अभिचार से पीड़ित हों तो अनुष्ठान कैसे आरंभ करें
अभिचार से पीड़ित घर के लिए उपाय क्रम पर नोट्स।
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अभिचार कभी अचानक नहीं होता: वह वहीं पकड़ता है जहाँ पूजा-पाठ छूट चुका हो
छूटी हुई पूजा ही रास्ता देती है
वक्ता कहते हैं कि कोई भी अभिचार किसी व्यक्ति पर एकदम झटके से, शून्य से नहीं होता। वह केवल उन्हीं पर अचानक जैसा लगता है जो लंबे समय से कोई पूजन, पाठ या विशेष अनुष्ठान नहीं कर रहे — दीपावली में एक बार दीया जला दिया, नवरात्रि में धूप-दीप दिखा दिया, और बस। जहाँ शुभ ऊर्जाएँ उचित मात्रा में उपस्थित नहीं होतीं, वे कहते हैं, वहीं दिक्कत होती है।
वक्ता कहते हैं कि सबसे पहली बात यह समझ लेनी चाहिए कि अभिचार कभी किसी पर एकदम झटके से नहीं होता। झटके से अभिचार, वे कहते हैं, उन्हीं पर होता है जो बहुत लंबे समय से कोई पूजन, पाठ या विशेष अनुष्ठान नहीं कर रहे। ऐसे घर की उनकी तस्वीर यह है: दीपावली में एक बार दीया जला दिया, नवरात्रि में एक बार धूप-दीप दिखा दिया, और बस। ऐसे स्थानों पर, जहाँ शुभ ऊर्जाएँ उचित मात्रा में उपस्थित नहीं होतीं, वहीं दिक्कत पकड़ लेती है।
गंभीर अभिचार में घर पर अनुष्ठान करने से परेशानी क्यों बढ़ती है
पचास किलो ऊर्जा के सामने नई शुरुआत
वक्ता उस व्यक्ति की बात करते हैं जो अभिचार से बुरी तरह ग्रसित है, जिसका शत्रु बार-बार प्रयोग कर रहा है, और जिसके लिए हनुमान चालीसा या bajrang-baan करने पर भी परेशानी बढ़ जाती है। वे कहते हैं कि जब भी कोई अनुष्ठान किया जाता है तो वहाँ उपस्थित नकारात्मक ऊर्जाओं और तत्वों को परेशानी होती है, वे नहीं चाहते कि अनुष्ठान पूर्ण हो, इसलिए वे परेशानी बढ़ा देते हैं। वे पैमाना भी बताते हैं: शत्रु के पास मान लीजिए 50 किलो ऊर्जा जमा है, जबकि पीड़ित ने अभी नई-नई ऊर्जा बनाना शुरू किया है — तो दिक्कत होगी ही। उपाय, वे कहते हैं, इसमें है कि अनुष्ठान कहाँ और कैसे आरंभ किया जाए, जिसे वे क्रमवार बताते हैं।
वक्ता स्थिति रखते हैं: कोई परिवार या व्यक्ति अभिचार से बहुत बुरी तरह ग्रसित है, घर में अनुष्ठान करने का प्रयास करता है, और परेशानी बहुत बढ़ जाती है — एकदम उठापटक, इतना कष्ट कि घर की हालत खराब हो जाती है। साथ में दूसरा पहलू: व्यक्ति बहुत जगहों पर तंत्र काट के लिए जाता है, लोग सहयोग भी करते हैं, फिर भी हो नहीं पाता, मनोबल गिरता है, श्रद्धा खंडित होने लगती है। ऐसी अवस्था में, वे कहते हैं, स्वयं के लिए और घर-परिवार की रक्षा के लिए कुछ विशेष तंत्रोक्त प्रयोग स्वयं करना आवश्यक हो जाता है। फिर वे बताते हैं कि हनुमान चालीसा, bajrang-baan या ऐसा कोई पाठ परेशानी क्यों बढ़ाता दिखता है। जब भी अनुष्ठान किया जाता है, उस स्थान पर उपस्थित नकारात्मक ऊर्जाओं और तत्वों को परेशानी होती है; वे नहीं चाहेंगे कि अनुष्ठान पूर्ण हो, इसलिए वे साधक की परेशानी बढ़ाते हैं। असंतुलन का उनका उदाहरण: शत्रु पुनः-पुनः प्रयोग करता रहा है और उसके पास मान लीजिए 50 किलो ऊर्जा है; पीड़ित ने अभी-अभी ऊर्जा बनाना शुरू किया है। तब दिक्कत तो होगी ही, वे कहते हैं — इसीलिए पहला अनुष्ठान घर के बजाय कहीं और रखना पड़ता है।
