दत्तात्रेय याग से कुलयोगिनी के प्रत्यक्ष दर्शन — पूर्वजों की शक्तियाँ, अनुष्ठान का विधान और पारण की परीक्षा
पूर्वजों से विरासत में मिली शक्तियों की एक सत्य घटना, उन्हें शांत करने के लिए बताया गया दत्तात्रेय अनुष्ठान, और पारण के क्षण में बुढ़िया के रूप में प्रकट हुई कुलयोगिनी।
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पूर्वजों की जागृत पर विसर्जित न की गई तांत्रिक शक्तियाँ वंशजों को परेशान करती हैं
अकाल मृत्यु से खोई ओझैती-सोखैती की विद्याएँ; श्मशान शक्तियाँ, सिद्ध, कुल और लोक योगिनियाँ, चेटक और डीह के समूह
वक्ता कहते हैं कि कई परिवारों में पिता, दादा या कुल का कोई बड़ा तंत्र साधना या ओझैती-सोखैती का काम करता था, पर अकाल मृत्यु या किसी और कारण से वह विद्या, उसका विधान और नियम अगली पीढ़ी को न दे पाया। वर्तमान वंशजों को पता ही नहीं कि कौन सी शक्तियाँ थीं, कैसे पूजी जाती थीं, तो जब वे किसी परेशानी में पड़कर कोई साधना-उपासना शुरू करते हैं, वे शक्तियाँ आकर तांडव मचाने लगती हैं। पूर्वज के कर्म अच्छे भी रहे हों तो किसी मानवीय भूल से कुछ बताया न गया, विसर्जन न हुआ; ये शक्तियाँ श्मशान की शक्तियाँ, सिद्ध, कुल या लोक योगिनियाँ, चेटक शक्तियाँ, या सिकड़ी-चौकी पर चलने वाली शक्तियों का डीह का समूह हो सकती हैं।
वक्ता एक ऐसी स्थिति से शुरू करते हैं जो उनके अनुसार कई परिवारों में होती है। कोई पूर्वज — पिता, दादा, दादी या कुल का कोई और बड़ा — किसी प्रकार की तंत्र साधना करता था, या देखने-सुनने का, ओझैती-सोखैती का काम करता था। कालांतर में वे जीवित रहते हुए वे विद्याएँ अपने वंशजों को नहीं दे पाए: शायद अकाल मृत्यु हो गई, शायद विद्या को सही से संरक्षित नहीं कर पाए या संतुलित विधान नहीं बता पाए, या कोई और कारण रहा। परिणाम यह, वे कहते हैं, कि वर्तमान वंशजों को इन विद्याओं और शक्तियों की कोई जानकारी नहीं — कौन सी ऊर्जा, कौन सी शक्ति, क्या विधान, पूजन का क्या नियम — और यह अज्ञान कहीं न कहीं बड़ों की गलतियों का फल है। तो जब आज का वंशज किसी परेशानी में पड़कर कोई साधना-उपासना शुरू करता है, वे शक्तियाँ आकर तांडव मचाना आरंभ कर देती हैं। वे कहते हैं कि बहुत से लोगों के जीवन में ऐसा विषय उपस्थित हो जाता है। वे जोड़ते हैं कि यदि मान भी लें कि परदादा के कर्म अच्छे थे, तो भी किसी मानवीय भूल से सारी बातें न बताई गईं, कुछ छूट गया, या विसर्जन नहीं हो पाया। ये शक्तियाँ श्मशान की शक्तियाँ हो सकती हैं, सिद्ध योगिनी, कुल योगिनी, लोक योगिनी, अन्य प्रकार की चेटक शक्तियाँ, या सिकड़ी में या चौकी पर चलने वाली शक्तियों का पूरा समूह — डीह का समूह — जिन्हें अलग-अलग क्षेत्रों में अलग नामों से जाना जाता है।
विरासत की शक्तियाँ उसी वंशज को चुनती हैं जो साधना शुरू करता है
वे सामर्थ्य देखती हैं, स्वप्न से अधिकार माँगती हैं, और पीढ़ी भर सेवा न मिलने से उग्र होती हैं
वक्ता कहते हैं कि ऐसी शक्तियों की पूरी जानकारी वही दे सकता था जिसने उनकी सेवा-पूजा की और सिद्धि करके रखी। यदि दादा चार भाई थे और उनके परिवार अब तीसरी-चौथी पीढ़ी में हैं, तो जो वंशज सबसे अधिक कष्ट में होकर साधना शुरू करेगा, उसी को सबसे अधिक परेशानी होगी, क्योंकि शक्तियाँ सामर्थ्य देखती हैं — यही तो पूजा-सेवा कर सकता है, इसी बच्चे में हमें तृप्त करने का सामर्थ्य है। वे अप्रत्यक्ष रूप से, स्वप्न आदि से अपना अधिकार माँगती हैं, जिससे व्यक्ति भयभीत होता है; और एकाध पीढ़ी सेवा-पूजा न मिलने से वे उग्र हो चुकी होती हैं, तो उनके कोप का भाजन भी बनना पड़ता है।
वक्ता कहते हैं कि ऐसी शक्तियों की पूरी और सही जानकारी केवल वही व्यक्ति दे सकता था जो उनकी सेवा-पूजा करता था और जिसने उन पर सिद्धि करके रखी थी। वे उदाहरण देते हैं। मान लीजिए दादा चार भाई थे, चारों के अपने परिवार अब तीसरी-चौथी पीढ़ी में आ गए हैं, और तीसरी पीढ़ी में आप हैं। यदि चारों परिवारों में आप ही सबसे अधिक कष्ट में हैं और आपने साधना शुरू कर दी, जबकि बाकी तीन ने कष्ट में होकर भी कोई विशेष पूजा-सेवा नहीं की, तो सबसे अधिक परेशानी आपको ही होगी। कारण, वे कहते हैं, यह कि शक्तियाँ सामर्थ्य देखती हैं: यही तो पूजा-सेवा कर सकता है, हमको तृप्त करने का सामर्थ्य इसी बच्चे में है। तो वे अप्रत्यक्ष रूप से आपको परेशान करेंगी, स्वप्न आदि के माध्यम से अपना अधिकार माँगेंगी, जिसमें व्यक्ति भयभीत हो जाता है। और यह भयभीत होने वाला विषय भी है, वे जोड़ते हैं, क्योंकि एकाध पीढ़ी का जो पूरा गैप होता है उसमें वे शक्तियाँ सेवा-पूजा न मिलने से उग्र हो चुकी होती हैं, और व्यक्ति को उनके कोप का भाजन भी बनना पड़ता है।
सोखा-ओझा अपनी शक्तियों को कहाँ स्थान देता है
पूजन स्थान, क्षेत्रपाल के पास डीह, पूजित पीपल, वीर शक्तियों के लिए आग की जड़ — सब घर में कभी नहीं
