नकली गुरु के वशीकरण की पहचान, और दुर्गा सप्तशती से उसका काट
एक नकली गुरु के वशीकरण, उसके लक्षण और उसके काट की सत्य घटना।
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शक्ति की भोग-लालसा साधक पर बाध्यता कैसे बन जाती है
किसी भ्रष्ट तांत्रिक का क्षुद्र शक्ति को दिया गया वचन साधक के शरीर की माँग में कैसे बदल जाता है?
वक्ता बताते हैं कि जब कोई तांत्रिक क्षुद्र शक्तियों को सिद्ध करता है तो उन्हें दिए जाने वाले वचन खाने-पीने के भोग और गंध-सुगंध से आगे बढ़कर शरीर के भोग तक पहुँच जाते हैं; ऐसा वचन दे देने के बाद जो लोग अपनी समस्या के समाधान हेतु उस तांत्रिक के पास आते हैं, उन्हीं को उस वचन की पूर्ति के लिए बाध्य कर दिया जाता है।
वक्ता बताते हैं कि जब कोई तांत्रिक क्षुद्र शक्तियों को सिद्ध करता है तो उन्हें बाँधने के लिए दिए जाने वाले वचन प्रायः भोग से आरंभ होते हैं — खाने-पीने की विभिन्न प्रकार की वस्तुएँ — और तत्पश्चात गंध-सुगंध का वचन दिया जाता है। यदि आवाहित शक्ति प्रबल पैशाचिक शक्ति है जिसे शरीर का भोग और आनंद चाहिए, चाहे वह स्त्री का शरीर हो या पुरुष का, तो साधक कहीं न कहीं यह वचन भी दे डालता है कि समय-समय पर उसे शरीर की उपलब्धि होती रहेगी। वक्ता यह भी जोड़ते हैं कि स्त्रीत्व धारण करने वाली शक्ति को पुरुष का शरीर चाहिए होता है, और प्रेत योनि में पुरुष रूप धारण करने वाली शक्ति को स्त्री का शरीर चाहिए होता है। इसी क्रम में जब ऐसे साधक के पास लोग अपनी समस्या के समाधान हेतु आते हैं, तो इन्हीं शक्तियों के माध्यम से उनकी समस्या का समाधान तो हो जाता है, परंतु साथ ही उन्हें अपने शरीर से उस शक्ति के भोग को पूरा करने के लिए भी बाध्य कर दिया जाता है। सामने वाला व्यक्ति सोचता है कि उसकी सुरक्षा हेतु ये क्रियाएँ की जा रही हैं, जबकि वास्तव में उसके साथ छल हो रहा होता है।
उन्होंने ऑनलाइन मार्गदर्शक क्यों खोजना आरंभ किया
शारीरिक और जीवन की कठिनाइयों के साथ आध्यात्मिक रुचि ने उन्हें ऑनलाइन खोजने पर विवश किया, जहाँ यूट्यूब और फेसबुक पर मिले एक व्यक्ति पर उनका विश्वास बन गया।
वे बताती हैं कि एक समय उनके शरीर में और जीवन में विभिन्न प्रकार के कष्ट थे, और साथ ही वे आध्यात्मिक भी थीं, जिससे उनके मन में यह विचार आया कि पूजन-पाठ और साधना से उनकी समस्या दूर हो सकती है; इसलिए उन्होंने खोजना आरंभ किया और यूट्यूब तथा फेसबुक पर उन्हें एक व्यक्ति मिला जिन पर उनका प्रगाढ़ विश्वास बन गया।
वे बताती हैं कि एक समय ऐसा रहा जब उनके शरीर में विभिन्न प्रकार के कष्ट थे और जीवन में भी अनेक परेशानियाँ थीं, और साथ ही वे आध्यात्मिक भी रहीं। वक्ता कहते हैं कि अध्यात्म के कारण ही व्यक्ति के मन में यह विचार आता है कि पूजन-पाठ, साधना इत्यादि करने से उसकी समस्या दूर हो सकती है — इससे आध्यात्मिकता में प्रगाढ़ता भी आती है और समस्या को दूर करने का सामर्थ्य भी प्राप्त होता है। इसलिए उन्होंने ऐसे किसी व्यक्ति को खोजना आरंभ किया जो उन्हें दोनों प्रकार का मार्ग बता सके। आजकल के समय के अनुसार उन्होंने सबसे पहले यूट्यूब और फेसबुक पर ही खोजा, और वहाँ उन्हें एक व्यक्ति मिले जिन पर उनका प्रगाढ़ विश्वास हो गया कि ये उनकी समस्या दूर कर सकते हैं और इस क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए सही मार्गदर्शन भी कर सकते हैं।
