कलश विसर्जन विधि: नवरात्रि समापन के नियम
नवरात्रि व्रत समापन की चरणबद्ध विधि।
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नवरात्र का व्रत कब खोलना चाहिए?
पारण विजयदशमी को, नवमी या अष्टमी को कभी नहीं
वक्ता कहते हैं कि जो प्रतिपदा से नवमी तक व्रत करते हैं, वे पारण सदैव विजयदशमी को करें — कभी भी नवमी या अष्टमी को कन्या पूजन करके अन्न खाकर नहीं। नौ दिन का व्रत नवमी को नहीं, दशमी को विजयदशमी का पूजन करने के बाद खुलता है। वे विजयदशमी को वह दिन बताते हैं जो नौ दिन के व्रत, पूजा, साधना, हवन और जप को एक सूत्र में पिरोता है, जिसका अपना विजय मुहूर्त होता है।
विजयदशमी को शस्त्र पूजन
हर सनातनी घर में शस्त्र हो और उस दिन उसका पूजन हो
वक्ता कहते हैं कि विजयदशमी के दिन सबसे पहले शस्त्र पूजन, आयुध पूजन करना चाहिए: हर सनातन धर्मी के घर में शस्त्र होना ही चाहिए, और उस दिन उसका पूजन होता है। पूजन स्थान पर शस्त्र को पंचामृत और पंचगव्य से, फिर गंगाजल से स्नान कराकर, रोली-कुमकुम तिलक करके, धूप-दीप दिखाकर, भगवती को समर्पित कर उनके पास स्थापित कर देना चाहिए और धूप-दीप से पूजन करना चाहिए।
विजयादशमी के दिन सर्वप्रथम, वक्ता कहते हैं, शस्त्र पूजन — आयुध पूजन — करना चाहिए। हर सनातन धर्म'सनातन (शाश्वत) धर्म' — वैदिक-पौराणिक-तांत्रिक परंपरा का पारंपरिक नाम, जिसे आज सामान्यतः हिंदू धर्म कहा जाता है। मानने वाले के घर में शस्त्र होना ही चाहिए, और उसका पूजन उस दिन किया जाता है। पूजन स्थान पर शस्त्र को पञ्चामृतदूध, दही, घी, शहद और शक्कर से बना पंचामृत, पूजा से पहले मूर्ति को स्नान कराने हेतु प्रयुक्त होता है। और पंचगव्यगाय से प्राप्त पाँच पदार्थों से बना शुद्धिकारक मिश्रण, पंचामृत व तुलसी पत्तों के साथ घर, विशेषकर चौखट, की शुद्धि हेतु प्रयुक्त होता है। से स्नान कराकर, फिर गंगाजलगंगा नदी का जल, अशुद्धि के संपर्क में आई अनुष्ठान वस्तुओं को शुद्ध व पुनःप्रतिष्ठित करने हेतु प्रयुक्त। से स्नान कराकर, रोलीबलि में अर्पित नींबू जैसी अनुष्ठान सामग्री पर लगाया जाने वाला लाल रोली चूर्ण, जिसके पश्चात जल से परिक्रमा कर अर्पण किया जाता है।-कुमकुम तिलक करके, धूप-दीप दिखाकर, फिर उसे भगवती को समर्पित कर देना चाहिए — उनके पास स्थापित कर देना चाहिए — और धूप-दीप आदि दिखाकर पूजन करना चाहिए।
विजयदशमी को शमी और अपराजिता पूजन
दोनों की एक-एक टहनी, प्रार्थना के साथ काटकर कलश पर चढ़ाई
वक्ता कहते हैं कि विजयदशमी को शमी और अपराजिता पूजन अवश्य करना चाहिए: शमी शत्रु का विनाश करती है, अपराजिता हर क्षेत्र में विजय देती है, और नौ दिन का व्रत इन्हीं दोनों की कृपा से पूर्णता पाता है — प्रकृति पूजा के बिना कोई व्रत-त्योहार पूरा नहीं होता। जिनके पास पौधे नहीं हैं वे मानसिक रूप से ही सही, दोनों के नाम से दो दीपक जलाएँ, या फूल वाले या नर्सरी से पौधे ले आएँ। काटने का औज़ार धोकर शस्त्र रूप में पूजें; फिर रोली, कुमकुम, दीपक, अक्षत, नैवेद्य, पान, सुपारी, लौंग, इलायची, गंगाजल और मौली लेकर पहले अपराजिता के पास जाएँ, जल चढ़ाएँ, मौली बाँधें, अक्षत-कुमकुम, पुष्प, धूप-दीप, नैवेद्य चढ़ाएँ, बार-बार व्रत के पूर्ण फल और विजय की प्रार्थना करें, क्षमा माँगते हुए थोड़ी-सी लता काटें, फिर शमी के पास यही करें, और दोनों को कलश पर चढ़ा दें। पूर्ण विधान में यह नगर की सीमा से बाहर जाकर होता है, जो वे कहते हैं आज संभव नहीं।
