बिना गुरु के दिव्य दृष्टि कैसे प्राप्त हो — कुल-शक्ति का मार्ग, मसान का खतरा, और भुजा गलत क्यों निकलती है
बिना गुरु के दिव्य दृष्टि कैसे प्राप्त होती है, और बिना मार्गदर्शन शक्ति-सिद्धि तथा भुजा के जोखिम।
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गुरु के स्थान पर कुल-शक्ति या शक्तिपीठ की योगिनी की कृपा
बिना गुरु के दिव्य दृष्टि कैसे प्राप्त हो सकती है?
वक्ता कहते हैं कि साधना क्षेत्र में आने वाले किसी नए साधक को एकाएक कभी भी शक्ति-सिद्धि प्राप्त नहीं होती — गुरु इसीलिए इतने महत्वपूर्ण होते हैं। बिना गुरु के यह तभी संभव है जब साधक के अपने कुल की कोई कुल शक्ति उस पर कृपा कर दे, या फिर वैसी सामर्थ्य वाली कोई शक्ति जो साधक के प्रारब्ध को पूरी तरह समेटने की क्षमता रखती हो — कोई योगिनी या किसी शक्ति पीठ की कोई शक्ति — कृपा कर दे।
वक्ता कहते हैं कि किसी भी साधक के लिए सबसे पहली और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि साधना के क्षेत्र में आने वाले नए साधक को एकाएक कभी भी शक्ति-सिद्धि प्राप्त नहीं होगी। वे कहते हैं कि गुरु इसीलिए महत्वपूर्ण होते हैं। बिना गुरु के यह कैसे हो, इस पर वे बताते हैं कि यह तभी संभव है जब साधक के अपने कुल की कोई कुल शक्ति उस पर कृपा कर दे, या फिर उतनी ही सामर्थ्य वाली कोई शक्ति — जो साधक के प्रारब्धपूर्व कर्मों द्वारा पहले से गतिमान भाग्य का वह अंश — साधना व सत्कर्म इसकी तीव्रता को घटा सकते हैं, किंतु पूर्णतः मिटा नहीं सकते। को पूरी तरह से समेटने की क्षमता रखती हो — कृपा कर दे। ऐसी शक्ति कोई योगिनी हो सकती है या किसी शक्ति पीठ की कोई शक्ति।
एक ही शक्ति की निरंतर दैनिक सेवा-पूजा से क्षमता स्वतः बनती है
अपनी स्वयं की दीर्घकालीन उपासना से दिव्य दृष्टि कैसे विकसित होती है?
वक्ता कहते हैं कि यदि साधक लगातार प्रतिदिन किसी एक शक्ति की सेवा-पूजा लंबे समय तक करता रहे, तो वह क्षमता उसके भीतर स्वतः ही उत्पन्न हो जाती है। परंतु वह किस स्तर तक जाएगी — किसी देवी-देवता से वचन मिलेगा या नहीं, वह कुछ बोल पाएगा या नहीं, उसे कुछ सुनाई देगा या नहीं — यह स्वयं साधक पर निर्भर करता है।
वक्ता कहते हैं कि यदि साधक लगातार प्रतिदिन किसी एक ही शक्ति की सेवा-पूजा करता आ रहा है, लंबे समय तक पूजन-पाठ कर रहा है, तो वह क्षमता उसके अंदर स्वतः ही उत्पन्न हो जाती है। परंतु वह क्षमता किस स्तर तक पहुँचेगी — साधक किसी देवी या देवता से वचन ले पाएगा या नहीं, वह कुछ बोल पाएगा या नहीं, उसे कुछ सुनाई देगा या नहीं — यह पूरी तरह स्वयं साधक पर निर्भर करता है।
तांत्रोक्त परंपरा में घर-घर बिठाई जाने वाली शक्ति मसान
मसान क्या है, और आजकल घरों में इसे आम तौर पर क्यों बिठाया जाता है?
उदाहरण के रूप में वक्ता मसान की ओर संकेत करते हैं — एक ऐसी शक्ति जिसे तांत्रोक्त रूप से बहुत लोग जानते हैं, और जिसे आजकल परेशानी झेल रहे बहुत से ग्रामीण घरों में बिठा दिया जाता है, जिससे वह शक्ति वहीं बैठ जाती है।
उदाहरण देते हुए वक्ता कहते हैं कि आज यह छुपा नहीं रह गया है कि घर-घर में — विशेषकर ग्रामीण इलाकों में — बहुतों के घर में मसान पूजित होते हैं। वे कहते हैं कि मसान एक ऐसी शक्ति हैं जिनके विषय में तांत्रोक्त रूप से बहुत सारे लोग जानते हैं। जिनके घर में कोई परेशानी होती है, वहाँ आजकल लोग ऐसी शक्ति को बिठा देते हैं, और वह बैठ जाती है।
एक रात्रि की मसान सिद्धि सुरक्षित होने से पहले वर्षों की तैयारी
उस पर नियंत्रण के बिना एक रात्रि की मसान सिद्धि का आवाहन इतना खतरनाक क्यों है?
