दोनों शिष्योंको उपदेश देकर शिव वहीं अन्तर्धान हो गये।
Śiva, in the form of guru together with the Goddess as guru-mātā, formally initiates (dīkṣā) Viṣṇu and Brahmā into this very mantra, screened from view, each uttering it three times before the teacher.
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सर्गादिपञ्चकृत्यस्य लक्षणं ब्रूहि नौ प्रभो।
हे प्रभो, हम दोनोंको सृष्टि आदि पाँच कार्योंका लक्षण बताइए।
मत्कृत्यबोधनं गुह्यं कृपया प्रब्रवीमि वाम्। सृष्टिः स्थितिश्च संहारस्तिरोभावोऽप्यनुग्रहः। पञ्चैव मे जगत्कृत्यं नित्यसिद्धमजाच्युतौ॥ २
मेरे कार्योंका ज्ञान गूढ़ है, फिर भी कृपा करके मैं तुम दोनोंको बताता हूँ। हे ब्रह्मा और अच्युत, मेरे जगत्-सम्बन्धी कार्य पाँच ही हैं: सृष्टि, स्थिति, संहार, तिरोभाव और अनुग्रह भी। ये नित्यसिद्ध हैं।
सर्गः संसारसंरम्भस्तत्प्रतिष्ठा स्थितिर्मता। संहारो मर्दनं तस्य तिरोभावस्तदुत्क्रमः॥ ३
संसारकी रचनाका आरम्भ सर्ग है। उसका टिके रहना स्थिति कही गयी है। उसका नाश संहार है। उसका उत्क्रमण तिरोभाव है।
तन्मोक्षोऽनुग्रहस्तन्मे कृत्यमेवं हि पञ्चकम्। कृत्यमेतद्वहत्यन्यस्तूष्णीं गोपुरबिम्बवत्॥ ४
उससे छुटकारा अनुग्रह है। सो इस प्रकार मेरा कार्य पाँच प्रकारका ही है। दूसरा इस कार्यको चुपचाप वहन करता है, गोपुरके प्रतिबिम्बकी तरह।
सर्गादि यच्चतुःकृत्यं संसारपरिजृम्भणम्। पञ्चमं मुक्तिहेतुर्वै नित्यं मयि च सुस्थिरम्॥ ५
सृष्टि आदि जो चार कार्य हैं, वे संसारका विस्तार हैं। पाँचवाँ निश्चय ही मोक्षका कारण है, और वह सदा मुझमें अचल भावसे स्थिर है।
तदिदं पञ्चभूतेषु दृश्यते मामकैर्जनैः। सृष्टिर्भूमौ स्थितिस्तोये संहारः पावके तथा॥ ६
यह कार्य मेरे अपने जनोंद्वारा पाँच भूतोंमें देखा जाता है। सृष्टि पृथ्वीमें, स्थिति जलमें और संहार अग्निमें है।
तिरोभावोऽनिले तद्वदनुग्रह इहाम्बरे। सृज्यते धरया सर्वमद्भिः सर्वं प्रवर्धते॥ ७
तिरोभाव वायुमें है, वैसे ही अनुग्रह यहाँ आकाशमें है। पृथ्वीसे सब उत्पन्न होता है। जलसे सब बढ़ता है।
अर्द्यते तेजसा सर्वं वायुना चापनीयते। व्योम्नानुगृह्यते सर्वं ज्ञेयमेवं हि सूरिभिः॥ ८
अग्निसे सब जला दिया जाता है और वायुसे दूर ले जाया जाता है। आकाशसे सब अनुगृहीत होता है। विद्वानोंको ऐसा ही जानना चाहिये।
पञ्चकृत्यमिदं वोढुं ममास्ति मुखपञ्चकम्। चतुर्दिक्षु चतुर्वक्त्रं तन्मध्ये पञ्चमं मुखम्॥ ९
इन पाँच कार्योंको वहन करनेके लिये मेरे पाँच मुख हैं। चारों दिशाओंमें चार मुख हैं, और उनके बीचमें पाँचवाँ मुख है।
युवाभ्यां तपसा लब्धमेतत्कृत्यद्वयं सुतौ। सृष्टिस्थित्यभिधं भाग्यं मत्तः प्रीतादतिप्रियम्॥ १०
हे पुत्रो, तुम दोनोंने तपस्यासे सृष्टि और स्थिति नामक ये दो कार्य प्राप्त किये। यह अत्यन्त प्रिय सौभाग्य प्रसन्न हुए मुझसे मिला।
तथा रुद्रमहेशाभ्यामन्यत्कृत्यद्वयं परम्। अनुग्रहाख्यं केनापि लब्धुं नैव हि शक्यते॥ ११
इसी तरह रुद्र और महेश्वरने दूसरे दो श्रेष्ठ कार्य पाये। पर अनुग्रह नामक कार्य निश्चय ही किसीसे भी पाया नहीं जा सकता।
तत्सर्वं पौर्विकं कर्म युवाभ्यां कालविस्मृतम्। न तद् रुद्रमहेशाभ्यां विस्मृतं कर्म तादृशम्॥ १२
तुम दोनोंने वह सारा पुराना कर्म समयके साथ भुला दिया। रुद्र और महेश्वरने वैसा कर्म नहीं भुलाया।
रूपे वेषे च कृत्ये च वाहने चासने तथा। आयुधादौ च मत्साम्यमस्माभिस्तत्कृते कृतम्॥ १३
इसी कारण मैंने उन्हें मेरी समानता दी है: रूप और वेषमें, कार्यमें, वाहन तथा आसनमें, और आयुध आदिमें।
मद्ध्यानविरहाद्वत्सौ मौढ्यं वामेवमागतम्। मज्ज्ञाने सति मैवं स्यान्मानं रूपं महेशवत्॥ १४
हे वत्सो, मेरे ध्यानके अभावसे तुम दोनोंमें इस प्रकार मूढ़ता आ गयी है। मेरा ज्ञान रहनेपर ऐसा न होता: महेशके समान अभिमान और रूप न रहता।
तस्मान्मज्ज्ञानसिद्ध्यर्थं मन्त्रमोंकारनामकम्। इतः परं प्रजपतं मामकं मानभञ्जनम्॥ १५
