मंत्र विद्या से कोई देव या प्रेत शक्ति कैसे बंध जाती है

देवी-देवता के साधक से बंधने की प्रक्रिया पर नोट्स।

8 notes, in the order they are taught. Jump to any one.

1 also answer a common question

Questions this answers

1 of the notes below are questions in their own right. Scroll for more.

The notes
EN हिंदी
01

काली या भैरव का प्रयोग किसी पर मारण में कैसे हो सकता है?

अपने वचन से बँधी धर्म-रक्षक शक्ति

· Reviewed Sep 14, 2026 · 00:11–00:47 · Also a question

वक्ता एक ऐसा संशय उठाते हैं जो उनके अनुसार श्रोताओं के मन में आता होगा: लोग सुनते हैं कि फलाने पर मारण प्रयोग हो गया, और कोई कहता है कि "काली जी का प्रयोग हो गया" या "भैरव जी का प्रयोग हो गया", जबकि भैरव जी और काली जी धर्म की रक्षा के लिए प्रकट हुई शक्तियाँ हैं, तो वे धर्म-अधर्म का विचार किए बिना अधर्म में कैसे? उनका उत्तर, जिसे पूरा प्रवचन विस्तार देता है, यह है कि कोई भी शक्ति नियमबद्ध साधना से प्रसन्न होकर साधक को वचन देती है, और वचन से बँध जाने पर उसे वही करना पड़ता है जो वह कहे, चाहे वह सदुपयोग करे या दुरुपयोग।

02

साधना और जप से कोई शक्ति वचन से कैसे बँध जाती है

भाव, क्रिया और प्राप्त अंशात्मक शक्ति

· Reviewed Sep 14, 2026 · 00:48–02:35

वक्ता कहते हैं कि तंत्र के क्षेत्र में, और भक्ति मार्ग में भी, जब हम किसी देवता की साधना-उपासना भाव प्रधानता, क्रिया प्रधानता और उपासना के सिद्धांतों के साथ नित्य-नैमित्तिक नियम से करते हैं, जीवन का प्रत्येक क्षण उस देव शक्ति को समर्पित कर देते हैं, तो हमारे एकनिष्ठ प्रेम से उत्पन्न भाव-ऊर्जा से वह शक्ति पुष्ट होकर, प्रसन्न होकर हमारे समक्ष प्रकट होती है और वचन देती है: "आप जो कहेंगे उस कार्य को हम सिद्ध करेंगे, हम आपके प्रेम के वशीभूत हैं।" क्रिया प्रधानता में, वे कहते हैं, शक्ति उन्हीं मंत्रों के वश में होकर कार्य करने को मजबूर हो जाती है जिनसे उसे सिद्ध किया गया। इसे वे पारलौकिक विज्ञान का हिस्सा कहते हैं: एक ही मंत्र को बार-बार दोहराना, जो जप है, उससे ऊर्जा निर्मित होती है जिसका लक्ष्य असीमित बल वाली कोई दिव्य शक्ति होती है; उसे समर्पित करके हम उससे अंशात्मक शक्ति, उसके बल का एक अंश, प्राप्त करते हैं, जिसका सदुपयोग या दुरुपयोग हम अपने स्वार्थ के लिए करते हैं। यही, वे कहते हैं, वरदान, कृपा या आशीर्वाद कहलाने वाली चीज़ का यथार्थ है; वचन से बँधी उस शक्ति को फिर स्थान देकर उसकी सेवा-पूजा की जाती है और उसका सदुपयोग या दुरुपयोग किया जाता है।

