घर पर स्वयं से तंत्र काट कैसे करें — बार-बार अभिचार करने वाले शत्रु के विरुद्ध शक्तिपीठ आधारित चार चरणों का विधान
शत्रु द्वारा बार-बार प्रयोग दोहराए जाने पर घर पर स्वयं तंत्र काटने का वक्ता का चार-चरण विधान — निकटतम शक्तिपीठ, वहाँ से लाया नारियल, नित्य पाठ, भैरव के द्वार-दीपक, धूना और नित्य कपूर-लौंग उतारा।
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परिवार पर तंत्र का पहला लक्षण कलह है
कलह जिसे देर होने तक अनदेखा किया जाता है
वक्ता कहते हैं कि जब भी किसी व्यक्ति या परिवार पर तंत्र का प्रयोग होता है, तो सबसे पहला काम यह होता है कि उस परिवार में कलह शुरू हो जाती है। कलह सबसे बड़ा कारण बनती है, और लोग उसे काफी समय तक अनदेखा करते हैं — जब तक बात समझ में आती है, तब तक काफी देर हो चुकी होती है।
जब भी किसी व्यक्ति या परिवार पर तंत्र का प्रयोग होता है, वक्ता कहते हैं, तो सबसे पहला काम यह होता है कि उस परिवार में कलह शुरू हो जाती है। कलह सबसे बड़ा कारण बनती है, और हम उसे काफी समय तक अनदेखा करते हैं; जब तक बात समझ में आती है, तब तक काफी देर हो चुकी होती है।
बाहर से करवाया गया तंत्र काट कुछ ही दिनों की राहत क्यों देता है
सीमित समय का पहरा, छूटे हुए नियम, और बार-बार अभिचार करवाने वाला सक्रिय शत्रु
वक्ता उस आम अनुभव पर बात करते हैं कि बाहर तंत्र काट करवाया, कुछ दिन राहत रही, फिर सब कुछ पहले जैसा होने लगा — जबकि हर किसी के पास इतना पैसा नहीं होता कि बार-बार किसी साधक या तांत्रिक को पैसे देता रहे। वे दो कारण बताते हैं। पहला, सच्चा सिद्ध व्यक्ति अपने इष्ट का कोई दूत, वीर या गण आपके घर के रक्षण के लिए भेजता है, लेकिन सीमित समय के लिए, हमेशा के लिए नहीं, और उसके निमित्त कुछ काम बताता है — भोग, उस शक्ति के नाम का दीपक — जिन्हें लोग अक्सर निभाते नहीं। दूसरा, शत्रु दो तरह का होता है: एक बार अभिचार करके भूल जाने वाला, जिसके लिए एक काट से मामला खत्म हो जाता है; और सक्रिय शत्रु जो जैसे ही आप काट करवाते हैं फिर करवा देता है। सक्रिय शत्रु के विरुद्ध, वे कहते हैं, गाँठ बाँध लीजिए: जब तक आप स्वयं सब कुछ करना शुरू नहीं करेंगे, कोई बाहरी व्यक्ति लंबे समय तक आपकी सहायता नहीं कर सकता।
वक्ता एक बहुत ही विशेष प्रश्न से शुरू करते हैं। जब हमें पता चल जाता है कि हमारे किसी शत्रुशत्रु, इन प्रवचनों के व्यावहारिक अर्थ में — जो सामान्य अथवा तांत्रिक उपायों से गृहस्थ के विरुद्ध कार्य करता है। ने, या शत्रुता-भाव रखने वाले किसी व्यक्ति ने, हम पर तंत्र या अभिचार का प्रयोग कर दिया है, तो हमें क्या करना चाहिए? मान लीजिए हम बाहर जहाँ-जहाँ दिखाना-सुनाना था, दिखा-सुना आए; कुछ दिन राहत रही, उसके बाद फिर सारी चीज़ें पहले जैसी होने लगीं। ऐसा क्यों होता है, इससे हमेशा के लिए छुटकारा कैसे मिले, और स्वयं से क्या किया जाए — क्योंकि हर व्यक्ति के पास इतना पैसा नहीं होता कि वह बार-बार किसी साधक, किसी तांत्रिक को पैसे देता रहे, और मुफ्त में हर जगह काम नहीं होता। जब हम कहीं जाकर दिखा-सुना कर आते हैं, वे कहते हैं, तो वहाँ से कुछ सलाह दी जाती है: वापस जाकर इतने दिन तक यह काम करना है। हो सकता है हम उतने दिन करें, और बहुत बार नहीं करते। जो सही जगह होती हैं, वहाँ के सिद्ध व्यक्ति — जिन्होंने वचनों में किसी शक्ति या सिद्धि को अपनाया है, कृपा प्राप्त की है — अपने इष्ट का कोई दूत रक्षण के लिए आपके साथ भेजते हैं। वीर हो, दूत हो या गण हो, उसका पहरा आपके घर पर उतने समय के लिए रहता है। हमेशा के लिए नहीं भेजते, कुछ समय के लिए भेजते हैं। और उसके निमित्त आपसे ज़रूर कहते हैं कि यह काम आपको करना है: यह भोगगृहस्थ के भोजन से पूर्व देवता के समक्ष अर्पित किया जाने वाला नैवेद्य। देना है, इस शक्ति के नाम से दीपक जलाना है। इस बीच, वे कहते हैं, सबसे बड़ी बात यह है कि शत्रु पक्ष दो तरह का होता है। पहला एक बार आप पर अभिचार कर देता है और उसके बाद उसे मतलब नहीं — आपको पता चला, काट करवाया, ठीक हो गया, मामला खत्म। दूसरा बार-बार अभिचार करवा रहा है: जैसे ही आप कहीं काट करवाते हैं, वह पुनः करवा देता है; कुछ दिन आप ठीक रहे, फिर वह करवा देता है। यानी आपका शत्रु सक्रिय है — वह तंत्र को बार-बार घुमा रहा है, चाहे किसी और से करवा रहा हो या स्वयं कर रहा हो। ऐसी स्थिति में, वक्ता कहते हैं, गाँठ बाँधकर लिख लीजिए: जब तक आप स्वयं हर चीज़ करना शुरू नहीं करेंगे, कोई भी बाहरी व्यक्ति आपकी लंबे समय तक सहायता नहीं कर सकता।
क्या किसी गुरु की शरण में जाने से तंत्र से रक्षा की गारंटी मिल जाती है?