वक्ता कहते हैं कि कोई भी सोखा-ओझा हर शक्ति को अपने घर पर, विशेषकर पुश्तैनी घर में, स्थान देकर नहीं रखता: काफी शक्तियाँ उसके पूजन स्थान पर होती हैं, कुछ डीह पर यानी क्षेत्रपाल के पास — आवश्यकता होने पर पूजन-भोग देकर चला आता है — कुछ पूजित पीपल वृक्ष में, और वीर प्रकार की शक्तियाँ आग की जड़ में। हर कोई अपनी चालाकी के अनुसार रखता है और समय-समय पर प्रयोग करता है। इसीलिए, वे कहते हैं, उनकी घटना वाले परिवार का विषय कभी पूरी तरह शोधित नहीं हो पाया — कितनी शक्तियाँ हैं, क्या कहाँ है।
वक्ता बताते हैं कि उनकी घटना वाले परिवार का विषय कभी सही से क्यों नहीं शोधित हो पाया — कितनी चीज़ें हैं, क्या है, क्या नहीं। यदि आप पुश्तैनी घर में रह रहे हैं, वे कहते हैं, तो कोई भी सोखा-ओझा हर शक्ति को अपने घर पर स्थान देकर नहीं रखता। काफी शक्तियाँ उसके पूजन के स्थान पर होती हैं; कुछ डीह पर, यानी क्षेत्रपाल के पास; जब आवश्यकता होती है तो वहाँ जाकर पूजन-भोग देकर चला आता है। कुछ पूजित पीपलभगवान दत्तात्रेय को समर्पित एक पवित्र वृक्ष — इसके नीचे किया गया पितृ तर्पण गृह-क्लेश उत्पन्न करने वाले अशांत पितरों को शांत करता है। वृक्ष में रखी जाती हैं; वीर प्रकार की शक्तियाँ हों तो आग की जड़ में दी जाती हैं। हर कोई अपनी विद्या और चालाकी के अनुसार रखता है और समय-समय पर प्रयोग करता है।
जगाई गई शक्ति जगाने वाले को विसर्जन तक संकल्प से बाँधती है
जीवित रहते मुक्त करें या किसी को बताएँ; नहीं तो धन-संपत्ति और वंश परेशान होंगे
वक्ता कहते हैं कि यदि आपने एक बार किसी शक्ति को अपने नाम से जगाया है और उसे भोग देते हैं, तो उसका नाम आपके साथ जुड़ गया और आप उससे संकल्पित, आबद्ध हैं। या तो जीवित रहते उस संकल्प का विसर्जन हो — शक्ति को उस स्थान से मुक्त कर दिया जाए, रहे या जाए उसकी इच्छा, ताकि आपको दोष न लगे — या यदि आप न वह कर पाए, न किसी को बता पाए, तो आपका धन-संपत्ति, आपका वंश, सबको कहीं न कहीं वह परेशान करेगी। यही, वे कहते हैं, उनकी घटना वाले साधक के साथ हो रहा था।
वक्ता कहते हैं कि यदि आपने एक बार उसे अपने नाम से जगाया है तो आपके साथ उसका नाम जुड़ा है — आप ही उसे भोग देते हैं। अब आप कहीं न कहीं उससे आबद्ध हैं, संकल्पित हैं। या तो जीवित रहते हुए उस संकल्प का विसर्जन हो जाए — उसे उस स्थान से मुक्त कर दिया जाए, रहे चाहे जाए वह उसकी इच्छा, ताकि आपको दोष न लगे — या यदि आप जीवित रहते न यह कर पाए, न किसी और को इसके बारे में बता पाए, तो आपका धन-संपत्ति, आपका वंश, जो भी होगा, उन सबको कहीं न कहीं वे चीज़ें परेशान करेंगी। यही, वे कहते हैं, कथा वाले साधक के साथ भी हो रहा था।
क्षेत्रपाल निकारी घर को कीलित करने के लिए केवल 24 घंटे देती है
क्षेत्रपाल सब शक्तियों को एक दिन के लिए ले जाता है; कीलन-बंधन न हो तो उत्पात लौटता है
वक्ता कहते हैं कि जब क्षेत्रपाल की निकारी की जाती है तो क्षेत्रपाल सभी शक्तियों को ले जाता है, उन्हें भी जो घर में पूजित रही हैं और उस दुष्ट शक्ति को भी जिसे घर के किसी व्यक्ति ने चौखट पार कराकर बलि आदि देकर बैठाया हो। लेकिन वे चीज़ें केवल 24 घंटे के लिए दूर होती हैं; वे 24 घंटे घर को कीलित-बंधित करने के लिए हैं ताकि वे पुनः प्रवेश न करें। ऐसा न हो तो एकाध दिन घर बहुत सौम्य-शांत लगता है और फिर वही उत्पात और दिक्कतें शुरू हो जाती हैं — और साधक के लिए पूरी निद्रा कठिन हो जाती है।
वक्ता कहते हैं कि परिवार का विषय कभी पूरी तरह समझ में नहीं आता था — कोई देखे तो आधा पता चले, आधा नहीं। विशेष रूप से जब क्षेत्रपाल निकारीक्षेत्रपाल को अर्पित एक विसर्जन-अनुष्ठान — सुरक्षा तथा क्षेत्र में निवास करने वाली दुष्ट शक्तियों (डाकिनी, शाकिनी, भूत, प्रेत, पिशाच, वेताल) की शांति हेतु प्रार्थना, जो घर की देहरी पर व्याप्त दुष्ट ऊर्जाओं को कम-से-कम 24 घंटे हेतु शुद्ध कर देती है। की जाती थी, तो चूँकि घर में वे शक्तियाँ पूजित रही थीं, मान रखने के लिए क्षेत्रपाल सबको लेकर जाते थे। लेकिन वे कहते हैं कि वे सदैव यह कहते हैं: यदि आपके घर में कोई दुष्ट शक्ति उपस्थित है — जिसे चौखट पार कराकर घर के किसी व्यक्ति ने बैठाया है, बलि आदि देकर रखा है — तो क्षेत्रपाल निकारी से वह चीज़ें केवल 24 घंटे के लिए दूर होती हैं। वे 24 घंटे आपके पास हैं घर को कीलित-बंधित करने के लिए, या ऐसा प्रबंध करने के लिए कि वह पुनः प्रवेश न करे। जब ऐसी निकारी होती है तो एकाध दिन घर बहुत शांत और सौम्य लगता है, लेकिन 24 घंटे बाद पुनः वही उत्पात शुरू हो जाता है, दिक्कतें शुरू हो जाती हैं। साधक के लिए, वे जोड़ते हैं, निद्रा पूर्ण हो पाना बहुत मुश्किल हो जाता है।
घर की विरोधी शक्तियाँ घर में की गई साधना में सिद्धि का मार्ग रोकती हैं
दत्त एकाक्षरी और माला मंत्र जैसी उच्च साधना घर में पूर्ण नहीं हो पाती