अभिचार में पहला अनुष्ठान: निकटतम मंदिर में, घर पर कभी नहीं
संख्या कम चलेगी, स्थान में समझौता नहीं
वक्ता का पहला काम: जो भी अनुष्ठान उठाया जाए — भैरव, महाभैरव, बटुक भैरव, दत्तात्रेय का वज्र पंजर कवच या वज्र कवच, या जगदंबिका की शक्तियों का कोई भी कवच — उसे पहली बार कभी घर में नहीं करना है। उसे घर के सबसे निकट उस मंदिर में करना है जहाँ बैठकर पूजन-पाठ की व्यवस्था हो। संख्या कम रखी जा सकती है, 21 या 27, और अभ्यास हो जाने पर बढ़ा ली जाए, पर सबसे पहले के समय में घर में बिल्कुल कुछ नहीं करना है।
वक्ता गिनाते हैं कि पीड़ित व्यक्ति क्या उठा सकता है: भगवान भैरव का अनुष्ठान, महाभैरव का, बटुक भैरव का, भगवान दत्तात्रेय का वज्र पंजर कवच कवच या वज्रभगवान इंद्र का अभेद्य वज्र अस्त्र — यहाँ पूर्णतः सिद्ध किए गए स्तोत्र की अभेद्य, तीव्र प्रभावशाली सामर्थ्य के उपमा-स्वरूप प्रयुक्त। कवच, या भगवती जगदंबिका की अन्य किसी शक्ति का अनुष्ठान। जो भी हो, वे कहते हैं, उसे पहली बार घर में मत कीजिए। उसे घर के सबसे निकट उस मंदिर में करना है जहाँ बैठकर पूजन-पाठ की व्यवस्था हो। यदि बहुत अधिक न हो सके तो संख्या कम रखिए — 21 या 27 — और अभ्यास हो जाने पर बढ़ा लीजिए, पर मंदिर में ही। सबसे पहले के समय में, वे दोहराते हैं, घर में बिल्कुल ही कुछ नहीं करना है।
क्षेत्रपाल के मंदिर में नित्य दीपदान: क्षेत्र रक्षक की शरण क्यों आवश्यक है
शत्रु पहले उन्हीं को पूजता है, इसलिए आप भी
वक्ता का दूसरा काम: केवल पाठ पर्याप्त नहीं; क्षेत्र के क्षेत्रपाल, ग्राम देवता या ग्राम देवी के मंदिर में नियमित जाना है। कारण: अभिचार करने वाले क्षेत्र रक्षक के बिना कुछ नहीं कर पाते — वे ग्राम देवता, डीह बाबा और क्षेत्रपाल का पूजन देते ही देते हैं — इसलिए उन्हीं देवता की शरण लेने से शत्रु के विरुद्ध वहाँ रोक लग जाती है। यदि रक्षक ज्ञात न हों तो गाँव या शहर का सबसे पुराना मंदिर ही वह स्थान माना जाए। वहाँ प्रतिदिन सरसों के तेल के दो मध्यम atta-deepak: एक मंदिर के क्षेत्र रक्षक के नाम, एक कुल की रक्षा करने वाली शक्तियों (कुलदेवी या कुलदेवता, ज्ञात हों या न हों) के नाम, घर की रक्षा की प्रार्थना के साथ।
