मंत्र विद्या से कोई देव या प्रेत शक्ति कैसे बंध जाती है
देवी-देवता के साधक से बंधने की प्रक्रिया पर नोट्स।
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काली या भैरव का प्रयोग किसी पर मारण में कैसे हो सकता है?
अपने वचन से बँधी धर्म-रक्षक शक्ति
वक्ता एक ऐसा संशय उठाते हैं जो उनके अनुसार श्रोताओं के मन में आता होगा: लोग सुनते हैं कि फलाने पर मारण प्रयोग हो गया, और कोई कहता है कि "काली जी का प्रयोग हो गया" या "भैरव जी का प्रयोग हो गया", जबकि भैरव जी और काली जी धर्म की रक्षा के लिए प्रकट हुई शक्तियाँ हैं, तो वे धर्म-अधर्म का विचार किए बिना अधर्म में कैसे? उनका उत्तर, जिसे पूरा प्रवचन विस्तार देता है, यह है कि कोई भी शक्ति नियमबद्ध साधना से प्रसन्न होकर साधक को वचन देती है, और वचन से बँध जाने पर उसे वही करना पड़ता है जो वह कहे, चाहे वह सदुपयोग करे या दुरुपयोग।
वक्ता विषय को थोड़ा अद्भुत और अलग बताते हैं, जिससे तंत्र क्षेत्र में श्रोता की जानकारी बढ़ेगी। वे कहते हैं कि मन में यह जिज्ञासा होती होगी कि धर्म-अधर्म का विचार किए बिना कोई शक्ति किसी का अहित कैसे कर सकती है। वे इसे ठोस रूप में रखते हैं। हम सुनते हैं कि फलाने के ऊपर इस प्रकार के मारण तंत्र का प्रयोग हो गया, और फिर कोई कहता है कि काली जी का प्रयोग हो गया, भैरव जी का प्रयोग हो गया। तो भैरव जी, काली जी आखिर क्यों किसी के ऊपर मारण का प्रयोग करेंगे? वे तो धर्म की रक्षा के लिए उपस्थित हुई, प्रकट हुई शक्तियाँ हैं। तो अधर्म में कैसे? इस प्रकार के अनेक संशय, वे कहते हैं, मन में आते होंगे, और यह विषय इसीलिए सबके समक्ष है कि आखिर यह किस प्रकार होता है। आगे की व्याख्या यह है कि कोई शक्ति साधक के एकनिष्ठ प्रेम से प्रसन्न होकर या उसके मंत्र के वश में होकर वचन देती है और उससे बँध जाती है; वही तंत्र, न कि शक्ति की अपनी धर्मपरायणता, तय करता है कि वह क्या करेगी।
साधना और जप से कोई शक्ति वचन से कैसे बँध जाती है
भाव, क्रिया और प्राप्त अंशात्मक शक्ति
वक्ता कहते हैं कि तंत्र के क्षेत्र में, और भक्ति मार्ग में भी, जब हम किसी देवता की साधना-उपासना भाव प्रधानता, क्रिया प्रधानता और उपासना के सिद्धांतों के साथ नित्य-नैमित्तिक नियम से करते हैं, जीवन का प्रत्येक क्षण उस देव शक्ति को समर्पित कर देते हैं, तो हमारे एकनिष्ठ प्रेम से उत्पन्न भाव-ऊर्जा से वह शक्ति पुष्ट होकर, प्रसन्न होकर हमारे समक्ष प्रकट होती है और वचन देती है: "आप जो कहेंगे उस कार्य को हम सिद्ध करेंगे, हम आपके प्रेम के वशीभूत हैं।" क्रिया प्रधानता में, वे कहते हैं, शक्ति उन्हीं मंत्रों के वश में होकर कार्य करने को मजबूर हो जाती है जिनसे उसे सिद्ध किया गया। इसे वे पारलौकिक विज्ञान का हिस्सा कहते हैं: एक ही मंत्र को बार-बार दोहराना, जो जप है, उससे ऊर्जा निर्मित होती है जिसका