वक्ता चेतावनी देते हैं कि मसान जैसी शक्तियाँ वास्तव में एक ही रात्रि में सिद्ध होती हैं, जैसा यूट्यूब पर प्रायः दावा किया जाता है, परंतु इसके लिए सचमुच जिगर चाहिए क्योंकि यह अत्यंत अनियंत्रित शक्ति है जो कभी जल्दी नियंत्रित नहीं होती। जिस शक्ति से इस पर नियंत्रण हो सके, उसे सिद्ध करने में ही वर्षों लग सकते हैं, और उस नियंत्रण के बिना आवाहन कर देने पर प्रकट होते ही यह घर में और उसकी प्रतिष्ठा में तांडव मचा सकती है।
वक्ता सावधान करते हैं कि मसान जैसी शक्तियाँ सदैव एक ही रात्रि में सिद्ध होती हैं — वही बात जो यूट्यूब पर लगातार दिखती है कि एक रात्रि में यह कर लो, एक रात्रि में वह कर लो। वे कहते हैं कि वास्तविकता यही है कि यह एक रात्रि में होती है, लेकिन उतना जिगर होना चाहिए, क्योंकि यह बहुत ही अनियंत्रण वाली शक्ति है जो कभी जल्दी नियंत्रित नहीं होती। वे कहते हैं कि उस एक रात्रि की सिद्धि के पीछे की शक्ति को नियंत्रित करने की क्षमता पाने भर के लिए ही सालों-साल की साधना लग जाती है। यदि साधक के पास वह नियंत्रण करने वाली क्षमता नहीं है और फिर भी उसने आवाहन कर दिया, तो प्रकट होते ही वह घर में पूरी तरह कलह करवा देगी, परिवार का नाम खराब कर देगी और पूरे घर में तांडव कर देगी।
अनियंत्रित शक्ति पहले स्वयं का हित साधती है और प्रसन्न होने तक स्वप्न से घर को परेशान करती है
मसान जैसी घरेलू शक्तियाँ पूजने वाले के बजाय अपने ही फायदे के लिए क्यों काम करती हैं?
वक्ता कहते हैं कि जब ऐसी शक्ति घर में पूजित होती है, तो उसमें अपने ही फायदे के लिए काम करने की क्षमता होती है, पूजने वाले के फायदे के लिए नहीं — यदि उसे शराब जैसा भोग चाहिए तो चाहिए, और संतुष्ट होने तक वह स्वप्न (स्वप्न) के माध्यम से घर को परेशान करती रहेगी। प्रसन्न हो जाने पर वह पूजने वाले को इतना क्षमतावान बना देती है कि वह उसके प्रयोग से किसी का भी भेद ले सके।
वक्ता कहते हैं कि जब ऐसी शक्ति घर में किसी भी स्वरूप में पूजित होने लगती है, तो उसमें अपने फायदे के लिए काम करने की क्षमता होती है — घर के फायदे के लिए नहीं, विशुद्ध रूप से अपने ही फायदे के लिए — क्योंकि यदि उसे शराब का भोग चाहिए, तो चाहिए। जब तक उसे मनचाही वस्तु नहीं मिलती, वह कुछ समय तक स्वप्न (स्वप्न) के माध्यम से घर को परेशान करेगी। परंतु एक बार प्रसन्न हो जाने पर वह पूजने वाले को इतना क्षमतावान बना देती है कि वह इस शक्ति का प्रयोग करके किसी का भी भेद ले सकता है। जब तक पूजने वाला उसकी सेवा-पूजा सही तरीके से करता रहेगा, वह उसे भेद देती रहेगी — अर्थात, वे कहते हैं, जो वह चाहता था वही उसे प्राप्त हो जाता है: उसे दिव्यदृष्टि प्राप्त होती है, और वह वह कर सकता है जिसे कहीं गाँवों में भुजा (बूझा) और कहीं शोधन क्रिया कहा जाता है।
अनियंत्रित शक्ति किसी के अधीन नहीं होती
अनियंत्रित शक्ति की साधना कभी स्वतंत्र रूप से नहीं करनी चाहिए, क्योंकि वह किसी की नहीं सुनती
वक्ता कहते हैं कि ऐसी शक्ति कितने प्रतिशत सही बताएगी, यह पूजने वाले की अपनी साधनात्मक ऊर्जा पर निर्भर करता है, और वे चेतावनी देते हैं कि इस प्रकार की शक्ति की साधना कभी स्वतंत्र रूप से नहीं करनी चाहिए — इस पर नियंत्रण न होने पर यह किसी के कहने में नहीं चलेगी।
वक्ता कहते हैं कि ऐसी शक्ति कितने प्रतिशत सही बताएगी, यह पूजने वाले की अपनी साधनात्मक ऊर्जा पर निर्भर करेगा। वे कहते हैं कि इसीलिए इस प्रकार की शक्ति की साधना कभी भी स्वतंत्र रूप से स्वयं नहीं करनी चाहिए। इस पर नियंत्रण न रहने पर यह किसी के कहने में नहीं चलेगी।
सटीक भुजा के लिए पूछने वाले का घर असुरक्षित होना आवश्यक
किसी व्यक्ति के विषय में भुजा पूरी तरह सटीक कब निकलती है?
