लोबान या राल: घर की धुनी में क्या जलाना चाहिए
घर की धुनी हेतु लोबान और राल के अंतर पर नोट्स।
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लोबान और राल: दोनों क्या हैं और कहाँ से आते हैं
एक विदेशी राल और भारत की अपनी साल की राल
वक्ता बताते हैं कि लोबान एक ऐसे पेड़ के दूध का ठोस रूप है जो भारत में नहीं होता — वह सुमात्रा, जावा और इंडोनेशिया में मिलता है — और इत्र तथा औषधि में प्रयोग होता है। वे जोड़ते हैं कि पूर्व काल में वे क्षेत्र देवताओं के विरोधी असुर, दैत्य, राक्षसों के निवास थे, और उन्हीं के द्वारा इसका अधिकाधिक प्रयोग होता होगा। भारत में जो प्रयोग होता है वह राल है, साल वृक्ष का गोंद, जो छाल काटते ही तुरंत ठोस हो जाता है; राल की धूनी, वे कहते हैं, सनातन संस्कृति में सब जगह होती है।
सबसे पहले, वक्ता कहते हैं, लोबान क्या है और कहाँ से मिलता है। लोबान एक पेड़ से निकलने वाले दूध का ठोस रूप है। वह पेड़ — उसके पत्ते, फूल और बनावट — भारत में नहीं पाया जाता; इस प्रकार के वृक्ष सुमात्रा, जावा और इंडोनेशिया में होते हैं। उनकी छाल को बीच से काटा जाता है तो दूध की धार बहती है, जो बाहर आने पर ठोस बन जाती है, और उसी ठोस पदार्थ को लोबान के रूप में इत्र और औषधियों के लिए प्रयोग किया जाता है। दूसरी बात, वे कहते हैं: यह भारत में पाया जाने वाला धूप नहीं है। पूर्व काल में, जैसा हम सब जानते हैं, जिस क्षेत्र में यह मिलता है वहाँ देवताओं से विरोध करने वाली जातियाँ — असुर, दैत्य, राक्षस आदि — रहती थीं, और उन्हीं के द्वारा इसका अधिकाधिक प्रयोग होता होगा। भारत में जिसका प्रयोग होता है उसे हम राल कहते हैं, जो साल के वृक्ष से निकलने वाले गोंद से बनता है। साल के वृक्ष की छाल को बीच से चीरा जाता है तो एक तैलीय पदार्थ निकलता है जो तुरंत ठोस हो जाता है और राल का रूप ले लेता है। राल की धूनी हमारी सनातन संस्कृति में सब जगह होती है।
लोबान के धुएँ का स्वास्थ्य पर प्रभाव
यह रोग ठीक भी करता है और पैदा भी
वक्ता कहते हैं कि लोबान का धुआँ दोनों ओर काम करता है: औषधि के रूप में इससे बहुत से चर्म रोग और जोड़ों के दर्द ठीक होते हैं, और उतने ही नए रोग हो भी जाते हैं — जोड़ों के, फेफड़ों के, अस्थमा जैसे। दोनों बातें सच हैं, इसलिए इसका औषधीय प्रयोग सोच-समझकर, दिशा-निर्देश में करना चाहिए, सामान्य सलाह पर नहीं।
जहाँ एक ओर लोबान की धूनी से बहुत से चर्म रोग आदि ठीक हो जाते हैं, वक्ता कहते हैं, वहीं बहुत से नए रोग हो भी जाते हैं। औषधि के रूप में प्रयोग करने से जोड़ों के दर्द ठीक होते हैं; और औषधि के रूप में प्रयोग करने से बहुत से रोग हो भी जाते हैं — जोड़ों में, फेफड़ों में, अस्थमा जैसी बीमारियाँ। दोनों चीज़ें हैं। इसलिए, वे कहते हैं, इसका उपयोग सोच-समझकर, दिशा-निर्देश में करना चाहिए।