इसलिये मेरे ज्ञानकी सिद्धिके लिये अबसे आगे तुम दोनों मेरे अपने ओंकार नामक मन्त्रका जप करो। यह अभिमानको तोड़नेवाला है।
उपादिशं निजं मन्त्रमोङ्कारमुरुमङ्गलम्। ॐकारो मन्मुखाज्जज्ञे प्रथमं मत्प्रबोधकः॥ १६
मैंने अपने महामंगलकारी मन्त्र ओंकारका उपदेश किया। ओंकार सबसे पहले मेरे मुखसे प्रकट हुआ। वह मेरा बोध करानेवाला है।
वाचकोऽयमहं वाच्यो मन्त्रोऽयं हि मदात्मकः। तदनुस्मरणं नित्यं ममानुस्मरणं भवेत्॥ १७
यह वाचक है और मैं वाच्य हूँ। यह मन्त्र मेरा स्वरूप ही है। उसका नित्य स्मरण मेरा ही स्मरण होता है।
अकार उत्तरात् पूर्वमुकारः पश्चिमाननात्। मकारो दक्षिणमुखाद् बिन्दुः प्राङ्मुखतस्तथा॥ १८
पहले उत्तरवर्ती मुखसे अकार और पश्चिम मुखसे उकार निकला। दक्षिण मुखसे मकार तथा पूर्ववर्ती मुखसे बिन्दु निकला।
नादो मध्यमुखादेवं पञ्चधासौ विजृम्भितः। एकीभूतः पुनस्तद्वदोमित्येकाक्षरोऽभवत्॥ १९
मध्यवर्ती मुखसे नाद निकला। इस प्रकार यह पाँच रूपोंमें फैला। फिर उसी प्रकार एक होकर यह ओम् इस रूपमें एक अक्षर बन गया।
नामरूपात्मकं सर्वं वेदभूतकुलद्वयम्। व्याप्तमेतेन मन्त्रेण शिवशक्त्योश्च बोधकः॥ २०
नाम और रूपवाला सब कुछ और वेदमें बताये प्राणियोंके दोनों कुल इस मन्त्रसे व्याप्त हैं। और यह शिव और शक्तिका बोध करानेवाला है।
अस्मात् पञ्चाक्षरं जज्ञे बोधकं सकलस्य तत्। अकारादिक्रमेणैव नकारादि यथाक्रमम्॥ २१
इससे पंचाक्षर मन्त्र उत्पन्न हुआ। वह सकल रूपका बोध करानेवाला है। वह अकारादि क्रमसे ही और क्रमशः नकारादि क्रमसे प्रकट हुआ।
अस्मात् पञ्चाक्षराज्जाता मातृकाः पञ्चभेदतः। तस्माच्छिरश्चतुर्वक्त्रात्त्रिपाद्गायत्रिरेव हि॥ २२
इस पंचाक्षर मन्त्रसे पाँच भेदोंसे मातृका वर्ण उत्पन्न हुए। उससे शिरोमन्त्र निकला, और निश्चय ही चार मुखोंसे त्रिपदा गायत्री ही प्रकट हुई।
वेदः सर्वस्ततो जज्ञे ततो वै मन्त्रकोटयः। तत्तन्मन्त्रेण तत्सिद्धिः सर्वसिद्धिरितो भवेत्॥ २३
उससे सम्पूर्ण वेद प्रकट हुआ, और उससे ही करोड़ों मन्त्र निकले। उस-उस मन्त्रसे उस-उस कार्यकी सिद्धि होती है, पर इससे सम्पूर्ण सिद्धि होती है।
अनेन मन्त्रकन्देन भोगो मोक्षश्च सिद्ध्यति। सकला मन्त्रराजानः साक्षाद्भोगप्रदाः शुभाः॥ २४
इस मूलमन्त्रसे भोग और मोक्ष सिद्ध होते हैं। सकल रूपसे जुड़े मन्त्रराज साक्षात् भोग देनेवाले और शुभ हैं।
पुनस्तयोस्तत्र तिरः पटं गुरुः प्रकल्प्य मन्त्रं च समादिशत् परम्। निधाय तच्छीर्ष्णि कराम्बुजं शनै- रुदङ्मुखं संस्थितयोः सहाम्बिकः॥ २५
फिर अम्बिकाके साथ गुरुने वहाँ उत्तराभिमुख बैठे हुए उन दोनोंके लिये ओटके लिये वस्त्र लगाया। उनके मस्तकपर धीरे-धीरे करकमल रखकर उन्होंने उत्तम मन्त्रका उपदेश दिया।
त्रिरुच्चार्याग्रहीन्मन्त्रं यन्त्रतन्त्रोक्तिपूर्वकम्। शिष्यौ च तौ दक्षिणायामात्मानं च समार्पयत्॥ २६
यन्त्र-तन्त्रमें बतायी विधिके अनुसार तीन बार उच्चारण करके उन्होंने मन्त्र ग्रहण कराया। और उन दोनों शिष्योंने गुरुदक्षिणाके रूपमें अपने-आपको समर्पित कर दिया।
प्रबद्धहस्तौ किल तौ तदन्तिके तमूचतुर्देववरं जगद्गुरुम्॥ २७
तब वे दोनों हाथ जोड़े हुए उनके समीप देवश्रेष्ठ जगद्गुरुसे बोले।
नमो निष्कलरूपाय नमो निष्कलतेजसे। नमः सकलनाथाय नमस्ते सकलात्मने॥ २८
निष्कलरूपको नमस्कार है। निष्कल तेजवालेको नमस्कार है। सबके स्वामीको नमस्कार है। सबके आत्मा आपको नमस्कार है।
नमः प्रणववाच्याय नमः प्रणवलिङ्गिने। नमः सृष्ट्यादिकर्त्रे च नमः पञ्चमुखाय ते॥ २९
प्रणवके वाच्यको नमस्कार है। प्रणवरूप लिंगवालेको नमस्कार है। सृष्टि आदि करनेवालेको नमस्कार है। और पाँच मुखवाले आपको नमस्कार है।
पञ्चब्रह्मस्वरूपाय पञ्चकृत्याय ते नमः। आत्मने ब्रह्मणे तुभ्यमनन्तगुणशक्तये॥ ३०
पंचब्रह्मस्वरूप, पाँच कार्य करनेवाले आपको नमस्कार है। आत्मा, ब्रह्म, अनन्त गुण और शक्तिवाले आपको नमस्कार है।
