गृहस्थ के नौ रात्रि — महाविद्या क्रम से सप्तशती, रात्रि में नवदुर्गा जाप, हवन और पारण
दीक्षारहित गृहस्थ के लिए नौ रात्रि की नवरात्र योजना।
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विषय — दीक्षारहित, कामकाजी गृहस्थ के लिए नवरात्र
बिना किसी दीक्षा वाले साधक के लिए नौ दिन की नवरात्र योजना, जो काम से छुट्टी भी न ले सके
वक्ता कहते हैं कि वे बताएंगे कि जिस सामान्य साधक को किसी भी प्रकार की दीक्षा प्राप्त नहीं हुई है, वह नौ दिनों में भगवती के कौन-कौन से मंत्रों का जाप करे और कौन-सा विधान रखे, जिससे मंत्र का तंत्रोक्त यानी तीव्रतम प्रभाव उसे प्राप्त हो, जगदंबा की कृपा भी मिले और कार्य भी सिद्ध हो। साथ में दुर्गा सप्तशती के पाठ भी सम्मिलित हैं, और यह पूरा विधान उन लोगों के लिए बनाया गया है जो काम कर रहे हैं और जिन्हें छुट्टी नहीं मिल रही है।
नए संवत्सर में पहला नवरात्र, और प्रतिपदा को घट स्थापना
क्या कोई पहली बार भी नवरात्र रख सकता है, और कलश स्थापना कब होती है?
जो नया संवत्सर आरंभ हो रहा है, उसमें प्रत्येक व्यक्ति नवरात्र कर सकता है, वह भी जो पहली बार कर रहा हो। कलश स्थापना प्रतिपदा के दिन शुभ मुहूर्त में की जाती है; अपने क्षेत्र के ज्ञानी ब्राह्मण-विद्वानों द्वारा बताए गए समय के अनुसार भी किया जा सकता है।
गुरु-गणपति पूजन, स्वस्तिवाचन और संकल्प
पहली सुबह संकल्प से पहले गुरु-गणपति पूजन, फिर स्वस्तिवाचन
पहले दिन सुबह पूजन के समय अपने स्थान पर बैठकर संकल्प कर लें। पहले गुरु और गणपति पूजन होगा; स्वस्तिवाचन के बाद संकल्प लिया जाता है। यदि स्वस्तिवाचन नहीं आता तो भगवान नारायण का नाम तीन बार लें, गणपति जी का नाम लें, गणपति जी का पाठ करें, और उसके पश्चात हाथ में जल, अक्षत और पुष्प लेकर नौ दिन का नवरात्र व्रत करने का संकल्प लें।
दिन में सप्तशती पाठ, रात्रि में तिथि अनुसार दुर्गा मंत्र जाप
साथ-साथ दो चीजें — दिन में सप्तशती पाठ, रात्रि में तिथि के अनुसार दुर्गा मंत्र
दो चीजें साथ लेकर चलनी हैं। पहली है श्री दुर्गा सप्तशती का पाठ करना। दूसरी है रात्रि काल में, उस दिन जो तिथि है उसके अनुसार भगवती महादुर्गा का जो स्वरूप रहेगा, उस स्वरूप के मंत्र का जाप करके कृपा प्राप्त करना।
अब यह कि करना कैसे है: वक्ता कहते हैं कि दो चीजें लेकर चलनी हैं। पहली चीज है श्री दुर्गा सप्तशती का पाठ करना। दूसरी चीज है कि रात्रि काल में, जो तिथि है उस तिथि के अनुसार उस दिन भगवती महादुर्गा का जो स्वरूप रहेगा, उन दुर्गा स्वरूप के मंत्र का जाप करके कृपा प्राप्त करना।
रक्त चंदन, रुद्राक्ष या स्फटिक की माला और उसका चेतन-युक्त होना
नवरात्र के जाप के लिए कौन-सी माला ली जाए, और क्या उसकी प्राण प्रतिष्ठा आवश्यक है?