श्याम धूप के रूप में लोबान: तंत्र में इसका प्रयोजन
यह प्रेतों को आकर्षित करता है, भगाता नहीं
लोबान पर मत बनाने से पहले, वक्ता कहते हैं, देख लें कि ऋषि-मुनि इसका प्रयोग कहाँ और कैसे करते थे। मुंडमालन तंत्र और कापालिक तंत्र जैसे तंत्र ग्रंथों में — जहाँ शव साधना, श्याम साधना और श्मशान जागरण का वर्णन है — धूप विधि में लोबान को "श्याम धूप" कहा गया है, और इसका प्रयोग दो जगह होता है। पहला, और सबसे अधिक, नकारात्मक और वायवीय ऊर्जाओं — भूत, प्रेत, पिशाच — को आकर्षित करने के लिए, भगाने के लिए नहीं; शमशान साधना करने वाले या प्रेत-आसन सिद्ध करने वाले उच्च कोटि के तांत्रिक (जैसे त्रिपुर भैरवी की उपासना में, जो प्रेत पर विराजमान हैं, या हनुमान जी के मरकटी स्वरूप में) इसका इसी के लिए प्रयोग करते हैं। दूसरा, शनि, भैरव या हनुमान जी के उन तंत्र-युक्त मंदिरों में जहाँ अन्य शक्तियाँ भी स्थापित हैं, जहाँ दरबार लगते हैं और प्रेतों को बुलाया या किसी के सिर से हटाया जाता है। सामान्य मंदिर में इसका प्रयोग नहीं होता, न होना चाहिए।
चूँकि लोग तंत्र ग्रंथों का हवाला देते हैं — हमारे ऋषि-मुनि लोबान का प्रयोग करते थे — वक्ता कहते हैं कि पहले जान लीजिए कि वे इसका प्रयोग कहाँ और कैसे करते थे; तब आप बेहतर समझ पाएँगे कि आपको क्यों मना किया गया है, और जो करने को कह रहे हैं उन्हें इसके बारे में कितनी जानकारी है। जब आप मुंडमालिनी तंत्र, कपालिक तंत्र आदि का अध्ययन करेंगे, जहाँ शव साधना, श्याम साधना, शमशान साधना और शमशान जागरण की विधि का वर्णन है, उन सभी जगहों पर आपको धूप देने की विधि मिलेगी। संस्कृत में जहाँ ऐसी धूप विधियों का उल्लेख है, उसे श्याम धूप कहा गया है; लोबान को श्याम धूप कहा गया है। और श्याम धूप का प्रयोग दो जगहों पर, दो प्रकार से होता है। पहला, और सबसे अधिक, किसी भी प्रकार की नकारात्मक और वायवीय ऊर्जाओं को आकर्षित करने के लिए — भगाने के लिए नहीं। जिन्हें हम भूत, प्रेत, पिशाच कहते हैं, वे इससे आकर्षित होते हैं। इसीलिए शमशान साधना आदि के समय तंत्र साधना करने वाले तांत्रिक और ऋषि-मुनि इसका प्रयोग करते थे: महाविद्याओं की उच्च कोटि की साधना में लोग प्रेत को सिद्ध करते हैं, क्योंकि प्रेत आसन होता है। भगवती के कई स्वरूप उस पर विराजते हैं; हनुमान जी, जैसा हम जानते हैं, मरकटी स्वरूप में बैठते हैं; त्रिपुर भैरवी प्रेत के ऊपर विराजमान हैं, इसलिए जो भैरवी सिद्धि करते हैं वे प्रेतासन सिद्ध करते हैं, प्रेत को भी सिद्ध करते हैं — आवश्यक होता है। ऐसी तंत्र क्रियाओं में, जिनमें उच्च कोटि के तांत्रिक भी प्रेत-पिशाच सिद्ध करते हैं, वे श्याम धूप — लोबान की धूनी — करके उनका आकर्षण करते हैं। तंत्र ग्रंथों में यह यदा-कदा सांकेतिक रूप में मिल जाएगा; यह निर्देशित है, इसलिए ऐसी जगहों पर इसका प्रयोग होता है। दूसरा, शनि जी, भैरव जी या