बिना गुरु के दिव्य दृष्टि कैसे प्राप्त हो — कुल-शक्ति का मार्ग, मसान का खतरा, और भुजा गलत क्यों निकलती है
बिना गुरु के दिव्य दृष्टि कैसे प्राप्त होती है, और बिना मार्गदर्शन शक्ति-सिद्धि तथा भुजा के जोखिम।
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बिना गुरु के दिव्य दृष्टि: कुल-शक्ति की कृपा या एक शक्ति की लंबी उपासना
नए साधक को एकाएक सिद्धि नहीं
वक्ता कहते हैं कि नए साधक को कभी भी एकाएक शक्ति-सिद्धि नहीं मिलती, इसीलिए गुरु महत्वपूर्ण हैं। बिना गुरु के दिव्यदृष्टि तभी संभव है जब अपने कुल की कोई कुल शक्ति, या साधक के प्रारब्ध को पूरी तरह समेटने की क्षमता रखने वाली कोई शक्ति — कोई योगिनी या किसी शक्ति पीठ की शक्ति — कृपा कर दे। दूसरा रास्ता है किसी एक शक्ति की लगातार प्रतिदिन लंबी सेवा-पूजा, जिससे यह क्षमता स्वतः उत्पन्न हो जाती है; वह किस स्तर तक जाएगी — देवता से वचन मिलेगा या नहीं, कुछ बोल या सुन पाएंगे या नहीं — यह साधक पर निर्भर है।
वक्ता कहते हैं कि किसी भी साधक के लिए सबसे पहली और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि साधना में आने वाले नए साधक को कभी भी एकाएक शक्ति-सिद्धि नहीं मिलेगी। इसीलिए, वे कहते हैं, गुरु महत्वपूर्ण होते हैं। बिना गुरु के दिव्यदृष्टि कैसे मिले, इस पर वे कहते हैं कि यह तभी संभव है जब अपने कुल की कोई कुल शक्ति कृपा कर दे, या ऐसी सामर्थ्य वाली कोई शक्ति जो साधक के प्रारब्धपूर्व कर्मों द्वारा पहले से गतिमान भाग्य का वह अंश — साधना व सत्कर्म इसकी तीव्रता को घटा सकते हैं, किंतु पूर्णतः मिटा नहीं सकते। को पूरी तरह समेटने की क्षमता रखती हो — कोई योगिनी, किसी शक्ति पीठ की कोई शक्ति — कृपा कर दे। वे दूसरा रास्ता भी जोड़ते हैं: यदि कोई अपनी किसी एक शक्ति की लगातार प्रतिदिन सेवा-पूजा और पूजन-पाठ लंबे समय तक करता रहे, तो वह क्षमता भीतर स्वतः उत्पन्न हो जाती है। परंतु वह किस स्तर तक जाएगी — किसी देवी-देवता से वचन ले पाएंगे या नहीं, कुछ बोल पाएंगे या नहीं, कुछ सुनाई देगा या नहीं — यह साधक पर निर्भर करता है।
एक रात्रि की मसान सिद्धि: सच, पर बिना गुरु के अनियंत्रित
एक रात के पीछे सालों की साधना
वक्ता कहते हैं कि मसान एक तांत्रोक्त शक्ति है जिसे आजकल ग्रामीण इलाकों में परेशानी होने पर बहुत लोग घर में बिठा देते हैं। YouTube पर दिखने वाली एक रात्रि की सिद्धि सच है, पर यह शक्ति अत्यंत अनियंत्रित होती है: इसे नियंत्रित कर सकने वाली शक्ति सिद्ध करने में सालों लगते हैं, और बिना उस नियंत्रण के आवाहन कर दिया और यह प्रकट हो गई तो घर में पूरी कलह और तांडव करवा देती है। जिसे एक रात्रि में सिद्धि या जल्दी शक्ति-वचन मिलता है, उसके पीछे गुरु का हाथ होता है जो बुनियादी कार्य करता है और बिगड़ने पर बचाता है; उस जानकारी के बिना सीधा हाथ डालना घाटा है।