लक्ष्य असीमित बल वाली कोई दिव्य शक्ति होती है; उसे समर्पित करके हम उससे अंशात्मक शक्ति, उसके बल का एक अंश, प्राप्त करते हैं, जिसका सदुपयोग या दुरुपयोग हम अपने स्वार्थ के लिए करते हैं। यही, वे कहते हैं, वरदान, कृपा या आशीर्वाद कहलाने वाली चीज़ का यथार्थ है; वचन से बँधी उस शक्ति को फिर स्थान देकर उसकी सेवा-पूजा की जाती है और उसका सदुपयोग या दुरुपयोग किया जाता है।
वक्ता बंधन को दो रूपों में समझाते हैं। पहला, भाव। तंत्र के क्षेत्र में या किसी भी भक्ति मार्ग में जब हम किसी देवता की साधना-उपासना भाव प्रधानता के साथ, क्रिया प्रधानता के साथ, उपासना के सिद्धांतों के साथ, अपने नित्य-नैमित्तिक नियम के रूप में करते हैं, और जीवन का प्रत्येक क्षण किसी देव शक्ति, किसी दिव्य ऊर्जा को समर्पित कर देते हैं, तो उस एकनिष्ठ प्रेम से उत्पन्न भाव-ऊर्जा से वह शक्ति पुष्ट होकर, प्रसन्न होकर हमारे समक्ष प्रकट होती है। कृपा करती हुई वह इस प्रकार का वचन देती है: "आप जो कहेंगे उस कार्य को हम सिद्ध करेंगे, हम आपके प्रेम के वशीभूत हैं।" दूसरा, क्रिया। जब व्यक्ति क्रिया प्रधानता के साथ शक्तियों को ऐसे मंत्रों से सिद्ध कर लेता है जिन मंत्रों के वश में होकर वह शक्ति कार्य करने को मजबूर हो जाती है, तब भी इस प्रकार की क्रियाएँ संपादित की जाती हैं। फिर वे इस विषय को पारलौकिक विज्ञान का एक हिस्सा कहते हैं। किसी एक ही मंत्र को बार-बार दोहराया जाता है, जिसे हम जप कहते हैं। बार-बार दोहराते-दोहराते जो ऊर्जा निर्मित होती है, उसका प्रक्षेपण या लक्ष्य कोई एक दिव्य ऊर्जा, कोई एक दिव्य शक्ति होती है जिसके पास असीमित बल होता है। उसे समर्पित करके हम उससे कोई अंशात्मक शक्ति हासिल करते हैं, इस भाव से कि इस अंशात्मक शक्ति का सदुपयोग या दुरुपयोग हम अपने स्वार्थ के निमित्त करेंगे। यथार्थ, वे कहते हैं, यही है, चाहे इसे वरदान प्राप्ति कहें, चाहे कृपा-आशीर्वाद। इस प्रकार वचन से बँधी शक्ति को, वे कहते हैं, फिर स्थान-स्थान पर जगह देकर उसकी सेवा-पूजा की जाती है, और उसी का सदुपयोग या दुरुपयोग किया जाता है।
पौराणिक उदाहरण: सौ वर्ष की तपस्या से दैत्य महादेव को बाँध लेता है
नियति वरदान देने को बाध्य करती है; फिर पुण्य भुला दिया जाता है
वक्ता कहते हैं कि पौराणिक आख्यान इस पैटर्न से भरे पड़े हैं: जितने भी दैत्य, दानव, राक्षस हैं, सबने एक नियम, एक निष्ठा से, भक्त होकर, पूरे विधि-विधान से, एक निश्चित समय तक या बहुत दीर्घ काल तक किसी एक शक्ति की उपासना की। उनका उदाहरण एक दैत्य है जो शिव, महारुद्र की सौ वर्ष तपस्या करता है, और उतने समय रहन-सहन, आचार-विचार, नित्य संध्या-पूजन में एक अद्भुत, योग्य ब्राह्मण जैसा रहता है। जब महादेव प्रकट होते हैं और दैत्य ऐसी शक्ति माँगता है जिससे वह जो चाहे कर सके, तो उस मंत्र, उस तपस्या, उस भाव और उस समय की लाज-मर्यादा महादेव को रखनी है; नियति ने यह तय कर रखा है, और भगवान स्वयं नियति हैं। उसके लिए प्रतिबद्ध होकर वे ऐसी शक्तियाँ दे देते हैं, और शक्ति पाने के बाद दैत्य अपनी तपस्या की मर्यादा भूल जाता है, सोचता है कि सौ-सौ वर्ष के पुण्य कैसे नष्ट होंगे, और अपनी मनमर्जी का कार्य करता है।
