अनघा लक्ष्मी तर्पण विधि — घर की मृत स्त्री को शांत करने हेतु
अनघा लक्ष्मी पूजन तथा परेशान करने वाली मृत स्त्री को शांत करने हेतु बेल वृक्ष पर तर्पण की विधि।
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अनघा लक्ष्मी — दत्तात्रेय की वामांगी शक्ति
भगवती अनघा लक्ष्मी का पूजन भगवान दत्तात्रेय के साथ क्यों किया जाता है?
वक्ता कहते हैं कि भगवान दत्तात्रेय ब्रह्मा, विष्णु और महेश का एकत्रित स्वरूप हैं जिनमें समस्त शक्तियाँ विद्यमान हैं, और भगवती अनघा लक्ष्मी उनकी वामांगी शक्ति, उनकी महायोग शक्ति हैं। वे कहते हैं कि जब भी किसी महाशक्ति की पूजा की जाए तो उनके युगल स्वरूप का पूजन भी अवश्य करना चाहिए, इसलिए दत्तात्रेय के पूजन के साथ अनघा लक्ष्मी के 101 नामों से अर्चना या तर्पण करने पर उनकी विशिष्ट कृपा प्राप्त होती है।
वक्ता कहते हैं कि कहा जाता है भगवान दत्तात्रेय तीन प्रमुख स्वरूपों के साथ एकत्रित होकर ब्रह्मा, विष्णु और महेश का एकत्रित स्वरूप हैं, जिनमें समस्त शक्तियाँ विद्यमान हैं। उनकी महायोग शक्ति — उनकी वामांगीगृहस्थ की पत्नी, जिसे पति के वाम अंग में विराजमान दिव्य स्त्री शक्ति का स्वरूप माना जाता है — इसी आधार पर पत्नी के साथ शयन में कोई दोष नहीं माना जाता। शक्ति — भगवती अनघा लक्ष्मी हैं। वे कहते हैं कि यदि कोई भगवान दत्तात्रेय के किसी भी मंत्र का 100 माला जाप कर रहा हो, तो उसके साथ भगवती अनघा लक्ष्मी के 101 नामों का पाठ कर लेने से विशेष कृपा प्राप्त हो जाती है। वे जोड़ते हैं कि जब भी किसी महाशक्ति की पूजा की जाए तो उनके युगल स्वरूप, उनकी युगल शक्ति का पूजन भी अवश्य करना चाहिए — इसलिए भगवान दत्त के स्वरूप पूजन के साथ अनघा लक्ष्मी के 101 नामों से अर्चना करना अति विशिष्ट होता है।
धन समस्या हेतु प्रतिदिन अनघा लक्ष्मी अर्चन
धन की समस्या अधिक हो तो कम से कम चार महीने तक प्रतिदिन प्रातः एक बार कुमकुम से अनघा लक्ष्मी का अर्चन
वक्ता कहते हैं कि यदि धन संबंधी समस्या बहुत अधिक हो, तो कम से कम चार महीने तक प्रतिदिन सुबह एक बार कुमकुम से भगवती अनघा लक्ष्मी का अर्चन करने पर उनकी विशिष्ट कृपा प्राप्त होती है।
वक्ता कहते हैं कि विशेष करके जहाँ धन संबंधी समस्या बहुत अधिक हो, वहाँ त्वरित रूप से फल देने वाली उपासना यह है कि कम से कम चार महीने तक, प्रतिदिन मात्र एक बार सुबह के समय, कुमकुम से भगवती अनघा लक्ष्मी का अर्चन किया जाए। ऐसा करने से, वे कहते हैं, भगवती की विशिष्ट कृपा प्राप्त होती है।
दत्त साधकों हेतु मासिक कृष्ण पक्ष अष्टमी अर्चन
भगवान दत्त की सेवा-पूजा और अनघा लक्ष्मी व्रत करने वालों के लिए हर कृष्ण पक्ष अष्टमी को इन नामों से अर्चन