सकलाकलरूपाय शम्भवे गुरवे नमः। इति स्तुत्वा गुरुं पद्यैर्ब्रह्मा विष्णुश्च नेमतुः॥ ३१
सकल और निष्कल रूपवाले गुरु शम्भुको नमस्कार है। इस प्रकार पद्योंसे गुरुकी स्तुति करके ब्रह्मा और विष्णुने प्रणाम किया।
वत्सकौ सर्वतत्त्वं च कथितं दर्शितं च वाम्। जपतं प्रणवं मन्त्रं देवीदिष्टं मदात्मकम्॥ ३२
हे वत्सो, मैंने तुम दोनोंको सारा तत्त्व कहा और दिखाया। तुम दोनों देवीद्वारा उपदिष्ट प्रणव मन्त्रका जप करो, जो मेरा ही स्वरूप है।
ज्ञानं च सुस्थिरं भाग्यं सर्वं भवति शाश्वतम्। आर्द्रायां च चतुर्दश्यां तज्जप्यं त्वक्षयं भवेत्॥ ३३
ज्ञान और स्थिर भाग्य, सब सदाके लिये स्थायी हो जाता है। और आर्द्रा नक्षत्रमें चतुर्दशीको उसका जप तो अक्षय होता है।
सूर्यगत्या महार्द्रायामेकं कोटिगुणं भवेत्। मृगशीर्षान्तिमो भागः पुनर्वस्वादिमस्तथा॥ ३४
सूर्यकी गतिसे आनेवाली महा-आर्द्रामें एक बारका जप करोड़गुना हो जाता है। मृगशिराका अन्तिम भाग तथा पुनर्वसुका आदि भाग
आर्द्रासमं सदा ज्ञेयं पूजाहोमादितर्पणे। दर्शनं तु प्रभाते च प्रातःसङ्गवकालयोः॥ ३५
पूजा, होम, तर्पण आदिमें सदा आर्द्राके समान जानना चाहिये। और मेरा दर्शन प्रभातमें, प्रातः और संगव कालमें करना चाहिये।
चतुर्दशी तथा ग्राह्या निशीथव्यापिनी भवेत्। प्रदोषव्यापिनी चैव परयुक्ता प्रशस्यते॥ ३६
तथा लेनी चाहिये वह चतुर्दशी जो निशीथव्यापिनी हो, और प्रदोषव्यापिनी भी। अगली तिथिसे युक्त चतुर्दशी प्रशंसित है।
लिङ्गं वेरं च मे तुल्यं यजतां लिङ्गमुत्तमम्। तस्माल्लिङ्गं परं पूज्यं वेरादपि मुमुक्षुभिः॥ ३७
मेरा लिंग और मेरी मूर्ति समान हैं, फिर भी पूजा करनेवालोंके लिये लिंग श्रेष्ठ है। इसलिये मुमुक्षुओंको मूर्तिसे भी बढ़कर लिंगको पूजना चाहिये।
लिङ्गमोङ्कारमन्त्रेण वेरं पञ्चाक्षरेण तु। स्वयमेव हि सद्द्रव्यैः प्रतिष्ठाप्यं परैरपि॥ ३८
लिंगको ओंकार-मन्त्रसे और मूर्तिको पंचाक्षर मन्त्रसे स्थापित करना चाहिये। उत्तम द्रव्योंसे स्वयं ही स्थापना करे अथवा दूसरोंसे करवाये।
पूजयेदुपचारैश्च मत्पदं सुलभं भवेत्। इति शास्य तथा शिष्यौ तत्रैवान्तर्हितः शिवः॥ ३९
उपचारोंसे पूजा करे, तो मेरा पद सुलभ हो जाता है। इस प्रकार दोनों शिष्योंको उपदेश देकर शिव वहीं अन्तर्धान हो गये।
पंचाक्षरी मंत्र सिद्धि के फल
हर शक्ति शिव की शरणागत; कुंडली के बारह भाव निर्दोष
वक्ता कहते हैं कि अगर हम अपने जीवन में पंचाक्षरी की सिद्धि कर लेते हैं, तो शिव से जुड़ी हर शक्ति हमारे अनुकूल हो जाती है — क्योंकि पूरे संसार में ऐसी कोई शक्ति है ही नहीं जो भगवान शिव की शरणागति न लेती हो: यक्ष, भूत, प्रेत, पिशाच, उपदेव, बड़ी से बड़ी महाशक्तियाँ, देवी-देवता का कोई भी स्वरूप, देव, दानव, गंधर्व, किन्नर, अप्सरा, लोक देवी-देवता, श्मशानिक शक्तियाँ, कोई भी ग्रह, बैताल। जब मंत्र जागृत और सिद्ध हो जाता है — हमारे आभामंडल, कारण और सूक्ष्म शरीर, हमारी आत्मा में उपस्थित — तो सभी शक्तियाँ अनुकूल हो जाती हैं, सभी ग्रह-नक्षत्र अनुकूल हो जाते हैं, कुंडली के बारह भावों पर पड़ रहा दुष्प्रभाव और चल रहा दुर्दिन नष्ट हो जाता है, और सभी गण, प्रेत, पिशाच और ब्रह्मराक्षस इसके प्रभाव से शांत और अनुकूल हो जाते हैं।
इसकी कृपा हम कैसे प्राप्त करें, वक्ता पूछते हैं। अगर अपने जीवन में इस मंत्र की सिद्धि कर लेते हैं, तो भगवान शिव से संबंधित प्रत्येक शक्ति — और पूरे संसार में ऐसी कोई शक्ति है ही नहीं जो भगवान शिव की शरणागति न लेती हो — चाहे यक्ष, भूत, प्रेत, पिशाच, उपदेव हों, या बड़ी से बड़ी महाशक्तियाँ, देवी-देवता का कोई अन्य स्वरूप: सभी शिव की शरणागति रखती हैं। यानी अगर हम पंचाक्षरी को जागृत और सिद्ध कर लेते हैं — हमारे आभामंडल में, कारण और सूक्ष्म स्वरूप में, हमारी आत्मा में भगवान शिव का यह मंत्र उपस्थित हो जाता है, उनकी ऊर्जा यहाँ समाविष्ट हो जाती है — तो सभी शक्तियाँ हमारे अनुकूल हो