रिश्तेदार की पुतला क्रिया के विरुद्ध 36 दिन का बगलामुखी अनुष्ठान — तांत्रिक की वाणी स्तंभित और उपसंहार की सीख
साधक परिवार पर हुई पुतला क्रिया को 36 दिन के बगलामुखी अनुष्ठान से पलटने की सत्य घटना, और घर के बंधन, उपसंहार विधि तथा शरणागत शत्रु की रक्षा पर वक्ता की सीख।
10 notes, in the order they are taught. Jump to any one.
1 also answer a common question
Questions this answers
1 of the notes below are questions in their own right. Scroll for more.
धर्मनिष्ठ परिवार की उन्नति से ईर्ष्या — अभिचार क्रिया की जड़
मित्र या रिश्तेदार ईर्ष्या करता है, और जगदम्बा अपने उपासक की रक्षा करती हैं
वक्ता कहते हैं कि जब कोई परिवार धर्म के मार्ग पर आजीविका कमाता है और पूजा-पाठ में समर्पित रहता है, तो भगवती की कृपा से पूरा घर आध्यात्मिक, आर्थिक और व्यावहारिक रूप से उन्नति करता है — और यही देखकर आसपास के लोग, विशेषकर कोई मित्र या रिश्तेदार, ईर्ष्या करने लगते हैं; यह होता ही होता है। आधे लोग इसलिए दुखी हैं कि अगला आदमी सुखी कैसे है। वे जो अनुभव सुनाते हैं वह दिखाता है कि ईर्ष्या में व्यक्ति किस स्तर तक गिर सकता है, और जगदम्बा अपने परम सेवक साधकों की कैसे रक्षा करती हैं।
वक्ता आरंभ में कहते हैं कि जब हम सत्य और धर्म के पथ पर चलते हुए धर्म-संगत कार्य से आजीविका कमाते हैं, तो हमारी सही प्रकार से उन्नति होती है। ऐसे समय में जब हम पूजा-पाठ भी कर रहे हों और सनातन संस्कृति के प्रति समर्पित हों, तो भगवतीदेवी का आदरसूचक संबोधन, जो इन प्रवचनों में विचाराधीन किसी भी स्वरूप के लिए प्रयुक्त होता है। और देवों की कृपा से हमारे बाल-बच्चे, पूरा परिवार आध्यात्मिक रूप से उन्नति करता है; सब सही तरीके से चलते हैं और कोई दोष नहीं रहता। पर, वे कहते हैं, यही वह समय भी है जब आसपास के लोग आपकी आध्यात्मिक, आर्थिक और व्यावहारिक उन्नति देखकर ईर्ष्या करने लगते हैं — विशेषकर कोई मित्र या रिश्तेदार, और यह होता ही होता है। आपकी उन्नति से सब परेशान नहीं हो सकते, पर आधे लोग इसलिए दुखी होते हैं कि अगला आदमी सुखी कैसे है: उसके पास धन हो या वह कष्ट में हो, पर वह सुखी कैसे है, हमेशा हँसता-मुस्कुराता कैसे रहता है? यह, वक्ता कहते हैं, आजकल का सबसे बड़ा नियम हो गया है। आज का अनुभव, वे कहते हैं, इसी विषय पर है: ईर्ष्या के कारण व्यक्ति किस हद तक, किस स्तर तक गिर सकता है और क्या कर सकता है — और जगदम्बा"जगत की माता" — देवी का एक नाम। सत्य पथ पर चलने वाले, अपने परम सेवक साधकों की किस प्रकार रक्षा करती हैं। वे जोड़ते हैं कि ऐसा अनुभव आज सुनें या वर्षों बाद, यदि अपने इष्ट के प्रति समर्पित हैं तो यह सोच में सकारात्मक परिवर्तन अवश्य लाएगा।
सत्य घटना: देवास के साधक परिवार पर रिश्तेदार की क्रिया — शरीर फूलना और रक्त विकार