शस्त्र पूजन के बाद, वक्ता कहते हैं, शमीउपाय-अनुष्ठानों में प्रयुक्त एक पत्ता — परंपरागत रूप से शनिवार को नहीं तोड़ा जाता; शनिवार के अनुष्ठान हेतु आवश्यक हो तो इसे पूर्व शुक्रवार को तोड़ लिया जाता है। पूजन और अप्राजिता पूजन अवश्य करना चाहिए। जिनके घर में शमी का पेड़ या पौधा और अपराजिता की लता है, तब तो ठीक है। जिनके यहाँ नहीं है, वे मानसिक रूप से ही सही, दो दीपक अवश्य जलाएँ — एक शमी वृक्ष के नाम से और एक अपराजिता के नाम से। संभव हो तो शहर में रहने वाले, जिनके पास पौधा नहीं है, वहाँ बात करें जहाँ से फूल खरीदते हैं, या नर्सरी से लाकर पूजन के लिए पहले से लगा लें; पौधा घर में लग जाए तो बहुत अच्छा है। शमी, वे कहते हैं, शत्रु का विनाश करती है; अपराजिता हर क्षेत्र में विजय देती है। नौ दिन का नवरात्रि व्रत इन्हीं दोनों की कृपा से पूर्णता पाता है, इसलिए इन दोनों का पूजन सबके लिए बहुत आवश्यक है — प्रकृति पूजा के बिना हमारा कोई भी व्रत, त्योहार, पर्व संपन्न होता ही नहीं। विधि: जिससे काटेंगे — चाकू या कैंची — उसे पहले अच्छे से धो लें और शस्त्र रूप में उसका भी पूजन कर लें। फिर रोलीबलि में अर्पित नींबू जैसी अनुष्ठान सामग्री पर लगाया जाने वाला लाल रोली चूर्ण, जिसके पश्चात जल से परिक्रमा कर अर्पण किया जाता है।, कुमकुम, दीपक, अक्षतअखंडित कच्चे चावल के दाने, संकल्प लेते समय जल व पुष्प के साथ हाथ में लिए जाते हैं।, थोड़ा नैवेद्यपूजा के दौरान देवता को अर्पित किया जाने वाला भोग, जिसके साथ जल अर्पण व समर्पण मंत्र होते हैं।, पान का पत्ता, सुपारीसुपारी, जो संकल्प में देवता के प्रतीक रूप में रखी जाती है और पूजन में अर्पित होती है।, लौंग, इलायची, गंगाजलगंगा नदी का जल, अशुद्धि के संपर्क में आई अनुष्ठान वस्तुओं को शुद्ध व पुनःप्रतिष्ठित करने हेतु प्रयुक्त। और थोड़ा मौली धागा लेकर शमी और अपराजिता के पास जाएँ। पूर्ण विधान में, वे बताते हैं, यह सीमा से बाहर — अपने नगर की सीमा के बाहर जाकर — किया जाता है, पर आज के समय में यह संभव नहीं, तो जहाँ लगाया है वहीं जाएँ। सबसे पहले अपराजिता का पूजन करें: जल चढ़ाएँ, मौली बाँधें, अक्षत-कुमकुम चढ़ाएँ, पुष्प चढ़ाएँ, धूप-दीप दिखाएँ, नैवेद्य चढ़ाएँ। माँ अपराजिता को बारंबार प्रणाम करें और बार-बार प्रार्थना करें कि जो नवरात्र व्रत पूर्ण किया है उसका पूर्ण फल मिले और हर क्षेत्र में विजय मिले। ऐसी प्रार्थना के बाद जो शस्त्र, चाकू या कैंची ले गए हैं उससे उनकी थोड़ी-सी लता बार-बार क्षमा माँगते हुए काटकर अपनी थाली में रख लें। फिर यही शमी के वृक्ष के पास करें — पूजन के बाद एक छोटी टहनी या पत्ता काटकर रख लें — और दोनों को लाकर स्थापित कलश के ऊपर चढ़ा दें।
