भगवती काली का जगन मंगल कवच — कौन पाठ करे, और अभिचार व शत्रु के विरुद्ध पूरा अनुष्ठान विधान
भगवती काली का जगन मंगल कवच किसे करना चाहिए और किसे नहीं, और अभिचार व शत्रु के विरुद्ध इसे सिद्ध करने का वक्ता का पूरा घरेलू अनुष्ठान विधान — समय, पूजन, संकल्प, पाठ की संरचना, प्रतीकात्मक बलि और समापन हवन।
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भगवती काली का जगन मंगल कवच कौन पढ़ सकता है और किसे नहीं पढ़ना चाहिए
घने बीज मंत्र, भारी ऊर्जा, और बिना दीक्षा संकट में छूट
वक्ता कहते हैं कि भगवती काली का कवच व्यक्ति को असंभव-से कार्य करने में सक्षम कर देता है, लेकिन सही प्रभाव केवल काली के सेवक या साधक को देता है। चूँकि इसमें काली के हर बीज मंत्र का समन्वय है और इससे भारी ऊर्जा बनती है — और इसके बाद जीवन बहुत तेज़ी से बदलता है, जिसे आत्मसात करना, संभालना और प्रयोग करना आना चाहिए — इसलिए बिल्कुल नया साधक, जिसके पास न साधना, न जप का तपोबल, न गुरु-दीक्षा, न कोई पूर्व अनुष्ठान हो, इसे सीधे या अत्यधिक न पढ़े; ऐसा व्यक्ति सप्ताह में एक दिन, शनिवार को, पढ़ सकता है, जब तक जगदंबा में अटूट विश्वास न बने या दीक्षा न मिले। दो प्रकार के लोग इसे पूरा उठा सकते हैं: जो शत्रुओं के अभिचार, षड्यंत्र, घर में मरने-मरने जैसी स्थिति या झूठे मुकदमों से टूट चुका हो, वह बिना दीक्षा भी इसका अनुष्ठान कर सकता है, कोई दोष नहीं; और महाकाली का नित्य सेवक जो रोज़ पंचोपचार, दशोपचार या षोडशोपचार पूजा और बीज जप करता है, जिसके लिए दीक्षित होना या न होना महत्व नहीं रखता। हर कवच हर किसी के लिए नहीं है, वे ज़ोर देते हैं; इंटरनेट पर अच्छा लगने भर से इसे शुरू न करें।
वक्ता आरंभ में कहते हैं कि भगवती काली का कवच ऐसा है कि इसे धारण करने, पाठ करने, सिद्ध करने या केवल इसके माध्यम से भगवती से प्रार्थना करने मात्र से व्यक्ति वे कठिन कार्य करने में सक्षम हो जाता है जो इस जीवन में कभी-कभी असंभव-से लगते हैं। साथ ही वे तुरंत शर्त जोड़ते हैं: केवल भगवती काली के सेवक या साधक को ही इसका सही प्रभाव मिलता है, हालाँकि किसी कारण से कुछ समय के लिए पाठ करना भी चल सकता है। आगे कुछ बताने से पहले वे चेतावनी देते हैं कि इसमें बहुत अधिक बीज मंत्रों का प्रयोग हुआ है। यदि आप बिल्कुल नए साधक हैं — साधनाएँ नहीं करते, जप का तपोबलतप और निरंतर साधना से अर्जित आध्यात्मिक शक्ति — किसी बाधा को पूर्णतः दूर करने के लिए इसे संचित नकारात्मक या तांत्रिक ऊर्जा से अधिक होना आवश्यक है। आपके भीतर नहीं है, दीक्षित नहीं हैं, कोई गुरु ही नहीं है, सदाशिव के सामान्य मंत्र या रुद्राभिषेक तक कभी नहीं किया, स्वयं पूजा-पाठ नहीं करते, और कभी कोई अनुष्ठान नहीं किया — तो सीधे-सीधे इस कवच का पाठ न करें, या इसका अत्यधिक पाठ न करें। ऐसा व्यक्ति चाहे तो सप्ताह में एक दिन, शनिवार को, पाठ कर सकता है। यदि आप केवल भगवती की शरणागति चाहते हैं और बिल्कुल नए हैं, तो पहले सप्ताह में एक दिन करें; जब जगदंबा के प्रति अटूट विश्वास और श्रद्धा बन जाए, या दीक्षित हो जाएँ, तब आगे करें। नियमित पाठ के लिए, वे कहते हैं, दो-तीन चीज़ें होनी चाहिए। पहली, यह समझ लें कि इस कवच से अत्यधिक मात्रा में ऊर्जा बनती है, क्योंकि काली के जितने भी अलग-अलग अक्षर-मंत्र हैं, उन हर बीज का समन्वय इस कवच में है — और जब एक मूल बीज ही सहस्रों शक्तियाँ धारण कर सकता है, तो यहाँ अनेक बीज एक साथ काम करते हैं। इसे करने के बाद जीवन में बहुत तेज़ी से बदलाव आता है; उसे कितनी जल्दी आत्मसात कर पाते हैं यह आप पर निर्भर है, और इतने सक्रिय कवच से बनी ऊर्जा को संभालना, संरक्षित करना और प्रयोग करना आना चाहिए। इसीलिए वे बार-बार कहते हैं: पूरी जानकारी अच्छी तरह जान लें, तब करें। वे उस आदत का ज़िक्र करते हैं कि इंटरनेट पर पढ़ा, अच्छा लगा, और शुरू कर दिया — हर कवच हर किसी के लिए नहीं है। दूसरी, आवश्यकता की बात। यदि शत्रु आपके विरुद्ध भारी षड्यंत्र कर रहे हैं, अभिचार कर रहे हैं, किसी कारण से घर में मरने-मरने जैसी स्थिति हो चुकी है, या झूठे केस-मुकदमों में फँसाया गया है, और आपके पास दीक्षा भी नहीं है — तो ऐसे संकट में आप इस कवच का अनुष्ठान अवश्य कर सकते हैं; इसमें कोई दोष नहीं है। अन्यथा यह महाकाली के उस उपासक के लिए है जो रोज़ पंचोपचारपूजा का मूल पंचांग क्रम — धूप, दीप, गंध, पुष्प व नैवेद्य — जो साधना की प्रारंभिक क्रियाओं के बाद देवता हेतु किया जाता है।, दशोपचार या षोडशोपचारदेवता हेतु सोलह अंगों वाला पूर्ण पूजा-क्रम, मूल पंचोपचार से अधिक विस्तृत। विधि से उनके चरणों की सेवा करता है और उनके बीज मंत्रों का जप करता है; ऐसा व्यक्ति दीक्षित है या नहीं यह महत्व नहीं रखता, और वह उनके चरणों में जाने के लिए इसका पाठ अवश्य करे।