उदाहरण के लिए वक्ता पौराणिक आख्यानों की ओर मुड़ते हैं, जो उनके अनुसार इससे भरे पड़े हैं। जितने भी दैत्य, दानव, राक्षस देखिए, वे सभी एक नियम, एक निष्ठा से, भक्त होकर, पूरे विधि-विधान से युक्त होकर, एक निश्चित समय तक अथवा बहुत दीर्घ काल तक किसी एक शक्ति की उपासना किए। वे उदाहरण लेते हैं कि किसी ने शिव जी की पूजा की, जो महारुद्र हैं। किसी दैत्य ने सौ साल तक उनकी तपस्या की, शिव जी प्रकट हुए। जब तक उसने महादेव की सौ साल तपस्या की, तब तक उसका रहन-सहन, आचार-विचार, व्यवहार, नित्य का संध्या-पूजन, सब दिव्य रहा। उसका चरित्र एक अद्भुत और योग्य ब्राह्मण जैसा रहा, जिसके बारे में कहा जा सके कि हाँ, यह ब्राह्मण है, नित्य कर्मादि, संध्या-वंदन करने वाला। लेकिन जब महादेव प्रकट हो जाते हैं और दैत्य अपना इच्छित वरदान पा लेता है, तो उसके मन का लक्ष्य पूरा हो जाता है: "महादेव, हमें ऐसी शक्ति दे दीजिए कि हम इससे जो चाहें कर सकें।" अब, वक्ता कहते हैं, उस मंत्र की, उसकी तपस्या की, उसके प्रकट किए भाव की और दिए गए समय की लाज-मर्यादा महादेव को रखनी है। यह नियति ने तय कर रखी है, और भगवान स्वयं नियति हैं। वे अपनी लीला कर रहे हैं, पर यहाँ विषय समझने का प्रयास कीजिए: उसके लिए प्रतिबद्ध होकर वे ऐसी शक्तियाँ प्रदान कर देते हैं। शक्ति मिलने के बाद, वे कहते हैं, दैत्य-दानव अपनी उस तपस्या की मर्यादा भूल जाते हैं। "इतने सौ-सौ साल के पुण्य हैं, कैसे नष्ट होंगे?" और अब उसके द्वारा वे अपनी मनमर्जी का कार्य करते हैं।
कलिकाल में नकारात्मक शक्तियों की सिद्धि और सिद्धों के तंत्र का दुरुपयोग
रक्षा के लिए बने विधान, मारण में मोड़े गए
वक्ता कहते हैं कि कलिकाल में भी जितने तंत्र-मंत्र चल रहे हैं, कहीं न कहीं ऐसा ही विषय होता है। आज के समय में नकारात्मक शक्तियों को प्रचंडता के साथ सिद्ध किया जाता है: भूत, प्रेत, पिशाच, बैताल, ब्रह्मराक्षस, दैत्य, दानव, महिषासुर जैसी शक्तियाँ। इन सबको कम समय में और अधिक से अधिक बल के रूप में सिद्ध करने के लिए तंत्र के विषय सिद्धों ने बनाए, अपने रक्षण और शत्रुओं के नाश के लिए; पर अब जन-कल्याण के स्थान पर उनका दुरुपयोग दूसरों को हानि पहुँचाने और मारण आदि प्रयोगों के लिए किया जाता है।