जाप के लिए रक्त चंदन की माला या रुद्राक्ष की माला — इन दोनों में से कोई भी — ली जा सकती है, और स्फटिक की माला पर भी जाप किया जा सकता है। माला को प्राण प्रतिष्ठित और चेतन-युक्त कर लें; विधान चैनल पर दिया गया है। यदि अब तक प्राण प्रतिष्ठा नहीं हुई है तो अमावस्या तिथि के दिन, जो सोमवती अमावस्या पड़ रही है और दिव्य काल है, उस दिन भी किया जा सकता है।
महाविद्या क्रम — सप्तशती का नौ तिथियों में विभाजन
क्या पूरी दुर्गा सप्तशती प्रतिदिन पढ़ी जाती है?
नहीं — सप्तशती का पूर्ण पाठ प्रतिदिन नहीं करना है। वह महाविद्या क्रम से किया जाता है, जिसकी पूरी विधि चैनल पर अलग से दी गई है। वे कहते हैं कि यहां वे बताएंगे कि नौ दिन का एक साथ कैसे-कैसे करना है।
वक्ता कहते हैं कि अब सबसे पहली बात: सप्तशती का पूर्ण पाठ हमें प्रतिदिन नहीं करना है। हम उसे महाविद्या क्रम से करेंगे। महाविद्या क्रम की पूरी विधि चैनल पर अलग से बताई गई है, श्रोता उसे भी देखकर और स्पष्ट हो सकते हैं। आज भी वे वर्णन करेंगे कि नौ दिन का एक साथ कैसे-कैसे करना है।
घट स्थापना, आरती का निश्चित समय, फिर पाठ
पहला दिन घट स्थापना में जाता है, फिर सुबह-शाम की आरती का समय निश्चित कर लें
पहले दिन केवल घट स्थापना करने में ही थोड़ा समय लग जाएगा। उसके बाद सुबह और शाम की आरती अवश्य होनी चाहिए। यदि परिवार आरती में सम्मिलित होने वाला है तो एक निश्चित समय पर आरती कर दिया कीजिए; अपना पाठ उसके बाद करना है।
सुबह पाठ, संध्या या रात्रि जाप; लाल, पीला या नारंगी वस्त्र, कुशा आसन, पूर्व या उत्तर दिशा
पाठ सुबह, जाप रात्रि या संध्या में; कुशा के आसन पर लाल, पीला या नारंगी वस्त्र
महाविद्या क्रम में पाठ सुबह के समय किया जाता है, और भगवती के मंत्रों का जाप रात्रि काल में या संध्या के समय। लाल या पीला वस्त्र पहनने का पूर्ण प्रयास कीजिए — रंगीन ही होना चाहिए, इसलिए लाल, पीला या नारंगी पहन लीजिए। आसन कुशा का हो, लाल या पीला, लाल सर्वोत्तम रहता है। दिशा पूर्व या उत्तर की ओर होनी चाहिए।
गणपति, भैरव, हनुमान और नरसिंह; और महागुरु के रूप में भगवान दत्त
नवरात्र व्रत में भगवती के साथ किन देवताओं का पूजन किया जाता है?