03

पौराणिक उदाहरण: सौ वर्ष की तपस्या से दैत्य महादेव को बाँध लेता है

नियति वरदान देने को बाध्य करती है; फिर पुण्य भुला दिया जाता है

· Reviewed Sep 14, 2026 · 02:36–04:06

वक्ता कहते हैं कि पौराणिक आख्यान इस पैटर्न से भरे पड़े हैं: जितने भी दैत्य, दानव, राक्षस हैं, सबने एक नियम, एक निष्ठा से, भक्त होकर, पूरे विधि-विधान से, एक निश्चित समय तक या बहुत दीर्घ काल तक किसी एक शक्ति की उपासना की। उनका उदाहरण एक दैत्य है जो शिव, महारुद्र की सौ वर्ष तपस्या करता है, और उतने समय रहन-सहन, आचार-विचार, नित्य संध्या-पूजन में एक अद्भुत, योग्य ब्राह्मण जैसा रहता है। जब महादेव प्रकट होते हैं और दैत्य ऐसी शक्ति माँगता है जिससे वह जो चाहे कर सके, तो उस मंत्र, उस तपस्या, उस भाव और उस समय की लाज-मर्यादा महादेव को रखनी है; नियति ने यह तय कर रखा है, और भगवान स्वयं नियति हैं। उसके लिए प्रतिबद्ध होकर वे ऐसी शक्तियाँ दे देते हैं, और शक्ति पाने के बाद दैत्य अपनी तपस्या की मर्यादा भूल जाता है, सोचता है कि सौ-सौ वर्ष के पुण्य कैसे नष्ट होंगे, और अपनी मनमर्जी का कार्य करता है।

04

कलिकाल में नकारात्मक शक्तियों की सिद्धि और सिद्धों के तंत्र का दुरुपयोग

रक्षा के लिए बने विधान, मारण में मोड़े गए

· Reviewed Sep 14, 2026 · 04:07–04:44

वक्ता कहते हैं कि कलिकाल में भी जितने तंत्र-मंत्र चल रहे हैं, कहीं न कहीं ऐसा ही विषय होता है। आज के समय में नकारात्मक शक्तियों को प्रचंडता के साथ सिद्ध किया जाता है: भूत, प्रेत, पिशाच, बैताल, ब्रह्मराक्षस, दैत्य, दानव, महिषासुर जैसी शक्तियाँ। इन सबको कम समय में और अधिक से अधिक बल के रूप में सिद्ध करने के लिए तंत्र के विषय सिद्धों ने बनाए, अपने रक्षण और शत्रुओं के नाश के लिए; पर अब जन-कल्याण के स्थान पर उनका दुरुपयोग दूसरों को हानि पहुँचाने और मारण आदि प्रयोगों के लिए किया जाता है।

05

मारण प्रयोग क्यों काम करता है: उसके पीछे की सेवा, सिद्धि और त्रिवाचा

क्षुद्र शक्ति भी अपना वचन निभाती है

· Reviewed Sep 14, 2026 · 04:45–05:47

वक्ता कहते हैं कि किसी पर मारण प्रयोग या नकारात्मक ऊर्जा का प्रक्षेपण ऐसे ही उठाकर चला नहीं दिया जाता; करने वाले ने तपस्या की है। जो साधक ऐसा दुरुपयोग करता है, उसने भी 40 दिन, 50 दिन, महीना, साल-साल भर श्मशान की, मसान की, अपने गुरु की सेवा की है, उस सेवा से वह विद्या पाई है और उसे बड़ी कठिनाई से सिद्ध किया है। सिद्ध होने पर जो देव-देवता, मशान-मशानी या जो भी शक्ति प्रकट हुई, उससे त्रिवचा हुआ है। चाहे वह क्षुद्र शक्ति ही क्यों न हो, वे कहते हैं, उसके निमित्त हुए मंत्र जप से उसे बल मिला, वह ऊर्जा तृप्त हुई और उसने वचन दे दिया। इसलिए जब वह बाद में आपके ऊपर प्रक्षेपण करता है, आपका संहार करने या कष्ट देने के लिए उस सिद्ध ऊर्जा का आह्वान करता है, तो उसे वह कार्य करना पड़ता है, क्योंकि वह वचन दे चुकी है और उस तपस्या के वशीभूत हो चुकी है।

