अनघा लक्ष्मी तर्पण विधि — घर की मृत स्त्री को शांत करने हेतु
अनघा लक्ष्मी पूजन तथा परेशान करने वाली मृत स्त्री को शांत करने हेतु बेल वृक्ष पर तर्पण की विधि।
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अनघा लक्ष्मी — दत्तात्रेय की वामांगी शक्ति, जिनका पूजन उनके साथ किया जाता है
महाशक्ति के साथ उनके युगल स्वरूप का पूजन
वक्ता कहते हैं कि भगवान दत्तात्रेय ब्रह्मा, विष्णु और महेश का एकत्रित स्वरूप हैं जिनमें समस्त शक्तियाँ विद्यमान हैं, और उनकी महायोग शक्ति, उनकी वामांगी शक्ति, भगवती अनघा लक्ष्मी हैं। वे कहते हैं कि जब भी किसी महाशक्ति की पूजा की जाए तो उनके युगल स्वरूप का पूजन भी अवश्य करना चाहिए, इसलिए दत्तात्रेय के पूजन के साथ अनघा लक्ष्मी के 101 नामों से अर्चना या तर्पण करने पर उनकी विशिष्ट कृपा मिलती है। यदि कोई दत्तात्रेय के किसी मंत्र की 100 माला कर रहा हो तो साथ में उनके 101 नामों का पाठ कर लेने से वह विशेष कृपा प्राप्त होती है।
वक्ता कहते हैं कि यदि भगवान दत्तात्रेय के पूजन के साथ-साथ भगवती अनघा लक्ष्मी के 101 नामों से उनकी अर्चना की जाए या उनका तर्पणहवन व मार्जन के साथ किया जाने वाला जल आदि द्वारा देवता या पितरों को अर्पित तर्पण। किया जाए तो उनकी विशिष्ट कृपा प्राप्त होती है। वे कहते हैं कि कहा जाता है भगवान दत्तात्रेय तीन प्रमुख स्वरूपों के साथ एकत्रित होकर ब्रह्मा, विष्णु और महेश का एकत्रित स्वरूप हैं, जिनमें समस्त शक्तियाँ विद्यमान हैं। उनकी महायोग शक्ति, उनकी वामांगीगृहस्थ की पत्नी, जिसे पति के वाम अंग में विराजमान दिव्य स्त्री शक्ति का स्वरूप माना जाता है — इसी आधार पर पत्नी के साथ शयन में कोई दोष नहीं माना जाता। शक्ति, भगवती अनघा लक्ष्मी हैं। वे जोड़ते हैं कि यदि कोई भगवान दत्तात्रेय के किसी भी मंत्र की 100 माला जप कर रहा हो तो साथ में भगवती अनघा लक्ष्मी के 101 नामों का पाठ कर लेने से विशेष कृपा प्राप्त हो जाती है। उनका सामान्य नियम यह है कि जब भी किसी महाशक्ति की पूजा की जाए तो उनका जो भी युगल स्वरूप, युगल शक्ति है, उनका पूजन भी अवश्य करना चाहिए। इसलिए भगवान दत्त के स्वरूप-पूजन के साथ अनघा लक्ष्मी के 101 नामों से अर्चना करना, वे कहते हैं, अति विशिष्ट होता है।
अनघा लक्ष्मी के 101 नामों से नियमित अर्चन: धन-समस्या में और कृष्ण पक्ष अष्टमी को
चार महीने प्रतिदिन, या महीने में एक बार
वक्ता कहते हैं कि जहाँ धन-संबंधी समस्या बहुत अधिक हो, वहाँ कम से कम चार महीने तक प्रतिदिन केवल एक बार सुबह कुंकुम से भगवती अनघा लक्ष्मी के 101 नामों से अर्चन करने पर त्वरित रूप से उनकी विशिष्ट कृपा मिलती है। अलग से वे कहते हैं कि जो लोग भगवान दत्त की सेवा-पूजा करते हैं और अनघा लक्ष्मी आदि व्रत करते हैं, वे यदि हर महीने कृष्ण पक्ष अष्टमी को इन मंत्रों से अर्चन करें तो उनकी कृपा अवश्य प्राप्त होती है।
