गृहस्थ तंत्र का लाइव प्रश्नोत्तर — हवन के नियम, घर के मंदिर का स्थान, यंत्र निर्माण, और दर्जनों बिखरे हुए विधान
हवन के नियम, घर के मंदिर की व्यवस्था, यंत्र निर्माण और मंत्र की शुद्धता पर एक बिखरा पर सघन लाइव प्रश्नोत्तर।
76 notes, in the order they are taught. Jump to any one.
60 also answer a common question
Questions this answers
60 of the notes below are questions in their own right. Scroll for more.
किस देवता के हवन में कौन से तिल जाते हैं?
शांति-पौष्टिक कर्म के हवनों में घी के साथ मिलाकर काला तिल
काला तिल लगभग सभी देवी-देवताओं के शांति और पौष्टिक कर्म के हवनों में प्रयोग होता है; जब कभी हवन किया जाता है, उसमें घी के साथ मिलाकर प्रमुखता से इसी का उपयोग होता है। सफेद तिल के प्रयोग पर वक्ता अलग से कुछ नहीं कहते।
काले और सफेद तिल में से किस देवता के हवन में कौन सा तिल प्रयोग होता है, यह पूछे जाने पर वक्ता केवल काले तिल के विषय में उत्तर देते हैं: वह लगभग सभी देवी-देवताओं के हवनों के शांति और पौष्टिक कर्म में प्रयोग किया जाता है, और जब कभी हवन होता है तब घी के साथ मिलाकर प्रमुखता से उसी का उपयोग होता है।
दो-तीन देवताओं का एक साथ हवन करने पर क्या तर्पण भी करना होता है?
बहु-देवता हवन में हर देवता के लिए तर्पण-मार्जन
यदि दो-तीन देवताओं का चार-पाँच माला हवन किया जाए तो तर्पण भी सबका मन से करना चाहिए; उसके साथ मार्जन भी होता है।
दो-तीन देवताओं का चार से पाँच माला हवन करने पर क्या हर एक का तर्पण करना चाहिए, यह पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं — हाँ, सबका तर्पणहवन व मार्जन के साथ किया जाने वाला जल आदि द्वारा देवता या पितरों को अर्पित तर्पण। कीजिए, और साथ में मार्जन भी।
घर का मंदिर कहाँ बनवाना चाहिए?
मंदिर की छाया घर पर न पड़े और वह निवास से सटा हुआ न हो
तीन फीट का विग्रह यूँ ही स्थापित नहीं करवाना चाहिए; पूरा मंदिर बनवाना है तो वह घर के भीतर नहीं, मंदिर की विधि-व्यवस्था के अनुसार बनना चाहिए। मंदिर की छाया निवास पर न पड़े, और वह अपने घर से सटा हुआ या सामने न हो — वक्ता कहते हैं इसका शास्त्र प्रमाण भी है — क्योंकि कालांतर में इससे दोष और दिक्कत आती है।
काली माता की प्राण प्रतिष्ठा और स्थापना घर पर सौम्य रूप में करवाई जा सकती है या नहीं, यह पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि तीन फीट की छोटी स्थापना करवाने का तरीका यह नहीं है: यदि पूरा मंदिर बनवाना है तो वह घर के अंदर नहीं, बल्कि मंदिर की जो विधि-व्यवस्था होती है उसी के अनुसार बनना चाहिए। मंदिर की छाया निवास स्थान पर कभी न पड़े, और वह अपने घर से सटा हुआ या घर के सामने न हो — वे कहते हैं कि इसी बात का शास्त्र प्रमाण भी है। आजकल लोग घर-घर में बड़े-बड़े मंदिर बना दे रहे हैं, जिसे वे उचित नहीं बल्कि विडंबना बताते हैं, क्योंकि कालांतर में इससे दोष और दिक्कत आती है। यदि अभी तक मंदिर नहीं बनवाया है तो वे ऐसी जगह चुनने की सलाह देते हैं जिसके अगल-बगल अपना या किसी पड़ोसी का घर न हो।
क्या माला-मंत्र का जप चलते-फिरते किया जा सकता है?
चलत-फिरत माला-मंत्र का जप नहीं होता
नाम स्मरण चलते-फिरते किया जा सकता है, पर माला-मंत्र का जप चलत-फिरत कभी नहीं करना चाहिए; सुबह-शाम और जो भी सेवा करनी हो, सेवा ऐसी न कीजिए जिससे दोष लगे।
वक्ता कहते हैं कि नाम स्मरण चलते हुए हो सकता है, पर माला मंत्र का जप — माला लेकर की जाने वाली मंत्र आवृत्ति — चलत-फिरत कभी नहीं होता। सुबह-शाम और जो भी सेवा करनी हो वह कीजिए, पर सेवा ऐसे ढंग से न कीजिए जिससे दोष लगे।
राजाओं के समय में "आखेट" का वास्तव में क्या तात्पर्य था?
आखेट हिंसक जीवों पर नियंत्रण था, वीरता का प्रदर्शन नहीं
राजाओं के समय में आखेट अधिकतर ऐसे जीवों का होता था जो गाँव में हिंसा फैलाते थे, जिससे राजा के दो कार्य एक साथ सिद्ध होते थे — प्रजा की सुरक्षा, और उन जीवों की हिंसा-प्रवृत्ति पर नियंत्रण, ताकि वन्य जीवन और ग्रामीण जीवन में सामंजस्य बना रहे। आखेट का अर्थ कभी यह था ही नहीं कि जाकर अपनी वीरता का प्रदर्शन किया जाए; वह अर्थ बाद में जुड़ा।
आखेट का क्या अर्थ था, यह पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि राजाओं के समय में आखेट का तात्पर्य आज की समझ से भिन्न था। वह अधिकाधिक ऐसे जीवों का होता था जिनके द्वारा गाँवों में हिंसा फैलाई जाती थी, जिससे राजा के दो कार्य एक साथ हो जाते थे: अपनी प्रजा की सुरक्षा, और ऐसे जीवों की हिंसा-प्रवृत्ति पर नियंत्रण, ताकि वन्य जीव और ग्रामीण जीवन दोनों के बीच सामंजस्य बना रहे। वे कहते हैं कि आखेट का यह अर्थ होता ही नहीं था कि हम गए और वहाँ अपनी वीरता का प्रदर्शन किए — यह सदैव से नहीं रहा है, यह बाद में हुआ है।
जब हर दूसरा वीडियो कुछ और कहता हो तो भ्रमित होने से कैसे बचें?
बार-बार दोहराए गए झूठ को अपनी मेधा शक्ति से ही पहचाना जा सकता है
परस्पर विरोधी वीडियो और कथनों के बीच भ्रमित होने से कैसे बचें, यह पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि भगवती के द्वारा दी गई अपनी मेधा शक्ति से ही सही और गलत की पहचान होती है — क्योंकि झूठ को भी दिन भर सौ बार दिखाया जाए तो वह सत्य लगने लगता है, और जिस चीज को आदमी पहले इग्नोर करता है वही अलग तरीके से बार-बार प्रस्तुत होने पर सही लगने लगती है।
जब हर दूसरा वीडियो परस्पर विरोधी बातें कहता हो तब भ्रमित होने से कैसे बचें, यह पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि विवेक स्वयं की मेधा शक्ति से आना चाहिए, जो भगवती के द्वारा ही दी गई है, और उसी से क्या सही है क्या गलत यह पहचाना जाता है। वे एक चेतावनी जोड़ते हैं: झूठ को भी दिन भर सौ बार दिखाया जाए तो वह सत्य लगने लगता है; जिस चीज को आदमी पहले इग्नोर कर देता था, वही अलग तरीके से बार-बार प्रस्तुत की जाती रहे तो बाद में सही बताई जा रही लगने लगती है।
किसी मंत्र-स्तोत्र का प्रत्यक्ष प्रभाव दिखने के लिए क्या करना पड़ता है?
कवच का पाठ सामान्य रूप से हो सकता है, पर प्रत्यक्ष सिद्धि के लिए पूर्ण वैदिक नियम
पर्व काल छोड़कर किसी मंत्र-स्तोत्र को किस तिथि को सिद्ध किया जा सकता है, यह इस पर निर्भर करता है कि वह किस देवता का है और उसका अपना पूरा विधि-विधान क्या है। सामान्यतः कवच का जप शिव मंदिर में रहकर किया जा सकता है, पर जिस सिद्धि का प्रत्यक्ष प्रभाव दिखे उसके लिए पूर्ण वैदिक नियम मानने पड़ेंगे, जिसमें मृत संजीवनी मंत्र का जप भी सम्मिलित है — इसीलिए यह विधि क्लिष्ट है।
पर्व काल छोड़कर सामान्य रूप से किसी भी महीने में किस तिथि को कोई मंत्र-स्तोत्र सिद्ध किया जा सकता है, यह पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि यह निर्भर करता है कि किस देवता का मंत्र है, और यह उसके पूरे विधि-विधान के नियमानुसार रहकर ही किया जा सकता है। वे कहते हैं कि सामान्यतः कवच का जप शिव मंदिर में रहकर अलग प्रकार से किया जा सकता है। पर यदि उद्देश्य यह हो कि वह सिद्ध हो और उसका प्रत्यक्ष प्रभाव दिखाई दे, तब पूर्ण वैदिक नियम मानने पड़ेंगे, जिसमें मृत संजीवनी मंत्र का जप भी करना पड़ता है — इसीलिए यह पूरी विधि क्लिष्ट है।
दुर्गा सप्तश्लोकी कितने पाठ से प्रभावी होती है?
सप्तश्लोकी की पुनरावृत्ति, और अनसुलझे अपराध सिद्धि में बाधा कैसे बनते हैं
सप्तश्लोकी का 108 का पाठ सात या नौ बार कर लेने से ही इतना हो जाता है कि जो संकल्प लेकर किया गया है वह काम करने लगे। पर इसी जीवन के कोई अपराध अनसुलझे रह गए हों तो सिद्ध करने के प्रयास में ही बहुत परेशानियाँ आती हैं; 1100 पाठ के लगभग दस से ग्यारह बार निरंतर करने पर वह प्रत्यक्ष रूप से दिखने लगता है, और जितनी अधिक आवृत्ति होती जाती है उतना ही उसका सामर्थ्य समझ में आता जाता है।
सप्तश्लोकी कितने पाठ से सिद्ध होती है, यह पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं: मान कर चलिए कि 108 का पाठ सात बार या नौ बार कर लेने से इतना तो हो ही जाता है कि जो संकल्प लेकर आप करेंगे वह करने लगेगा। पर वे सावधान करते हैं कि यदि इसी जीवन में कुछ ऐसे अपराध बन पड़े हों जिनका निवारण न हुआ हो, तो सिद्ध करने के प्रयास में ही बहुत परेशानियाँ आएँगी। जहाँ साधक ने एक बार 1100 पाठ पूरे कर लिए हों, वहाँ लगभग दस से ग्यारह बार ऐसे निरंतर करने पर ही परिणाम उस रूप में प्रत्यक्ष होते हैं जैसा सोचा जा रहा है — और जितनी आवृत्ति बढ़ती जाती है उतना ही समझ में आता जाता है कि उसका सामर्थ्य कितना है और वह कितना प्रभाव दे रहा है।
विंध्याचल के त्रिकोण की तीन देवियाँ कौन हैं?
विंध्यवासिनी, काली और अष्टभुजा — लघु त्रिकोण
महाविंध्यवासिनी काली और अष्टभुजा माँ तथा त्रिकोण यात्रा के विषय में पूछे जाने पर वक्ता प्रमुख त्रिकोण बनाने वाली तीन देवियों के नाम बताते हैं — भगवती विंध्यवासिनी, काली (काली खोह) और भगवती अष्टभुजा — और कहते हैं कि इसे लघु त्रिकोण कहा जाता है।
महाविंध्यवासिनी काली, अष्टभुजा माँ और त्रिकोण यात्रा के विषय में पूछे जाने पर वक्ता उन तीन देवियों के नाम बताते हैं जो मिलकर प्रमुख त्रिकोण बनाती हैं: भगवती विंध्यवासिनी, काली (काली खोह) और भगवती अष्टभुजा। इसी को, वे कहते हैं, लघु त्रिकोण कहते हैं।
शिव मंत्र से पहले प्रणव कौन लगा सकता है?
शिवाय से पहले प्रणव केवल यज्ञोपवीत धारण करने वालों के लिए
गुरु आदेश है कि शिव मंत्र से पहले प्रणव केवल वही लगाएँ जो यज्ञोपवीत धारण करते हैं। जिनका वह संस्कार नहीं हुआ — स्त्रियाँ भी सम्मिलित — वे प्रणव छोड़कर शिवाय के बाद नमः लगाकर जप करें; और जो यज्ञोपवीत धारण करके भी अष्टमी-चतुर्दशी का ब्रह्मचर्य पालन नहीं करते, उनका प्रणव लगाकर जप एक तरह से व्यर्थ ही मान लिया जाता है।
सरसों के तेल के दीपक से काला धुआँ निकलना क्या अशुभ संकेत है?
दीपक का काला धुआँ प्रायः बाती की गड़बड़ी है
सरसों के दीपक से बहुत काला धुआँ निकलना आवश्यक रूप से नकारात्मक ऊर्जा ग्रहण करने का संकेत नहीं है; अच्छे कॉटन की मध्यम मोटाई की बाती, सही सरसों का तेल, और बाती को दोनों हाथों से गोल घुमाकर बहुत टाइट न करना — इतने से धुआँ बंद हो जाता है। वक्ता ऐसी छोटी बातों को अंधविश्वास बना लेने से मना करते हैं।
किसी ने बताया था कि सरसों के दीपक से काला धुआँ निकलना नकारात्मक ऊर्जा ग्रहण करने का संकेत है — यह सुनकर वक्ता असहमति जताते हैं: ऐसा ज़रूरी नहीं है। बाती अच्छे रुई/कॉटन कपड़े से बनाइए, मध्यम रखिए — न बहुत छोटी, न बहुत बड़ी — सरसों का तेल सही रखिए, और वर्तिका को दोनों हाथों से गोल घुमाकर बहुत टाइट मत कीजिए; ये बुनियादी बातें ठीक हों तो काला धुआँ नहीं निकलेगा। वे ऐसी छोटी-छोटी बातों को अंधविश्वास बना लेने से सावधान करते हैं, यह मानते हुए भी कि शास्त्र प्रमाण है कि ऐसे संकेत कब और किस विधि-विधान से वास्तव में अर्थ रखते हैं।
विवाहित स्त्री के लिए ब्रह्मचर्य पालन अपने हाथ में न हो तो क्या करें?