विजयदशमी को पूजा स्थान पर किए जाने वाले पाठ
अपराजिता, रामरक्षा और आदित्य हृदय, दोनों नवरात्रों में
वक्ता कहते हैं कि टहनियाँ कलश पर चढ़ाने के बाद पूजा स्थान पर बैठें, धूप-दीप पहले से जल रहा हो या उस दिन का पूजन कर लिया हो, और दशमी के दिन अपराजिता स्तोत्र, रामरक्षा स्तोत्र और आदित्य हृदय का पाठ करें — चैत्र और शारदीय दोनों नवरात्रों में, तीनों अवश्य। यदि ये तीन न करें तो कवच का पाठ और उसके साथ प्रतिलेख में "सतनाम" लिखे पाठ आदि कर लें, और फिर आरती करें।
शमी और अपराजिता कलश पर चढ़ाने के बाद, वक्ता कहते हैं, वहाँ फिर बैठें; धूप-दीप पहले से जल रहा होगा, या उस दिन का पूजन कर लिया होगा। फिर दशमी के दिन aprajita-stotram, रामरक्षा स्तोत्रम् और आदित्य हृदय स्तोत्रम् का पाठ करना चाहिए। यह हर नवरात्रि में — चाहे chaitra-navratri हो या शारदीय नवरात्र — दोनों में करना चाहिए; ये तीन अवश्य कर लें। यदि ये तीनों न करें, वे कहते हैं, तो कवच का पाठ कर लें, और कवच के साथ-साथ प्रतिलेख में "सतनाम" लिखे पाठ आदि कर लें; उसके बाद आरतीदेवता की प्रतिमा के समक्ष प्रज्वलित दीपक घुमाने का अनुष्ठान — दीपदान में जब दीपक बुझने लगते हैं, तब इसे किया जाता है। करें।
नवरात्र कलश का विसर्जन: विदाई प्रार्थना और कलश हिलाना
संस्कृत में उत्तिष्ठ देवि चामुण्डे, या वही प्रार्थना हिंदी में
वक्ता कहते हैं कि आरती के बाद विसर्जन के लिए हाथ में अक्षत और फूल लें और विसर्जन मंत्र बोलें — संस्कृत आती हो तो "उत्तिष्ठ देवि चामुण्डे", नहीं तो सामान्य हिंदी में: कि भगवती की कृपा और उनकी दी हुई बुद्धि व सामर्थ्य से यह नवरात्र व्रत-संकल्प पूर्ण हुआ; कि विनीत भाव से उन्हें विदा करने प्रस्तुत हूँ; कि माँ दुर्गा और उनके साथ आए सभी देवगण प्रसन्नतापूर्वक अपने-अपने लोक जाएँ और वहाँ से सदैव परिवार की रक्षा करें व सुख-समृद्धि दें; और भगवती लक्ष्मी और श्री गणेश भंडार गृह में स्थापित रहें। फिर बार-बार क्षमा प्रार्थना करते हुए अक्षत-फूल कलश पर या उसके सामने रख दें, और कलश तथा स्थापित सभी मंडल हिला दें। खोइंचा और क्षमा प्रार्थना के बाद बोए हुए जवारे और अपराजिता-शमी की टहनियाँ देवी के विग्रह या फोटो पर समर्पित करें।
आरतीदेवता की प्रतिमा के समक्ष प्रज्वलित दीपक घुमाने का अनुष्ठान — दीपदान में जब दीपक बुझने लगते हैं, तब इसे किया जाता है। हो जाने के बाद वक्ता बताते हैं कि विसर्जन कैसे करना है। सबसे पहले हाथ में अक्षतअखंडित कच्चे चावल के दाने, संकल्प लेते समय जल व पुष्प के साथ हाथ में लिए जाते हैं। और फूल लें। यदि संस्कृत का मंत्र आता हो तो संस्कृत में विसर्जन मंत्र बोलें — "उत्तिष्ठ देवी चामुंडा", जैसा प्रतिलेख में है। नहीं तो हिंदी में सामान्य रूप से बोल सकते हैं। वे जो हिंदी प्रार्थना बताते हैं: हे भगवती, आपकी कृपा से और