वक्ता कहते हैं कि किसी व्यक्ति के विषय में पूरी तरह सटीक भुजा (बूझा) तभी संभव है जब उस व्यक्ति का घर किसी बड़ी, तीव्र सकारात्मक शक्तियों के बंधन में न हो — जब कुल-पितृ शक्तियों का रक्षात्मक बंधन और कवच कहीं कमजोर हो या वे शक्तियाँ साथ न दे रही हों। तभी वह शक्ति पूरी तरह अंदर घुसकर एक-एक भेद दे पाती है।
वक्ता कहते हैं कि यदि कोई व्यक्ति भुजा (बूझा) के लिए आता है और उसके विषय में वह पूरी तरह सटीक निकल रही है, तो यह तभी संभव है जब उस व्यक्ति के घर में किसी भी प्रकार की बड़ी, तीव्र सकारात्मक शक्तियों का बंधन न हो — घर मानो खुला हुआ हो। जब उस व्यक्ति के घर की कुल और पितृ शक्तियों का बंधन या कवच कहीं कमजोर है, या वे शक्तियाँ साथ नहीं दे रही हैं, तभी यह शक्ति पूरी तरह अंदर घुसकर सटीक भेद दे पाती है।
पूर्व साधनाओं के बंधन में बँधा व्यक्ति सटीक भुजा को रोक देता है
अनियंत्रित शक्ति अपनी साधनाओं से सुरक्षित व्यक्ति का भेद क्यों नहीं ले पाती?
वक्ता बताते हैं कि यदि जिस व्यक्ति की भुजा ली जा रही है उसने लंबे समय तक बहुत सारी साधनाएँ की हुई हैं — भले ही उसे प्रत्यक्ष सिद्धि न हो और किसी देवी-देवता का वचन भी न हो — जैसे भगवती बगला (बगलामुखी) की लंबी साधना, तो वह बंधन में और सुरक्षित रहता है, और उस पर चलाई गई अनियंत्रित शक्ति कभी सही भुजा नहीं दे पाएगी, क्योंकि वह उस बंधन को तोड़ नहीं सकती।
वक्ता उदाहरण देते हैं कि कोई ऐसा व्यक्ति, जिसे प्रत्यक्ष रूप से न कोई सिद्धि है और न किसी देवी या देवता का वचन, फिर भी उसने अप्रत्यक्ष रूप से बहुत सारी साधनाएँ की हुई हैं — जैसे भगवती बगला (बगलामुखी) की काफी लंबे समय तक साधना। वे कहते हैं कि ऐसी अनियंत्रित शक्ति यदि उस व्यक्ति के विषय में भुजा देने लगे तो वह कभी सही नहीं होगी, क्योंकि वह व्यक्ति बंधन में है: उसने हर जगह बंधन बाँध रखा है और हर जगह कीलित करके रखा है, उसका घर सुरक्षित है और वह स्वयं भी सुरक्षित है, तथा उसकी अपनी लंबी साधनाओं की ऊर्जा इतनी प्रबल है कि वह शक्ति उसका भेद तोड़ ही नहीं पाती।
जान-बूझकर गलत भुजा, क्योंकि शक्ति किसी के अधीन नहीं
रुकी हुई शक्ति यह मानने के बजाय कि वह भेद नहीं ले पा रही, जान-बूझकर गलत भुजा देती है