शरीर फुलाने वाली क्रिया; दवा का असर थोड़ी देर ही
वक्ता मध्य प्रदेश के देवास ज़िले के एक मित्र साधक की घटना सुनाते हैं — बहुत पुराने साधक, सुखी और धर्मनिष्ठ परिवार। एक रिश्तेदार ने ईर्ष्यावश किसी बहुत अच्छे तांत्रिक से घर पर और साधक की माताजी पर ऐसी क्रिया करवा दी जिसमें शरीर फूलने लगता है। मेडिकल रिपोर्ट में रक्त-संबंधी विकार आया; शरीर बार-बार फूलता, दवा का थोड़ा असर होता, फिर वैसा ही हो जाता, और दिक्कतें बढ़ती गईं।
वक्ता कहते हैं कि यह अनुभव मध्य प्रदेश के देवास ज़िले के एक मित्र साधकसाधना करने वाला; सामान्य पूजक से भिन्न, नियमबद्ध अभ्यासी। का है, बहुत पुराने साधक, अपना अच्छा घर। परिवार आध्यात्मिक श्रेणी पर सही तरीके से चढ़ रहा था: पुश्तैनी घर, रोज़ पूजा-पाठ, सुबह-शाम नियम से आरती जैसे शुद्ध सनातन परिवार में होती है, बच्चे भी पूजा-पाठ सीखते और करते, माता-पिता की बात मानते, बड़े-बुज़ुर्गों का सम्मान — एक खुशहाल, अच्छा परिवार। ऐसे समय में, वे कहते हैं, उनके अपने ही एक रिश्तेदार ने ईर्ष्यावश आसपास के किसी बहुत अच्छे तांत्रिक से मिलकर इनके घर — निवास स्थान — पर और इनकी माताजी पर ऐसी क्रिया करवा दी जिसमें शरीर फूलने लगता है। मेडिकली जो रिपोर्ट आ रही थी उसमें शरीर में कहीं खून से संबंधित समस्या, रक्त-संबंधी विकार आ रहे थे। दिक्कतें बढ़ने लगीं: शरीर बार-बार फूल जाए, दवा का थोड़ा प्रभाव पड़े, फिर वैसा ही हो जाए।
साधक को अपने घर पर हुई क्रिया का पता कैसे चलता है?
घर का हल्कापन जाना, अनायास क्लेश, और स्वप्न से इष्ट की चेतावनी
वक्ता कहते हैं कि जिस घर में देवी-देवताओं की कृपा रहती है उसका हल्कापन और सकारात्मकता महसूस की जा सकती है; क्रिया के बाद घर में अनायास क्लेश होने लगे, और साधक होने से परिवार को भाँपते देर न लगी कि कुछ गलत हुआ है। जब साधना करते हैं, वे कहते हैं, तो इष्ट शक्ति किसी न किसी माध्यम से जानकारी दे ही देती है, और सबसे विशेष माध्यम स्वप्न है। स्वप्न में इन्हें पातालक क्रिया दिखाई गई — किसी के नाम से तंत्रोक्त विधि से अभिमंत्रित पुतला खराब जगह गाड़ा गया — और यह भी कि रिश्तेदार घर आकर बैठे और तांत्रिक वस्तुएँ रख गए ताकि नकारात्मक शक्तियाँ घर पहुँचें।
वक्ता बताते हैं कि यह परिवार पूर्णिमा के दिन नियमित हवन करता था। और, वे कहते हैं, जब घर में सकारात्मक माहौल और देवी-देवताओं की कृपा रहती है तो घर का हल्कापन, सकारात्मकता महसूस की जा सकती है। पर जब यह प्रक्रिया हो गई तो घर में अनायास ही क्लेश होने लगे। चूँकि साधक थे, इन्हें भाँपते देर न लगी कि यहाँ कुछ गलत हो रहा है या हुआ है। वे कहते हैं कि जब आप साधकसाधना करने वाला; सामान्य पूजक से भिन्न, नियमबद्ध अभ्यासी। हैं और साधना करते हैं तो यह साफ पता चल जाता है: आपकी इष्ट शक्ति किसी न किसी माध्यम से जानकारी दे ही देती है, और सबसे विशेष माध्यम स्वप्न है। स्वप्न में इन्हें दो चीज़ें दिखाई गईं। एक, जिसे पातालक क्रिया कहा जाए — तंत्र में बहुत खतरनाक — जिसमें किसी के नाम से पुतला को तंत्रोक्त विधि-विधान से अभिमंत्रित करके किसी खराब जगह गाड़ दिया जाता है। दूसरी, वे कहते हैं, यह कि रिश्तेदार ने वह करवाया ही नहीं, बल्कि इनके घर आकर बाकायदा बैठकर सब गड़बड़ कर दी — यानी आकर कुछ तंत्रोक्त वस्तुएँ घर में रखकर चले गए, जिन्हें पहुँचाना था ताकि नकारात्मक शक्तियाँ घर में पहुँच जाएँ।
गृह-बंधन की सीमा: अभिमंत्रित तांत्रिक वस्तुएँ लेकर घुसा आगंतुक
भक्त के लिए अतिथि ईश्वर है, और आक्रमणकारी उसी का लाभ उठाता है
वक्ता कहते हैं कि घर कितना भी सुरक्षित कर लें, यदि कोई व्यक्ति ऐसी क्रियाएँ करवाकर किसी चीज़ को लेकर घर में घुस जाता है तो बंधन उस तरह काम नहीं करता जैसा करना चाहिए, और दिक्कतें शुरू हो जाती हैं। इस घटना में रिश्तेदार तांत्रिक को "मित्र" कहकर साथ लाए, आने का कोई बहाना बताया, सामान्य मेहमान की तरह चाय-पानी किया — और भक्ति-मार्गी घर के लिए हर अतिथि ईश्वर समान है, तो कोई शक न हुआ — और घर में अपनी राक्षस प्रवृत्ति दिखाकर चले गए।
वक्ता यहाँ पहली सीख देते हैं: घर कितना भी सुरक्षित कर लीजिए, यदि कोई व्यक्ति ऐसी क्रियाएँ करवाकर किसी चीज़ को लेकर आपके घर में घुस जाता है तो बंधन उस तरह काम नहीं करता जैसा करना चाहिए। तब चीज़ें दिक्कत देना शुरू कर देती हैं। वे बताते हैं कि हुआ कैसे। रिश्तेदार उस तांत्रिक प्रवृत्ति के व्यक्ति को साथ लेकर आए कि हमारे मित्र हैं, और आने का कोई कारण बता दिया; चाय-पानी हुआ, सामान्य बातचीत हुई जैसी होती है। और भक्ति-मार्ग पर चलने वाले आध्यात्मिक व्यक्ति के लिए घर आया कोई भी मेहमान ईश्वर समान है — आवभगत में कमी थोड़े करेंगे। तो ठीक से स्वागत हुआ, पर ये लोग घर में अपनी राक्षस प्रवृत्ति दिखाकर चले गए। तब तक, वे कहते हैं, कहानी हो चुकी थी। जैसे ही परिवार ने भाँपा — अधिक दिन नहीं हुए थे, पर लगने लगा कि यहाँ कुछ दिक्कत है — इन्होंने वक्ता को बताया कि ऐसी-ऐसी चीज़ें हो रही हैं, ऐसा हुआ था, ऐसे व्यक्ति आए थे, और पूछा कि इस स्थिति में क्या करें, कौन-सा प्रयोग करें।
पुतला क्रिया के लिए वक्ता का बताया उपाय: 36 दिन का बगलामुखी अनुष्ठान, साथ में भैरव मूल मंत्र
शत्रु-नाशक संकल्प, दो साधनाएँ साथ, कुछ दिनों में राहत