बीच में टूटे 40 दिन के चक्र को आगे से गिनना, और अष्टमी-चतुर्दशी का नियम
जहाँ विवाहित स्त्री का ब्रह्मचर्य पूरी तरह उसके अपने हाथ में न हो, वहाँ 40 दिन का दुर्गा चालीसा चक्र बीच में पाँच-छह दिन छूट जाए तो अगले दिन से पुनः आरंभ करके आगे की गिनती की जाती है। ऐसे व्रत में अष्टमी और चतुर्दशी का ब्रह्मचर्य फिर भी अपेक्षित है; जहाँ वह सचमुच साधिका के हाथ में न हो, वहाँ यह दंपति का आपसी विषय है, नियम से छूट नहीं।
विवाहित स्त्री का ब्रह्मचर्यकिसी दीर्घ अनुष्ठान के दौरान आवश्यक कठोर ब्रह्मचर्य। अपने हाथ में न होने पर 40 दिन की दुर्गा चालीसा चक्र-विधि कैसे पूरी हो, यह पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि पाँच-छह दिन का व्यवधान गिनती को व्यर्थ नहीं करता — अगले दिन से पाठ पुनः आरंभ कीजिए और वहीं से गिनती आगे बढ़ाइए। अष्टमी और चतुर्दशी का ब्रह्मचर्य तथापि ऐसे व्रत में अपेक्षित है; जहाँ वह वास्तव में साधिका के अपने हाथ में न हो, वहाँ वे कहते हैं कि यह दंपति का आपसी विषय है — पतिदेव को यह समझाना चाहिए कि जिस कामना की पूर्ति के लिए यह किया जा रहा है उसमें उन्हें भी नियमों को मानना चाहिए — न कि इसे नियम से छूट मान लिया जाए। वे जोड़ते हैं कि जो स्त्री 40 दिन का संकल्प न लेकर चालीसा को दैनिक पूजन में ही लेकर चले और नित्य समर्पण करे, उससे भी इष्टाराध्य प्रसन्न होंगे; और यदि संकल्प लिया जाए तो स्त्री शरीर के हेतु बनी मर्यादा के अनुसार, जैसे पुरुष को अपने शरीर के अनुसार, उसे लेकर चलना चाहिए।
घरवाले नाराज हों तो क्या सुबह की पूजा छोड़ देनी चाहिए?
बृहद के बदले लघु सूक्ष्म पूजा — पर पूजा छोड़ना कभी नहीं
घरवाले नाराज हों तो स्त्री की सुबह की पूजा दोपहर या शाम पर टाल देने की प्रसिद्ध संतों की सलाह से वक्ता स्पष्ट असहमति रखते हैं। उनका मत: यदि पतिदेव लंबी पूजा पर बहुत चिल्लाते हैं तो बृहद पूजा के बदले दस मिनट पहले उठकर लघु सूक्ष्म पूजा कीजिए — दीया, धूप, प्रसादी — और परिवार को भेजने के बाद आराम से बैठकर माला जप कीजिए, पूजा छोड़ दीजिए यह नहीं।
यह सुनकर कि विवाहित स्त्री को सुबह पूजन का समय नहीं मिल पाता क्योंकि देर से उठना होता है या पूजा करने पर घर के लोग नाराज हो जाते हैं, वक्ता उस प्रसिद्ध सलाह को अस्वीकार करते हैं — जो वे एक बहुत प्रसिद्ध, करोड़ों अनुयायियों वाले संत की बताते हैं — कि वह अपनी पूजा दोपहर या शाम में कर ले। उनका अपना मत: यदि पतिदेव लंबी पूजा पर बहुत चिल्लाते हैं तो साधिका पूजा छोड़े नहीं, बल्कि उसे दस मिनट पहले उठकर की जाने वाली लघु सूक्ष्म पूजा तक सीमित कर ले — दीया-बाती, धूप और इष्ट को प्रसादी — और परिवार को भेज देने के बाद ही आराम से बैठकर माला जप करे। सार्वजनिक रूप से यह कह देना कि पूजा बाद में कर लो, उनके अनुसार अधिकतर उन्हीं के हाथ प्रमाण दे देता है जो करना ही नहीं चाहते, भले इससे कुछ सच्ची साधिकाओं का पारिवारिक कलह बच जाता हो। वे शास्त्र का सहारा लेते हैं — कि फिर संध्या को दो भागों में बाँटकर प्रातः संध्या में पूजा के लिए क्यों कहा गया — और कहते हैं कि गृहस्थ की मर्यादा सेवा को समय के अनुसार छोटा करके रखी जाए, सेवा छोड़कर नहीं।
पत्नी का आधा दोष पति को मिलने का वायरल कथन, और छूट देने वाले संत ही सबसे प्रसिद्ध क्यों होते हैं
दंपति के बीच कर्म-बँटवारे का वायरल कथन, और स्पष्ट नियम बताने पर मिलने वाली गालियाँ
वक्ता एक बहुत वायरल हुए कथन का उल्लेख करते हैं, जिसमें एक प्रसिद्ध महाराज जी ने कहा कि विवाहिता स्त्री कुछ गलत करे तो उसका आधा दोष पति को मिल जाता है जबकि उसका पुण्य पूरा उसी का रहता है, और पति गलती करे तो पूरा दोष उसी का रहता है पर उसका आधा पुण्य पत्नी को चला जाता है। उनकी टिप्पणी यह है कि ऐसे छूट देने वाले विचार सार्वजनिक रूप से रखने पर व्यवहार में संयम नहीं, छूट ही समझे जाते हैं — और सबसे अधिक प्रसिद्ध वही बाबा होते हैं जो छूट देते हैं।
वक्ता एक वायरल वक्तव्य का वर्णन करते हैं, जो एक प्रसिद्ध महाराज जी ने कहा था, कि यदि विवाहिता स्त्री कुछ गलत कार्य करती है तो उसका आधा दोष पति को मिल जाता है जबकि जो पुण्य वह करती है वह पूरा उसी का रहता है; पर पति गलती करे तो पूरा दोष पति के पास ही रहेगा और उसका आधा पुण्य पत्नी के पास चला जाएगा। उनकी अपनी प्रतिक्रिया यह है कि इस प्रकार के छूट देने वाले विचार सार्वजनिक रूप से रखने पर — भले उनके किसी अंश का प्रमाण कहीं हो — व्यवहार में उन्हें संयम नहीं, केवल छूट ही समझा जाता है, और कुछ बातों को अपनी हद तक भी रखना चाहिए। वे एक व्यापक टिप्पणी जोड़ते हैं: जो जितने नीति-नियम स्पष्ट रूप से बताएगा उसे उतना ही बड़ा पाखंडी कहा जाएगा, जबकि जो सुविधाजनक छूट देते हैं वही बाबा सबसे अधिक प्रसिद्ध होते हैं।
यज्ञोपवीत धारण तो कर लिया पर कभी पवित्र न करवाया जाए तो क्या होता है?
अपवित्र यज्ञोपवीत, और ब्रह्म राक्षस बनने की चेतावनी
वक्ता बताते हैं कि एक बड़े अधिकारी, जिन्होंने यज्ञोपवीत तो धारण किया था पर कभी उसे पवित्र नहीं करवाया, उनसे उन्होंने कहा कि ऐसा न करने पर मरने के बाद ब्रह्म राक्षस बनना पड़ता है। वे कहते हैं कि यह डराना नहीं, संतों और शास्त्रों का प्रमाण है: द्विज होकर वर्षों तक बिना यज्ञोपवीत के रहने पर देव और पितृ दोनों हव्य ग्रहण नहीं करते, और नियम छोड़कर भी जो लोग उन्नति करते दिखते हैं वह उनके पूर्व के कर्मों के पुण्य का फल है।
वक्ता बताते हैं कि उन्होंने राजनीति से जुड़े एक बड़े अधिकारी व्यक्ति से — जो ब्राह्मण थे और जिन्होंने यज्ञोपवीतवैदिक कर्मों में दीक्षा का प्रतीक यज्ञोपवीत (जनेऊ) संस्कार — पीढ़ियों तक न होने पर, इसे पुनः आरंभ करने से पहले हर ज्ञात पीढ़ी के लिए प्रायश्चित आवश्यक है। धारण तो किया था पर कभी उसे पवित्र नहीं करवाया — कहा कि ऐसा न करने पर मरने के बाद ब्रह्मराक्षस बनना पड़ता है। उन पर यह आरोप लगने पर कि वे डरा रहे हैं, वे कहते हैं कि यह डराना नहीं, संतों और शास्त्रों का प्रमाण है: जो द्विज होकर वर्षों तक बिना यज्ञोपवीत के रहता है, उसके देव और पितृ दोनों हव्य ग्रहण नहीं करते, और वहाँ से न अपनी उन्नति होती है न परिवार की। वे एक व्यापक सावधानी जोड़ते हैं: लोग किसी को नियम छोड़कर भी दिन दूना रात चौगुना बढ़ते देखकर यह मान लेते हैं कि नियम का महत्व नहीं — पर वह वृद्धि, वे कहते हैं, उस व्यक्ति के पूर्व के पुण्यों का फल है, नियम छोड़ने की सुरक्षा का प्रमाण नहीं। उनकी सलाह यही है कि जितना सामर्थ्य हो उतना नियम के भीतर रहकर कीजिए, भले पाँच मिनट का हो — नियम से परे जाकर नहीं।
यदि वैदिक हवन वास्तव में सामर्थ्य से बाहर हो तो क्या करें?
कलिकाल की छूट — तंत्रोक्त या साबर हवन
जहाँ वैदिक हवन के नियम वास्तव में सामर्थ्य से बाहर हों, वहाँ वक्ता कहते हैं कि परंपरा स्वयं कलिकाल के हेतु छूट देती है: तंत्रोक्त हवन या साबर मंत्र का हवन तो किया ही जा सकता है, और किसी न किसी माध्यम से परिवार का कल्याण किया जा सकता है — बशर्ते इस छूट को कुछ भी न करने का बहाना न बना लिया जाए।
वक्ता कहते हैं कि जहाँ वैदिक हवन का पालन वास्तव में सामर्थ्य से बाहर हो — अधिकार, दीक्षा या क्षमता के कारण — वहाँ शास्त्र स्वयं कलिकाल के अनुरूप छूट देता है: हवन पूर्ण वैदिक रीति से न हो सके तो तंत्रोक्त हवन या सबर मंत्र का हवन तो किया ही जा सकता है। किसी न किसी माध्यम से, वे कहते हैं, अपने परिवार का कल्याण किया जा सकता है — और ऐसा करते हुए अपने अधिकार का हनन भी न हो, इस पर वे ज़ोर देते हैं। जो लोग एक ओर छूट देते हैं और उसी साँस में किसी भी भक्ति-प्रयास से रोक देते हैं, उनकी वे आलोचना करते हैं और इसे परस्पर विरोधी बताते हैं।
क्या महामृत्युंजय कवच का एक से अधिक बार पाठ किया जा सकता है?
बार-बार कवच पाठ के बदले शिव रक्षा स्तोत्र का अनुष्ठान
महामृत्युंजय कवच एक से अधिक बार न पढ़ने की पंडित जी की चेतावनी उसके बीजात्मक पाठ से जुड़ी है, जिसकी ऊर्जा स्त्री, यज्ञोपवीत धारण न करने वाला, या नीति-नियम के अनुसार न रह सकने वाला व्यक्ति सहन नहीं कर सकता। ऐसे व्यक्ति को उसके स्थान पर शिव रक्षा स्तोत्र का अनुष्ठान करना चाहिए, जो पौराणिक भी है और तंत्रोक्त भी।
एक पंडित जी ने चेताया था कि महामृत्युंजय कवच का एक से अधिक बार पाठ नहीं करना चाहिए क्योंकि उसकी ऊर्जा सहन नहीं की जा सकती — यह सुनकर वक्ता बताते हैं कि यह विशेष रूप से उसके बीजात्मक पाठ से संबंधित है। स्त्री, यज्ञोपवीतवैदिक कर्मों में दीक्षा का प्रतीक यज्ञोपवीत (जनेऊ) संस्कार — पीढ़ियों तक न होने पर, इसे पुनः आरंभ करने से पहले हर ज्ञात पीढ़ी के लिए प्रायश्चित आवश्यक है। धारण न करने वाला, या जो नीति-नियम के अनुसार न रह सके — ऐसे व्यक्ति को उस कवच के बार-बार पाठ से उसे सिद्ध करने का प्रयास नहीं करना चाहिए। उसके स्थान पर ऐसे व्यक्ति को शिव रक्षा स्तोत्र का अनुष्ठान करना चाहिए, जो पौराणिक भी है और तंत्रोक्त भी, और जिससे वही रक्षा प्राप्त होगी जो वह चाहता है — क्योंकि महामृत्युंजय पूर्ण वैदिक हैं, और तंत्रोक्त महामृत्युंजय में इतने अधिक बीज मंत्र होते हैं कि एक भी बीज मंत्र ऊँच-नीच हो जाए तो गलत असर पड़ सकता है।
आत्मरक्षा में किसी की मृत्यु हो जाए तो क्या दोष लगता है?
आत्मरक्षा के हेतु हुई मृत्यु में दोष नहीं लगता
यदि किसी की मृत्यु अपने हाथ से केवल आत्मरक्षा में हो जाए तो कोई दोष नहीं लगता — सनातन धर्मग्रंथ और ऋषि-मुनि कहते हैं कि आत्मरक्षा के हेतु हुई मृत्यु में दोष नहीं लगता, और कानून भी सच्ची आत्मरक्षा के लिए वैसी ही छूट देता है। ईश्वर के सामने तो प्रमाण की आवश्यकता ही नहीं, क्योंकि उन्हें पता है कि हत्या आत्मरक्षा के हेतु हुई।
यदि किसी की मृत्यु अपने हाथ से केवल आत्मरक्षा में हो जाए तो किस प्रकार का दोष लगेगा, यह पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि कोई दोष नहीं लगता। सनातन संस्कृति के अनुसार, जैसा धर्मग्रंथों और ऋषि-मुनियों ने कहा है, केवल आत्मरक्षा के हेतु हुई मृत्यु में दोष नहीं लगता; वे कहते हैं कि कानून भी सच्ची आत्मरक्षा के लिए वैसी ही छूट देता है, यद्यपि उसे न्यायालय में प्रमाणित करना पड़ता है। ईश्वर के सामने, वे कहते हैं, ऐसे प्रमाण की आवश्यकता नहीं, क्योंकि उन्हें पहले से पता है कि हत्या आत्मरक्षा के हेतु हुई। वे जोड़ते हैं कि फिर भी निवृत्ति के हेतु कुछ करना हो तो उसी के लिए व्रत-उपवास इत्यादि हैं।
क्या गाय के गोबर के उपले पर श्री सूक्त की आहुति केवल शुद्ध घी से दी जा सकती है?