एक शक्ति साधक को कहां तक ले जा सकती है, इसके उदाहरण में वक्ता मसान की बात करते हैं। वे कहते हैं कि यह छुपा नहीं है कि ग्रामीण इलाकों में बहुतों के घर में मसान पूजित होते हैं — एक तांत्रोक्त शक्ति, जिसे आजकल घर में कोई परेशानी होने पर लोग बिठा देते हैं; कुछ न कुछ बैठ ही जाता है। वे कहते हैं कि सदैव ध्यान रखिए कि इस प्रकार की शक्तियां एक-एक रात्रि में सिद्ध होती हैं — YouTube पर दिखने वाले "एक रात्रि में यह कर लो" वाले वीडियो। वास्तविकता, वे कहते हैं, यही है कि एक रात्रि में होती है, पर उतना जिगर चाहिए, क्योंकि यह बहुत अनियंत्रण वाली शक्ति है, कभी जल्दी नियंत्रित नहीं होती। उस एक रात्रि की सिद्धि के लिए वैसी एक शक्ति सिद्ध करने में सालों लग जाएंगे जो इस पर नियंत्रण कर सके। यदि वह शक्ति नहीं है और आवाहन दे दिया, यह प्रकट हो गई, तो घर में पूरी तरह कलह करवा देगी, पूरे घर में तांडव कर देगी। इसीलिए, वे कहते हैं, गुरु को आवश्यक कहा जाता है: किसी को एक रात्रि में सिद्धि या कोई शक्ति वचन में आ रही है, तो उसके पीछे उसके गुरु का हाथ होता है। गुरु साथ खड़े रहते हैं, बुनियादी कार्य कर देते हैं, जिससे शिष्य उसे संभाल पाता है, और जब भी वह बिगड़े तो बचाने के लिए होते हैं। यह सारी जानकारी न हो और सीधा हाथ डाल दिया, तो कहीं न कहीं घाटा है।
मसान जैसी घरेलू शक्ति अपने फायदे के लिए काम करती है, इसलिए अकेले कभी नहीं साधी जाती
भोग की कीमत पर भेद
वक्ता कहते हैं कि घर में किसी भी स्वरूप में पूजित मसान जैसी शक्ति में यह क्षमता होती है कि वह अपने फायदे के लिए काम करे, आपके नहीं — इसे शराब का भोग चाहिए तो चाहिए, और कुछ समय तक वह स्वप्न के माध्यम से परेशान करती है। प्रसन्न हो जाए तो वह उपासक को किसी का भी भेद लेने में सक्षम बना देती है और जब तक सेवा-पूजा सही चले, भेद देती रहती है — यही वह दिव्यदृष्टि और बूझा (गांव में भुजा या शोधन-क्रिया) है जो लोग चाहते थे। वह कितना सही देगी, यह उपासक की अपनी साधनात्मक ऊर्जा पर निर्भर है। इसीलिए, वे कहते हैं, ऐसी शक्ति की साधना स्वतंत्र रूप से कभी नहीं करनी चाहिए: नियंत्रण न रहे तो वह किसी के कहने में नहीं चलती।
वक्ता कहते हैं कि यदि मसान जैसी शक्ति घर में किसी भी स्वरूप में पूजित हो, तो इन शक्तियों में यह क्षमता होती है कि वे अपने फायदे के लिए काम करें — आपके नहीं, स्वयं के फायदे के लिए। इन्हें शराब का भोग चाहिए तो चाहिए। तब वे स्वप्न के माध्यम से दिखाती हैं और कुछ समय तक परेशान करती हैं। पर यदि शक्ति प्रसन्न हो गई, वे कहते हैं, तो वह स्वतः आपको इतना क्षमतावान बना देती है कि आप उसका प्रयोग करके किसी का भी भेद ले सकते हैं। जब तक आप उसकी सेवा-पूजा सही तरीके से करेंगे, वह भेद देती रहेगी। यानी जो आप चाहते थे वह मिल गया: दिव्यदृष्टि, दोनों शक्ति, और आप बूझा ले सकेंगे — जिसे गांव में कहीं भुजा, कहीं शोधन-क्रिया कहते हैं। वह कितने प्रतिशत सही देगी, वे कहते हैं, यह आपकी ऊर्जा, आपकी साधनात्मक ऊर्जा पर निर्भर करता है। इसीलिए वे कहते हैं कि इस प्रकार की शक्तियों की साधना स्वतंत्र रूप से कभी नहीं करनी चाहिए: इस पर नियंत्रण नहीं रहेगा तो यह किसी के कहने में नहीं चलेगी।