वक्ता कहते हैं कि जब ऐसी शक्ति किसी सुरक्षित व्यक्ति का भेद नहीं तोड़ पाती, तो वह हार नहीं मानती — बल्कि गलत भुजा देना आरंभ कर देती है, क्योंकि उसे तो भोग चाहिए और पूछने वाले के फायदे-घाटे से उसे कोई मतलब नहीं, क्योंकि वह पूरी तरह स्वतंत्र और अनियंत्रित है।
वक्ता कहते हैं कि ऐसी स्थिति में वह शक्ति गलत भुजा (बूझा) देना आरंभ कर देगी — वह कभी ना नहीं बोलेगी, कभी यह नहीं मानेगी कि उसे पता नहीं, और सही भुजा भी नहीं देगी, क्योंकि उसे भोग चाहिए और पूछने वाले के लाभ-हानि से उसका कोई मतलब नहीं। वे कहते हैं कि चूँकि उस पर किसी की शक्ति नियंत्रण नहीं कर रही, वह पूरी तरह स्वतंत्र है, और पूजने वाला उसके अधीन रहेगा — वह जैसा चलाएगी वैसा ही उसे चलना पड़ेगा।
काल भैरव के माध्यम से बाँधी गई शक्ति की भुजा सच्ची रहती है
काल भैरव के अधीन बँधी शक्ति सच बताती है, यह भी कि वह खाली हाथ लौट आई है
वक्ता कहते हैं कि यदि वही शक्ति काल भैरव अथवा अपने कुल भैरव की ऊर्जाओं और मंत्रों के अधीन बाँध दी जाए, तो वह स्वतंत्र न रहकर नियंत्रित हो जाती है और तब सच बताती है — यह भी कि वह उत्तर नहीं ला पा रही — क्योंकि तब उसे सीधे नहीं, बल्कि भैरव के अधिकार के अंतर्गत एक कार्य के रूप में संभाला जा रहा होता है।
वक्ता इसकी तुलना इससे करते हैं कि यदि आप भगवान काल भैरव की, या अपने कुल के भैरव (कुल भैरव) की उपासना कर लें और उनकी शक्तियों, ऊर्जाओं तथा मंत्रों के द्वारा इस शक्ति को बाँधकर रखें या इसे बंधन दे दें। वे कहते हैं कि जब वह शक्ति उस ऊर्जा से नियंत्रित होती है, तब वह सच बताएगी, क्योंकि तब पूजने वाला उससे स्वतंत्र रूप से या सीधे डील नहीं कर रहा होता — उसे एक कार्य के रूप में रखा जाता है। यदि वह भुजा सही नहीं ले पाएगी, तो वह ईमानदारी से कह देगी कि यहाँ यह गड़बड़ी है, मैं यह नहीं कर पा रही, मैं खाली हाथ आई हूँ। परंतु स्वतंत्र छोड़ दी जाए और ऐसे नियंत्रण से बाहर रहे, तो वह पूजने वाले को जैसा चाहे वैसा चलाएगी।
अप्रत्यक्ष शक्ति-सहारे वाला किंतु अनजान साधक जानकार मसान-सिद्ध के सामने असुरक्षित
सटीक भुजा देने वाला हर किसी के विषय में सटीक क्यों नहीं बता पाता?
