नया तंत्र साधक साधना कैसे आरंभ करे, भाग 2: गुरु तत्व
नए साधक हेतु साधना की नींव पर क्रमवार व्याख्या
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कर्म साक्षी दीप जलाने के बाद के छह आरंभिक विधान: हर पूजन का आधार
इनके बिना पूर्ण फल नहीं
वक्ता कहते हैं कि बिल्कुल नए साधक को सबसे पहले पूजन का एकदम आरंभिक विधान जानना चाहिए, जिसकी चर्चा पिछले भाग में हुई: दीप प्रज्वलन के आसपास का विधान। वे स्पष्ट करते हैं कि वहाँ बताए छह आरंभिक विधान कर्म साक्षी दीप प्रज्वलित करने के पश्चात करने चाहिए। वे ज़ोर देते हैं कि इन्हें अवश्य जान लें, क्योंकि इनके बिना जो भी करेंगे वह पूर्ण फल नहीं देगा।
वक्ता इसे इस विषय का दूसरा भाग बताते हैं कि साधना के मार्ग में बिल्कुल नया व्यक्ति अपना आधार कैसे मज़बूत करे और कहाँ से शुभारंभ करे। वे कहते हैं कि पहले वाला भाग अवश्य सुन लें: उसमें एकदम आधारभूत शुभारंभ, पूजन में दीप प्रज्वलित करने से पहले का विधान, बिल्कुल आरंभ की प्रक्रियाएँ बताई गई हैं। वे क्रम का एक स्पष्टीकरण जोड़ते हैं: वे छह विधान कर्म साक्षी दीप प्रज्वलित करने के पश्चात करने चाहिए। उनके ज़ोर देने का कारण सरल है: इन विधानों के बिना आप जो भी करेंगे, वह पूर्ण फल प्रदान नहीं करेगा। आरंभ के इन छह कर्मों के बाद ही वे अगले चरणों पर बढ़ते हैं।
स्वस्तिवाचन: यज्ञोपवीत धारियों के लिए पूर्ण वैदिक रूप, बाकी सबके लिए पौराणिक श्लोक
माताएँ-बहनें और बिना यज्ञोपवीत वाले क्या पढ़ें
वक्ता कहते हैं कि आरंभ के छह कर्मों के बाद पहला विषय स्वस्तिवाचन है, यानी मांगलिक श्लोकों का वाचन, जिनमें वैदिक मंत्र भी हैं और पौराणिक श्लोक भी। जो यज्ञोपवीत धारण करते हैं वे पूर्ण स्वस्तिवाचन सीखें, जिसमें "आनो भद्रा" आदि मंत्रों का सही वाचन भी है, किसी से या YouTube से। जो इसे नहीं सीखना चाहते, यज्ञोपवीत नहीं पहनते, या माताएँ-बहनें हैं, वे केवल पौराणिक श्लोक पढ़ें: गणपति के 12 नाम, "शुक्लांबरधरं", भगवती दुर्गा का मंत्र, श्रीमद्भगवद्गीता के कुछ श्लोक और भैरव तथा काशी क्षेत्र के कुछ श्लोक, जो नित्य कर्म पूजा प्रकाश जैसी पुस्तक में मिल जाते हैं।
आरंभ के छह कर्मों के बाद, वक्ता कहते हैं, पहला विषय स्वस्तिवाचन का है। इसमें मांगलिक श्लोकों का वाचन किया जाता है। इनमें वैदिक मंत्र भी हैं और पौराणिक मंत्र, पौराणिक श्लोक भी। वे बाँटते हैं कि कौन क्या पढ़े। अगर आप यज्ञोपवीतवैदिक कर्मों में दीक्षा का प्रतीक यज्ञोपवीत (जनेऊ) संस्कार — पीढ़ियों तक न होने पर, इसे पुनः आरंभ करने से पहले हर ज्ञात पीढ़ी के लिए प्रायश्चित आवश्यक है। धारण करते हैं और पूरा स्वस्तिवाचन सीखे हैं, या YouTube पर जगह-जगह उपलब्ध सामग्री से सीख लेते हैं, तो आप, यज्ञोपवीत धारण करने