भुजा कुछ लोगों के लिए सटीक और कुछ के लिए गलत क्यों निकलती है
सामने वाले का अपना कवच तय करता है
वक्ता कहते हैं कि कोई शक्ति किसी व्यक्ति का पूरी तरह सटीक बूझा तभी देती है जब उसका घर खुला हो — बड़ी सकारात्मक शक्तियों का बंधन न हो, उसके कुल और पितृ शक्तियों का कवच कमजोर हो या साथ न दे रहा हो — तब शक्ति भीतर घुसकर एक-एक भेद निकाल पाती है। यदि सामने वाले के पास किसी देवता का प्रत्यक्ष वचन नहीं, पर उसने लंबी साधनाएं की हैं, जैसे भगवती बगलामुखी की, तो वह हर जगह बंधन और कीलन में है, घर और स्वयं सुरक्षित है, और शक्ति उसका भेद नहीं ले पाती। तब, वे कहते हैं, वह ना नहीं बोलेगी: गलत भुजा देना शुरू कर देगी, क्योंकि उसे भोग चाहिए और वह स्वतंत्र है, उस पर कोई शक्ति नियंत्रण नहीं कर रही। इसलिए सटीक भुजा देने वाले भी हर किसी का भुजा नहीं दे सकते।
वक्ता कहते हैं: मान लीजिए आपको ऐसी कोई शक्ति बहुत आसानी से मिल गई और आपने बूझा लेना शुरू कर दिया। सामने बैठे व्यक्ति का पूरी तरह सटीक भुजा तभी संभव है जब उसके घर में बड़ी, सकारात्मक, तीव्र शक्तियों का बंधन न हो — घर खुला हो, उसके कुल और पितृ शक्तियों का कवच और बंधन कहीं कमजोर हो या वे साथ न दे रहे हों। तभी शक्ति पूरी तरह भीतर घुसकर एक-एक भेद दे पाती है। पर मान लीजिए ऐसा व्यक्ति आ गया जिसके पास प्रत्यक्ष रूप से भुजा लेने की शक्ति नहीं, किसी देवी-देवता का प्रत्यक्ष वचन नहीं, पर अप्रत्यक्ष रूप से उसने बहुत साधनाएं की हुई हैं — जैसे भगवती बगलामुखी की साधना लंबे समय तक। आपने उस पर अपनी शक्ति चलाई, तो वह कभी सही भुजा नहीं दे पाएगी, क्योंकि वह बंधन में है। उसने हर जगह बंधन बांध रखा है, कीलित कर रखा है; घर सुरक्षित है, स्वयं सुरक्षित है, उसकी साधनाओं की ऊर्जा इतनी प्रबल है कि आप उसका भेद नहीं ले पाएंगे। तब क्या होगा, वक्ता कहते हैं, कि शक्ति गलत भुजा देना शुरू कर देगी। वह कभी ना नहीं बोलेगी; बस गलत देगी, क्योंकि उसे भोग चाहिए और आपके फायदे-घाटे से उसे मतलब नहीं — वह स्वतंत्र है, उस पर कोई शक्ति नियंत्रण नहीं कर रही। यह, वे कहते हैं, दिव्यदृष्टि की एक और परत है जो सबको पता होनी चाहिए: जो किसी का सटीक भुजा दे देते हैं, वे हर किसी का नहीं दे सकते।
काल भैरव के अधीन बंधी शक्ति सच बताती है, खाली हाथ लौटना भी
नियंत्रण तय करता है कौन किसके अधीन