केवल घी (या मिश्री सहित) से आहुति चलेगी, पर पंचभू संस्कार फिर भी आवश्यक
गाय के गोबर के उपले पर श्री सूक्त के मंत्रों से आहुति केवल शुद्ध घी से, या घी में मिश्री मिलाकर भी दी जा सकती है, बशर्ते व्यक्ति ने उच्चारण और स्वर का ज्ञान सीखा हो या स्वयं अभ्यास किया हो। चूँकि यह वैदिक सूक्त है, पंचभू संस्कार तथा शेष वैदिक विधि का पालन फिर भी करना पड़ेगा।
गाय के गोबर के उपले पर रोज़ श्री सूक्त के मंत्रों से आहुति केवल शुद्ध घी से दी जा सकती है या नहीं, यह पूछे जाने पर वक्ता पुष्टि करते हैं कि दी जा सकती है — या घी में मिश्री मिलाकर भी — बशर्ते व्यक्ति यज्ञोपवीतवैदिक कर्मों में दीक्षा का प्रतीक यज्ञोपवीत (जनेऊ) संस्कार — पीढ़ियों तक न होने पर, इसे पुनः आरंभ करने से पहले हर ज्ञात पीढ़ी के लिए प्रायश्चित आवश्यक है। धारण करता हो और उसने उच्चारण-स्वर इत्यादि का ज्ञान सीखा हो या स्वयं अभ्यास किया हो। पर चूँकि यह वैदिक सूक्त है, पंचभू संस्कार इत्यादि तथा शेष वैदिक विधि का पालन साथ में करना ही पड़ेगा।
क्या एक साल में 108 बार दुर्गा सप्तशती पढ़ने का संकल्प लिया जा सकता है?
साल भर का सप्तशती संकल्प संभव है, पर नियम-पालन में कोई छूट नहीं
एक साल में 108 बार दुर्गा सप्तशती पढ़ने का संकल्प अवश्य लिया जा सकता है, पर स्पष्ट और निर्दोष उच्चारण तथा पूरे समय ब्रह्मचर्य और खान-पान का नियम-पालन अनिवार्य है, क्योंकि यह सतचंडी विधान में आ जाता है। भगवती की जो छूट है — कि अनजाने में की गई पूजा भी स्वीकार होगी — वह चैत्र या शारदीय नवरात्र की वार्षिकी पूजा के लिए कही गई है, उससे बाहर स्वतंत्र रूप से किए जाने वाले पाठ के लिए नहीं।
एक साल में 108 बार दुर्गा सप्तशती पढ़ने का संकल्प लेने से लाभ के बजाय साधक पागल हो सकता है — जैसा प्रश्नकर्ता से लोगों ने कहा था — यह पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि यह अवश्य किया जा सकता है। पर सबसे पहले उच्चारण स्पष्ट और निर्दोष होना चाहिए, साथ ही पूरे समय ब्रह्मचर्य तथा खाना-पीना, रहना-सोना सब का नियम-पालन, क्योंकि यह सतचंडी विधान में आ जाएगा और इसमें अंग पूजन भी सीखकर करना चाहिए। कलश साल भर रखा जा सकता है, बशर्ते नियम भी साल भर निभाए जाएँ। वे चेताते हैं कि सप्तशती की किताब को केवल खोलकर शुरू से आखिर तक पढ़ देना पाठ नहीं है। जगदंबा ने द्वादश अध्याय में जो कहा है — कि जान-अनजाने में भी की गई बलि, हवन, पूजन वे ग्रहण करेंगी — वह विशेष रूप से चैत्र या शारदीय की वार्षिकी पूजा के लिए कहा गया है, कलश स्थापना सहित, न कि उससे बाहर स्वतंत्र रूप से किए जाने वाले पाठ के लिए। उनकी सलाह है कि साल भर का चक्र लेने से पहले एक-एक अध्याय का उच्चारण ठीक से सीख लिया जाए। वे यह भी जोड़ते हैं कि विधोक्त अनुष्ठान केवल माला जप से नहीं होता — मंत्र, माला और दिशा जान लेना ही पर्याप्त नहीं है।
लापरवाह साधना का परिणाम बाद में क्यों सामने आता है?
मंत्र दोष और श्राप जो बाद में, परिवार पर प्रकट होते हैं
ठीक विधि से करने पर भी तुरंत परिणाम नहीं मिलता — पुण्य संचित होकर बाद में फलता है, और कई बार वह स्वयं पर नहीं बल्कि बाल-बच्चों या पति-पत्नी पर भोगना पड़ता है, जब यह समझ ही नहीं आता कि कौन सा अपराध हुआ था। मंत्र दोष, देव दोष, देव श्राप और मंत्र श्राप इसीलिए खतरनाक हैं कि वे सामने आकर पहले से कुछ नहीं कहते।
वक्ता चेताते हैं कि पूरे विधि-विधान से करने पर भी तुरंत परिणाम नहीं मिलता — जो पुण्य होता है वह प्रायः बाद में फलता है, और कई बार स्वयं पर नहीं बल्कि अपने बाल-बच्चों या पति-पत्नी पर भोगना पड़ता है, और उस समय यह समझ में भी नहीं आता कि ऐसा कौन सा अपराध हुआ था। मंत्र दोष, देव दोष, देव शाप और मंत्र श्राप, वे कहते हैं, इसीलिए बहुत खतरनाक होते हैं कि कोई सामने से आकर पहले से बता नहीं देता।
प्रत्यक्ष गुरु प्राप्ति के लिए कौन सी साधना करें?
प्रत्यक्ष गुरु प्राप्ति के हेतु भगवान दत्त की उपासना
प्रत्यक्ष गुरु प्राप्ति चाहने वाले के लिए वक्ता भगवान दत्त (दत्तात्रेय) की उपासना करते हुए यथाशक्ति उनका परायण करने की सलाह देते हैं।
जो प्रत्यक्ष गुरु प्राप्ति करना चाहते हैं, उनके लिए वक्ता भगवान दत्त — दत्तात्रेय — की उपासना करते हुए यथाशक्ति उनका परायण करने की सलाह देते हैं।
विंध्यवासिनी चालीसा का चक्र-विधि पाठ मधु के भोग के साथ बेहतर रहेगा
चक्र-विधि चालीसा पाठ के साथ मधु का भोग
माँ विंध्यवासिनी चालीसा का चक्र-विधि से पाठ किया जा सकता है या नहीं और उसमें मधु का भोग लगाना पड़ेगा या नहीं, यह पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि लगाइएगा तो अच्छा रहेगा।
माँ विंध्यवासिनी चालीसा का चक्र-विधि से पाठ किया जा सकता है और क्या उसमें मधु का भोग लगाना पड़ेगा, यह पूछे जाने पर वक्ता संक्षेप में उत्तर देते हैं कि मधु का भोग लगाइएगा तो अच्छा रहेगा।
उधारी वसूलने के लिए आकर्षण की साधना पूछे जाने पर वे मना करके इष्ट की साधना की ओर मोड़ देते हैं
उधारी वसूली के लिए कोई विशेष आकर्षण साधना नहीं बताई जाती
एक व्यक्ति, जो उधारी वसूलने का काम करता है, ऐसी साधना पूछता है जिससे लोग उसे देखते ही मोहित-आकर्षित हो जाएँ और उसके बोलने का प्रभाव पड़े — वक्ता कोई साधना नहीं बताते: वे कहते हैं कि इससे अधिक ज़रूरी यह है कि जिससे वसूली करने जा रहे हैं उसके पास पैसा हो कि वह दे सके। अपने इष्ट आराध्य की साधना यथाशक्ति की जा सकती है — और वे टिप्पणी करते हैं कि प्रश्नकर्ता बहुत उतावले प्रतीत हो रहे हैं।
एक दर्शक, जिसका काम उधारी वसूलना है, पूछते हैं कि ऐसी कौन सी साधना करें कि लोग उन्हें देखते ही मोहित-आकर्षित हो जाएँ और उनके बोलने पर प्रभाव पड़े। वक्ता इसके लिए कोई आकर्षण प्रयोग नहीं बताते। वे कहते हैं कि इससे ज़्यादा ज़रूरी यह है कि जिससे वसूली करने जा रहे हैं उसके पास पैसा हो — मोहित-आकर्षित हो भी जाएँ तो पैसा ही नहीं होगा तो देंगे कहाँ से। वे प्रश्नकर्ता से कहते हैं कि अपने इष्ट आराध्य की साधना यथाशक्ति कर सकते हैं, और टिप्पणी करते हैं कि प्रश्नकर्ता उन्हें बहुत उतावले प्रतीत हो रहे हैं।
मंदिर बनवाने का उद्देश्य होते हुए भी परिवार के भरण-पोषण का दायित्व बना रहता है
जीवन का उद्देश्य मंदिर बनवाना, पर साथ में भरण-पोषण का दायित्व भी
एक दर्शक कहते हैं कि उनके जीवन का एक ही उद्देश्य है कि वे मंदिर बनाएँ और सपरिवार माँ की सेवा करें — वक्ता इसे बहुत अच्छी बात कहते हैं, पर स्मरण कराते हैं कि अपने परिवार का भरण-पोषण भी उनका एक उद्देश्य और दायित्व है, और मंदिर बनवाने का उद्देश्य उसके साथ लेकर चलना चाहिए, उसके बदले नहीं।
एक दर्शक कहते हैं कि उनके जीवन का एक ही उद्देश्य है कि मंदिर बनाएँ और सपरिवार माँ की सेवा करें। वक्ता इसे बहुत अच्छी बात कहते हैं, पर जोड़ते हैं कि उस उद्देश्य के साथ-साथ अपने पारिवारिक भरण-पोषण का भी एक उद्देश्य और दायित्व है, जिसकी जिम्मेदारी भी उन्हीं के ऊपर है। दोनों को, वे कहते हैं, साथ लेकर चलना चाहिए।
काम भावना पर नियंत्रण वास्तव में कैसे स्थापित होता है?
सत्संग और देखने-सुनने-सोचने के नियंत्रण से काम पर नियंत्रण
काम भावना पर नियंत्रण सबसे पहले अपने आचरण और संगत से आरंभ होता है, क्योंकि जिस चीज का दिन-रात चिंतन किया जाता है वह अंततः बैकग्राउंड में स्वयं चलती रहती है; उपाय है सत्संग और स्तुति का गान, जिससे मन मजबूत हो, तथा अपने पौरुष, तेज और शुक्र को जानकर उन्हें नियंत्रित करना सीखना। सबसे बड़ी बात यह है कि हम क्या देख रहे, सुन रहे और सोच रहे हैं — इन तीनों को नियंत्रित कर दीजिए तो काम पर भी नियंत्रण हो जाएगा।
काम भावना पर नियंत्रण कैसे हो, यह पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि यह सर्वप्रथम अपने आचरण और संगत से आरंभ होता है, क्योंकि जिस चीज का दिन-रात चिंतन किया जाता है उसे बाद में चिंतन करने की आवश्यकता भी नहीं पड़ती, वह बैकग्राउंड में चलती रहती है। उपाय यह है कि पहले अपने विचार को एकाग्र करके उसकी दिशा मोड़ी जाए — सत्संग और स्तुति के गान के द्वारा, ऐसे संतों का सत्संग सुनकर जिनका प्रभाव मन पर पड़े और मन मजबूत हो — क्योंकि सचमुच संयत व्यक्ति वही है जो अपने मन को जब चाहे जिधर चाहे मोड़ दे, न कि जो ज़रा-सी बात पर इधर से उधर हो जाए। वे जोड़ते हैं कि अपने भीतर के पौरुष को, तेज को और शुक्र की गति को जानना और उसे नियंत्रित करना सीखना चाहिए, क्योंकि उसकी अधिकता से मन अनियंत्रित हो जाता है। सबसे बड़ी बात, वे कहते हैं, यह है कि हम क्या देख रहे हैं, सुन रहे हैं, सोच रहे हैं — इन तीनों को नियंत्रित कर दीजिए तो काम पर भी नियंत्रण हो जाएगा; बाद में कुछ नष्ट हो जाने पर आत्मग्लानि से कोई लाभ नहीं।
क्या उग्र बीज मंत्र गुरु के विशेष आदेश के बिना लिया जा सकता है?
उग्र बीज मंत्र के लिए पहले दीक्षा, और उससे पहले काली कवच का अनुष्ठान
बहुत उग्र बीज मंत्र का अधिकाधिक जप तभी करना चाहिए जब विधि-विधान से उसकी दीक्षा हो चुकी हो। जो पहले से गुरु-दीक्षित हैं वे गुरु आज्ञा लेकर आगे बढ़ें, पहले भगवती काली के कवच का अनुष्ठान पूरा करें, और उसके बाद यथाशक्ति जप करें।
एक विशेष बीज (बीज मंत्र) के बहुत उग्र होने की बात पर वक्ता कहते हैं कि ऐसे मंत्रों का अधिकाधिक जप तभी करना चाहिए जब विधि-विधान से दीक्षा हो चुकी हो। जो पहले से गुरु-दीक्षित हैं वे गुरु आज्ञा लेकर आगे बढ़ें — या यदि गुरु ने उस मंत्र का उपदेश दे ही दिया हो तो सीधे आरंभ कर सकते हैं — पहले भगवती काली के कवच का अनुष्ठान कर लें, और उसके बाद ही यथाशक्ति जप आरंभ करें।
जीवन के निर्णय ज्योतिष देखकर लें या केवल अपने आराध्य पर विश्वास करके?