100 में 80 को रक्षण, 20 को नहीं; कर्म और प्रारब्ध तय करते हैं
वक्ता कहते हैं कि तंत्र क्षेत्र में आने पर सभी लोग गुरु प्राप्त करने के लिए परेशान रहते हैं, यह मानकर कि गुरु मिल जाएँगे या किसी गुरु परंपरा में जाएँगे तो रक्षण मिल जाएगा। वे खुलकर कहते हैं कि यह अपवाद है, नियम नहीं: 100 लोग किसी गुरु की शरण में जाते हैं तो हो सकता है 80 को सुरक्षा मिले और 20 ऐसे निकलते ही हैं जिन्हें रक्षण नहीं मिलता, और किसी भी परंपरा में ऐसी सटीकता नहीं है कि जो गया उसका भला ही हो गया। वहाँ भी, वे कहते हैं, आपका अपना कर्म और प्रारब्ध काम करता है; गुरु बस वही पूरा कर देते हैं जो अंतिम रूप से पूरा होने वाला होता है, और यह सबके लिए एक समान नहीं होता।
वक्ता कहते हैं कि गुरु के लिए सभी लोग परेशान होते हैं — तंत्र क्षेत्र में आ गए हैं, गुरु प्राप्त हो जाएँ; गुरु मिल जाएँगे तो उनके कारण रक्षा मिल जाएगी; उनके कारण किसी गुरु परंपरा में जाएँगे तो वहाँ से रक्षण मिल जाएगा। वे कहते हैं कि वे इस पर खुलकर बोलते हैं: यह सिर्फ और सिर्फ अपवाद है। 100 लोग किसी गुरु की शरणागतजो शरण में आ गया हो, जिसने फल देवता पर छोड़ दिया हो। में जाते हैं, गुरु किसी को अपनी शरण में लेते हैं, तो 100 में से हो सकता है 80 लोगों को सुरक्षा मिले, और 20 लोग ऐसे निकलते ही हैं जिन्हें रक्षण नहीं मिलता। हर परंपरा में देख लीजिए, वे कहते हैं — कहीं भी ऐसी सटीकता नहीं है कि जो गया उसका भला ही हो गया। तो आप कैसे कह सकते हैं कि किसी भौतिक गुरु की शरण में गए तो आपको पूरी तरह हर चीज़ सही से मिल गई? यह कभी संभव नहीं है। वहाँ भी, वे कहते हैं, आपका अपना ही कर्म और प्रारब्धपूर्व कर्मों द्वारा पहले से गतिमान भाग्य का वह अंश — साधना व सत्कर्म इसकी तीव्रता को घटा सकते हैं, किंतु पूर्णतः मिटा नहीं सकते। काम करता है। बस जो अंतिम रूप से कुछ होने वाला होता है, पूरा होने वाला होता है, उसे वे पूरा कर देते हैं; देखकर पूरा करते हैं। सभी के लिए एक समान नहीं होता; वहाँ भी अलग है।
घर पर तंत्र काट के लिए किस शक्तिपीठ की शरण लें?