भगवती के साथ गणपति जी, भैरव जी, हनुमान जी और भगवान नरसिंह — इन चारों का पूजन करना होता है। यदि आप केवल इन चारों के नाम से अक्षत और पुष्प चढ़ाते हैं तो भी आपकी पूजा स्वीकार है, इसलिए अधिक चिंतन नहीं करना चाहिए। यदि विधान आता है तो बढ़िया है, नहीं तो केवल इतना।
उत्कीलन या मृत्यु संजीवनी की आवश्यकता नहीं; कवच, अर्गला, कीलक, प्रथम अध्याय, फिर तंत्रोक्त देवी सूक्तम
इस क्रम में उत्कीलन या मृत्यु संजीवनी नहीं — कवच, अर्गला, कीलक, प्रथम अध्याय, फिर देवी सूक्तम
जब पूजन और पाठ महाविद्या क्रम से किए जाते हैं, तो उसमें उत्कीलन और मृत्यु संजीवनी अथवा संजीवन क्रम करने की आवश्यकता नहीं होती; वे कहते हैं कि यह उन्होंने उस वीडियो में अलग से बताया है और प्रमाण भी दिए हैं। आपको केवल कवच, अर्गला और कीलक का पाठ करना है, और पहले दिन प्रथम अध्याय का; प्रथम अध्याय के पश्चात तंत्रोक्त देवी सूक्तम का पाठ करना है।
वक्ता कहते हैं कि तत्पश्चात आप श्री दुर्गा सप्तशती का पाठ आरंभ करेंगे। सप्तशती पाठ में, जब पूजन और पाठ महाविद्या क्रम से किए जाते हैं, तो उसमें उत्कीलन और मृत्यु संजीवनी, संजीवन क्रम — इन सभी को करने की आवश्यकता नहीं होती। यह उन्होंने उस वीडियो में अलग से बताया है और वहां उसके प्रमाण भी दिए हैं। आपको मात्र कवच, अर्गला और कीलक का पाठ करना है, और पहले दिन प्रथम अध्याय का पाठ। प्रथम अध्याय का पाठ करने के पश्चात आप तांत्रोक्त देवीसूक्तम् का पाठ करेंगे।
पहले और बाद में एक-एक माला का संपुट, या कम से कम नौ बार, बिना प्रणव के
दुर्गा सप्तशती के पाठ के साथ नवार्ण मंत्र का प्रयोग कैसे और कितनी बार किया जाता है?
यदि आप नवार्ण आदि करते हैं तो एक-एक माला से संपुट कीजिए — एक माला प्रथम अध्याय से पहले और एक माला बाद में। यदि नहीं करते तो कम से कम नौ बार नवार्ण कर लीजिए। बिना प्रणव के कीजिएगा। इससे अधिक जाप और सिद्धि आदि के लिए, वे कहते हैं, दीक्षा लेकर करनी चाहिए।
गलत संस्कृत पाठ के बजाय पूरी सप्तशती हिंदी में भावपूर्वक पढ़ना
यदि संस्कृत का उच्चारण न आता हो तो क्या दुर्गा सप्तशती हिंदी में पढ़ी जा सकती है?
जिन्हें संस्कृत में पाठ करना नहीं आता, वे कृपया गलत पाठ न करें। हिंदी में भावपूर्वक पूर्ण पाठ कीजिए। इसमें कोई परेशानी नहीं है — कोई कितना भी कहे कि हिंदी में करने से कुछ नहीं होता, और यह भी कि "मां भाव की भूखी हैं" — ये दोनों विषय आते हैं, और आपको चिंता नहीं करनी है।
वक्ता कहते हैं कि यहां पर जिन्हें संस्कृत में पाठ करना नहीं आता है, वे कृपया गलत पाठ न करें। हिंदी में भावपूर्वक पूर्ण पाठ कीजिए। इसमें कोई परेशानी नहीं है। कोई कितना भी यह कहे कि हिंदी में करने से कुछ नहीं होता, और यह कि मां तो भाव की ही भूखी हैं — ये दोनों विषय आ ही जाते हैं, और आपको इसकी चिंता नहीं करनी है। यदि आप पहली बार कर रहे हैं तो हिंदी में शुरू कीजिए।