ज्योतिष और तंत्र साधना परस्पर पूरक विद्याएँ हैं, प्रतिस्पर्धी नहीं
ज्योतिष को "वेदों का नेत्र" कहा गया है और उसकी तंत्र से तुलना करना ही उचित नहीं — दोनों एक दूसरे की पूरक विद्याएँ हैं। इष्ट आराध्य की पूजा श्रद्धा का विषय है और ज्योतिष ज्ञान का, और तंत्र साधक को जो सिद्धियाँ मिलती हैं वे भी उन्हीं बारह भावों के बीच रहती हैं जिन्हें ज्योतिष पढ़ता है; पर ज्योतिषी की सटीकता जन्म-विवरण के सही होने पर भी निर्भर है, और जन्म समय में ज़रा-सा अंतर पूरा फल-कथन बदल सकता है।
जीवन के निर्णय ज्योतिष को फॉलो करके लेने चाहिए या केवल अपने इष्ट आराध्य के पूजन-अर्चन पर विश्वास करके, यह पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि यह इस पर निर्भर करता है कि अपने इष्ट आराध्य के प्रति समर्पण की भावना कैसी है। ज्योतिष को, वे कहते हैं, वेदों का नेत्र कहा गया है, और नेत्र की किसी से तुलना नहीं की जा सकती — दोनों एक दूसरे की पूरक विद्याएँ हैं, प्रतिस्पर्धी नहीं। ज्योतिषी की अपनी सटीकता उसके अपने ज्ञान और सामर्थ्य पर निर्भर है; दैवज्ञ को भी दैवज्ञता बिना साधना के प्राप्त नहीं होती, और तंत्र साधक को जो सिद्धियाँ मिलती हैं वे भी उन्हीं बारह भावों के बीच रहती हैं जिन्हें ज्योतिष पढ़ता है। पूजा — श्रद्धाकिसी देवता, गुरु अथवा साधना में श्रद्धा और आदरपूर्ण विश्वास — पितरों के लिए किए जाने वाले श्राद्ध कर्म से भिन्न। का विषय — और ज्योतिष — ज्ञान का विषय — साथ चलते हैं, और किसी एक को श्रेष्ठ कहना, वे कहते हैं, मूर्खता और अज्ञानता है। वे जोड़ते हैं कि यदि कोई अपने आराध्य पर विश्वास करके निर्णय लेने जा रहा है तो वह भी उसकी जन्म कुंडली में स्पष्ट रूप से अंकित रहता है। वे ज्योतिष की सीमा एक हाल के उदाहरण से समझाते हैं: जिस परिवार को वे देख रहे थे उसमें जन्म तिथि छह की है या सात की, इसी का भ्रम रह गया, क्योंकि रात 12:25 का जन्म संधि पर पड़ गया — और इस छोटे से भ्रम के कारण वे स्वयं भी निश्चय से नहीं कह पाए कि दोनों में से कौन सी कुंडली सही है, क्योंकि जन्म समय में ज़रा-सा अंतर भी पूरे फल-कथन को गलत कर देता है।
दुर्गा सप्तशती के कौन से भाग अंगों के बिना स्वतंत्र रूप से पढ़े जा सकते हैं?
कुछ स्तुतियाँ और एकादश अध्याय स्वतंत्र रूप से पढ़े जा सकते हैं
दुर्गा सप्तशती के एकादश अध्याय का नित्य पाठ अवश्य किया जा सकता है; स्वतंत्र रूप से पढ़ने पर छह अंगों के साथ पढ़ना अनिवार्य नहीं है। यही बात रात्रि सूक्तम, चतुर्थ और पंचम अध्याय की स्तुतियों, तंत्रोक्त देवी सूक्तम, तथा एकादश-द्वादश अध्याय की स्तुतियों और फल-कथन पर लागू होती है, और कवच, अर्गला तथा कीलक भी अलग-अलग पढ़े जा सकते हैं।
वक्ता पुष्टि करते हैं कि दुर्गा सप्तशती के एकादश अध्याय का नित्य पाठ बिल्कुल किया जा सकता है। जब उसे पूरे पाठ के अंग के रूप में नहीं बल्कि स्वतंत्र रूप से पढ़ा जाए, तब छह अंगों का साथ होना आवश्यक नहीं। वे इसे एक सूची तक बढ़ाते हैं: रात्रि सूक्तम्, चतुर्थ और पंचम अध्याय की स्तुति, तांत्रोक्त देवीसूक्तम्, तथा एकादश और द्वादश अध्याय की स्तुतियाँ और फल-कथन — ये सब अंगों के बिना स्वतंत्र रूप से पढ़े जा सकते हैं — और कवच, अर्गला तथा कीलक भी इसी प्रकार अलग-अलग पढ़े जा सकते हैं।
अर्चन का क्या महत्व है, और क्या उससे विग्रह जागृति संभव है?
भगवती को अर्चन प्रिय, और अधिकाधिक सेवा से विग्रह जागृति
कहा गया है कि भगवती को अर्चन बहुत प्रिय है, जैसे महादेव को अभिषेक। विग्रह जागृति मूलतः भाव का विषय है, जो अधिकाधिक सेवा और अनुष्ठान के द्वारा संभव होती है — इसके लिए वे सप्तशती के बारहवें अध्याय में जगदंबा के इस वचन का हवाला देते हैं कि जहाँ नित्य उनका पाठ होगा उस स्थान का वे कभी त्याग नहीं करेंगी।
क्या अर्चन से विग्रह जागृति संभव है और अर्चन का क्या महत्व बताया गया है, यह पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि भगवती को अर्चन बहुत प्रिय कहा गया है, जैसे महादेव को अभिषेकजल और अन्य निर्धारित द्रव्यों से देवता की प्रतिमा या प्रतीक का विधिवत स्नान कराना। बहुत प्रिय है। जहाँ तक भौतिक दृष्टि से जागृति की बात है, वे इसे मूलतः भाव का विषय बताते हैं, जो अधिकाधिक सेवा और अनुष्ठान के द्वारा संभव होती है। वे सप्तशती के बारहवें अध्याय में जगदंबा के इस वचन का हवाला देते हैं कि जहाँ भी नित्य उनका पाठ होगा उस स्थान का वे कभी त्याग नहीं करेंगी — इसलिए जहाँ ऐसा पाठ चलता रहे वहाँ ऐसी जागृति संभव है।
यंत्र वास्तव में किस धातु पर बना होना चाहिए?
यंत्र की धातु, और उभरा बनाम गुदा हुआ का भ्रम
यंत्र ठीक से ताँबे, चाँदी, सोने, या भोजपत्र पर बना होना चाहिए; भोजपत्र वाले यंत्र की पूजा तो हो सकती है पर अभिषेक नहीं। "उभरा" बनाम "गुदा हुआ" एक भ्रमित करने वाला और लगभग निरर्थक भेद है, क्योंकि मेरु पृष्ठ हर प्रकार के यंत्र और हर धातु का होता है, केवल श्री यंत्र या स्फटिक का नहीं। बाजार में मिलने वाले रंग-बिरंगे डिजाइन वाले 24 कैरेट गोल्ड यंत्र के बनने का कोई विधि-निषेध नहीं होता और उनसे कोई विशेष फल नहीं मिलता।
यंत्र उभरा हुआ होना चाहिए या बाजार में टीन की प्लेट पर गुदा हुआ यंत्र चलेगा, और उसका कोई माप होता है क्या — यह पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि यंत्र ठीक से ताँबे, चाँदी या सोने पर बनना चाहिए — या चौथा विकल्प भोजपत्र, यद्यपि भोजपत्र वाले यंत्र की सेवा-पूजा तो हो सकती है पर अभिषेक नहीं हो पाएगा, और वह शीशे में रहेगा या धारण करने हेतु चाँदी के कवच में रखा जाता है, सीधे स्पर्श में नहीं। "उभरा" बनाम "गुदा हुआ", वे कहते हैं, वास्तव में भ्रमित करने वाला पर लगभग अप्रासंगिक भेद है: उभरा हुआ मेरु पृष्ठ रूप हर प्रकार के यंत्र और हर धातु का होता है, केवल श्री यंत्र का या केवल स्फटिक का नहीं। जिसे वे स्पष्ट रूप से अस्वीकार करते हैं वह है बाजार में मिलने वाला रंग-बिरंगे डिजाइन वाला 24 कैरेट गोल्ड यंत्र — ऐसे यंत्रों के बनने का, वे कहते हैं, कोई विधि-निषेध नियम नहीं होता और उनसे कोई विशेष फल प्राप्त नहीं होता, चाहे वे दिखने में कितने ही आकर्षक हों।
यंत्र बनाने पर लागू होने वाले नक्षत्र, होरा और सामग्री के नियम
नक्षत्र, होरा और सामग्री के वे नियम जिन्हें मशीन का यंत्र छोड़ देता है
यंत्र बनाने के लिए जानना पड़ता है कि वह किस नक्षत्र में आरंभ हो, किस होरा में शुरू और किसमें समाप्त, बीच में रुकना है या नहीं, भोजपत्र कौन से रंग का हो, कलम और स्याही किस चीज की हो, और वह किस प्रयोजन के लिए है — पूजन, स्थापन, धारण या रक्षण — क्योंकि प्रयोजन के अनुसार आवरणों की संख्या और उसके बनने में लगने वाले दिन बदल जाते हैं।
यंत्र निर्माण की बात जारी रखते हुए वक्ता कहते हैं कि इसमें केवल धातु से कहीं अधिक जानना पड़ता है। वह किस नक्षत्र में आरंभ होगा; किस होरा में शुरू और किस होरा में समाप्त; बीच में रुकना है या एक ही बैठक में पूरा करना है; यदि भोजपत्र पर बनना है तो कौन से रंग का भोजपत्र; बनाने के समय साधक की स्थिति कैसी हो; कलम स्वर्ण की हो या किसी पेड़ के तने से बनी, और वह सामग्री किस विधि से लाई जाए; स्याही किन चीजों को मिलाकर बनेगी, और उस स्याही को अभिमंत्रण करना है या नहीं। और सबसे महत्वपूर्ण, यंत्र किस प्रयोजन के लिए है — देव विग्रह पूजन, स्थापन, धारण, या रक्षण — क्योंकि प्रयोजन के अनुसार उसका निर्माण बदल जाता है। उसमें कितने आवरण हैं, इसी से यह तय होता है कि वह कितने दिनों में पूर्ण होना चाहिए। वे यह भी बताते हैं कि समय के नियम परिस्थिति के अनुसार बदलते हैं: आपात स्थिति में यंत्र बनाना हो तो जानना पड़ेगा कि तंत्र शास्त्र के अनुसार गुरु अस्त में किसका यंत्र बनता है और किस समय बनता है।
एक मिनट में बन जाने वाला यंत्र उस विधि को छोड़ देता है जिससे उसे फल मिलता है
मशीन से बने यंत्र बनाम हाथ से विधिपूर्वक बने यंत्र
जो यंत्र कारखाने में कुछ मिनटों में बन जाता है और जिनमें एक घंटे में हजारों बनते हैं, उसमें समय और सामग्री का कोई नियम नहीं लगता, इसलिए वह मन की संतुष्टि से अधिक कुछ नहीं देता। जो पुराने जानकार स्वर्णकार उत्कीर्णन की सही विधि जानते हैं और मांस-मदिरा का सेवन नहीं करते, वे हाथ से पूरी सावधानी के साथ बनाते हैं; और जिनके पास सामर्थ्य है वे मैन्युफैक्चरिंग यूनिट से अपने पंडित जी के बताए समय पर विशेष रूप से बनवा लेते हैं।
यंत्र के समय-नियमों की पिछली चर्चा को आगे बढ़ाते हुए वक्ता बताते हैं कि जो यंत्र कारखाना दो-चार मिनट में बना देता है — और जिसमें एक मिनट में कई हजार बनकर तैयार हो जाते होंगे — उसमें इतना कम बल क्यों होता है: उसमें निर्माण पर लागू होने वाला समय या सामग्री का कोई नियम नहीं लगता, इसलिए वह असली फल नहीं, केवल मन की संतुष्टि देता है। जिन्हें जानकारी नहीं है वे ले लें तो अलग बात है, पर जानकारी होकर भी ऐसा नहीं करना चाहिए। इसके विपरीत, वे कहते हैं, जो पुराने जानकार स्वर्णकार उत्कीर्णन की सही विधि जानते हैं — और जो स्वयं मांस-मदिरा का सेवन नहीं करते, और दक्षिण के ब्राह्मण तो इन सभी बातों को लेकर विशेष रूप से सचेत होते हैं और हाथ से ऐसा बनाते हैं जैसा मशीन से नहीं बन सकता — वे पूरी सावधानी के साथ हाथ से बनाते हैं, यद्यपि वे भी तंत्र शास्त्र का हर नियम मानकर नहीं बनाते; जिन दो-तीन को उन्होंने देखा है, उनका आग्रह यह रहता है कि सब एक ही बैठक में, शुभ दिनों में पूरा हो जाए। और जिनके पास सामर्थ्य है, वे जोड़ते हैं, वे मैन्युफैक्चरिंग यूनिट से बात करके अपने पंडित जी के बताए ठीक समय पर बनवा लेते हैं — पूरा स्लॉट बुक करा लेते हैं, जैसा सामान्य खरीदार कभी नहीं कर सकता — और इसी से ऐसे विशेष यंत्रों का प्रभाव अलग होता है, जबकि सामान्य व्यक्ति जिसे यंत्र का विधि-नियम भी पता नहीं वह तो पंडित जी को रखकर नित्य पूजन करवा लेगा।
गंगा का यंत्र वास्तव में किस काम में आता है?
गंगा का स्वतंत्र यंत्र है, पर प्रयोग अधिकतर अस्थायी पितृ शांति में
जिनकी इष्ट माता गंगा हैं वे भगवती से संबंधित, महादेव से संबंधित या नारायण से संबंधित यंत्र रख सकते हैं — क्योंकि शिव जी के आवरण में और भगवती के यंत्र में भी भगवती गंगा विराजती हैं — इसके अतिरिक्त उनका स्वतंत्र यंत्र भी है। पर वक्ता कहते हैं कि उनकी जानकारी में गंगा का यंत्र किसी ने स्थायी रूप से स्थापित नहीं किया; उनके अनुभव में इसका प्रयोग अधिकतर अस्थायी रूप से पितृ शांति के लिए होता है।
माता गंगा मैया इष्ट हों तो कौन सा यंत्र रखें, यह पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि भक्त भगवती से संबंधित, महादेव से संबंधित या नारायण से संबंधित यंत्र रख सकते हैं, क्योंकि शिव जी के आवरण में भगवती गंगा विराजती हैं और भगवती के यंत्र में भी, और इसके अतिरिक्त उनका पूर्णतः स्वतंत्र यंत्र भी है। वे बताते हैं कि स्वतंत्र रूप से आज तक किसी ने इसके बारे में पूछा नहीं; उनके अनुभव में इसका प्रयोग स्थायी नहीं, अधिकतर अस्थायी रूप से पितृ शांति के हेतु होता है, और उनकी जानकारी में श्राद्ध के रूप में इसकी स्थापना आज तक किसी ने नहीं की।
माँ शेरावाली के साथ कभी-कभी शेर के बजाय बाघ क्यों दिखाया जाता है?
भगवती के अलग-अलग स्वरूपों के वाहन अलग-अलग — शेर या बाघ
भगवती "शेरावाली" कोई एक निश्चित स्वरूप नहीं है; अष्टभुजा स्वरूप में भगवती के अनेक विग्रह हैं, जिनमें भगवती कौशिकी और कौशांबी भी हैं, और हर स्वरूप का अपना वाहन — शेर या बाघ — उसी अनुसार अलग-अलग होता है।
माँ शेरावाली के साथ कभी-कभी शेर के बजाय बाघ क्यों दिखाया जाता है, यह पूछे जाने पर वक्ता बताते हैं कि "शेरावाली" स्वयं कोई एक निश्चित स्वरूप नहीं है। अष्टभुजा स्वरूप में भगवती के अनेक विग्रह हैं — जिनमें भगवती कौशिकी और कौशांबी भी हैं — और इनमें से हर स्वरूप का अपना विशेष वाहन, शेर या बाघ, उसी अनुसार होता है।
कमजोर संवाद-कौशल या कला-क्षमता के लिए कौन सी साधना करें?