शिविर में प्रयुक्त पदार्थ, और आकर्षण को प्रेम समझ लेना
शिविर में खाने-पीने की वस्तुओं और इत्र के माध्यम से एक शक्ति का प्रवेश कराया गया, जिसके बाद वे अकारण ही उनकी ओर आकर्षित होने लगीं और उसे प्रेम समझ बैठीं।
वे बताती हैं कि इस तथाकथित गुरु द्वारा आयोजित साधना शिविर में उनके साथ किसी प्रकार का शारीरिक शोषण नहीं हुआ, परंतु खाने-पिलाने में प्रयुक्त पदार्थों और इत्र इत्यादि के माध्यम से उनके शरीर में एक शक्ति का प्रवेश करा दिया गया — जिसके पश्चात वे अकारण ही उनकी ओर आकर्षित होने लगीं और उस आकर्षण को सच्चा प्रेम समझ बैठीं।
उनका विश्वास बढ़ने और उनके द्वारा कराई गई साधनाओं से लाभ होने के पश्चात वे उनके द्वारा आयोजित एक शिविर में जाने को तैयार हो गईं, जहाँ सभी साधक साथ बैठकर साधना करते। वे बताती हैं कि साधना शिविर में ऐसा कुछ नहीं हुआ जिसे वे शारीरिक शोषण कहें — परंतु वहाँ उनके शरीर में एक ऐसी शक्ति का प्रवेश करा दिया गया, जो खाने-पिलाने में प्रयुक्त पदार्थों तथा इत्र इत्यादि के माध्यम से किया गया, जिससे उनके मन में पूरी उथल-पुथल मच गई। वे अकारण ही उनकी ओर आकर्षित होने लगीं। उन्हें लगा कि यह आकर्षण शायद उनकी वाणी के प्रभाव से या उनके व्यक्तित्व के प्रभाव से हो रहा है, और — यद्यपि वास्तव में उनके साथ छल हो रहा था — उन्होंने उसे प्रेम समझकर सामान्य रूप से स्वयं को समर्पित कर दिया। वक्ता जोड़ते हैं कि उस शिविर में जाने के पश्चात जो हुआ, उसने उनके जीवन को पूरी तरह बदलकर रख दिया।
बुलाने पर जाने की विवशता वशीकरण का लक्षण
किसी के कहने पर जाने की विवशता वास्तव में वशीकरण है, स्वेच्छा नहीं — इसका स्पष्ट लक्षण क्या है?
इस वृत्तांत में बताया गया है कि इसके पश्चात शारीरिक शोषण हुआ, और साथ ही एक लक्षण बार-बार दोहराया गया: जब भी वह व्यक्ति फोन या मैसेज करके कहता कि आना है, तो वे जाने के लिए मजबूर हो जाती थीं, भले ही वे न जाना चाहती हों और भले ही वह न कोई फोर्स करता था न ब्लैकमेल — यही विवशता, न कि कोई प्रकट बल, इस बात का लक्षण थी कि वे वशीकरण की पकड़ में थीं।
वृत्तांत में बताया गया है कि धीरे-धीरे दोनों के बीच बात बढ़ी और उन्होंने अपनी स्थिति उनके सामने रखी, तत्पश्चात उन्होंने कहा कि साधना इस प्रकार से करनी होगी, आप पास आइए — और वे चली गईं। वहाँ जाने के पश्चात उनका विभिन्न प्रकार से शारीरिक शोषण तो हुआ ही, परंतु वे तब भी यह समझ नहीं पाईं कि उनके साथ हो क्या रहा है। एक बात बार-बार दोहराई गई: वे कहीं भी हों, यदि वह व्यक्ति फोन करके या मैसेज करके कह दे कि तुम्हें आना है, तो वे जाने के लिए मजबूर हो जाती थीं। वे चाहती थीं कि न जाएँ, फिर भी उन्हें जाना पड़ता था। वक्ता विशेष रूप से कहते हैं कि इसमें कोई प्रकट बल नहीं था — वह न फोर्स करता था, न किसी प्रकार से ब्लैकमेल — परंतु जैसे ही वह आदेश कर देता या बोल देता कि आना है, वे चली ही जाती थीं। बिना किसी समझ में आने वाले भावनात्मक या तार्किक कारण के उठने वाली यह विवशता स्वयं में ही एक ऐसा लक्षण है जिसे स्वेच्छा नहीं, बल्कि वशीकरण का चिह्न मानकर पहचानना चाहिए।