कुछ नवरात्रों में संस्कृत सीखना — प्रतिदिन दस श्लोक से 700 श्लोक
कुछ नवरात्रों में प्रतिदिन दस श्लोक — सातों सौ श्लोक पूरे हो जाते हैं
वे यह नहीं कह रहे कि जीवन पर्यंत हिंदी में ही पाठ करें। दो-तीन, चार-पांच नवरात्र होते-होते संस्कृत धीरे-धीरे आने लगेगी; आधा घंटा या पंद्रह मिनट दीजिए तो छह महीने में सीख जाइएगा। श्लोक तो 700 ही हैं — प्रतिदिन दस करेंगे तो दो महीने दस दिन में सीख जाइएगा। केवल उच्चारण करना सीखना है, कंठस्थ नहीं करना है।
आठ बजे, एक कर्म साक्षी दीपक, और शैलपुत्री का मंत्र
लगभग आठ बजे, कर्म साक्षी दीपक के साथ, शैलपुत्री के मंत्र पर
प्रतिपदा की रात्रि में, या संध्या के समय जब परिवार के साथ या अकेले आरती हो जाए, तब पहले भी जाप कर सकते हैं; नहीं तो लगभग आठ बजे पुनः अपने आसन पर बैठें। अखंड ज्योत प्रज्वलित है; एक कर्म साक्षी दीपक अलग से प्रज्वलित करें, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करें, गुरु, गणपति, बटुक भैरव और भगवान नरसिंह के नाम से अक्षत-पुष्प चढ़ाएं, और उसके बाद भगवती के प्रथम स्वरूप शैलपुत्री दुर्गा के मंत्र का जाप करें।
वक्ता कहते हैं कि प्रतिपदा के दिन रात्रि काल में, या संध्या के समय जब परिवार के साथ या अकेले आरती आदि कर ली, तब पहले भी जाप किया जा सकता है। नहीं तो लगभग 8 बजे पुनः अपने आसन पर बैठें। अखंड ज्योति प्रज्वलित है; एक कर्म साक्षी दीपक अलग से भी प्रज्वलित करें, और धूप, दीप, नैवेद्य आदि अर्पित करें। गुरु, गणपति, बटुक भैरव जी और भगवान नरसिंह के नाम से आप अक्षत, पुष्प आदि अर्पित करेंगे, और उसके पश्चात भगवती के प्रथम स्वरूप शैलपुत्री दुर्गा का मंत्र। इसकी पीडीएफ वीडियो के डिस्क्रिप्शन में डाल दी जाएगी — कि नवरात्र के नौ दिनों में प्रत्येक दिन रात्रि काल में किन-किन मंत्रों का जाप करना है: प्रतिपदा के दिन किसका, और द्वितीय दिन ब्रह्मचारिणी का क्या मंत्र रहेगा। प्रत्येक का नौ-नौ माला जाप करना है।
नौ माला भगवती को समर्पित, और नौ लौंग तथा नौ कपूर प्रज्वलित
नौ माला भगवती को समर्पित, और समापन पर नौ लौंग तथा कपूर प्रज्वलित
रात्रि में प्रथम दुर्गा स्वरूप का नौ माला जाप करके भगवती को समर्पित कर दिया जाता है। आपको इतना ही करना है। चाहें तो किसी पात्र में नौ कपूर और नौ लौंग प्रज्वलित कर दीजिए। इसके साथ पहले दिन का पूजन पूर्ण हुआ — समय बहुत कम लगेगा, समय एकदम प्रामाणिक रहेगा, और भगवती की पूर्ण कृपा प्राप्त होगी।
वक्ता कहते हैं कि शैलपुत्री दुर्गा का प्रथम मंत्र — भगवती दुर्गा जी का प्रथम स्वरूप — रात में नौ माला जपा जाता है और फिर भगवती को समर्पित कर दिया जाता है। आपको इतना ही करना है। चाहें तो किसी पात्र में नौ कपूर और नौ लौंग प्रज्वलित कर दीजिए। आपका पहले दिन का पूजन पूर्ण हुआ। समय भी बहुत कम लगेगा, समय एकदम प्रामाणिक रहेगा, और भगवती की पूर्ण कृपा प्राप्त होगी।