वाले, पूर्ण स्वस्तिवाचन करें। "आनो भद्रा" आदि मंत्रों का सही प्रकार से वाचन सीखना आवश्यक है। अगर आप वह नहीं सीखना चाहते, या यज्ञोपवीत धारण नहीं करते, या आप माताएँ-बहनें हैं, तो आप सभी पौराणिक मांगलिक श्लोक लें। वे गिनाते हैं: भगवान गणपति के 12 नाम, "शुक्लांबरधरं" मंत्र, भगवती दुर्गा का मंत्र, श्रीमद्भगवद्गीता के कुछ श्लोक, और भगवान भैरव तथा काशी क्षेत्र के कुछ विषय। ये नित्य कर्म पूजा प्रकाश जैसी पुस्तक में मिल जाते हैं, आप उनका केवल पाठ करें। तो इस वर्ग के लिए पौराणिक श्लोक सबसे पहले आते हैं।
संकल्प नित्य पूजन में भी अनिवार्य है, केवल कई दिनों के अनुष्ठान में नहीं
बिना संकल्प लक्ष्य स्पष्ट नहीं रहता
वक्ता कहते हैं कि स्वस्तिवाचन के बाद संकल्प आता है, और वह नित्य पूजन में भी लेना है। ऐसा नहीं है कि केवल 40 दिन या 9 दिन के संकल्प में ही संकल्प करना होता है; नित्य पूजन में भी यह अति आवश्यक है। कारण: संकल्प न लें तो लक्ष्य स्पष्ट नहीं रहेगा, और लक्ष्य होना चाहिए भले आप एक दिन का कुछ कर रहे हों। इसलिए नित्य पूजन का संकल्प भी अनिवार्य है।
स्वस्तिवाचन के बाद अगला विषय, वक्ता कहते हैं, संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। का है। वे दृढ़ हैं कि संकल्प नित्य पूजन में करना है। ऐसा नहीं है कि केवल 40 दिन या 9 दिन के संकल्प में ही संकल्प करना होता है; नित्य पूजन में भी संकल्प अति आवश्यक है। कारण वे यह देते हैं कि संकल्प न लेंगे तो लक्ष्य स्पष्ट नहीं रहेगा। लक्ष्य होना चाहिए: भले आप एक दिन का कर रहे हों, कुछ भी कर रहे हों, नित्य पूजन का भी संकल्प अनिवार्य होता है। तो संकल्प लेंगे।
संकल्प के समय हाथ में कुशा या स्वर्ण मुद्रिका, और हिंदी में संकल्प लेना
देव दीक्षा विधान वीडियो में हिंदी संकल्प का पाठ
वक्ता कहते हैं कि संकल्प में संभव हो तो कुश का अवश्य प्रयोग करें। अगर कुशा की पवित्री या स्वर्ण मुद्रिका पहनी है तो कोई विषय नहीं; पर दोनों में से कुछ नहीं पहना है तो संकल्प के समय कुशा हाथ में अवश्य होनी चाहिए। शब्दों पर: संस्कृत में पूरा संकल्प लेना आता हो तो ठीक, नहीं तो हिंदी में सामान्य संकल्प भी चलता है, और हिंदी में संकल्प लेने का पूरा विधान, पीडीएफ सहित, इसी चैनल के भगवान दत्तात्रेय के देव दीक्षा विधान वाले वीडियो में है।
संकल्प पर वक्ता कहते हैं: संभव हो तो कुशपवित्र घास, जो आसन, पवित्री और मार्जन में प्रयुक्त होती है; आध्यात्मिक रूप से रोधक मानी जाती है। का अवश्य प्रयोग करें। अगर आपने कुशा की पवित्रीकुश घास से बनी अंगूठी जो अनामिका में धारण की जाती है, पितृ कर्म तथा अनेक अनुष्ठानों में आवश्यक। पहनी है, या स्वर्ण मुद्रिका यानी सोने की अंगूठी पहनी है, तो कोई विषय नहीं। पर