अन्य स्त्रियों के साथ वही व्यवहार, और मंत्र-प्रयोग की स्वीकारोक्ति
जब उसे विश्वास हो गया कि वे पूरी तरह उसके वश में हैं, तब उसने खुलकर बता दिया कि उसने मंत्रों और एक विशेष शक्ति के प्रयोग से उन्हें वश में किया है।
उन्होंने देखा कि जो स्त्रियाँ और लड़कियाँ अपनी समस्या के समाधान हेतु इस तथाकथित गुरु के पास आती थीं, वे भी उसी प्रकार उसकी ओर आकर्षित हो जाती थीं जैसे वे स्वयं हुई थीं; और जब उसे विश्वास हो गया कि वे पूरी तरह उसके कहने में चल रही हैं, तब उसने खुलकर बता दिया कि उसने मंत्रों और एक विशेष शक्ति के प्रयोग से उन्हें वश में किया है।
उनके साथ क्या हो रहा है, यह समझ तब और गहरी हुई जब उन्होंने देखा कि यह केवल उनके साथ नहीं हो रहा — जो स्त्रियाँ और लड़कियाँ अपनी समस्या के समाधान हेतु इस तथाकथित गुरु के पास आती थीं (वृत्तांत में उसे केवल "लतखोर बाबा" कहा गया है, अर्थात् गुरु के वेश में एक पतित व्यक्ति), वे भी किसी न किसी प्रकार से उसकी ओर आकर्षित हो ही जाती थीं, क्योंकि वह उनके साथ भी इसी प्रकार की क्रियाएँ करता था। ध्यान देने पर यह चीज़ उनसे छुपी नहीं रही। कुछ समय तक तो वे शांत रहीं, तत्पश्चात जब उन्होंने सच्चाई अच्छे प्रकार से देख ली कि यह प्रेम नहीं, बल्कि किसी विद्या का प्रयोग है — और जब उस व्यक्ति को भी पूरा विश्वास हो गया कि अब वे उसके कहने में चल रही हैं — तब उसने सच्चाई स्वयं प्रकट कर दी: कि उसके पास इस प्रकार की सामर्थ्य और शक्ति है, उसी शक्ति के प्रभाव से उसने उन्हें वश में किया है, और इस हेतु इस प्रकार के मंत्रों का प्रयोग किया गया है। उसने स्पष्ट कह दिया कि अब वे कुछ कर भी नहीं सकतीं — न घर-परिवार में बता सकती हैं, न किसी से सहायता ले सकती हैं, न इसके विरुद्ध कुछ कर सकती हैं।
प्रेम स्वीकारने से इनकार और नियंत्रण बनाए रखने का दावा
उसने उनके प्रेम को स्वीकार करने से मना कर दिया और अपनी कोई जिम्मेदारी नहीं मानी, और कहा कि जब वह चाहेगा तब उन्हें आना ही पड़ेगा।
छल की सच्चाई जान लेने के पश्चात भी उसका आघात उनके मन को कुंठित कर गया; उन्होंने प्रयास किया कि यदि वह उनसे प्रेम करता है तो उनके प्रेम को स्वीकार करके आगे साथ चले, परंतु उसने मना कर दिया और अपनी कोई मंशा या जिम्मेदारी नहीं मानी, जिस पर उन्होंने कहा कि अब वे उससे कोई संबंध नहीं रखेंगी — और उसने उत्तर दिया कि जब वह चाहेगा तब उन्हें आना ही पड़ेगा।