जाएँगी, सभी ग्रह-नक्षत्र अनुकूल हो जाएँगे, और कुंडली के बारह वर्गों में जो भी दुष्प्रभाव पड़ रहा हो, जो भी दुर्दिन चल रहा हो, सब नष्ट हो जाएगा। आगे वे यह बात दोहराते हैं: देव, दानव, यक्ष, गंधर्व, किन्नर, अप्सरा, लोक देवी-देवता, कोई भी शक्ति — भूत, प्रेत, मसान, श्मशानिक शक्तियाँ, कोई भी ग्रह, बैताल — सभी भगवान शिव के अधीन हैं, और उनका पंचाक्षरी मंत्र उनके पाँच महास्वरूपों को धारण करने वाला है। इसकी सिद्धि से जितने गण, प्रेत, पिशाच, ब्रह्मराक्षस आदि हैं, सभी इसके प्रभाव से शांत और अनुकूल हो जाते हैं। इसलिए, वे कहते हैं, इस मंत्र की सिद्धि अवश्य करें।
विश्वेश्वर संहिता के अनुसार पंचाक्षरी सिद्धि के लिए कितना जप
एक पुरश्चरण पाँच लाख; कलिकाल में बीस लाख; पच्चीस लाख से कोई भी मुक्त
वक्ता कहते हैं कि शिव पुराण की विश्वेश्वर संहिता में कहा गया है कि जो व्यक्ति अपने जीवन में कम से कम 25 लाख पंचाक्षरी जप कर लेता है, वह मुक्त हो जाता है। मंत्र सिद्धि का सामान्य नियम है जितने अक्षर उतने लाख जप, तो पाँच अक्षर के इस मंत्र के लिए पाँच लाख; लेकिन कलियुग में धर्म — शिव का वृषभ — चार में से एक पैर पर खड़ा है, इसलिए चार गुना पुरश्चरण, 20 लाख, से सिद्धि मानी जाती है। संहिता इसे वर्ण से समझाती है: क्षत्रिय पाँच लाख जपे तो क्षत्रित्व दूर कर ब्राह्मण हो जाता है, फिर पाँच लाख से ब्राह्मणत्व दूर होता है, और तीसरे पाँच लाख से सिद्धि — 15 लाख; चतुर्थ वर्ण का व्यक्ति चार पुरश्चरण करे तो पाँचवें में सिद्धि, 25 लाख में द्विज हो जाता है और मंत्र-विप्रत्व पाता है। यह, वे कहते हैं, अतिशयोक्ति नहीं, शास्त्रोक्त बात है — स्त्री, शूद्र, कोई भी इस जप से शुद्ध होकर सिद्धि पा सकता है; यह लिखित बात है, और अनुभवगत बातें और भी अलग हो सकती हैं।
पहला विषय, वक्ता कहते हैं, यह है कि कितना जप करें। इसका माहात्म्य अनंत है। शिव के पंचाक्षरी का जप करें तो शिव महापुराण की विश्वेश्वर संहिता में कहा गया है कि जो व्यक्ति अपने जीवन में कम से कम 25 लाख जप कर लेता है, वह मुक्त हो जाता है। सिद्धि कैसे होती है, इसका वर्णन वर्णों से है — हमारे यहाँ चार वर्णों का जो भेद है — और सामान्य रूप से कलिकाल में किसी भी मंत्र का पुरश्चरण चार गुना किया जाता है। जितने अक्षर का मंत्र, उतने लाख जप से सिद्धि; तो सामान्यतः पंचाक्षरी का पाँच लाख जप करने से मंत्र सिद्ध होता है। लेकिन कलिकाल में, वे कहते हैं, धर्म का एक पाँव है। चार पाँव वाला वृषभ स्वरूप धर्म का स्वरूप है — भगवान शिव के वृषभ ही धर्म के स्वरूप माने गए हैं — और कलिकाल में कहा जाता है कि उनके तीन पैर नहीं हैं, मात्र एक बचता है। इसी कारण चार गुना पुरश्चरण करना होता है, तो 20 लाख जप से कलिकाल में सिद्धि मानकर चला जाए। शिव महापुराण का ही उदाहरण देखिए: कहा गया है कि अगर क्षत्रिय पाँच लाख जप करता है तो अपने क्षत्रित्व को दूर करके ब्राह्मण हो जाता है; पुनः पाँच लाख करे तो ब्राह्मणत्व दूर कर लेता है; और पाँच लाख और करे तो मंत्र की सिद्धि — यानी 15 लाख जपना पड़ा। उसी अनुसार चतुर्थ वर्ण का व्यक्ति चार पुरश्चरण करेगा तो पाँचवें में सिद्धि: 25 लाख में वह द्विज हो जाता है, मंत्र-विप्रत्व पाता है। स्क्रीन पर दिखाए श्लोक इसके प्रमाण हैं, वे कहते हैं; यह अतिशयोक्ति या मनगढ़ंत नहीं, विश्वेश्वर संहिता की शास्त्रोक्त बात है। इस मंत्र का इतना माहात्म्य है, वे कहते हैं, कि स्त्री हो, शूद्र हो, कोई भी हो, हर कोई इस जप से शुद्ध हो सकता है और सिद्धि पा सकता है। यह लिखित बात है; अनुभवगत बातें और भी अलग हो सकती हैं। इसलिए अपने जीवन में इस मंत्र की सिद्धि सभी को करनी चाहिए।
पंचाक्षरी में ॐ कौन लगाए, और नमः शिवाय बनाम शिवाय नमः का क्रम
प्रणव केवल संन्यासियों को; नमः पहले केवल यज्ञोपवीत वालों को