वक्ता कहते हैं कि जिस साधक के पास प्रत्यक्ष सिद्धि या किसी देवता का वचन नहीं है, पर जो सीधा-सादा है और जिसे अपनी साधनाओं से अप्रत्यक्ष रूप से दैविक शक्तियों का साथ मिला हुआ है, वह भी सटीक भुजा देने वाले की भुजा को विफल कर देता है। तब जानकार मसान-सिद्ध, यह भाँप लेने पर, उस साधक के शरीर को अशुद्ध करने का प्रयास करता है — प्रसाद के माध्यम से या अभिमंत्रित जल से — ताकि उसका कवच निष्प्रभावी हो जाए और उसका भेद लिया जा सके।
वक्ता दिव्यदृष्टि के इस विषय की एक और परत जोड़ते हैं: जो लोग किसी-किसी के विषय में पूरी तरह सटीक भुजा (बूझा) दे देते हैं, वे हर किसी के विषय में ऐसा नहीं कर सकते। वे ऐसे साधक का वर्णन करते हैं जिसे प्रत्यक्ष सिद्धि नहीं है और जो बहुत जानकार भी नहीं है, एक सीधा-सादा व्यक्ति, जिसने फिर भी साधनाएँ की हुई हैं और जिसके साथ अप्रत्यक्ष रूप से दैविक शक्तियाँ हैं। यदि ऐसा साधक किसी ऐसे व्यक्ति के पास चला जाए जिसने मसान सिद्ध कर रखा है और जिसे उस लाइन का ज्ञान है — कि यहाँ कैसे खराब करना है और कैसे ठीक करना है — और वह भाँप ले कि इस साधक की भुजा सही नहीं आ रही, तो वह किसी भी प्रकार से उस साधक को अशुद्ध करने का प्रयास करेगा। यह प्रसाद के माध्यम से हो सकता है, या अभिमंत्रित किए हुए जल से, या किसी और तरीके से — कुछ भी ऐसा जिससे साधक का शरीर अपवित्र हो जाए और उसके पास जो कवच इत्यादि हैं वे निष्प्रभावी हो जाएँ। यह हो जाने पर ही उसका भेद पूरी तरह लिया जा सकता है।
अबुझ साधक को धोखा देना एक षड्यंत्र है, और इसी से इस लाइन का नाम पड़ा
इस जानकारी के बिना साधक इस धोखे में फँस जाता है और उस व्यक्ति के प्रभाव में आ जाता है, और यही षड्यंत्र इस लाइन को उसका नाम देता है
वक्ता कहते हैं कि यदि सामने वाले साधक को इन सब बातों का ज्ञान नहीं है, तो वह इस धोखे में फँस जाता है और उस व्यक्ति के प्रभाव में आ जाता है — जबकि उसके पास पहले से जो अप्रत्यक्ष सहारा है, उसके समक्ष यह शक्ति कुछ भी नहीं है। वे इसे जान-बूझकर रचा गया षड्यंत्र कहते हैं, और कहते हैं कि इसीलिए इस लाइन को "सयानों" की लाइन कहा जाता है।
वक्ता कहते हैं कि यदि सामने वाला साधक अबुझ है और उसे इन सभी बातों का ज्ञान नहीं है, तो वह फँस जाता है — वह दूसरे के प्रभाव में आ जाता है। यद्यपि यह शक्ति उसके पास जो पहले से है उसके समक्ष कुछ भी नहीं है, फिर भी प्रत्यक्ष सिद्धि न होने के कारण वह बेचारा परेशान होकर सोचने लगता है कि मेरे पास तो कुछ है ही नहीं, सामने वाले बाबा तो बहुत बड़े जानकार हैं। वक्ता कहते हैं कि इस प्रकार किसी को धोखा देना अपने आप में एक षड्यंत्र है, और इसीलिए इस लाइन को सयानों की लाइन कहा जाता है — चतुर या चालाक लोगों की। वे सलाह देते हैं कि आप जिस भी देवी या देवता की भक्ति कर रहे हैं, उन पर दृढ़ भक्ति और दृढ़ विश्वास रखिए।
अगले नए बाबा के पीछे भागकर चल रही साधना छोड़ देना
साधक प्रायः कौन सी गलती करते हैं जो दिव्य दृष्टि को रोक देती है?
वक्ता कहते हैं कि दिव्यदृष्टि अवश्य प्राप्त होती है, और साधक सबसे बड़ी गलती यह करते हैं कि वे बहुत ज्यादा बदलते हैं — एक साल किसी देवता की उपासना करके "कुछ नहीं हुआ" कहकर छोड़ देते हैं और यूट्यूब पर देखे किसी नए बाबा की विधि पर चले जाते हैं। वे कहते हैं कि नई साधना ली जा सकती है, पर पहली वाली कभी नहीं छोड़नी चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि हाँ, दिव्यदृष्टि बिल्कुल प्राप्त होती है — गलती यह है कि लोग कहाँ चूक जाते हैं। वे कहते हैं कि सबसे बड़ी गलती यह है कि लोग बहुत ज्यादा बदलते हैं। वे उदाहरण देते हैं: कोई एक साल तक गणेश जी की उपासना कर लेता है, फिर तय कर लेता है कि इनसे तो कुछ नहीं हुआ, और यूट्यूब पर किसी दूसरे बाबा का वीडियो देखकर उसी पर चला जाता है। वे कहते हैं कि ऐसे वीडियो देखकर नई साधना अवश्य की जा सकती है — परंतु पहले वाली को कभी नहीं छोड़ना चाहिए।
निरंतर एकनिष्ठ साधना अंततः बिना किसी सहारे के इच्छित फल देती है
यदि साधक गणपति अथर्वशीर्ष जैसी एक ही साधना को लंबे समय तक पकड़े रहे तो क्या होता है?
