नया तंत्र साधक साधना कैसे आरंभ करे, भाग 2: गुरु तत्व

नए साधक हेतु साधना की नींव पर क्रमवार व्याख्या

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The notes
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01

कर्म साक्षी दीप जलाने के बाद के छह आरंभिक विधान: हर पूजन का आधार

इनके बिना पूर्ण फल नहीं

· Reviewed Sep 14, 2026 · 00:22–00:46

वक्ता कहते हैं कि बिल्कुल नए साधक को सबसे पहले पूजन का एकदम आरंभिक विधान जानना चाहिए, जिसकी चर्चा पिछले भाग में हुई: दीप प्रज्वलन के आसपास का विधान। वे स्पष्ट करते हैं कि वहाँ बताए छह आरंभिक विधान कर्म साक्षी दीप प्रज्वलित करने के पश्चात करने चाहिए। वे ज़ोर देते हैं कि इन्हें अवश्य जान लें, क्योंकि इनके बिना जो भी करेंगे वह पूर्ण फल नहीं देगा।

02

स्वस्तिवाचन: यज्ञोपवीत धारियों के लिए पूर्ण वैदिक रूप, बाकी सबके लिए पौराणिक श्लोक

माताएँ-बहनें और बिना यज्ञोपवीत वाले क्या पढ़ें

· Reviewed Sep 14, 2026 · 00:47–01:56

वक्ता कहते हैं कि आरंभ के छह कर्मों के बाद पहला विषय स्वस्तिवाचन है, यानी मांगलिक श्लोकों का वाचन, जिनमें वैदिक मंत्र भी हैं और पौराणिक श्लोक भी। जो यज्ञोपवीत धारण करते हैं वे पूर्ण स्वस्तिवाचन सीखें, जिसमें "आनो भद्रा" आदि मंत्रों का सही वाचन भी है, किसी से या YouTube से। जो इसे नहीं सीखना चाहते, यज्ञोपवीत नहीं पहनते, या माताएँ-बहनें हैं, वे केवल पौराणिक श्लोक पढ़ें: गणपति के 12 नाम, "शुक्लांबरधरं", भगवती दुर्गा का मंत्र, श्रीमद्भगवद्गीता के कुछ श्लोक और भैरव तथा काशी क्षेत्र के कुछ श्लोक, जो नित्य कर्म पूजा प्रकाश जैसी पुस्तक में मिल जाते हैं।

03

संकल्प नित्य पूजन में भी अनिवार्य है, केवल कई दिनों के अनुष्ठान में नहीं

बिना संकल्प लक्ष्य स्पष्ट नहीं रहता

· Reviewed Sep 14, 2026 · 01:57–02:25

वक्ता कहते हैं कि स्वस्तिवाचन के बाद संकल्प आता है, और वह नित्य पूजन में भी लेना है। ऐसा नहीं है कि केवल 40 दिन या 9 दिन के संकल्प में ही संकल्प करना होता है; नित्य पूजन में भी यह अति आवश्यक है। कारण: संकल्प न लें तो लक्ष्य स्पष्ट नहीं रहेगा, और लक्ष्य होना चाहिए भले आप एक दिन का कुछ कर रहे हों। इसलिए नित्य पूजन का संकल्प भी अनिवार्य है।

04

संकल्प के समय हाथ में कुशा या स्वर्ण मुद्रिका, और हिंदी में संकल्प लेना

देव दीक्षा विधान वीडियो में हिंदी संकल्प का पाठ

· Reviewed Sep 14, 2026 · 02:26–03:13

वक्ता कहते हैं कि संकल्प में संभव हो तो कुश का अवश्य प्रयोग करें। अगर कुशा की पवित्री या स्वर्ण मुद्रिका पहनी है तो कोई विषय नहीं; पर दोनों में से कुछ नहीं पहना है तो संकल्प के समय कुशा हाथ में अवश्य होनी चाहिए। शब्दों पर: संस्कृत में पूरा संकल्प लेना आता हो तो ठीक, नहीं तो हिंदी में सामान्य संकल्प भी चलता है, और हिंदी में संकल्प लेने का पूरा विधान, पीडीएफ सहित, इसी चैनल के भगवान दत्तात्रेय के देव दीक्षा विधान वाले वीडियो में है।

