कौन सुखी है?
Who is happy? — The Yakṣa’s question: no debt, no exile — that is happiness
लोभं हित्वा सुखी भवेत् ॥
जय श्री कृष्ण।
आज एक छोटा-सा खेल खेलते हैं। आँखें बंद कीजिए… और मन में पूरा कीजिए ये वाक्य —
"बस ये हो जाए… फिर मैं सुखी हो जाऊँगा।"
क्या आया मन में? नौकरी लग जाए? प्रमोशन हो जाए? बेटी की शादी हो जाए? घर की EMI ख़त्म हो जाए?
अब थोड़ा पीछे जाइए। दस साल पहले भी आपने यही वाक्य बोला था। तब क्या था? "बस नौकरी लग जाए।" लग गई। फिर? "बस शादी हो जाए।" हो गई। फिर? "बस अपना घर हो जाए।"
ये "बस" कभी ख़त्म ही नहीं होता! दौड़ की लाइन हर बार दस क़दम आगे खिसक जाती है।
तो आज का प्रश्न बहुत सीधा है, और बहुत पुराना है। कौन सुखी है?
ये प्रश्न आज से हज़ारों बरस पहले एक सरोवर के किनारे पूछा गया था।
पाण्डव वनवास में थे। प्यास से व्याकुल। एक-एक करके चारों भाई पानी लेने गए और वहीं गिर पड़े। आख़िर में युधिष्ठिर पहुँचे। और जल में से एक आवाज़ आई — एक यक्ष की।
उसने बहुत प्रश्न पूछे। और अंत में चार प्रश्न एक साथ रखे, और शर्त भी रखी — उत्तर सही हुआ, तो तुम्हारे मरे हुए भाई जी उठेंगे।
को मोदते किमाश्चर्यं कः पन्थाः का च वार्तिका ।
पहला प्रश्न था — "को मोदते?" कौन सुखी है?
सोचिए, आप युधिष्ठिर होते तो क्या कहते? राजा? सेठ? जिसके पास सोने का महल हो?
युधिष्ठिर ख़ुद राजा रह चुके थे। उन्होंने राजसूय यज्ञ किया था। उन्होंने देखा था कि सुख महल में नहीं रहता। तो उन्होंने जो उत्तर दिया… वो सुनकर आप हँसेंगे भी, और चौंकेंगे भी।
पञ्चमेऽहनि षष्ठे वा शाकं पचति स्वे गृहे ।
अनृणी चाप्रवासी च स वारिचर मोदते ॥
"जो पाँचवें या छठे दिन, अपने ही घर में, बस साग पकाकर खा लेता है… पर जिस पर कोई कर्ज़ नहीं, और जो अपनों से दूर परदेस में नहीं पड़ा… वही सुखी है।"
साग! न पकवान, न छप्पन भोग। बस साग। पर अपने घर का।
और दो शर्तें। पहली — अनृणी। कर्ज़ न हो। अब ये श्लोक बैंक वालों को मत सुनाइएगा, वो नाराज़ हो जाएँगे!
दूसरी — अप्रवासी। अपनों के पास हो। रात को घर लौटकर अपनी ही छत के नीचे सोए।
सोचिए। कितने लोग आज बड़े शहरों में, बड़ी तनख़्वाह पर, अकेले कमरे में बैठे खाना ऑर्डर कर रहे हैं… और माँ फ़ोन पर पूछ रही है, "खाना खाया बेटा?"
