मुट्ठी भर चिवड़ा
A handful of flattened rice — Sudāmā, ashamed to go empty-handed, and the friend who ate his gift
तर्पयन्त्यङ्ग मां विश्वमेते पृथुकतण्डुलाः ॥
जय श्री कृष्ण।
एक सवाल। आपके किसी पुराने दोस्त की बड़ी नौकरी लग गई हो… बड़ा आदमी बन गया हो… बड़ा घर, बड़ी गाड़ी… और आपको उसके घर जाना पड़े। तो सबसे पहले मन में क्या आता है?
"हाथ में क्या लेकर जाऊँ?"
मिठाई का डिब्बा छोटा लगता है। फल ले जाओ तो लगता है, उसके घर तो इससे अच्छे फल रोज़ आते होंगे। और अगर जेब में पैसे ही न हों… तो आदमी जाता ही नहीं। सोचता है, "क्या मुँह लेकर जाऊँ?"
वो संकोच। वो शर्म। आज की कथा उसी के बारे में है।
भागवत कहता है — श्रीकृष्ण का एक मित्र था। एक ब्राह्मण। बहुत ज्ञानी, बहुत शांत। और बहुत, बहुत ग़रीब।
और पहली दिलचस्प बात यहीं है। भागवत की कथा में उसका नाम तक नहीं आता! बस "कृष्ण का एक मित्र"। अध्याय के नाम में उसे श्रीदामा कहा गया है, और लोग उसे सुदामा कहते हैं।
जो अपने आप मिल जाए, उसी से घर चलता था। फटे कपड़े। और उसकी पत्नी… भूख से दुबली।
एक दिन पत्नी काँपती हुई पति के पास आई। मुरझाया हुआ चेहरा। और धीरे से बोली —
"सुनिए… क्या लक्ष्मी के स्वामी श्रीकृष्ण आपके मित्र नहीं हैं? वो द्वारका में रहते हैं। उनके पास जाइए न। जो उन्हें याद करता है, उसे वो अपने आप को भी दे देते हैं। तो क्या थोड़ा धन नहीं देंगे?"
उसने एक बार नहीं कहा। बार-बार, बड़ी कोमलता से कहा।
अब ब्राह्मण ने मन में क्या सोचा? भागवत बताता है — "धन मिले न मिले… श्रीकृष्ण के दर्शन तो होंगे। वही सबसे बड़ा लाभ है।"
तो जाने का तय हुआ। अब वही सवाल — हाथ में क्या ले जाएँ?
"घर में कुछ है भेंट देने लायक?"
घर में कुछ नहीं था। तो पत्नी ने क्या किया?
याचित्वा चतुरो मुष्टीन् विप्रान् पृथुकतण्डुलान् ।
चैलखण्डेन तान् बद्ध्वा भर्त्रे प्रादादुपायनम् ॥
वो पड़ोस के घरों में गई… और चार मुट्ठी चिवड़ा माँग लाई। एक फटे कपड़े के टुकड़े में बाँधा। और पति के हाथ में रख दिया।
सुना आपने? दूसरी चौंकाने वाली बात। भगवान के लिए जो भेंट जा रही थी… वो भी उधार की थी!
तो अगर आपको कभी लगे कि आपके पास भगवान को देने के लिए कुछ अपना नहीं है… याद रखिए, उनके सबसे प्यारे मित्र के पास भी नहीं था।
ब्राह्मण पैदल चल पड़ा। रास्ते भर एक ही चिंता — "मुझे कृष्ण के दर्शन होंगे भी? इतने बड़े राजा… मुझे अंदर घुसने भी देंगे?"