वक्ता कहते हैं कि केवल पाठ ही नहीं करना है। सदैव स्मरण रखना है कि जिस क्षेत्र में रहते हैं उसके कोई न कोई क्षेत्र रक्षक होंगे — क्षेत्रपाल, ग्राम देवताकिसी गांव या क्षेत्र के रक्षक देवता — देवता ज्ञात न हो तो प्रायः उस क्षेत्र के सबसे प्राचीन मंदिर के रूप में पहचाने जाते हैं — क्षेत्रीय सुरक्षा हेतु क्षेत्रपाल के साथ आवाहित। या ग्राम देवी। यदि पता है कि वे कौन हैं तो उनके मंदिर में नियमित रूप से जाना ही जाना है। कारण: अभिचार करने वाले क्षेत्र रक्षक के बिना इनमें से कुछ कर नहीं पाते। ग्राम देवता, डीह बाबा, क्षेत्रपाल — इन सबका पूजन वे देते ही देते हैं। तो वहाँ जाने से उसी स्थान पर आपकी रक्षा के लिए, ऐसे प्रयोग करने वाले शत्रुओं के विरुद्ध, रोक लग जाती है। यदि पता न हो कि क्षेत्र रक्षक कौन हैं, तो आसपास के मंदिरों में देखिए कि सबसे पुराना कौन सा है; गाँव या शहर का सबसे पुराना मंदिर ही उस क्षेत्र की रक्षिका और रक्षक माना जाए। वहाँ प्रतिदिन पहला काम: आटे के दो दीये बनाकर दो atta-deepak अवश्य जलाने हैं — मध्यम आकार के, बहुत बड़े नहीं — सरसों का तेल डालकर। पहला दीपक उस क्षेत्र रक्षक के नाम जिनका वह मंदिर है; दूसरा अपने कुल की रक्षा का। यदि पता न हो कि कुल के देवी-देवता (कुलदेवी या कुलदेवताकुल का अधिष्ठात्री देवता, जिसका निर्णय किसी अन्य साधना से पूर्व कर लेना चाहिए।) कौन हैं, तो वहाँ कहना है: हे प्रभु, जो भी मेरे कुल की रक्षा करने वाली शक्तियाँ हैं, उनके निमित्त यह दीपदान है; और जगदंबा से, या जिस भी भगवती का वह मंदिर हो, प्रार्थना करनी है कि यह विनती उन तक पहुँचा दें, हमारे घर का रक्षण हो, हम आपकी शरण में हैं।
सावधानी: दीपक कभी सीधे नंगी भूमि पर नहीं रखा जाता
नीचे पत्ता, फूल या छोटी रंगोली
वक्ता कहते हैं कि दीपक कभी भी सीधे जमीन पर नहीं रखना चाहिए। उसे पलाश के पत्ते पर या किसी फूल पर रखा जा सकता है; नहीं तो वहाँ रोली, हल्दी या चावल के आटे से किसी भी प्रकार की छोटी सी रंगोली बनाकर उसके ऊपर रखें। सीधे भूमि पर कभी नहीं, वे कहते हैं — स्मरण रखिएगा।
क्षेत्र रक्षक के मंदिर में नित्य दीपदान बताते हुए वक्ता एक ऐसा नियम जोड़ते हैं जो अपने आप में पूरा है: दीपक कभी नीचे नंगी जमीन पर नहीं रखा जाता। उसे पलाश के पत्ते के ऊपर या किसी पुष्प के ऊपर रखा जा सकता है। यदि दोनों न हों तो वहाँ रोलीबलि में अर्पित नींबू जैसी अनुष्ठान सामग्री पर लगाया जाने वाला लाल रोली चूर्ण, जिसके पश्चात जल से परिक्रमा कर अर्पण किया जाता है।, हल्दी या चावल के आटे से किसी भी प्रकार की छोटी सी रंगोली बनाकर उसके ऊपर रखें। सीधे भूमि पर कभी नहीं, वे कहते हैं, और इसे स्मरण रखने को कहते हैं।
मुख्य द्वार पर संध्या के दो दीपक: कुल रक्षक भैरव और क्षेत्रपाल भैरव
जिस ओर जिस नाम से, रोज़ वैसे ही
वक्ता का तीसरा काम: शाम के समय मुख्य द्वार के पास चौखट पर दो दीपक जलाने हैं — चौखट न हो तो द्वार के दोनों ओर। एक कुल रक्षक, परिवार के रक्षक भैरव के नाम; दूसरा क्षेत्रपाल भैरव के नाम। दिशा देखने की आवश्यकता नहीं, पर पहले दिन जिस ओर जिस नाम से जलाया, अगले दिनों भी उसी ओर उसी नाम से जलाना है। उद्देश्य, वे कहते हैं, यह है कि घर की चौखट पर इन शक्तियों का आवागमन आरंभ हो जाए।