अगर सोने की मुद्रिका भी नहीं और पावित्री भी नहीं, तो संकल्प के समय कुशा हाथ में अवश्य होनी चाहिए। संकल्प कैसे लें, इस पर वे एक बात का ध्यान रखने को कहते हैं। संस्कृत में पूरा संकल्प लेना आता हो तो ठीक; नहीं तो हिंदी में सामान्य संकल्प भी चलता है। लेने का पूरा विधान इसी चैनल पर भगवान दत्तात्रेय के देव दीक्षा विधान वाले वीडियो में है: वहाँ सुनिए कि हिंदी में संकल्प कैसे लिया जाए, और वहाँ एक पीडीएफ भी मिल जाएगा, जिसे पढ़कर, देखकर आप संकल्प ले सकते हैं।
संकल्प के बाद प्रथम पूजन गुरु का, और बिना दीक्षा के दत्तात्रेय ही सबसे सुगम गुरु
दत्त स्मरण से समस्त गुरु मंडल का पूजन
वक्ता कहते हैं कि संकल्प के बाद प्रथम पूजन गुरु का होता है, और यहीं से साधना का प्रथम चरण आरंभ होता है। पूछे जाने पर कि गुरु ही न हो, दीक्षा ही न हुई हो तो गुरु पूजन कैसे करें, वे उत्तर देते हैं कि सबसे सुगम और सरल विषय भगवान दत्तात्रेय हैं: उनके स्वरूप का प्रादुर्भाव इसी कारण हुआ है कि समस्त संसार में जहाँ किसी जिज्ञासु को गुरु तत्त्व की आवश्यकता हो और गुरु पाने की ललक हो, वे तत्क्षण उपस्थित होते हैं। वे कहते हैं कि दत्तात्रेय का स्मरण मात्र करने से समस्त गुरु मंडल का पूजन हो जाता है।
संकल्प लेने के पश्चात, वक्ता कहते हैं, प्रथम पूजन गुरुदेव का होता है। यहीं से साधना का प्रथम चरण आरंभ होता है: आपने आरंभ की चीज़ें सीख लीं, संकल्प ले लिया, अब गुरु पूजन करेंगे। वे स्वाभाविक आपत्ति उठाते हैं: गुरु पूजन के लिए गुरु है ही नहीं, गुरु दीक्षा ही नहीं हुई, तब कैसे करें? उनका उत्तर है कि सबसे सुगम और सबसे सरल विषय भगवान दत्तात्रेय हैं। दत्तात्रेय के स्वरूप का अवतरण, प्रादुर्भाव, इसी कारण हुआ है कि समस्त संसार में जहाँ कहीं भी जिस किसी जिज्ञासु, जिस किसी भक्त को गुरु तत्त्व की आवश्यकता हो, अनिवार्यता हो, उसके भीतर ललक हो कि हमें गुरु की प्राप्ति होनी चाहिए, "मुझे गुरु चाहिए", वहाँ वे तुरंत, तत्क्षण उपस्थित होते हैं। यानी अगर हम भगवान दत्तात्रेय का स्मरण मात्र करते हैं, तो समग्र गुरु मंडल के समस्त गुरु तत्वों का पूजन हो जाता है।
जिस भी परंपरा में आगे दीक्षा हो, उसमें दत्तात्रेय का पूजन होगा ही
ब्रह्मा, विष्णु और सदाशिव का एकीकृत रूप
वक्ता कहते हैं कि दत्तात्रेय का स्वरूप ब्रह्मा जी, विष्णु जी और भगवान सदाशिव का एकीकृत रूप है। भविष्य में जब कभी पुण्यों से युक्त होकर आप किसी भी कुल परंपरा में दीक्षित होंगे, चाहे वैष्णव हो, शैव, शाक्त, कौल संप्रदाय या अघोर, उसमें दत्तात्रेय का पूजन किसी न किसी रूप में होगा ही होगा; और जब आपके गुरु मंडल पूजन की विधि और पात्र साधना की बृहद विधि सिखाएँगे, तो यंत्र पूजन, मंडल पूजन और आधार पूजन में दत्तात्रेय का स्थान अवश्य होगा। इसलिए, वे कहते हैं, निश्चिंत होकर दत्तात्रेय के प्रति समर्पण लाकर गुरु तत्व से संबंधित पूजन करें।
