फल की चिंता
Worrying about results — “Your right is to the work alone” — evenness is yoga
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ॥
जय श्री राम।
रिज़ल्ट से एक रात पहले। एक बच्चा बिस्तर पर लेटा है, छत को देख रहा है। और दिमाग़ में एक फ़िल्म चल रही है।
"अगर नंबर कम आए… तो अच्छा कॉलेज नहीं मिलेगा। अच्छा कॉलेज नहीं मिला, तो अच्छी नौकरी नहीं मिलेगी। नौकरी नहीं मिली, तो पापा क्या कहेंगे? रिश्तेदार क्या कहेंगे? मम्मी ने इतनी उम्मीदें लगाई हैं… उनका दिल टूट जाएगा…"
एक के बाद एक। एक डर, दूसरे डर को जन्म देता है। और सुबह होते-होते, अभी रिज़ल्ट आया भी नहीं, पर वो बच्चा… मन में सौ बार फ़ेल हो चुका है।
और बगल के कमरे में? माँ-बाप भी जाग रहे हैं। पिता फ़ोन पर बार-बार रिज़ल्ट की वेबसाइट खोलकर देख रहे हैं, जो अभी खुली भी नहीं। माँ मन ही मन मन्नतें माँग रही है। और सुबह तीनों ऐसे मिलेंगे, जैसे कुछ हुआ ही नहीं — "अच्छी नींद आई?"
और ये सिर्फ़ बच्चों की बात नहीं। प्रमोशन की लिस्ट का इंतज़ार। मेडिकल रिपोर्ट का इंतज़ार। बेटे के इंटरव्यू का इंतज़ार। हम सब ये फ़िल्म चलाते हैं।
आज मैं आपको बताऊँगा कि ये फ़िल्म एक बार… हनुमान जी के मन में भी चली थी। और फिर वो उससे बाहर कैसे निकले।
हनुमान समुद्र लाँघकर लंका पहुँच चुके हैं। रात का समय। छोटा-सा रूप बनाकर, रावण के महलों में सीता जी को ढूँढ रहे हैं।
एक महल, दूसरा महल। शयन-कक्ष, चित्रशालाएँ, लता-कुंज। रावण का अंतःपुर, उसकी रानियाँ। सोता हुआ रावण। सब देख लिया।
सीता जी कहीं नहीं।
और हनुमान के मन में पहला डर आया — "कहीं सीता जी जीवित ही न हों…" और फिर दूसरा — "मैं लौटकर क्या कहूँगा? सब वानर पूछेंगे, 'वीर, तुम वहाँ गए थे, क्या किया?' जाम्बवान क्या कहेंगे? अंगद क्या कहेंगे?"
सुना आपने? "लोग क्या कहेंगे।" हनुमान जी को भी ये डर लगा था।
और फिर, पहली बार, हनुमान ने अपने आप को सँभाला। और एक ऐसी बात कही, जो सुन्दरकाण्ड के सबसे प्रसिद्ध श्लोकों में है —
अनिर्वेदः श्रियो मूलमनिर्वेदः परं सुखम् ।
अनिर्वेदो हि सततं सर्वार्थेषु प्रवर्तकः ॥
"हिम्मत न हारना ही सफलता की जड़ है। हिम्मत न हारना ही सबसे बड़ा सुख है। यही हर काम में आगे बढ़ाता है।"
और हनुमान फिर से खोजने लगे। तहख़ाने, मंदिर, बावलियाँ, गलियाँ। ऊपर उछलते, नीचे कूदते, दरवाज़े खोलते। वाल्मीकि कहते हैं — रावण के अंतःपुर में चार अंगुल की भी जगह नहीं बची, जहाँ हनुमान नहीं गए।
और फिर भी… सीता जी नहीं मिलीं।
और अब वो पल आता है, जो मुझे पूरे सुन्दरकाण्ड में सबसे इंसानी लगता है। पहली चौंकाने वाली बात।
हनुमान एक दीवार पर बैठ गए। और उनके मन में… वही फ़िल्म चलने लगी।
गत्वा तु यदि काकुत्स्थं वक्ष्यामि परमप्रियम् ।
न दृष्टेति मया सीता ततस्त्यक्ष्यति जीवितम् ॥
"अगर मैं जाकर श्रीराम से कहूँ, 'सीता नहीं मिलीं'… तो वो प्राण छोड़ देंगे।"
और फिर एक के बाद एक — "श्रीराम नहीं रहेंगे, तो लक्ष्मण नहीं बचेंगे। दोनों भाइयों की ख़बर सुनकर भरत मर जाएँगे। भरत को देखकर शत्रुघ्न। फिर तीनों माताएँ। फिर सुग्रीव, जो वचन के पक्के हैं। फिर रुमा, फिर तारा, फिर अंगद। फिर सारे वानर… पूरा इक्ष्वाकु कुल ख़त्म हो जाएगा!"