काली कवच सिद्ध करें, नियमित पाठ करें या पूरा अनुष्ठान: आवश्यकता से चुनाव
बार-बार के अभिचार से शरण; प्रभाव व्यक्ति पर निर्भर
वक्ता कहते हैं कि यदि शत्रु आप पर अभिचार पर अभिचार किए जा रहे हैं तो आप इस कवच के माध्यम से देवी की शरणागत हो सकते हैं और आपकी रक्षा अवश्य होगी, हालाँकि प्रभाव कितनी जल्दी दिखे यह व्यक्ति-व्यक्ति पर निर्भर है, इसीलिए वे सिद्ध करने की विधि भी बताते हैं। उनका नियम: आवश्यकता हो तो कवच सिद्ध करें; आवश्यकता न हो तो नियमित पाठ करें; अत्यधिक आवश्यकता हो तो अनुष्ठान करें। जो बिल्कुल नया है और केवल भगवती की शरणागति चाहता है, वह पहले सप्ताह में एक दिन करे, और जगदंबा के प्रति अटूट विश्वास बनने पर या दीक्षा मिलने पर ही आगे बढ़े।
अभिचार वाली बात पर लौटते हुए वक्ता कहते हैं कि यदि आपके ऊपर काफी अधिक अभिचार हो रहे हैं — शत्रु अभिचार पर अभिचार किए जा रहे हैं — तब आप इस कवच का सहारा ले सकते हैं, इसके माध्यम से देवी की शरणागत हो सकते हैं, और आपकी रक्षा अवश्य होगी। फिर भी, वे बताते हैं, किसी को कम और किसी को अधिक प्रभाव मिलता है और किसी को जल्दी मिलना शुरू हो जाता है; इसीलिए इसे सिद्ध करने की विधि भी वे इसी वीडियो में बता रहे हैं। पर पहले, वे दोहराते हैं, यह जान लें कि किसे सिद्ध करना चाहिए और किसे नहीं, तभी करें। उनका नियम: आवश्यकता हो तो सिद्ध करें; आवश्यकता न हो तो नियमित पाठ करें; और यदि अत्यधिक आवश्यकता है तब आप इसका अनुष्ठान कर सकते हैं। यदि आप सामान्य रूप से केवल भगवती की शरणागति चाहते हैं और अभी बिल्कुल नए हैं, तो पहले सप्ताह में एक दिन करें। जब सही तरीके से उनकी शरणागत हो जाएँ, जब जगदंबा के प्रति अटूट विश्वास और श्रद्धा बन जाए, तब आगे करें — या फिर दीक्षित हो जाने पर करें। इन बातों को सही ढंग से वर्गीकृत करके अपने ऊपर लागू करने के बाद ही, वे कहते हैं, इस कवच का पठन-पाठन करना चाहिए।
काली कवच के नित्य पाठ के प्रभाव की समय-रेखा
पहले दिन से कृपा, एक महीने में दिखे, तीन महीने में प्रबल ऊर्जा
वक्ता कहते हैं कि यदि आप भगवती के शरणागत हैं और रात्रि में या सूर्योदय से पहले रोज़ एक पाठ भी करते हैं — एक अमावस्या से अगली अमावस्या तक, लगभग दो पक्ष — तो भगवती की कृपा आप तक आने लगती है। यह पहले दिन से ही शुरू होती है, पर लगभग एक महीने में समझ में आने लगती है, दो महीने में बदलाव शुरू हो जाता है, और तीन महीने के पूरे नियम से किए गए पाठ में इतनी ऊर्जा बनती है जो आपके जीवन, शरीर, मानसिक स्थिति और पूरे व्यक्तित्व को बदल सकती है; बीजों से शरीर की कोशिकाओं तक में बदलाव आता है।
कवच को कैसे सिद्ध करें और जीवन में उतारें, इस पर आते हुए वक्ता पहले नियमित पाठ की समय-रेखा बताते हैं। यदि आप भगवती के शरणागत हैं और नियमित पाठ कर रहे हैं — रात्रि के समय या सुबह सूर्योदय से पूर्व रोज़ एक-एक पाठ भी — तो लगभग दो पक्ष बीतने पर, अर्थात् एक अमावस्या से शुरू करके अगली अमावस्या तक, भगवती की कृपा आप तक आनी आरंभ हो जाती है। यह पहले दिन से ही शुरू हो जाती है, वे कहते हैं, पर जो प्रभाव पड़ना चाहिए वह इतने दिनों में आपको समझ में आने लगता है — एक महीना होते-होते पूरा। दो महीना होते-होते बदलाव शुरू हो जाता है। तीन महीने में, यदि आप पूरे नियम से नियमित कर रहे हैं, तो बहुत अधिक मात्रा में ऊर्जा बननी आरंभ हो जाती है, और उसमें आपके जीवन, शरीर, मानसिक स्थिति और पूरे व्यक्तित्व को बदलने की क्षमता होती है। शरीर में भी बदलाव आना शुरू हो जाता है, वे समझाते हैं, क्योंकि जब बीज का प्रभाव पड़ता है तो शरीर की हर उस कोशिका में बीज की शक्ति प्रस्फुटित होने लगती है जो उससे संबंधित है। इसीलिए इस कवच की ऊर्जा इतनी अधिक है कि यह शरीर पर भी प्रभाव डालती है।
काली कवच अनुष्ठान में वस्त्र, दिशा और सामने का विग्रह