वक्ता का तीसरा काम घर से जुड़ा है। शाम के समय, यदि घर में चौखट है तो उसके पास मुख्य द्वार के पास दो दीपक जलाने हैं; चौखट न हो तो मुख्य द्वार के दोनों ओर। पहला दीपक कुल रक्षक के नाम; दूसरा भैरव जी के नाम — क्षेत्र रक्षक, क्षेत्रपाल के नाम। वे कहते हैं कि दाहिने-बाएँ की दिशा देखने की आवश्यकता नहीं, किसी भी ओर जला दीजिए। पर पहले दिन जिस ओर जिस नाम से जलाया, अगले दिनों भी उसी ओर उसी नाम से। उनका उदाहरण: घर से बाहर निकलते समय द्वार पर दाहिनी ओर अपने कुल रक्षक भैरव का सरसों तेल का दीया — उनकी जानकारी हो चाहे न हो — रक्षा के निमित्त; बाईं ओर क्षेत्रपाल भैरव के नाम का दीया। उद्देश्य यह कि घर की चौखट के ऊपर इन शक्तियों का आवागमन आरंभ हो जाए।
पूर्ण किए अनुष्ठान को किसी पुराने सिद्ध पीठ या शक्ति पीठ पर दोहराना
वहाँ सात दिन से एक स्तर पूरा
वक्ता का चौथा काम: मंदिर का अनुष्ठान पूर्ण हो जाए — मान लीजिए दत्तात्रेय के वज्र कवच के 11, 21 या 41 दिन, जितना हो सका — तो घर के पास किसी सिद्ध पीठ, प्रसिद्ध शक्ति पीठ या ऐसे दिव्य पीठ पर जाएँ जो 100 या 200 साल पुराना हो और क्षेत्र में जागृत पीठ माना जाता हो; वहाँ की देवी-देवता कोई भी शक्ति हो सकती है। वहाँ वही अनुष्ठान कम से कम 3, 5 या 7 दिन दोहराएँ, दूर हो तो वहीं रहकर, पास हो तो आते-जाते: प्रतिदिन 108 पाठ और प्रतिदिन हवन, बहुत बृहद नहीं। वहाँ सात दिन, वे कहते हैं, एक स्तर पूरा कर देते हैं: जिन शक्तियों का कवच जपा जा रहा था वे जागृत हो जाती हैं, और उनसे जुड़ी योगिनियाँ, रक्षिकाएँ और भैरव साधक के साथ चलने लगते हैं।
वक्ता का चौथा काम तब शुरू होता है जब अनुष्ठान पूर्ण हो जाए। उदाहरण: भगवान दत्तात्रेय के वज्रभगवान इंद्र का अभेद्य वज्र अस्त्र — यहाँ पूर्णतः सिद्ध किए गए स्तोत्र की अभेद्य, तीव्र प्रभावशाली सामर्थ्य के उपमा-स्वरूप प्रयुक्त। कवच का अनुष्ठान घर के पास के मंदिर में 21 दिन किया, या 11, या 41 — जितना हो सका। हर अनुष्ठान की विधि-विधान, वे कहते हैं, उससे संबंधित वीडियो में है। पहले से देखकर रखना है कि घर के पास कोई सिद्ध पीठ, कोई प्रसिद्ध शक्ति पीठ या कोई वैसा दिव्य पीठ है — 100 या 200 साल पुराना, जिसकी उस क्षेत्र में बहुत मान्यता हो कि यह जागृत पीठ है। वह किसी भी शक्ति का हो सकता है; उससे मतलब नहीं। घर के पास के मंदिर में जो अनुष्ठान किया, वही वहाँ जाकर पूर्ण करना है। यदि वह दूर है या रोज नहीं जा सकते तो वहीं रहकर कीजिए; रोज जा सकते हैं तो जाकर आइए। कम से कम तीन, पाँच या सात दिन कीजिए, जितना अधिक हो सके। प्रतिदिन 108 पाठ और प्रतिदिन हवन — सारा विधि-विधान सामान्य रूप से, बहुत बृहद नहीं, पर वहाँ रहकर। जब उस तीर्थ क्षेत्र, सिद्ध पीठ या जागृत पीठ में सात दिन का अनुष्ठान हो जाए, वे कहते हैं, तो एक स्तर पूर्ण हो गया। जिन शक्तियों का कवच जपा जा रहा था वे जागृत हो जाती हैं, और उनसे संबंधित देव-तत्व — योगिनी शक्तियाँ, रक्षिकाएँ, संबंधित भैरव — सब प्रमुखता से साधक के साथ चलना आरंभ कर देते हैं।