वक्ता दत्तात्रेय के स्वरूप की ओर संकेत करते हैं: उसमें आप देखेंगे कि ब्रह्मा जी, विष्णु जी और भगवान सदाशिव तीनों का एकाकार, एकीकृत रूप है। इससे वे एक आश्वासन निकालते हैं। भविष्य में जब कभी पुण्यों से युक्त होकर आप किसी भी कुल परंपरा में दीक्षित होंगे, चाहे वह कोई भी परंपरा हो, वैष्णव, शैव, शाक्त, कौल संप्रदाय या अघोर, उसमें भगवान दत्तात्रेय का पूजन किसी न किसी रूप में होगा ही होगा। और जब आपके गुरु जी आपको मंडल पूजन की विधि सिखाएँगे, पात्र साधना आदि की पूरी बृहद विधि बताएँगे, तो यंत्र पूजन, मंडल पूजन, आधार पूजन में भगवान दत्तात्रेय का स्थान अवश्य होगा ही। इसलिए, वे कहते हैं, निश्चिंत होकर भगवान दत्तात्रेय के प्रति समर्पण लाकर गुरु तत्व से संबंधित पूजन करें।
दत्तात्रेय के माध्यम से गुरु पूजन कैसे करें, और पितरों, 64 योगिनियों व 52 भैरवों पर उनका आदेश
गुरु मंडल की कृपा से समय आने पर गुरु प्राप्ति
दत्तात्रेय के माध्यम से गुरु पूजन के लिए वक्ता कहते हैं कि गुरु को समर्पित श्लोक जैसे "गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु" का वाचन करें, या दत्त की 108 नामावली, अष्टोत्तर शतनाम, या उनके 12 नामों का पाठ करें; इनमें से किसी से भी समस्त गुरु मंडल का पूजन हो जाता है। वे जोड़ते हैं कि समस्त पितृों के उद्धार का कारण भगवान दत्त हैं, और महासिद्धों में सिद्ध भगवान दत्त ही वह मूल तत्व शक्ति हैं जो 64 योगिनीयों और 52 भैरवों को चलाते और आदेश देते हैं। उनके स्वरूप का पूजन मात्र, स्मरण मात्र उन्हें संतुष्ट कर देता है; संतुष्ट होकर वे समस्त गुरु मंडल की कृपा कर देते हैं। जैसे-जैसे पुण्य बढ़ते हैं और दूषित प्रारब्ध का क्षय होता है, विवेक स्वयं जागृत होता है, मार्ग दिखने लगता है, और समय आने पर गुरु की प्राप्ति भी हो जाती है।
गुरु पूजन के निमित्त भगवान दत्तात्रेय का पूजन करने के लिए वक्ता तीन विकल्प देते हैं: गुरु को समर्पित श्लोक, "गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु" आदि का वाचन कीजिए; या भगवान दत्त की 108 नामावली, अष्टोत्तर शतनाम का पाठ कीजिए; या उनके 12 नामों का पाठ कीजिए। इनमें से किसी से भी समस्त गुरु मंडल का पूजन हो जाता है। दत्त के बारे में वे दो बातें और जोड़ते हैं। समस्त पितृों के उद्धार का कारण भगवान दत्त हैं। और 64 योगिनीयों और 52 भैरवों का जो मूल तत्व शक्ति स्वरूप है, जो उन्हें चलाता है, आदेश करता है, वह महासिद्धों में कहीं न कहीं सिद्ध भगवान दत्त हैं। तो जब आप दत्त के स्वरूप का पूजन मात्र कर देते हैं, स्मरण मात्र कर लेते हैं, उससे भी वे