आपकी ही दी हुई बुद्धि और सामर्थ्य से मैंने यह नवरात्रि व्रत संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। पूर्ण किया है; अब मैं आपको विदा करने हेतु विनीत भाव से प्रस्तुत हूँ। हे माँ दुर्गे, आप और आपके साथ आए सभी देवगण अपने-अपने लोक को प्रसन्नतापूर्वक जाएँ और वहाँ से सदैव मेरे परिवार की और मेरी रक्षा करें तथा मुझे सुख-समृद्धि दें। हे भगवती लक्ष्मी, हे श्री गणेश, आप सदैव मेरे भंडार गृह में स्थापित रहें। यह कहने के बाद बार-बार क्षमा प्रार्थना करते हुए अक्षत-फूल कलश पर या कलश के सामने रख दें। फिर कलश को हिलाना चाहिए, और जो भी मंडल स्थापित किया है उसे भी हिलाना चाहिए। वे जोड़ते हैं कि कोंचा भरने और बार-बार क्षमा प्रार्थना के बाद जो जवारे बोए हैं, अपराजिता की टहनी और शमी की टहनी — ये सब माँ को समर्पित करने चाहिए — श्री विग्रह हो तो उस पर, नहीं तो फोटो पर — और फिर बाकी पूजन करना चाहिए।
खोइंचा: विसर्जन से पहले देवी के लिए बाँधी जाने वाली विदाई-पोटली
बेटी को घर से खाली हाथ विदा नहीं करते
वक्ता कहते हैं कि बहुत से क्षेत्रों में खोइंचा भरना या भात भरना नाम की रीति है: एक चुनरी में माँ को अक्षत, फूल, धूप, घास और दक्षिणा रखकर उनके आँचल में बाँधा जाता है, जैसे बेटी को घर से खाली हाथ विदा नहीं करते। घर की सुहागन महिलाएँ इसे करती हैं, और यह विसर्जन मंत्र पढ़ने से पहले किया जाता है।
यहाँ, वक्ता कहते हैं, बहुत से लोग, बहुत से क्षेत्रों में एक रीति करते हैं जिसे खोइंचा भरना या कहीं भात भरना नाम दिया गया है। अर्थात एक चुनरी में माँ को अक्षतअखंडित कच्चे चावल के दाने, संकल्प लेते समय जल व पुष्प के साथ हाथ में लिए जाते हैं।, फूल, धूप, घास और दक्षिणागुरु अथवा आचार्य को दी जाने वाली भेंट, जिससे अनुष्ठान पूर्ण होता है; इसके बिना कर्म अपूर्ण माना जाता है। रखकर उनके आँचल में बाँधा जाता है — क्योंकि जब बेटी को घर से विदा करते हैं तो खाली हाथ विदा नहीं करते, वैसे ही माँ को विदा किया जाता है। घर की जो सुहागन महिलाएँ होंगी, वे इसे करती हैं। वे क्रम स्पष्ट करते हैं: यह कोंचा विसर्जन मंत्र पढ़ने से पहले भरना है — पहले विदाई की पोटली, फिर मंत्र।
विशेष स्थिति: घर की एकमात्र सुहागन रजस्वला हो तो खोइंचा कौन भरे
घर के पुरुष भर सकते हैं
पूछे जाने पर कि घर में सुहागन स्त्री एक ही हो और वह उस समय रजस्वला हो जाए तो कौन करेगा, वक्ता उत्तर देते हैं कि ऐसी स्थिति में पुरुष खोइंचा भर सकते हैं — चुनरी में बाँधकर माँ को विदाई देने से पहले वहाँ रख सकते हैं।
एक प्रश्न आया था, वक्ता कहते हैं: यदि घर में सुहागन स्त्री एक ही हो और वह रजस्वला हो गई हो — मासिक की समस्या हो गई हो — तो कोंचा कौन करेगा? ऐसी स्थिति में, वे उत्तर देते हैं, घर के पुरुष खोइंचा भर सकते हैं; चुनरी में बाँधकर माँ को विदाई देने से पहले वहाँ रख सकते हैं। सामान्य स्थिति की तरह यह भी विसर्जन मंत्र पढ़ने से पहले किया जाता है।
नवरात्र की हवन-राख और चढ़ावे से घर का बंधन