चूँकि यह परिवार भगवती दुर्गा के साथ भगवती बगला की भी नियमित उपासना करता था, वक्ता ने इन्हें 36 दिन का बगलामुखी महानुष्ठान उठाने को कहा, जिसके संकल्प में पूरा उच्चारण करना था "परमंत्र परयंत्र परतंत्र शदनार्थे मम परिवारस्य सर्व शत्रु कृत्य प्रयोग इत्यादि विनाशार्थे" (जैसा प्रतिलेख में है), और फिर जो साधना करनी है उसका संकल्प। साथ में भैरव मूल मंत्र — भैरव अष्टमी के लिए प्रकाशित महाभैरव मंत्र — का प्रयोग विधान करना था, जिसे वे पहले ही सिद्ध कर चुके थे; वे कहते हैं कि हर गृहस्थ को वह मंत्र करके रखना चाहिए, परिवार की रक्षा में उसका विशेष प्रभाव है। तीन-चार दिन में माताजी का स्वास्थ्य सुधरने लगा, दस-ग्यारह दिन में सब नियंत्रण में आ गया, और साधक ने फिर भी 36 दिन का संकल्प पूरा किया।
वक्ता कहते हैं कि चूँकि यह परिवार भगवती दुर्गा के साथ-साथ जगदम्बा के स्वरूप भगवती बगला की भी नियमित साधना-उपासना करता था, उन्होंने उस समय कहा: भगवती बगलामुखी से संबंधित अनुष्ठानएक दीर्घ अनुष्ठान — जिसमें अपने कड़े नियम होते हैं। उठाइए, संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। लेकर इसे कीजिए। संकल्प में इसका पूर्ण रूप से उच्चारण करना था: परमंत्र परयंत्र परतंत्र शदनार्थे मम परिवारस्य सर्व शत्रु कृत्य प्रयोग इत्यादि विनाशार्थे — और उसके बाद, जो साधना करनी है उसका संकल्प कि उस साधना को मैं कर रहा हूँ। इस प्रकार संकल्प करवाकर उन्होंने 36 दिन का महानुष्ठान करने को कहा। साथ में, वे कहते हैं, भैरव जी की एक उपासना है जो वे सिद्ध साबरी विद्यालय चैनल पर डालने वाले हैं; उसका मूल मंत्र पहले ही डाल चुके हैं — भैरव अष्टमी के लिए जो महाभैरव मंत्र है, वही मूल मंत्र। उसे अवश्य करना चाहिए: उन्होंने कहा था कि प्रत्येक गृहस्थ को वह मंत्र करके रखना चाहिए, क्योंकि अपने परिवार की रक्षा के लिए उसका बहुत विशेष प्रभाव है। परिवार उस मूल मंत्र की साधना पहले ही कर चुका था; अब उसका प्रयोग विधान करना था। तो ये दो साधनाएँ, वे कहते हैं, इन्हें एक साथ आरंभ करने को कहा गया। यह साधना शुरू करने के तीन-चार दिन के भीतर ही माताजी का स्वास्थ्य ठीक होने लगा। परिवार में जिन्हें भी शारीरिक परेशानियाँ थीं वे भी ठीक होकर सामान्य हो गईं, और परिवार का माहौल काफी हल्का होने लगा। दस-ग्यारह दिन होते-होते सब ठीक हो गया और चीज़ें पूरी तरह नियंत्रण में आ गईं। क्योंकि साधक थे और सब वैसे ही कर रहे थे, इन्होंने 36 दिन का संकल्प पूर्ण किया।
बगलामुखी अनुष्ठान से दोनों अपराधियों की वाणी क्यों स्तंभित हुई
प्रतिकार-क्रिया को नकारात्मक मसान विद्या से पलटना ध्यान-श्लोक की तरह उलटा पड़ता है
वक्ता कहते हैं कि बात परिवार के ठीक होने पर रुकी नहीं: जिसने घर में घुसकर कृत्य किया और जिसने करवाया, दोनों की वाणी स्तंभित हो गई — गला फूल गया, नस दब गई, वोकल कॉर्ड में सूजन — ठीक वैसे जैसे भगवती बगला का ध्यान कहता है कि वे बाएँ हाथ से शत्रु की जीभ पकड़कर दाहिने हाथ के मुद्गर से प्रताड़ित करती हैं। वे कारण बताते हैं: परिवार जब रोज़ बलि विधान से क्रिया काट रहा था, तो तांत्रिक को पता चलता और वह अपनी