वक्ता कहते हैं कि ऐसे घर में जो जितनी साधना करेगा, ये शक्तियाँ उतना ही सिद्धि तक पहुँचने का मार्ग नहीं बनने देंगी — इससे पहले कि साधक उस मंत्र का जप पूरा करे जिससे सिद्धि होनी है, और विशेषकर जब वह घर में कर रहा हो। कारण यह कि वह उच्च कोटि की साधना कर रहा है; इस मामले में साधक भगवान दत्त के एकाक्षरी मंत्र और माला मंत्र का जप कर रहा था, और जप की पूर्णता पर उसका पूर्ण प्रभाव नहीं मिलता।
वक्ता कहते हैं कि ऐसे घर में जो जितनी साधना करेगा, ये लोग उतना ही सिद्धि तक पहुँचने का मार्ग नहीं बनने देंगे — इससे पहले कि साधक उस मंत्र का जप पूरा करे जिससे सिद्धि होनी है, और विशेष रूप से जब वह घर में कर रहा हो। कारण यह कि वह एक उच्च कोटि की साधना कर रहा है; इस मामले में साधक भगवान दत्त के एकाक्षरी मंत्र और माला मंत्र का जप कर रहा था। तब जप आदि की पूर्णता होने पर भी उसका पूर्ण प्रभाव नहीं मिलेगा।
केवल सुरक्षा के निमित्त किया गया जप पुण्य नहीं जोड़ता
पूर्ण जप प्रारब्ध काटता और पुण्य-बल बनाता है; सुबह का जप शाम तक रक्षा; खर्च हुआ जप कुछ नहीं जोड़ता
वक्ता कहते हैं कि जप की पूर्णता होने पर ही उसका पूर्ण प्रभाव मिलता है — प्रारब्ध छिन्न होते हैं, ऊर्जा बनती है, पुण्य-बल बनता है, तब सुरक्षा होती है। सामान्यतः सुबह जप करें तो शाम तक सुरक्षा रहती है। लेकिन यदि जप किसी काम में प्रयुक्त होने के निमित्त हो रहा है — सीधे सुरक्षा के लिए, या विरोधी शक्तियों के बंधन के लिए — तो कोई पुण्य एक जगह एकत्रित नहीं होता; बनते ही खर्च हो जाता है। यही, वे कहते हैं, उनकी घटना वाले साधक के साथ सदैव हो रहा था।
जप की पूर्णता होने पर ही, वक्ता कहते हैं, उसका पूर्ण प्रभाव मिलता है: आपके प्रारब्धपूर्व कर्मों द्वारा पहले से गतिमान भाग्य का वह अंश — साधना व सत्कर्म इसकी तीव्रता को घटा सकते हैं, किंतु पूर्णतः मिटा नहीं सकते। छिन्न होंगे, ऊर्जा बनेगी, पुण्य-बल बनेगा, तब आपकी सुरक्षा होगी। सामान्यतः, वे कहते हैं, सुबह जप करें तो शाम तक आपकी सुरक्षा है। लेकिन यदि आप किसी काम में प्रयुक्त होने के निमित्त जप कर रहे हैं — सीधे कह दिया कि सुरक्षा के निमित्त जप कर रहे हैं, या इनके बंधन के निमित्त — तो कोई पुण्य एक जगह एकत्रित भी नहीं हो रहा। बनते ही खर्च हो जाता है। यही विषय, वे कहते हैं, यहाँ सदैव हो रहा था।
हर भगत परिवार की वह एक गुप्त मास्टर शक्ति
केवल एक को बताई जाती; सब पर नियंत्रण; सबसे कृपालु; वह रहे तो सब लौटा देती
वक्ता कहते हैं कि जिस भी परिवार के पूर्वज भगतवाल का काम करते थे, उसमें एक ऐसी शक्ति अवश्य होती है जो मास्टर की तरह है: जागृत होकर अपनी प्रचंडता पर आ जाए तो सभी शक्तियों को पूर्ण नियंत्रण में ले सकती है, और वही अपने भक्त-साधक पर सबसे अधिक कृपालु होती है — जिसके पास ओझा तब जाता था जब बाकी सबसे हार रहा हो। क्योंकि वह सबसे मूल है, उसे पूरी तरह गुप्त रखा जाता है, केवल एक व्यक्ति को बताया जाता है, बाकी किसी को नहीं; सब कुछ चला भी जाए तो वह रहे तो सब ला देती है। ऐसी उपस्थिति, वे कहते हैं, साधक के परिवार में थी और वह बहुत परेशान था।
वक्ता कहते हैं कि एक बात हमेशा याद रखिए: जिस भी परिवार के पूर्वज भगतवाल का काम करते रहे हों, उसमें एक ऐसी शक्ति अवश्य होती है जो मास्टर की का काम करती है। यदि वह जागृत हो गई, अपनी प्रचंडता पर आ गई, तो सभी शक्तियों को पूर्ण नियंत्रण में ले सकती है। और साथ ही वही अपने भक्त-साधक पर सबसे अधिक कृपालु होती है — जिस सोखा-ओझा ने उसे जागृत किया, वह बाकी शक्तियों से हारने पर उसी के पास जाता था। लेकिन, वे कहते हैं, क्योंकि वह सबसे मूल है, उसे पूरी तरह गुप्त ही रखा जाता है, जैसे कोई सीक्रेट रखता है। वह केवल एक व्यक्ति को बताई जाती है, उसी एक को रोक देते हैं; बाकी सबको सब कुछ देंगे, पर वह नहीं देंगे। यदि आपका सब कुछ चला भी गया तो वह रहेंगी तो सब ला देंगी — इतनी सामर्थ्यवान होती है ऐसी शक्ति। साधक के परिवार में, वे कहते हैं, उस चीज़ की उपस्थिति थी और वह बहुत परेशान हो रहा था।
पूर्वजों की शक्तियाँ विरोधी हों तो घर में साधना न करें
गाँव की टोका-टोकी से बाहर भी जप न हो पाए तो कुछ दिन अन्यत्र रहने का प्रबंध करें
वक्ता कहते हैं कि ऐसे समय में वे सदैव यही कहते हैं: घर में मत कीजिए। यह साधक बाहर भी जप नहीं कर पाता था, क्योंकि गाँव के लोग टोका-टोकी करते थे — अरे सोखा बन रहा है, ओझैती सीख रहा है, यहाँ मत करो, मंदिर में लोग आते-जाते हैं। तो वक्ता ने कहा कि कुछ दिन के लिए किसी अन्य स्थान पर जाने का प्रबंध कीजिए; साल-दो साल की बातचीत के बाद वह गया, और वहाँ उसे दो चीज़ें जप करने को दी गईं।