पौराणिक उदाहरण से वक्ता वर्तमान पर आते हैं। कलिकाल में भी, वे कहते हैं, जितने तंत्र-मंत्र विचार आदि चल रहे होते हैं, कहीं न कहीं ऐसा ही विषय होता है। आज के समय में, वे कहते हैं, नकारात्मक शक्तियों को प्रचंडता के साथ सिद्ध किया जाता है: भूत, प्रेत, पिशाच, बैताल, ब्रह्मराक्षस, दैत्य, दानव, महिषासुर जैसी शक्तियाँ। इन सभी शक्तियों को कम समय में और अधिक से अधिक बल के रूप में सिद्ध करने के लिए तंत्र के विषय सिद्धों के द्वारा बनाए गए हैं। वे विधान, उनके अनुसार, कहीं न कहीं अपने रक्षण के लिए, शत्रुओं के नाश के लिए थे। अब जन-कल्याण के स्थान पर कहीं न कहीं दूसरों को हानि पहुँचाने और मारण आदि के प्रयोग के लिए उनका प्रयोग, दुरुपयोग किया जाता है। यहाँ भी, वे कहते हैं, यही विषय होता है।
मारण प्रयोग क्यों काम करता है: उसके पीछे की सेवा, सिद्धि और त्रिवाचा
क्षुद्र शक्ति भी अपना वचन निभाती है
वक्ता कहते हैं कि किसी पर मारण प्रयोग या नकारात्मक ऊर्जा का प्रक्षेपण ऐसे ही उठाकर चला नहीं दिया जाता; करने वाले ने तपस्या की है। जो साधक ऐसा दुरुपयोग करता है, उसने भी 40 दिन, 50 दिन, महीना, साल-साल भर श्मशान की, मसान की, अपने गुरु की सेवा की है, उस सेवा से वह विद्या पाई है और उसे बड़ी कठिनाई से सिद्ध किया है। सिद्ध होने पर जो देव-देवता, मशान-मशानी या जो भी शक्ति प्रकट हुई, उससे त्रिवचा हुआ है। चाहे वह क्षुद्र शक्ति ही क्यों न हो, वे कहते हैं, उसके निमित्त हुए मंत्र जप से उसे बल मिला, वह ऊर्जा तृप्त हुई और उसने वचन दे दिया। इसलिए जब वह बाद में आपके ऊपर प्रक्षेपण करता है, आपका संहार करने या कष्ट देने के लिए उस सिद्ध ऊर्जा का आह्वान करता है, तो उसे वह कार्य करना पड़ता है, क्योंकि वह वचन दे चुकी है और उस तपस्या के वशीभूत हो चुकी है।
वक्ता एक आम धारणा को सुधारते हैं। ऐसा नहीं है, वे कहते हैं, कि किसी के ऊपर मारण प्रयोग किया गया या कोई नकारात्मक ऊर्जा का प्रक्षेपण किया गया तो उसे सीधे-सीधे बस ऐसे उठाकर चला दिया। उसने तपस्या की है। जो साधक इस प्रकार का दुरुपयोग करता है, उसने भी 40 दिन, 50 दिन, महीना, साल-साल भर श्मशान की, मशान की, अपने गुरु की सेवा की है। सेवा के बाद उसे उस प्रकार की विद्या प्राप्त हुई, और उस विद्या को उसने कठिनता-कठिनाई से सिद्ध किया। सिद्ध करने के बाद जो भी देव-देवता, मशान-मशानी या जो भी शक्ति प्रकट हुई, उनसे त्रिवाचा हुआ। अब, वे कहते हैं, उसका जितना तपोबल है, और चाहे वह क्षुद्र शक्ति ही क्यों न हो, उसके निमित्त जो मंत्र जप आदि हुआ, उससे उसे बल मिला। उससे वह ऊर्जा तृप्त हुई और उसने उसके लिए वचन भी दे दिया। इसके बाद जब वह आपके ऊपर प्रक्षेपण करता है, या आपका संहार करने, आपको कष्ट पहुँचाने के लिए अपनी उस सिद्ध हुई ऊर्जा का आह्वान देता है कि "आप आइए, ऐसा कार्य कीजिए", तो चूँकि वे वचन दे चुके हैं, और इतने समय तक की गई उसकी तपस्या के वशीभूत हो चुके हैं, उन्हें वह कार्य करना पड़ता है।
नकारात्मक शक्ति के साधक की निष्ठा बनाम भगवान के साधारण भक्त की
छूटे दिन, भोग के झगड़े और 12:01