हनुमान जी के मंदिरों में जहाँ इसका प्रयोग होता है, वह भी दो चीज़ों के लिए है। वहाँ बहुत सी अन्य प्रकार की शक्तियों की भी स्थापना और पूजा हुई रहती है — वे तंत्र-युक्त मंदिर होते हैं। सामान्य मंदिर में इसका प्रयोग नहीं होता, न करना चाहिए; लोग अनजाने में कर देते हैं, लेकिन इसका धूप सामान्य मंदिर के लिए नहीं है। इसका प्रयोग उन तांत्रिक मंदिरों में होता है जहाँ दरबार लगते हैं, प्रेत-पिशाचों को बुलाया जाता है, किसी के सिर से हटाया जाता है।
लोबान घर में कभी क्यों नहीं जलाया जाता
यह प्रेत-पिशाच को प्रसन्न करता है और पितरों को भगा देता है
वक्ता बताते हैं कि लोबान की धूनी जो भी उपस्थित हो उस पर क्या करती है: तांत्रिक इसी से किसी के सिर पर आवेशित ऊर्जा को बुलाता है, और प्रेत या पिशाच इससे बहुत प्रसन्न और शांत होता है — लेकिन देव शक्ति, सकारात्मक ऊर्जा, अपने देव-पितृ या सात्विक घर के देवी-देवता चिड़चिड़ाकर हटने का प्रयास करते हैं। इसलिए, वे कहते हैं, सनातनी को श्याम धूप घर में कभी नहीं करना चाहिए: घर में पहले से मौजूद नकारात्मक ऊर्जा पुष्ट और संतुष्ट होती है, शुभ शक्तियाँ दूर भागती हैं, और कुल के पितृ सबसे पहले भागते हैं। सुगंध पसंद हो या न हो, अलग बात है। वे बताते हैं कि इस्लाम में इसका सबसे अधिक प्रयोग कहाँ है — मज़ारों पर जहाँ मुर्दे लेटे हैं, जिससे सैयद, पीर, ख़बीस और जिन्न प्रसन्न होते हैं — और कहते हैं कि जो इसे हानिरहित बताते हैं वे पहले अध्ययन करें।
लोबान की धूनी, वक्ता बताते हैं, किसी के शरीर पर नकारात्मक ऊर्जा को बुलाने के लिए भी होती है और हटाने के लिए भी। मान लीजिए आपके सिर पर कोई प्रेत-पिशाचिक ऊर्जा है जो स्वयं को देवी-देवता बताकर पूजा माँग रही है। जिस तांत्रिक ने वैसी सिद्धि प्राप्त की है, वह लोबान की ही धूनी देकर उसे बुलाएगा; धूनी और उसके मंत्र से जो भी नकारात्मक ऊर्जा होगी वह सिर पर आवेशित हो जाएगी। और यदि आपके सिर पर ऐसी ऊर्जा है जिसे आप या तांत्रिक पहले से प्रेत-पिशाच जानते हैं, तो वह लोबान की धूनी से बहुत प्रसन्न होगी — उसे शांति महसूस होगी। लेकिन देव शक्ति होगी तो चिड़चिड़ाएगी; सकारात्मक ऊर्जा होगी — आपके देव-पितृ, देव-पुत्र, घर के कोई देवी-देवता जो देव स्वरूप में, शुभ सात्विक स्वरूप में हों — तो वे बहुत चिड़चिड़ा जाएँगे, हटने का प्रयास करेंगे, भागेंगे; जिसके सिर पर होंगे वह भी क्रोधित अवस्था में चला जाएगा। यह जान लीजिए, वे कहते हैं: जब किसी के सिर पर ऐसा आवेश आता हो, या देखने-सुनने के लिए किसी को बुलाया जाता हो, वहीं तांत्रिक इस धूनी का प्रयोग करते हैं। इसलिए लोबान कभी घर में नहीं जलाना चाहिए। उनका अपना मत भी यही है, वे कहते हैं, कि एक सनातनी को, सनातन संस्कृति के मानने वाले को, श्याम धूप घर में कभी नहीं करना चाहिए, क्योंकि यदि आपके घर में कोई नकारात्मक ऊर्जा