वक्ता कहते हैं कि ऐसे समय में उनकी सलाह सदैव यही होती है: घर में मत करिए। साधक की समस्या यह थी कि बाहर जाकर जप-तप करने पर गाँव के लोग बड़ी टोका-टोकी करते थे — अरे का हो, सोखा बन रहा है, ओझैती सीख रहा है, कुछ सिद्धि कर रहा है, यहाँ मत करो, मंदिर में लोग आते-जाते हैं। तो वक्ता ने कहा कि कुछ ऐसा प्रबंध करिए कि कुछ दिन के लिए किसी अन्य स्थान पर जाएँ; लगभग साल-दो साल की बातचीत के बाद वह अन्य स्थान पर गया, और वहाँ उसे दो चीज़ें जप करने के लिए कही गईं।
जिस देवता का स्वरूप बार-बार स्वप्न में दिखे, साधना वहीं से शुरू करें
इस साधक के लिए भगवान दत्त, यद्यपि घर में कभी उनकी पूजा नहीं हुई
वक्ता कहते हैं कि उन्होंने साधक को भगवान दत्त की साधना इसलिए कहने कहा क्योंकि वह शुरू से कहता था कि घर में कभी भगवान दत्त की पूजा होते नहीं देखी-सुनी, लेकिन स्वप्न में अनेक बार उनके स्वरूप से जुड़ी बातें देखी हैं, यद्यपि उसे जानकारी नहीं थी, नाम भी नहीं पता था। जब वह उस स्वरूप को सदैव देखता था, तो वक्ता ने कहा: शुरुआत यहीं से कीजिए।
वक्ता कहते हैं कि साधक को भगवान दत्त की साधना-पूजा इसलिए करने को कहा गया क्योंकि वह शुरू से सदैव कहता था कि हमारे घर में प्रत्यक्ष रूप से कभी भगवान दत्तात्रेय की पूजा होते नहीं देखी-सुनी, लेकिन स्वप्न में अनेक बार उनके स्वरूप से संबंधित विषय देखे हैं, यद्यपि जानकारी नहीं थी, घर में कोई नाम भी नहीं था। जब साधक ने कहा कि हम उस स्वरूप को सदैव देखते हैं, तो वक्ता ने कहा: आप शुरुआत ही यहीं से कीजिए।
पूर्वी भारत में भगवान दत्त को कम जानते हैं; उनका प्रमुख स्वरूप कभी कश्मीर में था
मुख्यतः महाराष्ट्र और दक्षिण में पूजित; शैव संप्रदाय का तांत्रिक त्रिभार स्वरूप
वक्ता कहते हैं कि मध्य प्रदेश से लेकर बिहार, झारखंड, राजस्थान, उड़ीसा तक भगवान दत्त को शायद ही कोई जानता है — किसी दुकानदार से उनका फोटो या श्रीविग्रह माँगो तो पूछेगा कि ये कौन से देवता हैं। उनके स्वरूप की पूजा अधिकतर महाराष्ट्र और दक्षिण में होती है; ऐसा क्यों हुआ और कैसे हानि पहुँचाई गई, यह वे पहले बता चुके हैं। जबकि कश्मीर के क्षेत्र में, वे कहते हैं, भगवान दत्त का सबसे प्रमुख स्वरूप रहा — जिसे उनकी परंपरा त्रिभार स्वरूप कहती है, तंत्र में जिसका पूजन होता है और जो दत्त से बहुत मिलता-जुलता है — और एक समय शैव संप्रदाय में वे वहीं सबसे अधिक पूजित रहे।
वक्ता कहते हैं कि यह सत्य है: मध्य प्रदेश के क्षेत्र से लेकर बिहार, झारखंड, राजस्थान, उड़ीसा — इधर के क्षेत्रों में भगवान दत्तात्रेय को शायद ही कोई जानता है। किसी से कहिए कि भगवान दत्त का फोटो या श्रीविग्रह चाहिए तो वह पूछेगा कि ये कौन से देवता हैं; दिखाना पड़ता है। उनके स्वरूप का पूजन अधिकतर महाराष्ट्र और दक्षिण के क्षेत्र में होता है। इधर लोगों को जानकारी ही नहीं है, और वक्ता कहते हैं कि इसका एजेंडा क्या रहा, कैसे हानि पहुँचाई गई, यह वे पहले बता चुके हैं। जबकि, वे कहते हैं, कश्मीर के क्षेत्र में ही भगवान दत्त का सबसे प्रमुख स्वरूप रहा — जिसे उनकी परंपरा त्रिभार स्वरूप कहती है, तंत्र में उसी स्वरूप में पूजन होता है, जो दत्त से बहुत मिलता-जुलता है — और एक समय शैव संप्रदाय में वे उधर ही सबसे अधिक पूजित रहे।
शुक्ल पक्ष के गुरु पुष्य में पीपल के नीचे देव दीक्षा
दत्त मार्ग का पहला चरण; दत्त की सेवा से साधक को पहले ही कुछ सुरक्षा मिल रही थी
वक्ता कहते हैं कि साधक को देव दीक्षा विधान से शुरुआत करने को कहा गया, जो उसने पीपल वृक्ष के नीचे बहुत शुभ मुहूर्त में — शुक्ल पक्ष के गुरु पुष्य में — किया। शुरू से ही जब भी वह भगवान दत्त की सेवा-पूजा करता था, उसे थोड़ी सुरक्षा मिल रही थी, इसलिए वक्ता ने कहा कि इन्हीं को पूर्ण कीजिए।
वक्ता कहते हैं कि साधक को देव दीक्षा विधान से शुरुआत करने को कहा गया। उसने यह पीपलभगवान दत्तात्रेय को समर्पित एक पवित्र वृक्ष — इसके नीचे किया गया पितृ तर्पण गृह-क्लेश उत्पन्न करने वाले अशांत पितरों को शांत करता है। वृक्ष के नीचे बहुत शुभ मुहूर्त में किया — गुरु पुष्य नक्षत्र में, शुक्ल पक्ष में। शुरू से ही जब भी वह भगवान दत्त की सेवा-पूजा करता था तो उसे थोड़ी सुरक्षा प्राप्त हो रही थी, तो वक्ता ने कहा: आप इन्हीं को पूर्ण करिए।
तीन महीने का दत्तात्रेय अनुष्ठान: चार लाख एकाक्षरी, 11,000 वज्र पंजर कवच, 11,000 माला मंत्र
घर से दूर करने के लिए बताई गई जप संख्याएँ, हवन विधि सहित
वक्ता कहते हैं कि साधक जब अन्य स्थान पर रहने गया तो उसे भगवान दत्त के एकाक्षरी का चार लाख जप, अलग से भगवान दत्त के वज्र पंजर कवच का कम से कम 11,000 — "उससे कम तो करना ही नहीं", वक्ता ने कहा था — और फिर दत्त माला मंत्र का 11,000 दिया गया। तीन महीने के अंदर उसने यह सब बहुत अच्छे से पूर्ण किया; हवन आदि की विधि बता दी गई थी।
जब वह अन्य स्थान पर रहने गया, वक्ता कहते हैं, तो साधक को भगवान दत्त के एकाक्षरी का चार लाख जप, अलग से साथ में भगवान दत्त के वज्र पंजर कवच का — वक्ता कहते हैं कि उन्होंने कम से कम 11,000 कहा था, उससे कम तो करना ही नहीं — और फिर दत्त माला मंत्र का 11,000 दिया गया। तीन महीने के अंदर-अंदर उसने यह सब बहुत अच्छे से पूर्ण किया। हवन आदि की विधि बता दी गई थी।