वक्ता कहते हैं कि यहाँ एक विषय जान लेना चाहिए: यदि धन-संबंधी समस्या बहुत अधिक हो तो यह उपासना त्वरित फल देती है। कम से कम चार महीने तक, प्रतिदिन मात्र एक बार, सुबह के समय कुंकुमदेवी को अर्पित किया जाने वाला तथा तिलक हेतु प्रयुक्त सिंदूरी चूर्ण। से भगवती अनघा लक्ष्मी का (उनके 101 नामों से) अर्चन किया जाए तो भगवती की विशिष्ट कृपा प्राप्त होती है। फिर वे दूसरा अवसर बताते हैं। जो लोग विशेष रूप से भगवान दत्त की सेवा-पूजा करते हैं और अनघा लक्ष्मी आदि व्रत करते हैं, वे यदि हर महीने कृष्ण पक्ष अष्टमीपक्ष की आठवीं तिथि, जो शाक्त कर्मों के लिए विशेष अनुकूल मानी जाती है। तिथिचंद्र पंचांग की एक तिथि — कुछ प्रतिमाओं (जैसे शिवलिंग) को प्रतिदिन स्नान आवश्यक है, जबकि अन्य को केवल अपने निर्धारित साप्ताहिक दिन या तिथि पर। को भगवती के इन मंत्रों से अर्चन करें तो उनकी कृपा अवश्य ही प्राप्त होती है।
धन हेतु अनघा लक्ष्मी का चाँदी के श्री बीज का प्रयोग
बीज धन रखने के स्थान पर रहता है
वक्ता एक ऐसा विधान बताते हैं जिसे वे दत्तात्रेय साधकों के लिए बहुत बड़ा वरदान कहते हैं, यद्यपि सामान्य रूप से कोई भी इसका प्रयोग कर सकता है। लक्ष्मी जी का बीज अक्षर श्री चाँदी का बनवाया जाता है; अनघा लक्ष्मी अष्टमी (मार्गशीर्ष में दत्तात्रेय जयंती के बाद आने वाली अष्टमी) को, या विपत्ति काल में किसी भी कृष्ण पक्ष अष्टमी को, उसे प्लेट में रखकर भगवती का स्वरूप मानकर कुंकुम से उनके नामों द्वारा अर्चन करते हैं, आरती दिखाते हैं और धन रखने के स्थान पर रख देते हैं। उस अष्टमी से प्रतिदिन उसे वापस पूजन स्थान पर लाकर पुनः कुमकुम से 108 बार या 101 मंत्रों से अर्चन करके धन के स्थान पर रख देते हैं; लाल और पीला पुष्प अवश्य चढ़ाते हैं। वे कहते हैं ऐसा करने से, विशेषकर धन-समस्या में, भगवती की विशिष्ट कृपा अवश्य मिलती है।
वक्ता कहते हैं कि एक और विशेष विधान है जो भगवान दत्तात्रेय का पूजन करने वाले साधकों के लिए बहुत बड़े वरदान के स्वरूप में है; चाहें तो सामान्य रूप से हर कोई इसका प्रयोग कर सकता है। लक्ष्मी जी का बीज अक्षर श्री चाँदी का बनवाया जाता है। मार्गशीर्ष महीने में जब भगवान दत्तात्रेय की जयंती पूर्ण हो जाती है, उसके बाद आने वाली अष्टमीपक्ष की आठवीं तिथि, जो शाक्त कर्मों के लिए विशेष अनुकूल मानी जाती है। को अनघा लक्ष्मी व्रत किया जाता है। विशेष रूप से उस अनघा लक्ष्मी अष्टमी के दिन, या विपत्ति काल में किसी भी कृष्ण पक्ष अष्टमी को, उस श्री बीज मंत्र को किसी प्लेट में रखकर, उसे भगवती का स्वरूप मानकर, उसके ऊपर कुंकुमदेवी को अर्पित किया जाने वाला तथा तिलक हेतु प्रयुक्त सिंदूरी चूर्ण। से इन नामों द्वारा अर्चन किया जाता है। अर्चन के बाद आरतीदेवता की प्रतिमा के समक्ष प्रज्वलित दीपक घुमाने का अनुष्ठान — दीपदान में जब दीपक बुझने लगते हैं, तब इसे किया जाता है। दिखाकर उसे अपने धन रखने के स्थान पर रख देते हैं। उस कृष्ण पक्ष अष्टमी से आरंभ करके प्रतिदिन उस बीज को धन रखने के स्थान से वापस पूजन स्थान पर लाते हैं, पुनः कुमकुम से 108 बार या 101 मंत्रों से अर्चन करते हैं, और फिर ले जाकर धन रखने के स्थान पर रख देते हैं। लाल पुष्प और पीला पुष्प उन्हें अवश्य चढ़ाएँ। वे कहते हैं कि इस प्रकार आरंभ करने पर, विशेषकर धन-संबंधी समस्या में, भगवती की विशिष्ट कृपा अवश्य प्राप्त होगी, और यह प्रयोग करके देखने को कहते हैं।