दूसरा-तीसरा अध्याय, चौथा, और पांचवां से आठवां; ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा और कूष्मांडा
दूसरा-तीसरा अध्याय, फिर चौथा, फिर पांचवें से आठवें तक — ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा
द्वितीय तिथि को: पुनः कवच, अर्गला और कीलक, दुर्गा सप्तशती के दूसरे और तीसरे अध्याय, तथा तंत्रोक्त देवी सूक्तम, और रात्रि में भगवती ब्रह्मचारिणी का नौ माला जाप। तृतीया को: दिन में कवच, अर्गला, कीलक, चतुर्थ अध्याय और तंत्रोक्त देवी सूक्तम, तथा रात्रि में भगवती चंद्रघंटा का नौ माला जाप। चतुर्थी को: कवच, अर्गला, कीलक, पांचवां, छठवां, सातवां और आठवां अध्याय, तंत्रोक्त देवी सूक्तम, और रात्रि काल में भगवती कूष्मांडा के मंत्र का नौ माला जाप।
वक्ता कहते हैं कि द्वितीय तिथि के दिन आप पुनः कवच, अर्गला और कीलक का पाठ करेंगे, दुर्गा सप्तशती के दूसरे और तीसरे अध्याय का पाठ करेंगे, और तांत्रोक्त देवीसूक्तम् का पाठ करेंगे। और रात्रि काल में भगवती ब्रह्मचारिणी का नौ माला जाप करेंगे। उनका मंत्र भी डिस्क्रिप्शन की पीडीएफ में मिल जाएगा; नौ दुर्गा का सबका एक ही साथ रहेगा। तृतीया तिथि के दिन आप दिन में कवच, अर्गला, कीलक, चतुर्थ अध्याय और तंत्रोक्त देवी सूक्तम का पाठ कर लें; रात में भगवती चंद्रघंटा का नौ माला जाप कर लें। चतुर्थी तिथि को: कवच, अर्गला, कीलक, पांचवें, छठवें, सातवें और आठवें अध्याय का पाठ, तंत्रोक्त देवी सूक्तम, और रात्रि काल में भगवती कूष्माण्ड के मंत्र का नौ माला जाप।
नौवां-दसवां अध्याय, फिर ग्यारहवां; स्कंदमाता और कात्यायनी
नौवां और दसवां अध्याय, फिर ग्यारहवां — रात्रि में स्कंदमाता और कात्यायनी
पंचमी तिथि को कवच, अर्गला और कीलक के साथ नौवें और दसवें अध्याय का पाठ करें, और रात्रि काल में स्कंद माता के मंत्रों का जाप करें। षष्ठी तिथि को एकादश अध्याय, कवच, अर्गला, कीलक और तंत्रोक्त देवी सूक्तम के साथ। कवच, अर्गला और कीलक प्रतिदिन किए जाते हैं, और अध्यायों के बाद तंत्रोक्त देवी सूक्तम — "या देवी सर्वभूतेषु" वाली स्तुति — पढ़ी जाती है। षष्ठी की रात्रि में भगवती कात्यायनी का नौ माला जाप।
वक्ता कहते हैं कि पंचमी तिथि को कवच, अर्गला और कीलक के साथ नौवें और दसवें अध्याय का पाठ करें, और रात्रि काल में स्कंद माता के मंत्रों का जाप करें। षष्ठी तिथि को एकादश अध्याय रहेगा, कवच, अर्गला, कीलक और तांत्रोक्त देवीसूक्तम् के साथ। यह प्रतिदिन रहेगा: कवच, अर्गला, कीलक प्रतिदिन करेंगे। महाविद्या क्रम के जो अध्याय हैं उनका पाठ करें, और उसके बाद तंत्रोक्त देवी सूक्तम का पाठ करें — वही स्तुति जो "या देवी सर्वभूतेषु" से चलती है। और षष्ठी तिथि को रात्रि काल में भगवती कात्यायनी का नौ माला जाप किया जाएगा।
बारहवां-तेरहवां अध्याय, फिर तीनों रहस्य; कालरात्रि और महागौरी