परिवार की मूल शक्ति भगवती का स्वरूप हो तो भगवती अनघा के साथ शक्ति कुंड में हवन
दत्त परिवार की शक्तियों पर नियंत्रण रखने वाली प्रमुख शक्ति, या उनके संप्रदाय से संबंधित
वक्ता श्रोताओं से ध्यान रखने को कहते हैं कि इस मामले में हवन भगवती अनघा के साथ हुआ था और शक्ति कुंड का प्रयोग करवाया गया था, क्योंकि साधक के घर का विषय थोड़ा अलग था। उसकी मूल शक्ति कहीं न कहीं भगवती का एक स्वरूप थी, और भगवान दत्त, वे कहते हैं, यहाँ सबके ऊपर नियंत्रण रखने वाली प्रमुख शक्ति रहे होंगे, या उनके संप्रदाय से संबंधित, जो कृपा कर रहे थे। बीच के बहुत से अनुभव, वे जोड़ते हैं, वे छोड़ रहे हैं, कभी लाइव में चर्चा करेंगे।
वक्ता श्रोताओं से इस मामले के हवन की एक बात ध्यान रखने को कहते हैं: इसमें भगवती अनघा लक्ष्मी के साथ हवन हुआ था, और कुंड शक्ति कुंड का प्रयोग करवाया गया था। यह इसलिए कि साधक के घर का विषय थोड़ा अलग था। उसकी मूल शक्ति कहीं न कहीं भगवती का एक स्वरूप थी, और भगवान दत्तात्रेय, वे कहते हैं, यहाँ सबके ऊपर नियंत्रण रखने वाली प्रमुख शक्ति रहे होंगे, या उनके संप्रदाय से संबंधित रहे होंगे, जो कृपा कर रहे थे। वे जोड़ते हैं कि बीच में बहुत सारे अनुभव हैं जिन्हें वे छोड़ रहे हैं, कभी लाइव में विस्तार से चर्चा करेंगे — साधक के बहुत अच्छे-अच्छे विषय रहे हैं।
सब कामनाओं के लिए चौकोर हवन कुंड, भगवती के लिए वृत्ताकार शक्ति कुंड
शक्ति कुंड का अर्थ
वक्ता शक्ति कुंड का अर्थ बताते हैं: जैसा सब जानते हैं, चतुष्कोण, चौकोर अग्निकुंड या हवन कुंड सभी कामनाओं की पूर्ति के निमित्त होता है, जबकि वृत्ताकार कुंड भगवती के निमित्त होता है।
वक्ता बताते हैं कि शक्ति कुंड का अर्थ क्या है। जैसा कि हम सब जानते हैं, वे कहते हैं, चतुष्कोण, चौकोर अग्निकुंड — हवन कुंड — सभी कामनाओं की पूर्ति के निमित्त होता है। जबकि वृत्ताकार कुंड भगवती के निमित्त होता है। इसीलिए इस मामले में, जहाँ परिवार की मूल शक्ति भगवती का स्वरूप थी, शक्ति कुंड का प्रयोग हुआ।
साधना का स्थान महत्व रखता है: बिना पूजा के भूत-प्रेत नए साधकों को विचलित करते हैं
वीर साधक ऐसे स्थान से अनुभव निचोड़ लेता है; नए के लिए विचलित करने वाला
वक्ता कहते हैं कि साधना के लिए जो स्थान आप चुनते हैं उसका बहुत प्रभाव पड़ता है। जहाँ पहले से भूत-प्रेत-पिशाच भरे पड़े हैं और सब आपसे जले-भुने हैं — "तुमने हमें दो साल से, पच्चीस साल से पूजा नहीं दी" — वे आपको साधना नहीं करने देंगे, सही अनुभव भी नहीं होने देंगे। हाँ, कोई वीर, प्रचंड साधक जो पहले साधना कर चुका हो, उसके लिए ऐसा स्थान सोना है, वह उनसे अनुभव पर अनुभव निचोड़ लेगा — पर वह अलग विषय है जो सब नहीं समझेंगे; नए साधकों के लिए यह विचलित करने वाला है।
वक्ता कहते हैं कि जब आप साधना का स्थान चुनते हैं तो उस स्थान का बहुत प्रभाव पड़ता है। जिस जगह पहले से ही भूत-प्रेत-पिशाच भरे पड़े हैं और वे सब आपसे जले-भुने हैं — तुमने हमको दो साल से पूजा नहीं दी, पच्चीस साल से पूजा नहीं दी — वे आपको साधना कहाँ करने देंगे? अनुभव भी सही से नहीं होने देंगे। हाँ, कोई वीर साधक, प्रचंड साधक जो पहले साधना कर चुका है, वह बैठे तो उसके लिए वह स्थान सोना है; वह अनुभव कर-करके उनसे निचोड़ लेगा — लेकिन वह अलग विषय है जो सब लोग समझेंगे भी नहीं। नए साधकों के लिए यह विचलित करने वाला विषय हो जाता है।
घटना: बरगद के नीचे पुराना जीर्ण-शीर्ण दत्त मंदिर साधना स्थान के रूप में
दत्तात्रेय के प्राचीन घिसे विग्रह और शिव का नित्य अभिषेक; पुजारी पूजा सौंप देता है
वक्ता कहते हैं कि साधक ऐसे स्थान पर बैठा जहाँ पहले भगवान दत्त से संबंधित पूजन होते थे: बहुत पुराना, जीर्ण-शीर्ण स्थान, नाम मात्र का मंदिर, जहाँ लोग केवल शिवरात्रि आदि पर आते थे और बाकी दिन एक पुजारी अपनी पूजा करके गाँजा फूँककर सोया रहता था। साधक पहुँचा तो पुजारी ने कहा कि अब पूजा आपकी ज़िम्मेदारी है। वहाँ भगवान दत्तात्रेय का बहुत पुराना विग्रह था, इतना घिसा कि पता भी न चले कि दत्त का है; साधक उसका और भगवान शिव का — दोनों का मंदिर था — नित्य अभिषेक-पूजन करता और वहीं बरगद के नीचे जप करता था।
कथा का साधक, वक्ता कहते हैं, ऐसे स्थान पर बैठा जहाँ पहले से भगवान दत्तात्रेय से संबंधित पूजन आदि होते थे। बहुत पुराना स्थान था, जीर्ण-शीर्ण, नाम मात्र का मंदिर; लोग वहाँ शिवरात्रि आदि के समय ही आते थे, बाकी दिन एक पुजारी अपनी पूजा करके गाँजा फूँककर सोए रहते थे, कोई मतलब नहीं। साधक गया तो पुजारी बोले: अब आपकी ज़िम्मेदारी में, आप करिए पूजा। वहाँ भगवान दत्तात्रेय का बहुत पुराना विग्रह था, जिसमें सही से पता भी नहीं चल रहा था कि दत्त का विग्रह है; साधक उनका अभिषेकजल और अन्य निर्धारित द्रव्यों से देवता की प्रतिमा या प्रतीक का विधिवत स्नान कराना।-पूजन प्रतिदिन करता, भगवान शिव का भी — दो का मंदिर था — और वहीं बरगद के वृक्ष के नीचे अपना जप करता।