सबके लिए लाल; पूर्व या उत्तर, बिना मार्गदर्शक दक्षिण कभी नहीं
शत्रु और अभिचार के विरुद्ध काली के ही स्वरूप में अनुष्ठान उठाने पर वक्ता कहते हैं कि सभी — स्त्री हों या पुरुष, नए हों या पुराने — लाल वस्त्र पहनें और लाल आसन पर बैठें, क्योंकि वस्त्रों के रंग का बहुत महत्व है। दिशा पर वे चेतावनी देते हैं कि कहीं पढ़-सुनकर "काली जी की है तो दक्षिण मुँह कर लें" न करें, इससे बहुत विकट स्थिति हो जाएगी: गृहस्थ और सामान्य साधक जिनके पास सही मार्गदर्शक नहीं, या जिन्हें अभी संकल्प सही से नहीं आता, दक्षिण मुँह न करें। वे पूर्व या उत्तर तय करते हैं, पश्चिम केवल तब जब ये दोनों न मिलें। सामने भगवती का विग्रह हो तो अति उत्तम; यदि काली की फोटो या विग्रह नहीं रखते, तो पूरा पाठ जगदंबा के जिस स्वरूप का विग्रह स्थापित हो उसके बाएँ हाथ में जल से समर्पित होता है।
पहली बात, वक्ता कहते हैं, वह स्थिति है जिसमें इसे उठाया जाता है — नवरात्र में या अन्यथा: आवश्यकता आ पड़ी है, शत्रु अभिचार से बहुत कष्ट दे रहे हैं या षड्यंत्र रचा जा चुका है, और हम भगवती काली के ही स्वरूप की उपासना करना चाहते हैं, क्योंकि उसी स्वरूप में मन लगता है और किसी अन्य स्वरूप में नहीं जाना चाहते। ऐसी स्थिति में, वे कहते हैं, रक्त वस्त्र — लाल वस्त्र — पहनें और लाल आसन रखें, चाहे स्त्री हों या पुरुष, साधक हों या साधिका, सेवक हों या सेविका, नए हों या पुराने; इसका पालन करना अधिक अच्छा है, क्योंकि वस्त्रों के रंगों का अत्यधिक महत्व होता है। दिशा पर वे सावधान करते हैं: कहीं पढ़-सुनकर ऐसा न करें कि काली जी का कवच है तो चलो दक्षिण दिशा मुँह कर लें — इससे बहुत विकट स्थिति हो जाएगी। पहले वे पूर्व या दक्षिण रखने को कहते हैं, और विषम परिस्थिति में जब ये दोनों न मिलें तो पश्चिम; फिर उसे सीमित करते हैं: गृहस्थों, सामान्य सेवकों और साधकों को, जिनके जीवन में अभी सही मार्गदर्शक नहीं, या जो नए हैं और जिन्हें अभी संकल्प आदि सही से नहीं आता, दक्षिण दिशा करके नहीं करना चाहिए — यह सबके लिए हर जगह नहीं होता। इसलिए दिशा का विशेष ध्यान रखें और या तो पूर्व रखें या उत्तर। यदि सामने भगवती का श्री विग्रह है तो अति उत्तम है। यदि किसी कारण से भगवती काली की फोटो या विग्रह नहीं रखते, तो जगदंबा के जिस स्वरूप का विग्रह वहाँ स्थापित है, जप उनके बाएँ हाथ में समर्पित होता है: जब कवच का पूरा पाठ कर लें, तो हाथ में जल लेकर भगवती को समर्पित करें।
काली कवच अनुष्ठान की आरंभ तिथियाँ, अवधि और समय
अमावस्या, कृष्ण चतुर्दशी या अष्टमी, नवरात्र, दीपावली की अवधि; 7, 9 या 11 दिन
वक्ता आरंभ के समय गिनाते हैं: अमावस्या, कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी, कृष्ण पक्ष की अष्टमी, या समय की कमी में किसी भी पक्ष का कोई शनिवार या मंगलवार। नवरात्र में प्रतिपदा से नवमी तक (या दशमी तक, दशमी की रात्रि में हवन); यदि नवरात्र उपवास के साथ कर रहे हैं तो अष्टमी तक जप, नवमी को हवन, फिर पुनः आरंभ। कार्तिक में दीपावली के आसपास धनतेरस से एक दिन पहले के प्रदोष से शुरू करके गोवर्धन पूजा के अगले दिन या अक्षय नवमी तक, या कार्तिक कृष्ण अष्टमी से चतुर्दशी की रात्रि तक; धनतेरस या चतुर्दशी की रात्रि से शुरू करना संभव है पर समय सीमित रहेगा और उसी दिन हवन करना होगा। अनुष्ठान के रूप में कम से कम 7, 9 या 11 दिन करें, और समय रात्रि — सूर्यास्त के बाद — या सूर्योदय से पूर्व रखें।
अनुष्ठान आरंभ करने पर वक्ता संभावित आरंभ-बिंदु बताते हैं। अमावस्या के दिन से शुरू करें; या कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी से आरंभ कर सकते हैं; या कृष्ण पक्ष की अष्टमी से। विषम परिस्थिति में, यदि समय की कमी है, तो किसी भी शनिवार या मंगलवार के दिन से भी शुरू कर सकते हैं — पक्ष कोई भी हो, कोई दिक्कत नहीं। नवरात्रि के दिनों में प्रतिपदापक्ष की प्रथम तिथि, जिससे नवरात्र के अनुष्ठान आरंभ होते हैं। से आरंभ करके नवमीपक्ष की नवीं तिथि, जिस पर नवरात्र का अनुष्ठान पूर्ण होता है। तक करेंगे; दशमी तक कर सकते हैं और दशमी की रात्रि में हवन भी कर सकते हैं। यदि नवरात्र उपवास करके कर रहे हैं तो नवरात्र के अनुसार अष्टमीपक्ष की आठवीं तिथि, जो शाक्त कर्मों के लिए विशेष अनुकूल मानी जाती है। तक जप करना है, नवमी को हवन आदि करके नवमी रात्रि से