विनष्टौ भ्रातरौ श्रुत्वा भरतोऽपि मरिष्यति ।
भरतं च मृतं दृष्ट्वा शत्रुघ्नो न भविष्यति ॥
और फिर एक उलझन — "अगर बताऊँ कि सीता नहीं मिलीं, तो दोष। न बताऊँ, तो भी दोष। क्या करूँ?" जैसे वो बच्चा सोचता है — "मार्कशीट दिखाऊँ, तो डाँट। छिपाऊँ, तो और बड़ी डाँट!"
देखिए इस मन को। अभी कुछ हुआ नहीं है। सीता जी कहीं हैं, बस मिली नहीं हैं। पर मन ने कल्पना में पूरा वंश ख़त्म कर दिया।
बिल्कुल उस बच्चे की तरह, जिसने रिज़ल्ट से पहले ही अपनी पूरी ज़िंदगी बर्बाद मान ली।
वाल्मीकि ने ये सब क्यों लिखा? हनुमान जैसे वीर की कमज़ोरी क्यों दिखाई? शायद इसलिए, कि हम जानें — ये डर बड़े-बड़ों को आता है। आपको आता है, तो आप अकेले नहीं।
और ये फ़िल्म इतनी अँधेरी हो गई, कि हनुमान ने सोचा — "मैं लौटूँगा ही नहीं। यहीं वन में तपस्वी बनकर रहूँगा।" और उससे भी आगे के अँधेरे विचार आए।
और फिर… एक रोशनी।
विनाशे बहवो दोषा जीवन्भद्राणि पश्यति ।
तस्मात्प्राणान्धरिष्यामि ध्रुवो जीवति संगमः ॥
"हार मान लेने में बहुत दोष हैं। जो जीता रहता है… वो अच्छे दिन देखता है। इसलिए मैं जीऊँगा। जीते रहे, तो मिलन ज़रूर होगा।"
"जीवन्भद्राणि पश्यति।" जो टिका रहता है, वो भला देखता है। अगर आज कोई इतने अँधेरे में है कि सब ख़त्म लगता है… तो ये पंक्ति आपके लिए है। रुकिए। टिके रहिए। सुबह आती है।
और अब दूसरी बात, जो सबसे काम की है। हनुमान उस अँधेरे से बाहर कैसे निकले?
उन्होंने आगे की चिंता छोड़ी… और सामने देखा।
अशोकवनिका चेयं दृश्यते या महाद्रुमा ।
इमामभिगमिष्यामि न हीयं विचिता मया ॥
"अरे! ये बड़े-बड़े पेड़ों वाली अशोक वाटिका दिख रही है। इसे तो मैंने अभी खोजा ही नहीं!"