अभिचार-नाशक अनुष्ठान में कष्ट होना स्वाभाविक: दूसरों पर निर्भरता नहीं, स्वयं का प्रयास
सौ में दो-चार का ही दूसरों से समाधान
वक्ता कहते हैं कि पूरे अनुष्ठान के दौरान शरीर में जो भी कष्ट हो, घर में जो उपद्रव हो, उसे यथासंभव इग्नोर करना है: जिन्हें हटाया जा रहा है वे यह प्रयास देखकर दिक्कत देंगी ही। "हम कुछ भी करते हैं तो परेशानी बढ़ती है, इसमें ताकत नहीं, समय नहीं" — यह रोना, वे कहते हैं, आपकी निजी समस्या है। समस्या किसी और के कंधे पर रख देने से स्थायी समाधान जरूरी नहीं — सौ में दो-चार का ही होता है — और जब तक शत्रु जागृत है और बार-बार अभिचार कर रहा है, कोई कब तक निर्भर रहेगा; दूसरों से अभिचार नाश करवाइए, पर साथ में स्वयं भी तैयार होइए। वे जोड़ते हैं कि 90 से 99 प्रतिशत लोग घर की पूजा छोड़कर परेशानी आने पर ही समाधान ढूँढते हैं; समय वैसे ही मैनेज करना होगा जैसे फिल्म और ट्रिप के लिए होता है; छोटा-छोटा, धीरे-धीरे कीजिए, क्योंकि एक बार देव-कृपा हो गई तो प्रेत-पिशाच कहीं के नहीं रहते।
वक्ता कहते हैं कि पूरे अनुष्ठान के दरमियान शरीर में जिस भी प्रकार का कष्ट हो, घर में जो उपद्रव हो, उसे इग्नोर करने का प्रयास कीजिए। कष्ट तो होगा, वे कहते हैं, क्योंकि जब वे चीजें जानेंगी कि हमें हटाने के लिए इतना प्रयास हो रहा है तो दिक्कतें देंगी ही। फिर वे उस शिकायत पर आते हैं जो बार-बार सुनते हैं: "हम कुछ भी करते हैं तो परेशानी बढ़ती है, इसमें ताकत नहीं है, कैसे करेंगे, इतना समय नहीं दे पाएँगे।" यह, वे कहते हैं, आपकी निजी समस्या है। समस्या किसी और के कंधे पर रख देने से यह जरूरी नहीं कि वह कभी स्थायी रूप से सुलझे — सौ में दो-चार लोगों का ही ऐसे स्थायी समाधान होता है। ऐसा नहीं कि सामने वाला तंत्र काट नहीं करेगा; पर जब शत्रु जागृत है और अभी भी अभिचार कर रहा है, तो वह बार-बार करेगा, फिर आप कितने समय तक किसी पर निर्भर रहेंगे? अभिचार नाश करवाइए, साथ में स्वयं भी तैयार होइए। वे इसे अपनी ही गलती कहते हैं कि घर में पूजन-पाठ छोड़ दिया, कोई विशेष अनुष्ठान नहीं किया, और बैठे रहे कि जब कोई कुछ करेगा तब हम करेंगे। 90 प्रतिशत — बल्कि 99 प्रतिशत — लोग यही करते हैं: परेशानी हो जाने पर समाधान ढूँढते हैं; पहले से मजबूत होकर कोई नहीं बैठता, और पहले तो लोग इन चीजों का मजाक उड़ाते हैं। इसलिए "समय नहीं हो पाएगा" का रोना छोड़ना होगा: फिल्म देखने, वीकेंड ट्रिप, गर्लफ्रेंड-बॉयफ्रेंड से मिलने के लिए समय मैनेज हो जाता है, पैसे मैनेज हो जाते हैं — पर पूजन-पाठ-अनुष्ठान की बात आते ही बहाने आते