युधिष्ठिर कहते हैं — थाली में कम हो, चलेगा। पर सिर पर बोझ न हो, और पास में अपने हों। सुख वहीं है।
अब एक ऐसे आदमी की कहानी सुनिए, जिसके पास सब कुछ था। सब कुछ।
राजा ययाति। पूरी पृथ्वी के राजा। एक श्राप से समय से पहले बूढ़े हो गए। पर उन्हें छूट मिली — कोई अपनी जवानी दे दे, तो बदल लो।
और राजा ने क्या किया? अपने बेटों से कहा, "बेटा, मेरा बुढ़ापा ले लो, अपनी जवानी मुझे दे दो।" सबसे छोटे बेटे पूरु ने हाँ कर दी।
और फिर… एक हज़ार बरस। हज़ार बरस तक राजा ने जवानी के सारे सुख भोगे।
अब आप सोच रहे होंगे, हज़ार बरस बाद तो पेट भर गया होगा? सुनिए, राजा ख़ुद क्या कहते हैं —
पूर्णं वर्षसहस्रं मे विषयान्सेवतोऽसकृत् ।
तथापि चानुसवनं तृष्णा तेषूपजायते ॥
"पूरे हज़ार बरस मैंने भोग किए। फिर भी… हर पल… नई प्यास उठती रहती है।"
और फिर ययाति ने वो बात कही, जो आज भी पूरे भारत में दोहराई जाती है —
न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति ।
हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते ॥
भोग से इच्छा कभी शांत नहीं होती। जैसे आग में घी डालो, तो आग बुझती नहीं… और भड़कती है।
नया फ़ोन लिया। दो हफ़्ते बड़ा मज़ा आया। फिर? नया मॉडल आ गया! घी डाल दिया।
यत्पृथिव्यां व्रीहियवं हिरण्यं पशवः स्त्रियः ।
ययाति कहते हैं — पृथ्वी पर जितना धान है, जौ है, सोना है, पशु हैं… सब मिलकर भी एक इच्छा से भरे मन को तृप्त नहीं कर सकते।
पूरी पृथ्वी। और एक मन नहीं भरा।
अब भागवत एक बात कहता है जो थोड़ी कड़वी है। ध्यान से सुनिए।
यावद्भ्रियेत जठरं तावत्स्वत्वं हि देहिनाम् ।
"जितने से पेट भर जाए, उतना ही तुम्हारा है। जो उससे ज़्यादा को अपना माने… वो चोर है।"
डरिए मत। ये कमाने से मना नहीं करता। ये कहता है — जो ज़्यादा है, वो तुम्हारे पास किसी और की अमानत है। भूखे की। बीमार की। किसी बच्चे की फ़ीस की।
और सच मानिए, जिस दिन आप उस अमानत को उसके मालिक तक पहुँचाते हैं… उस रात नींद बहुत अच्छी आती है।
अब एक बड़ी दिलचस्प कहानी। भागवत में एक अवधूत हैं। जवान, कुछ काम नहीं करते, बच्चे जैसे निश्चिंत घूमते हैं। राजा यदु ने उन्हें देखा और रहा नहीं गया। पूछ बैठे — "महाराज, आप कुछ करते नहीं, फिर भी इतने आनंद में कैसे?"
अवधूत मुस्कुराए। बोले — मेरे चौबीस गुरु हैं।
चौबीस! और गुरु कौन? पृथ्वी, हवा, आकाश, समुद्र, एक अजगर, एक मछली, एक पक्षी… और एक ऐसी स्त्री, जिसका नाम सुनकर समाज मुँह फेर लेता था।
पहले पक्षी की सुनिए। कुरर पक्षी।
सामिषं कुररं जघ्नुर्बलिनो ये निरामिषाः ।
तदामिषं परित्यज्य स सुखं समविन्दत ॥
एक कुरर पक्षी को कहीं से मांस का टुकड़ा मिल गया। चोंच में दबाकर उड़ा। और जैसे ही उड़ा — बाक़ी बड़े-बड़े पक्षी उस पर टूट पड़े! चोंच मार रहे हैं, पंजे मार रहे हैं, पीछे-पीछे उड़ रहे हैं।
पक्षी परेशान। लहूलुहान। और फिर… उसने वो टुकड़ा गिरा दिया।
बस। सारे पक्षी टुकड़े के पीछे चले गए। और कुरर… आराम से एक डाल पर बैठ गया। सुखी।
आपकी चोंच में क्या दबा है? कोई ज़मीन का झगड़ा? किसी की कही एक कड़वी बात, जो पाँच साल से पकड़े बैठे हैं? किसी से आगे निकलने की होड़?
गिरा दीजिए। देखिए, पीछा करने वाले कितनी जल्दी छूट जाते हैं।
और अब वो स्त्री। उसका नाम था पिंगला। विदेह नगरी में रहती थी। उसकी जीविका थी — धनी ग्राहकों की राह देखना।
एक शाम वो सज-धजकर दरवाज़े पर खड़ी हो गई। किसी के क़दमों की आहट आती — "शायद ये वाला… ये बहुत पैसे देगा।" वो आदमी आगे निकल जाता। फिर दूसरी आहट। फिर कोई नहीं।
अंदर जाती, बाहर आती। अंदर जाती, बाहर आती। आधी रात हो गई। नींद उड़ गई।
हम सब पिंगला हैं। कोई प्रमोशन की कॉल की राह देख रहा है। कोई किसी की तारीफ़ की। कोई इस बात की कि फ़ोन पर कितने लोगों ने हमें पसंद किया। दरवाज़े पर खड़े हैं। अंदर-बाहर हो रहे हैं।
और फिर, उस आधी रात को, पिंगला के मन में कुछ टूटा। और कुछ जागा। वो बोली —
सुहृत्प्रेष्ठतमो नाथ आत्मा चायं शरीरिणाम् ।
"जो मेरे सबसे पास है… सबसे सच्चा मित्र, सबसे प्यारा, मेरा स्वामी, मेरी आत्मा… उसे छोड़कर मैं इन तुच्छ लोगों की राह देख रही थी?"