वक्ता कहते हैं कि यदि साधक केवल और केवल गणपति अथर्वशीर्ष को ही पकड़कर लंबे समय तक चल दे, तो उसे किसी और की आवश्यकता नहीं पड़ेगी — एक समय आने पर उसे स्वतः ही ऐसी शक्तियाँ प्राप्त हो जाएँगी, और जो जानकारी वह लेना चाहता है वह उसे मिलने लगेगी।
वक्ता कहते हैं कि यदि साधक केवल गणपति अथर्वशीर्षअथर्ववेद से लिया गया एक वैदिक उपनिषदिक स्तोत्र (यहाँ गणपति हेतु) — स्वयं सिद्ध, किंतु इसके वैदिक मंत्रों के लिए सही उच्चारण आवश्यक है। को ही पकड़कर लंबे समय तक उसी पर चलता रहे, तो उसे किसी और की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। एक समय आने के बाद उसे स्वतः ही ऐसी शक्तियाँ प्राप्त हो जाएँगी, और जो भी जानकारी साधक लेना चाहता है वह उसे मिलने लगेगी।
लगभग एक वर्ष के निरंतर अथर्वशीर्ष पाठ से बना स्पष्ट प्रबल ओरा
दो-तीन लोग जिन्होंने लगभग एक वर्ष तक गणपति अथर्वशीर्ष का पाठ बिना टूटे जारी रखा, उनका ओरा अब स्पष्ट रूप से प्रबल दिखता है
वक्ता दो-तीन ऐसे लोगों का वर्णन करते हैं जिन्होंने, लगभग एक वर्ष पहले उनकी पहली पोस्ट के बाद से, गणपति अथर्वशीर्ष का पाठ बिना टूटे जारी रखा है — एक ने तो हजारों बार पाठ कर लिया है। वे कहते हैं कि जब भी वे उस व्यक्ति को देखते हैं, उसका आभामंडल गजब का प्रबल बन गया है और उसके अंदर बहुत क्षमता है।
वक्ता कहते हैं कि दो-तीन लोग ऐसे हैं जिन्होंने लगभग जनवरी से — अब लगभग एक वर्ष होने जा रहा है, जब उन्होंने पहली बार गणपति अथर्वशीर्षअथर्ववेद से लिया गया एक वैदिक उपनिषदिक स्तोत्र (यहाँ गणपति हेतु) — स्वयं सिद्ध, किंतु इसके वैदिक मंत्रों के लिए सही उच्चारण आवश्यक है। के विषय में पोस्ट की थी — अब तक इसे करते आए हैं। वे कहते हैं कि एक बंधु ने, जिनका नाम वे नहीं लेंगे, अपनी साधना में गणपति अथर्वशीर्ष का इतना पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक। कर लिया है कि हजारों-हजार बार पाठ हो चुका है। जब भी वक्ता को उस व्यक्ति को देखने का अवसर मिलता है, या जब भी वे उन्हें देखते हैं, तो उनका आभामंडल सिस्टम गजब का प्रबल बन गया है — उनके अंदर बहुत बड़ी क्षमता बन चुकी है।
अर्जित शक्ति खोलने की विधि समय से पहले बताने पर माया के कारण भटकाव का खतरा
वक्ता आगे बढ़ रहे साधक से खोलने की विधि रोक कर रखते हैं ताकि माया प्रबल न हो जाए
वक्ता कहते हैं कि वे जान-बूझकर इस साधक को यह नहीं बताते कि कितना हो चुका है या इसे आगे कैसे खोलना है, क्योंकि वे चाहते हैं कि वह इन सब चीजों में न फँसे — पूरी प्रक्रिया समय से पहले बता देने पर माया प्रबल हो जाएगी और प्रगति तेज होने के बजाय भटकाव आ जाएगा।
वक्ता कहते हैं कि वे इस व्यक्ति से अभी बहुत ज्यादा कुछ नहीं करते-कहते — वे इतना ही कहते हैं कि अभी और करना है, क्योंकि वे चाहते हैं कि वह इन सब चीजों में न फँसे। वे कहते हैं कि यदि वे साफ-साफ कह दें कि हाँ, अब इतना हो गया, अब इसे इस तरह से खोलना है, और पूरी प्रक्रिया करवा दें ताकि सब कुछ उन्हें प्राप्त हो जाए, तो उसके बाद उन्हें भटकने में देर नहीं लगेगी, क्योंकि उस स्थान पर माया प्रबल हो जाएगी।
शक्ति प्रकट होते ही भक्ति छूटकर प्रदर्शन में बदल जाती है
गुरु के मार्गदर्शन के बिना शक्तियाँ प्राप्त हो जाएँ तो साधना का क्या होता है?