वक्ता कहते हैं कि यदि कोई भगवान काल भैरव या अपने कुल भैरव की उपासना करके उनकी ऊर्जा और मंत्रों से मसान जैसी शक्ति को उनके नीचे बांधकर नियंत्रित रखे, तो वह सच बताती है — क्योंकि साधक उससे सीधे स्वतंत्र रूप से नहीं निपट रहा, बल्कि उसे हर कार्य के लिए सेवक की तरह रखे है। जो कार्य वह न कर पाए, उसे बताना पड़ेगा: "यहां गड़बड़ी है, मैं यह नहीं कर पाया, खाली हाथ आया हूं।" पर यदि शक्ति स्वतंत्र हो और साधक उसके अधीन, तो वह जैसे चलाए वैसे चलना पड़ता है।
वक्ता कहते हैं कि तस्वीर तब बदल जाती है जब कोई भगवान काल भैरव या अपने कुल भैरव की उपासना कर ले और उनकी शक्तियों, ऊर्जाओं और मंत्रों के द्वारा मसान जैसी शक्ति को बांधकर रखे, उसे बंधन दे, ताकि वह उनके नीचे नियंत्रित रहे। तब, वे कहते हैं, वह सच बताएगी — क्योंकि आप उससे स्वतंत्र रूप से, सीधे नहीं निपट रहे। आप उसे एक तरह से हर कार्य के लिए काम की तरह रखे हुए हैं। उसे काम करना पड़ेगा; सही से नहीं होगा तो वह बताएगी: "हां, यहां गड़बड़ी है, मैं यह नहीं कर पा रहा, खाली हाथ आया हूं।" पर यदि शक्ति स्वतंत्र रहे और आप उसके अधीन रहें, वे कहते हैं, तो वह जैसा चलाएगी वैसा आपको चलना पड़ेगा।
सयानों की चाल: सुरक्षित साधक को अशुद्ध करके उसका भेद लेना
अपने देवता में दृढ़ भक्ति ही बचाव
वक्ता एक सीधे-सादे साधक का वर्णन करते हैं जिसके पास प्रत्यक्ष सिद्धि नहीं और जानकारी कम है, पर साधनाओं के कारण दैविक शक्तियां अप्रत्यक्ष रूप से उसका साथ देती हैं। जब वह ऐसे व्यक्ति के पास जाता है जिसने मसान सिद्ध कर रखा है और जो इस लाइन में खराब और अच्छा करना जानता है, तो वह भांप लेता है कि सही बूझा नहीं आ रहा और साधक को अशुद्ध करने का प्रयास करता है — प्रसाद या अभिमंत्रित जल से — ताकि उसका शरीर अपवित्र हो और कवच निष्प्रभावी हो जाए; तभी उसका भेद मिल पाता है। अबूझ साधक फंस जाता है, उसके प्रभाव में आ जाता है और सोचने लगता है "मेरे पास कुछ नहीं, ये बाबा बहुत बड़े जानकार हैं", जबकि वह शक्ति उसके समक्ष कुछ नहीं। यही धोखा, यही षड्यंत्र इस लाइन को सयानों की लाइन कहलवाता है, वे कहते हैं; इसलिए जिस देवी-देवता की भक्ति करें, उन पर दृढ़ भक्ति और दृढ़ विश्वास रखें।
वक्ता कहते हैं कि एक बात और जान लीजिए: ऐसा साधक लीजिए जिसके पास प्रत्यक्ष सिद्धि नहीं और जो उतना जानकार भी नहीं, सीधा-सादा व्यक्ति, जिसने साधनाएं की हुई हैं और अप्रत्यक्ष रूप से उसके पास शक्तियां हैं — साथ देने वाली दैविक शक्तियां। मान लीजिए वह ऐसे व्यक्ति के पास गया जिसने मसान सिद्ध कर रखा है और जिसके पास इस भक्ति लाइन का ज्ञान है कि यहां कैसे खराब करना है, कैसे अच्छा करना है। वह जब अपनी शक्ति चलाएगा और देखेगा कि सही बूझा नहीं आ रहा, तो वह भांप लेगा, और फिर सामने वाले साधक को किसी भी तरह अशुद्ध करने का प्रयास करेगा — प्रसाद के माध्यम से, या कुछ जल अभिमंत्रित करके, कुछ ऐसा जिससे उसका शरीर अपवित्र हो और उसके पास जो कवच इत्यादि हैं वे निष्प्रभावी हो जाएं। यह हो तभी उसका भेद