कलश हिलाते समय मुख्य द्वार पर लाल कपड़े की पोटली
वक्ता कहते हैं कि कलश हिला देने के बाद जो अपने घर का बंधन करना चाहें, वे जो हवन किया था उसकी राख, जौ, नौ दिन माँ पर चढ़े फूल, सुपारी और जो भी चढ़ाकर रखा है — सब लाल कपड़े में बाँधकर उसी समय मुख्य द्वार पर बाँध दें।
कलश तो हिला दिया, वक्ता कहते हैं; पर अब यदि अपने घर का बंधन आदि करना चाहें, तो जो हवन किया था उसकी राख, जौ, नवरात्रि में नौ दिन माँ के ऊपर चढ़े फूल, सुपारीसुपारी, जो संकल्प में देवता के प्रतीक रूप में रखी जाती है और पूजन में अर्पित होती है। और जो भी चढ़ाकर रखा है — वह सारा लाल कपड़े में करके उसी समय मुख्य द्वार पर बाँध दें।
नवरात्र के अंत में अखंड ज्योत
कलश हिलने तक जले; कलश के घर से निकलने से पहले शांत हो
वक्ता कहते हैं कि नवरात्र का अखंड दीप विसर्जन तक — कलश हिलने तक — जलते रहना चाहिए; विसर्जन मंत्र पढ़कर कलश हिला देने के बाद अखंड ज्योत बुझ जानी चाहिए। बचा तेल डिब्बे में निकालकर रखें, वर्षभर रोली मिलाकर तिलक में काम आएगा, और किसी की तबीयत खराब हो तो उसके मस्तक पर लगाकर भगवती से प्रार्थना कर सकते हैं; बची राख भी रख लें। कलश के घर से निकलने से पहले ज्योत पूरी तरह जलकर बुझ जाए और थोड़ा गंगाजल छिड़ककर ठंडी हो जाए — ज्योत घर में जलती रहे और कलश नदी ले जाएँ, ऐसा नहीं करना चाहिए, जब तक घर में पहले से कोई अलग विधि-विधान न चला आ रहा हो।
नवरात्रि में जो अखंड ज्योति जलती है, वक्ता कहते हैं, वह विसर्जन होने तक — यानी कलश हिलने तक — जलती रहनी चाहिए। विसर्जन मंत्र पढ़कर कलश हिला देने के बाद अखंड ज्योत बुझ जानी चाहिए। उसमें जो तेल बचा रहे उसे एक डिब्बे में निकालकर रख लें; वर्षभर काम आएगा — उसमें रोलीबलि में अर्पित नींबू जैसी अनुष्ठान सामग्री पर लगाया जाने वाला लाल रोली चूर्ण, जिसके पश्चात जल से परिक्रमा कर अर्पण किया जाता है। मिलाकर तिलक लगाएँ। किसी की तबीयत खराब हो तो उसके मस्तक आदि पर लगाकर भगवती से प्रार्थना-निवेदन कर सकते हैं। जो राख बचे उसे भी निकालकर रख लें। वे ध्यान दिलाते हैं: घर से कलश निकलने से पहले अखंड ज्योत पूरी तरह जलकर बुझ जानी चाहिए, और दीपक को ठंडा करने — थोड़ा गंगाजलगंगा नदी का जल, अशुद्धि के संपर्क में आई अनुष्ठान वस्तुओं को शुद्ध व पुनःप्रतिष्ठित करने हेतु प्रयुक्त। छिड़कने — के बाद ही कलश को विसर्जन के लिए घर से बाहर ले जाना चाहिए। ज्योत घर में जलती रह जाए और आप कलश उठाकर नदी में विसर्जन करने चले जाएँ — ऐसा नहीं करना चाहिए। यदि घर में पहले से ऐसा कोई विधि-विधान चला आ रहा हो, वे कहते हैं, तो वह अलग बात है।
नवरात्र के बाद पारण: कलश निकलने से पहले अन्नदान, भोग और प्रसाद
अन्नदान और भोग के बाद ही खाएँ; खाने के बाद ही विसर्जन