वक्ता चेतावनी देते हैं कि ऐसी क्षमताएँ प्राप्त होते ही भक्ति छूट जाती है और साधक प्रदर्शन की ओर मुड़ जाता है — वह लोगों को अपने बारे में बताना चाहता है, चाहे सामने-सामने या सार्वजनिक पोस्ट के माध्यम से। वे कहते हैं कि इससे साल भर की तप, पैसा और मेहनत खत्म होने में देर नहीं लगती, क्योंकि संचित ऊर्जा को कैसे सँभालकर आगे ले जाना है यह सिखाने वाला गुरु नहीं होता, और साधक किसी और का देखना-सुनना शुरू कर देता है और अर्जित सब खो देता है।
वक्ता कहते हैं कि जैसे ही व्यक्ति को ये सारी चीजें प्राप्त होती हैं, उसकी भक्ति छूट जाती है और वह प्रदर्शन की ओर चला जाता है। फिर वह लोगों को अपने बारे में बताना चाहता है — यह जरूरी नहीं कि सामने-सामने ही, बल्कि फेसबुक जैसे मंचों पर और इधर-उधर पोस्ट के माध्यम से। वे कहते हैं कि इसका परिणाम यह होता है कि साल भर का तप — जो पैसा, समय और मेहनत लगी है — खत्म होने में समय नहीं लगता, क्योंकि साधक के पास ऐसा गुरु नहीं है जो सिखाए कि संचित ऊर्जाओं को कैसे संचित रखकर आगे लेकर चलना है। ऊर्जा संचित तो हुई है, परंतु जब साधक किसी और का देखना-सुनना शुरू कर देता है, तो उससे जो नई चीज वह लेता है वह उसी के घाटे का कारण बनती है।
लंबे अनुष्ठान के बाद शक्ति स्वयं आदेश देने लगती है, जो पहले स्वप्न में दिखता है
क्या अंततः शक्ति स्वयं साधक को आदेश देती है कि अब क्या करना है?
वक्ता कहते हैं कि जब साधक किसी भी शक्ति का लंबे समय तक अनुष्ठान करके इतना समर्थवान हो जाता है, तो एक समय आता है जब वह शक्ति स्वयं ही आदेश करने लगती है कि अब यह करो, और यह प्रायः पहले स्वप्न (स्वप्न) में दिखना शुरू होता है। वे दो भाइयों का उदाहरण देते हैं जो लंबे समय से अनेक साधनाएँ कर रहे हैं और जिन्हें यह सब स्वप्न में आने लगा है, जिसे वे इस संकेत के रूप में समझते हैं कि अब उन्हें और देने का समय आ गया है।
वक्ता कहते हैं कि छोटी-छोटी चीजें होने लगती हैं: कुछ कार्य करने होते हैं, कुछ चीजें साधक को दिखने लगती हैं, और यह उसे स्वप्न (स्वप्न) में दिखना शुरू हो जाता है। वे दो भाइयों का उदाहरण देते हैं जो लंबे समय से अनेक प्रकार की साधनाएँ कर रहे हैं — यह सब उन्हें स्वप्न में आना आरंभ हो चुका है, और जब यह उन्हें बताया जाता है तो वे समझ जाते हैं कि अब इन्हें ये चीजें दे देने का समय है। वे कहते हैं कि जब उनकी अपनी शक्तियाँ उन्हें आदेश कर रही हैं, तो वे रोकने वाले कौन होते हैं — चाहे वे उनके माध्यम से लें, या यदि शक्तियों को लगे कि वे इस योग्य नहीं हैं, तो वे स्वयं ही कोई और प्रबल साधक उनके समक्ष ले आएँगी ताकि उन्हें सारी चीज प्राप्त हो जाए।
एक ही मंत्र या पाठ को छोटे-छोटे बार-बार के अनुष्ठानों से निरंतर पकड़े रहना
स्वयं से दिव्य दृष्टि प्राप्त करने की व्यावहारिक विधि क्या है?