सच्चाई जान लेने से मन का आघात समाप्त नहीं हुआ — चाहे उन पर कितना भी बड़ा वशीकरण का प्रयोग किया गया हो, छल के कारण वे मन में कुंठित हो ही गईं; वक्ता कहते हैं कि किसी के साथ भी इस प्रकार छल होगा और उसके मन पर आघात होगा तो उसे घात लगेगा ही। फिर भी उन्होंने एक प्रयास किया: उन्होंने कहा कि यदि आप हमसे प्रेम करते हैं तो हमारे प्रेम को स्वीकार कीजिए, हम आगे आपके साथ चलने को तैयार हैं। उसने मना कर दिया कि इस प्रकार की उसकी कोई मंशा नहीं है, और कहा कि तुम स्वयं सामने से आई थीं, मैंने तुम्हें कुछ नहीं कहा था। तब उन्होंने कहा कि आज के बाद से वे उससे किसी प्रकार का कोई संबंध नहीं रखेंगी। उसने उत्तर दिया कि अब तुम ऐसा कर ही नहीं सकतीं — तुम जहाँ जाना है जाओ, परंतु जब हम चाहेंगे तुमको आना ही पड़ेगा।
तंत्र-सामग्री का रोक रखा जाना, और पकड़ के बाहरी लक्षण
उसके पास उनकी वे वस्तुएँ रह गई थीं जिनके माध्यम से तंत्र किया जाता है — पकड़ बेचैनी, पूजा में मन न लगने, मंदिर से भागने और रात को रोने के रूप में प्रकट होती थी।
उसके पास उनकी कुछ व्यक्तिगत या "एसेंशियल" वस्तुएँ मौजूद थीं जिनके माध्यम से तंत्र इत्यादि किया जाता है, इसी कारण वे उससे निकल ही नहीं पा रही थीं; जब भी वे उसके विषय में सोचना बंद करना चाहतीं, वह इसी पकड़ के सहारे ऐसे प्रयोग कर देता कि वे पूरी बेचैन हो जातीं, पूजा-पाठ में बैठ नहीं पातीं, मंदिर से भागने लगतीं और रात को रोने लगतीं — और मैसेज का उत्तर न मिलने पर उनकी दशा और बिगड़ जाती।
वृत्तांत में बताया गया है कि वे स्वयं को इससे निकाल क्यों नहीं पा रही थीं: उस व्यक्ति के पास उनकी कुछ व्यक्तिगत या एसेंशियल वस्तुएँ मौजूद थीं — वही वस्तुएँ जिनके माध्यम से इस प्रकार का तंत्र किया जाता है — और इसी कारण वे उससे निकल नहीं पा रही थीं। जब भी वे अपनी इच्छा से यह चाहतीं कि न जाएँ या उसके विषय में सोचें ही नहीं, तो वह इसी पकड़ के माध्यम से ऐसे-ऐसे प्रयोग कर देता कि वे पूरी बेचैन और विचलित हो जातीं। वे पूजा-पाठ में बैठ नहीं पाती थीं, मन उचाटित हो जाया करता था; मंदिर जातीं और मंदिर से भागने लगतीं; रात को बिना किसी स्पष्ट कारण के रोना आरंभ हो जाता। यदि वे मैसेज करतीं कि मेरे साथ ऐसा क्यों हो रहा है और उत्तर न मिलता, तो उस चुप्पी से उनकी दशा और खराब हो जाती। एक तरीके से वे पूरी तरह घिर गई थीं और यह उनकी मजबूरी बनती जा रही थी — जबकि इससे पहले वे भगवान सदाशिव तथा भगवती की भक्ति और सेवा करती थीं।
प्रेम को स्वीकारने से पहले उसकी सत्यता परखना
जो भाव प्रेम जैसा प्रतीत हो, उसे स्वीकार करने और उस पर विश्वास करने से पहले परख लेना चाहिए कि वह वास्तव में क्या है।
वक्ता मूल बात यह बताते हैं: मान भी लें कि उन्हें प्रेम हो गया था, तब भी उन्हें पहले परख लेना चाहिए था कि यह प्रेम वास्तव में सत्य है अथवा नहीं, न कि उसे वैसे ही स्वीकार कर लेना चाहिए था — और जब सच्चाई पूरी तरह स्पष्ट हो गई तथा उन्होंने अन्य लड़कियों के साथ भी वही कृत्य होते देख लिया, तभी उन्होंने वशीकरण का काट खोजना आरंभ किया।
वक्ता इस भाग की मूल सीख बताते हैं: मान भी लिया जाए कि उन्हें किसी अर्थ में प्रेम हो गया था, तब भी उन्हें पहले यह परख लेना चाहिए था कि यह प्रेम वास्तव में सत्य है अथवा नहीं, न कि उसे सीधे स्वीकार कर लेना चाहिए था। जब उन्होंने छल की सच्चाई पूरी तरह समझ ली और यह भी देख लिया कि अन्य लड़कियों तथा स्त्रियों के साथ भी वही कृत्य किया जा रहा है, तब उन्होंने अपने ऊपर किए गए वशीकरण का काट खोजना आरंभ किया।