बारहवां और तेरहवां अध्याय, फिर तीनों रहस्य — कालरात्रि और महागौरी
सप्तमी तिथि को कवच, अर्गला और कीलक के साथ बारहवें और तेरहवें अध्याय का पाठ करें, देवी सूक्तम का पाठ करें, और रात्रि में भगवती कालरात्रि का नौ माला जाप करें। इससे तेरह अध्याय पूर्ण हो जाते हैं, इसलिए अष्टमी तिथि को कवच, अर्गला और कीलक के साथ तीनों रहस्यों का पाठ करेंगे — वे तीनों रहस्य, मूर्ति रहस्य आदि, जो तेरह अध्यायों और तंत्रोक्त देवी सूक्तम के बाद दिए गए हैं — और रात्रि में महागौरी के मंत्रों का जाप करेंगे।
वक्ता कहते हैं कि सप्तमी तिथि को आप कवच, अर्गला और कीलक के साथ बारहवें और तेरहवें अध्याय का पाठ करेंगे। देवी सूक्तम का पाठ करेंगे, और रात्रि काल में भगवती कालरात्रि का नौ माला जाप करेंगे। अब आपके तेरह अध्याय पूर्ण हो चुके हैं, तो अष्टमी तिथि को आप कवच, अर्गला और कीलक के साथ तीनों रहस्यों का पाठ करेंगे। तीनों रहस्य वे हैं जो तेरह अध्यायों और तांत्रोक्त देवीसूक्तम् आदि के बाद दिए गए हैं — मूर्ति रहस्य आदि। इन तीनों रहस्यों का पाठ करें, और उसके पश्चात रात्रि काल में महागौरी के मंत्रों का जाप करेंगे।
नवमी की सुबह हवन और कन्या पूजन; दशमी को पारण
नवमी को सुबह हवन क्योंकि कन्या पूजन करना है, और पारण दशमी पर
नवमी तिथि को सुबह-सुबह हवन कर लिया जाता है, क्योंकि कन्या पूजन करना है। सुबह के समय भगवती का हवन कर लें और कन्या पूजन कर लें; कोई दिक्कत नहीं है, वहां पूर्ण हुआ। लेकिन ध्यान रखें कि अभी पारण नहीं करना है। नवमी की रात्रि में भगवती सिद्धिदात्री के मंत्र का नौ माला जाप करें, और दशमी तिथि को पारण करें।
अष्टमी की रात्रि में महागौरी और सिद्धिदात्री दोनों का जाप, नवमी की सुबह आहुतियां
अष्टमी की रात्रि में महागौरी और सिद्धिदात्री दोनों का जाप, आहुतियां नवमी की सुबह
यदि मन में संशय रह जाए कि यह कैसे होगा, तो दूसरा मार्ग है। अष्टमी की रात्रि में महागौरी की नौ माला जपने के पश्चात भगवती सिद्धिदात्री का भी नौ माला जाप एक ही साथ कर दीजिए। फिर नवमी की सुबह नौ दुर्गाओं में से प्रत्येक के मंत्रों से कम से कम सत्ताईस-सत्ताईस आहुति अग्नि में दीजिए।
वक्ता कहते हैं कि यदि आपके मन में संशय है — कि नहीं, ऐसे कैसे होगा, कैसे करेंगे — तो उसमें भी कोई दिक्कत नहीं है। आपके लिए दूसरा मार्ग है। अष्टमी तिथि को ही रात्रि काल में, जब आप महागौरी की नौ माला जाप करेंगे, उसके पश्चात भगवती सिद्धिदात्री का भी नौ माला जाप एक ही साथ कर दीजिए। अष्टमी की रात में आपने दोनों का ही जाप कर दिया। फिर नवमी तिथि को सुबह में, नौ दुर्गाओं में से प्रत्येक दुर्गा के मंत्रों से कम से कम सत्ताईस-सत्ताईस आहुति अग्नि में दीजिएगा।
स्त्री के लिए गुग्गुल, पुरुष के लिए घी; वेदोक्त निषेध और तंत्रोक्त अनुमति
क्या स्त्री आहुति दे सकती है, और किस द्रव्य से?