वक्ता कहते हैं कि प्रणव लगाने का अधिकार केवल संन्यास धर्म में चल रहे संन्यासियों को है; गृहस्थ शुद्ध पंचाक्षरी बिना ॐ के जपें, और जो कहे कि ॐ लगाए बिना शिव की पूर्ण कृपा नहीं मिलेगी, वह अधूरा ज्ञान है — इसीलिए गुरु की आवश्यकता है। गृहस्थों में जिनका यज्ञोपवीत संस्कार हुआ है, वे नमः पहले और शिवाय बाद में बोलें, जैसा मंत्र है; जिनका नहीं हुआ — जो उसके अधिकारी नहीं, जिनका कभी होता ही नहीं, और माताएँ-बहनें — वे शिवाय पहले और नमः बाद में। प्रमाण विश्वेश्वर संहिता में है, वे कहते हैं, और उसमें यह भी है कि इस मंत्र की दीक्षा देने वाला गुरु भी हर प्रकार के व्यक्ति को उसी रूप में दीक्षा दे। जिस क्षत्रिय या ब्राह्मण ने वास्तव में यज्ञोपवीत धारण किया ही नहीं, वह भी नमः बाद में ही बोले: यज्ञोपवीत नहीं तो आप द्विज हैं ही नहीं, फिर पहले क्यों लगाएँगे? यह आपके ही कल्याण के लिए है, वे कहते हैं, "हम तो ब्राह्मण हैं, हम तो क्षत्रिय हैं" वाला झगड़ा नहीं।
पंचाक्षरी पुरश्चरण के साथ भगवती पार्वती के सप्ताक्षरी मंत्र का जप जोड़ना
पुरुष मंत्र की स्त्री शक्ति; दशांश, या एक माला भी, उसी माला पर
वक्ता कहते हैं कि जब भी हम किसी मंत्र का जप करते हैं, तो उसकी शक्ति का जप भी कर लें — पंचाक्षरी पुरुष मंत्र है, तो उसकी स्त्री शक्ति का — तो और विशेष कृपा मिलती है; इसलिए पंचाक्षरी का पुरश्चरण करने वाले भगवती पार्वती के सप्ताक्षरी मंत्र का दशांश भी कर लें तो अति उत्तम। वे स्पष्ट कहते हैं कि यह निज अनुभव से है, शिव महापुराण से नहीं, और करने का कोई दबाव नहीं। दस माला न हो सके तो सप्ताक्षरी की एक माला भी सही, जो उनकी पीडीएफ़ में दी है; अलग माला की ज़रूरत नहीं — हो तो लाल चंदन, लाल मूँगा, लाल हकीक या नौमुखी रुद्राक्ष की माला, नहीं तो जिस माला पर पंचाक्षरी जपा उसी पर सप्ताक्षरी की एक माला जपकर भगवती को समर्पित कर दें।
एक बात और ध्यान रखें, वक्ता कहते हैं: जब भी हम किसी मंत्र का जप करते हैं, तो अगर उससे संबंधित शक्ति का भी जप कर लें — पंचाक्षरी पुरुष मंत्र है, तो उसकी स्त्री शक्ति का — तो और विशेष कृपा मिलती है। इसलिए जो भी पंचाक्षरी का पुरश्चरण करने वाले हैं, वे भगवती पार्वती जी के सप्ताक्षरी मंत्र का दशांश भी कर लें तो अति उत्तम है। वे स्पष्ट करते हैं कि यह शिव महापुराण के अनुसार नहीं, निज अनुभव के अनुसार बता रहे हैं; किसी पर ऐसा दबाव नहीं कि करना ही है — वे विधान पूरा दे देंगे, जो करना चाहे कर सकता है। डिस्क्रिप्शन में दी पीडीएफ़ में यह है। आगे वे जोड़ते हैं: साथ में भगवती पार्वती के सप्ताक्षरी की दस माला न कर पाएँ तो एक माला भी सही — वह भी पीडीएफ़ में दी है; एक माला ही सही, जप कर लें। इसके लिए दूसरी माला की ज़रूरत नहीं। कोई दूसरी माला हो तो करिए — लाल चंदन की, लाल मूँगे की, लाल हकीक की, या नौमुखी रुद्राक्ष की; न हो तो जिस माला पर पंचाक्षरी का जप किया उसी पर सप्ताक्षरी की भी एक माला जपकर भगवती को समर्पित कर दें।
पंचाक्षरी पुरश्चरण के लिए सबसे अच्छे मास
श्रावण, भाद्रपद या माघ में शीघ्र जागृत; किसी भी मास में मना नहीं
वक्ता कहते हैं कि पंचाक्षरी का पुरश्चरण सावन के मास में, भाद्रपद में या माघ में करें तो मंत्र अति शीघ्र जागृत होता है और शिव की विशेष कृपा मिलती है; शिव महापुराण में वर्णन है कि भाद्रपद में अनुष्ठान करने से भी लाभ और शीघ्र सिद्धि मिलती है। अन्य किसी भी मास में भी कर सकते हैं — उसके लिए कोई मना ही नहीं — लेकिन वे श्रावण की चर्चा कर रहे हैं, उसे 30 दिन का मास मानकर।
करने का विधान कैसे रहेगा, इस पर वक्ता कहते हैं कि श्रावण के मास में, भादो के मास में या माघ के मास में अगर हम इस मंत्र का पुरश्चरण करते हैं तो यह मंत्र अति शीघ्र जागृत होता है और हमें भगवान शिव की विशेष कृपा मिलती है। मान लीजिए श्रावण 30 दिन का है, वे कहते हैं। भाद्रपद के मास में भी अनुष्ठान करेंगे तो शिव महापुराण में वर्णन है कि मंत्र से लाभ होता है, सिद्धि शीघ्र मिलती है; और माघ में, और अन्य मास में भी कर सकते हैं। लेकिन विशेष रूप से अभी वे श्रावण मास पर चर्चा कर रहे हैं; पुरश्चरण कभी भी कर सकते हैं — उसके लिए कोई मना ही नहीं है।