वशीकरण के काट के रूप में दुर्गा सप्तशती महाविद्या क्रम पाठ
उन्होंने नवरात्र में श्री दुर्गा सप्तशती का महाविद्या क्रम से पाठ आरंभ किया और यथाशक्ति हवन सहित पूरा विधान पूर्ण किया, शेष क्रियाएँ मंदिर में कीं।
वशीकरण का काट खोजते हुए उन्हें इसी चैनल का दुर्गा सप्तशती महाविद्या क्रम पाठ वाला वीडियो मिला; मन में आ चुके ग्लानि और अशुद्धता के भाव को लेकर उन्होंने नवरात्रि के समय में यह पाठ आरंभ किया, यथाशक्ति हवन सहित पूरा विधान पूर्ण किया, और शेष सभी क्रियाएँ मंदिर में कीं।
वशीकरण का काट खोजते हुए उन्हें इसी चैनल (गृहस्थ तंत्र) का वह अत्यधिक देखा गया वीडियो मिला जिसमें दुर्गा सप्तशती का महाविद्या क्रम से पाठ करना बताया गया है। नवरात्र के समय में उन्होंने चैनल से कोई संपर्क नहीं किया था, परंतु उसी नवरात्रि के समय में, मन में आ चुके ग्लानि के भाव और इस अशुद्धता के बोध के साथ कि ऐसा अशुद्ध प्रेम उनसे हो गया, उन्होंने मन की थोड़ी शांति के हेतु श्री दुर्गा सप्तशती का महाविद्या क्रम से पाठ करना आरंभ किया। उन्होंने यथाशक्ति पूरे विधान को पूर्ण किया, जितना बन पड़ा उतना हवन भी करवाया, और शेष सभी क्रियाएँ मंदिर में कीं।
प्राप्त शांति, और प्रति मास अष्टमी से चतुर्दशी तक का पाठ
पाठ के पश्चात उन्होंने पाया कि तंत्र का प्रभाव कट चुका है, और उन्होंने प्रत्येक मास अष्टमी से चतुर्दशी तक यह पाठ करना आरंभ कर दिया।
भगवती कृपा से पाठ पूर्ण करने के पश्चात उनके मन में असीम शांति का अनुभव हुआ और उन्होंने पाया कि तंत्र का प्रभाव पूरी तरह कट चुका है; तत्पश्चात उन्होंने इस पाठ को प्रत्येक मास अष्टमी से चतुर्दशी तक करना आरंभ कर दिया, जैसा वीडियो में बताया गया था।
पाठ पूर्ण करने के पश्चात भगवती कृपा से उनके मन में असीम शांति का अनुभव हुआ — उनके कथन के अनुसार उन पर किए गए तंत्र का प्रभाव पूरी तरह कट चुका था। वक्ता जोड़ते हैं कि दुर्गा सप्तशती का महाविद्या क्रम पाठ और पहले से की जा रही सेवा-पूजा — इन्हीं से उन्हें वह सामर्थ्य प्राप्त हुआ, क्योंकि भगवती का जो महात्म्य है, जो चंडी चरित्र है, उसमें जगदंबा की ऐसी-ऐसी शक्तियाँ समाहित होती हैं कि जब व्यक्ति पूरे भाव से समर्पित होकर भगवती को पुकारता है तो वे शक्तियाँ उसे किसी भी प्रकार के तंत्र से निकालकर ले आती हैं — वक्ता के शब्दों में, उसके आगे किया गया तंत्र "कुछ था ही नहीं"। उस एक पाठ से आगे बढ़कर उन्होंने प्रत्येक मास यह पाठ करना आरंभ किया, अष्टमी से चतुर्दशी तक, जैसा मूल वीडियो में बताया गया था; और उनके मन में ग्लानि का भाव धीरे-धीरे कम होने लगा तथा भगवती की ओर समर्पण पहले से भी अधिक दृढ़ होने लगा।
अपनी भूल के निस्तारण हेतु अनुष्ठान, और कृपा के संकेत
उन्होंने स्वयं को भी उत्तरदायी माना कि उन्हें अपने ऊपर नियंत्रण रखना चाहिए था, इसके निस्तारण हेतु कई अनुष्ठान किए, और उसके बाद हुई घटनाओं को कृपा का संकेत माना।