वक्ता कहते हैं कि जो लोग भगवान दत्त की सेवा-पूजा करते हैं तथा अनघा लक्ष्मी आदि व्रत करते हैं, वे यदि हर महीने कृष्ण पक्ष अष्टमी तिथि को भगवती का इन नामों से अर्चन करें तो उनकी कृपा अवश्य ही प्राप्त होती है।
वक्ता कहते हैं कि जो लोग विशेष करके भगवान दत्त की सेवा-पूजा करते हैं, तथा अनघा लक्ष्मी आदि व्रत करते हैं, वे यदि हर महीने कृष्ण पक्ष अष्टमी तिथि को भगवती के इन मंत्रों से अर्चन करें तो उनकी कृपा अवश्य ही प्राप्त होती है।
चांदी का श्री बीज बनवाकर स्थापित करना
चांदी का श्री बीज अनघा लक्ष्मी अष्टमी को कुमकुम से पूजकर धन रखने के स्थान पर रखना
वक्ता एक और विशेष विधान बताते हैं जिसे वे दत्तात्रेय के साधकों के लिए बड़ा वरदान कहते हैं, और कहते हैं कि सामान्य रूप से हर कोई भी इसका प्रयोग कर सकता है: लक्ष्मी जी के बीज अक्षर श्री का चांदी का बीज बनवाया जाता है और मार्गशीर्ष महीने में दत्तात्रेय जयंती पूर्ण होने के बाद आने वाली अष्टमी (अनघा लक्ष्मी अष्टमी) को, अथवा विपत्ति काल में किसी भी कृष्ण पक्ष की अष्टमी को, उसे प्लेट में रखकर भगवती का स्वरूप मानकर कुमकुम से इन नामों द्वारा अर्चन किया जाता है, आरती दिखाई जाती है, और फिर उसे घर में धन रखने के स्थान पर रख दिया जाता है।
वक्ता एक और विशेष विधान बताते हैं, जिसे वे भगवान दत्तात्रेय का पूजन करने वाले साधकों के लिए बहुत बड़ा वरदान कहते हैं, यद्यपि वे कहते हैं कि सामान्य रूप से प्रत्येक व्यक्ति भी इसका प्रयोग कर सकता है। श्री का चांदी का बीज बनवाया जाता है — श्री, जो भगवती लक्ष्मी जी का बीज अक्षर है। मार्गशीर्ष महीने में जब भगवान दत्तात्रेय की जयंती पूर्ण हो जाती है, उसके अगले आने वाली अष्टमी को अनघा लक्ष्मी व्रत किया जाता है। उस अनघा लक्ष्मी अष्टमी के दिन — और विशेष करके विपत्ति काल में किसी भी कृष्ण पक्ष की अष्टमी के दिन — उस चांदी के श्री बीज को किसी प्लेट में रखकर, भगवती का स्वरूप मानकर, उसके ऊपर कुमकुम से इन नामों के द्वारा अर्चन किया जाता है। अर्चन के पश्चात उसे आरती दिखाकर घर में धन रखने के स्थान पर रख दिया जाता है।
स्थापित बीज की दैनिक विधि और पुष्प
बीज को प्रतिदिन धन के स्थान से पूजा स्थान पर लाकर कुमकुम से 108 बार या 101 मंत्रों से अर्चन कर वापस रखना