05

संकल्प के बाद प्रथम पूजन गुरु का, और बिना दीक्षा के दत्तात्रेय ही सबसे सुगम गुरु

दत्त स्मरण से समस्त गुरु मंडल का पूजन

· Reviewed Sep 14, 2026 · 03:14–04:11

वक्ता कहते हैं कि संकल्प के बाद प्रथम पूजन गुरु का होता है, और यहीं से साधना का प्रथम चरण आरंभ होता है। पूछे जाने पर कि गुरु ही न हो, दीक्षा ही न हुई हो तो गुरु पूजन कैसे करें, वे उत्तर देते हैं कि सबसे सुगम और सरल विषय भगवान दत्तात्रेय हैं: उनके स्वरूप का प्रादुर्भाव इसी कारण हुआ है कि समस्त संसार में जहाँ किसी जिज्ञासु को गुरु तत्त्व की आवश्यकता हो और गुरु पाने की ललक हो, वे तत्क्षण उपस्थित होते हैं। वे कहते हैं कि दत्तात्रेय का स्मरण मात्र करने से समस्त गुरु मंडल का पूजन हो जाता है।

06

जिस भी परंपरा में आगे दीक्षा हो, उसमें दत्तात्रेय का पूजन होगा ही

ब्रह्मा, विष्णु और सदाशिव का एकीकृत रूप

· Reviewed Sep 14, 2026 · 04:12–05:00

वक्ता कहते हैं कि दत्तात्रेय का स्वरूप ब्रह्मा जी, विष्णु जी और भगवान सदाशिव का एकीकृत रूप है। भविष्य में जब कभी पुण्यों से युक्त होकर आप किसी भी कुल परंपरा में दीक्षित होंगे, चाहे वैष्णव हो, शैव, शाक्त, कौल संप्रदाय या अघोर, उसमें दत्तात्रेय का पूजन किसी न किसी रूप में होगा ही होगा; और जब आपके गुरु मंडल पूजन की विधि और पात्र साधना की बृहद विधि सिखाएँगे, तो यंत्र पूजन, मंडल पूजन और आधार पूजन में दत्तात्रेय का स्थान अवश्य होगा। इसलिए, वे कहते हैं, निश्चिंत होकर दत्तात्रेय के प्रति समर्पण लाकर गुरु तत्व से संबंधित पूजन करें।

07

दत्तात्रेय के माध्यम से गुरु पूजन कैसे करें, और पितरों, 64 योगिनियों व 52 भैरवों पर उनका आदेश

गुरु मंडल की कृपा से समय आने पर गुरु प्राप्ति

· Reviewed Sep 14, 2026 · 05:01–06:08

दत्तात्रेय के माध्यम से गुरु पूजन के लिए वक्ता कहते हैं कि गुरु को समर्पित श्लोक जैसे "गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु" का वाचन करें, या दत्त की 108 नामावली, अष्टोत्तर शतनाम, या उनके 12 नामों का पाठ करें; इनमें से किसी से भी समस्त गुरु मंडल का पूजन हो जाता है। वे जोड़ते हैं कि समस्त पितृों के उद्धार का कारण भगवान दत्त हैं, और महासिद्धों में सिद्ध भगवान दत्त ही वह मूल तत्व शक्ति हैं जो 64 योगिनीयों और 52 भैरवों को चलाते और आदेश देते हैं। उनके स्वरूप का पूजन मात्र, स्मरण मात्र उन्हें संतुष्ट कर देता है; संतुष्ट होकर वे समस्त गुरु मंडल की कृपा कर देते हैं। जैसे-जैसे पुण्य बढ़ते हैं और दूषित प्रारब्ध का क्षय होता है, विवेक स्वयं जागृत होता है, मार्ग दिखने लगता है, और समय आने पर गुरु की प्राप्ति भी हो जाती है।

08

गुरु पूजन के विकल्प के रूप में दक्षिणामूर्ति और गुरु गीता, और वक्ता दत्त को क्यों चुनते हैं

गुरु तत्व से संपन्न दो स्वरूप

· Reviewed Sep 14, 2026 · 06:09–07:21

पूछे जाने पर कि प्रथम साधना कौन सी करें, वक्ता कहते हैं कि साधक की पहली साधना गुरु की ही होनी चाहिए। गुरु तत्व से संपन्न आदि गुरु, जो सबसे बड़ी महाशक्ति के स्वरूप में हैं, भगवान दत्तात्रेय हैं; गुरु तत्व से संपन्न दूसरा स्वरूप भगवान सदाशिव का दक्षिणामूर्ति शिव है, जो तंत्र में अनन्य है और दशों महाविद्या में से किसी के भी पूजन में जिसका स्थान अवश्य होता है। आप इन स्वरूपों के लिए भी जा सकते हैं, पर इनके पूजन का विधि-विधान किसी योग्य व्यक्ति से जान लें; गुरु गीता का आश्रय लेकर भी गुरु पूजन किया जा सकता है। उनके अपने मत में, चूँकि आगे आपकी परंपरा कौन सी होगी यह न आप जानते हैं न वे, सबके लिए तत्क्षण प्रभाव और मार्गदर्शन देने वाली सबसे प्रभावी शक्ति दत्त हैं, इसलिए दत्त की शरणागति लें और उनका पूजन करें।