द्वारका पहुँचा। तीन चौकियाँ पार कीं, तीन ड्योढ़ियाँ पार कीं। एक सुंदर महल में पहुँचा। और श्रीकृष्ण अपनी प्रिया के पलंग पर बैठे थे।
तं विलोक्याच्युतो दूरात् प्रियापर्यङ्कमास्थितः ।
सहसोत्थाय चाभ्येत्य दोर्भ्यां पर्यग्रहीन्मुदा ॥
दूर से देखा… और "सहसा उत्थाय" — एकदम उठ खड़े हुए! दौड़कर पास आए और दोनों बाँहों में भर लिया।
प्रीतो व्यमुञ्चदब्बिन्दून् नेत्राभ्यां पुष्करेक्षणः ॥
और भागवत कहता है — कमल-नयन श्रीकृष्ण की आँखों से… प्रेम के आँसू बहने लगे।
भगवान रो पड़े। एक फटे कपड़ों वाले दोस्त को देखकर।
फिर उन्होंने मित्र को अपने पलंग पर बिठाया। स्वयं पानी लाए। अपने हाथों से उसके पैर धोए… और वो जल अपने सिर पर लगाया। चंदन लगाया, धूप-दीप से पूजा की। और रानी ने स्वयं चँवर डुलाकर उस थके हुए ब्राह्मण को हवा की।
महल के लोग हैरान! आपस में फुसफुसा रहे हैं — "इस भिखारी जैसे आदमी ने ऐसा कौन-सा पुण्य किया है? लक्ष्मी को पलंग पर छोड़कर प्रभु इसे बड़े भाई की तरह गले लगा रहे हैं!"
फिर दोनों दोस्त हाथ में हाथ डालकर बैठ गए। और पुरानी बातें शुरू हुईं। गुरुकुल की बातें।
और श्रीकृष्ण ने एक रात याद दिलाई। "याद है? गुरुमाता ने हमें लकड़ियाँ लाने जंगल भेजा था?"
अचानक आँधी आई। बेमौसम बारिश। बादल गरजे। सूरज डूब गया। चारों ओर पानी ही पानी, कुछ दिखाई न दे। और दो बच्चे… एक-दूसरे का हाथ पकड़े… रात भर जंगल में भटकते रहे।
सुबह गुरु सान्दीपनि ढूँढते हुए आए। बच्चों को देखा और बोले — "बच्चो, तुमने मेरे लिए इतना कष्ट सहा!" और आशीर्वाद दिया।
सोचिए। जो सारे जगत का मालिक है… वो अपने ग़रीब दोस्त को वो रात याद दिला रहा है, जब दोनों एक बराबर थे। एक-दूसरे का हाथ पकड़े हुए।
और फिर श्रीकृष्ण मुस्कुराए। और वो सवाल पूछा, जिससे ब्राह्मण डर रहा था।
"भाभी ने मेरे लिए क्या भेजा है?"
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति ।
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः ॥
"जो प्रेम से मुझे एक पत्ता, एक फूल, एक फल, या थोड़ा-सा पानी भी दे… मैं उसे खाता हूँ।"
यही श्लोक गीता में भी है, नौवें अध्याय में। और यहाँ भगवान उसे अपने दोस्त के सामने जीकर दिखा रहे हैं।
पर ब्राह्मण ने सिर झुका लिया। पोटली नहीं निकाली। इतने बड़े महल में, इतने बड़े राजा को… चार मुट्ठी चिवड़ा? उधार का? शर्म आ गई।
भगवान सबके मन की जानते हैं। उन्होंने सोचा — "ये अपने लिए नहीं आया। अपनी पत्नी के लिए आया है। और इसने कभी धन के लिए मुझे नहीं भजा।"
स्वयं जहार किमिदमिति पृथुकतण्डुलान् ॥
"अरे, ये क्या है?" कहकर… ख़ुद ही उसके कपड़े में बँधी पोटली खींच ली!
नन्वेतदुपनीतं मे परमप्रीणनं सखे ।
तर्पयन्त्यङ्ग मां विश्वमेते पृथुकतण्डुलाः ॥
"मित्र! तुम तो मेरे लिए सबसे प्यारी चीज़ लाए हो! ये चिवड़े मुझे ही नहीं… सारे विश्व को तृप्त कर देंगे।"
और एक मुट्ठी मुँह में डाल ली। दूसरी उठाई…
और तीसरी बात, सबसे प्यारी। उसी पल लक्ष्मी जी ने उनका हाथ पकड़ लिया!