वक्ता कहते हैं कि नकारात्मक ऊर्जाओं की पूजा करने वाले, जो भूत-प्रेत सिद्ध करते हैं, बहुत निष्ठावान होते हैं और कोई गलती नहीं करते, क्योंकि उन्हें पता है कि गलती हुई तो प्राण चले जाएँगे; जबकि भगवान की सेवा करने वाला मानता है कि गलती होने या नियम छूटने से कोई फर्क नहीं पड़ेगा, भगवान तो कृपालु-दयालु हैं, कष्ट थोड़े देंगे, इसलिए वह 10 दिन करता है 5 छोड़ता है, महीना करता है 4 महीने छोड़ देता है, और छोड़ने की यही प्रवृत्ति कारण है कि चीज़ें प्राप्त नहीं होतीं। वे अंतर और बताते हैं: मशान-देव का साधक अपने आराध्य को नित्य नियम से भोग-भेंट देता है, दारू चढ़ाए, मुर्गा चढ़ाए, जो भी उसका विषय हो, जबकि भगवान के भोग पर घर में मारपीट होती है कि भोग खत्म हुआ तो तुम लाओ, इतना महँगा क्यों चढ़ाया; साधक दृढ़ है कि रात 12:00 बजे शुरू होना है और 12:01 नहीं होने देगा, जबकि भक्त आज 6 बजे, कल 8 बजे, परसों 10 बजे पूजा करता है। साधक अपनी शक्ति को साक्षात भगवान मानता है; भक्त, वे कहते हैं, भगवान को बच्चा बनाकर रखता है, भाव-भाव के चक्कर में उनका अनादर करता रहता है, और उसी अनादर का परिणाम पाता है।
नकारात्मक शक्ति के बंधन को दिखाने के बाद वक्ता सीख श्रोता की अपनी पूजा पर मोड़ते हैं। अगर हम भगवान की सेवा कर रहे हैं, दिव्य महाशक्तियों की सेवा कर रहे हैं, तो एकनिष्ठ होकर करनी है। देखिए, वे कहते हैं: नकारात्मक ऊर्जाओं की पूजा करने वाले लोग, जो भूत-प्रेत को सिद्ध करते हैं, बहुत निष्ठावान होते हैं। कोई गलती नहीं करते, क्योंकि उन्हें पता है कि गलती होगी तो प्राण चले जाएँगे। लेकिन जब कोई भगवान की सेवा करता है तो उसे पता है कि गलती होने या नियम छूट जाने से कोई फर्क नहीं पड़ेगा: भगवान तो कृपालु और दयालु हैं, कष्ट थोड़े देंगे। तो आराम से 10 दिन करता है, 5 दिन छोड़ता है; 5 दिन करता है, 2 दिन छोड़ता है; महीना भर करता है, 4 महीना छोड़ देता है। यह जो छोड़ने की प्रवृत्ति है, वे कहते हैं, इसी कारण से वे चीज़ें प्राप्त भी नहीं होतीं। वे दोनों को आमने-सामने रखते हैं। एक ओर व्यक्ति एकनिष्ठ होकर अपने आराध्य, मशान-देव की सेवा-पूजा कर रहा है, नित्य नियम से भोग-भेंट दे रहा है, दारू चढ़ाए, मुर्गा चढ़ाए, जो भी उसका विषय है। दूसरी ओर भगवान को भोग लगाने पर घर में आपस में मारपीट हो जाती है: भोग खत्म हो गया तो तुम लेकर आओ; नैवेद्य में यह क्यों चढ़ा दिया; ऐसा चढ़ाना चाहिए; इतना महँगा क्यों चढ़ा रहे हो। तो आपकी निष्ठा भी नहीं बन पाती। आज 6 बजे पूजा, कल 8 बजे, परसों 10 बजे। वह व्यक्ति पूरी तरह दृढ़ है कि रात के 12 बजे शुरू हो जाना चाहिए मतलब शुरू हो जाना चाहिए; वह 12:01 नहीं होने देगा। पर आपको उससे कोई मतलब नहीं। तो निष्ठा में कमी आ जाती है, वे कहते हैं। और वह व्यक्ति जब किसी शक्ति की आराधना-साधना करता है तो इतनी दिव्यता से करता है कि उसे साक्षात भगवान ही मान लेता है। यहाँ आप भगवान को भी बच्चा बनाकर रखते हो, भाव-भाव के चक्कर में उनका अनादर करते रहते हो। उसी अनादर का परिणाम, वे कहते हैं, आपको प्राप्त होता है।