वक्ता कहते हैं कि पारण से पहले अन्नदान करना चाहिए: पाँच तरह का अन्न, या यथाशक्ति सवा किलो अन्न — आटा, चावल आदि का सीधा — हाथ से छूकर संकल्प लें कि "मैं ब्राह्मण को दान दे रहा हूँ", फिर रख दें और ब्राह्मण, पंडित जी या मंदिर भिजवा दें। फिर जो भी खाना बना है पहले माँ को भोग लगाएँ; पहले भगवती का चढ़ा प्रसाद खाएँ, फिर भोग — खिचड़ी, या दशमी को बनी पूरी-सब्ज़ी। पारण के बाद ही, और अखंड ज्योत पूरी तरह शांत होने पर, कलश घर से बाहर ले जाएँ; कलश विसर्जित करके आकर खाना — यह गलती न करें।
अब, वक्ता कहते हैं, प्रश्न आता है कि पारण कैसे करना है। पारण से पहले अन्नदान करना चाहिए। अन्नदान यानी पाँच तरह का अन्न, या यथाशक्ति सवा किलो अन्न — जिसे सीधा कहा जाता है: आटा, चावल आदि। उसे लेकर हाथ से स्पर्श करके संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। लें: "मैं ब्राह्मण को दान दे रहा हूँ।" नवरात्र पूर्ण होने के बाद यह छूकर रख देना चाहिए; फिर ब्राह्मण को, किसी पंडित जी को, किसी मंदिर में भिजवा दें। उसके बाद जो भी खाना बना है उसका सबसे पहले भोगगृहस्थ के भोजन से पूर्व देवता के समक्ष अर्पित किया जाने वाला नैवेद्य। लगाएँ। पारण से पहले माँ को भोग लगाएँ, निवेदन करें। फिर पहले भगवती का चढ़ा प्रसादअर्पण के पश्चात् देवता से लौटा हुआ अंश, जिसे त्यागा नहीं अपितु ग्रहण किया जाता है। खाएँ, फिर जो भोग लगाया है वह खाएँ। भोग में चाहें तो खिचड़ी से व्रत तोड़ सकते हैं, या जो भी पूरी-सब्ज़ी आदि बनाकर दशमी को भोग लगाएँ — उसके बाद ही खाएँ। जो चीज़ व्यवस्थित बनती है वह इसी क्रम से करनी है, वे कहते हैं। पारण करने के बाद ही कलश घर से बाहर ले जाना है। ऐसा नहीं, वे कहते हैं, कि कलश विसर्जित कर देंगे और उसके बाद आकर मुँह जूठा करेंगे — ऐसी गलती न करें। पारण के बाद, जब अखंड ज्योति पूरी तरह शांत हो जाए, तब कलश उठाकर जैसे भी ले जाना चाहें — कार से, बाइक से, जैसे भी नदी जाते हैं — जाएँ।
नवरात्र कलश का नदी में विसर्जन
ज्यों का त्यों ले जाएँ, तट पर धूप-दीप और प्रार्थना, प्रदक्षिणा, नारियल समेत डुबोएँ
वक्ता कहते हैं कि अतिरिक्त चुनरियाँ घर पर रख सकते हैं, पर कलश ठीक जैसे सजा है वैसे ही नदी तक जाता है। तट पर उसे रखकर धूप-दीप दिखाएँ और पुनः प्रार्थना करें — कोई अपराध हुआ हो तो क्षमा, सदैव रक्षा, और हर वर्ष सेवा की सद्बुद्धि — फिर अपनी जगह पर पाँच या कम से कम तीन बार प्रदक्षिणा घूमें, और कलश को नारियल समेत पानी में डुबोएँ, नारियल हाथ में पकड़े रहें कि बह न जाए। पूरा डूबने पर ढक्कन हटाकर भीतर की दक्षिणा, सुपारी और अन्य द्रव्य निकालें, चुनरी में बाँधकर जहाँ धन रखते हैं वहाँ रखें; पूर्ण पात्र के चावल नदी में मछलियों के लिए डाल दें या चिड़ियों को दें; कलश और नारियल नदी में छोड़ दें। बोए हुए जवारे भी सीधे विसर्जित कर सकते हैं — उनसे कोई प्रदूषण नहीं होता।