दत्त साधना से जागृत कुल योगिनी: पहले स्वप्न, फिर हर पूर्णाहुति पर और दिव्य अनुभव
आरंभिक अनुभवों में शांति से चलते रहना
वक्ता कहते हैं कि उस स्थान पर बैठने का प्रभाव इतना दिव्य हुआ कि साधक की अपने कुल की योगिनी शक्ति प्रचंड रूप से जागृत हो गई। पहले स्वप्न में दर्शन और अनुभव शुरू हुए; वह बताता कि ऐसा दिख रहा है, और वक्ता कहते कि ठीक है, अभी शांति से चलना है। जैसे-जैसे वह एक-एक अनुष्ठान की पूर्णाहुति करता गया, उसके अनुभव और दिव्य होते गए।
वक्ता कहते हैं कि उस स्थान पर बैठने का प्रभाव इतना दिव्य हुआ कि साधक की अपने कुल की योगिनी शक्ति — कुल की शक्ति — प्रचंड रूप से जागृत हो गई। पहले उसे स्वप्न आदि में दर्शन और अनुभव आरंभ हुए; वह बताता कि भैया ऐसा दिख रहा है, और वक्ता कहते कि ठीक है, अभी शांति से चलना है। जैसे-जैसे वह एक-एक अनुष्ठानएक दीर्घ अनुष्ठान — जिसमें अपने कड़े नियम होते हैं। की पूर्णाहुति करता गया, उसके अनुभव और दिव्य होते गए।
अनुष्ठान के बाद पारण: सबसे अमूल्य और सबसे मायामय समय
कोई देव शक्ति ठीक तब माँगने आ सकती है जब भूख बुद्धि ढक देती है, जैसे नवरात्र के अंतिम दिन
वक्ता कहते हैं कि उनके अनुसार साधक के जीवन का सबसे अमूल्य समय वह है जब आप किसी अनुष्ठान को पूर्ण करके पारण करने वाले हों और उसी समय कोई देव शक्ति आकर आपसे कुछ माँग ले। यह बड़ा मायामय समय होता है: माया पूरी फैली रहती है और व्यक्ति समझ नहीं पाता। जैसे नवरात्र के नौवें दिन कन्या पूजन के बाद मन कल की पूरी-हलवे पर होता है, वैसे ही अंतिम दिन साधक को बहुत भूख लगती है और बस यही सूझता है कि "अब तो खाना मिलेगा" — और ठीक ऐसे ही समय, दत्त माला मंत्र का 11,000 पूर्ण करने के बाद, इस साधक का सबसे तीव्र अनुभव हुआ।
सबसे तीव्रतम अनुभव, वक्ता कहते हैं, पारणनियत समय पर व्रत का विधिपूर्वक पारण, जिसके बिना व्रत अपूर्ण माना जाता है। के समय हुआ। उनके अनुसार यह साधक के जीवन का सबसे अमूल्य समय होता है: जब आप किसी अनुष्ठान को पूर्ण करने के बाद पारण करने वाले होते हैं और उसी पारण के समय कोई देव शक्ति आकर आपसे कुछ माँग ले। यह बड़ा मायामय समय होता है — माया पूरी फैली रहती है और व्यक्ति समझ नहीं पाता कि क्या हो रहा है। वे नवरात्रि से समझाते हैं: जो नौ दिन करते हैं वे जानते होंगे कि नौवें दिन कन्या पूजन के बाद, जब दसवें दिन पारण करना है, मन कहता है — अरे आज थोड़ी पूरी-हलवा मिल जाता, कल ऐसे खाएँगे, वैसे खाएँगे। जो साधना करते हैं उन्हें अंतिम दिन बहुत ज़्यादा भूख लगती है, और जैसे ही पारण का समय आता है — अरे, अब तो खाना मिलेगा। ठीक ऐसे ही समय, जब उसने दत्त माला मंत्र का 11,000 पूर्ण कर लिया था और पारण करने वाला था, साधक के साथ यह हुआ।
अनुष्ठान भर का नियम: स्वपाकी, दिन में फलाहार, रात में बिना नमक का हविष्य
वह अनुशासन जो सच्ची कृपा लाता है, यद्यपि सबके लिए संभव नहीं
वक्ता कहते हैं कि साधक स्वपाकी था — अपना भोजन स्वयं बनाता था — दिन भर फलाहार पर रहता और रात में एक समय हविष्य अन्न, यानी बिना नमक का भोजन करता था, पूरा नियम वैसे पालन करते हुए जैसा साधना के क्षेत्र में होना चाहिए। वे मानते हैं कि यह सबके लिए संभव नहीं, पर सत्य अनुभव इसलिए रख रहे हैं कि यदि भगवती कभी अवसर दें तो इसी प्रकार साधना कीजिए — तब यथार्थ में शक्तियाँ कृपा करेंगी।
वक्ता साधक के नियम का वर्णन करते हैं। वह स्वपाकी था, अपना भोजन स्वयं बनाता था। दिन भर फलाहारव्रत के दिनों में अन्न के स्थान पर लिया जाने वाला फलाहार। में रहता, और रात में एक समय हविष्य अन्न करता था — बिना नमक का भोजन। पूरा नियम वैसे ही पालन किया जैसा साधना के क्षेत्र में होना चाहिए। ऐसा सबके साथ संभव नहीं है, वक्ता कहते हैं, फिर भी जो अनुभव सत्य है वह रख रहे हैं: कभी जीवन में यदि भगवती अवसर दें तो इसी प्रकार साधना कीजिए, तो यथार्थ में शक्तियाँ कृपा करेंगी।
घटना: पारण के भोजन पर एक बुढ़िया खाना माँगती है, और साधक का क्रोध ही माया है
कुल योगिनी पतली-दुबली गाँव की बुढ़िया के रूप में; पूरी थाली चिढ़कर दी, प्रेम से ली गई
वक्ता कहते हैं कि साधक ने पूरियाँ छानीं, जो आता था बनाया, दोनों स्थानों पर नैवेद्य अर्पित किया और पुजारी बाबा को भी दिया (जिन्होंने कहा पहले आप खाइए), और बस्ती से एक-दो किलोमीटर दूर उस स्थान पर खाने बैठा। तभी एक बुढ़िया — उनके शब्दों में "बुढ़िया का रूप धरे काली माई" — आ पहुँची और पहला निवाला उठाते ही भोजपुरी में बोली: अकेले खा रहे हो? हमको भी खिलाओ, भूख लगी है, इतनी गर्मी में पानी भी नहीं मिल रहा। साधक को अपने आप ऐसा क्रोध आया जैसा पूरी साधना में कभी नहीं आया — यही, वक्ता कहते हैं, माया है। भूख से अंधा वह देख भी न पाया कि वह कहाँ से आई; दूसरा खाना था नहीं; जब उसने पूछा कि झूठा तो नहीं किया और साधक ने कहा नहीं, तो उसने क्रोध से पूरी थाली बढ़ा दी और पानी रख दिया, और उसने बड़े प्रेम से लिया। यही परीक्षा की असली घड़ी थी।