वक्ता कहते हैं कि जिस कृष्ण पक्ष की अष्टमी को उसे स्थापित किया गया, उसी दिन से आरंभ करके प्रतिदिन उस बीज को धन रखने के स्थान से वापस पूजा स्थान पर लाना चाहिए, कुमकुम से पुनः 108 बार या 101 मंत्रों से अर्चन करना चाहिए, और फिर उसे धन रखने के स्थान पर रख देना चाहिए; लाल और पीले पुष्प उसे अवश्य ही चढ़ाने चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि उस कृष्ण पक्ष की अष्टमी से आरंभ करके प्रत्येक दिन उस बीज को धन रखने के स्थान से वापस अपने पूजन स्थान पर लाना चाहिए और कुमकुम से पुनः अर्चन करना चाहिए — या तो 108 बार, या 101 मंत्रों से — और फिर उसे ले जाकर धन रखने के स्थान पर रख देना चाहिए। लाल पुष्प और पीला पुष्प, वे कहते हैं, उसे अवश्य ही चढ़ाना चाहिए। इस प्रकार करने से, वे कहते हैं, भगवती की विशिष्ट कृपा अवश्य प्राप्त होती है, विशेष करके धन संबंधी समस्या के लिए।
पितृ समस्या हेतु दत्तात्रेय सेवा-पूजा
पितरों से संबंधित या वैशाचिक समस्या आने पर भगवान दत्तात्रेय की सेवा, पूजा और अनुष्ठान सर्वाधिक प्रभावी
वक्ता कहते हैं कि जब पितरों से संबंधित किसी भी प्रकार की विशेष समस्या हो जाए, या वैशाचिक समस्याएँ उपस्थित हो जाएँ, तो उस समय भगवान दत्तात्रेय की सेवा, पूजा और अनुष्ठान बहुत प्रभावी होते हैं।
दत्त मंत्रों से पीपल वृक्ष पर तर्पण
भगवान दत्त के मंत्रों से पीपल वृक्ष पर तर्पण करने से पितर बहुत शीघ्र शांत हो जाते हैं
वक्ता कहते हैं कि भगवान दत्त के मंत्रों से पीपल वृक्ष पर तर्पण करना भी अति उत्तम होता है, और उससे भी पितर बहुत शीघ्र शांत और सौम्य हो जाते हैं।
वक्ता कहते हैं कि भगवान दत्त के मंत्रों से पीपलभगवान दत्तात्रेय को समर्पित एक पवित्र वृक्ष — इसके नीचे किया गया पितृ तर्पण गृह-क्लेश उत्पन्न करने वाले अशांत पितरों को शांत करता है। वृक्ष पर तर्पणहवन व मार्जन के साथ किया जाने वाला जल आदि द्वारा देवता या पितरों को अर्पित तर्पण। आदि करना भी अति उत्तम होता है — उससे भी पितृ बहुत शीघ्र शांत और सौम्य हो जाते हैं।
मृत स्त्री से संबंधित दोष की पहचान
घर की मृत स्त्री (पित्रानी/डाकिनी) से संबंधित दोष की पहचान कैसे होती है?
वक्ता कहते हैं कि यदि घर में किसी स्त्री की मृत्यु हुई हो, विशेष करके अकाल मृत्यु, और वह परिवार को बहुत अधिक परेशान कर रही हो — उनका स्वरूप कुछ भी हो गया हो, उन्हें पित्रानी कहिए या डाकिनी — और उनसे संबंधित दोष उपस्थित हो गया हो, तो इसके लिए भगवती के 101 नामों का प्रयोग किया जाता है।
वक्ता बताते हैं कि यह विषय अधिकतर राजस्थान के क्षेत्रों में देखने को मिलता है, जहाँ ऐसी शक्ति को पित्रानी कहते हैं; यद्यपि वे जोड़ते हैं कि यह समस्या सभी जगह उपस्थित हो सकती है — बस वहाँ के लोग इन सब चीज़ों को लेकर अधिक सक्रिय हैं। यदि घर में किसी स्त्री की मृत्यु हुई हो — विशेष करके अकाल मृत्यु — और वह परिवार को बहुत अधिक परेशान कर रही हो, उनका स्वरूप कुछ भी हो गया हो, उन्हें पित्रानी कहिए या डाकिनी, और उनसे संबंधित दोष उपस्थित हो गया हो, तो वक्ता कहते हैं कि इसके लिए भगवती के 101 नाम ही प्रयोग किए जाते हैं।