संवाद-कौशल और कलाकारी दोनों के लिए गणपति की उपासना
जिनका संवाद-कौशल कमजोर है, उनके लिए वक्ता यथाशक्ति गणपति की उपासना की सलाह देते हैं, और कहते हैं कि इससे बुध मजबूत होंगे, कम्युनिकेशन स्किल अच्छा होगा, और गणपति की कृपा से बुद्धि भी तीव्र हो जाएगी। आगे चलकर संगीत और चित्रकला में पारंगत होने के विषय में पूछे जाने पर वे फिर विद्याधर साधना — यानी गणपति जी की साधना — की ओर संकेत करते हैं।
जिनका कम्युनिकेशन स्किल अच्छा नहीं है, उनके लिए वक्ता भगवान गणेश की यथाशक्ति उपासना की सलाह देते हैं; इससे, वे कहते हैं, बुध मजबूत होंगे, कम्युनिकेशन स्किल अच्छा होगा, और गणपति की कृपा से बुद्धि भी तीव्र हो जाएगी। इसी लाइव में आगे, संगीत और चित्रकला में पारंगत होने के लिए कौन सा मंत्र या स्तोत्र है, यह अलग से पूछे जाने पर वे फिर विद्याधर साधना — यानी गणपति जी की साधना — की ओर संकेत करते हैं, कलाकारी के लिए भी वही प्रासंगिक साधना बताते हुए।
क्या बिना माला और बिना गिनती के पंचाक्षरी का जप किया जा सकता है?
बिना उच्चारण, समय के अनुसार किया गया जप बिना गिनती के भी मान्य
बिना माला और बिना मंत्रों की गिनती के पंचाक्षरी का जप — एक-दो घंटे का समय लेकर, बिना उच्चारण किए, ध्यान इत्यादि के साथ — किया जा सकता है। इसका कोई नियम-निषेध नहीं है, और गिनती छोड़ देने से कोई हानि नहीं हो रही।
क्या पंचाक्षरी मंत्र को बिना माला के, मंत्रों की संख्या के बजाय केवल समय — एक या दो घंटे — का ध्यान रखकर जपा जा सकता है और क्या उस तरह भी मंत्र सिद्ध होगा, यह पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि यह किया जा सकता है: सामान्यतः बिना उच्चारण किए हुए, एक-दो घंटे का समय लेकर ध्यान इत्यादि के साथ जप करना चाहें तो कर सकते हैं। इसमें कोई नियम-निषेध नहीं है, और गिनती छोड़ देने से कोई हानि नहीं हो रही।
एकाक्षरी मंत्र के स्वरूप में ज़रा सा अंतर हो तो क्या फर्क पड़ता है?
स्वर में ज़रा सा फेरबदल एकाक्षरी मंत्र के ऋषि और छंद बदल देता है
भवानी मंत्र का जो स्वरूप सबसे प्रामाणिक है, उसका प्रमाण तंत्र ग्रंथों से दिया जा सकता है। पर एकाक्षरी मंत्र में अनुस्वार का, या दीर्घ बनाम ह्रस्व स्वर का ज़रा सा फेरबदल भी उसके ऋषि, छंद इत्यादि सब कुछ बदल देता है — इसलिए स्वरूप ठीक वही होना चाहिए, न कि जो "मन लायक" लगे।
वक्ता कहते हैं कि भवानी मंत्र का जो स्वरूप सबसे प्रामाणिक रूप में प्रचलित है उसका प्रमाण वास्तविक तंत्र ग्रंथों से दिया जा सकता है, और वे उसकी प्रामाणिकता भेज देंगे। एक प्रश्नकर्ता की इससे जुड़ी चिंता पर — कि उन्हें मन लायक एकाक्षरी नहीं मिल पा रही, जो मिल रही है उसमें भगवती के साथ अन्य शक्तियों का प्रयोग है जो उन्हें उचित नहीं लग रहा — वे सावधान करते हैं कि एकाक्षरी में अनुस्वार का, या दीर्घ बनाम ह्रस्व स्वर का ज़रा सा फेरबदल भी उस मंत्र के ऋषि, छंद इत्यादि सब कुछ बदल देता है। वे जोड़ते हैं कि जो एक सामान्य स्वरूप होना चाहिए वह उन्हें स्वयं भी नहीं मिला है।
जिनका यज्ञोपवीत नहीं है वे पंचाक्षरी मंत्र का हवन कैसे करें?
हवन किसी विद्वान ब्राह्मण से, और नमः के आगे स्वाहा का प्रश्न
यज्ञोपवीत के बिना पंचाक्षरी मंत्र का बड़ा अनुष्ठान करने पर हवन का भाग किसी ब्राह्मण से करवा लेना चाहिए। नमः के आगे स्वाहा लगाना चाहिए या नहीं, इस पर वक्ता कहते हैं कि यह नियम हर जगह लागू नहीं होता — जो मंत्र नमः लगाने से ही बना है, उसमें से नमः हटा देने पर वह पंचाक्षरी रह ही नहीं जाएगा।
जो पंचाक्षरी मंत्र का बड़ा अनुष्ठान कर रहे हैं पर जिनका यज्ञोपवीतवैदिक कर्मों में दीक्षा का प्रतीक यज्ञोपवीत (जनेऊ) संस्कार — पीढ़ियों तक न होने पर, इसे पुनः आरंभ करने से पहले हर ज्ञात पीढ़ी के लिए प्रायश्चित आवश्यक है। नहीं है, उनके लिए वक्ता कहते हैं कि हवन का भाग साधक की ओर से किसी ब्राह्मणब्राह्मण वर्ण का व्यक्ति, जिसे अनेक अनुष्ठानों के अंत में भोजन अथवा दक्षिणा दी जाती है। से करवा लेना चाहिए। स्वयं हवन करते समय नमः के आगे स्वाहा लगाना चाहिए या नहीं, यह पूछे जाने पर वे कहते हैं कि यह नियम हर जगह लागू नहीं होता — यह इस पर निर्भर है कि प्रणव कहाँ लगाया जा रहा है, या मंत्र मूल रूप से किस तरह बना है। जो मंत्र नमः लगाने से ही बना है, उसमें से नमः हटा देने पर वह वास्तव में पंचाक्षरी रह ही नहीं जाएगा।
वर्ण सरनेम से तय होता है या काम से?
विवादास्पद प्रश्न पर उनका उत्तर — कर्म और वर्ण दोनों से देखिए
एक दर्शक, जिनका सरनेम ब्राह्मण का है पर जो व्यापार करते हैं, पूछते हैं कि वे ब्राह्मण हैं या वैश्य — वक्ता इसे बहुत विवादास्पद विषय बताते हैं जिस पर आपस में युद्ध हो जाता है। उनका अपना मत यह है कि इसे कर्म और वर्ण दोनों से देख लीजिए: कर्म से हैं तो उचित है वैसे कीजिए, वर्ण से हैं तो वैसे लीजिए — कोई दिक्कत नहीं है।
एक दर्शक पूछते हैं कि जनेऊ (और उसके साथ वर्ण) सरनेम से तय होता है या काम से — वे शर्मा हैं पर बिजनेस करते हैं, तो वे ब्राह्मण हैं या वैश्य? वक्ता उत्तर से पहले इसे बहुत विवादास्पद विषय बताते हैं, जिस पर आपस में युद्ध हो जाता है। उनका अपना मत यह है कि इसे कर्म और वर्ण दोनों से देखा जाए: यदि कर्म से हैं तो उचित है, वैसे कीजिए; वर्ण से हैं तो वैसे लीजिए — किसी में कोई दिक्कत नहीं है।
रोटी वाली विधि ग्रह-दोष, हनुमान जी की प्रसन्नता और चालीसा-सिद्धि — तीनों एक साथ साधती है
ग्रह दोष, हनुमान जी की प्रसन्नता और चालीसा सिद्धि — सब एक साथ
चैनल पर पहले बताई गई रोटी वाली विधि एक साथ कई स्तरों पर काम करती है: जिनका राहु खराब हो, चंद्र खराब हो या शनि खराब हो वह ठीक हो जाता है; हनुमान जी प्रसन्न होते हैं क्योंकि उसमें भगवान राम के नाम का पूरा प्रयोग होता है; और उसके ऊपर से हनुमान चालीसा की सिद्धि भी होती है।
पहले बताई गई रोटी विधि के लिए धन्यवाद मिलने पर वक्ता बताते हैं कि वह एक साथ क्या-क्या साधती है: जिसका राहु खराब हो, चंद्र खराब हो या शनि खराब हो वह ठीक हो जाता है; हनुमान जी प्रसन्न होते हैं, क्योंकि उसमें भगवान राम के नाम का पूरा प्रयोग हो जाता है; और उसके ऊपर से हनुमान चालीसा की सिद्धि भी हो जाती है — जिसे वक्ता स्वयं "बोनस ही बोनस, ऑफर ही ऑफर" कहते हैं।
कलिकाल में भैरव जी सबसे तीव्र सहायता करते हैं, और सुरक्षा हेतु सभी को उनकी पूजा करनी चाहिए
सुरक्षा के हेतु सभी को भैरव जी की पूजा करने का आग्रह
वक्ता पुष्टि करते हैं कि कलिकाल में भैरव जी सबसे तीव्र सहायता करने में सक्षम हैं — यह उनका अपना अनुभव भी है — और वे कहते हैं कि सुरक्षा हेतु सभी को भैरव जी की पूजा करनी चाहिए।
एक दर्शक की टिप्पणी का समर्थन करते हुए वक्ता पुष्टि करते हैं कि उनके अपने अनुभव में कलिकाल में भैरव जी सबसे तीव्र सहायता करने में सक्षम हैं, और कहते हैं कि सुरक्षा के हेतु सभी को विशेष रूप से भैरव जी की पूजा करनी चाहिए।
ऑफिस जाने की जल्दी में सुबह की न्यूनतम पूजा क्या है?
ऑफिस निकलने से पहले पाँच मिनट में क्या हो सकता है
ऑफिस से पहले न्यूनतम इतना: जगदंबा के सामने धुला हुआ दीपक प्रज्वलित कीजिए, भोग, जल और इत्र लगाइए, कपूर जलाकर आरती उतारिए, और पुष्प हो तो एक-आध चढ़ा दीजिए — पाँच मिनट भी नहीं लगेंगे — और यह सब करते हुए जो मंत्र जप, स्तुति या चालीसा पढ़नी हो वह साथ-साथ पढ़ते जाइए, बाती सजाते हुए भी। समय सचमुच न मिले तो पूजा छोड़ने के बजाय पाँच मिनट पहले उठ जाइए।
जो ऑफिस जाने से पहले अधिक समय नहीं दे सकते, उनके लिए वक्ता कहते हैं कि कम से कम इतना तो कर ही लेना चाहिए: जगदंबा के सामने धुला हुआ दीपक प्रज्वलित कर दें, भोग, जल और इत्र लगा दें, कपूर जलाकर आरतीदेवता की प्रतिमा के समक्ष प्रज्वलित दीपक घुमाने का अनुष्ठान — दीपदान में जब दीपक बुझने लगते हैं, तब इसे किया जाता है। उतार दें, और पुष्प हो तो एक-आध चढ़ा दें — इसमें पाँच मिनट भी नहीं लगते — और यह सब करते हुए जो मंत्र जप या स्तुति करनी हो वह साथ-साथ करते जाइए, वर्तिका सजाते हुए भी; 108 नाम पढ़ना हो तो वह भी उसी तरह पढ़ते जाइए। समय सचमुच नहीं मिल रहा तो, वे कहते हैं, पूजा छोड़ने के बजाय पाँच मिनट पहले उठ जाइए।
साबर मंत्र की सिद्धि पूरी करने के बाद क्या महिला को हवन करना ज़रूरी है?
साबर मंत्र की सिद्धि में हवन उतना आवश्यक नहीं होता
साबर मंत्रों में हवन उतना आवश्यक नहीं होता, यद्यपि यह इस पर निर्भर करता है कि मंत्र कौन सा है और व्यक्ति ने उससे पहले क्या किया है।
आर.के. सबर मंत्र की 21 दिन, पाँच माला की सिद्धि पूरी करने के बाद महिला को हवन करना ज़रूरी है या नहीं, यह पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि साबर में हवन उतना आवश्यक नहीं होता — यद्यपि यह इस पर निर्भर करता है कि मंत्र कौन सा है, और साधक ने उसे लेने से पहले क्या साधना की है।
हनुमान जी के बीज मंत्र में मकार बोलना है या गकार?
तंत्रोक्त विधि में सामान्यतः मकार, गकार मंत्र के अनुसार
हनुमान जी के मंत्र में "हम" बोलना है या दूसरा अक्षर, यह पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि यदि तंत्रोक्त विधि से कर रहे हैं तो सामान्यतः मकार में ही बोलना चाहिए — यानी "हम"। कुछ स्वरूपों में गकार भी होगा; कौन सा होगा यह मंत्र पर निर्भर करेगा।
हनुमान जी के मंत्र में "हम" बोलना है या दूसरा अक्षर, यह पूछे जाने पर वक्ता हनुमान जी के बीज मंत्र के संदर्भ में उत्तर देते हैं: यदि तंत्रोक्ततंत्र में कहा गया, जो उसी कर्म अथवा मंत्र के वेदोक्त रूप से भिन्न होता है। विधि से कर रहे हैं तो सामान्यतः मकार में ही बोलना चाहिए — यानी "हम"। वे जोड़ते हैं कि उसमें गकार भी होगा, और दोनों में से कौन सा लागू होगा यह उस विशेष मंत्र पर निर्भर करेगा।
छोटे बच्चों को बुरी चीजों से कैसे बचाएँ?
जिस स्तोत्र-स्तुति का सबसे अधिक जप किया हो, उससे बना सुरक्षा कवच
छोटे बच्चों की सुरक्षा के लिए सुरक्षा कवच बनाकर पहनाया जा सकता है। वह उसी सिद्धि के माध्यम से बनाया जा सकता है जो आपने की हो — जैसे नवरात्रि इत्यादि में जिस स्तोत्र-स्तुति का आपने अधिकाधिक जाप किया हो।
छोटे बच्चों को बुरी चीजों से बचाने के लिए क्या करें, यह पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि सुरक्षा कवच बनाकर पहनाया जा सकता है। वह उसी सिद्धि के माध्यम से बनाया जा सकता है जो आपने वास्तव में की हो — जैसे नवरात्रि इत्यादि में जिस स्तोत्र-स्तुति का आपने अधिकाधिक जाप किया हो।
सौंदर्य प्राप्ति और आकर्षण के लिए कौन सा मंत्र या स्तोत्र करें?