वे मानती हैं कि तंत्र तो उन पर किया ही गया, परंतु अपने ऊपर नियंत्रण उन्हें स्वयं रखना चाहिए था; अपने मन में रह गए अपराध बोध और आत्म-ग्लानि के निस्तारण हेतु उन्होंने कई अनुष्ठान किए; तत्पश्चात उनके साथ कुछ ऐसी घटनाएँ हुईं जिन्हें उन्होंने दिव्य कृपा का संकेत माना और समझा कि जगदम्बा ने उन्हें उस अपराध से मुक्त कर दिया है।
वक्ता बताते हैं कि अपने वृत्तांत में वे स्वयं को पूरी तरह दोषमुक्त नहीं मानतीं — वे कहीं न कहीं यह मानती हैं कि तंत्र तो रहा, परंतु अपने ऊपर नियंत्रण होना चाहिए था, जो नहीं रहा। मन में रह गए कष्ट के भाव, अपमान बोध और अपराध बोध के निस्तारण हेतु उन्होंने कई अनुष्ठानएक दीर्घ अनुष्ठान — जिसमें अपने कड़े नियम होते हैं। किए। तत्पश्चात कहीं न कहीं, किसी माध्यम से, सांकेतिक रूप से उनके साथ दिव्यता के स्वरूप में कुछ ऐसी घटनाएँ हुईं जिनसे उन्हें समझ में आया कि जगदम्बा"जगत की माता" — देवी का एक नाम। अब उन पर प्रसन्न हैं और उन्हें उस अपराध से मुक्त कर चुकी हैं। इसके पश्चात वे पूरी तरह सेवा-भक्ति में लग गईं और लगातार साधनाएँ करती रहती हैं।
अंतिम चेतावनी: ऑनलाइन मार्गदर्शक पर विश्वास से पहले परख
किसी पर भी आँख मूँदकर विश्वास नहीं करना चाहिए: विश्वास दृढ़ होने से पहले संपर्क ही नहीं करना चाहिए, और ऑनलाइन किसी से संपर्क करने वाली स्त्री को गार्जियन को साथ रखना चाहिए।
वक्ता यह सीख देते हैं कि कभी भी किसी के ऊपर आँख मूँदकर विश्वास नहीं करना चाहिए, चाहे वह कोई भी क्यों न हो; जब तक सही विषय-सामग्री से विश्वास दृढ़ न हो जाए तब तक संपर्क करना ही नहीं चाहिए, और ऑनलाइन किसी से संपर्क करने वाली स्त्रियों को गार्जियन से बात करवानी चाहिए तथा तभी स्वयं बात करनी चाहिए जब वे वास्तव में इन विषयों को सँभालने में सक्षम हों।
वक्ता अंत में इस सत्य घटना की सीख बताते हैं: कभी भी किसी के ऊपर आँख मूँदकर विश्वास नहीं करना चाहिए, चाहे वह कोई भी क्यों न हो। इसी चैनल के श्रोताओं के लिए भी वे कहते हैं कि जब तक आपका विश्वास दृढ़ न हो — जब तक आपको सही विषय-सामग्री न मिल जाए और यह न लगे कि यह सही स्रोत है — तब तक संपर्क करना ही नहीं चाहिए, और विश्वास हो जाने पर ही आगे बढ़ना चाहिए। जो स्त्रियाँ, माताएँ और बहनें यूट्यूब या फेसबुक देखकर ऑनलाइन किसी से भी संपर्क करती हैं, उनसे वे कहते हैं कि उस बातचीत में गार्जियन को अवश्य सम्मिलित कीजिए। यदि कोई स्त्री सक्षम है — यदि उसके जीवन के अनुभव ऐसे हैं कि वह इन चीज़ों को स्वयं सँभाल सकती है — तभी उसे किसी से सीधे बात करनी चाहिए, अन्यथा नहीं। इसका कारण वे सीधा बताते हैं: आपको यह पता ही नहीं होता कि सामने वाला व्यक्ति सही है अथवा गलत। वृत्तांत इस आशा के साथ समाप्त होता है कि श्रोता इस घटना से सीख लेंगे और भगवती के चंडी महात्म्य (चंडी चरित्र) के माध्यम से यथाशक्ति भगवती की सेवा करेंगे, जिससे जगदम्बा"जगत की माता" — देवी का एक नाम। उन्हें सुनकर उनके हर कष्ट से निकालेंगी।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।