06

नकारात्मक शक्ति के साधक की निष्ठा बनाम भगवान के साधारण भक्त की

छूटे दिन, भोग के झगड़े और 12:01

· Reviewed Sep 14, 2026 · 05:48–07:19

वक्ता कहते हैं कि नकारात्मक ऊर्जाओं की पूजा करने वाले, जो भूत-प्रेत सिद्ध करते हैं, बहुत निष्ठावान होते हैं और कोई गलती नहीं करते, क्योंकि उन्हें पता है कि गलती हुई तो प्राण चले जाएँगे; जबकि भगवान की सेवा करने वाला मानता है कि गलती होने या नियम छूटने से कोई फर्क नहीं पड़ेगा, भगवान तो कृपालु-दयालु हैं, कष्ट थोड़े देंगे, इसलिए वह 10 दिन करता है 5 छोड़ता है, महीना करता है 4 महीने छोड़ देता है, और छोड़ने की यही प्रवृत्ति कारण है कि चीज़ें प्राप्त नहीं होतीं। वे अंतर और बताते हैं: मशान-देव का साधक अपने आराध्य को नित्य नियम से भोग-भेंट देता है, दारू चढ़ाए, मुर्गा चढ़ाए, जो भी उसका विषय हो, जबकि भगवान के भोग पर घर में मारपीट होती है कि भोग खत्म हुआ तो तुम लाओ, इतना महँगा क्यों चढ़ाया; साधक दृढ़ है कि रात 12:00 बजे शुरू होना है और 12:01 नहीं होने देगा, जबकि भक्त आज 6 बजे, कल 8 बजे, परसों 10 बजे पूजा करता है। साधक अपनी शक्ति को साक्षात भगवान मानता है; भक्त, वे कहते हैं, भगवान को बच्चा बनाकर रखता है, भाव-भाव के चक्कर में उनका अनादर करता रहता है, और उसी अनादर का परिणाम पाता है।

07

भगवान और नकारात्मक शक्तियाँ, दोनों अपने भक्त के वश में

कृपा और हानि के पीछे एक ही नियम

· Reviewed Sep 14, 2026 · 07:20–07:34

वक्ता सार कहते हैं: जिस प्रकार भगवान भक्त के वश में हैं, उसी प्रकार शैतान और जो भी नकारात्मक ऊर्जाएँ-शक्तियाँ हैं, वे भी अपने भक्त के मंत्र के वश में, उसकी क्रिया के वश में, उसके भाव के वश में होती हैं, और इसी कारण हानि पहुँचाती हैं। इस विषय को ऐसे समझिए, वे कहते हैं, कि सब ऊर्जाओं का खेल है।

08

तंत्र विद्या: ऊर्जा का रूपांतरण, जिसका बल तपोबल है

तपोबल के बिना उपाय कुछ ही दिन टिकता है

· Reviewed Sep 14, 2026 · 07:35–08:20

वक्ता कहते हैं कि ऊर्जा को एक ऊर्जा से दूसरी ऊर्जा में कैसे परिवर्तित किया जाता है, यही तंत्र विद्या है, और इसी विद्या का सदुपयोग या दुरुपयोग कोई भी साधक अपने तपोबल के माध्यम से करता है। तपोबल ही, वे कहते हैं, वह ऊर्जा है जिससे ये सब चीज़ें सफलतापूर्वक होती हैं: रक्षा भी इसी से होगी, विनाश भी इसी से, दंड भी इसी से; यानी तपोबल से ही संभव है। तपोबल के सिवाय जो अन्य क्रियाएँ हैं, वे कहते हैं, क्षणिक होती हैं: किसी का उतारा, कोई उपाय या काट करवाइए तो वह 24 घंटे, दो दिन, दस दिन तक सहयोग करेगा, उसके बाद लंबे समय तक नहीं।

Indexed, not endorsed as instruction

यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।

Explore this topic