पूरी तरह मिल पाता है। लोग यह कर देते हैं, वे कहते हैं। सामने वाला साधक अबूझ हो, उसे इन बातों का ज्ञान न हो, तो वह फंस जाता है और फिर उसके प्रभाव में आ जाता है — हालांकि वह शक्ति उसके समक्ष कुछ नहीं है। बेचारा, क्योंकि उसके पास प्रत्यक्ष सिद्धि नहीं है, परेशान होकर सोचने लगता है: "मेरे पास तो कुछ नहीं, सामने वाले बाबा बहुत बड़े जानकार हैं।" इस तरह धोखा देना एक तरह से षड्यंत्र है, और इसीलिए, वक्ता कहते हैं, इस लाइन को सयानों की लाइन कहा जाता है — इसीलिए वे सयाने कहे जाते हैं। इसलिए आप किसी भी देवी-देवता की भक्ति कर रहे हैं तो उन पर दृढ़ भक्ति रखिए, दृढ़ विश्वास रखिए।
साधनाएं बदलते रहना: दिव्य दृष्टि रोकने वाली सबसे बड़ी गलती
एक साल के गणपति अथर्वशीर्ष से दिखने वाला ओरा
वक्ता कहते हैं कि दिव्यदृष्टि बिल्कुल मिलती है, और साधकों की सबसे बड़ी गलती है बहुत ज्यादा बदलना — एक साल गणेश जी की उपासना, "इनसे कुछ नहीं हुआ", फिर YouTube पर किसी बाबा को देखकर उनका करने लगे। नई साधना करिए, वे कहते हैं, पर पुरानी मत छोड़िए। यदि कोई सिर्फ गणपति अथर्वशीर्ष को पकड़कर लंबे समय तक चले, तो उसे किसी की आवश्यकता नहीं पड़ेगी: एक समय पर शक्तियां स्वतः मिल जाती हैं और जो जानकारी चाहिए वह मिलने लगती है। प्रमाण में वे दो-तीन लोगों का हवाला देते हैं जो उनके अथर्वशीर्ष पोस्ट करने के करीब एक साल बाद भी कर रहे हैं; एक ने हजारों पाठ कर लिए हैं, और जब भी वक्ता उसे देखते हैं, उसका आभामंडल गजब का प्रबल और क्षमता से भरा हो गया है।
वक्ता कहते हैं कि हां, दिव्यदृष्टि बिल्कुल प्राप्त होती है — और गलती जो लोग करते हैं, सबसे बड़ी गलती, यह कि वे बहुत ज्यादा बदलते हैं। आज एक साल गणेश जी की उपासना कर ली, फिर "इनसे तो कुछ नहीं हुआ, चलो फलाना बाबा का YouTube पर देखा, अब उनका करते हैं।" उस बाबा का करना है तो करिए, वे कहते हैं, नई साधना कीजिए — पर जो कर रहे थे उसे मत छोड़िए। यदि आप सिर्फ गणपति अथर्वशीर्षअथर्ववेद से लिया गया एक वैदिक उपनिषदिक स्तोत्र (यहाँ गणपति हेतु) — स्वयं सिद्ध, किंतु इसके वैदिक मंत्रों के लिए सही उच्चारण आवश्यक है। को पकड़कर लंबे समय तक चल दिए, वे कहते हैं, तो आपको किसी की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। एक समय के बाद ऐसी शक्तियां स्वतः मिल जाएंगी, और जो जानकारी लेना चाहते हैं वह मिलने लगेगी। उसका भी तरीका है, जो वे कहते हैं कि जुड़े रहने वालों को बताएंगे। उदाहरण में वे दो-तीन लोगों का हवाला देते हैं जिन्होंने जनवरी के आसपास — करीब एक साल पहले — उनकी पहली गणपति अथर्वशीर्ष पोस्ट के समय शुरू किया था और आज तक कर रहे हैं। एक बंधु ने हजारों-हजार पाठ कर लिए हैं। वे नाम नहीं लेंगे, पर उस व्यक्ति ने जितनी पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक। कर ली हैं, जब भी वक्ता को उसे देखने का मौका मिलता है, उसका आभामंडल गजब का प्रबल बन गया है; उसके अंदर बहुत क्षमता है।