पितर और वैशाचिक समस्याओं में दत्तात्रेय सेवा और पीपल पर तर्पण
दत्त मंत्रों से पितर शीघ्र शांत
वक्ता कहते हैं कि जब पितृ से संबंधित कोई विशेष समस्या हो जाए, या वैशाचिक समस्याएँ उपस्थित हो जाएँ, तो उस समय भगवान दत्तात्रेय की सेवा, पूजा और अनुष्ठान बहुत प्रभावी होते हैं। वे जोड़ते हैं कि भगवान दत्त के मंत्रों से पीपल वृक्ष पर तर्पण करना भी अति उत्तम है, और उससे पितर बहुत शीघ्र शांत और सौम्य हो जाते हैं।
अनघा बेल-वृक्ष तर्पण किसके लिए: घर की मृत स्त्री जो परिवार को परेशान करे
पित्रानी या डाकिनी, जब नारायण बलि संभव न हो
वक्ता कहते हैं कि यदि घर में किसी स्त्री की मृत्यु हुई हो, विशेषकर अकाल मृत्यु, और वह परिवार को बहुत परेशान कर रही हो, चाहे उसका स्वरूप कुछ भी हो गया हो, उसे पित्रानी (जैसे राजस्थान में कहते हैं) कहें या dakini, और उससे संबंधित दोष उपस्थित हो, तो भगवती के 101 नामों से बिल्व वृक्ष पर तर्पण किया जाता है। वे एक व्यक्ति का उदाहरण देते हैं जिनकी माता जी की हत्या हो गई थी और अब वे परेशान करती हैं, और नारायण बलि का सामर्थ्य अभी नहीं है: वहाँ यह तर्पण विकल्प है, और तीन-चार दिन से सप्ताह भर में उस शक्ति की उग्रता घटकर वह सौम्य हो जाती है। छोटे बच्चों को परेशान कर रही हो तब भी इसका प्रयोग कर सकते हैं।
वक्ता कहते हैं कि यह विषय अधिकतर राजस्थान के क्षेत्रों में देखने को मिलता है, वहाँ ऐसी शक्ति को पित्रानी कहते हैं; यह समस्या कहीं भी हो सकती है, लेकिन वहाँ के लोग इन चीज़ों को लेकर अधिक सक्रिय हैं। स्थिति यह है: घर में किसी स्त्री की मृत्यु हुई हो, अकाल मृत्यु हुई हो, और वह बहुत अधिक परेशान कर रही हो। उसका स्वरूप कुछ भी हो गया हो, उसे पित्रानी कहें या dakini, किसी भी स्वरूप में हो, यदि उससे संबंधित दोष उपस्थित हो गया है तो भगवती के 101 नाम हैं, जिनके द्वारा बिल्वभगवान शिव से संबद्ध पवित्र बेल वृक्ष — इसके नीचे साधना की जाती है, इसकी लकड़ी बंधन-मुक्ति अनुष्ठान में घी व तिल की आहुति के लिए हवन-सामग्री के रूप में प्रयुक्त होती है, तथा इसका त्रिदल पत्र (बिल्वपत्र) शिव को अर्पित किया जाने वाला मुख्य द्रव्य है। वृक्ष पर गंगा जल से तर्पणहवन व मार्जन के साथ किया जाने वाला जल आदि द्वारा देवता या पितरों को अर्पित तर्पण। किया जाता है। वे एक उदाहरण देते हैं। एक व्यक्ति ने बताया कि उनकी माता जी की हत्या हो गई थी, अब वे बड़ी परेशान करती रहती हैं, और अभी उनके पास सामर्थ्य नहीं है कि नारायण बलि आदि करवा पाएँ। ऐसी परिस्थिति में, वे कहते हैं, इसका प्रयोग करें; यह विकल्प है। तुरंत ही, तीन-चार दिन होते-होते, सप्ताह भर पूर्ण होते-होते, जो शक्ति परेशान कर रही है वह सौम्य हो जाती है; उतनी उग्रता नहीं रहती। वे जोड़ते हैं कि यदि वह छोटे बच्चों को परेशान कर रही हो और अधिक दिक्कत हो रही हो, तब भी इसका प्रयोग कर सकते हैं।