विद्या से पलटता — भगतवाल की चीज़ें, उनकी जानकारी में ज्वालापंथी, जिस बड़े मसान को लोग "बादशाह" कहते हैं उस प्रकार की, जिसका नाम वे नहीं लेना चाहते — नकारात्मक में; कितनी भी बड़ी हो, चीज़ नकारात्मक है और गलत में प्रयोग हो रही है, और बार-बार पलटते रहने से इधर भगवती ने नियंत्रण किया और उधर उसकी जीभ न हिली। दोनों को एक जैसी परेशानी होने से बाद में पक्का हुआ कि ऑफिस के मित्र ने जिस "जानकार" से मिलवाया था, वही तांत्रिक था।
वक्ता कहते हैं कि आपको आश्चर्य होगा कि बात परिवार के ठीक होने पर रुकी नहीं: सबसे बड़ी आश्चर्य की बात उन दो व्यक्तियों की है — जिसने घर में घुसकर यह कृत्य किया और जिसने करवाया। देखिए, वे कहते हैं, भगवती बगलामुखी के स्वरूप में हम क्या बोलते हैं: "जिग्रमादाय करण देवी वामनेन शत्रु परपिड्यंतिम" (जैसा प्रतिलेख में है) — बाएँ हाथ से शत्रु की जीभ पकड़कर दाहिने हाथ से मुद्गर यानी गदा से प्रताड़ित करती हैं। ठीक यही घटना उनके जीवन में घटी: दोनों की वाणी स्तंभित हो गई। दोनों का गला फूल गया; ऐसी नस दबी कि वोकल कॉर्ड में ही सूजन आ गई, और दोनों बोलने में असक्षम होकर रह गए। क्यों? जब परिवार रोज़ बलि विधान आदि कर रहा था, विचार पलटने के लिए, ताकि जो तंत्र क्रियाएँ हुई हैं वे कटें, तो उधर तांत्रिक महाशय को पता चलता और वे भी अपनी मंत्र विद्या का प्रयोग करते। वे भगतवाल की चीज़ें थीं; वक्ता की जानकारी में वे ज्वालापंथी चीज़ें थीं, नकारात्मक में प्रयोग — उस प्रकार की जो बहुत बड़े मसान के रूप में पूजित हैं, जिन्हें लोग बादशाह नाम देते हैं, जिनका नाम वे नहीं लेना चाहते। कितनी भी बड़ी हो, वे कहते हैं, चीज़ नकारात्मक ही है और गलत में प्रयोग हो रही है। आजकल तो भूत-प्रेतों को भी बड़ा स्थान दे दिया गया है; कलियुगचार युगों में वर्तमान और अंतिम युग, जिसमें वक्ता के अनुसार कुछ साधनाएँ वर्जित हैं और कुछ विशेष रूप से फलदायी। है, कुछ भी हो सकता है। तो तांत्रिक जब उस क्रिया को बार-बार पलटता रहा, तो इधर भगवती ने चीज़ें नियंत्रित कर दीं — पर उसकी ऐसी स्थिति हो गई कि जीभ न हिले। 36 दिन की साधना पूरी होने पर परिवार को रिश्तेदार की स्थिति पता चली, और बाद में यह भी कि जो मेहमान बनकर आए थे वही तांत्रिक थे। साधक के ऑफिस के एक अच्छे मित्र ने "हमारे एक जानकार" से मिलने का सुझाव दिया था जो ऐसी चीज़ें ठीक करते हैं, और साधना शुरू करने से पहले ये उनसे मिलने गए थे — वही व्यक्ति घर आकर स्वयं करके गए थे। तब केवल शक था और सीधे लोग थे, प्रमाण नहीं था, तो किसी पर आरोप नहीं लगा सकते थे; जब दोनों को एक जैसी परेशानी मिली तो बात पूरी तरह पक्की हो गई।
किसी भी प्रयोग से पहले उपसंहार विधि जानें: अश्वत्थामा की चेतावनी
जो अस्त्र लौटाना न आए, वह चलाने वाले पर ही पड़ता है