एक मास के पंचाक्षरी पुरश्चरण की रूपरेखा: पाँच लाख का लक्ष्य, रोज़ की मालाएँ और रोज़ का संकल्प
रोज़ लगभग 171 माला, न्यूनतम सवा लाख, और हर दिन नया संकल्प
वक्ता कहते हैं कि पुरश्चरण का लक्ष्य कम से कम पाँच लाख रखें, जिसे वे 5,000 माला गिनते हैं। तीन घंटे भी निकालें तो जप दो-ढाई घंटे में आराम से हो जाता है: रोज़ कम से कम 166 माला — 171 मान लीजिए — 30 दिन तक करें तो 5,130 माला, यानी पाँच लाख पूरा और एक पुरश्चरण पूर्ण, जिसका श्रावण में अति उत्तम फल मिलता है। 171 न हो सके तो 100, या 50 भी, पर पूरे महीने में कम से कम 1,250 माला — सवा लाख — तो ज़रूर, और कम संख्या पर ध्यान न दें। वे यह भी कहते हैं कि संकल्प पूरे महीने का एक बार नहीं, प्रतिदिन लें — एक बार का संकल्प लेना चाहें तो उन्हें विरोध नहीं — ताकि किसी कारण संकल्प टूटे तो कष्ट न हो: लक्ष्य पाँच लाख का ही रहेगा, पर संकल्प और समर्पण रोज़ होंगे।
जब हम यह पुरश्चरण आरंभ करें, वक्ता कहते हैं, तो लक्ष्य कम से कम पाँच लाख का रखें। पाँच लाख जप के लिए 5,000 माला जप करनी है। रोज़ कितना समय लगेगा? मान लीजिए तीन घंटे भी निकाल लें तो जप दो-ढाई घंटे में आराम से हो जाएगा। रोज़ कम से कम 166 माला — 171 मान लीजिए — 30 दिन तक करें तो 5,130 माला जप होगा, यानी हम आराम से पाँच लाख की संख्या पूरी कर लेंगे और एक पुरश्चरण पूर्ण हो जाएगा; और श्रावण मास में इतना कर लें तो अति उत्तम फल मिलता है। तो 171 माला मिनिमम करनी चाहिए। उतना न कर पाएँ तो 100 माला कीजिए; 100 भी नहीं तो 50। कम से कम पूरे महीने में 1,250 माला — सवा लाख का जप — तो ज़रूर कर लेना चाहिए। और कम संख्या पर ध्यान मत दीजिए, वे कहते हैं। एक विषय वे पहले ही स्पष्ट कर देते हैं: संकल्प एक ही बार में नहीं लेना है। नए लोग विशेष करके — वे इसके विरोध में नहीं, आप जैसा चाहें ले सकते हैं — लेकिन वे एकदम सरल कर रहे हैं ताकि कोई कष्ट न हो, बीच में किसी कारण संकल्प टूट जाए तो दिक्कत न हो। तो हम प्रतिदिन संकल्प लेंगे: लक्ष्य पाँच लाख का रखेंगे, लेकिन संकल्प प्रतिदिन लेंगे, समर्पण प्रतिदिन करेंगे।
पंचाक्षरी पुरश्चरण की दैनिक विधि: सामग्री, दीपक, संकल्प, स्मरण, अभिषेक, जप और आरती
दो दीपकों से कपूर आरती तक पूरी बैठक, लगभग तीन घंटे में
दैनिक बैठक के लिए वक्ता पीला वस्त्र और पीला आसन, रोज़ अभिषेक के लिए शिवलिंग, बिल्व पत्र, कनेर, आकवन और शमी का पत्ता या पुष्प, और गौ माता का दूध — या जल में रोली, मसला कपूर और अगरु या गुलाब जल मिलाकर बना गंधोदक — माँगते हैं। पीला या श्वेत पहनकर पूर्व या उत्तर मुख बैठें, दो दीपक जलाएँ — सरसों तेल का रक्षात्मक शक्तियों (भैरव, हनुमान, काली, योगिनियों) के लिए, घी का शिव, पार्वती, समस्त पौष्टिक शक्तियों और कुल देवी-देवताओं के लिए — और आचमन, पवित्री धारण, शिखा बंधन, भूमि स्पर्श, आसन शोधन करें। फिर स्वस्तिवाचन (या मंगलम् भगवान विष्णु मंत्र), गुरु स्मरण — गुरु न हों तो दत्तात्रेय, क्योंकि उनमें ब्रह्मा-विष्णु-महेश तीनों हैं, या शिव या नारायण — और अक्षत, पुष्प, जल लेकर नाम, गोत्र, तिथि, नक्षत्र बोलते हुए दिन का संकल्प: शिव की प्रसन्नता के लिए, पंचाक्षर मंत्र की सिद्धि के लिए, जन्म-जन्मांतर के पापों और ज्ञात-अज्ञात दोषों के नाश के लिए, पितृ देवों की प्रसन्नता के लिए आज यथाशक्ति जप का संकल्प। फिर संकट नाशन स्तोत्र से गणेश, स्तोत्र-शतनामावली से बटुक भैरव, और सप्तश्लोकी या स्तोत्र से भगवती — कुल पाँच मिनट — फिर बारह ज्योतिर्लिंगों के नाम से शिव का अभिषेक और श्रृंगार, चाहें तो शिव कवच, स्तोत्र या रुद्राष्टकम्, और गोमुखी में रखी रुद्राक्ष माला पर जप। बाद में समर्पण, शिव तांडव स्तोत्र या लिंगाष्टकम् जैसी स्तुति, और कपूर से आरती। अधिकतम तीन घंटे, वे कहते हैं।