पुनः इसका जप-पाठ कर सकते हैं। श्रावण के महीने में, या कार्तिक के महीने में दीपावली के आसपास: यदि दीपावली के समय आरंभ करना चाहते हैं तो प्रदोष से — यानी धनतेरस से एक दिन पहले से — शुरू करके गोवर्धन पूजा के अगले दिन तक या अक्षय नवमी तक कर सकते हैं। या फिर कार्तिक में जो कृष्ण पक्ष की अष्टमी पड़ेगी उससे आरंभ करके चतुर्दशी की रात्रि तक कवच का पाठ कर सकते हैं। या चाहें तो धनतेरस से भी आरंभ करें या चतुर्दशी की रात्रि से भी — पर तब, वे चेताते हैं, यदि चतुर्दशी की रात्रि में हवन करेंगे और उसी दिन अमावस्या पड़ गई तो जप भी उतना ही कर सकेंगे, समय की सीमा रहेगी, और उसी दिन हवन भी करना पड़ेगा। जब अनुष्ठान के रूप में उठाते हैं, तो इस कवच की साधना कम से कम सात, नौ या ग्यारह दिन करनी चाहिए। समय रात्रि काल रखना है: सूर्यास्त के बाद शाम का समय, रात्रि काल, या सुबह सूर्योदय से पूर्व रख सकते हैं। सूर्योदय के बाद करें तो कर सकते हैं, पर अच्छा रहेगा कि सूर्योदय से पूर्व आरंभ कर दें।
काली कवच के हर सत्र से पहले की पूजा: दीप, व्यवस्था और एक फूल पर आवाहन
कम से कम पाँच लाल जवा फूल; सारे उपचार आवाहन-पुष्प पर
वक्ता कहते हैं कि पाठ से पहले की पूजा सामान्य पूजन विधि ही है; यदि बहुत कुछ नहीं आता तो कम से कम पाँच लाल जवा (गुड़हल) के फूल रखें। आसन पर बैठने से पहले कर्म-साक्षी दीप प्रज्वलित करें — दीप सबसे पहले। सबको गंगाजल से छिड़कें, आचमन करें, पवित्री धारण करें, शिखा बंधन आता हो तो करें, भगवती का और फिर गुरु-गणपति का स्मरण करें। एक फूल लेकर आवाहन करें: "हे भगवती काली, मैं आपका आवाहन करता हूँ; कृपया यहाँ उपस्थित होकर मेरी पूजा स्वीकार करें और मेरी कामनाएँ पूर्ण करें।" वह फूल रख दें और सब कुछ उसी पर चढ़ाएँ — आसन के लिए बगल में एक फूल, आचमन का जल, गंधोदक, सिंदूर आदि, नैवेद्य सामने — पंचोपचार या दशोपचार से धूप, दीप, नैवेद्य, भोग सहित, नैवेद्य में अपनी परंपरा जानते हों तो वैसे; तभी कवच का पाठ शुरू होता है।
जप कैसे करना है, इस पर वक्ता कहते हैं कि सर्वप्रथम भगवती का पूजन करेंगे, और सामान्य पूजन की विधि ही पर्याप्त है। यदि बहुत कुछ नहीं आता, तो कम से कम पाँच लाल जवा के फूल — जिसे गुड़हल या अड़हुल कहते हैं — होने चाहिए। पहले सबको गंगाजलगंगा नदी का जल, अशुद्धि के संपर्क में आई अनुष्ठान वस्तुओं को शुद्ध व पुनःप्रतिष्ठित करने हेतु प्रयुक्त। से छिड़क लें। आसन पर बैठें, आचमनपूजा से पूर्व आत्मशुद्धि हेतु जल का अनुष्ठानिक आचमन, प्रारंभिक शुद्धिकरण क्रियाओं में से एक। करें, पवित्री धारण करें, शिखा बंधन आता हो तो करें। भगवती का नाम स्मरण करें, फिर गुरु-गणपति का। फिर एक फूल लेकर भगवती का आवाहन करें: हे भगवती काली, मैं आपका आवाहन करता हूँ; कृपया यहाँ उपस्थित होकर मेरे द्वारा किए जाने वाले पूजन को स्वीकार करें और मेरी कामनाएँ पूर्ण करें। यह बोलकर आवाहन करें और पुष्प रख दें। शेष पूजन उसी पुष्प पर होगा: आसन देने के लिए बगल में एक पुष्प रखें, उस पर आचमन के लिए जल, गंधोदक उसी पर, और नैवेद्यपूजा के दौरान देवता को अर्पित किया जाने वाला भोग, जिसके साथ जल अर्पण व समर्पण मंत्र होते हैं। सामने रखें। ध्यान रहे, वे कहते हैं, कि दीप सबसे पहले प्रज्वलित होता है — कर्म-साक्षी दीप: सारी तैयारी के बाद जब आसन पर बैठने आएँ, बैठने से पहले एक दीपक जला लें, उसके बाद ही बाकी काम करें। पंचोपचारपूजा का मूल पंचांग क्रम — धूप, दीप, गंध, पुष्प व नैवेद्य — जो साधना की प्रारंभिक क्रियाओं के बाद देवता हेतु किया जाता है। पूजन में सिंदूर आदि सब उसी पहले फूल पर चढ़ाएँ जिस पर आवाहन हुआ। तो सामान्य पंचोपचार पूजन कर सकते हैं, या दशोपचार। धूप, दीप, नैवेद्य, भोग लगाकर पूजन पूरा करें। भगवती का नैवेद्य-अर्चन हर जगह एक जैसा नहीं होता, वे कहते हैं; इन बातों को जानकर अपनी परंपरा के अनुसार, यदि पता हो, वैसे करें। अन्यथा सामान्य धूप, दीप, नैवेद्य अर्पण करने के बाद कवच का पाठ शुरू करें।
सावधानी: काली कवच अनुष्ठान में हवन तक विग्रह को नहीं हिलाना
अभिषेक और शृंगार केवल पहले दिन
वक्ता कहते हैं कि यदि अनुष्ठान के लिए श्री विग्रह को सजाना चाहते हैं तो केवल पहले दिन — उसी दिन उनका अभिषेक, स्नान और स्थापना कर सकते हैं। अगले दिन से, जब तक समापन हवन न हो जाए, विग्रह को बिल्कुल नहीं हिलाना है।