हैं। उन बहानों से किसी और का कुछ नहीं जाता; परेशानी, दवाइयों में खर्च, आपसी मनमुटाव, तनाव, बीमारी, रुका काम — सब आपका ही है। उनकी अंतिम सलाह: समस्या आपकी है तो समाधान भी स्वयं करने का प्रयास कीजिए; मोटिवेट होइए और जितना हो सके चलिए। बहुत लंबा जरूरी नहीं — छोटा-छोटा करके कीजिए। धीरे-धीरे भी करेंगे तो, वे कहते हैं, ये चीजें इतनी ताकतवर हैं कि एक बार देव-कृपा हो गई तो ये प्रेत-पिशाच कहीं के नहीं रहते; संबंधित वीडियो, वे कहते हैं, यह समझा देंगे।
मंदिर और सिद्ध पीठ के चरणों के बाद अनुष्ठान को क्रमशः घर लाना
पहले पाँच-ग्यारह आवृत्ति, दीपदान सबसे बाद
वक्ता कहते हैं कि जब द्वार के दीपक और तीर्थ क्षेत्र वाला चरण मिलकर एक स्तर पूरा कर दें, तब अनुष्ठान घर आता है — पर सीधे नहीं। सुबह: अपने इष्ट को स्नान कराकर केवल सामान्य धूप-दीप; शाम: अब भी मंदिर में ही, चाहे 15 मिनट का हो या एक घंटे का। फिर 11 या 21 दिन बीतने पर घर में छोटे-छोटे अनुष्ठान, उदाहरण के लिए बटुक भैरव का अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्र — जिसमें, वे कहते हैं, हर प्रकार के अभिचार को नष्ट करने का सामर्थ्य है, वह तत्व जागृत होने पर बटुक नकारात्मक शक्तियों को अपने कपाल में पकड़ लेते हैं — पर मात्र 5 या 11 बार, उससे अधिक नहीं। तीन-छह महीने में, बाहर का अनुष्ठान दो-तीन बार दोहराने पर, आत्मविश्वास और सामर्थ्य बढ़ता है और शक्तियों के जागरण का आभास होता है; तभी घर पर दीपदान आरंभ हो — अष्टमी को भैरव के नाम 108 या 8 दीप — धीरे-धीरे बढ़ाते हुए।
वक्ता क्रम दोहराते हैं: घर के मुख्य द्वार पर शुरू किया, फिर तीर्थ क्षेत्र में अनुष्ठान किया; जब यह एक स्तर पूरा हो गया तब घर में अनुष्ठान शुरू होता है। लेकिन कैसे? घर में सीधे नहीं। सुबह का अनुष्ठान केवल सामान्य: अपने इष्ट-आराध्य को स्नान कराकर सामान्य धूप-दीप। शाम के समय अनुष्ठान अब भी मंदिर में ही, चाहे 15 मिनट का हो या एक घंटे का। फिर धीरे-धीरे, जब 11 या 21 दिन और बीत जाएँ, घर में छोटा-छोटा अनुष्ठान। घर में क्या, इसका उनका उदाहरण: बटुक भैरव के अष्टोत्तरशतनामकिसी देवता के 108 नामों का पाठ — सहस्रनाम (1000 नाम) से छोटा, और प्रायः संगत हवन या दैनिक जप की गणना हेतु प्रयुक्त। का स्तोत्रदेवता की स्तुति का पाठ, जिसे बिना दीक्षा के भी पढ़ा जा सकता है, जबकि मंत्र के लिए दीक्षा अपेक्षित है।। वे कहते हैं इसमें बड़ा सामर्थ्य है — हर प्रकार के अभिचार को नष्ट करने का सामर्थ्य भगवान बटुक भैरव के शतनाम स्तोत्र में है; वे कपाल में सभी नकारात्मक शक्तियों को पकड़ लेते हैं, एक बार वह तत्व जागृत हो जाए तो। घर में बैठकर पहले इसका जाप मात्र पाँच बार या 11 बार, उससे ज्यादा नहीं — सामान्य रहिए, सामान्य कीजिए। जैसे-जैसे इसे बढ़ाते जाएँ — तीन महीना हो गया, छह महीना — और बाहर का अनुष्ठान