सामग्री, वक्ता कहते हैं: पीला वस्त्र, पीला आसन, और भगवान शिव का एक शिवलिंग अवश्य ताकि रोज़ अभिषेक कर सकें; बिल्वपत्र, कनेर का पुष्प, आकवन का पुष्प, शमी का पत्ता और पुष्प मिल जाए; और अभिषेक के लिए दूध — गौ माता का दूध मिले तो अति उत्तम। दूध न मिले तो गंधोदक बना लें: जल में रोली और कपूर, कपूर को थोड़ा मसलकर पाउडर बनाकर, अगरु या गुलाब जल मिलाकर — इसका अलग वीडियो चैनल पर है। अभिषेक सामान्यतः बारह ज्योतिर्लिंग के नाम से करना है। रोज़ का क्रम: पीला — या श्वेत — वस्त्र पहनकर पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके आसन पर बैठें। सबसे पहले दो दीप जलाएँ, एक घी का, एक सरसों तेल का, सभी देवताओं का स्मरण करते हुए: सरसों तेल का दीपक रक्षात्मक शक्तियों — भैरव जी, हनुमान जी, भगवती काली, योगिनियों — के लिए, और घी का भगवान शिव, माँ पार्वती, समस्त पौष्टिक शक्तियों और कुलदेवी-देवताओं के लिए। फिर आरंभिक प्रक्रिया — आचमन, पवित्री धारण, शिखा बंधन, भूमि स्पर्श, आसन शोधन आदि, सब चैनल पर लाइव दिखाया गया है। फिर स्वस्तिवाचन, न आता हो तो "मंगलम् भगवान विष्णु" मंत्र; फिर गुरु स्मरण — गुरु न हों तो भगवान दत्त को गुरु स्वरूप में, क्योंकि उनमें ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीनों की शक्ति समाहित है, या भगवान शिव या भगवान नारायण, जिनमें आस्था हो; गुरु स्तोत्र पीडीएफ़ में सबसे पहले है। फिर संकल्प, सामान्य हिंदी में या, बेहतर, संस्कृत में: हाथ में अक्षत, पुष्प, जल लेकर, नाम, गोत्र, तिथि, नक्षत्र जितना आता हो बोलकर — भगवान शिव की प्रसन्नता के लिए, पंचाक्षर मंत्र की सिद्धि के लिए, और इस मंत्र की कृपा से, शिव और भगवती की कृपा से जन्म-जन्मांतर के अर्जित सभी पापों के नाश के लिए, ज्ञात-अज्ञात सभी दोषों के नाश के लिए, पितृ देवों की प्रसन्नता के लिए, शिव की प्रसन्नता के लिए आज इस मंत्र का यथाशक्ति जप करने का संकल्प लेते हैं। फिर संकटनाशन गणपति स्तोत्र से गणपति जी, स्तोत्र और शतनामावली से बटुक भैरव जी, फिर सप्तश्लोकी दुर्गा या स्तोत्र-शतनामावली से भगवती का स्मरण-पूजन — सब पीडीएफ़ में; यह आरंभिक पूजन पाँच मिनट में आराम से पूरा हो जाता है। अब शिव का अभिषेक — प्रक्रिया का अपना वीडियो है, या सीधे बारह ज्योतिर्लिंगों के नाम से कर लें — और श्रृंगार। उसके बाद चाहें तो शिव का कवच, स्तोत्र-शतनाम या रुद्राष्टकम, जो संभव हो, पढ़ें और रुद्राक्ष की माला से, गोमुखी के भीतर रखकर, जप शुरू करें; गोमुखी का प्रयोग और जप की विधि भी चैनल पर है। जप के बाद समर्पण, फिर पुनः स्तुति — शिव तांडव स्तोत्र या जो संभव हो, लिंगाष्टकम — भगवान शिव को सुनाएँ, और फिर कपूर से आरती। इतना रोज़, वे कहते हैं, अधिकतम तीन घंटे लेगा; उससे ज़्यादा नहीं।
श्रावण के तीस दिन रोज़ तीन घंटे: स्वर्णिम काल, विशेषकर तीर्थ में
काशी-उज्जैन वासी, और दूर रहने वालों पर विशेष कृपा
वक्ता कहते हैं कि सावन के तीस दिन चौबीस घंटे में से तीन घंटे इस साधना को देने से कई-कई जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं। काशी, उज्जैन (अवंतिकापुरी) या किसी भी तीर्थ क्षेत्र में रहने वालों के लिए यह स्वर्णिम काल उन्हें मुक्त करने वाला है। बाकी जगह के लोग साधना करेंगे तो शिव विशेष कृपा करते हैं — दूर रहने वाले बच्चों से माता-पिता को और ज़्यादा प्रेम होता है; जो पास हैं उनके पास माता-पिता को प्रसन्न करने का पूरा अवसर है, करना न करना उन पर है, पर जो दूर हैं और स्मरण करते हैं, उन पर शिव और प्रसन्न होते हैं।