यदि श्री विग्रह को सजाना चाहते हैं, वक्ता कहते हैं — चाहे नित्य या अनुष्ठान के समय तक — तो ध्यान रहे कि विग्रह को केवल पहले दिन ही हिलाना है। पहले दिन उनका अभिषेक, स्नान, स्थापना आदि करा सकते हैं। अगले दिन से, जब तक हवन नहीं हो जाता, विग्रह को नहीं हिलाना है। इस बात का भी ध्यान रखें, वे कहते हैं।
जगन मंगल कवच अनुष्ठान का संकल्प-वाक्य और प्रतिदिन पाठ संख्या
अभिचार के विरुद्ध एक बार का संकल्प; 108 या 1100 पाठ बराबर बाँटे
वक्ता कहते हैं कि संकल्प अवश्य लेना है। हाथ में एक लाल फूल और थोड़ा अक्षत (बिना टूटा चावल, कुमकुम और हल्दी से या केवल हल्दी से रंगा) लेकर अपना कष्ट कहें — अभिचार के लिए: "हे भगवती, मेरे और मेरे परिवार के ऊपर शत्रुओं द्वारा किए गए सभी अभिचार कर्म, सभी परयंत्र-परतंत्र के समूल नाश हेतु, हमारे रक्षण हेतु, और भविष्य में किसी भी तंत्र प्रयोग से रक्षण हेतु मैं आपके जगन मंगल कवच के 108 (या 1100) पाठ का संकल्प ले रहा हूँ/रही हूँ" — फिर फूल-अक्षत रख दें। संकल्प केवल पहले दिन लिया जाता है। 1100 पाठ हों तो 11 दिन तक रोज़ 100; 108 हों तो 11 दिन रोज़ 10, दैनिक गिनती बराबर रखते हुए जो बचे उसे अंतिम दिन पूरा करें।
संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। अवश्य लेना है, वक्ता कहते हैं। कैसे? हाथ में एक लाल फूल लें और थोड़ा सा अक्षतअखंडित कच्चे चावल के दाने, संकल्प लेते समय जल व पुष्प के साथ हाथ में लिए जाते हैं। — यानी बिना टूटा चावल, जिसे कुमकुम से पीला और लाल रंग सकते हैं या केवल हल्दी से पीला। इन्हें हाथ में लेकर, जो भी कष्ट आपके जीवन में है, उसका संकल्प लेना है। मान लें कि आप अभिचार से ग्रसित हैं। तब संकल्प में आप यह उच्चारण करेंगे: हे भगवती, मेरे परिवार के ऊपर और हमारे ऊपर शत्रुओं द्वारा जिस भी प्रकार के जितने भी अभिचार कर्म किए गए हैं, जो भी परयंत्र-परतंत्र है, जो भी अभिचार है — उन सभी के नष्ट हेतु, उन सभी के समूल नाश हेतु, तथा अपने और अपने परिवार के रक्षण हेतु, और भविष्य में जो भी तंत्र प्रयोग हो उनसे रक्षण हेतु, मैं आपके जगन मंगल कवच के 108 पाठ, या 1100 पाठ, या जितना भी आप करना चाहते हैं, करने का संकल्प ले रहा हूँ या ले रही हूँ। यह बोलकर अक्षत और फूल वहाँ रख दें। यदि 1100 पाठ करने जा रहे हैं तो 11 दिन तक प्रतिदिन 100-100 पाठ करेंगे। संकल्प केवल पहले दिन करना है, हर दिन नहीं: पहले दिन आपने बोल दिया कि 1100 पाठ का संकल्प लेते हैं, हो गया। यदि 108 पाठ करने हैं तो भी पहले ही दिन संकल्प लेंगे, और 11 दिन करने जा रहे हैं तो प्रतिदिन 10-10 पाठ करेंगे — अंतिम दिन को उसी हिसाब से संभाल लें कि प्रतिदिन नौ करने हैं या दस, बराबर-बराबर लेकर चलें और जो बच जाए उसे अंतिम दिन पूरा कर लें। इस प्रकार, वे कहते हैं, आप आरंभ करेंगे।
जगन मंगल कवच के बार-बार पाठ की संरचना और जल-समर्पण
भूमिका और विनियोग एक बार, फलश्रुति केवल अंतिम पाठ में
वक्ता कहते हैं कि विनियोग से पहले दी गई पंक्तियाँ — भैरव जी ने कहा, फिर भैरवी ने कहा, फिर भैरव जी ने कहा — केवल पहले पाठ के साथ बोली जाती हैं। फिर "ओम श्री जगन मंगलस्य कवचस्य" से शुरू होने वाला विनियोग हाथ में जल लेकर पूरा बोलकर जल गिराया जाता है, एक बार। कवच का मूल भाग पहले मंत्र "शिरो में कालिकम पातु" से फलश्रुति "इति ते कथितम दिव्यम कवचं" से ठीक पहले की पंक्ति "दशकम माम यथा तथा" तक चलता है। यदि एक दिन में 11 पाठ करने हैं तो 10 पाठ वहीं रुककर फिर से शुरू होते हैं; 11वें में फलश्रुति भी अंत तक पढ़ी जाती है। फिर हाथ में जल लेकर भगवती के बाएँ हाथ में समर्पित करते हैं, दिन के कवच-जप का पूरा फल उन्हें अर्पित करके प्रसाद-स्वरूप रक्षा और संकल्प की पूर्ति माँगते हुए।