51 प्रकट पीठों में सबसे नज़दीकी, या कोई भी जागृत पीठ
जब शत्रु सक्रिय है और आप बार-बार पैसे लगाकर भी ठीक नहीं हो रहे, तो वक्ता कहते हैं कि सबसे पहले अपने घर की शक्ति के विषय में पता कर लें कि कौन हैं। यदि पता नहीं चलता, तो एक ही सबसे ज़रूरी काम है कि भगवती के 51 प्रकट शक्ति पीठ में से कौन-सा पीठ आपके रहने की जगह से सबसे नज़दीक है — या वह भी नहीं तो कौन-सा जाग्रत पीठ है, चाहे वह 100 या 200 साल पहले का ही हो, भगवती का हो, महादेव का हो या किसी भी देवी-देवता का। उस पीठ के शरणागत हो जाइए, वहाँ जाइए, उस देवता की प्रतिमा या फोटो लाइए और उनके नाम से अपने पूजन स्थान पर स्थापित कीजिए।
तो अब यहाँ दो चीज़ें आ गईं, वक्ता कहते हैं: आपका शत्रुशत्रु, इन प्रवचनों के व्यावहारिक अर्थ में — जो सामान्य अथवा तांत्रिक उपायों से गृहस्थ के विरुद्ध कार्य करता है। सक्रिय है। जो एक बार में खत्म हो गया था — आपका मामला सुलझ गया, सब ठीक हो गया। पर अब शत्रु सक्रिय है, बार-बार तंत्र प्रयोग कर रहा है, आप बार-बार जा रहे हैं, पैसे लग रहे हैं, कुछ दिन ठीक हो रहे हैं फिर नहीं हो रहे, परेशानियाँ बढ़ रही हैं, नई-नई चीज़ें सामने आ रही हैं। ऐसी स्थिति में क्या करना चाहिए? ऐसी स्थिति में, वे कहते हैं, सर्वप्रथम अपने घर की शक्ति के विषय में पता कर लेना चाहिए कि कौन हैं। यदि पता नहीं चल रहा है, तो एक ही सबसे ज़रूरी काम है: आपके नज़दीक का शक्ति पीठ कौन-सा है। भगवतीदेवी का आदरसूचक संबोधन, जो इन प्रवचनों में विचाराधीन किसी भी स्वरूप के लिए प्रयुक्त होता है। के जो प्रकट शक्तिपीठ हैं, 51 शक्तिपीठ, उनमें से कौन-सा आपके रहने की जगह से सबसे नज़दीक है — यदि अपना घर है तो वहाँ से सबसे नज़दीक कौन-सा है। यदि वह भी नहीं, तो जाग्रत पीठ कौन-सा है? कोई न कोई ऐसा पीठ होगा जो जागृत माना जाता होगा — हो सकता है वह पौराणिक काल से न हो, आज से 100 साल पहले का हो, 200 साल पहले का हो। भगवती का जागृत पीठ होगा, या महादेव का होगा, किसी भी देवी-देवता का होगा। उस पीठ के शरणागतजो शरण में आ गया हो, जिसने फल देवता पर छोड़ दिया हो। हो जाइए — वह स्थल जिस भी देवता का हो, उनके शरणागत हो जाइए। वहाँ जाइए, वहाँ से उनकी प्रतिमा लाइए या फोटो लाइए, और अपने पूजन स्थान पर उनके नाम से स्थापित कीजिए। कैसे करना है, वे कहते हैं, उसका पूरा विधान सुनिए।
घर पर तंत्र काट का पहला काम: चावल और श्रीफल के साथ शक्तिपीठ की यात्रा
शाम का चावल-संकल्प, हर सिर से उतारा चावल, प्रमुख विग्रह पर अर्पण, और घर लाया नारियल
वक्ता का पहला काम घर से पीठ तक और वापस चलता है। यात्रा से एक शाम पहले घर का मुखिया नहा-धोकर एक अंजुली बासमती चावल में थोड़ी हल्दी और ₹11 मिलाकर उसे स्पर्श करता है और पीठ की भगवती से कहता है कि कल घर की हर आभिचारिक या दैविक समस्या के लिए आपके पास आऊँगा, मार्गदर्शन और सहायता माँगता है, फिर उस देवता के नाम से घी या सरसों तेल का दीपक जलाता है। अगली सुबह मुखिया एक-एक मुट्ठी चावल हर पीड़ित व्यक्ति के सिर से, अपने सहित, तीन बार सीधा (क्लॉकवाइज़) घुमाकर सबका एक ही थैली में रखता है, शाम वाले चावल से अलग, और दोनों को फूल-प्रसादी के साथ पीठ ले जाता है। वहाँ एक ही ज़रूरी काम है कि वह चावल पुजारी या सेवक के माध्यम से प्रमुख विग्रह पर भगवती के चरणों तक पहुँचे, भले बाद में पक्षियों को डाल दिया जाए। लौटते समय पीठ से ही एक पानी वाला नारियल खरीदें, बिना छिला या जटा सहित, लाल चुनरी में लपेटकर प्रमुख विग्रह से स्पर्श करवाएँ, रोली-मौली से बाँधें, और घर में साफ किए पूजन-स्थान पर देवता की प्रतिमा या फोटो के पास रखें, जहाँ सुबह-शाम धूप-दीपक जले। पीठ नज़दीक हो तो महीने में एक बार, नहीं तो तीन महीने में एक बार हाज़िरी दें, हर बार चावल का काम दोहराते हुए।