उसने भगवान की ओर मुँह कर लिया। दरवाज़ा बंद किया। और भागवत कहता है —
आशा हि परमं दुःखं नैराश्यं परमं सुखम् ।
यथा सञ्छिद्य कान्ताशां सुखं सुष्वाप पिङ्गला ॥
आशा सबसे बड़ा दुःख है। और उसे छोड़ देना सबसे बड़ा सुख। पिंगला ने आशा का धागा काटा… और सुख से सो गई।
सोचिए, जिस स्त्री की कहानी कोई सुनना नहीं चाहता था… भगवान के भक्त ने उसे अपना गुरु माना। और हज़ारों बरस से उसकी नींद हमें सुख का पाठ पढ़ा रही है।
तो क्या इच्छाएँ आना बंद हो जाएँगी? नहीं। गीता एक सुंदर उदाहरण देती है।
आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं
समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत् ।
समुद्र को देखिए। हज़ारों नदियाँ दिन-रात उसमें गिर रही हैं। गंगा, यमुना, सब। क्या समुद्र उफनता है? किनारे तोड़ता है? नहीं। वो अपनी जगह शांत रहता है।
इच्छाएँ आएँगी, नदियों की तरह। सुखी वो है जो समुद्र बन जाए। जो इच्छाओं के पीछे दौड़े… वो कभी शांत नहीं होता।
न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम् ॥
और जो शांत नहीं… उसे सुख कहाँ?
पर ये शांति आती कहाँ से है? समुद्र इतना गहरा, इतना स्थिर कैसे है?
गीता का उत्तर बहुत सुंदर है। भगवान कहते हैं —
सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति ॥
"जो मुझे सब प्राणियों का सुहृद् जान लेता है… वो शांति पा लेता है।"
सुहृद्। वही शब्द जो पिंगला ने कहा था। सबसे सच्चा मित्र।
सोचिए, अगर आपको पक्का पता हो कि दुनिया का मालिक… आपका दोस्त है। आपका भला चाहता है। तो फिर डर किस बात का? होड़ किस बात की? दरवाज़े पर खड़े रहने की ज़रूरत क्या?
और वो दोस्त सिर्फ़ भला चाहता ही नहीं, ज़िम्मेदारी भी लेता है।
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते ।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥
"जो मुझे याद करते हैं… उनका जो नहीं है वो दिलाना, और जो है उसकी रक्षा करना — ये मैं ख़ुद उठाता हूँ।"
"वहाम्यहम्" — मैं ढोता हूँ। जैसे पिता बच्चे का बस्ता उठा लेता है।
बच्चा क्यों सुखी होता है? उसके पास पैसा नहीं, घर नहीं, बैंक खाता नहीं। बस एक भरोसा है — पापा हैं न।
तो आज घर ले जाने के लिए तीन बातें।
पहली। आज रात कागज़ पर लिखिए — "बस ये हो जाए, फिर सुखी हो जाऊँगा।" और उसके नीचे लिखिए, दस साल पहले आपने ये वाक्य कैसे पूरा किया था। दोनों को साथ देखिए। मुस्कुराहट अपने आप आ जाएगी।
दूसरी। चोंच में दबा एक टुकड़ा गिराइए। बस एक। एक शिकायत। एक तुलना। एक होड़। कुरर की तरह, डाल पर बैठिए।
और तीसरी… सबसे प्यारी।
रात को सोने से पहले, पिंगला की तरह, दिन भर की सारी आशाएँ उस सुहृद् को सौंप दीजिए। कहिए — "तुम हो न। तुम ढो लोगे।"
कौन सुखी है?
जिसके सिर पर कर्ज़ नहीं… जिसके पास अपने हैं… जिसकी चोंच ख़ाली है… और जिसे पता है कि उसका सबसे बड़ा दोस्त… भगवान है।
वो साग खाकर भी सुखी है।
जय श्री कृष्ण।
मानं हित्वा प्रियो भवति क्रोधं हित्वा न शोचति ।
कामं हित्वाऽर्थवान्भवति लोभं हित्वा सुखी भवेत् ॥
तीन बातें याद रखिए
- 1.आज रात कागज़ पर लिखिए — "बस ये हो जाए, फिर सुखी हो जाऊँगा।" और उसके नीचे लिखिए, दस साल पहले आपने ये वाक्य कैसे पूरा किया था। दोनों को साथ देखिए। मुस्कुराहट अपने आप आ जाएगी।
- 2.चोंच में दबा एक टुकड़ा गिराइए। बस एक। एक शिकायत। एक तुलना। एक होड़। कुरर की तरह, डाल पर बैठिए।
- 3.… सबसे प्यारी।