"बस प्रभु! आपको प्रसन्न करने वाली इतनी-सी भेंट ही… किसी को इस लोक और परलोक की सारी संपत्ति देने के लिए काफ़ी है।"
एक मुट्ठी। उधार की। और लक्ष्मी जी को हाथ थामना पड़ा।
अब कहानी का वो मोड़, जो सबसे गहरा है।
अगली सुबह ब्राह्मण विदा हुआ। श्रीकृष्ण कुछ दूर तक छोड़ने आए। और हाथ में… कुछ नहीं दिया।
स चालब्ध्वा धनं कृष्णान्न तु याचितवान् स्वयम् ।
न उन्होंने दिया, न इसने माँगा। सोचिए, घर पर भूखी पत्नी राह देख रही है। और ये ख़ाली हाथ लौट रहा है।
पर रास्ते में वो क्या सोचता है, सुनिए। "अच्छा हुआ प्रभु ने धन नहीं दिया। ग़रीब आदमी धन पाकर मतवाला हो जाता, और उन्हें भूल जाता। उन्होंने करुणा करके नहीं दिया।"
जिसे कुछ नहीं मिला, वो भी शिकायत नहीं कर रहा। धन्यवाद कर रहा है।
और फिर वो अपनी गली में पहुँचा…
और ठिठक गया।
जहाँ उसकी टूटी झोपड़ी थी, वहाँ सूरज जैसे चमकते महल खड़े थे! बगीचे, पक्षी, कमलों से भरे तालाब। "ये किसका घर है? मेरा घर कहाँ गया?"
तभी गाजे-बाजे बजे। और उसकी पत्नी दौड़ती हुई बाहर आई… भागवत कहता है, जैसे स्वयं लक्ष्मी अपने धाम से निकली हो। और पति को देखकर उसकी आँखें भर आईं।
तब ब्राह्मण समझा। और उसने वो बात कही जो भगवान को सबसे अच्छी तरह बताती है —
किंचित्करोत्युर्वपि यत् स्वदत्तं सुहृत्कृतं फल्ग्वपि भूरिकारी ।
"मेरे मित्र का स्वभाव ही ऐसा है। अपना दिया हुआ, कितना भी बड़ा हो, उन्हें थोड़ा लगता है। और दोस्त का दिया हुआ, कितना भी छोटा हो, उन्हें बहुत लगता है।"
और वो बिना कहे देते हैं। बादल की तरह। सामने कुछ नहीं कहते… बस बरस जाते हैं।
और भागवत कहता है, ब्राह्मण ने उस सारे वैभव को भोगा… पर उसमें फँसा नहीं।
तो आज घर ले जाने के लिए तीन बातें।
पहली। ख़ाली हाथ होने की शर्म मत कीजिए। भगवान के सबसे प्यारे दोस्त की भेंट भी उधार की थी। वो चिवड़ा नहीं देखते। वो प्रेम देखते हैं।
दूसरी। जो है, वो सामने रख दीजिए। छिपाइए मत। ब्राह्मण ने पोटली छिपाई, तो भगवान ने ख़ुद खींच ली। आपका एक आँसू, एक दीया, एक "धन्यवाद"… निकालकर रख दीजिए।
और तीसरी। जब लगे कि प्रार्थना के बाद भी कुछ नहीं मिला… ख़ाली हाथ लौट रहे हैं… तो उस ब्राह्मण की तरह सोचिए — "शायद यही मेरे भले में है।" क्योंकि घर पहुँचकर पता चलता है, बादल पहले ही बरस चुका था।
तो अगली बार, जब किसी बड़े दरवाज़े के सामने खड़े होकर संकोच हो… जब लगे, "मेरे पास देने को क्या है"…
तो उस फटे कपड़े की पोटली को याद कीजिए।
मुट्ठी भर चिवड़ा… और सारा विश्व तृप्त हो गया।
जय श्री कृष्ण।
नन्वेतदुपनीतं मे परमप्रीणनं सखे ।
तर्पयन्त्यङ्ग मां विश्वमेते पृथुकतण्डुलाः ॥
तीन बातें याद रखिए
- 1.ख़ाली हाथ होने की शर्म मत कीजिए। भगवान के सबसे प्यारे दोस्त की भेंट भी उधार की थी। वो चिवड़ा नहीं देखते। वो प्रेम देखते हैं।
- 2.जो है, वो सामने रख दीजिए। छिपाइए मत। ब्राह्मण ने पोटली छिपाई, तो भगवान ने ख़ुद खींच ली। आपका एक आँसू, एक दीया, एक "धन्यवाद"… निकालकर रख दीजिए।
- 3.जब लगे कि प्रार्थना के बाद भी कुछ नहीं मिला… ख़ाली हाथ लौट रहे हैं… तो उस ब्राह्मण की तरह सोचिए — "शायद यही मेरे भले में है।" क्योंकि घर पहुँचकर पता चलता है, बादल पहले ही बरस चुका था।