है तो वह इससे पुष्ट होगी, संतुष्ट होगी; उसकी तृप्ति होगी, उसकी वृद्धि होगी। शुभ शक्तियाँ दूर भागेंगी। सबसे पहले आपके कुल के पितृ भागेंगे — लोबान की धूनी शुरू होते ही पितृ सबसे पहले दूर भागते हैं; कुल के जो भी शुभ सात्विक पितृ हैं, वे दूर भागेंगे। इसकी सुगंध, या लोबान का इत्र, आपको पसंद हो या न हो, वह अलग विषय है। यह भी जान लीजिए, वे कहते हैं, कि इस्लाम में इसका प्रयोग क्यों होता है: जो लोग इसका सबसे अधिक प्रयोग करते हैं, वे कहाँ कर रहे हैं, देख लीजिए — मज़ारों के ऊपर, जहाँ मुर्दे लेटे हैं। किसकी प्रसन्नता के लिए? इससे सैयद प्रसन्न होते हैं, पीर पसंद करते हैं, ख़बीस पसंद करते हैं, जिन्न-जिन्नात ऐसी चीज़ें सूँघकर प्रसन्न होते हैं। इसीलिए लोबान की धूनी घर में कभी नहीं देनी है। जो महाज्ञानी कहते हैं कि ऐसा कुछ नहीं होता, घर में कर सकते हैं — उनके बारे में वे कहते हैं कि उन्हें ज्ञान नहीं है, गलत जानकारी दे रहे हैं; उनसे कहिए कि पहले अध्ययन करें। इस तरह गलत जानकारी देकर वे लोगों से अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मरवाते हैं। इसलिए घर में इसका धूप न दें।
प्रतिष्ठा से पहले स्थान को सभी ऊर्जाओं से खाली करना
पहले निर्वात, फिर शुभ शक्तियों को स्थान
वक्ता लोबान का भगाने वाला एकमात्र प्रयोग बताते हैं। जब घर का बंधन करना हो और उसमें बहुत सी नकारात्मक ऊर्जाएँ हों — सात्विक और तामसिक दोनों, या केवल तामसिक — तब गंधक, लोबान और हींग को कुछ अन्य जड़ी-बूटियों के साथ मिलाकर अपामार्ग की लकड़ी पर धूनी की जाती है। पूरा स्थान खाली हो जाता है: न कोई देव शक्ति रहती है, न प्रेत-पिशाचिक शक्ति; वह निर्वात बन जाता है जिसमें केवल परब्रह्म परमेश्वर, साक्षात जगदंबा, रहती हैं। तभी शंख ध्वनि, कपूर प्रज्वलित करके आदि से शुभ सात्विक ऊर्जा का आवाहन करके उन्हें स्थान दिया जाता है।
लोबान भगाने के लिए भी प्रयोग होता है, वक्ता कहते हैं, और यह भी जान लेना चाहिए कि कैसे। जब घर का बंधन किया जाना हो — घर में बहुत सी नकारात्मक ऊर्जाएँ हों, सात्विक और तामसिक दोनों प्रकार की ऊर्जा उपस्थित हो, या केवल तामसिक ही — तब गंधक, साथ में लोबान, साथ में हींग, इन तीनों का मिश्रण और कुछ अन्य जड़ी-बूटियाँ, सबको मिलाकर अपामार्ग की लकड़ी पर धूनी की जाती है। वह स्थान पूरा खाली हो जाता है। न वहाँ कोई देव शक्ति रहेगी, न प्रेत-पिशाचिक शक्ति। इसे निर्वात मान लीजिए — जिसमें केवल परब्रह्म परमेश्वर, साक्षात जगदंबा, जो स्वयं को परब्रह्म परमेश्वर कहती हैं, रहती हैं; प्रकृति पूरी खाली, वहाँ कोई ऊर्जा नहीं। पहले इस प्रकार की धूनी देकर स्थान खाली करने के बाद ही शुभ सात्विक ऊर्जा का आवाहन किया जाता है — शंख ध्वनि आदि करके, वहाँ कपूर प्रज्वलित करके — और शुभ शक्तियों को स्थान दिया जाता है। इस प्रकार से होता है।