संकल्प हो जाने पर, वक्ता कहते हैं, आप पाठ शुरू करेंगे। पुस्तक में विनियोग से पहले कुछ पंक्तियाँ दी रहती हैं — पहले भैरव जी ने कहा, फिर भैरवी ने कहा, फिर भैरव जी ने कहा। इन सबको आप केवल पहला पाठ करते समय बोलेंगे। फिर विनियोग, जो यहाँ "ओम श्री जगन मंगलस्य कवचस्य" से शुरू होता है: सारा विनियोग बोलकर जल गिराना है — हाथ में जल लेकर विनियोग करें, जल गिरा दें, और फिर कवच शुरू करें। कवच का प्रथम मंत्र "शिरो में कालिकम पातु कृम कार्य" और उसके आगे के मंत्र वहाँ से लेकर फलश्रुतिकिसी स्तोत्र या शास्त्र का समापन अंश, जिसमें उसके पाठ से प्राप्त होने वाले फलों और लाभों का वर्णन होता है। के ठीक पहले तक पाठ करने हैं। जहाँ फलश्रुति "इति ते कथितम दिव्यम कवचं" से शुरू होती है — उससे ऊपर की पंक्ति, जो "यथा तथा" पर समाप्त होती है, वहीं तक आपका कवच-पाठ है। तो पहली बार पाठ करेंगे तो वहाँ तक करेंगे। यदि एक दिन में 11 पाठ करने हैं तो 10 पाठ आप वहीं तक करके बार-बार शुरू से चले जाएँगे — विनियोग एक बार करना है, और हर बार पाठ नए सिरे से शुरू करके सबसे अंतिम पंक्ति "दशकम माम यथा तथा" तक लाना है। जब 11वाँ पाठ होगा तब फलश्रुति भी साथ में बोलते हुए अंत तक चले जाएँगे। उसके बाद हाथ में जल लेकर भगवती के बाएँ हाथ में समर्पित करें — यानी इस पाठ का फल समर्पित करें, यह कहते हुए: हे भगवती, आज मैंने जो कवच का जप किया उसका पूरा फल आपको समर्पित करता हूँ; कृपा-प्रसाद स्वरूप आप मुझे रक्षण प्रदान करें और मेरे संकल्प की पूर्ति करें।
कालिका की किसी भी स्तुति या जप के बाद भैरव स्मरण, महादेव स्तोत्र और कपूर आरती
काली के बाद काल भैरव का स्मरण अनिवार्य
वक्ता कहते हैं कि जब भी आप भगवती कालिका की स्तुति, पाठ या जप करते हैं तो काल भैरव का स्मरण अवश्य करना चाहिए। बटुक भैरव, काल भैरव या जिस भी भैरव स्वरूप को आप कालिका का मानते हों, उनमें से किसी की 108 नामावली (अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्र) या "काल भैरवम भजे" वाले भैरव अष्टक का पाठ करें, जो उचित लगे। फिर महादेव के पंचाक्षर स्तोत्र या द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र का कम से कम स्मरण, या पाठ, करें, और उसके बाद कपूर पर आरती अवश्य करें।
जल-समर्पण के बाद, वक्ता कहते हैं, यह याद रखें: जब भी आप भगवती कालिका की स्तुति, पाठ, जप आदि करते हैं तो काल भैरव का नाम स्मरण अवश्य करना चाहिए। तो या तो बटुक भैरव, काल भैरव, या अन्य जो भी स्वरूप आप भगवती कालिका के काल भैरव के रूप में मानते हों — इन दोनों में से किसी की 108 नामावली, अर्थात् अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्र, का पाठ कर लें, या भैरव अष्टक का पाठ करें, जो "काल भैरवम भजे" वाला है — जो आपको सही और उचित लगे, कवच के बाद उसका पाठ करें। फिर महादेव का पंचाक्षर स्तोत्र, या द्वादश ज्योतिर्लिंगम स्तोत्र — इन सबका कम से कम स्मरण कर लें, या पाठ कर लें। उसके बाद कपूर पर आरतीदेवता की प्रतिमा के समक्ष प्रज्वलित दीपक घुमाने का अनुष्ठान — दीपदान में जब दीपक बुझने लगते हैं, तब इसे किया जाता है। अवश्य करनी चाहिए।
संहार बीज के कारण काली कवच पाठ के बाद प्रतीकात्मक बलि
जीव सेवा, कपूर पर लौंग, और रोज़ 100 पाठ पर दो मंडलों पर दो नींबू
वक्ता कहते हैं कि कवच में संहार बीज का कई बार प्रयोग हुआ है — ऐसा बीज जो अपने नाम के अनुरूप तलवार की तरह चलता है — इसलिए पाठ के बाद प्रतीकात्मक बलि आवश्यक हो जाती है। सात्विक प्रकार जीव सेवा है, जो पंचबलि के अंतर्गत आती है: कौवे को रोटी, गाय और कुत्ते को भोजन, चींटियों को आटा, अवश्य करें। इसके अलावा अग्नि जलाकर कम से कम दो कपूर, एक पर भगवती काली के नाम से दो लौंग और दूसरे पर काल भैरव के नाम से दो लौंग जलाएँ। यदि रोज़ 100 पाठ कर रहे हैं तो कपूर से पहले दो कच्चे हरे नींबू खड़े काटकर प्लेट या ज़मीन पर बने दो मंडलों पर निंबू बलि दें (मंडल चैनल के बलि वाले वीडियो में दिखाया गया है); इससे कवच की ऊर्जा आराध्य और आपके बीच संतुलित रहती है और आप पर तीक्ष्ण प्रभाव नहीं पड़ता। फिर हर मंडल के सामने कपूर पर लौंग जलाएँ, बार-बार क्षमा प्रार्थना करें और सब भगवती को समर्पित करें।
अब थोड़ी विशेष बात, वक्ता कहते हैं, जब कवच की सिद्धि के लिए इतना सब कर लिया। जब हम कवच का इतना पाठ कर लेंगे तो ध्यान रहे कि इसमें बीज मंत्र हैं और संहार बीज का काफी बार प्रयोग हुआ है। संहार बीज अपने नाम से ही संहार है — तलवार की भाँति चलता है। यहीं लोगों के लिए थोड़ी कठिनाई होती है, वे कहते हैं: लोग पूछते हैं कि बलि कैसे चढ़ाएँगे, बलि कैसे देंगे। प्रतीकात्मक रूप में बलि देना आवश्यक हो जाता है। हम दो प्रकार से बलि देते हैं। पहला, सात्विक प्रकार, जिसे हम जीवों की सेवा के रूप में जानते हैं और जो पंचबलिअनुष्ठान के अंत में विभिन्न योनियों हेतु अर्पित की जाने वाली