सबसे पहले, वक्ता कहते हैं, आज का यह विधान तंत्र काट के लिए है, और पहला काम घर से करना है। जिस दिन भी जाना हो, उससे एक दिन पहले शाम के समय घर के मुखिया को यह काम करना है। अच्छे से नहा-धोकर अपने हाथ से एक अंजुली चावल लें — दोनों हथेलियाँ मिलाकर, जैसे नदी में खड़े होकर अर्घ्य देने के लिए जल लेते हैं। बासमती चावल हो। उसमें थोड़ी हल्दीहल्दी, जो अर्पण में तथा देवी के पीतवर्ण स्वरूपों की माला और विधियों में प्रयुक्त होती है। और ₹11 मिला लें। एक प्लेट में रखें, अंजुली में लें और प्लेट में रख दें। उसे स्पर्श करके कहें — वे पास के जयंती माता के पीठ का उदाहरण लेते हैं — कल मैं भगवती जयंती के शक्तिपीठ आऊँगा। हे भगवतीदेवी का आदरसूचक संबोधन, जो इन प्रवचनों में विचाराधीन किसी भी स्वरूप के लिए प्रयुक्त होता है।, इस घर में जो भी समस्या है, आभिचारिक हो या दैविक, उन सबके लिए मैं आपके पास आ रहा हूँ; कृपया मेरे इस जीवन के, जिसमें इतनी समस्याएँ हैं, निदान के लिए मार्गदर्शन और सहायता करें। फिर चावल को स्पर्श करके छोड़ दें। उसी समय जो भी शक्तिपीठ या देवता का स्थान हो, उनके नाम से एक दीपकपूजन के लिए जलाया जाने वाला दीपक, जो विधि के अनुसार घी अथवा तेल का होता है। जला दें; घी का हो या सरसों तेल का, कोई बात नहीं। अगली सुबह आप निकलेंगे। जाने से पहले: मान लीजिए घर में पाँच व्यक्ति हैं और पाँचों पर तंत्र-संबंधी समस्या है। वही मुखिया एक-एक मुट्ठी चावल लेकर सबके सिर से सीधा, यानी क्लॉकवाइज़, तीन-तीन बार घुमाएगा और एक प्लास्टिक की थैली या डिब्बे में रखता जाएगा। सबका चावल एक साथ; अलग-अलग रखने की ज़रूरत नहीं। मुखिया अपने सिर से भी उतारकर रखेगा। शाम वाला चावल अलग रखना है। दोनों चावल और जो भी फूल-प्रसादी हो, लेकर चलें — पूरा परिवार जाए तो भी ठीक, अकेले जाएँ तो भी ठीक। वहाँ पहुँचकर एक सबसे महत्वपूर्ण काम है: वहाँ पूजन की जो भी व्यवस्था हो, उसमें लाइन लगाकर प्रमुख विग्रह तक पहुँचें। वहाँ के पुजारी या सेवकों से प्रार्थना करें कि हम यह चावल लाए हैं, इसे भगवती के चरणों में चढ़ाना चाहते हैं, स्पर्श हो जाए। चढ़ाने के बाद भले वे पक्षियों को डाल दें या जैसे भी उपयोग करें, ठीक है; लेकिन आपका काम यह है कि चावल वहाँ तक पहुँचे और भगवती के चरणों से स्पर्श हो। थोड़ा-सा भी वहाँ डाल दें तो बहुत अच्छा, अगर वहाँ तक जाने को मिले। लौटते समय चाहें तो श्री विग्रह लाएँ, चाहें तो देवता का फोटो, और एक नारियलनारियल — कलश पर पूर्ण फल के रूप में स्थापित, तथा बलि में प्राण के स्थान पर अर्पित। जो वहीं शक्ति पीठ में ही खरीदें। पानी वाला नारियल हो, पूरी तरह छिला न हो; छीलें भी तो जटा रहनी चाहिए। लाल चुनरी में लपेटकर उसी प्रमुख विग्रह से स्पर्श करवाएँ, रोलीबलि में अर्पित नींबू जैसी अनुष्ठान सामग्री पर लगाया जाने वाला लाल रोली चूर्ण, जिसके पश्चात जल से परिक्रमा कर अर्पण किया जाता है। और मौलीकलाई अथवा कलश पर बाँधा जाने वाला लाल-पीला सूत। धागे से बाँधकर घर ले आएँ। बाकी फूल-प्रसादी सब वहीं चढ़ा दें। पूजन-स्थान पहले से अच्छी तरह साफ रखा हो, यह तय करके कि उनका स्थान कहाँ होगा। वहाँ बाकायदा प्रतिमा या फोटो रखें, नारियल उनके पास रखें, और सुबह-शाम धूप-दीपक उसी के समक्ष जलेगा, नित्य उनका स्मरण होगा। प्रयास करें, वे कहते हैं, नज़दीक हो तो महीने में एक बार, नहीं तो तीन महीने में एक बार हाज़िरी दें; और जब भी जाएँ, चावल वाला काम फिर से करना है — अक्षतअखंडित कच्चे चावल के दाने, संकल्प लेते समय जल व पुष्प के साथ हाथ में लिए जाते हैं। बार-बार वहाँ जाना चाहिए। यह पहला काम पूरा हुआ।