अनघा लक्ष्मी के 101 नामों से बेल-वृक्ष तर्पण का विधान
पीतल का लोटा, मधु, काला तिल, तीन पान पत्ते
वक्ता कहते हैं कि यह तर्पण बिल्व वृक्ष के तने पर गंगा जल से किया जाता है, वृक्ष के पास खड़े होकर या उसके नीचे बैठकर; वृक्ष पूजित होना चाहिए, सर्वोत्तम मंदिर के भीतर का, और निर्जन स्थान का कभी नहीं। पीतल के लोटे में जल भरकर उसमें थोड़ा मधु और काला तिल डालते हैं। तीन पान पत्ते (डंठल तोड़कर, अग्र भाग साबुत) एक साथ लेते हैं; घर की मृत स्त्री का नाम लेकर संकल्प बोलते हैं, घी का दीप पुष्प के ऊपर रखकर जलाते हैं, सीधे भूमि पर नहीं, और भगवती से प्रार्थना करते हैं कि उन्हें संतुष्ट और सौम्य करें और परिवार को सामर्थ्य दें कि उनकी मुक्ति के लिए नारायण बलि करवा सकें। पत्ते पात्र में डालकर 101 नामों में से प्रत्येक के साथ 'तर्पयामि नमः' बोलते हुए वृक्ष पर जल डालते हैं। पत्ता और बचा जल घर लाकर पूरे घर में, विशेषकर मुख्य द्वार पर, छिड़क देते हैं।
वक्ता कहते हैं कि गंगा जल से यह तर्पणहवन व मार्जन के साथ किया जाने वाला जल आदि द्वारा देवता या पितरों को अर्पित तर्पण। बिल्वभगवान शिव से संबद्ध पवित्र बेल वृक्ष — इसके नीचे साधना की जाती है, इसकी लकड़ी बंधन-मुक्ति अनुष्ठान में घी व तिल की आहुति के लिए हवन-सामग्री के रूप में प्रयुक्त होती है, तथा इसका त्रिदल पत्र (बिल्वपत्र) शिव को अर्पित किया जाने वाला मुख्य द्रव्य है। वृक्ष के तने पर किया जाता है, या तो तने के पास से, या वृक्ष के नीचे बैठकर उस पर डालते हुए। वृक्ष पूजित होना चाहिए; निर्जन स्थान में नहीं होना चाहिए। बाद में वे इस पर फिर लौटते हैं: यदि वृक्ष मंदिर में उपस्थित हो तो अति उत्तम है, पूजित वृक्ष अति उत्तम प्रभाव देता है, और ध्यान रखें कि वह निर्जन स्थान का वृक्ष कभी न हो। सामग्री: पीतल के लोटे में जल भरकर उसमें थोड़ा सा मधु डालते हैं; आगे वे कहते हैं कि जल में काला तिल भी रहेगा, यानी काला तिल, मधु और जल से तर्पण करना है। डालने के लिए पान का पत्ता लेते हैं; पीपलभगवान दत्तात्रेय को समर्पित एक पवित्र वृक्ष — इसके नीचे किया गया पितृ तर्पण गृह-क्लेश उत्पन्न करने वाले अशांत पितरों को शांत करता है। का पत्ता भी लिया जा सकता है, लेकिन वे कहते हैं कि भगवती के स्वरूप के लिए पान का पत्ता अति उत्तम है, इसलिए पान पत्ते का ही प्रयोग करें। तीन पान पत्ते लेकर उनका डंठल तोड़ देते हैं, अग्र भाग नहीं तोड़ना है, और उन्हें एक साथ पकड़ते हैं। तर्पण से पहले संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। लेते हैं: घी का दीप