संतुष्ट हो जाते हैं, और संतुष्ट होकर समस्त गुरु मंडल की कृपा आप पर कर देते हैं। फिर धीरे-धीरे, जब आपके पुण्यों की वृद्धि होने लगेगी और वर्तमान दूषित प्रारब्धपूर्व कर्मों द्वारा पहले से गतिमान भाग्य का वह अंश — साधना व सत्कर्म इसकी तीव्रता को घटा सकते हैं, किंतु पूर्णतः मिटा नहीं सकते। का क्षय होने लगेगा, तो आपके भीतर स्वयं विवेक जागृत होने लगेगा, मार्ग दिखने लगेगा, और समय आने पर गुरु की प्राप्ति भी हो जाएगी। इस प्रकार, वे कहते हैं, गुरु मंडल का पूजन होता है।
गुरु पूजन के विकल्प के रूप में दक्षिणामूर्ति और गुरु गीता, और वक्ता दत्त को क्यों चुनते हैं
गुरु तत्व से संपन्न दो स्वरूप
पूछे जाने पर कि प्रथम साधना कौन सी करें, वक्ता कहते हैं कि साधक की पहली साधना गुरु की ही होनी चाहिए। गुरु तत्व से संपन्न आदि गुरु, जो सबसे बड़ी महाशक्ति के स्वरूप में हैं, भगवान दत्तात्रेय हैं; गुरु तत्व से संपन्न दूसरा स्वरूप भगवान सदाशिव का दक्षिणामूर्ति शिव है, जो तंत्र में अनन्य है और दशों महाविद्या में से किसी के भी पूजन में जिसका स्थान अवश्य होता है। आप इन स्वरूपों के लिए भी जा सकते हैं, पर इनके पूजन का विधि-विधान किसी योग्य व्यक्ति से जान लें; गुरु गीता का आश्रय लेकर भी गुरु पूजन किया जा सकता है। उनके अपने मत में, चूँकि आगे आपकी परंपरा कौन सी होगी यह न आप जानते हैं न वे, सबके लिए तत्क्षण प्रभाव और मार्गदर्शन देने वाली सबसे प्रभावी शक्ति दत्त हैं, इसलिए दत्त की शरणागति लें और उनका पूजन करें।
वक्ता इस प्रश्न पर आते हैं कि प्रथम साधना कौन सी करें। जब साधक साधना के क्षेत्र में आते हैं और आरंभ की ये सब चीज़ें जान लेते हैं, तो पहली साधना उन्हें गुरु की ही करनी चाहिए। वे गुरु तत्व से संपन्न दो स्वरूप बताते हैं। आदि गुरु, जो सबसे बड़ी महाशक्ति के स्वरूप में हैं, भगवान दत्तात्रेय हैं। दूसरा भगवान सदाशिव का दक्षिणामूर्ति शिव स्वरूप है। दक्षिणामूर्ति शिव का स्वरूप, वे कहते हैं, तंत्र में अनन्य है: दशों महाविद्या में से किसी भी स्वरूप का पूजन हो, उसमें इनका भी स्थान अवश्य होता है। आप इन स्वरूपों के लिए भी जा सकते हैं, पर इनके पूजन के निमित्त थोड़ा विधि-विधान किसी योग्य व्यक्ति से जान लेना चाहिए। आप चाहें तो गुरु गीता का आश्रय लेकर भी गुरु पूजन कर सकते हैं। उनका अपना मत: सबके लिए जो शक्ति तुरंत, तत्क्षण कार्य करने में, प्रभाव देने में और मार्गदर्शन देने में सबसे प्रभावी है, वह दत्त हैं, क्योंकि आगे जाकर आपकी परंपरा कौन सी होगी यह न आप जानते हैं न वे। इसलिए भगवान दत्त की शरणागति लें और उनका पूजन करें। वे बताते हैं कि दत्त से संबंधित विषय चैनल पर बृहद रूप से उपलब्ध हैं, उन वीडियो को सुनकर साधनाएँ की जा सकती हैं।