घर पर तंत्र काट का दूसरा काम: हर सदस्य का नित्य पाठ
अर्गला, 32 या 108 नाम, कवच, या कम से कम दुर्गा चालीसा
दूसरा काम, वक्ता कहते हैं, नित्य पाठ है। पीठ भगवती के जिस भी स्वरूप का है — उदाहरण में जयंती माता, जो दुर्गा जी का स्वरूप हैं — उससे संबंधित कुछ पढ़ें: अर्गला का पाठ, उनकी 32 नामावली, 108 नाम या कवच का पाठ। इनमें से कोई भी एक पाठ घर का प्रत्येक व्यक्ति सुबह-शाम करे; और कुछ नहीं तो दुर्गा चालीसा तो सबको आती होगी, वही करें — पर प्रत्येक व्यक्ति करे, और पाठ के समय दीपक जलता रहे।
दूसरा काम क्या है? वक्ता कहते हैं: भगवतीदेवी का आदरसूचक संबोधन, जो इन प्रवचनों में विचाराधीन किसी भी स्वरूप के लिए प्रयुक्त होता है। का जो भी स्वरूप है — मान लीजिए, उदाहरण की तरह जयंती माता, जो भगवती दुर्गा का स्वरूप हैं — तो दुर्गा जी के उस स्वरूप से संबंधित अर्गला का पाठ हुआ, या उनकी 32 नामावलीदेवता के नामों की लिखित सूची — जैसे दुर्गा के 108 नाम, हवन में प्रत्येक नाम पर पृथक आहुति देने की सुविधा हेतु अलग से लिखे जाते हैं। हुई, या 108 नाम हुए, या कवच का पाठ हुआ। इनमें से किसी भी एक चीज़ का पाठ घर का प्रत्येक व्यक्ति सुबह-शाम करे। नहीं तो दुर्गा चालीसा तो आती होगी — दुर्गा चालीसा ही करें, लेकिन प्रत्येक व्यक्ति करे। यह काम सुबह-शाम करना है; दीपक जलता रहे और आप पाठ करते रहें।
घर के भीतर तंत्र काटने के लिए शक्तिपीठ का श्रीफल क्यों ज़रूरी है
भीतर बैठी नकारात्मक शक्तियों के विरुद्ध एक सात्विक शक्ति
वक्ता कहते हैं कि प्रश्न यह था कि घर में क्यों और कैसे करें, और उत्तर यह है कि घर में कम से कम एक शक्ति, एक सकारात्मक ऊर्जा होनी चाहिए: यदि घर पर तंत्र हो गया है और नकारात्मक शक्तियाँ घर में घुसी बैठी हैं, तो आप कितना भी करें, खुद से नहीं होगा। इसलिए एक सात्विक, पवित्र शक्ति — एक ऐसी ऊर्जा जो उस जगह से आई है, श्री नारियल यानी श्रीफल के रूप में, जिसे जगदम्बा से स्पर्श कराया गया है और जिसे उनका साक्षात स्वरूप माना जाता है — आकर वहाँ स्थापित हो, और उसी के सामने आपकी सारी पूजा-पाठ और समर्पण हो।
यह तो दो काम हो गए, वक्ता कहते हैं — आप पहले एक बार जाकर आ गए — और चूँकि प्रश्न घर का था कि घर में क्यों, घर में कैसे किया जाए, इसलिए वे कारण समझाते हैं। घर में कम से कम एक ऐसी शक्ति, ऐसी सकारात्मक ऊर्जा होनी चाहिए। अगर घर में तंत्र हो गया है, घर में शक्तियाँ घुसी बैठी हैं — नकारात्मक शक्तियाँ — तो आप कितना भी करोगे, खुद से नहीं होगा। तो एक सात्विक, पवित्र शक्ति, एक ऐसी ऊर्जा जो उस जगह से आई है, चाहे श्री नारियल, श्रीफल के रूप में — जगदम्बा"जगत की माता" — देवी का एक नाम। से स्पर्श कराए नारियल को श्री का साक्षात स्वरूप माना जाता है — वह श्रीफल आकर वहाँ स्थापित हो, और उसी के सामने आप सब पूजा-पाठ कर रहे हैं, समर्पण कर रहे हैं।
घर पर तंत्र काट का तीसरा काम: शनिवार और मंगलवार को मुख्य द्वार पर भैरव का दीपक
पीठ के रक्षक के लिए द्वार के दोनों ओर सरसों तेल के चौमुख दीपक
तीसरा काम, वक्ता कहते हैं, दो दिन — शनिवार और मंगलवार — शाम के समय है। पीठ भगवती का स्वरूप है तो उनके कोई भैरव होंगे; कोई और देवता हैं तो उनके भी कोई न कोई रक्षक होंगे (श्री राम जी का स्थान है तो हनुमान जी)। भैरव तो हर जगह होते ही हैं, पता कर लीजिए — न भी पता चले तो कोई बात नहीं। शनिवार और मंगलवार की शाम को भैरव जी के नाम से दीपक आपके मुख्य द्वार पर दोनों ओर जलने चाहिए: द्वार के दोनों ओर सरसों तेल का एक-एक चौमुख दीपक, और भगवती के सामने तो जलाएँगे ही।