09

गुरु की ललक का उत्तर मिलता है: गुरु मिलने तक पहला पुरश्चरण दत्त के लिए

पूर्व जन्म का गुरु तत्व कुल परंपरा के निकट लाता है

· Reviewed Sep 14, 2026 · 07:22–08:09

वक्ता कहते हैं कि जब तक गुरु नहीं है, देव दीक्षा विधान करके सबसे पहला पुरश्चरण अनुष्ठान भगवान दत्तात्रेय के निमित्त, गुरु मंडल के निमित्त करें। ऐसा नहीं है कि इस जन्म में गुरु की प्राप्ति नहीं हुई तो पूर्व जन्मों में भी नहीं हुई होगी; अवश्य हुई होगी। यह साधना ललक से करने पर गुरु की प्राप्ति होती ही होती है, क्योंकि दत्तात्रेय का यह दायित्व ही है कि जो कोई गुरु के लिए ललक प्रस्तुत करे, समर्पित होकर कातर भाव से पुकारे, उसे गुरु प्रदान करना। जैसे-जैसे पूर्व जन्म के गुरु तत्व और कुल परंपरा के पुण्यों का अंश बृहद रूप से बढ़ता है, वे कहते हैं, आप उस कुल परंपरा के निकट होते जाते हैं।

10

बिना गुरु के साधक के लिए देव दीक्षा विधान और एकाक्षरी जप, और उससे जुड़ी शंकाएँ

शंकाएँ हटाएँ, समर्पण पुष्ट करें, फिर आरंभ

· Reviewed Sep 14, 2026 · 08:10–08:56

वक्ता कहते हैं कि जिसके कोई गुरु नहीं हैं वह सबसे पहले देव दीक्षा विधान करे; पूरी विधि चैनल पर है, YouTube पर "देव दीक्षा विधान गृहस्थ तंत्र" खोजने पर मिल जाती है। उन्हें देखकर विधान कीजिए और एकाक्षरी का जप कीजिए। वे उन शंकाओं का उल्लेख करते हैं जो लोग उठाते हैं, कि एकाक्षरी जप का अधिकार है या नहीं, और यह भय कि जो करेगा वह विरक्त हो जाएगा, दत्तात्रेय का दूत हो जाएगा, संन्यासी हो जाएगा, और कहते हैं कि इनका निवारण कई बार अलग से लाइव और वीडियो में प्रॉपरली किया गया है। उनका निर्देश है कि उन्हें सुनकर सभी शंकाएँ हटा दें, अपना समर्पण पुष्ट करें, और प्रथम साधना दत्त की करें।

11

एकाक्षरी के बाद: दत्त माला मंत्र और वज्र कवच, बृहस्पतिवार पूजन और पूर्णिमा दीपदान

किसी भी स्तर के साधक के लिए पहले दत्त

· Reviewed Sep 14, 2026 · 08:57–09:48

वक्ता कहते हैं कि जब एकाक्षरी हो जाए तो आगे दो चीज़ों की साधना करनी चाहिए: dattatreya-mala-mantra और वज्र कवचम्। आप किसी भी स्तर के साधक हों, बिल्कुल नए या पहले से करते आ रहे, प्रथम साधना भगवान दत्त की करेंगे: बृहस्पतिवार को उनका विशेष पूजन, पूर्णिमा आदि को उनका दीपदान, और महापर्व काल में उनका दीपदान। दीपदान की पूरी तंत्रोक्त विधि और उसके अनुभव समय-समय पर चैनल पर आते रहते हैं। सेवा-पूजा भाव से करने पर, वे कहते हैं, इसका कोई तिर्यक प्रभाव नहीं होता और तपोबल की वृद्धि होती है। इसके बाद ही अन्य, जैसे पंचाक्षरी मंत्र, की बात रहेगी।

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यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।

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