वक्ता सलाह देते हैं कि अपनी शक्ति पर भरोसा रखकर लंबे समय तक करते रहें: किसी एक मंत्र, स्रोत या पाठ को पकड़िए और तब तक चलते रहिए जब तक आपके देवता वह न दे दें जो आप चाहते हैं। जो गृहस्थ निरंतर ब्रह्मचर्य नहीं रख सकते, उनके लिए वे छोटे-छोटे संकल्प बताते हैं — जैसे 11 दिन का दौर, फिर कुछ दिन सामान्य गृहस्थ जीवन, फिर 11 दिन का दौर, हर महीने इसी तरह — और बीच के दिनों में भी सुबह-शाम की प्रक्रिया चालू रखें।
वक्ता कहते हैं कि एक समय आएगा जब शक्तियाँ स्वयं दिव्य दृष्टि प्रदान करेंगी, और उसे सुचारू रूप से चलाने के लिए साधक को फिर गुरु की आवश्यकता पड़ेगी — यह जानने के लिए कि उसकी रक्षा कैसे करनी है, कौन-कौन से नियमों का पालन करना है, कौन सी गलती करने पर वह वापस जा सकती है, और कौन सी गलती करने पर आपकी शक्ति ही बंद हो सकती है; यह सब व्यावहारिक रूप से जानने के लिए ही उस अवस्था में गुरु आवश्यक होते हैं। परंतु प्राप्त करने तक, वे कहते हैं, साधक यह स्वयं से कर सकता है। प्राप्त करने का सबसे अच्छा, सुगम और सही तरीका वे यही बताते हैं: जिस किसी एक मंत्र, एक स्रोत या एक पाठ को आप पकड़कर चल रहे हैं, उसे तब तक चलाते रहिए जब तक आपके देवता आपको वह प्राप्ति न दे दें जो आप चाहते हैं। उदाहरण के लिए, यदि कोई हनुमान चालीसा का पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक। कर रहा है और प्रतिदिन ग्यारह पाठ करता है, तो वह प्रतिदिन करे, पर निरंतर करे। वे कहते हैं कि 90 दिन या 108 दिन का अनुष्ठानएक दीर्घ अनुष्ठान — जिसमें अपने कड़े नियम होते हैं। लीजिए, एक बार पूरा कीजिए, फिर कुछ दिन का अंतराल लीजिए। चूँकि गृहस्थ निरंतर ब्रह्मचर्यकिसी दीर्घ अनुष्ठान के दौरान आवश्यक कठोर ब्रह्मचर्य। नहीं रह सकता, इसलिए वे छोटा-छोटा लेने की सलाह देते हैं — 11 दिन का लीजिए, 11 दिन तक उसमें रहिए, फिर तीन-चार दिन या एक सप्ताह तक सामान्य गृहस्थ जीवन में रहिए, फिर 11 दिन का लीजिए — इसी क्रम को, जैसे हर महीने, निरंतर दोहराते रहिए। वे कहते हैं कि बाकी बचे दिनों में भी सुबह-शाम अपनी प्रक्रिया चालू रखिए। ऐसा निरंतर करते रहने से जो ऊर्जा निर्मित होती है, वही अंततः साधक को उसकी इच्छित वस्तु दिला देती है।
स्वयं अर्जित प्राप्ति हमेशा के लिए रहती है, केवल उसे नियंत्रित करना सीखना होता है
स्वयं से अर्जित शक्ति स्थायी क्यों होती है, जबकि किसी और से ली गई नहीं?
वक्ता कहते हैं कि इतनी दुर्लभ चीज इतनी आसानी से नहीं मिलती, परंतु जो साधक अपने निरंतर प्रयास से स्वयं प्राप्त करता है वह हमेशा के लिए रहता है, और उसके बाद केवल उसे नियंत्रित करना सीखना होता है, क्योंकि वह उसकी अपनी अर्जित की हुई चीज है, किसी और से ली हुई नहीं।
वक्ता कहते हैं कि यह सब बहुत ही अलग तरह की चीज है — इतनी आसानी से नहीं मिलती। परंतु जो स्वयं से, इस निरंतर प्रयास से प्राप्त होता है, वे कहते हैं, वह हमेशा के लिए होता है। उसके बाद साधक को केवल यह सीखना होगा कि उसे नियंत्रित कैसे करना है, क्योंकि वह उसका खुद का अर्जित किया हुआ है — उसके विपरीत जो किसी और से लिया जाता है। दूसरी श्रेणी पर — जो लोग किसी और से लेते हैं — वे कहते हैं कि आजकल चल रहे इन दावों के पीछे की वास्तविकता वे अलग से समझाएँगे कि ऊर्जा ट्रांसफर कर देंगे, या भूत-प्रेत ट्रांसफर कर देंगे: जो सचमुच ऐसा करते हैं वे वास्तव में क्या करते हैं और यह वास्तव में कैसे प्रभावी होता है।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।