गुरु की ललक का उत्तर मिलता है: गुरु मिलने तक पहला पुरश्चरण दत्त के लिए
पूर्व जन्म का गुरु तत्व कुल परंपरा के निकट लाता है
वक्ता कहते हैं कि जब तक गुरु नहीं है, देव दीक्षा विधान करके सबसे पहला पुरश्चरण अनुष्ठान भगवान दत्तात्रेय के निमित्त, गुरु मंडल के निमित्त करें। ऐसा नहीं है कि इस जन्म में गुरु की प्राप्ति नहीं हुई तो पूर्व जन्मों में भी नहीं हुई होगी; अवश्य हुई होगी। यह साधना ललक से करने पर गुरु की प्राप्ति होती ही होती है, क्योंकि दत्तात्रेय का यह दायित्व ही है कि जो कोई गुरु के लिए ललक प्रस्तुत करे, समर्पित होकर कातर भाव से पुकारे, उसे गुरु प्रदान करना। जैसे-जैसे पूर्व जन्म के गुरु तत्व और कुल परंपरा के पुण्यों का अंश बृहद रूप से बढ़ता है, वे कहते हैं, आप उस कुल परंपरा के निकट होते जाते हैं।
वक्ता कहते हैं कि आप चाहें तो, जब तक गुरु नहीं है, देव दीक्षा विधान करके जो सबसे पहला पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक। अनुष्ठान करें वह भगवान दत्तात्रेय के निमित्त, गुरु मंडल के निमित्त करें। वे निराशा को सीधे संबोधित करते हैं। ऐसा नहीं है कि आपका यह जन्म हुआ है और इस जन्म में गुरु की प्राप्ति नहीं हुई तो पूर्व के जन्मों में भी नहीं हुई होगी; अवश्य हुई होगी। गुरु की प्राप्ति होती ही होती है, अगर हम ललक से इस साधना को करते हैं। भगवान दत्तात्रेय का यह दायित्व ही है कि जो कोई भी व्यक्ति गुरु के लिए ललक प्रस्तुत करे, समर्पित होकर कातर भाव से पुकार करे, उसे गुरु प्रदान करना। फिर पूर्व जन्म का जो भी गुरु तत्व का अंश होगा, कुल परंपरा होगी, आपके पुण्यों का, जैसे-जैसे वह बृहदात्मक रूप से बढ़ने लगेगा, वैसे-वैसे आप उस कुल परंपरा के निकट होने लगेंगे। तो, वे कहते हैं, अगर आपके कोई गुरु नहीं हैं तो सबसे पहले देव दीक्षा विधान करें।
बिना गुरु के साधक के लिए देव दीक्षा विधान और एकाक्षरी जप, और उससे जुड़ी शंकाएँ
शंकाएँ हटाएँ, समर्पण पुष्ट करें, फिर आरंभ
वक्ता कहते हैं कि जिसके कोई गुरु नहीं हैं वह सबसे पहले देव दीक्षा विधान करे; पूरी विधि चैनल पर है, YouTube पर "देव दीक्षा विधान गृहस्थ तंत्र" खोजने पर मिल जाती है। उन्हें देखकर विधान कीजिए और एकाक्षरी का जप कीजिए। वे उन शंकाओं का उल्लेख करते हैं जो लोग उठाते हैं, कि एकाक्षरी जप का अधिकार है या नहीं, और यह भय कि जो करेगा वह विरक्त हो जाएगा, दत्तात्रेय का दूत हो जाएगा, संन्यासी हो जाएगा, और कहते हैं कि इनका निवारण कई बार अलग से लाइव और वीडियो में प्रॉपरली किया गया है। उनका निर्देश है कि उन्हें सुनकर सभी शंकाएँ हटा दें, अपना समर्पण पुष्ट करें, और प्रथम साधना दत्त की करें।