पाँच बलियाँ। के अंतर्गत आता है — जीव सेवा: कौवे को रोटी दें, गाय और कुत्ते को दें, चींटियों को आटा दें। यह सब तो करना ही करना है। इसके अलावा अग्नि प्रज्वलित करके उस पर कपूर जलाएँ, और जलते कपूर पर लौंग जलाएँ। कम से कम दो कपूर जलाने हैं: एक पर भगवती काली के नाम से दो लौंग जलाएँ; दूसरे कपूर पर काल भैरव के नाम से दो लौंग जलाएँ। यह पहला प्रकार हो गया। दूसरे प्रकार की बलि, वक्ता कहते हैं, तब है जब आप रोज़ 100 पाठ कर रहे हों। यदि आपका रोज़ 100 पाठ है तो इससे पहले — कपूर-लौंग जलाने से पहले — दो कच्चे, हरे नींबू लाकर निंबू बलि देनी है, हर नींबू को खड़ा काटकर। मंडल कैसे बनेगा, इसके लिए इसी चैनल पर बलि कैसे चढ़ाते हैं वाला एक वीडियो है जिसमें उन्होंने मंडल बनाकर दिखाया है; आपको दो मंडल बनाने चाहिए, प्लेट पर या ज़मीन पर, और वहाँ बलि चढ़ानी चाहिए। इससे क्या होता है, वे समझाते हैं, कि कवच की ऊर्जा आपके आराध्य और आपके बीच एक समन्वय स्थापित कर देती है और उसे संतुलित रखती है, जिससे आप पर कोई विशेष तीक्ष्ण प्रभाव नहीं पड़ता। यह ज़रूरी है, वे कहते हैं — आवश्यक है। यह करने के बाद दोनों मंडलों के सामने एक-एक कपूर पर दो-दो लौंग जलाएँ, और फिर अपनी क्षमा प्रार्थनाकर्म के अंत में की जाने वाली क्षमा-याचना, जो त्रुटि अथवा न्यूनता के लिए होती है। आदि करके बार-बार क्षमा माँगें और सब भगवती को समर्पित करें।
काली कवच अनुष्ठान का समापन हवन: 108 नामों से सरसों के तेल में डूबी काली मिर्च
आरंभिक आहुति, जयंती मंगला 108, फिर हर नाम से स्वाहा
अंतिम दिन, वक्ता कहते हैं, हवन होता है: 1100 पाठ पर 1100 आहुति। आरंभिक विधान चैनल के नवरात्र वीडियो से अर्गला स्तोत्र के प्रथम मंत्र की आहुति तक लें, और "ओम जयंती मंगला काली" से 108 आहुति अवश्य दें। फिर मुख्य आहुति सरसों के तेल में डुबोई काली मिर्च से, काली की 108 नामावली को मंत्र बनाकर "नमः" की जगह "स्वाहा" — "ओम काली स्वाहा": 1100 पाठ पर हर नाम से 10 या 11 आहुति, कुल 108 पाठ पर हर नाम से एक। सामग्री में काली मिर्च अधिक रख सकते हैं, एक आहुति में एक से अधिक दाने; 1100 वाले में सामग्री कहीं अधिक लगेगी, जिसे वे मंत्र सहित डिस्क्रिप्शन या पीडीएफ में लिखने की बात कहते हैं।
अंतिम दिन, वक्ता कहते हैं, आपको हवन की विधि करनी है। यदि पूरे 1100 पाठ किए हैं तो 1100 आहुति डलेगी। हवन का आरंभिक विधान इसी चैनल पर डाला हुआ है: नवरात्र विधानों में आरंभिक विधि वहाँ से कर लें। उसमें अर्गला स्तोत्र के प्रथम मंत्र से आहुति की विधि बताई गई है — वहाँ तक आपको करनी है। "ओम जयंती मंगला काली" मंत्र से जो 108 आहुति देनी है — वह अवश्य करें। ये आरंभिक आहुति देने के बाद जो मुख्य आहुति होगी वह काली मिर्च को सरसों के तेल में डुबोकर देनी है। तो ये आहुति देने के लिए अब आपके पास या तो 1100 काली मिर्च चाहिए, या पूरी की पूरी हवन सामग्री बना लें — जिसके लिए, वे कहते हैं, वीडियो का डिस्क्रिप्शन देखें, जहाँ वे सब अलग से लिखेंगे या पीडीएफ फाइल का लिंक देंगे कि हवन सामग्री क्या-क्या रहेगी और किस मंत्र से आहुति देनी है। मंत्र क्या रहेगा, इस पर वक्ता कहते हैं कि सबसे सरल और सत्य वही लें: भगवती काली की 108 नामावलीदेवता के नामों की लिखित सूची — जैसे दुर्गा के 108 नाम, हवन में प्रत्येक नाम पर पृथक आहुति देने की सुविधा हेतु अलग से लिखे जाते हैं।। उसी से आहुति दें। यदि 1100 जप कर रहे हैं तो भगवती काली के 108 नामों में से प्रत्येक नाम से 10-10 आहुति, या हर नाम से 11-11 आहुति डालें। नमः नहीं बोलेंगे: पहला नाम "ओम काली नमः" हो तो "ओम काली स्वाहा", "ओम काली स्वाहा" बोलकर इस तरह 10-12 या 11-12 आहुति डालें। दूसरे नाम से 11 आहुति — 1100 हो तो 11-11 — और इसी तरह 108 नामों तक हर नाम से 11-11 आहुति हवन सामग्री से डालते जाएँ। यदि आपने कुल ठीक 108 पाठ किए हैं — यानी प्रतिदिन 11 या 9 पाठ करते हुए 11 दिन में 108 — तो हर नाम से केवल एक-एक आहुति डालें। उसमें काली मिर्च के दाने अधिक रख सकते हैं, या एक आहुति में एक से अधिक दाने डाल सकते हैं। 1100 वाले में थोड़ा अधिक लगेगा: सारी सामग्री मिलाकर करनी पड़ेगी, क्योंकि उसमें काली मिर्च अधिक खर्च हो जाएगी। दोनों विधान, वे कहते हैं, बता दिए गए हैं, आप किसी से भी कर सकते हैं।