जलाकर पुष्प के ऊपर रखते हैं, सीधे भूमि पर नहीं, और बोलते हैं कि मेरे घर की यह सदस्य, जिनकी अकाल मृत्यु हुई है और जो स्त्री स्वरूप में थीं, वही अभिप्रेत हैं; वे बल देकर कहते हैं कि मृतक स्त्री ही होनी चाहिए तभी इसका प्रयोग करें, तब यह अति प्रभावी होता है। फिर बोलते हैं: जिनकी मृत्यु हो गई है वे अब हमें परेशान कर रही हैं; हे भगवती, आप इन्हें संतुष्ट कर दें, सौम्य कर दें, और हमें सामर्थ्यवान बनाएँ कि हम इनके निमित्त नारायण बलि करवाकर इनकी सद्गति करवा दें, ताकि इन्हें भी मुक्ति मिल जाए। अन्यत्र वे यही प्रार्थना दूसरे शब्दों में देते हैं: भगवती, आप इन्हें शांत करें, इनकी उग्रता शांत हो, हमें कष्ट न हो, और शीघ्र मार्ग प्रशस्त करें कि इनकी पूर्ण मुक्ति और गति हो जाए। यह बोलकर तीनों पत्ते उस पात्र में डाल देते हैं, और भगवती के प्रत्येक नाम के साथ 'तर्पयामि नमः' बोलते हुए (जैसे पहला, 'श्री अनघाय तर्पयामि नमः') पत्ते से बेल वृक्ष पर जल डालते हैं। सभी 101 नामों से तर्पण करने के बाद पत्ता और जो थोड़ा जल बच जाए उसे घर लाकर पूरे घर में और मुख्य द्वार पर छिड़क देते हैं। वे कहते हैं, इसी प्रकार यह कार्य करना चाहिए, और इससे शांति मिलती है।
अनघा तर्पण मंत्र में प्रणव केवल यज्ञोपवीत धारण करने वालों के लिए
बाकी सब श्री बोलें
वक्ता कहते हैं कि इस मंत्र में प्रणव (ॐ) का प्रयोग केवल यज्ञोपवीत धारण करने वाले करें; बाकी लोग उसकी जगह 'श्री' का प्रयोग करेंगे। इसलिए प्रथम मंत्र 'श्री अनघाय नमः' है, जिसे तर्पण में 'श्री अनघाय तर्पयामि नमः' बोलते हुए पत्ते से वृक्ष पर जल डालते हैं।
बेल-वृक्ष तर्पण के विशेष प्रसंग: अल्पायु में मृत बच्ची, या नष्ट गर्भ या मृत संतान
जब समर्थ साधक या तीर्थ-कर्म संभव न हो
वक्ता कहते हैं कि यदि घर की कोई बच्ची, मान लें तीन से तेरह वर्ष के बीच की, जो रजस्वला हो चुकी हो सकती है, की अकाल मृत्यु हुई हो और वह परिवार को बहुत परेशान कर रही हो, और कोई सामर्थ्यवान साधक न मिला हो जो उसकी गति करा सके, न ही गंगा जी, प्रयाग, काशी या गया जी में विशेष कर्म के लिए आर्थिक साधन हों, तो भगवती के इस स्वरूप और इन मंत्रों से बिल्व वृक्ष पर तर्पण करके उसे शांत और सौम्य किया जा सकता है। वे जोड़ते हैं कि जिनका गर्भ खराब हो गया हो या जिनकी संतान की अकाल मृत्यु हुई हो, उन माता-पिता को बहुत कष्ट होता है, वे भी इसका प्रयोग करें; भगवती की कृपा से वह शांत हो जाती है।
वक्ता कहते हैं: मान लीजिए किसी छोटी बच्ची की अकाल मृत्यु हुई हो, तीन वर्ष से लेकर तेरह वर्ष तक के बीच की कोई बच्ची, जो रजस्वला हो चुकी हो सकती है, और वह बहुत ज़्यादा परेशान कर रही हो। कोई सामर्थ्यवान साधक नहीं मिला जो उसकी गति करा पाए, या परिवार के पास आर्थिक उपलब्धता नहीं है कि गंगा जी, प्रयाग, काशी आदि के क्षेत्र में या गया जी में उसके निमित्त कुछ विशेष करा पाए। ऐसी स्थिति में, वे कहते हैं, भगवती के इस स्वरूप