पहले अपने इष्ट का; विशेष उद्देश्य के लिए जन्म कुंडली देखकर
अपने इष्ट आराध्य का करेंगे तो सबसे बढ़िया रहेगा। यदि केवल इसी हेतु कोई विशेष मंत्र करना हो, तो पहले जन्म कुंडली देखकर करना अधिक उचित रहेगा।
सौंदर्य प्राप्ति और आकर्षण के लिए कौन सा मंत्र या स्तोत्र करना चाहिए, यह पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि अपने इष्ट आराध्य का करेंगे तो सबसे बढ़िया रहेगा। यदि कोई केवल इसी हेतु कोई विशेष मंत्र करना ही चाहे, तो उस व्यक्ति की जन्म कुंडली देखकर बताया जाए तो अधिक उचित रहेगा।
यदि हवन की ठीक सामग्री — मधु, नारियल — उपलब्ध या व्यावहारिक न हो तो?
मधु के बदले किशमिश, नारियल के बदले सुपारी
जहाँ मधु वास्तव में उपलब्ध न हो वहाँ पाठ रोके बिना किशमिश चढ़ाई जा सकती है; जहाँ कुंड छोटा हो और नारियल से पूर्णाहुति न हो सके वहाँ सुपारी से कर लीजिए, या देवी का हवन हो तो जायफल से भी। आवश्यकता पूर्ण फल की है, किसी एक विशेष वस्तु की नहीं।
मंदिर के स्पीकर पर महामृत्युंजय मंत्र सुनने से क्या मंत्र दोष लगता है?
जिस मंत्र को आप बोल नहीं रहे, केवल सुनने से दोष नहीं लगता
शिव मंदिर में स्पीकर पर बजते महामृत्युंजय मंत्र को केवल सुनने से कोई दोष नहीं लगता — सुनने वाला उसे बोल तो नहीं रहा है।
शिव जी के मंदिर में स्पीकर पर सुनाई देने वाले महामृत्युंजय मंत्र को सुनने से मंत्र दोष लग सकता है या नहीं, यह पूछे जाने पर वक्ता स्पष्ट उत्तर देते हैं कि नहीं: सुनने से दोष क्यों लगेगा, वे पूछते हैं, आप बोल तो नहीं रहे हैं।
क्या हर मंत्र के लिए अलग माला चाहिए — और यदि सिद्ध मंत्र इतने हो जाएँ कि रोज़ न हो सकें तो?
एक माला पर एक ही मंत्र ज़रूरी नहीं, और दैनिक पाठ इष्ट का
एक माला पर एक ही मंत्र करना चाहिए, यह आवश्यक नहीं — चाहे देवता एक ही हो; अपवाद है प्रत्यक्षीकरण शक्ति की सिद्धि, जिसके लिए उस माला पर एक ही चीज चलेगी। और जब सिद्ध चालीसाएँ और मंत्र इतने हो जाएँ कि रोज़ पाठ न हो पाए, तब वक्ता की सलाह है कि जो प्रमुख हो, जो आपके इष्ट आराध्य हों, उनका पाठ कीजिए और बाकी सभी का सामान्य स्मरण कर लीजिए।
एक माला पर एक ही मंत्र करना चाहिए, चाहे देवता एक ही हो — यह पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि ऐसा आवश्यक नहीं है; एक सामान्य गृहस्थ यदि एक से अधिक मंत्र कर रहा है तो वह हर मंत्र के लिए अलग माला कहाँ से लेगा। अपवाद वहाँ है जहाँ कोई प्रत्यक्षीकरण शक्ति को सिद्ध कर रहा हो; तब उस माला पर एक ही चीज चलेगी। जब कोई कई चालीसाएँ और मंत्र सिद्ध कर ले पर उन सबका रोज़ पाठ न कर पाए, तब क्या करें — यह अलग से पूछे जाने पर वे सलाह देते हैं कि जो प्रमुख हो, जो साधक के इष्ट आराध्य हों, उनका पूरा पाठ कीजिए और बाकी सभी का सामान्य स्मरण कर लीजिए।
घर के मंदिर में माँ दक्षिणा काली का मंडल कैसे स्थापित करें?
दुर्गा के समान ही, क्योंकि अधिकांश महाविद्याओं का पंचायतन मंडल वही रहता है
माँ दक्षिणा काली का मंडल ठीक वैसे ही स्थापित करना चाहिए जैसे भगवती दुर्गा का किया जाता है, क्योंकि अधिकाधिक महाविद्याओं का पंचायतन मंडल भी माँ भगवती दुर्गा के समान ही रहता है।
पूर्णाभिषेक कहाँ प्राप्त होता है?
जिस कुल में दीक्षित हैं, पूर्णाभिषेक वहीं मिलेगा
जो पूर्णाभिषिक्त होना चाहते हैं, उन्हें वह उसी कुल में प्राप्त होगा जिसमें वे पहले से दीक्षित हैं।
जो दर्शक पूर्णाभिषिक्त होना चाहते हैं, उन्हें वक्ता संक्षेप में उत्तर देते हैं: जिस कुल में आप पहले से दीक्षा-प्राप्त हैं, पूर्णाभिषेक वहीं मिलेगा, अन्यत्र नहीं।
क्या भगवान के पूजा के बर्तन हर बार धोने ही पड़ते हैं?
बिना धुला दीपक या थाली — वही जो हम स्वयं के लिए स्वीकार नहीं करते
जैसे कोई सुबह की बिना धुली थाली में रात को नहीं खाता, वैसे ही भगवान को अर्पित होने वाला दीपक और बर्तन प्रयोग से पहले धोने चाहिए, काला पड़ने के लिए नहीं छोड़ने चाहिए। महीनों बिना धुले रह जाने पर मूर्ति का केवल चेहरा दिखता रह जाता है और यह भी पता नहीं चलता कि कौन से देवता हैं — इस स्थिति को वक्ता उपेक्षा कहते हैं, भक्ति नहीं।
वक्ता सीधी तुलना करते हैं: जैसे कोई सुबह की बिना धुली थाली में रात को नहीं खाता, वैसे ही भगवान को अर्पित होने वाले दीये और अन्य बर्तन भी बिना धुले नहीं छोड़ने चाहिए — देवता को झूठे बर्तन में खिलाना, वे कहते हैं, स्वयं वैसा करने से अलग नहीं है। वे ऐसे घरों का वर्णन करते हैं जहाँ पीतल का दीपक कभी रगड़कर साफ नहीं होता, केवल पानी फिरा दिया जाता है, इसलिए महीनों में काला पड़ जाता है; जहाँ अगरबत्ती का धूना इतना जम जाता है जितना मजारों पर भी न मिले; और जहाँ मूर्ति का निचला आधा भाग पूरा काला हो चुका होता है, केवल चेहरा धुँधला दिखता है — कई बार इतना भी नहीं कि पता चले कौन से देवता हैं, और लोग किसी और को कोई और समझकर पूजा करते रहते हैं, क्योंकि शिव जी भी तभी पहचाने जाते हैं जब त्रिनेत्र दिखे। यह, वे कहते हैं, उपेक्षा है, वह भक्ति नहीं जो समझी जाती है।
त्रिपुर सुंदरी के मंत्र के लिए दीक्षा आवश्यक; और कमलगट्टा पूर्णाहुति का बीज
त्रिपुर सुंदरी के जप से पहले दीक्षा, और पूर्णाहुति में कमलगट्टा स्वीकार्य
जो भगवती त्रिपुर सुंदरी के मंत्र का जप करना चाहते हैं उन्हें दीक्षित होकर करना चाहिए। अलग से, दैनिक हवन की पूर्णाहुति कमलगट्टा से की जा सकती है या नहीं — जब पूर्ण फल चाहिए — यह पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि दे सकते हैं, वह स्वयं बीज है, कोई दिक्कत नहीं है।
दो छोटे प्रश्नोत्तर। जो भगवती त्रिपुरसुंदरी के मंत्र का जप करना चाहते हैं, उनसे वक्ता कहते हैं कि दीक्षा लेकर कीजिए। अलग से, दैनिक हवन की पूर्णाहुति कमलगट्टा से हो सकती है या नहीं — जब पूर्ण फल चाहिए — यह पूछे जाने पर वे पुष्टि करते हैं कि हो सकती है; कमलगट्टा स्वयं बीज है, इसमें कोई दिक्कत नहीं है।
जप की गति और भटकते मन पर नियंत्रण किससे होता है?
होश में रहना — केवल मन को रोकने की इच्छा नहीं
जप की गति कम-तेज हो जाए या मन किसी और विषय में लग जाए, तो उपाय केवल होश में रहना है — पल-पल यह याद रखना कि हम क्या कर रहे हैं — क्योंकि जहाँ मन भटका, सबसे पहले वही याद छूट जाती है।
जप के समय गति अनजाने में कम या तेज हो जाए, या मन किसी अन्य विषय में लग जाए, तब क्या करें — यह पूछे जाने पर वक्ता का उत्तर है कि यह मूलतः नियंत्रण की बात है, और वह होश से आता है: होश में रहेंगे तो नियंत्रित रहेगा, यह याद रखना होगा कि हम क्या कर रहे हैं। जहाँ मन भटका, वे कहते हैं, वहीं सब भूल गए।
हनुमान जी को एक लौंग चढ़ाएँ या जोड़ा?
पूरी तरह इस पर निर्भर कि कौन सी विधि की जा रही है
हनुमान जी को एक लौंग चढ़े या जोड़ा, यह इस पर निर्भर करता है कि कौन सी विधि की जा रही है; बालाजी के स्वरूप में अधिकतर एक चढ़ाते हैं, पर जब उतारा इत्यादि की विधि होती है तब दो चढ़ाते हैं।
हनुमान जी को एक लौंगलौंग, जो अर्पण तथा छोटे प्रयोगों में प्रयुक्त होती है। चढ़ाना चाहिए या जोड़ा, यह पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि यह इस पर निर्भर करता है कि कौन सी विधि की जा रही है। जैसे बालाजी के स्वरूप में अधिकतर एक चढ़ाते हैं; जहाँ उतारा इत्यादि की विधि होती है वहाँ दो चढ़ाते हैं — इसलिए इसे एक निश्चित नियम की तरह नहीं कहा जा सकता।
माँ के 32 नाम के अर्चन में कौन सी सामग्री लगती है?
कुमकुम, हल्दी और तोड़ी हुई पंखुड़ियाँ, गुलाब जल और गंगाजल से सुगंधित
माँ का 32 नाम से अर्चन बिल्कुल किया जा सकता है; उसकी सामग्री है कुमकुम और हल्दी, साथ में पुष्प की पंखुड़ियाँ तोड़कर आपस में मिलाई हुई, और उसमें गुलाब जल, गंगाजल तथा इत्र से सुगंध।
क्या माँ का 32 नाम से अर्चन किया जा सकता है, यह पूछे जाने पर वक्ता पुष्टि करते हैं कि किया जा सकता है। उसकी सामग्री है कुमकुम और हल्दीहल्दी, जो अर्पण में तथा देवी के पीतवर्ण स्वरूपों की माला और विधियों में प्रयुक्त होती है।, साथ में पुष्प की पंखुड़ियाँ तोड़कर आपस में मिलाकर, और उसमें गुलाब जल, गंगाजलगंगा नदी का जल, अशुद्धि के संपर्क में आई अनुष्ठान वस्तुओं को शुद्ध व पुनःप्रतिष्ठित करने हेतु प्रयुक्त। तथा इत्र से सुगंधित करके।
लापरवाह साधना से दोष लग चुका हो तो उसका उपाय क्या है?
लगे हुए दोष के लिए रुद्राष्टकम, अभिषेक और क्षमा याचना
एक भक्त बताते हैं कि अनजाने में उग्र मंत्र और स्तोत्र कर लेने से वे बीमार पड़ गए थे और शिव रुद्राष्टकम के पाठ से ठीक हुए। वक्ता इसकी पुष्टि करते हैं: जब भी कोई अपराध बन जाए — उग्र साधना या मनमौजी हवन से मंत्र श्राप, देव श्राप, मंत्र दोष, देव दोष या पितृ दोष — वहाँ भगवान शिव ही रुद्राष्टकम के द्वारा रक्षा करते हैं, और उनका अभिषेक करते हुए क्षमा याचना करनी चाहिए।
एक भक्त बताते हैं कि यूट्यूब देखकर अनजाने में उग्र मंत्र और स्तोत्र कर लेने से उन्हें अचानक बीमारियाँ आने लगीं और उनका आसन ही हिल गया, और वे तभी ठीक हुए जब वक्ता ने उन्हें शिव रुद्राष्टकम् के पाठ की ओर भेजा। वक्ता इसके पीछे के सिद्धांत की पुष्टि करते हैं: जब भी कोई अपराध बन जाए — उग्र साधना, गलत आहुति, या मनगढ़ंत और मनमौजी ढंग से किए गए हवन से मंत्र श्राप, देव श्राप, मंत्र दोष, देव दोष या पितृ दोष — वहाँ भगवान शिव ही रुद्राष्टकम् के द्वारा रक्षा करते हैं, और उनका अभिषेक करते हुए क्षमा याचना करनी चाहिए; इससे, वे कहते हैं, वे बहुत जल्द रक्षण कर लेते हैं।
यदि साल भर हवन करना संभव ही न हो तो क्या करें?
हवन के बदले मंदिर में हवन सामग्री का दान
जो साल भर घर में हवन नहीं कर सकते पर महीने में दो बार सप्तशती का पाठ करना चाहते हैं, वे अष्टमी और चतुर्दशी को पाठ करते जाएँ। केवल जहाँ घर के मंदिर पर वास्तविक सूतक-पातक हो वहीं पाठ करने से भी मना किया जाएगा; अन्यथा जो हवन नहीं हो पा रहा उसके बदले मंदिर में हवन सामग्री का दान कर दिया कीजिए।
जो साल भर घर में हवन का प्रबंध नहीं कर सकते पर श्रद्धा के लिए महीने में दो बार सप्तशती पाठ करना चाहते हैं, उनसे वक्ता कहते हैं कि पाठ चलता रह सकता है, अष्टमी और चतुर्दशी को कर लीजिए। केवल जहाँ घर के मंदिर पर वास्तविक सूतक-पातक हो, वहीं वे पाठ करने से भी मना करेंगे — अन्यथा जो हवन नहीं हो पा रहा उसके बदले मंदिर में हवन सामग्री का दान कर दिया कीजिए।
पीढ़ियों से छूटा हुआ कुलदेवता का व्रत फिर से आरंभ किया जा सकता है?