बस! न श्रीराम की चिंता, न भरत की, न वानरों की। बस अगला क़दम। "जो जगह अभी नहीं देखी, वो देखूँगा।"
चिंता हमेशा भविष्य में रहती है। और काम हमेशा सामने रहता है।
और जाने से पहले, हनुमान ने हाथ जोड़े —
नमोस्तु रामाय सलक्ष्मणाय देव्यै च तस्यै जनकात्मजायै ।
"लक्ष्मण सहित श्रीराम को नमस्कार। और देवी जानकी को नमस्कार।"
काम अपना, नमस्कार भगवान को। और उसी अशोक वाटिका में… सीता जी मिलीं।
सोचिए, अगर हनुमान उस दीवार पर बैठे-बैठे अपनी फ़िल्म ही देखते रहते? श्रीराम, भरत, अयोध्या, किष्किन्धा की चिंता में? तो अशोक वाटिका उनके सामने होते हुए भी अनदेखी रह जाती। फल की चिंता कई बार फल को ही छिपा देती है।
और यही तो गीता का सबसे प्रसिद्ध वचन है —
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥
"तुम्हारा अधिकार केवल कर्म पर है। फल पर कभी नहीं। फल को अपना उद्देश्य मत बनाओ। और कर्म छोड़ देने की ओर भी मत झुको।"
अब इसकी आख़िरी पंक्ति पर ध्यान दीजिए, जिसे लोग अक्सर भूल जाते हैं। तीसरी बात। "मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि" — काम छोड़ देने से भी मोह मत रखो।
हनुमान के साथ यही हुआ था। फल की चिंता ने उन्हें… काम छोड़ने की ओर धकेल दिया था। "लौटूँगा नहीं, यहीं तपस्वी बन जाऊँगा।" फल की चिंता और काम छोड़ना — दोनों एक ही बीमारी के दो रूप हैं।
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥
"सफलता हो या असफलता, दोनों में सम रहना… यही योग है।"
एक किसान को देखिए। वो खेत जोतता है, बीज डालता है, पानी देता है, निराई करता है। बारिश? वो उसके हाथ में नहीं। ओले? उसके हाथ में नहीं। पर कोई किसान ये सोचकर बीज डालना नहीं छोड़ता कि "शायद ओले पड़ें।" वो अपना काम पूरा करता है, और आसमान की ओर हाथ जोड़ देता है।
और भगवान ने एक और सुंदर बात कही — "योगः कर्मसु कौशलम्।" योग का मतलब है, काम में कुशलता। यानी जो बच्चा रात भर रिज़ल्ट की चिंता की जगह अगली किताब खोल ले… वो योगी है!
तो जो आज किसी रिज़ल्ट, किसी रिपोर्ट, किसी फ़ैसले का इंतज़ार कर रहे हैं, उनके लिए तीन बातें।
पहली। जब मन में "अगर ये हुआ तो… फिर वो होगा… फिर वो…" की फ़िल्म चले — तो पहचानिए। ये वही फ़िल्म है जो हनुमान के मन में चली थी। और वो सच नहीं हुई। सीता जी मिलीं। कोई नहीं मरा।
दूसरी। अपनी अशोक वाटिका ढूँढिए। "अभी क्या है, जो मैंने नहीं किया?" एक और किताब, एक और फ़ोन, एक और कोशिश। चिंता भविष्य की है, काम आज का है।
और तीसरी। "जीवन्भद्राणि पश्यति।" जो भी फल आए, ज़िंदगी उससे बड़ी है। जो टिका रहता है, वो अच्छे दिन देखता है। और इस बात को अपने बच्चों से ज़रूर कहिए — नंबर से पहले, और नंबर के बाद भी।
तो आज रात, अगर आप भी छत की ओर देखते हुए वो फ़िल्म चला रहे हैं…
तो लंका की उस दीवार पर बैठे हनुमान को याद कीजिए। जिनके मन में भी सब कुछ ख़त्म हो चुका था।
और फिर उन्होंने सामने देखा… "इसे तो अभी खोजा ही नहीं।"
फल उसका है। अगला क़दम आपका।
जय श्री राम।
अनिर्वेदः श्रियो मूलमनिर्वेदः परं सुखम् ।
अनिर्वेदो हि सततं सर्वार्थेषु प्रवर्तकः ॥
तीन बातें याद रखिए
- 1.जब मन में "अगर ये हुआ तो… फिर वो होगा… फिर वो…" की फ़िल्म चले — तो पहचानिए। ये वही फ़िल्म है जो हनुमान के मन में चली थी। और वो सच नहीं हुई। सीता जी मिलीं। कोई नहीं मरा।
- 2.अपनी अशोक वाटिका ढूँढिए। "अभी क्या है, जो मैंने नहीं किया?" एक और किताब, एक और फ़ोन, एक और कोशिश। चिंता भविष्य की है, काम आज का है।
- 3."जीवन्भद्राणि पश्यति।" जो भी फल आए, ज़िंदगी उससे बड़ी है। जो टिका रहता है, वो अच्छे दिन देखता है। और इस बात को अपने बच्चों से ज़रूर कहिए — नंबर से पहले, और नंबर के बाद भी।