काली कवच हवन के बाद के समापन कर्म: कुंड में नींबू, पूर्णाहुति, कन्या भोजन और अन्नदान
अनुष्ठान का फल अपने आभा-मंडल में समर्पित
हवन पूर्ण होने पर, वक्ता कहते हैं, चाहे 1100 पाठ किए हों या 108, हवन कुंड में कम से कम दो नींबू की बलि देनी है — हर नींबू खड़ा काटकर कुंड में निचोड़कर फिर डालें, एक काली के नाम से और एक काल भैरव के नाम से। फिर सामान्य पूर्णाहुति: गरी गोला काटकर उसमें गुड़ भरकर, पान पत्ते पर, और सब कुछ समर्पित। कम से कम एक कुँवारी कन्या को भोजन कराएँ — संभव हो तो नौ, पाँच या तीन — पूरे कन्या पूजन, पैर धोने, वस्त्र, भोग और दक्षिणा के साथ विदा करें। फिर मंदिर में यथाशक्ति अन्नदान करें, और सारा पुण्य भगवती को समर्पित करके माँगें कि प्रसाद स्वरूप इसकी ऊर्जा आपके आभामंडल में स्थापित होकर नित्य रक्षण दे।
हवन पूर्ण हो जाने पर, वक्ता कहते हैं, वैसे भी हवन कुंड में निंबू बलि देनी है — 1100 पाठ किए हों तो कम से कम दो नींबू, और 108 पाठ किए हों तो भी कुंड में दो नींबू की बलि। यानी नींबू को खड़ा काटकर हवन कुंड में निचोड़कर फिर डालना है। दो नींबू में एक काली के नाम से और दूसरा काल भैरव के नाम से। इस प्रकार यह पूर्ण होता है। फिर पूर्णाहुति की विधि — गरी गोला काटकर उसमें गुड़ आदि भरकर जैसे पूर्णाहुति की जाती है — वह भी करें, पान पत्ते पर जैसे किया जाता है, और फिर सारा का सारा समर्पित कर दें। प्रयास करें कि कम से कम एक कुँवारी कन्या का भोजन अवश्य कराएँ; संभव हो तो नौ, पाँच या तीन, पर कम से कम एक कुँवारी कन्या अवश्य आए, जिसका पूरा कन्या पूजन सही तरीके से हो — वस्त्र आदि देकर, अच्छे से पैर धोकर, पूजन करके, भोग लगाकर खिलाकर, दक्षिणा आदि देकर विदा करें। तत्पश्चात यथाशक्ति अन्नदान करें — मंदिर में जाकर फल, अन्न आदि का दान करें — और फिर सारा पुण्य-फल भगवती को समर्पित करके प्रसाद स्वरूप स्वीकार करें, यह कहते हुए: हे भगवती, मैंने जैसे भी इस अनुष्ठान को पूर्ण किया है, आपकी कृपा से यह सारा अनुष्ठान और इसका फल आपको समर्पित है; हे जगदंबे, आप मेरे इस कार्य को पूर्ण करें और प्रसाद स्वरूप इसकी ऊर्जा, इसकी शक्ति मेरे आभामंडल में स्थापित करके नित्य रक्षण प्रदान करें।
मूल अनुष्ठान से आगे काली कवच साधना के अगले चरण
तीन चरण, फिर अठारह चरण, अभी नहीं बताए
वक्ता कहते हैं कि इस कवच के अन्य, कहीं अधिक तीव्र विधान भी हैं: यह अनुष्ठान कर लेने पर अगला चरण आता है — सामान्यतः तीन चरणों में, और आगे अठारह चरण, जिनमें हर चरण में थोड़ा बदलता है, कहीं स्वरूप, कहीं मंडल पूजन। वे उन्हें अभी नहीं बताते, कहते हैं कि जो इस स्तर को पूरा करेंगे उन्हें बताएँगे; अभी इतना ही करें, अनेक लाभ मिलेंगे।
इस विधि से एक बार अनुष्ठान करके देखें, वक्ता कहते हैं। इसके अन्य विधान भी हैं जो अत्यंत तीव्र हैं: इसे कर लेने पर इसका अगला चरण आता है — सामान्यतः यह तीन चरणों में होता है, और आगे बढ़ने पर इसके अठारह चरण होते हैं। यदि आप इनमें से एक को भी पकड़ लेते हैं और एक-एक करके करते हैं, वे कहते हैं, तो वे बताएँगे; हर चरण में थोड़ा-थोड़ा बदलता जाएगा — कहीं स्वरूप बदलेगा, कहीं मंडल पूजन बदलेगा। पर अभी इतना ही करें, अनेकों-अनेक लाभ प्राप्त होंगे।
साधिकाएँ हवन की आरंभिक आहुतियाँ घी से नहीं देतीं
पुरुष साधक घी से; स्त्रियों के लिए अन्य सामग्री, पीडीएफ में बताएँगे
वक्ता एक भूली हुई बात जोड़ते हैं: हवन में यदि साधिकाएँ आरंभिक आहुतियाँ — गुरु, गणपति, नवग्रह आदि की — दे रही हैं तो वे घी से आहुति नहीं देंगी। पुरुष साधक ये आहुतियाँ घी से देंगे; स्त्री साधिकाएँ अन्य विधि से देंगी, जो वे हवन के पीडीएफ या डिस्क्रिप्शन में लिखने की बात कहते हैं।
एक और विशेष बात, वक्ता कहते हैं, जो वे बताना भूल गए थे और जिसके लिए क्षमा चाहते हैं: जो हवन होगा उसमें यदि साधिकाएँ आरंभिक आहुति दे रही हैं, तो — साधक तो घी से आहुति देंगे — पर साधिकाएँ घी से आहुति नहीं देंगी। हवन का जो पीडीएफ फॉर्मेट वे डालेंगे, या डिस्क्रिप्शन में लिखेंगे, उसमें वे लिख देंगे कि आरंभिक आहुतियाँ — जैसे गुरु, गणपति, नवग्रह की — स्त्री साधिकाओं को किस चीज़ से डालनी हैं। पुरुष साधक तो घी से डालेंगे, पर स्त्री साधिकाएँ अन्य विधि से डालेंगी, जो वे वहाँ भी लिख देंगे।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।