जब भोजन का समय आया, वक्ता कहते हैं, तो साधक ने पूरियाँ छानीं, जो बनाना आता था बनाया, दोनों जगह — दत्त विग्रह और शिव स्थान पर — नैवेद्यपूजा के दौरान देवता को अर्पित किया जाने वाला भोग, जिसके साथ जल अर्पण व समर्पण मंत्र होते हैं। अर्पित किया, और गाँजा फूँकने वाले बाबा को भी दिया, जो बोले कि आप खाइए, हम बाद में खा लेंगे। तो वह खाने बैठा। स्थान लोगों की बस्ती से थोड़ा दूर था, एक-दो किलोमीटर अंदर; गाय-भैंस, बकरी-भेड़ चराने वालों के सिवा बहुत कम लोग उधर जाते थे। जैसे ही वह खाना लेकर बैठा, एक बुढ़िया आ पहुँची — वक्ता के शब्दों में, बुढ़िया का रूप धरे काली माई अपना हिस्सा लेने पहुँच गईं। जैसे ही निवाला उठाया, वह तुरंत भोजपुरी में बोली: अकेले खा रहे हो, हमको भी थोड़ा खिलाओ? हमको भी भूख लगी है, ऊपर से इतनी गर्मी में पानी भी नहीं मिल रहा। साधक ने बाद में वक्ता को बताया कि उस समय उसे अपने आप बड़ा क्रोध आ गया। यही, वक्ता कहते हैं, माया होती है। साधक ने कहा कि इतनी साधना में कभी क्रोध नहीं आया, पर जैसे ही जिह्वा पर धरने वाला था, उसी समय उसने माँग लिया। कहाँ से, कैसे, कब आई, देखा ही नहीं, क्योंकि भूख से अंधा था। दूसरा खाना था नहीं; जैसे-तैसे दस पूरी बनाई थीं — दो-चार बाबा के लिए, पाँच-छह अपने लिए। अब वह एकदम पास आकर देख रही थी: बूढ़ी सी, पतली-दुबली, जैसे गाँव में स्त्रियाँ सामान्य वस्त्र पहनती हैं। जब उसने देने को कहा तो साधक बोला: माई, हमने झूठा नहीं किया है। वह बोली, तो दे दो। तो उसने पूरी थाली बढ़ा दी — क्रोध से, कि लो, अब खा ही लो तुम — और पानी भी रख दिया। उसने बड़े प्रेम से लिया। साधक को यह समझ नहीं आया, वक्ता कहते हैं, क्योंकि भूख-प्यास और ऊपर से क्रोध से मस्तिष्क असंतुलित हो रहा था — और यही परीक्षा की असली घड़ी थी।
घटना: पारण पर बुढ़िया के अदृश्य होने के बाद भरी हुई खीर और पूरियाँ
माया उसके जाने के बाद ही सिमटती है; साधक का पश्चाताप और पारण से इनकार
वक्ता कहते हैं कि बुढ़िया ने सब खाया, पानी पिया और बोली, एक पूरी और; पूरी नहीं है सुनकर बोली, थोड़ी खीर दे दो, बहुत अच्छी बनी है — क्या हो जाएगा, तुम जवान हो, फिर बना लेना। कुढ़ते हुए साधक अंदर गया तो खीर का पात्र भरा हुआ, पूरियाँ तली हुई, गरम, जैसे अभी उतारी हों, ताज़ी सब्ज़ी, सब उसके खाने भर की मात्रा में भरा हुआ। पीछे मुड़कर देखा तो मैदान साफ; माता जी प्रस्थान कर चुकी थीं। तभी, वक्ता कहते हैं, माया सिमटी और दिमाग होश में आया। उसने खुले, निर्जन रास्तों पर खोजा, सोए बाबा को जगा न सका, और रो पड़ा, भगवती वन दुर्गा को याद करते हुए — जो भी थीं, मुझसे अपराध हुआ — और बिना पुनः दर्शन के अन्न ग्रहण और पारण से इनकार कर दिया।
वक्ता आगे कहते हैं: बुढ़िया ने सारा खाया, पानी पिया, फिर बोली — और एक पूरी। साधक बोला, पूरी तो नहीं है। तो बोली — थोड़ी सी खीर दे दो, बहुत अच्छी खीर बनी है, बहुत आनंद आया। उसने कहा थोड़ी सी ही बची है; वह बोली, तो थोड़ी सी दे दो; क्या हो जाएगा, तुम जवान हो, फिर बना लेना। तो कुढ़ते हुए वह लाने गया। और यहीं, वक्ता कहते हैं, खेल हुआ। अंदर मानो अन्नपूर्णा ने अन्न भरकर रखा हो: खीर के पात्र में खीरदूध में पकाया गया चावल, जो अनेक विधियों में नैवेद्य के रूप में अर्पित होता है। भरी पड़ी, पूरियाँ तली पड़ी हैं, गरम-गरम, जैसे अभी किसी ने तलकर रखी हों, ताज़ी सब्ज़ी — सब कुछ ठीक उसके खाने भर की मात्रा में, उसी के पात्रों में। वह सिर खुजाने लगा — हमने तो इतना ही बनाया था, अंदर लाए नहीं, और गरम भी है। पीछे मुड़कर देखा: मैदान साफ, माता जी प्रस्थान कर चुकी थीं। यहीं से, वक्ता कहते हैं, माया सिमटती है और दिमाग होश में आता है — यह हम क्या देख लिए? वह तुरंत दौड़ा; जगह दोनों ओर से निर्जन, खाली, रास्ता ऐसा खाली कि कोई भागे तो आराम से दिखे। बाहर आकर पूरा हड़बड़ा गया। गंजेड़ी बाबा को जगाने लगा, बाबा बम भोले बोलकर फिर सो गए। दो-चार मिनट खोजता रहा — ऐसी घटना पर कोई भी बौखला जाएगा — विश्वास नहीं हो रहा, फिर आँखों से अश्रुधारा: भगवती, आप आईं और हमसे अपराध बन गया। उसने भगवती वन दुर्गावन की दुर्गा, जिनके नौ नाम कवच साधना में प्रयुक्त होते हैं। को याद किया — माँ, यदि आप थीं, वन देवी थीं, स्थान की देवी थीं, जो भी थीं — और बहुत रोया। अन्न ग्रहण नहीं कर रहा था, कि पुनः दर्शन हों तभी पारणनियत समय पर व्रत का विधिपूर्वक पारण, जिसके बिना व्रत अपूर्ण माना जाता है। करेंगे।
कुल योगिनी के दर्शन के बाद आवेश और त्रिनेत्र जागरण की पहली स्थिति