हनुमान जी का छूटा हुआ रोट क्षमा याचना के साथ पुनः आरंभ करना
एक भक्त को पता चलता है कि तीन-चार पीढ़ी पहले उनके दादाजी हनुमान जी का बड़े स्तर पर रोट करते थे, जो तब से छूटा हुआ है। वक्ता पुष्टि करते हैं कि इसे पुनः आरंभ किया जा सकता है — यदि हनुमान जी कुलदेवता हैं तो उन्हें रोट अवश्य चढ़ाना चाहिए — और उचित तिथि से, जैसे चैत्र पूर्णिमा से, क्षमा याचना करते हुए आरंभ कर देना चाहिए।
एक भक्त बताते हैं कि उन्हें अभी पता चला कि तीन-चार पीढ़ी पहले उनके पूर्वज हनुमान जी का बड़े स्तर पर रोटकुल और भैरव के कर्मों में बनाई जाने वाली मोटी रोटी, जिसे अर्पण के पश्चात भागों में बाँटा जाता है। करते थे, जिसे उसके बाद परिवार में किसी ने नहीं किया। वक्ता पुष्टि करते हैं कि यह अवश्य पुनः आरंभ किया जा सकता है: यदि हनुमान जी कुलदेवताकुल का अधिष्ठात्री देवता, जिसका निर्णय किसी अन्य साधना से पूर्व कर लेना चाहिए। हैं तो उन्हें रोट अवश्य चढ़ाना चाहिए। उसे उचित तिथि से — जैसे चैत्र पूर्णिमा से — क्षमा याचना करते हुए आरंभ कर देना चाहिए।
यदि हनुमान जी कुलदेवता हों तो कुलदेवी कौन होंगी?
हनुमान जी के साथ प्रायः कोई लोक देवी, सती स्वरूप में पूजित
जहाँ हनुमान जी कुलदेवता हैं, वहाँ साथ की कुलदेवी का स्वरूप क्या होगा यह मान लेने के बजाय जान लेने का विषय है — क्योंकि विशेष रूप से उत्तर प्रदेश और बिहार के क्षेत्र में हनुमान जी के साथ प्रायः कोई न कोई लोक देवी सती स्वरूप में ही पूजित होती हैं।
हनुमान जी के कुलदेवता होने पर कुलदेवी का स्वरूप क्या होगा, यह पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि यह मान लेने के बजाय वास्तव में जान लेने का विषय है, क्योंकि उनके अनुभव में, विशेष रूप से उत्तर प्रदेश और बिहार के क्षेत्र में, कुलदेवताकुल का अधिष्ठात्री देवता, जिसका निर्णय किसी अन्य साधना से पूर्व कर लेना चाहिए। हनुमान जी के साथ प्रायः कोई न कोई लोक देवी पूजित होती हैं, और वे प्रायः सती स्वरूप में पूजी जाती हैं।
केवल पंचायतन देवताओं की पूजा करने का अर्थ क्या बाकी सब हटा देना है?
पंचायतन पूजन का अर्थ पहले से पूजित देवताओं को हटाना नहीं
घर में केवल पंचायतन देवताओं की पूजा करने से पहले से पूजित देवता नाराज नहीं होते — शिव जी की पूजा होगी तो उनके माध्यम से भैरव जी की पूजा हो ही जाएगी। पर भौतिक दृष्टि से भैरव जी का जो स्वरूप प्रकट किया गया है वह भरण-पोषण और रक्षण के हेतु है, इसलिए उनका अलग पूजन भी सार्थक रहता है। पंचायतन पूजन का अर्थ यह नहीं कि घर से बाकी मूर्तियाँ, यंत्र और फोटो निकाल दिए जाएँ।
घर में केवल पंच देवता की पूजा करने से पहले से पूजित देवता नाराज तो नहीं होंगे — यह चिंता लेकर एक भक्त सीधे पूछते हैं। वक्ता उन्हें आश्वस्त करते हैं: जहाँ शिव जी की पूजा होगी वहाँ उनके माध्यम से भैरव जी की पूजा स्वतः हो जाएगी, इसलिए कोई अपराध नहीं होता। पर भौतिकता की दृष्टि से, वे जोड़ते हैं, भैरव जी का जो स्वरूप प्रकट किया गया है वह भरण-पोषण और रक्षण के हेतु है, इसीलिए उनका अलग पूजन भी सार्थक रहता है। एक दूसरे भक्त, जो अपनी मूर्तियों, यंत्रों और फोटो को लेकर इसी तरह चिंतित हैं, उनसे वे स्पष्ट कहते हैं कि पंचायतन पूजन स्थापित करने का अर्थ यह नहीं है कि पहले से पूजित बाकी सब घर से निकाल दिया जाए — और वे उनसे एक बार सीधे बात करने को कहते हैं, ताकि वे इसमें गड़बड़ा न जाएँ।
परिवार में मृत्यु के एक वर्ष के भीतर हवन नहीं
मृत्यु के बाद एक वर्ष की रोक, और अपने कुल के नियम का पालन
ससुर जी के देहावसान का एक वर्ष पूरा न हुआ हो तो हवन किया जा सकता है या नहीं, यह पूछे जाने पर वक्ता सहमति देते हैं कि नहीं करना चाहिए। वे बताते हैं कि कुछ लोग नया संवत आ जाने पर अवधि पूरी मान लेते हैं, पर कहते हैं कि जो आपका अपना नियम है उसे मानिए।
ससुर जी के देहावसान का एक वर्ष पूरा न होने के कारण हवन नहीं करना चाहिए क्या, यह पूछे जाने पर वक्ता स्पष्ट सहमति देते हैं: एक वर्ष नहीं हुआ तो नहीं करना। वे जोड़ते हैं कि नया संवत आ जाने पर कुछ लोग उसे मान लेते हैं, पर उनकी अपनी सलाह यह है कि जो आपका अपना नियम है उसे ही मानिए।
एक ही हवन में एक माला, देवी सूक्तम की आहुति और 32 नामावली — यह अधिक नहीं है
माला, देवी सूक्तम और 32 नाम — एक साथ का हवन स्वीकार्य
एक ही हवन में एक माला की आहुति, साथ में देवी सूक्तम के प्रथम श्लोक की आहुति, और 32 नामावली की 32 बार आहुति — क्या यह ज्यादा हो गया, यह पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि कुछ ज्यादा नहीं हुआ, एकदम ठीक है।
एक दर्शक पूछते हैं कि एक ही हवन में एक माला की आहुति, देवी सूक्तम के प्रथम श्लोक की आहुति, और 32 नामावली की बत्तीस बार आहुति — यह सब मिलाकर ज्यादा तो नहीं हो गया। वक्ता संक्षेप में उत्तर देते हैं कि इसमें कुछ ज्यादा नहीं हुआ — जैसा किया है एकदम ठीक है।
भगवती रेणुका की साधना छिन्नमस्तिका जयंती पर दी जाएगी
छिन्नमस्तिका के मंडल में अधिष्ठात्री के रूप में रेणुका-एकवीरा
बगलामुखी की उपासना कर रहे एक साधक पूछते हैं कि उनकी कुलदेवी छिन्नमस्तिका स्वरूप रेणुका हैं तो छिन्नमस्तिका साधना कैसे करें। वक्ता कहते हैं कि आने वाली छिन्नमस्तिका जयंती — वैशाख शुक्ल पक्ष चतुर्दशी — पर वे भगवती रेणुका की साधना देंगे; रेणुका-एकवीरा को वे उपमहाविद्या बताते हैं जो भगवती छिन्नमस्तिका की प्रमुख अधिष्ठात्री देवियों में आती हैं, और कहते हैं कि उनके मंडल की पूजा विधि वे जितना हो सकेगा देंगे।
माँ बगलामुखी की महाविद्या उपासना कर रहे एक साधक पूछते हैं कि उनकी कुलदेवी छिन्नमस्तिका स्वरूप रेणुका हैं तो छिन्नमस्तिका साधना कैसे करें। वक्ता कहते हैं कि भगवती रेणुका की साधना आने वाली छिन्नमस्तिका जयंती पर दी जाएगी, जो वैशाख शुक्ल पक्ष चतुर्दशी को पड़ती है। वे कारण बताते हैं: चैनल से जुड़े कुछ बहुत अच्छे साधक, जिनकी कुलदेवी भगवती रेणुका हैं, पहले से अच्छी साधना कर रहे हैं, और उन्हीं के निमित्त यह साधना दी जाएगी। वे भगवती एकवीरा रेणुका को उपमहाविद्या बताते हैं जो भगवती छिन्नमस्तिका की प्रमुख अधिष्ठात्री देवियों में आती हैं, और कहते हैं कि उनके मंडल की पूजा विधि वे जितना हो सकेगा देंगे, जिसे यथाशक्ति किया जाए।
जिसका पुण्य बहुत अधिक हो, उससे बड़ा पाप क्यों करवाया जाता है
जो पुण्य समाप्त नहीं होता, उसे खतरनाक पाप के द्वारा भोगा जाता है
वक्ता एक उपमा देते हैं: जिसके बैंक में इतना पैसा हो जाए कि खत्म ही न हो, वह उसे खर्च करने के लिए विदेश घूमने निकल पड़ता है। इसी तरह, वे कहते हैं, जब किसी का पुण्य इतना अधिक हो जाए कि समाप्त ही न हो और छोटे पाप उदय न हो पाएँ, तब भगवान उससे ऐसा खतरनाक पाप करवाते हैं जिसका वर्णन शास्त्र में भी नहीं है — और इसे वे झूठे दरबार चलाने वालों पर लागू करते हैं।
जो व्यक्ति ऊपर से कृपापात्र दिखता है वह कोई बहुत बड़ा गलत कार्य क्यों कर बैठता है, इसके लिए वक्ता एक उपमा देते हैं। मान लीजिए किसी के बैंक में इतना बैलेंस हो जाए — चार-पाँच करोड़, वे कहते हैं — कि पैसा खत्म ही न हो; उसे खत्म करने के लिए वह विदेश निकल जाता है, सिंगापुर, मलेशिया, जहाँ भी। इसी तरह, वे कहते हैं, जब किसी का पुण्य इतना अधिक हो जाता है कि वह समाप्त ही नहीं होता, तब भगवान कहते हैं कि इसके चिंदी-चोरी वाले पाप का फल इसे कैसे दिया जाए, इसके पाप कैसे उदय होंगे। तब उससे ऐसा खतरनाक पाप करवाया जाता है जिसका वर्णन शास्त्र में भी नहीं होता — कहीं नहीं मिलेगा, वे कहते हैं, कि इस प्रकार का ढोंग-पाखंड करने वाले के साथ क्या होना चाहिए, यद्यपि अध्यात्म के नाम पर पाखंड करने वालों के साथ क्या होगा यह मिल जाएगा।
दीक्षा देकर शिष्य को उसके हाल पर छोड़ देने वाले गुरु से बचें, और बिना विवेक किसी दरबार में जाने से भी
दरबारों और दीक्षा के बाद शिष्य को छोड़ देने वाले गुरुओं से सावधान
वक्ता बिना विवेक किसी तथाकथित दरबार या गुरु के हाथों स्वयं को सौंप देने के विरुद्ध कड़ी चेतावनी देते हैं, और विशेष रूप से उन गुरुओं के विरुद्ध जो दीक्षा देकर शिष्य को उसके हाल पर छोड़ देते हैं — कुछ साधिकाएँ ऐसे स्थानों पर दीक्षा लेकर, फिर दीक्षा देने वाले से संपर्क टूट जाने पर, वास्तव में दुर्गति को प्राप्त हुई हैं।
देवी या भैरव की सवारी का दावा करने वाले स्वयंभू "दरबारों" की भरमार, और तथाकथित गुरु माँ से मिलने के लिए पैसे लेने का वर्णन दर्शकों से सुनकर, वक्ता बिना वास्तविक विवेक ऐसे स्थानों पर स्वयं को सौंप देने के विरुद्ध कड़ी चेतावनी देते हैं। उनकी सबसे तीखी चेतावनी उन गुरु के विरुद्ध है जो दीक्षा देकर शिष्य को उसके हाल पर छोड़ देते हैं — वे कहते हैं कि कुछ साधिकाएँ इस तरह दीक्षा लेकर, फिर दीक्षा देने वाले से संपर्क टूट जाने पर, वास्तव में दुर्गति को प्राप्त हुई हैं। उनकी सलाह: या तो किसी को अपनी शरण में लो ही मत, यदि तुम सामने से कुछ कर नहीं सकते; और दीक्षा देकर अगले आदमी को मरने के लिए छोड़ मत दो। ऐसी गुरु माँ से अगली बार मिलने के लिए पंद्रह हजार रुपये का टोकन लिए जाने पर भी वे आपत्ति करते हैं, और पूछते हैं कि जीवन में वह पंद्रह हजार कहाँ से आएगा।
पूजन में किन देवी स्वरूपों को यज्ञोपवीत अर्पित होता है और किन्हें नहीं?
मात्र स्वरूप बनाम प्रचंड स्वरूप — इसी से तय होता है जनेऊ अर्पण
षोडश मातृकाओं को, और कुछ कुल-परंपराओं में सप्त मातृकाओं को भी, यज्ञोपवीत अर्पित नहीं किया जाता — वे मात्र स्वरूप में पूजित हैं, प्रचंड स्वरूप में नहीं — जबकि 64 योगिनियों, भगवती दुर्गा, नौ दुर्गाओं और दस महाविद्याओं को अर्पित किया जाता है। इसकी तुलना वक्ता गायत्री परिवार द्वारा स्त्रियों को यज्ञोपवीत पहना देने से करते हैं, जिसे वे इस विधान की गलत समझ मानते हैं।
एक दर्शक की इस बात से — कि हवन लोहे के कुंड में नहीं, ताँबे के में करना चाहिए, और गायत्री परिवार को तो यह पता होना चाहिए — वक्ता उस विषय की ओर मुड़ते हैं जिसे वे उनकी कहीं बड़ी भूल मानते हैं: स्त्रियों को यज्ञोपवीतवैदिक कर्मों में दीक्षा का प्रतीक यज्ञोपवीत (जनेऊ) संस्कार — पीढ़ियों तक न होने पर, इसे पुनः आरंभ करने से पहले हर ज्ञात पीढ़ी के लिए प्रायश्चित आवश्यक है। पहना देना, जो नियम उन्होंने तब बनाया जब यह प्रश्न उठा कि जो यज्ञोपवीत नहीं पहनते उन्हें गायत्री का अधिकार नहीं है। इसके विरुद्ध वे पूजन का अपना नियम रखते हैं: जब षोडश मातृका की पूजा की जाती है तो उन सोलह देवियों को स्पष्ट रूप से जनेऊ अर्पित नहीं किया जाता, क्योंकि वे मात्र स्वरूप में पूजित हैं, प्रचंड स्वरूप में नहीं — और यही नियम कुछ कुल-परंपराओं की सप्त मातृकाओं के लिए भी है, विशेष रूप से भगवती के सारस्वत कुल की। इसके विपरीत 64 योगिनी, भगवती दुर्गा, त्रिकोण की तीनों देवियाँ, नौ दुर्गाएँ और दस महाविद्या — इन्हें पूजन में अर्पित किया जाता है। यदि कुछ देवियों के लिए भी जनेऊ मना है, वे तर्क देते हैं, तो उसे मनुष्य स्त्रियों पर सामान्य नियम की तरह लागू कर देना इस विधान के आधार को ही गलत समझना है — और उसके सामने, वे कहते हैं, लोहे का कुंड कोई बड़ी बात ही नहीं।
पुराना, काला पड़ चुका दीपक बदलकर नया ले आना चाहिए?