बेल वृक्ष तर्पण की सामग्री और स्थान
पूजित बेल वृक्ष के तने पर गंगा जल, पीतल का लोटा, थोड़ा मधु और पान का पत्ता
वक्ता कहते हैं कि यह तर्पण गंगा जल से बेल वृक्ष के तने के ऊपर किया जाता है — वृक्ष के पास खड़े होकर या उसके नीचे बैठकर — और वह वृक्ष पूजित होना चाहिए, निर्जन स्थान में नहीं होना चाहिए। सामग्री में पीतल के लोटे में भरा जल जिसमें थोड़ा मधु डाला गया हो, तथा पान का पत्ता चाहिए, जिसे वे भगवती के स्वरूप के लिए अति उत्तम बताते हैं, यद्यपि पीपल का पत्ता भी लिया जा सकता है।
वक्ता कहते हैं कि भगवती के 101 नामों से किया जाने वाला तर्पणहवन व मार्जन के साथ किया जाने वाला जल आदि द्वारा देवता या पितरों को अर्पित तर्पण। गंगा जी के जल से, बेल वृक्ष की लकड़ी के ऊपर, तने के ऊपर किया जाता है — वृक्ष के पास खड़े होकर या उसके नीचे बैठकर। वे स्पष्ट करते हैं कि वह वृक्ष पूजित होना चाहिए; निर्जन स्थान में नहीं होना चाहिए। आवश्यक सामग्री: एक पीतल के लोटे में जल भरकर उसमें थोड़ा सा मधु डाल दें, तथा साथ में पान का पत्ता (पीपलभगवान दत्तात्रेय को समर्पित एक पवित्र वृक्ष — इसके नीचे किया गया पितृ तर्पण गृह-क्लेश उत्पन्न करने वाले अशांत पितरों को शांत करता है। का पत्ता भी लिया जा सकता है, पर वे कहते हैं कि भगवती के स्वरूप के लिए पान पत्ता ही अति उत्तम होता है)।
तर्पण का संकल्प और प्रार्थना के शब्द
तीन पान के पत्ते और पुष्प पर रखा घी का दीपक, तथा उन्हें सौम्य करने और नारायण बलि कराने का सामर्थ्य माँगने की प्रार्थना
वक्ता कहते हैं कि तीन पान के पत्ते लेकर (केवल उनका डंठल तोड़ें, अग्र भाग नहीं) एक साथ पकड़े जाते हैं, उससे पहले इस विषय का संकल्प लिया जाता है और घी का दीपक प्रज्वलित करके पुष्प के ऊपर रखा जाता है, सीधे भूमि पर नहीं; फिर यह बोला जाता है कि घर की जिस स्त्री सदस्य की मृत्यु हुई है उन्हीं के निमित्त यह किया जा रहा है, और भगवती से प्रार्थना की जाती है कि उन्हें संतुष्ट और सौम्य कर दें तथा हमें सामर्थ्यवान बनाएँ कि हम उनके निमित्त नारायण बलि करवा कर उनकी सद्गति करा सकें, ताकि उन्हें मुक्ति प्राप्त हो जाए।
वक्ता कहते हैं कि तीन पान के पत्ते लिए जाते हैं, उनका डंठल तोड़ दिया जाता है पर अग्र भाग नहीं तोड़ना है, और उन्हें एक साथ लेकर भगवती के प्रत्येक नाम से बेल वृक्ष के ऊपर तर्पणहवन व मार्जन के साथ किया जाने वाला जल आदि द्वारा देवता या पितरों को अर्पित तर्पण। किया जाता है। उससे पहले इस विषय का संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। ले लिया जाता है, और एक घी का दीप प्रज्वलित करके पुष्प के