वक्ता कहते हैं कि तंत्र मार्ग पर कोई भी अनुष्ठान, साधना या प्रयोग करें, सबसे बड़ी बात यह है कि उसे शांत करने की विधि भी आपको आनी चाहिए। विशेषकर यदि किसी अस्त्र का प्रयोग कर रहे हैं, या सीधे किसी शत्रु के नाम से संकल्प लेकर प्रयोग कर रहे हैं, तो उपसंहार की विधि पता होनी चाहिए — नहीं तो अश्वत्थामा जैसी स्थिति हो जाती है, आपकी विद्या आपके लिए ही घातक सिद्ध हो सकती है, जैसे अश्वत्थामा को ब्रह्मास्त्र छोड़ना आता था पर वापस लौटाने की विधि का ज्ञान नहीं था।
वक्ता कहते हैं कि इसके आगे भी सुनिए। तंत्र मार्ग पर आप कोई भी अनुष्ठान कर रहे हों, कोई भी साधना, कोई भी प्रयोग — उस प्रयोग को करने से पहले सबसे बड़ी बात है कि उसे शांत करने की विधि भी आपको आनी चाहिए। विशेषकर, वे कहते हैं, यदि किसी अस्त्र का प्रयोग कर रहे हैं, या किसी शत्रु पर सीधे उसके नाम से संकल्प लेकर या कोई चीज़ करके प्रयोग कर रहे हैं, तो उसे शांत करने की विधि — यानी उपसंहार की विधि — भी पता होनी चाहिए। नहीं तो सीधे-सीधे जान लीजिए कि अश्वत्थामा जैसी स्थिति हो जाती है: आपकी विद्या आपके लिए ही घातक सिद्ध हो सकती है। वे याद दिलाते हैं कि अश्वत्थामा को ब्रह्मास्त्रतांत्रिक व पौराणिक कथाओं का सर्वोच्च व अंतिम अस्त्र — किसी अद्वितीय व निर्णायक शक्ति वाले प्रयोग या विद्या हेतु प्रतीकात्मक रूप से प्रयुक्त। छोड़ने का, ब्रह्मास्त्र विद्या का ज्ञान तो था, पर उसे वापस लौटाने की विधि नहीं आती थी — वह ज्ञान ही उसके पास नहीं था।
शरणागत शत्रु को छोड़ने का कर्तव्य: तर्पण और अभिषेक से उपसंहार
दंडित जोड़ी के पास दो रास्ते थे, और जगदम्बा ने मति स्वीकार की ओर मोड़ी
वक्ता कहते हैं कि साधक ने हर विधि-विधान पूरा किया था — पाताल क्रियाएँ, साथ में यंत्र पर तर्पण आदि — तो पूरा तंत्र समूल नष्ट हुआ, भगवती ने दंड दिया, और सामने वाले को पता चल गया कि कहाँ से हो रहा है; उनकी स्थिति दिन-पर-दिन बिगड़ी और कोई तोड़ न रहा। रास्ते दो ही थे — अपने गुरु की शरण, या सीधे परिवार से बात — और कोई सामने आकर गलती माने यह बहुत कम होता है, पर जगदम्बा ने ऐसी मति फेरी कि दोनों ने स्वीकार किया और ठीक कर देने की विनती की, क्योंकि दोनों के घर डगमगाने लगे थे। शरणागत की रक्षा, वे कहते हैं, हर साधक का कर्तव्य है जब किसी पर प्रयोग किया हो — और भगवती बहुत कम, हज़ारों साधकों में किसी एक के साथ, ऐसा करती हैं कि दंडित दुष्ट शरणागत हो। तो उपसंहार विधि — तर्पण और अन्य क्रियाएँ, अभिषेक आदि — से भगवती की उग्रता शांत की गई, भैरव जी की चीज़ें उनके विधि-विधान से, और लगभग सप्ताह भर में दोनों की परेशानी हटी; उन्होंने वचन दिया कि ऐसा फिर कभी नहीं करेंगे।