दीपक जितना पुराना उतना सामर्थ्य — उसे साफ कीजिए, बदलिए नहीं
पूजन-पाठ की चीजें जब तक खंडित न हों, टूटें नहीं, तब तक सामान्यतः बदलनी नहीं चाहिए। दीपक जितना पुराना होता है उसमें उतना ही सामर्थ्य होता है, क्योंकि एक ही चीज में आप बार-बार देव तत्व का आवाहन कर रहे हैं; उसे रगड़कर चमकाकर प्रज्वलित कीजिए, फेंकिए नहीं। वक्ता ज्योति को भगवती पार्वती और शंकर जी की पुत्री तथा सभी देवताओं का पहला माध्यम भी बताते हैं।
जो दर्शक दीये को धोने के बजाय टिश्यू पेपर से पोंछ लेते हैं, या छह महीने एक ही दीया जलाकर फिर सीधे फेंक देते हैं — उन पर प्रतिक्रिया देते हुए वक्ता कहते हैं कि वे कितनी बार कह चुके हैं कि दीपकपूजन के लिए जलाया जाने वाला दीपक, जो विधि के अनुसार घी अथवा तेल का होता है। जितना पुराना होता है उसमें उतना ही सामर्थ्य होता है। पूजन-पाठ की चीजें जब तक खंडित न हों, टूटें नहीं, तब तक सामान्यतः नहीं बदलनी चाहिए; उचित यह है कि दीपक को रगड़कर एकदम चमका दिया जाए और प्रज्वलित किया जाए। उनका कारण: दीपक में सिद्धि इसलिए आती है कि एक ही चीज में आप बार-बार देव तत्व का आवाहन कर रहे हैं — और माध्यम तो सबसे पहले दीपक ही है। ज्योति को, वे कहते हैं, भगवती पार्वती और शंकर जी की पुत्री कहा गया है, और उन्हीं के माध्यम से सभी देवी-देवताओं का प्रत्यक्ष कारण और संकल्प चलता है; उस उपस्थिति को एक ही आसन पर बार-बार विराजमान कराते रहेंगे तो वह माध्यम स्वयं सिद्ध और जागृत हो जाएगा।
जैसे अपने भोजन का समय निश्चित है, वैसे ही भगवान की पूजा का भी
सुबह आठ बजे से पहले पूजा, और उसे टालने की छूट का विरोध
एक दर्शक की याद दिलाई गई बात — कि नीब करोरी बाबा सदैव कहते थे कि जैसे तुम शुद्ध रहते हो और शुद्ध खाते हो वैसे ही भगवान की पूजा और सेवा करो — का समर्थन करते हुए वक्ता जोड़ते हैं कि जैसे अपने भोजन का समय निश्चित है वैसे ही भगवान का भी समय निश्चित है, सुबह आठ बजे से पहले उनकी पूजा कर लीजिए। वे दोपहर पर टाल देने की छूट देने वाले प्रसिद्ध बाबाओं के प्रबल विरोध को दोहराते हैं।
एक दर्शक याद दिलाते हैं कि नीब करोरी बाबा सदैव कहते थे कि जैसे तुम शुद्ध रहते हो और शुद्ध खाते हो वैसे ही भगवान की पूजा और सेवा करो। वक्ता पूरी सहमति देते हैं और इसे आगे बढ़ाते हैं: आपका अपना समय निश्चित है — सुबह आठ बजे भोजन चाहिए तो चाहिए, दस बजे तक करना है तो करना है — वैसे ही भगवान का भी समय निश्चित है; सुबह आठ बजे से पहले उनकी पूजा कर लीजिए। वे इस विचार के अपने प्रबल विरोध को दोहराते हैं कि कोई बहुत प्रसिद्ध हो गया है इसलिए अब यह छूट दे दी जाए कि सुबह की पूजा छोड़कर दोपहर में कर लो। वे दूसरों के कहने में आकर अपने देवी-देवताओं की सेवा छोड़ देने से भी सावधान करते हैं: भगवान शायद कुपित न हों, वे कहते हैं, पर देवी-देवता भगवान से अलग हैं और लोक देवी-देवता उनसे भी अलग — वे तुरंत कुपित होते हैं, और ज़रा से आराम के चक्कर में बना-बनाया सारा खेल विनाश की ओर चला जाता है।
क्या सच्ची भक्ति के लिए अपने देवता को साथ लेकर घूमना ज़रूरी है?
डोली में घुमाने के बजाय हर मूर्ति में अपने इष्ट का अंश पहचानना
अपनी भक्ति दिखाने के लिए देवता को डोली में साथ लेकर घूमने के बढ़ते चलन का वक्ता विरोध करते हैं; उनका मत है कि जहाँ भी जाएँ और भगवती के जिस भी स्वरूप को देखें, उसमें उनका अंश पहचानकर उसी स्वरूप में प्रणाम करें — किसी निश्चित भौतिक विग्रह को जगह-जगह ढोने का आग्रह किए बिना।
एक बढ़ते हुए चलन का वक्ता विरोध करते हैं — भक्त अपनी भक्ति घोषित करने के लिए अपने देवता के विग्रह को डोली में साथ लेकर घूमते हैं। उनका अपना मत यह है कि जहाँ इस प्रकार का सामर्थ्य और अपने इष्ट आराध्य के प्रति इस प्रकार का समर्पण सचमुच हो, वहाँ विग्रह की आवश्यकता ही क्या है: जिस मंदिर में जाएँ, भगवती के जिस स्वरूप को देखें — किसी भी मंदिर में, किसी भी मूर्ति में — उसमें विंध्यवासिनी का अंश पहचानकर उसी स्वरूप में प्रणाम करें, क्योंकि वे वहाँ उसी मात्रा में विराजती हैं। अपनी भक्ति सिद्ध करने के लिए किसी निश्चित विग्रह को जगह-जगह भौतिक रूप से ले जाने का आग्रह, वे कहते हैं, आवश्यक नहीं; वे भक्तों से कहते हैं कि ऐसे निर्णय प्रचलन के पीछे चलकर नहीं बल्कि अपने मस्तिष्क से लें, और साथ ही इसमें संतों का अपमान न हो इसका ध्यान रखें।
प्याज-लहसुन कम या ज्यादा खाने से क्या दोष में फर्क पड़ता है?
कोई सीमा निर्धारित नहीं — दोष उतना ही लगेगा
खाने में प्याज-लहसुन बिल्कुल छोड़ना है या मसाले के हिसाब से मिलाया जा सकता है, यह पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि नहीं खाना है तो नहीं खाना है — थोड़ा खाइए या ज्यादा, हिसाब से खाइए या बेहिसाब, दोष तो उतना ही लगेगा। इसकी कोई सीमा निर्धारित नहीं है। औषधि के रूप में, जिसे वास्तविक आवश्यकता या कष्ट हो, उसी के लिए इसे कहा गया है।
खाने में प्याज-लहसुन अलग से बिल्कुल नहीं खाना है या मसाले के हिसाब से मिलाया जा सकता है, यह पूछे जाने पर वक्ता स्पष्ट उत्तर देते हैं: नहीं खाना है तो नहीं खाना है। थोड़ा खाइए या ज्यादा, हिसाब से खाइए या बेहिसाब — दोष तो उतना ही लगेगा, और इसकी कोई सीमा जोड़ी हुई नहीं है। यदि साधना में नहीं खाना है, वे कहते हैं, तो बिल्कुल ही मत खाइए। इसका जो अनुमत उपयोग है, वे जोड़ते हैं, वह औषधि के रूप में है — जिसे वास्तव में आवश्यकता हो, कुछ कष्ट हो, उसी के लिए कहा गया है।
श्री विद्या क्या है?
भगवती त्रिपुर सुंदरी की साधना की विधि
भगवती त्रिपुर सुंदरी की साधना श्री विद्या में विशेष रूप से प्रमुख मानी जाती है; उनकी साधना की जो विधि होती है वही श्री विद्या कही जाती है।
भगवती त्रिपुरसुंदरी की साधना के विषय में पूछे जाने पर वक्ता बताते हैं कि उनकी उपासना श्री विद्या में विशेष रूप से प्रमुख मानी जाती है — उनकी साधना की जो विधि होती है वही श्री विद्या कहलाती है।
प्रसिद्धि स्वयं एक श्राप है, और महामाया ज्ञानियों तक को मोह में खींच लेती हैं
सप्तश्लोकी की चेतावनी — ज्ञानियों के चित्त भी बलपूर्वक खींच लिए जाते हैं
वक्ता कहते हैं कि प्रसिद्धि स्वयं एक प्रकार का श्राप है — आजकल संत और बाबा लोग जैसे ही प्रसिद्ध होते हैं, खुद को परमेश्वर से भी ऊपर समझने लगते हैं। वे सप्तश्लोकी के प्रथम मंत्र का हवाला देते हैं, कि महामाया ज्ञानियों के चित्त को भी बलपूर्वक खींचकर मोह में डाल देती हैं, और कहते हैं कि ठीक यही होते हुए देखा जाता है।
वक्ता प्रसिद्धि को स्वयं एक प्रकार का श्राप कहते हैं: संत और बाबा लोग, वे कहते हैं, जैसे ही प्रसिद्ध हो जाते हैं, खुद को परमेश्वर से भी ऊपर समझने लगते हैं। वे सप्तश्लोकी के प्रथम मंत्र का हवाला देते हैं — जैसा ट्रांसक्रिप्ट में आया है, 'ज्ञानी नाम अपि चेतांसिम देवी भगवती हिसा बलाद कृष्ण मोहाय महामाया प्रक्षति' — जिसका अर्थ वे यह बताते हैं कि जो ज्ञानियों के चित्त को भी बलपूर्वक खींचकर अहंकार और अंधकार में डाल देती हैं, वही महामाया भगवती हैं। यही, वे कहते हैं, होते हुए देखा जाता है।
क्या हनुमान चालीसा की कोई पंक्ति बाद में जोड़ी गई है?
एक पद जिसे वे बाद का, अनधिकृत जोड़ मानते हैं
एक दर्शक कहते हैं कि हनुमान चालीसा में चार पंक्तियाँ गलत छुप गई हैं और वे किसी से कहेंगे कि उन्हें सुधार लें — वक्ता सहमति देते हैं। शंकराचार्य परंपरा को मानने वाले, जो शास्त्रोक्त विधि-विधान बताते हैं, उनके अनुसार वे मानते हैं कि यह पद किसी अशास्त्रीय व्यक्ति के द्वारा गृहीत है; वे कहते हैं कि वे इसे न स्वीकार करेंगे न करने देंगे, और जोड़ते हैं कि तुलसीदास के आगे वे किसी को नहीं मानेंगे।
एक दर्शक कहते हैं कि हनुमान चालीसा में चार पंक्तियाँ गलत छुप गई हैं और वे किसी से कहेंगे कि वे इसे सुधार लें। वक्ता इस बात को आगे बढ़ाते हैं: शास्त्रोक्त विधान के अनुसार, और शंकराचार्य परंपरा को मानने वालों के मत के अनुसार — जो शास्त्रोक्त विधि-विधान बताते हैं — यह पद किसी अशास्त्रीय व्यक्ति के द्वारा गृहीत किया गया है, जिसे इसे रचने का अधिकार नहीं था। वे कहते हैं कि वे इस पंक्ति को प्रामाणिक स्वीकार नहीं करेंगे और न करने देंगे, और ऐसा कहने के लिए जो भी देव शक्ति हो उससे क्षमा याचना करते हैं; साथ ही जोड़ते हैं कि तुलसीदास के आगे वे इस विषय में किसी और को नहीं मानेंगे।
श्री यंत्र सबको खुले हाथ क्यों नहीं दिया जाता?
श्री विद्या की कुल परंपरा के लिए, क्रमिक सेवा के बाद ही
श्री यंत्र विशेष रूप से श्री विद्या और उसकी कुल परंपरा का है, जिसकी सेवा-पूजा कुलवधू के समान होनी चाहिए, न कि टाँगकर सजाने की वस्तु के रूप में। धन से जुड़ी सामान्य कामना के लिए उसके बदले लक्ष्मी यंत्र या अष्ट लक्ष्मी का यंत्र दिया जाना चाहिए; उनके अपने यहाँ जो विधि-विधान से लेते हैं वे पहले छह महीने से साल भर की आरंभिक सेवा पूरी करते हैं, तभी थोड़े-थोड़े करके मंडल पूजन सीखने आगे लाए जाते हैं।
प्रसिद्ध होते ही अपने अनुयायियों को श्री यंत्र खुले हाथ बाँट देने वाले शिक्षकों की बात पर वक्ता स्पष्ट हैं: वे साफ कहते हैं कि श्री यंत्र किसी को नहीं देना है, क्योंकि श्री यंत्र विशेष रूप से श्री विद्या और उसकी कुल परंपरा का है, और उसकी सेवा-पूजा कुलवधू के समान होनी चाहिए, न कि केवल टाँगकर सजाने की वस्तु के रूप में। लक्ष्मी से जुड़ी सामान्य कामना के लिए, वे कहते हैं, उसके बदले लक्ष्मी यंत्र या अष्ट लक्ष्मी का यंत्र देना चाहिए, और साथ में उसका उपयोग भी सिखा देना चाहिए। उनके अपने यहाँ जो विधि-विधान से लेते हैं, वे पहले छह महीने से साल भर की आरंभिक सेवा पूरी करते हैं — सतार्चन, सहस्रार्चन, अभिषेक — और तभी, जब भाव बन चुका हो, उन्हें थोड़े-थोड़े करके मंडल पूजन सीखने आगे लाया जाता है; अब तक, वे कहते हैं, दो या तीन ही यहाँ तक पहुँच पाए हैं। जहाँ यह थोक के भाव में बाँटा जा रहा है, वहाँ, वे कहते हैं, उन्हें केवल दोष लगता दिखाई देता है।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।