अब तीसरा काम, वक्ता कहते हैं: शनिवार और मंगलवार, ये दो दिन, शाम के समय। पीठ भगवतीदेवी का आदरसूचक संबोधन, जो इन प्रवचनों में विचाराधीन किसी भी स्वरूप के लिए प्रयुक्त होता है। का स्वरूप है तो उनके कोई भैरव होंगे; कोई और देवता हैं तो उनके भी कोई न कोई रक्षक होंगे — श्री राम जी का स्थान है तो हनुमान जी का होगा। भैरव तो हर जगह होते ही हैं; आपको पता कर लेना है, और न भी पता हो तो कोई बात नहीं। शनिवार और मंगलवार की शाम के समय भैरव जी के नाम से दीपक आपके मुख्य द्वार पर दोनों ओर जलने चाहिए। सरसों तेल का चौमुख दीपकचार बत्तियों वाला चार-मुखी तेल का दीपक, भैरव व अन्य समान शक्तिशाली देवताओं के प्रयोग-अनुष्ठानों में जोड़े में या घर के कई स्थानों पर प्रयुक्त होता है। द्वार के दोनों ओर जला दीजिए — द्वार के दोनों तरफ। और भगवती के सामने तो जलाएँगे ही।
घर पर तंत्र काट के लिए सरसों, अपामार्ग और गूगल का धूना
चुने पाठ से 11 या 27 बार अभिमंत्रित सरसों, पूरे घर में धुआँ
द्वार के दीपकों के बाद, वक्ता कहते हैं, सरसों और कपूर मिलाकर अपामार्ग की लकड़ी पर जलाना है, उसी नामावली या पाठ का पाठ करते हुए जो आप कर रहे हैं — शिव जी का हो तो शिव कवच का अनुष्ठान, या शिव रक्षा स्तोत्र वाला, जो वे कहते हैं कि आगे देंगे। पहले सरसों को अभिमंत्रित करें: एक कटोरी में रखकर उसे स्पर्श करते हुए अपने पाठ का मंत्र (मान लीजिए दुर्गा जी की 32 नामावली की साधना) कम से कम 11 या 27 बार पढ़ें। फिर धूना देने वाले बर्तन में पहले अपामार्ग की लकड़ी जलाएँ, ऊपर थोड़ी सरसों डालें, और जब वह आधी जल जाए तो थोड़ा गूगल और घी डालकर पूरे घर में धुआँ कर दें।
उसके बाद, वक्ता कहते हैं, सरसों और कपूरकपूर, जिसे पूजन के अंत में जलाया जाता है। मिलाकर अपामार्गअपामार्ग (Achyranthes aspera) — एक पौधा जिसकी लकड़ी को धूनी में जलाकर घर से गंभीर नकारात्मक या तांत्रिक बाधाओं को दूर किया जाता है। की लकड़ी पर, उसी नामावलीदेवता के नामों की लिखित सूची — जैसे दुर्गा के 108 नाम, हवन में प्रत्येक नाम पर पृथक आहुति देने की सुविधा हेतु अलग से लिखे जाते हैं। या जो भी पाठ आप कर रहे हैं उसका पाठ करते हुए, जलाना है — वे कहते हैं कि चैनल पर हर देवी-देवता के कितने ही पाठ दिए हुए हैं। शिव जी से संबंधित है तो शिव कवच का अनुष्ठानएक दीर्घ अनुष्ठान — जिसमें अपने कड़े नियम होते हैं। कर लीजिए; एक और अनुष्ठान, शिव रक्षा स्तोत्र वाला, वे आगे देने की बात कहते हैं, वह भी कर सकते हैं, घर में भी। इन अनुष्ठानों को करके सरसों को अभिमंत्रित करिए। एक कटोरी में सरसों रख लें और उसे स्पर्श करते हुए — मान लीजिए दुर्गा जी की 32 नामावली वाली साधना आपने की है — सरसों हाथ में लेकर उस मंत्र का पाठ कम से कम 11 बार या 27 बार करें। फिर उसमें कपूर मिला लें। धूना देने वाले बर्तन में पहले अपामार्ग की लकड़ी जलाइए, उसके ऊपर थोड़ी-सी सरसों डालिए। जब वह जल जाए और थोड़ी बची रहे — आधा पक्का, जैसा कहा जाता है, आधा जला हुआ — उसके बाद उसमें थोड़ा गुग्गुलसुगंधित गोंद, जो धूप रूप में जलाया जाता है अथवा घी में मिलाकर आहुति दी जाती है; रक्षा और समृद्धि के प्रयोगों में विशेष प्रयुक्त। और घी डालिए और उससे पूरे घर में धुआँ कर दीजिए। पूरा घर धुआँ कर दीजिए। यह, वे कहते हैं, तीसरा काम हो गया।
घर पर तंत्र काट का चौथा काम: मिट्टी के खप्पर में रोज़ कपूर-लौंग का उतारा
