तुम भूल गए हो, हनुमान

You have forgotten, Hanumān — Jāmbavān reminds Hanumān of his strength before the leap

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बलं बुद्धिश्च तेजश्च सत्त्वं च हरिपुङ्गव । विशिष्टं सर्वभूतेषु किमात्मानं न बुध्यसे ॥
किष्किन्धा 66.7

जय श्री राम।

परीक्षा हॉल के बाहर की सुबह। सब बच्चे किताबें पलट रहे हैं। कोई कह रहा है, "मैंने तो सब पढ़ लिया।" कोई, "मेरा तो आधा भी नहीं हुआ।"

और एक बच्चा कोने में चुपचाप खड़ा है। उसने साल भर मेहनत की है। सब आता है उसे। पर उस सुबह, उसे लग रहा है — "मुझसे नहीं होगा। मैं उतना अच्छा नहीं हूँ।"

या कोई इंटरव्यू के बाहर बैठा है। बीस साल का अनुभव। फिर भी हाथ ठंडे, दिल तेज़। "पता नहीं, मैं इस लायक़ हूँ भी या नहीं।"

और घर पर? कोई माँ, जिसने बीस साल घर सँभाला, अब फिर से काम शुरू करना चाहती है। पर सोचती है, "अब मुझसे क्या होगा? सब भूल गई।"

हम सब कभी न कभी उस कोने में खड़े हुए हैं। और ऐसे पल में हमें किसी पढ़ाई की ज़रूरत नहीं होती। बस किसी ऐसे की ज़रूरत होती है, जो कंधे पर हाथ रखकर कहे — "तुम भूल गए हो। तुम कौन हो।"

सीता जी की खोज चल रही है। वानरों का एक दल दक्षिण के समुद्र तट पर आ पहुँचा है। अंगद, जाम्बवान, हनुमान, और बहुत से वीर।

और सामने… अनंत समुद्र। सौ योजन। उस पार लंका।

अंगद ने पूछा — "कौन कितना कूद सकता है?" और फिर शुरू हुई एक दिलचस्प गिनती।

गज बोले — "दस योजन!" गवाक्ष — "बीस!" गवय — "तीस!" शरभ — "चालीस!" गन्धमादन — "पचास!" मैन्द — "साठ!" द्विविद — "सत्तर!" सुषेण — "अस्सी!"

बिल्कुल क्लास के बच्चों की तरह, एक-दूसरे से बढ़कर!

फिर सबसे बूढ़े जाम्बवान बोले — "बेटा, जवानी में मेरा बल बेजोड़ था। जब भगवान ने वामन रूप में तीन पग भरे थे, तब मैंने पूरी पृथ्वी की इक्कीस बार परिक्रमा की थी!"

त्रिविक्रमे मया तात सशैलवनकानना । त्रिःसप्तकृत्वः पृथिवी परिक्रान्ता प्रदक्षिणम् ॥
किष्किन्धा 66.31

सोचिए! ये भालू, जाम्बवान, भगवान वामन के ज़माने से हैं! "पर अब बूढ़ा हो गया हूँ। नब्बे योजन तक जा सकता हूँ। बस।"

अंगद बोले — "मैं सौ योजन चला जाऊँगा। पर लौट पाऊँगा या नहीं, ये पक्का नहीं।"

और जाम्बवान ने उन्हें रोका। बड़ी समझदारी की बात कही — "युवराज, आप तो हज़ार योजन भी जा सकते हैं। पर जो सबको भेजता है, वो ख़ुद नहीं जाता। आप इस काम की जड़ हैं। जड़ बची रहे, तभी फूल और फल आते हैं।"

आज के हर टीम-लीडर को ये बात लिख लेनी चाहिए! हर काम ख़ुद करने दौड़ोगे, तो टीम कब खड़ी होगी?

और सब चुप। सौ योजन जाना है, और लौटना भी है। कोई नहीं है।

और इस सारी बातचीत के बीच… एक वानर, एक तरफ़, अकेला बैठा था। चुपचाप। कुछ नहीं बोल रहा।

ततः प्रतीतं प्लवतां वरिष्ठमेकान्तमाश्रित्य सुखोपविष्टम् ।
65.34

छलाँग लगाने वालों में सबसे श्रेष्ठ। और एकांत में चुप बैठा।

अब यहाँ पहली दिलचस्प बात। जिसने एक भी शब्द नहीं कहा, जिसने अपनी गिनती भी नहीं बताई… उसी पर बूढ़े जाम्बवान की नज़र गई।

जाम्बवान उठकर उसके पास गए।

वीर वानरलोकस्य सर्वशास्त्रविशारद । तूष्णीमेकान्तमाश्रित्य हनुमन्किं न जल्पसि ॥
66.2

"हनुमान! वानरों के वीर! सारे शास्त्रों के जानकार! तुम अकेले में चुप क्यों बैठे हो? कुछ बोलते क्यों नहीं?"