पुनः-पुनः करें, दो बार, तीन बार, तो आत्मविश्वास पूरा बढ़ चुका होता है, सामर्थ्य बढ़ चुका होता है, और उन ऊर्जाओं के आवागमन का आभास होता है: यहाँ शक्तियाँ जागृत हो रही हैं, इनकी कृपा हमारे साथ चल रही है। तब घर पर दीपदान आदि आरंभ करें: अष्टमीपक्ष की आठवीं तिथि, जो शाक्त कर्मों के लिए विशेष अनुकूल मानी जाती है। के दिन भगवान भैरव के नाम 108 दीप या आठ दीप, यह जरूर। वहाँ से, वे कहते हैं, धीरे-धीरे इन चीजों को बढ़ाइए।
पंचबलि: अनुष्ठान के साथ-साथ चलने वाले पाँच नित्य अर्पण
तृप्त जीव बुरा प्रारब्ध काटते हैं
वक्ता कहते हैं कि जब तक ये अनुष्ठान चलें, एक नियम सबके लिए है और अभिचार-ग्रस्त के लिए तो बहुत जरूरी: घर में प्रतिदिन बनने वाला भोजन गाय, कुत्ते और कौवे को जरूर जाए। समय-समय पर आटा और चीनी का बुरादा मिलाकर किसी निर्जन स्थान पर बरगद के नीचे चींटियों के लिए डालें — घर के आसपास कभी नहीं, क्योंकि कोई उन पर चढ़ेगा तो प्राण-हानि होगी और उसका कष्ट देने वाले को भोगना पड़ेगा। पंचबलि का पाँचवाँ भाग है किसी योग्य या दीन-दुखी भूखे व्यक्ति को रोज भोजन कराना, केवल ब्राह्मण को ही नहीं (हालाँकि पर्व-काल में ब्राह्मण को दान अवश्य दें)। जब जीवों की आत्मा तृप्त होकर आशीर्वाद देती है, वे कहते हैं, तो बुरा प्रारब्ध कटता है, तभी साधनाएँ फलीभूत होती हैं।
वक्ता एक नियम रखते हैं जिसे सबको तब तक निभाना है जब तक ये अनुष्ठान चलें — सबके लिए अनिवार्य नहीं, वे कहते हैं, पर अभिचार-ग्रस्त के लिए बहुत जरूरी: घर में प्रतिदिन जो भोजन बनता है उसमें से तीन प्राणियों — गाय, कुत्ते और कौवे — को जरूर जाए। उसके सिवाय समय-समय पर आटा और चीनी का बुरादा मिलाकर किसी निर्जन स्थान पर बरगद के वृक्ष के नीचे चींटियों के लिए डालें। घर के आसपास नहीं, वे कहते हैं: वहाँ चींटियों को नहीं डालना चाहिए, क्योंकि कोई उन पर चढ़ेगा तो प्राण-हानि होगी और उसका कष्ट भी आपको होगा। इसलिए किसी दूर जगह जाकर डालें। पंचबलि में पाँचवीं चीज है किसी योग्य व्यक्ति को, या ऐसे दीन-दुखी को जिसे भोजन की आवश्यकता है, भोजन देना। जरूरी नहीं कि केवल ब्राह्मण को ही दें; ब्राह्मण को पर्व-काल में दान जरूर दीजिए, इच्छा हो तो नित्य भी, कोई दिक्कत नहीं — पर कोई दीन-दुखी भूखा व्यक्ति है तो उसे भी रोज खिला देना चाहिए। यह करेंगे तो, वे कहते हैं, जीवों की आत्मा तृप्त होकर जब आशीर्वाद देगी तो बुरे प्रारब्धपूर्व कर्मों द्वारा पहले से गतिमान भाग्य का वह अंश — साधना व सत्कर्म इसकी तीव्रता को घटा सकते हैं, किंतु पूर्णतः मिटा नहीं सकते। कटेंगे — तभी आपकी साधनाएँ फलीभूत होंगी। अंत में वे कहते हैं कि इन पाँच प्रमुख कार्यों को, और साथ के बाकी कार्यों को, थोड़ा-थोड़ा करके अपने नियम में लाइए; लाभ, वे कहते हैं, जरूर होगा।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।