यदि आप स्त्री हैं तो गुग्गुल से दीजिए; पुरुष हैं तो घी से दीजिए। यह पूछे जाने पर कि क्या स्त्री आहुति दे भी सकती है, वक्ता उत्तर देते हैं कि वैदिक विधान में नहीं देना चाहिए, वेदोक्त विधान में नहीं होता — वे टिप्पणी करते हैं कि बाकी लोग आजकल बहुत होशियार हो चुके हैं। लेकिन, वे कहते हैं, यह तंत्रोक्त विधान है, यह जगदंबा का विधान है, और इसमें स्त्री सामान्य आहुति आदि कर सकती है, कोई दिक्कत नहीं है।
अष्टमी के अंतिम बीस मिनट और नवमी के आरंभ के बीस मिनट, और चामुंडा का प्रादुर्भाव
अष्टमी और नवमी के बीच का संधि काल क्या है?
अष्टमी के अंतिम बीस मिनट और नवमी के आरंभ के बीस मिनट को संधि काल कहा जाता है। इसी में भगवती का सबसे प्रमुखतम स्वरूप, जिसे जगदंबा का चामुंडा स्वरूप कहा जाता है — जिसे वे सबसे बड़ी जगदंबा का सबसे बड़ा तंत्रोक्त स्वरूप कहते हैं — प्रादुर्भूत हुआ। इसलिए इस स्वरूप का पूजन इसी समय करना चाहिए। नवमी को पारण करना है या नहीं, यह श्रोता के अपने विवेक पर छोड़ा गया है।
दीप दान और बलि; न्यूनतम एक नारियल और तीन नींबू
जहां पूरी विधि संभव न हो: दीप दान, और कम से कम एक नारियल तथा तीन नींबू
दीप दान कैसे करना है, बलि कैसे देनी है, किन्हें बलि देनी है और किन्हें नहीं — इस पर अलग से वीडियो है; वक्ता श्रोताओं से कहते हैं कि उसे भी देख लें और संभव हो तो कर भी लें। यदि इतनी बड़ी विधि नहीं कर पाएंगे तो कम से कम एक नारियल और तीन नींबू की बलि अवश्य दे दीजिए, और कपूर, लौंग आदि जला दीजिए।
वक्ता कहते हैं कि दीप दान कैसे करना है, बलि कैसे देनी है, किन्हें बलि देनी है और किन्हें नहीं — इस पर अलग से वीडियो है, पूरा विषय वहां है, और वे श्रोताओं से कहते हैं कि उसे भी देख लीजिएगा। संभव हो तो वह भी कर लीजिए। यदि उतनी बड़ी विधि नहीं कर पाएंगे तो कम से कम एक नारियल और तीन नींबू की बलि जरूर दे दीजिएगा। कपूर, लौंग आदि जला दीजिएगा।
अन्न और दक्षिणा का दान, और पूरे व्रत का जगदंबा को समर्पण
अन्न और दक्षिणा का दान, और पूरा व्रत जगदंबा को समर्पित
इतना करने के बाद, अंतिम दिन पारण करने से पहले, कुछ अन्न आदि का दान करना है और दक्षिणा आदि का दान करना है, संकल्प करके; और अंत में समर्पण करना है — कि हमने जो पूरा नवरात्र व्रत किया है, जगदंबा, वह हम आपको समर्पित करते हैं। उसके बाद ही पारण करना चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि इतना करने के बाद, अंतिम दिन, पारण करने से पहले कुछ अन्न आदि का दान करना है और दक्षिणा आदि का दान करना है, संकल्प करके। और अंत में समर्पण है: कि पूरा नवरात्र व्रत जो हमने किया है, जगदंबा, वह हम आपको समर्पित करते हैं। उसके बाद ही पारण कीजिएगा।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।