बृहस्पतिवार छोड़कर हर दिन, सवा महीने से तीन महीने तक
चौथा काम उस व्यक्ति को करना है जिस पर तंत्र या विचार का प्रयोग है, प्रतिदिन शाम को, केवल बृहस्पतिवार छोड़कर — बृहस्पतिवार को नहीं करना है। लड़का हो या लड़की, और लड़की जब भी यह क्रिया करे उसके बाल खुले होने चाहिए। छोटे-छोटे मिट्टी के पात्र (खप्पर) लाकर रख लें; प्रतिदिन एक कपूर और दो लौंग उस व्यक्ति के सिर से उल्टा तीन बार घुमाएँ, उसी पीठ की शक्ति का स्मरण करते हुए, फिर घर के बाहर या तुलसी जी के पास ले जाकर उस मिट्टी के पात्र में रखकर जला दें। हर दिन नया पात्र; पुराने पात्र एक जगह इकट्ठा करते जाएँ और जब भी नदी किनारे जाएँ, वहाँ विसर्जित कर दें। सवा महीने — तीन-चार पक्ष, दो-तीन महीने — तक लगातार करने पर यह बड़े से बड़े तंत्र प्रयोग पर काम करता है।
चौथा काम क्या करना है? वक्ता कहते हैं कि जिस व्यक्ति पर तंत्र या विचार का प्रयोग है, यह चौथा काम उसे करना है, शाम के समय प्रत्येक दिन, केवल बृहस्पतिवार छोड़कर — बृहस्पतिवार को नहीं करना है। लड़की हो या लड़का; लड़की हों तो जब भी यह क्रिया करें, उनके बाल खुले होने चाहिए। क्या करना है? मिट्टी के जो खप्परकपाल पात्र, जो कुछ अर्पणों में क्षेत्र के पीठ के नाम किया जाता है। आते हैं — छोटे-छोटे मिट्टी के पात्र — वे लाकर रख लीजिए, बिल्कुल छोटे साइज़ में। और प्रत्येक दिन एक कपूरकपूर, जिसे पूजन के अंत में जलाया जाता है। और दो लौंगलौंग, जो अर्पण तथा छोटे प्रयोगों में प्रयुक्त होती है। उस व्यक्ति के सिर से उल्टा तीन बार घुमाएँ, उसी शक्ति पीठ की जो शक्ति हैं उनका स्मरण करते हुए। फिर घर के बाहर या तुलसी जी के पास ले जाकर वे लौंग-कपूर उस मिट्टी के पात्र में रखकर जला दें। प्रत्येक दिन नया पात्र रहेगा; उन पात्रों को एक जगह इकट्ठा करते जाइए, और कभी भी नदी के किनारे जाइए तो वहाँ विसर्जित कर दीजिए। वे कहते हैं, जब आप इसे लगातार करने लगेंगे तो एक समय आएगा — सवा महीने के बाद, यानी तीन पक्ष, चार पक्ष, दो-तीन महीने तक लगातार करने पर — कि आप पर कितना भी बड़ा तंत्र का प्रयोग किया गया हो, कितना भी बड़ा, उसका निपटारा हो जाता है।
घर के तंत्र काट विधान में खुले विकल्प: भोग, पाठ, महिलाएँ और आरती के दिन
मंदिर नहीं, घर के लिए बना; हर देवता का एक निश्चित आरती-दिन
वक्ता कहते हैं कि प्रश्न घर में करने का था, और वे जान-बूझकर मंदिर जाने को नहीं कह रहे, क्योंकि मंदिर में बहुत देर तक कुछ नहीं कर पाएँगे। घर के विधान में कई चीज़ें खुली हैं: अपनी इच्छा से कोई भी मीठा भोग लगाइए और सबको खिलाइए; पीठ के देवता के अनुसार पाठ चुनिए — हनुमान जी का है तो बजरंग बाण; स्त्रियाँ बिना डरे करें, उनके चार-पाँच दिन छूटें तो उतने दिन कोई और करे, फिर वे पुनः शुरू करें। सभी सुबह-शाम 15 मिनट से आधा घंटा दें और मिलकर कपूर-लौंग से आरती करें; रोज़ न हो सके तो एक दिन तय रखें — हनुमान जी का मंगलवार, दुर्गा जी का शुक्रवार या सोमवार, शिव जी का सोमवार, और काली जी का शनिवार की शाम।