ऊपर रखा जाता है — सीधे-सीधे भूमि पर कभी नहीं। ऐसा करते हुए यह बोला जाता है: मेरे घर की यह सदस्य जिनकी अकाल मृत्यु हुई है, वे स्त्री स्वरूप में थीं — यह प्रयोग विशेष रूप से ऐसी मृत्यु पाने वाली स्त्री के लिए ही है। प्रार्थना आगे चलती है: जिनकी मृत्यु हो गई है वे अब हमें परेशान कर रही हैं; हे भगवती, आप इन्हें संतुष्ट कर दें, सौम्य कर दें, तथा हमें सामर्थ्यवान बनाएँ कि हम इनके निमित्त नारायण बलि करवा कर इनकी सद्गति करा दें, ताकि इनको भी मुक्ति प्राप्त हो जाए।
प्रत्येक नाम के साथ तर्पण जल डालना
तीनों पत्ते पात्र में डालकर प्रत्येक नाम के साथ 'तर्पयामि नमः' बोलते हुए बेल वृक्ष पर जल डालना
वक्ता कहते हैं कि यह प्रार्थना बोलने के बाद तीनों पान के पत्ते उस पात्र में डाल दिए जाते हैं, और भगवती के प्रत्येक नाम के साथ "तर्पयामि नमः" बोलते हुए बेल वृक्ष के ऊपर जल डाला जाता है।
वक्ता कहते हैं कि यह प्रार्थना बोलकर, तीनों पान के पत्ते उस पात्र में डाल दिए जाते हैं, और फिर भगवती के प्रत्येक नाम के द्वारा "तर्पयामि नमः" बोलते हुए बेल वृक्ष के ऊपर जल डालकर तर्पणहवन व मार्जन के साथ किया जाने वाला जल आदि द्वारा देवता या पितरों को अर्पित तर्पण। किया जाता है।
तर्पण से कितनी शीघ्र शांति मिलती है
परेशान करने वाली शक्ति तीन-चार दिन में, और सप्ताह भर में निश्चित रूप से सौम्य हो जाती है
वक्ता एक उदाहरण देते हैं — एक व्यक्ति की माता जी की हत्या हो गई थी और अब वे परिवार को बहुत परेशान करती हैं, जबकि नारायण बलि करवाने का सामर्थ्य अभी नहीं है: वे कहते हैं कि ऐसी परिस्थिति में यह तर्पण एक विकल्प है, और तीन से चार दिन में, सप्ताह भर होते-होते, उस शक्ति की उग्रता स्पष्ट रूप से सौम्य हो जाती है। वे जोड़ते हैं कि छोटे बच्चों को परेशान किया जा रहा हो तब भी इसका प्रयोग किया जा सकता है।
वक्ता एक उदाहरण देते हैं: एक व्यक्ति ने बताया कि उनकी माता जी की हत्या हो गई थी, और अब वे परिवार को बड़ा परेशान करती रहती हैं, जबकि अभी उनके पास इतना सामर्थ्य नहीं है कि वे नारायण बलि आदि करवा पाएँ। ऐसी परिस्थिति में, वे कहते हैं, इसी का प्रयोग करना चाहिए — यह विकल्प है। वे कहते हैं कि तुरंत ही — तीन दिन से चार दिन होते-होते, और सप्ताह भर पूर्ण होते-होते निश्चित रूप से — जो भी शक्ति परेशान कर रही है उसकी उग्रता शांत हो जाती है; उतनी उग्रता नहीं रहती। यदि विशेष रूप से छोटे बच्चों को परेशान किया जा रहा हो और अधिक दिक्कत हो रही हो, तो वे कहते हैं कि उसके लिए भी इस प्रयोग को किया जा सकता है।
तर्पण मंत्र में प्रणव बनाम श्री
भगवती अनघा के तर्पण मंत्र में प्रणव (ॐ) का प्रयोग करना चाहिए?