और फिर जाम्बवान ने एक-एक करके उसे याद दिलाना शुरू किया।

"तुम सुग्रीव के बराबर हो। तेज और बल में तो श्रीराम और लक्ष्मण के बराबर हो! गरुड़ को देखा है? समुद्र से साँप उठा लाता है। उसके पंखों में जितना बल है, उतना तुम्हारी भुजाओं में है!"

बलं बुद्धिश्च तेजश्च सत्त्वं च हरिपुङ्गव । विशिष्टं सर्वभूतेषु किमात्मानं न बुध्यसे ॥
66.7

"तुम्हारा बल, तुम्हारी बुद्धि, तुम्हारा तेज, तुम्हारा साहस… सब प्राणियों से बढ़कर है। फिर तुम अपने आप को क्यों नहीं पहचानते?"

ये प्रश्न सिर्फ़ हनुमान से नहीं था। ये आपसे भी है। "किमात्मानं न बुध्यसे?"

और फिर जाम्बवान ने हनुमान को उनकी अपनी कहानी सुनाई। जैसे कोई दादा, पोते को उसके बचपन के क़िस्से सुनाता है।

"तुम्हारी माँ अंजना, केसरी की पत्नी। पवन देव के आशीर्वाद से तुम पैदा हुए। एक गुफा में।"

"और जानते हो, बचपन में क्या किया था? सुबह-सुबह उगता सूरज देखा, और सोचा — कोई लाल फल है! और उसे पकड़ने को उछल पड़े!"

अभ्युत्थितं ततः सूर्यं बालो दृष्ट्वा महावने । फलं चेति जिघृक्षुस्त्वमुत्प्लुत्याभ्युद्गतो दिवम् ॥
66.20

"तीन सौ योजन ऊपर चले गए! सूरज की गर्मी से झुलसे, फिर भी हिम्मत नहीं हारी!"

और अब दूसरी चौंकाने वाली बात। हनुमान नाम पड़ा कैसे?

तदा शैलाग्रशिखरे वामो हनुरभज्यत । ततो हि नामधेयं ते हनुमानिति कीर्त्यते ॥
66.23

"इन्द्र ने ग़ुस्से में वज्र मारा। तुम पहाड़ की चोटी पर गिरे, और तुम्हारा बायाँ जबड़ा — 'हनु' — टूट गया। उसी से तुम्हारा नाम पड़ा — हनुमान।"

यानी जो नाम आज करोड़ों लोग संकट में पुकारते हैं… वो एक चोट की याद है। एक गिरने की याद।

आपकी चोटें भी आपकी पहचान हैं। जो परीक्षा आप एक बार फ़ेल हुए, जो नौकरी छूटी, जो रिश्ता टूटा… उनसे आप कमज़ोर नहीं हुए। उन्होंने आपको आपका नाम दिया है।

"और फिर पवन देव ने क्रोध में बहना बंद कर दिया। तीनों लोकों की साँस रुक गई! तब ब्रह्मा ने वर दिया — कोई शस्त्र तुम्हें नहीं मार सकेगा। और इन्द्र ने वर दिया — तुम्हारी मृत्यु तुम्हारी इच्छा से होगी।"

और फिर जाम्बवान ने आख़िरी बात कही —

उत्तिष्ठ हरिशार्दूल लङ्घयस्व महार्णवम् ।
66.35

"उठो, वानरों के सिंह! लाँघ जाओ ये महासागर! सब वानर उदास बैठे हैं। तुम चुप क्यों हो?"

और फिर… कुछ हुआ।

ततस्तु वै जाम्बवता प्रचोदितः प्रतीतवेगः पवनात्मजः कपिः ।
66.37

जाम्बवान के कहने से, हनुमान को अपने वेग पर भरोसा हो गया। और वो बढ़ने लगे! बड़े, और बड़े! जैसे गुफा में सोया सिंह अँगड़ाई लेकर उठता है।

और वानर? जो अभी तक उदास बैठे थे…

सहसा शोकमुत्सृज्य प्रहर्षेण समन्विताः ।
67.2

एक पल में सारा दुःख छोड़कर, ख़ुशी से उछल पड़े! गरजने लगे, हनुमान की जय-जयकार करने लगे!