वक्ता कहते हैं कि जब साधक ने यह क्रिया की और हर विधि-विधान पूरा किया — ये पाताल क्रियाएँ थीं, साथ में यंत्र पर तर्पणहवन व मार्जन के साथ किया जाने वाला जल आदि द्वारा देवता या पितरों को अर्पित तर्पण। आदि की क्रिया भी पूरे विधि-विधान से की थी — तो पूरा तंत्र समूल नष्ट हुआ। भगवती ने दंड भी दिया, और सामने वाले को पता भी चल गया कि वहाँ ऐसी चीज़ें हो रही हैं, क्योंकि वे ही कर रहे थे। उनकी स्थिति दिन-पर-दिन खराब होने लगी, और कोई तोड़ नहीं था। दो ही रास्ते थे: या तो अपने गुरु या किसी के पास शरणागत हों, या सीधे परिवार से बोलकर निपट लें — और ऐसा बहुत कम होता है कि कोई सामने आकर अपनी गलती स्वीकार करे। पर जगदम्बा"जगत की माता" — देवी का एक नाम। ने ऐसी मति फेरी कि दोनों ने सामने से स्वीकार किया: गलती हो गई, माफ कर दीजिए, कृपा करके एक बार ठीक कर दीजिए। घर-परिवार वाले लोग थे, दोनों की पारिवारिक परिस्थिति डगमगाने लगी थी। तब साधक ने वक्ता से उपसंहार की विधि पूछी: ये चीज़ें सामने आ गई हैं, इन्होंने स्वीकार भी कर लिया, बार-बार माफी माँग रहे हैं — अब क्या करना चाहिए? क्योंकि, वक्ता कहते हैं, शरणागतजो शरण में आ गया हो, जिसने फल देवता पर छोड़ दिया हो। की रक्षा करना हर साधकसाधना करने वाला; सामान्य पूजक से भिन्न, नियमबद्ध अभ्यासी। का कर्तव्य है ऐसी परिस्थिति में जब किसी पर प्रयोग किया गया हो। और यह स्थिति शायद हज़ारों साधकों में किसी एक के साथ होती है कि किसी दुष्ट को दंड दिया गया और वही आकर शरणागत हो जाए। भगवती ऐसा बहुत कम करती हैं; बहुत कम साधकों के जीवन में ऐसा होता है, इसलिए यह अनुभव विशेष है। तो उपसंहार की विधि से — तर्पण और अन्य क्रियाएँ, अभिषेकजल और अन्य निर्धारित द्रव्यों से देवता की प्रतिमा या प्रतीक का विधिवत स्नान कराना। आदि के माध्यम से — भगवती की उग्रअनुष्ठान अथवा देवता का उग्र भाव, जो सौम्य भाव के विपरीत है।ता शांत की गई। भैरव जी की जो भी चीज़ें थीं उनके वैसे विधि-विधान करके शांति की प्रक्रिया की गई। इसे शांत होने में लगभग सप्ताह भर लगा, फिर दोनों की जो परेशानी थी वह हटी। उन्होंने बार-बार क्षमा माँगी और वचन दिया कि जीवन में कभी ऐसी चीज़ें नहीं करेंगे।
साधक अपने परिवार की रक्षा करता है, पर आक्रमणकारी का नाश नहीं करता
पर-विद्या-ग्रसनी विद्या होते हुए भी, अपनी ऊर्जा का क्षय क्यों
वक्ता कहते हैं कि दीक्षित साधक होने से इनके पास पर-विद्या-ग्रसनी विद्या थी और चाहते तो दोनों को पूरी तरह समूल नष्ट कर सकते थे। पर साधक का काम यह नहीं कि दूसरे की चीज़ें खराब करे, बाँधे — अपनी अवनति क्यों करना, अपनी ऊर्जा का क्षय क्यों करना? यह उनका कार्य नहीं था और उन्होंने ऐसा कुछ किया भी नहीं; अपने परिवार की रक्षा और बचाव के लिए जो चाहिए था, वही किया।