बिना गुरु के मिली शक्तियां क्यों खो जाती हैं: माया, प्रदर्शन और ऊर्जा संचित कराने वाला कोई नहीं
खोलने की प्रक्रिया जानबूझकर रोकी गई
वक्ता कहते हैं कि वे आगे बढ़ रहे भक्त को जानबूझकर नहीं बताते कि उसकी साधना से बनी क्षमता को कैसे "खोलना" है, और सबके लिए यह प्रक्रिया पोस्ट भी नहीं करते, क्योंकि वे नहीं चाहते कि कोई फंसे: ये चीजें मिलते ही माया प्रबल हो जाती है, भक्ति छूट जाती है और साधक प्रदर्शन में चला जाता है — लोगों को उनके बारे में बताना, Facebook पर, इधर-उधर। तब साल भर का तप, पैसा, समय और मेहनत खत्म होने में देर नहीं लगती, क्योंकि संचित ऊर्जा को सहेजकर आगे कैसे ले जाना है यह सिखाने वाला गुरु नहीं है, और किसी और का देखना-सुनना शुरू करते ही घाटा शुरू हो जाता है।
जिस भक्त का आभामंडल साल भर के अथर्वशीर्ष से प्रबल हो गया है, उसके बारे में वक्ता कहते हैं कि वे अभी उसके लिए ज्यादा कुछ नहीं करते; उसे कहते हैं "अभी और करेंगे", क्योंकि वे चाहते हैं कि वह इन सब चीजों में न फंसे। यदि वे कह दें "अब इतना हो गया, अब इसे ऐसे खोलना है, यह कर लीजिए तो खुल जाएगा", और सारा प्रोसेस करवा दें, सब कुछ उसे प्राप्त हो जाए, तो भटकने में देर नहीं लगेगी — क्योंकि वहां maya प्रबल हो जाती है। ये सारी चीजें मिलते ही, वे कहते हैं, भक्ति छूट जाती है और व्यक्ति प्रदर्शन में चला जाता है। वह लोगों को उनके बारे में कुछ बताना चाहने लगता है — जरूरी नहीं सामने-सामने; Facebook पर, इधर-उधर। और नतीजा यह कि साल भर का तप, बेचारे का लगा पैसा, समय, मेहनत खत्म होने में समय नहीं लगता। क्योंकि गुरु तो है नहीं जो सिखाए कि बची हुई ऊर्जाओं को संचित करके आगे कैसे ले चलना है। ऊर्जा संचित तो हुई है, पर जैसे ही वह किसी और का देखना-सुनना शुरू करेगा — या वह कर लेगा जो वक्ता बता सकते थे — उसके बाद उसी का घाटा शुरू हो जाएगा। इसलिए, वक्ता कहते हैं, वे सबको वह हिस्सा नहीं बता रहे, क्योंकि वे किसी का लॉस नहीं चाहते; पर साधना करके रखिए और पकड़े रहिए।
लंबे अनुष्ठान के बाद शक्ति स्वयं अगला कदम आदेश करती है, प्रायः स्वप्न में
गुरु शक्ति के आदेश के आड़े नहीं आता
वक्ता कहते हैं कि जब साधक किसी भी शक्ति का अनुष्ठान इतना लंबा कर ले कि समर्थ हो जाए, तो एक समय आता है जब शक्ति स्वयं आदेश करती है: "अब यह करो" — छोटी-छोटी चीजें, करने वाले कार्य, लगने वाली चीजें, जो उसे दिखने लगती हैं। वे दो भाइयों का हवाला देते हैं जो लंबे समय से अनेक साधनाएं कर रहे हैं और जिन्हें स्वप्न में यह सब आना शुरू हो चुका है; जब वे समझ जाते हैं कि उन्हें यह दिखाया जा रहा है, तो इसका अर्थ है कि अब देने का समय है, और रोकने वाले वे कौन। चाहे वे उनके माध्यम से लें, या यदि लगे कि वे उस लायक नहीं, तो शक्तियां उनके समक्ष ऐसा प्रबल साधक ला देंगी कि सब कुछ मिल जाए। इसलिए अपनी शक्ति पर भरोसा रखकर लंबे समय तक करते रहें।