अब तीसरी बात, जो बहुत गहरी है। जाम्बवान ने हनुमान को कोई नई ताक़त नहीं दी। कोई मंत्र नहीं, कोई अस्त्र नहीं। बस याद दिलाया। "तुम कौन हो।" ताक़त पहले से अंदर थी। बस किसी को भरोसा दिलाना था।

और हनुमान ने महेन्द्र पर्वत पर चढ़कर, गरजकर कहा —

अहं द्रक्ष्यामि वैदेहीं प्रमोदध्वं प्लवङ्गमाः ॥
67.27

"मैं वैदेही को देखूँगा! वानरो, ख़ुशी मनाओ!"

और बूढ़े जाम्बवान ने आशीर्वाद दिया — "जाओ बेटा। और जब तक तुम लौटकर नहीं आते… हम सब एक पैर पर खड़े रहेंगे।"

सोचिए। जिसे भरोसा दिलाया, उसके लिए सब एक पैर पर खड़े होने को तैयार। जो बच्चा परीक्षा देने जा रहा है, उसके पीछे भी पूरा घर ऐसे ही खड़ा होता है। माँ का व्रत, पिता की चुप्पी, दादी की माला। वो अकेला नहीं कूदता।

और हनुमान के पैरों के दबाव से पूरा महेन्द्र पर्वत काँप उठा। चट्टानें गिरीं, झरने फूट पड़े। और छलाँग से ठीक पहले उन्होंने क्या कहा?

यथा राघवनिर्मुक्तः शरः श्वसनविक्रमः । गच्छेत्तद्वद्गमिष्यामि लङ्कां रावणपालिताम् ॥
सुन्दर 1.39

"जैसे श्रीराम का छोड़ा हुआ बाण हवा की तरह जाता है… वैसे ही मैं लंका जाऊँगा।"

"मैं" नहीं कूदा। श्रीराम का बाण कूदा। जब अपनी ताक़त भगवान के काम से जुड़ जाए… तो वो बाण बन जाती है।

गीता में भगवान ने यही कहा है —

उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् । आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥
गीता 6.5

"अपने आप को ख़ुद ऊपर उठाओ। अपने आप को गिराओ मत। तुम ख़ुद अपने सबसे अच्छे दोस्त हो… और ख़ुद ही अपने सबसे बड़े दुश्मन।"

तो परीक्षा, इंटरव्यू, या किसी भी बड़ी छलाँग से पहले, तीन बातें।

पहली। अपने बचपन को याद कीजिए। आपने भी कभी कोई "सूरज" पकड़ने की कोशिश की थी। वो हिम्मत कहीं गई नहीं। बस धूल जम गई है।

दूसरी। जाम्बवान बनिए। घर में, दफ़्तर में, कक्षा में कोई कोने में चुप बैठा हो… उसके पास जाइए। कंधे पर हाथ रखिए। उसे उसकी याद दिलाइए। कई बार एक वाक्य किसी की पूरी ज़िंदगी बदल देता है।

और तीसरी। छलाँग से पहले, हनुमान की तरह, अपने आप को श्रीराम का बाण मान लीजिए। "मैं नहीं, वो चला रहे हैं।" फिर डर किस बात का?

तो कल सुबह, जब परीक्षा हॉल के बाहर, या किसी बड़े दरवाज़े के सामने खड़े हों… और हाथ ठंडे हो रहे हों…

तो एक बूढ़े भालू की आवाज़ याद कीजिए, जो आपके कान में कह रही है —

"तुम भूल गए हो, हनुमान… तुम कौन हो।"

जय श्री राम।

उत्तिष्ठ हरिशार्दूल लङ्घयस्व महार्णवम् । परा हि सर्वभूतानां हनुमन्या गतिस्तव ॥
किष्किन्धा 66.35

तीन बातें याद रखिए

  1. 1.अपने बचपन को याद कीजिए। आपने भी कभी कोई "सूरज" पकड़ने की कोशिश की थी। वो हिम्मत कहीं गई नहीं। बस धूल जम गई है।
  2. 2.जाम्बवान बनिए। घर में, दफ़्तर में, कक्षा में कोई कोने में चुप बैठा हो… उसके पास जाइए। कंधे पर हाथ रखिए। उसे उसकी याद दिलाइए। कई बार एक वाक्य किसी की पूरी ज़िंदगी बदल देता है।
  3. 3.छलाँग से पहले, हनुमान की तरह, अपने आप को श्रीराम का बाण मान लीजिए। "मैं नहीं, वो चला रहे हैं।" फिर डर किस बात का?

इस सत्संग के श्लोक

किष्किन्धा 66.7 किष्किन्धा 66.31 65.34 66.2 66.7 66.23 66.35 66.37 67.2 67.27 सुन्दर 1.39 गीता 6.5 किष्किन्धा 66.35