वक्ता कहते हैं कि इस मंत्र में प्रणव (ॐ) का प्रयोग केवल वे करें जिन्होंने यज्ञोपवीत धारण किया है; बाकी लोग उसके स्थान पर "श्री" का प्रयोग करेंगे — तो मंत्र बनता है "श्री अनघाय नमः", और वृक्ष के ऊपर पत्ते से जल डालते हुए "श्री अनघाय तर्पयामि नमः" बोला जाता है।
तर्पण जल में मधु और काला तिल
जल में मधु और काला तिल डालकर उसी से 101 नामों का तर्पण
वक्ता कहते हैं कि तर्पण के जल में मधु और काला तिल भी रहेगा, और उसी जल से 101 नामों का तर्पण किया जाता है।
वक्ता स्पष्ट करते हैं कि इस तर्पणहवन व मार्जन के साथ किया जाने वाला जल आदि द्वारा देवता या पितरों को अर्पित तर्पण। के जल में मधु और काला तिल रहेगा — काला तिल, मधु और जल। उसी मिश्रण से फिर 101 नामों से तर्पणहवन व मार्जन के साथ किया जाने वाला जल आदि द्वारा देवता या पितरों को अर्पित तर्पण। करना है।
बचे हुए तर्पण जल का घर में छिड़काव
पत्ता और बचा हुआ जल घर लाकर पूरे घर में, विशेष रूप से मुख्य द्वार पर छिड़कना
वक्ता कहते हैं कि 101 नामों से तर्पण पूर्ण करने के बाद वह पत्ता और जो थोड़ा सा जल बच जाए उसे घर लाकर पूरे घर में छिड़क देना चाहिए, विशेष रूप से मुख्य द्वार पर।
वक्ता कहते हैं कि 101 नामों से तर्पणहवन व मार्जन के साथ किया जाने वाला जल आदि द्वारा देवता या पितरों को अर्पित तर्पण। पूर्ण हो जाने के बाद वह पत्ता और जो थोड़ा सा जल बच जाए, उसे घर लाकर पूरे घर में छिड़क देना चाहिए — और विशेष ध्यान देकर मुख्य द्वार पर छिड़कना चाहिए।
मंदिर का पूजित बेल वृक्ष चुनना
मंदिर में उपस्थित बेल वृक्ष अति उत्तम फल देता है, निर्जन स्थान का वृक्ष कभी नहीं
वक्ता कहते हैं कि यदि वह बेल वृक्ष मंदिर में उपस्थित हो तो अति उत्तम है, और वे दोहराते हैं कि वह निर्जन स्थान पर नहीं होना चाहिए — पूजित वृक्ष अति उत्तम प्रभाव देता है, और इस प्रयोग से शांति मिलती है।
वक्ता कहते हैं कि यदि प्रयोग में लिया जाने वाला बेल वृक्ष मंदिर में उपस्थित है तो वह अति उत्तम है; वे दोहराते हैं कि वह ऐसे निर्जन स्थान पर नहीं होना चाहिए, इसका ध्यान रखें। पूजित वृक्ष होगा, वे कहते हैं, तो अति उत्तम प्रभाव देगा, और इस प्रयोग से घर में शांति मिलती है।
अल्पायु में मृत बच्ची हेतु तर्पण उपाय
बचपन या किशोरावस्था में मृत्यु पाई बच्ची यदि परिवार को परेशान कर रही हो तो क्या उपाय बताया गया है?