वक्ता कहते हैं कि जब आप उतने समर्थवान हो जाएंगे — जब किसी भी शक्ति का अनुष्ठानएक दीर्घ अनुष्ठान — जिसमें अपने कड़े नियम होते हैं। लंबे समय तक कर लेंगे — तो स्वयं एक समय ऐसा आएगा कि वह शक्ति स्वयं आदेश करेगी: "अब आप यह करो।" छोटी-छोटी चीजें होती हैं: जो कार्य करने होते हैं, जो चीजें लगेंगी; आपको दिखना शुरू हो जाएगा। वे दो भाइयों का उदाहरण देते हैं जो लंबे समय से अनेक प्रकार की साधनाएं कर रहे हैं। उन्हें स्वप्न में यह सब चीजें आनी आरंभ हो चुकी हैं। जब यह उन्हें दिखाया जाता है, वे कहते हैं, तो वे समझ जाते हैं: इन्हें यह दिखाया जा रहा है, मतलब इन्हें यह चीज दे देने का समय है। रोकने वाले वे कौन, जब उनकी शक्तियां उन्हें आदेश कर रही हैं? चाहे वे उनके माध्यम से लें, या — उन्हें लगे कि वे उस लायक नहीं — तो शक्तियां उनके समक्ष ऐसा प्रबल साधक ला देंगी कि उन्हें सारा कुछ प्राप्त हो जाए। इसलिए, वे कहते हैं, सदैव अपनी शक्ति पर भरोसा रखकर लंबे समय तक करें; एक समय आएगा कि शक्तियां स्वयं दिव्यदृष्टि प्रदान करेंगी।
दिव्य दृष्टि मिलने के बाद गुरु चाहिए, उसे चलाने और सुरक्षित रखने के लिए
पाना स्वयं का काम; चलाना मार्गदर्शन मांगता है
वक्ता कहते हैं कि समय आने पर शक्तियां स्वयं दिव्यदृष्टि दे देंगी, पर उसे सुचारू रूप से चलाने के लिए फिर गुरु की आवश्यकता पड़ती है। प्राप्त तो हो जाएगी, पर उसे कैसे प्रयोग करना है, कैसे सुरक्षित रखना है, उसके क्या नियम हैं और किन्हें मानना है, किस गलती से वह वापस जा सकती है और किस गलती से शक्ति बंद हो सकती है — यह सब प्रैक्टिकली जानने के लिए गुरु चाहिए। प्राप्त करने तक, वे कहते हैं, स्वयं से कर सकते हैं।
वक्ता कहते हैं कि एक समय आएगा कि शक्तियां स्वयं आपको दिव्यदृष्टि प्रदान करेंगी — और उसे सुचारू रूप से चलाने के लिए फिर आपको गुरु की आवश्यकता पड़ेगी। प्राप्त तो हो जाएगी, वे कहते हैं, पर उसे कैसे यूज करना है, कैसे प्रोटेक्ट करना है, उसके क्या नियम होंगे, किन नियमों को फॉलो करना है, क्या गलती करेंगे तो वह वापस जा सकती है, क्या गलती करेंगे तो आपकी शक्ति बंद हो सकती है — यह सब जानने के लिए, प्रैक्टिकली जानने के लिए, गुरु चाहिए। प्राप्त करने तक, वे कहते हैं, आप स्वयं से कर सकते हैं, जैसा उन्होंने वीडियो के शुरू में बताया।
स्वयं दिव्य दृष्टि पाने की विधि: एक पाठ पकड़ें, अनुष्ठान के खंडों में
हनुमान चालीसा, रोज 11, गृहस्थ के लिए 11-दिन के खंड