चौबीस घंटे में से तीन घंटे निकालिए, वक्ता कहते हैं, सावन के तीस दिन, तो कई-कई जन्मों के पाप नष्ट हो जाएँगे। काशी में रहने वाले, उज्जैन, अवंतिकापुरी के लोग, या किसी भी तीर्थ क्षेत्र के लोग — उनके लिए तो, वे कहते हैं, भैया, यह गोल्डन पीरियड उन्हें मुक्त करने वाला है। बाकी जगहों के लोग साधना करेंगे तो भगवान शिव विशेष कृपा करते हैं: दूर रहने वाले बच्चों से माता-पिता को और ज़्यादा प्रेम होता है। जो पास हैं, उनके लिए पूरा अवसर है कि अपने माँ-बाप को जितना प्रसन्न कर सकें करें; करना न करना उनके ऊपर है। लेकिन जो दूर हैं और स्मरण कर रहे हैं — उन पर भगवान शिव और प्रसन्न होते हैं।
बीच में उठना पड़े तो पंचाक्षरी जप की बैठक कैसे फिर शुरू करें
जो हुआ समर्पित करें, हाथ-पैर सीधे करें, आचमन-स्मरण से फिर बैठें
वक्ता कहते हैं कि 200 या 171 माला एक बार में न हो पाए और बीच में उठने की ज़रूरत पड़े, तो पहली बैठक में जितना जप हुआ उसका समर्पण कर दें, थोड़ा चल-फिरकर हाथ-पैर और कमर सीधी करें, फिर आसन पर बैठकर आचमन करें, गुरु और गणेश का फिर स्मरण करें, जप शुरू करके अंत में पुनः समर्पण कर दें।
अगर आप 200 माला या 171 माला का जप कर रहे हैं, वक्ता कहते हैं, और एक बार में नहीं हो पा रहा — बीच में उठने की आवश्यकता पड़ गई — तो पहली बैठक में जितना हो पाए जप करके उसका समर्पण कर दें। थोड़ा चल-फिरकर हाथ-पैर सीधे करें, कमर सीधी करें। फिर आसन पर बैठ जाएँ, आचमन करें, गुरु-गणपति का फिर स्मरण करें, जप शुरू करें और अंत में पुनः समर्पण कर दें। विधि इसी प्रकार रहेगी।
पंचाक्षरी पुरश्चरण को पूर्ण करने वाला श्रावण पूर्णिमा का हवन
वही मंत्र स्वाहा के साथ; बिल्व या नवग्रह समिधा, आम कभी नहीं; घी-गुग्गुल
वक्ता कहते हैं कि श्रावण पूर्णिमा के दिन हवन अवश्य करना है, उसी मंत्र में स्वाहा जोड़कर — जो शिवाय पहले बोलते हैं वे शिवाय, नमः, स्वाहा; जिन्हें नमः पहले बोलने का अधिकार है वे नमः, शिवाय, स्वाहा। कम से कम पाँच माला की आहुति दें, और जितना हो सके — 10, 11, 21 या 27 माला। समिधा में नवग्रह लकड़ी या गाय के गोबर के उपले; आम की लकड़ी बिल्कुल नहीं; बिल्व की सूखी लकड़ी सर्वश्रेष्ठ। पौष्टिक सामग्री का मिश्रण करके आहुति दें, जो चैनल पर है, और पुरुष विशेष रूप से घी में गुग्गुल मिलाकर आहुति दें। अगर पति-पत्नी मिलकर यह पुरश्चरण अनुष्ठान करें, वे कहते हैं, तो शिव और जगदंबा द्वारा स्वर्ग उन पर न्योछावर हो जाएगा — यह दिव्य काल है, इसका लाभ उठाएँ।
श्रावण पूर्णिमा के दिन, वक्ता कहते हैं, हवन अवश्य करना है। मंत्र वही रहेगा — उस पर पूरी चर्चा हो चुकी है। हवन में प्रयोग कैसे होगा? जो शिवाय पहले बोलते हैं वे शिवाय, नमः, फिर स्वाहा बोलेंगे; जो नमः पहले बोलते हैं — जिसका अधिकार है — वे नमः, शिवाय, फिर स्वाहा। कम से कम पाँच माला की आहुति अवश्य दें; अधिकतम जितना हो सके — 10 माला, 11, 21, 27। हवन में समिधा के लिए नवग्रह लकड़ी का प्रयोग करें; गाय के गोबर के उपले भी प्रयोग कर सकते हैं। आम की लकड़ी का प्रयोग बिल्कुल न करें — इसका ध्यान रखें; आम की लकड़ी नहीं करनी है। बिल्व की सूखी लकड़ी मिल जाए तो सर्वश्रेष्ठ; उस पर आहुति दें। आहुति पौष्टिक सामग्री से देनी है — कौन-कौन सी, चैनल पर है; उसका मिश्रण करके आहुति दें। और पुरुष विशेष रूप से घी और गुग्गुल मिलाकर घी-गुग्गुल की आहुति देंगे। अगर पति-पत्नी दोनों मिलकर यह पुरश्चरण अनुष्ठान करें, वे कहते हैं — भैया, स्वर्ग आप ही के लिए है; स्वर्ग क्या? पति-पत्नी साथ में यह अनुष्ठान करें तो भगवान शिव और माँ जगदंबा द्वारा स्वर्ग आप पर न्योछावर हो जाएगा। यह दिव्य काल है; इसका लाभ उठाइए। वीडियो सुनने के बाद भी कोई संशय रहे, वे जोड़ते हैं, तो श्रावण से पहले लाइव में प्रश्न रखें ताकि संशय दूर हो और हमारा श्रावण सफल हो।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।