वक्ता याद दिलाते हैं कि प्रश्न यही था कि घर में कैसे करें। वे मंदिर जाने को नहीं कह रहे, क्योंकि मंदिर में बहुत देर तक हम कुछ नहीं कर पाएँगे; घर में करना है, इसीलिए ऐसे बता रहे हैं। घर के लिए जो चीज़ें बताई हैं वे ये हैं: चावल ले जाना है, चावल समर्पण करना है, वहाँ से श्रीफल को कैसे घर लाना है, विग्रह कैसे स्थापित करना है, दीपक कैसे-कैसे जलाना है, मंगल-शनिवार को भैरव जी का दीपक जलाना है। भोगगृहस्थ के भोजन से पूर्व देवता के समक्ष अर्पित किया जाने वाला नैवेद्य। इत्यादि: अपनी इच्छा अनुसार मीठा भोग लगाइए और भोग सबको खिलाइए। धूना कैसे करना है, बता दिया। पाठ अपनी इच्छा अनुसार चुन लीजिए, जिस भी शक्ति का पीठ है उसके अनुसार — हनुमान जी का है तो बजरंग बाण का पाठ कीजिए। स्त्री हैं तो कीजिए, डरने की ज़रूरत नहीं — करके देखिए, लेकिन लगातार करना है। महिलाओं के जो चार-पाँच दिन छूट जाते हैं, कोई दिक्कत नहीं; उतने दिन कोई और करेगा, उसके बाद आप पुनः शुरू कीजिए। सभी करके देखें: सुबह-शाम 15 मिनट, आधा घंटा समय दीजिए; सब मिलकर आरतीदेवता की प्रतिमा के समक्ष प्रज्वलित दीपक घुमाने का अनुष्ठान — दीपदान में जब दीपक बुझने लगते हैं, तब इसे किया जाता है। इत्यादि कीजिए — कपूर-लौंग से आरती कीजिए। हनुमान जी का पीठ है तो रोज़ न कर सकें तो कम से कम मंगलवार को आरती कीजिए; दुर्गा जी का है तो शुक्रवार या सोमवार को कर लीजिए; शिव जी का है तो सोमवार — यानी प्रतिदिन नहीं कर सकते तो एक कोई दिन तय रखिए। काली जी का स्थान है, काली जी की पूजा करनी है, तो शनिवार की शाम को आरती कर लीजिए। इतना करिए, वे कहते हैं।
घर का तंत्र काट विधान क्या करता है, और उसकी सीमा
तीन महीने में फर्क, स्वप्न में मार्गदर्शन, प्रयोग पंगु, जड़ से नहीं
वक्ता कहते हैं कि इतना करेंगे तो तीन महीने में फर्क नज़र आने लगेगा। कितने भी बड़े तंत्र प्रयोग हों, जब आप निरंतरता बना लेंगे तो शक्तिपीठ की शक्ति उन्हें छिन्न-भिन्न कर देगी और ऐसा मार्ग बना देगी कि आपको स्वप्न में मार्गदर्शन मिलने लगेगा — स्वयं चीज़ें दिखेंगी, पता चलेगा कि आगे क्या करना है। वे यह नहीं कहते कि जड़ से खत्म हो जाएगा, पर वह इस लायक भी नहीं रहेगा कि आप पर प्रभाव डाल सके — शक्ति उसे पंगु बनाकर छोड़ देगी। यदि आपका प्रारब्ध अच्छा हो और आप जीव सेवा करते हों, पशु-पक्षियों की सेवा, लोगों की सहायता करते हों, हृदय से अच्छे हों, तो बहुत सहायता मिलती है और सारी परेशानियाँ जड़ से खत्म हो जाती हैं। इसमें आपको स्वयं मेहनत करनी होगी, वे कहते हैं: जादू नहीं होगा, चमत्कार नहीं होगा, पर मेहनत करेंगे तो लाभ अवश्य होगा।
वक्ता कहते हैं कि इतना करेंगे तो तीन महीने में फर्क नज़र आने लगेगा। कितने भी बड़े तंत्र के प्रयोग किए गए हों, जब आप इन चीज़ों को करते-करते निरंतरता बना देंगे, तो एक समय आएगा कि शक्ति पीठ की ऊर्जा, शक्तिपीठ की शक्ति, उन्हें छिन्न-भिन्न करके रख देगी। वे ऐसा मार्ग बना देंगी, वे कहते हैं, कि स्वयं आपको स्वप्न में मार्गदर्शन मिलना शुरू हो जाएगा — स्वयं आपको चीज़ें दिखेंगी, पता चलेगा कि आगे क्या करना है। और एक समय ऐसा आएगा — वे कहते हैं कि वे यह नहीं बोल रहे कि जड़ से खत्म हो जाएगा — कि वह इस लायक भी नहीं रहेगा कि आप पर प्रभाव डाल सके; शक्ति उसे पंगु बनाकर छोड़ देगी। और अगर उनका बस चले, वे कहते हैं — आपका प्रारब्धपूर्व कर्मों द्वारा पहले से गतिमान भाग्य का वह अंश — साधना व सत्कर्म इसकी तीव्रता को घटा सकते हैं, किंतु पूर्णतः मिटा नहीं सकते। अच्छा हो, आप जीव सेवा करते हों, जितने भी पशु-पक्षी हैं उनकी सेवा करते हों, किसी ज़रूरतमंद व्यक्ति की मदद-सहायता करते हों, हृदय से अच्छे हों — तो बहुत ही सहायता आपको मिलेगी, और ये सभी चीज़ें, जो भी परेशानियाँ हैं, जड़ से खत्म हो जाएँगी। तो यह मेहनत आपको स्वयं करनी होगी। जादू नहीं होगा, चमत्कार नहीं होगा; लेकिन मेहनत करेंगे, ये सारी चीज़ें करेंगे, तो अवश्य लाभ मिलेगा। ये चार काम करके देखिए, वे कहते हैं, और भगवती हम सभी को रक्षण प्रदान करेंगी।
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