भगवान और नकारात्मक शक्तियाँ, दोनों अपने भक्त के वश में
कृपा और हानि के पीछे एक ही नियम
वक्ता सार कहते हैं: जिस प्रकार भगवान भक्त के वश में हैं, उसी प्रकार शैतान और जो भी नकारात्मक ऊर्जाएँ-शक्तियाँ हैं, वे भी अपने भक्त के मंत्र के वश में, उसकी क्रिया के वश में, उसके भाव के वश में होती हैं, और इसी कारण हानि पहुँचाती हैं। इस विषय को ऐसे समझिए, वे कहते हैं, कि सब ऊर्जाओं का खेल है।
वक्ता प्रवचन के दोनों हिस्सों को जोड़ते हैं। भगवान, वे कहते हैं, जिस प्रकार भक्त के वश में हैं, ठीक उसी प्रकार शैतान और जो भी नकारात्मक ऊर्जाएँ, शक्तियाँ हैं, वे भी अपने भक्त के मंत्र के वश में, उसकी क्रिया के वश में, उसके भाव के वश में होती हैं। और इसी कारण से वे हानि पहुँचाती हैं। तो इस विषय को इसी प्रकार समझिए, वे कहते हैं, कि सब ऊर्जाओं का खेल है। यही उनके आरंभिक संशय का उत्तर है कि धर्म-रक्षक शक्ति किसी के विरुद्ध कैसे कार्य कर सकती है: शक्ति का स्वभाव नहीं, बंधन तय करता है।
तंत्र विद्या: ऊर्जा का रूपांतरण, जिसका बल तपोबल है
तपोबल के बिना उपाय कुछ ही दिन टिकता है
वक्ता कहते हैं कि ऊर्जा को एक ऊर्जा से दूसरी ऊर्जा में कैसे परिवर्तित किया जाता है, यही तंत्र विद्या है, और इसी विद्या का सदुपयोग या दुरुपयोग कोई भी साधक अपने तपोबल के माध्यम से करता है। तपोबल ही, वे कहते हैं, वह ऊर्जा है जिससे ये सब चीज़ें सफलतापूर्वक होती हैं: रक्षा भी इसी से होगी, विनाश भी इसी से, दंड भी इसी से; यानी तपोबल से ही संभव है। तपोबल के सिवाय जो अन्य क्रियाएँ हैं, वे कहते हैं, क्षणिक होती हैं: किसी का उतारा, कोई उपाय या काट करवाइए तो वह 24 घंटे, दो दिन, दस दिन तक सहयोग करेगा, उसके बाद लंबे समय तक नहीं।
प्रवचन समाप्त करते हुए वक्ता एक परिभाषा देते हैं। ऊर्जा को एक ऊर्जा से दूसरी ऊर्जा में कैसे परिवर्तित किया जाता है, वे कहते हैं, यही तंत्र विद्या है। और इसी विद्या का दुरुपयोग या सदुपयोग कोई भी साधक अपने तपोबल के माध्यम से करता है। तपोबल ही, वे कहते हैं, वह ऊर्जा है जिससे ये सभी चीज़ें सफलतापूर्वक हो जाती हैं। रक्षा भी इसी से होगी, विनाश भी इसी से होगा, दंड भी इसी से होगा। यानी तपोबल से ही संभव है। तपोबल के सिवाय जो अन्य क्रियाएँ होती हैं, वे कहते हैं, क्षणिक होती हैं। किसी का उतारा कीजिए, कोई उपाय या काट करवाइए, तो 24 घंटे, दो दिन, दस दिन तक वह सहयोग करेगा, बाद में लंबे समय तक सहयोग नहीं करने वाला। अंत में वे आशा करते हैं कि विषय समझ में आया होगा, ताकि अपने इष्ट देवता के प्रति समर्पण सही प्रकार से पुष्ट हो और साधक सफल हो।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।