यहाँ एक प्रश्न आता है, वक्ता कहते हैं: नारियल और कलश की पूरी सजावट क्या निकालकर रख लेनी चाहिए? यदि एक से अधिक चुनरी चढ़ाई हैं और रखना चाहते हैं तो चुनरी आदि उठाकर घर पर रख सकते हैं; पर पूरा कलश ठीक उसी तरह लेकर नदी तक जाएँ। यहाँ ध्यान दें, वे कहते हैं। नदी पर कलश को किनारे रखकर पहले धूप-दीप दिखाएँ। वहाँ पुनः प्रार्थना करें: हे भगवती, कुछ भी अपराध हुआ हो तो क्षमा करें, सदैव मेरी रक्षा करें, और बार-बार हमें यह सद्बुद्धि दें कि हर वर्ष नित्य आपकी सेवा कर सकूँ। इस प्रार्थना के बाद अपनी जगह पर ही प्रदक्षिणादेवता या मंदिर की दक्षिणावर्त परिक्रमा, जिसमें देवता सदैव दाईं ओर रहते हैं। करते हुए — गोल-गोल घूमते हुए — पाँच बार, या कम से कम तीन बार घूमें। फिर कलश को नारियल समेत पानी में डुबोएँ। डुबाने के बाद नारियल को हाथ से पकड़े रहें ताकि बह न जाए। कलश के अंदर जो दक्षिणागुरु अथवा आचार्य को दी जाने वाली भेंट, जिससे अनुष्ठान पूर्ण होता है; इसके बिना कर्म अपूर्ण माना जाता है।, सुपारीसुपारी, जो संकल्प में देवता के प्रतीक रूप में रखी जाती है और पूजन में अर्पित होती है। आदि डाले थे: कलश पूरा डूब जाने के बाद ढक्कन हटाकर उन्हें निकालें। यदि पूर्ण पात्र — चावल वाला पात्र — रखते हैं तो वह चावल डुबाते समय नदी में डाल दें, मछलियाँ खा जाएँगी, कोई दिक्कत नहीं; या चिड़िया, पक्षियों को भी दे सकते हैं। कलश के अंदर की दक्षिणा, सुपारी और जो और द्रव्य डाले हों — सब निकालकर एक चुनरी में बाँधकर जहाँ धन रखते हैं वहाँ रख सकते हैं। कलश नदी में छोड़ देंगे; नारियल भी छोड़ना है। जो जवारे बोए हैं, वे जोड़ते हैं, उन्हें सीधे नदी में विसर्जित कर सकते हैं — उनसे कोई प्रदूषण नहीं होता।
कलश पर लपेटा वस्त्र: विसर्जन के बाद ही निकालें
नौ दिन की शक्ति उसमें रहती है; पहले डुबोएँ, फिर निचोड़कर रखें
वक्ता कहते हैं कि नारियल और कलश पर नौ दिन लपेटा गया वस्त्र विसर्जन से पहले नहीं उतारा जाता: कलश को नदी में डुबाने के बाद ही उसे निचोड़कर घर लाना है। वे बार-बार कहते हैं कि माँ ने नौ दिन जो चुनरी या वस्त्र पहना उसका सीधे प्रयोग करने का सामर्थ्य हममें नहीं है — बहुत लोग करते हैं, पर कलश के ऊपर का मुख्य वस्त्र पहले विसर्जित होना चाहिए; उसका नौ दिन का पूरा शक्ति-सामर्थ्य उसमें बना रहता है, पानी में डालने से खत्म नहीं होता। ऐसा न करना चाहें तो कम से कम उस पर पहले नदी का पानी छिड़कें, तभी वस्त्र हटाकर फिर विसर्जन करें।
नारियल भी छोड़ना है, वक्ता कहते हैं, पर नारियल के ऊपर लपेटा वस्त्र — जो कलश पर नौ दिन तक लपेटा था — उसे वहीं निचोड़कर उठाकर रख लेना है। वे कहते हैं कि बार-बार दोहरा रहे हैं: यह नदी में विसर्जन के बाद, यानी नदी में डुबाने के बाद ही लेकर आना है। हममें इतना सामर्थ्य नहीं है, वे कहते हैं, कि नौ दिन माँ ने जो चुनरी पहनी या जो वस्त्र लपेटा गया उसका सीधे-सीधे प्रयोग करें। बहुत लोग करते भी हैं, पर मुख्य कलश के ऊपर की चीज़ को इस तरह पहले विसर्जित करके उसके बाद ही वहाँ से लाना चाहिए। नौ दिन का पूरा शक्ति-सामर्थ्य उसमें उसी तरह बना रहता है — ऐसा नहीं कि पानी में डाल दिया तो सब खत्म हो गया। इस तरह कर सकते हैं; न करना चाहें तो कम से कम उस पर पहले नदी का पानी ऊपर से छिड़क लें, तभी वस्त्र हटाकर फिर विसर्जन करें।