घर की दैनिक धूनी के लिए राल का मिश्रण
जो देवताओं को पुष्ट करता है और नकारात्मक को भगाता है
राल, साल वृक्ष का गोंद, कूटकर पत्थर जैसा दाना बनाकर जलाया जाता है, और उसी से, वक्ता कहते हैं, देवी-देवता पुष्ट और संतुष्ट होते हैं। धूनी के लिए इसमें लौंग, काला तिल, काली मिर्च, कपूर, इलायची और जटामांसी जैसी औषधीय चीज़ें मिलाई जाती हैं; इससे शुभ सात्विक ऊर्जा बढ़ती है। इसकी सुगंध दिव्य और तेज़ होती है; शुभ शक्तियाँ इससे मज़बूत होती हैं और नकारात्मक दूर भागती हैं। मंत्रित करके इसकी धूनी करें, वे कहते हैं, तो हो ही नहीं सकता कि नकारात्मक शक्ति वहाँ ठहरे — वह कमज़ोर पड़कर भागती है।
राल, वक्ता कहते हैं — साल वृक्ष से निकले गोंद से बना — कूटकर पत्थर जैसा किया जाता है, और उससे धूनी करने पर उसी से देवी-देवता पुष्ट होते हैं, देवता संतुष्ट होते हैं। धूनी के लिए इसके साथ अन्य वस्तुएँ प्रयोग होती हैं: लौंग, काला तिल, काली मिर्च, सब मिलाकर, उसमें कपूर आदि डालकर, इलायची डालकर, जटामांसी — इस प्रकार की औषधीय चीज़ें सब मिलाकर — और साथ में राल; जब हम इससे धूनी करते हैं, तो इसी से शुभ सात्विक ऊर्जा बढ़ती है। उसी की धूनी करनी चाहिए। इसकी सुगंध भी बड़ी दिव्य और तेज़ होती है। शुभ सात्विक शक्तियाँ इससे पुष्ट होती हैं, मज़बूत होती हैं; नकारात्मक शक्तियाँ इससे दूर भागती हैं। और यदि मंत्रित करके इसकी धूनी कर दें, तो हो ही नहीं सकता कि नकारात्मक शक्ति वहाँ ठहरे — कमज़ोर पड़ जाएगी, दूर भागेगी।
तंत्र में राल: इसके नाम और स्थान बंधन में प्रयोग
अश्वकर्ण, कार्स्य, धूप वृक्ष, सूर्य धूप, सर्ज धूप
तंत्र में राल का भी प्रयोग है, वक्ता कहते हैं, अश्वकर्ण, कार्स्य, धूप वृक्ष, सूर्य धूप और सर्ज धूप नामों से। बहुत से कवचों में इसका वर्णन मिलता है, और रेणुका तंत्रम में भगवती छिन्नमस्तिका के स्वरूप की प्रसन्नता के लिए ऐसे मंत्र विधान हैं जिनकी धूनी कार्स्य या अश्वकर्ण धूप से की जाती है — वह धूप राल ही है। उन मंत्रों का पाठ करते हुए इससे धूनी करने पर स्थान-बंधन हो जाता है: शुभ शक्तियाँ आसानी से आती हैं और अशुभ दूर भागती हैं।
तंत्र में राल का भी प्रयोग है, वक्ता कहते हैं। तंत्र में इसे अश्वकर्ण, कार्स्य, धूप वृक्ष, सूर्य धूप, सर्ज धूप कहा गया है — इस प्रकार के नाम आपको मिलेंगे। बहुत से कवच आदि में इसका वर्णन मिलता है। जैसे रेणुका तंत्रम का अध्ययन करेंगे तो उसमें भी इसका वर्णन मिलेगा: भगवती छिन्नमस्तिका के स्वरूप की प्रसन्नता हेतु कुछ मंत्र विधान होते हैं, और उन मंत्रों की धूनी कार्स्य धूप से, अश्वकर्ण धूप से की जाती है। यही धूप राल कहा गया है। मंत्र का पाठ करते हुए इससे धूनी की जाए तो स्थान बंधन हो जाता है। शुभ शक्तियाँ वहाँ आसानी से आ पाती हैं, और अशुभ शक्तियाँ दूर भागती हैं।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।