और इन मंत्रों से बिल्वभगवान शिव से संबद्ध पवित्र बेल वृक्ष — इसके नीचे साधना की जाती है, इसकी लकड़ी बंधन-मुक्ति अनुष्ठान में घी व तिल की आहुति के लिए हवन-सामग्री के रूप में प्रयुक्त होती है, तथा इसका त्रिदल पत्र (बिल्वपत्र) शिव को अर्पित किया जाने वाला मुख्य द्रव्य है। वृक्ष पर तर्पणहवन व मार्जन के साथ किया जाने वाला जल आदि द्वारा देवता या पितरों को अर्पित तर्पण। करके उसे शांत और सौम्य किया जा सकता है। अंत में वे एक और प्रसंग जोड़ते हैं: कई बार ऐसा होता है कि जिनका गर्भ खराब हो जाता है या जिनकी संतान की अकाल मृत्यु हो जाती है, उन माता और पिता को बहुत कष्ट होता है। वे कहते हैं, वे भी इस प्रयोग को करें, और भगवती की कृपा से वह शांत हो जाती है। वहाँ, वे कहते हैं, उच्चारण अवश्य करना है: भगवती, आप इन्हें शांत करें, इनकी उग्रता शांत हो, हमें कष्ट न हो, और शीघ्र मार्ग प्रशस्त करें कि इनकी पूर्ण मुक्ति और गति हो जाए; ऐसा संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। करके तर्पण किया करें।
बेल-वृक्ष तर्पण की अवधि: 40 दिन प्रतिदिन, फिर महीने में दो बार
सातवें दिन से लाभ, पर छोड़ना नहीं
वक्ता कहते हैं कि यह तर्पण प्रतिदिन, कम से कम 40 दिन लगातार करना होगा; तब लाभ अवश्य मिलेगा। सात दिन से लाभ दिखने लगता है, लेकिन छोड़ना नहीं चाहिए; उन्हें पूर्ण रूप से शांत करना चाहिए। 40 दिन के बाद चाहें तो केवल दो दिन, हर कृष्ण पक्ष अष्टमी और अमावस्या को तर्पण करने से शांति बनी रहती है।
वक्ता कहते हैं कि यह तर्पणहवन व मार्जन के साथ किया जाने वाला जल आदि द्वारा देवता या पितरों को अर्पित तर्पण। प्रतिदिन करना होगा। कम से कम 40 दिन तक लगातार करेंगे तो लाभ अवश्य प्राप्त होगा। सात दिन से लाभ दृष्टिगोचर होना आरंभ हो जाता है, लेकिन वे कहते हैं छोड़ना नहीं चाहिए; उन्हें पूर्ण रूप से शांत करना चाहिए। 40 दिन के बाद चाहें तो केवल दो दिन, हर कृष्ण पक्ष अष्टमीपक्ष की आठवीं तिथि, जो शाक्त कर्मों के लिए विशेष अनुकूल मानी जाती है। और अमावस्या को तर्पण किया करें, उससे शांति बनी रहेगी।
सावधानी: बेल-वृक्ष तर्पण और काली प्रयोग साथ में नहीं
दो प्रयोग साथ करने से अत्यधिक उग्रता
वक्ता कहते हैं कि इस तर्पण के अलावा काली जी का एक प्रयोग, जो वे पहले दे चुके हैं, भी इसी समस्या में किया जा सकता है, लेकिन वे चेतावनी देते हैं कि यदि दोनों साथ में करेंगे तो बहुत अधिक उग्रता होगी। दोनों में से एक ही करना है, दोनों नहीं।
अंत में वक्ता कहते हैं कि इस तर्पणहवन व मार्जन के साथ किया जाने वाला जल आदि द्वारा देवता या पितरों को अर्पित तर्पण। के सिवाय काली जी का भी एक प्रयोग है, जो वे पहले ही दे चुके हैं, वह भी किया जा सकता है। लेकिन वे सावधान करते हैं कि यदि इसे इस तर्पण के साथ में करेंगे तो बहुत अधिक उग्रता होगी। इसलिए दोनों को साथ नहीं करना है।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।