सावधानी: नवरात्र कलश का नारियल कभी न फोड़ें
वह साक्षात दुर्गा हैं; फोड़ना देव-हत्या है
वक्ता कहते हैं कि कलश के ऊपर रखा नारियल कभी नहीं फोड़ना चाहिए — इसे वे ऐसी बेवकूफी, ऐसी गलती बताते हैं जो कभी न करें, क्योंकि वह नारियल साक्षात दुर्गा का स्वरूप है। उसे फोड़ेंगे तो हत्या का दोष, सीधा-सीधा देव-हत्या का दोष लगता है। कलश को भी कभी नहीं फोड़ना चाहिए।
कलश का जल पीने के प्रसाद के रूप में रखना
उसमें नौ दिन की भगवती की शक्ति है
वक्ता कहते हैं कि कलश हिलाने के बाद उसका थोड़ा-सा जल पीने के लिए रखा जा सकता है — विसर्जन करने जा रहे हों तब भी एक छोटे गिलास से निकालकर रख लें और सब कोई पिएँ, क्योंकि उसमें नौ दिन की भगवती की शक्ति है।
नदी न मिल सके तो नवरात्र कलश का विसर्जन
जल पीपल, बरगद या तुलसी में; कलश और नारियल पूजा स्थान में प्रतीक्षा करें
वक्ता कहते हैं कि यदि जाने के लिए नदी, तालाब, सरोवर न हो तो कलश का जल पीपल के वृक्ष, बरगद के वृक्ष या तुलसी के पौधे में डाल सकते हैं, और कलश को पूजा स्थान में ही साफ जगह रहने दें; बाद में कभी कहीं जाएँ तो विसर्जित कर दें, पर उसमें पैर नहीं लगना चाहिए और मिट्टी का हो तो फूटना नहीं चाहिए। नारियल भी उसी तरह पूजा स्थान में रहे, पूजन होता रहे, जब तक किसी यात्रा में विसर्जन न हो सके; पूर्ण पात्र के चावल चिड़ियों को डाल दें।
यदि नदी आदि न हो — जवारे या कलश विसर्जित करने न जा सकें — तो, वक्ता कहते हैं, कलश हिलाने के बाद उसका जल पीपलभगवान दत्तात्रेय को समर्पित एक पवित्र वृक्ष — इसके नीचे किया गया पितृ तर्पण गृह-क्लेश उत्पन्न करने वाले अशांत पितरों को शांत करता है। के वृक्ष, बरगद के वृक्ष या तुलसी के पौधे में डाल सकते हैं, और कलश को वहीं पूजा स्थान में साफ जगह रहने दें; कोई दिक्कत नहीं। बाद में कभी कहीं जाएँ तो विसर्जित कर दें — पर उसमें पैर नहीं लगना चाहिए, और कलश मिट्टी का हो तो फूटना नहीं चाहिए। ऐसी स्थिति में नारियल का क्या? यदि कहीं नहीं जा पा रहे — नदी नहीं, तालाब नहीं, सरोवर नहीं — तो नारियल को भी उसी तरह पूजा स्थान में रहने दें; पूर्ण पात्र के ऊपर के चावल चिड़ियों को डाल दें; नारियल वैसे ही रहे, पूजन होता रहेगा, और जब कहीं जाएँ तो वहाँ विसर्जित कर दें। बाद में नदी जाने का मौका मिले तो विसर्जन तब कर दें — पर उसे इसी तरह हटाना है।
नवरात्र के बाद बचे जवारे का क्या करें
कचरे में कभी नहीं: हरा भाग रस के लिए, जड़ें गमले में
वक्ता कहते हैं कि जवारे का ऊपरी हरा भाग कान पर लगाते हैं, भगवती को चढ़ाते हैं और धन रखने के स्थान पर रखते हैं, फिर भी बहुत बच जाते हैं; विसर्जन की सुविधा न हो तो कभी कचरे में न फेंकें। कलश हिलाने के बाद पूरा हरा भाग कैंची से काटकर उसका रस या शरबत बनाकर सब पी सकते हैं — कोई दोष नहीं लगता; नीचे का सफेद भाग गमले में डालकर ऊपर अच्छे से मिट्टी डालें और उसमें कोई पौधा लगा दें।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।