दूसरा प्रत्यक्ष दर्शन नहीं; एक भार जिसमें वह प्रसन्नता और पारण की अनुमति कहती है
वक्ता कहते हैं कि पुनः प्रत्यक्ष दर्शन तो नहीं हुआ, लेकिन साधक के शरीर पर आवेश आया — एक भार — और जिसे त्रिनेत्र जागरण की एकदम आरंभिक स्थिति कहते हैं, वह बन गई। उसमें उन्होंने दर्शन दिया और कहा: प्रसन्न हूँ, निश्चिंत होकर पारण करो। तब उसने पारण किया, दिन भर शरीर भारी रहा; उसने वक्ता को फोन किया, जिन्होंने कहा निश्चिंत रहिए। तब से साधक का जीवन बहुत बदल चुका है, और यह अनुभव उसी के कहने पर साझा किया जा रहा है।
वक्ता कहते हैं कि पुनः दर्शन तो नहीं हुआ। लेकिन साधक के शरीर पर आवेशकिसी बाहरी सत्ता का व्यक्ति में प्रवेश, चाहे वह आमंत्रित हो अथवा बाधा के रूप में। आया, भार आया, और जिसे त्रिनेत्र जागरण — तीसरे नेत्र के जागरण — की एकदम आरंभिक स्थिति कहते हैं, वह बन गई। उसमें उन्होंने दर्शन दिया और कहा: प्रसन्न हैं आप, निश्चिंत होकर पारण करें, चिंता न करें। तब उसने पारणनियत समय पर व्रत का विधिपूर्वक पारण, जिसके बिना व्रत अपूर्ण माना जाता है। किया, और दिन भर शरीर भारी रहा। उसने वक्ता को फोन करके बताया कि ऐसा-ऐसा हुआ, और उत्तर मिला कि कोई बात नहीं, निश्चिंत रहिए। वक्ता कहते हैं कि यह अनुभव वे इसलिए सामने रख रहे हैं कि साधक का वर्तमान जीवन काफी बदल चुका है — भगवती कृपा से बहुत कुछ प्राप्त हो चुका है — और उसी के कहने पर यह यथार्थ अनुभव साझा किया जा रहा है।
देवी-देवता दर्शन कैसे देते हैं?
सामान्य रूप में, हवा के झोंके जैसे — कभी चतुर्भुजा सिंहवाहिनी ध्यान रूप में नहीं
लोग पूछते हैं कि भगवान कैसे दर्शन देते हैं; वक्ता कहते हैं कि देवी-देवता बिल्कुल दर्शन देते हैं — पर कभी प्रत्यक्ष अपने वैदिक स्वरूप में या उस ध्यान स्वरूप में नहीं जिसका हम ध्यान करते हैं। चतुर्भुजा सिंह पर सवार होकर दर्शन नहीं देंगी, क्योंकि हममें उसे सहने का सामर्थ्य नहीं है। वे सामान्य रूप में, हवा के झोंके जैसे दर्शन देकर चले जाते हैं; इसी प्रकार इस साधक को दर्शन और कृपा मिली, और भगवती और भगवान दत्त की कृपा से वह आज बहुत संतोषमय जीवन जी रहा है।
लोग पूछते हैं, वक्ता कहते हैं, कि भगवान कैसे दर्शन देते हैं। उनका उत्तर है कि देवी-देवता बिल्कुल दर्शन देते हैं। लेकिन प्रत्यक्ष रूप में अपने वैदिक स्वरूप में, या जिस ध्यान स्वरूप का हम ध्यान करते हैं उसमें — चतुर्भुजा सिंह पर सवार — कभी दर्शन नहीं देंगी, क्योंकि हममें वह सामर्थ्य नहीं है। वे सामान्य रूप में, ऐसी हवा जैसे दर्शन देकर चले जाते हैं। ऐसा ही दर्शन, वे कहते हैं, इस साधक को हुआ; उस पर कृपा हुई, और आज भगवती की कृपा से, भगवान दत्तात्रेय की कृपा से वह बहुत संतोषमय जीवन जी रहा है।
देवी-देवता अनुशासित साधकों के लिए प्रकट होते हैं क्योंकि वे परीक्षा लेते हैं
प्रत्यक्ष कृपा की शर्त अनुशासन; साधक अब एकांतिक जीवन जीता है, अपनी प्राप्तियों की चर्चा नहीं करता
वक्ता कहते हैं कि उन्हें आशा है कि यह घटना उन साधकों को प्रोत्साहित करेगी जो अनुशासन के साथ साधना करना चाहते हैं। अनुशासनहीनों के लिए, वे कहते हैं, यह केवल भाव भर रहता है कि भगवान आ जाएँगे; लेकिन जो कठोर अनुशासन और दिनचर्या से स्वयं को बाँधकर चलता है, उसके साथ भगवान नहीं हैं ऐसा बिल्कुल नहीं — ऐसे व्यक्ति के लिए देवी-देवता अवश्य प्रकट होते हैं, क्योंकि वे परीक्षा भी लेते हैं। अनुशासन हर किसी के वश की बात नहीं, पर जो चलता है उसके जीवन में कितनी भी बड़ी कठिनाई या दैविक बाधा हो, वही देवी प्रकट होकर प्रत्यक्ष कृपा करके चली जाती हैं। साधक, वे जोड़ते हैं, अब एकांतिक जीवन जीता है, अपनी प्राप्तियों की चर्चा नहीं करता, केवल अपनी सेवा-पूजा और भगवती की इच्छा।
वक्ता समापन में कहते हैं कि आशा है यह वृत्तांत उन साधकों को अवश्य प्रोत्साहित करेगा जो अनुशासन के साथ जीवन में साधना करना चाहते हैं। अनुशासनहीनों के लिए, वे कहते हैं, यह केवल भाव भर रहेगा — भगवान आ जाएँगे। लेकिन जो कठोर अनुशासन के साथ, दिनचर्या के साथ अपने आप को बाँधकर चलता है, उसके साथ भगवान नहीं हैं ऐसा बिल्कुल नहीं है: ऐसे व्यक्ति के लिए देवी-देवता और भगवान अवश्य ही प्रकट होते हैं, क्योंकि वे परीक्षा भी लेते हैं। अनुशासन के साथ चल पाना, वे कहते हैं, हर किसी के वश की बात नहीं है। लेकिन जो चलता है — उसके जीवन में चाहे कितनी भी बड़ी कठिनाई हो, कितनी भी बड़ी दैविक बाधा हो — वही देवी प्रकट होकर प्रत्यक्ष कृपा करके चली जाती हैं। वे जोड़ते हैं कि उस समय के दर्शन का स्तर और साधक का अभी का स्तर — ज़मीन-आसमान का अंतर है। साधक बहुत एकांतिक जीवन जीता है — एकांतिक अर्थात इन विषयों को लेकर किसी के सामने चर्चा नहीं करता कि हमें यह प्राप्त है, ऐसा है; केवल अपनी सेवा-पूजा, और आगे का जीवन भगवती की इच्छा।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।