अगर आपके कोई गुरु नहीं हैं, वक्ता कहते हैं, तो सबसे पहले देव दीक्षा विधान करें। वह दीक्षा विधान कैसे करना है, क्या किया जाता है, सारा वीडियो इसी चैनल पर है; बस YouTube पर "देव दीक्षा विधान गृहस्थ तंत्र" लिखकर खोजना है। उन्हें देखकर वह विधान कीजिए और एकाक्षरी का जप कीजिए। वे इससे जुड़ी शंकाएँ स्वीकार करते हैं: एकाक्षरी जप का अधिकार किसे है, और यह धारणा कि जो कोई करेगा वह विरक्त हो जाएगा, भगवान दत्तात्रेय का दूत हो जाएगा, संन्यासी हो जाएगा। वे कहते हैं कि इन सबका कई बार अलग से लाइव में प्रॉपरली और अलग वीडियो में निवारण किया गया है। उनका निर्देश है कि उन्हें सुनकर अपनी सभी शंकाएँ हटा दीजिए, अपने समर्पण को पुष्ट कीजिए, और प्रथम साधना भगवान दत्त की कीजिए।
एकाक्षरी के बाद: दत्त माला मंत्र और वज्र कवच, बृहस्पतिवार पूजन और पूर्णिमा दीपदान
किसी भी स्तर के साधक के लिए पहले दत्त
वक्ता कहते हैं कि जब एकाक्षरी हो जाए तो आगे दो चीज़ों की साधना करनी चाहिए: dattatreya-mala-mantra और वज्र कवचम्। आप किसी भी स्तर के साधक हों, बिल्कुल नए या पहले से करते आ रहे, प्रथम साधना भगवान दत्त की करेंगे: बृहस्पतिवार को उनका विशेष पूजन, पूर्णिमा आदि को उनका दीपदान, और महापर्व काल में उनका दीपदान। दीपदान की पूरी तंत्रोक्त विधि और उसके अनुभव समय-समय पर चैनल पर आते रहते हैं। सेवा-पूजा भाव से करने पर, वे कहते हैं, इसका कोई तिर्यक प्रभाव नहीं होता और तपोबल की वृद्धि होती है। इसके बाद ही अन्य, जैसे पंचाक्षरी मंत्र, की बात रहेगी।
जब एकाक्षरी हो जाएगा, वक्ता कहते हैं, तब dattatreya-mala-mantra और वज्र कवचम्। इन दो चीज़ों की साधना आपको करनी चाहिए। वे नियम को सबके लिए बनाते हैं: आप किसी भी स्तर के साधक हों, बिल्कुल नए हों या पहले से करते आ रहे हों, लेकिन प्रथम साधना भगवान दत्त की करेंगे। बृहस्पतिवार के दिन उनका विशेष पूजन करेंगे; पूर्णिमा आदि को उनका दीपदान करेंगे; महापर्व काल के समय में उनका दीपदान करेंगे। दीपदान का पूरा तंत्रोक्त विधि-विधान, सारी चीज़, उसका अनुभव आदि समय-समय पर चैनल पर आते रहते हैं। इन्हें देख-सुनकर, वे कहते हैं, आप मोटिवेट भी होंगे, मार्गदर्शन भी मिलेगा और सही मार्ग पर चलेंगे भी। सेवा-पूजा भाव से करने पर आप पर बिना किसी तिर्यक प्रभाव के तपोबलतप और निरंतर साधना से अर्जित आध्यात्मिक शक्ति — किसी बाधा को पूर्णतः दूर करने के लिए इसे संचित नकारात्मक या तांत्रिक ऊर्जा से अधिक होना आवश्यक है। की वृद्धि भी हो रही है। उनके अनुसार, अपने अनुभव के अनुसार, प्रथम साधना यही करनी चाहिए। आगे आप अन्य करें, पंचाक्षरी मंत्र करें, सब करें; वह इसके बाद की बात रहेगी। जब गुरु साधना पूर्ण हो जाएगी, तब आगे क्या करना है, यह अगले वीडियो में बताया जाएगा।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।