वक्ता कहते हैं कि चाहते तो साधक यहाँ पर-विद्या-ग्रसनी विद्या — जो दूसरे की विद्या को ग्रस लेती है — का प्रयोग कर सकते थे, क्योंकि वे दीक्षित साधक हैं; उससे दोनों को पूरी तरह समूल नष्ट कर सकते थे। पर, वे कहते हैं, साधकसाधना करने वाला; सामान्य पूजक से भिन्न, नियमबद्ध अभ्यासी। का काम यह नहीं होता कि हम दूसरे की चीज़ें खराब करें, बाँधें, यह सब करें। अपनी अवनति क्यों करना; अपनी ऊर्जा का क्षय क्यों करना? तो यह उनका कार्य नहीं था, न ही उन्होंने ऐसा कुछ किया। अपने परिवार की रक्षा और अपने बचाव के लिए जो भी चीज़ें थीं, वही उन्होंने कीं।
साधना का लक्ष्य: दंड देने और शरण देने दोनों में सक्षम, शक्ति का दुरुपयोग कभी नहीं
सतत निष्काम साधना से जगदम्बा का शरणागत दूसरों को शरण देने योग्य बनता है
वक्ता कहते हैं कि सबको इस अनुभव से सीखना चाहिए कि इतने सक्षम हो जाएँ कि दूसरे को दंड दे सकें, फिर उसकी रक्षा भी कर सकें, और अपने परिवार की भी — शत्रु शरणागत हो तो उसे बचाने की विधि भी आपके पास हो। यह दो-चार-दस दिन की साधना से नहीं होता, बल्कि सतत निष्काम भाव से, या सकाम में भी उतनी ही भौतिक कामना से जितने से काम चल जाए; ऐसे जो जगदम्बा के शरणागत होते हैं वे दूसरों को शरण देने योग्य बन जाते हैं। केवल शक्ति पाकर उसका दुरुपयोग — प्रदर्शन, बात-बात पर किसी पर प्रयोग करके कष्ट देना और वर्चस्व जमाना — साधना का उद्देश्य कभी नहीं है, और जिसे वही चाहिए उसे इस मार्ग में नहीं आना चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि सभी को इस अनुभव से सीखना चाहिए: इतने सक्षम हो जाइए कि दूसरे को दंड दे सकें और उसकी रक्षा भी कर सकें, अपने परिवार की भी रक्षा कर सकें। यदि शत्रु शरणागत हो तो आपके पास वह विधि भी होनी चाहिए जिससे उसे बचा सकें। यहाँ तीन-चार सीखें हैं, वे कहते हैं, और इतना क्षमतावान साधक हर किसी को बनना चाहिए। ये चीज़ें, वे कहते हैं, दो दिन, चार दिन, दस दिन की साधना से नहीं होतीं। यह सतत, निरंतर निष्काम भाव से — या सकाम भाव में भी भौतिक की उतनी ही कामना से जितने से हमारी चीज़ें चल जाएँ — साधना करने से आता है। वह करके यदि हम जगदम्बा"जगत की माता" — देवी का एक नाम। के शरणागत होते हैं, तो कहते हैं न कि जो जगदम्बा के शरणागतजो शरण में आ गया हो, जिसने फल देवता पर छोड़ दिया हो। हो जाते हैं वे दूसरों को शरण देने योग्य बन जाते हैं; इतनी सामर्थ्य जगदम्बा दे देती हैं। तो हमें प्रयास करना चाहिए कि हम दूसरों के भी कल्याण की कामना कर सकें, दूसरों का भला कर सकें। केवल शक्ति प्राप्त करना और उसका दुरुपयोग करना — प्रदर्शन, बात-बात पर किसी पर प्रयोग करके उसे कष्ट पहुँचाना और अपना वर्चस्व स्थापित करना — यह साधना की कोई कामना नहीं, वे कहते हैं; यह साधना का उद्देश्य नहीं है। और यही चाहिए तो इस मार्ग में ऐसे गलत ढंग से नहीं आना चाहिए।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।