वक्ता कहते हैं कि दिव्यदृष्टि पाने का एक ही सबसे अच्छा, सुगम और सही तरीका है: जिस भी एक मंत्र, स्तोत्र या पाठ को पकड़ा है, उसे तब तक चलाते रहें जब तक आपके देवता आपकी चाही हुई प्राप्ति न दे दें। उनका उदाहरण हनुमान चालीसा है: एक पाठ करते हैं तो रोज 11 कीजिए, पर लगातार; 90 दिन या 108 दिन का अनुष्ठान लें, पूरा करें, फिर कुछ दिन गैप करें। जो गृहस्थ ब्रह्मचर्य नहीं रख सकता वह छोटे खंड ले — 11 दिन नियम में, फिर दो-चार दिन या एक सप्ताह सामान्य गृहस्थ जीवन, फिर 11 दिन, या हर महीने एक खंड — और बाकी दिनों में भी सुबह-शाम प्रक्रिया चालू रखे। इस निरंतरता से बनी ऊर्जा, वे कहते हैं, जो चाहिए वह दे देती है।
वक्ता कहते हैं कि दिव्यदृष्टि प्राप्त करने का सिर्फ एक ही सबसे अच्छा, सुगम और सही तरीका है: जिस किसी एक मंत्र, एक स्तोत्र, एक पाठ को आपने पकड़ा है, उसे चलाते रहिए, तब तक चलाते रहिए जब तक आपके देवता आपकी चाही हुई प्राप्ति न दे दें। उनका उदाहरण हनुमान चालीसा है। उसका एक पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक। कर रहे हैं, एक पाठ करते हैं, तो रोज 11 कीजिए — पर लगातार। उसे पकड़कर चलिए: 90 दिन का अनुष्ठानएक दीर्घ अनुष्ठान — जिसमें अपने कड़े नियम होते हैं। लीजिए, 108 दिन का लीजिए, एक बार पूरा किया, फिर कुछ दिन गैप कीजिए। गृहस्थ हैं और ब्रह्मचर्यकिसी दीर्घ अनुष्ठान के दौरान आवश्यक कठोर ब्रह्मचर्य। नहीं रख सकते, वे कहते हैं, तो छोटा-छोटा लीजिए: 11 दिन का लीजिए, 11 दिन नियम में रहें, फिर दो-तीन-चार दिन या एक सप्ताह सामान्य गृहस्थ में रहें, फिर 11 दिन का लीजिए — या हर महीने इसी तरह — और लगातार करते रहिए। बाकी बचे दिनों में भी सुबह-शाम अपना प्रोसेस चालू रखिए। इससे यह होगा, वे कहते हैं, कि लगातार चलाते रहने से जो ऊर्जा बनेगी, वह आपको वह दे देगी जो आप चाहते हैं — क्योंकि यह बहुत अलग चीज है, इतनी आसानी से नहीं मिलती।
स्वयं अर्जित शक्ति स्थायी होती है; केवल उसे नियंत्रित करना सीखना होता है
किसी और से ली गई शक्ति से अंतर
वक्ता कहते हैं कि जो अपनी साधना से स्वयं प्राप्त होता है वह हमेशा के लिए होता है; उसके बाद केवल उसे नियंत्रित करना सीखना होता है, क्योंकि वह आपकी खुद की अर्जित चीज है। जो किसी और से लिया जाता है — आजकल की "ऊर्जा ट्रांसफर" और "भूत-प्रेत ट्रांसफर" की बातें — उसे वे अलग रखते हैं, और आगे बताने का वादा करते हैं कि जो सच में करते हैं वे क्या करते हैं और वह वास्तव में कैसे प्रभावी होता है।
वक्ता कहते हैं कि जो आपको स्वयं से प्राप्त होगा वह हमेशा के लिए होगा। उसके बाद केवल उसे नियंत्रित करना सीखना होगा — वह आपकी खुद की गेन की हुई चीज है। बाकी जो किसी और से लिया जाता है, उसके बारे में वे आगे बताने को कहते हैं: लोग कहते हैं "ऊर्जा ट्रांसफर कर देंगे", "भूत-प्रेत ट्रांसफर कर देंगे", जो आजकल चल रहा है। असल में क्या होता है, जो सच में करते हैं वे क्या करते हैं, और वह सच में कैसे प्रभावी होता है — इसकी वास्तविकता वे किसी और समय समझाने की बात कहते हैं।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।