वक्ता कहते हैं कि यदि लगभग तीन वर्ष से तेरह वर्ष के बीच की कोई बच्ची — जो रजस्वला हो चुकी हो सकती है — अकाल मृत्यु को प्राप्त हुई हो और बहुत अधिक परेशान कर रही हो, और अभी कोई सामर्थ्यवान साधक नहीं मिला जो उनकी गति करा पाए, या परिवार के पास गंगा जी, प्रयाग, काशी या गया जी के क्षेत्र में कुछ विशेष कराने की आर्थिक उपलब्धता नहीं है, तो उसके स्थान पर भगवती के इन स्वरूपों और मंत्रों के द्वारा बेल वृक्ष पर यह तर्पण करके उन्हें शांत और सौम्य किया जा सकता है।
वक्ता एक और परिस्थिति की बात करते हैं: लगभग तीन वर्ष से लेकर 13 वर्ष तक के मध्य की कोई बच्ची, जो मृत्यु से पहले रजस्वला हो चुकी हो सकती है, अकाल मृत्यु को प्राप्त हुई हो और परिवार को बहुत ज़्यादा परेशान कर रही हो, और फिर भी अभी तक कोई सामर्थ्यवान साधक नहीं मिला जो उनकी गति करा पाए, या आपके पास इतनी आर्थिक उपलब्धता नहीं है कि उनके निमित्त गंगा जी, प्रयाग, काशी अथवा गया जी के क्षेत्र में कुछ विशेष करा पाएँ। ऐसी स्थिति में, वे कहते हैं, भगवती के इन स्वरूपों के द्वारा और इन मंत्रों के द्वारा बेल वृक्ष के ऊपर तर्पण करके उन्हें शांत किया जा सकता है, सौम्य किया जा सकता है।
तर्पण की न्यूनतम 40 दिन की अवधि
प्रतिदिन कम से कम 40 दिन लगातार, यद्यपि लाभ प्रायः सातवें दिन से दिखने लगता है
वक्ता कहते हैं कि निश्चित लाभ के लिए यह तर्पण प्रतिदिन कम से कम 40 दिन तक लगातार करना होगा, यद्यपि लाभ प्रायः सातवें दिन से दृष्टिगोचर होने लगता है — उन्हें पूर्ण रूप से शांत किए बिना इसे छोड़ना नहीं चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि यह तर्पणहवन व मार्जन के साथ किया जाने वाला जल आदि द्वारा देवता या पितरों को अर्पित तर्पण। प्रतिदिन करना होगा, कम से कम 40 दिन तक लगातार करेंगे तो लाभ अवश्य ही प्राप्त होगा। वे जोड़ते हैं कि सात दिन से लाभ दृष्टिगोचर होना आरंभ हो जाता है, लेकिन वहीं पर इसे छोड़ना नहीं चाहिए — उन्हें पूर्ण रूप से शांत होने तक इसे जारी रखना चाहिए।
40 दिन के बाद का रखरखाव तर्पण
40 दिन के बाद केवल दो दिन — कृष्ण पक्ष अष्टमी और अमावस्या — का तर्पण शांति बनाए रखता है
वक्ता कहते हैं कि आरंभिक 40 दिन के बाद तर्पण को महीने में केवल दो दिन — कृष्ण पक्ष अष्टमी और अमावस्या — तक घटाया जा सकता है, इससे शांति बनी रहती है।
वक्ता कहते हैं कि 40 दिन पूर्ण हो जाने के बाद, आप चाहें तो केवल दो दिन — हर कृष्ण पक्ष अष्टमी और अमावस्या — को ही तर्पणहवन व मार्जन के साथ किया जाने वाला जल आदि द्वारा देवता या पितरों को अर्पित तर्पण। किया करें, उससे शांति बनी रहेगी।
इस तर्पण को काली प्रयोग के साथ न करने की चेतावनी
एक दीपक वाला काली जी का प्रयोग भी है, पर दोनों साथ करने से बहुत अधिक उग्रता होती है
वक्ता कहते हैं कि इसके सिवाय काली जी का प्रयोग (एक दीपक वाला) भी है, पर वे चेतावनी देते हैं कि दोनों साथ में करने से बहुत अधिक उग्रता होती है। वे बताते हैं कि यह प्रयोग उन माता-पिता के लिए भी उपयोगी है जिनके गर्भ की संतान खराब हो गई हो या जिनकी अकाल मृत्यु हो गई हो, क्योंकि ऐसे माता-पिता को बहुत कष्ट होता है।
वक्ता जोड़ते हैं कि इसके सिवाय काली जी का एक प्रयोग भी है, एक दीपक वाला, वह भी किया जा सकता है; पर वे सावधान करते हैं कि यदि दोनों साथ में करेंगे तो बहुत अधिक उग्रता होगी। वे बताते हैं कि कई बार ऐसा होता है कि जिनके गर्भ की संतान खराब हो जाती है, या जिनकी अकाल मृत्यु हो जाती है, उन माता और पिता को बहुत कष्ट होता है — वे भी इस प्रयोग को कर सकते हैं।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।