भाद्रपद मास की साधना विधि
भाद्रपद मास के लिए बताई गई प्रत्येक साधना — गणेश चतुर्थी व दस दिवसीय विनायक नवरात्र, कृष्ण जन्माष्टमी का कवच विंडो, तारा चतुर्दशी व कौशिकी अमावस्या, और पितृ पक्ष का आरंभ।
भाद्रपद मास के लिए बताई गई प्रत्येक साधना — गणेश चतुर्थी व दस दिवसीय विनायक नवरात्र, कृष्ण जन्माष्टमी का कवच विंडो, तारा चतुर्दशी व कौशिकी अमावस्या, और पितृ पक्ष का आरंभ।
भाद्रपद साधक के वर्ष का मोड़ बिंदु है। सावन का अनुशासन अभी समाप्त हुआ है, पितृ पक्ष आरंभ होने वाला है, और इनके बीच वर्ष की सबसे व्यस्त तिथियां हैं — गणेश चतुर्थी से आरंभ दस दिवसीय विनायक नवरात्र, कृष्ण जन्माष्टमी के साथ काल भैरव अष्टमी, राधाष्टमी, और फिर तारा चतुर्दशी व कौशिकी अमावस्या — इन प्रवचनों में सीधे कहा गया है कि दीवाली व होली के अतिरिक्त ये रातें सबसे अधिक तंत्रोक्त प्रभाव वाली हैं।
यह भी स्पष्ट कहा गया है कि भाद्रपद किस लिए विशेष है — माघ के साथ, शिव पुराण में पंचाक्षरी पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक। के लिए सर्वश्रेष्ठ मास बताया गया है, और यही वह मास है जिसमें बिल्कुल नए साधक को आरंभ करने को कहा जाता है — विशेष रूप से गणपति से।
भादो के मास आषाढ़ के मास में भी शिव जी के पूजन का और पंचाक्षरी जप का, पंचाक्षरी पुरश्चरण के लिए भाद्रपद का मास और माघ का मास यह दो मास शिव महापुराण में बताया गया है, 17वें अध्याय में।
नवरात्र, सावन या पिछले भाद्रपद से जो भी सिद्ध कर चुके हैं, उसी का जप जारी रखें। नई पीड़ा में लिया गया नया मंत्र वह संचित शक्ति नहीं रखता।
बिल्कुल शून्य से आरंभ करने वाले साधक को भाद्रपद में ही आरंभ करने को कहा गया है — और गणपति से ही, किसी बड़े या अधिक मांग वाले देवता से नहीं।
तारा चतुर्दशी व कौशिकी/अघोर अमावस्या को मास की दो तांत्रोक्त निर्णायक रातें कहा गया है। और कुछ भी छोड़ें, इन दो तिथियों को पहले से जान लें।
भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी से चतुर्दशी तक विनायक नवरात्र है — दस दिन, जिसमें गणपति के विभिन्न स्वरूप अनंत फल देते हैं, और उनके तांत्रिक स्वरूप और भी विशिष्ट फल। किसी भी देवता का अनुष्ठान गणपति की प्रसन्नता बिना सफल नहीं होता — स्वयं जगदंबा भी बिना गणपति पूजन के अनुष्ठान को स्वीकार नहीं करतीं।
प्रत्येक माह की चतुर्थी तिथि भगवान विनायक के दिव्य स्वरूपों को समर्पित है। लेकिन भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी से चतुर्दशी का दस दिन विनायक नवरात्र है। भगवान विनायक को तर्पण अत्यंत प्रिय है, अतः साधकों को… तीन गांठ वाले जड़रहित 12 की संख्या में दूर्वा के समूह से भगवान विनायक के संकटनाशन गणेश स्तोत्र में वर्णित बारह नामों से श्री गणेश विग्रह पर तर्पण करना चाहिए।
श्री गणेशाय नमः।। किसी भी कर्मकांड तंत्र कांड अनुष्ठान साधना के क्षेत्र में बिना गणपति जी के प्रसन्नता के कोई फल नहीं मिलता। स्वयं जगदंबा भी बिना गणपति पूजन के किये गये अनुष्ठान को नहीं स्वीकार करतीं। प्रत्येक माह की चतुर्थी तिथि भगवान विनायक के दिव्य स्वरूपों को समर्पित है। लेकिन भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी से चतुर्दशी का दस दिन विनायक नवरात्र है। और इस समय भगवान गणपति के विभिन्न स्वरुपों की साधना अनुष्ठान अनन्त फल देने वालें हैं। भगवान श्री गणेश के तांत्रिक स्वरुपों की पूजा उपासना व अनुष्ठान और भी विशिष्ट फल इस समय प्रदान करती है। भगवान विनायक को तर्पण अत्यंत प्रिय है अतः साधकों को गुरु उपदेश लेकर विशेष तर्पण इस दस दिन के विनायक नवरात्र में अवश्य करना चाहिए। सामान्य साधकों साधिकाओं को तीन गांठ वाले जड़रहित 12 की संख्या में दूर्वा के समूह से भगवान विनायक के संकटनाशन गणेश स्तोत्र में वर्णित बारह नामों से श्री गणेश विग्रह पर तर्पण करना चाहिए। साथ ही उनके शतनाम से दूर्वा व लाल पुष्प से अर्चन।
जन-सामान्य में प्रचलित पंडाल वाली गणेश चतुर्थी बाल गंगाधर तिलक के समय एक सार्वजनिक एकता के साधन के रूप में आरंभ हुई थी — घर पर स्थापना बाद में आई। किंतु इसके नीचे परत और बड़ी है: कृष्ण पक्ष व शुक्ल पक्ष मिलाकर वर्ष में 24 चतुर्थियां होती हैं, और हर एक पर गणपति का अलग स्वरूप पूजा जाता है। भाद्रपद की चतुर्थी बस सबसे अधिक दिखने वाली है।
गणपति की तांत्रिक पूजा में दो अंग अधिकांश साधक कभी नहीं सीखते — अस्त्र पूजा व नाग पूजा। अस्त्र पूजा की विधि विशेष रूप से इसी भाद्रपद से पहले प्रकाशित करने की योजना बताई गई है, क्योंकि यह इसी मास से जुड़ी है।
खस जड़ का दीपदान गणपति के लिए किसी भी चतुर्थी-से-चतुर्दशी विंडो पर, या नित्य भी किया जा सकता है — किंतु विशेष रूप से भाद्रपद मास में किया जाए तो अति उत्तम बताया गया है।
और जो भाद्रपद का मास आता है, भाद्रपद के महीने में जो दीपदान किया जाता है, वह तो अति उत्तम होता है। उस समय तो अवश्य ही खस के जड़ का दीपदान भगवान गणपति जी को करना चाहिए।
जन्माष्टमी विंडो में सिद्ध किया गया कवच केवल स्मरण मात्र से आगे रक्षा देता है, ऐसा कहा गया है। विधान सात दिन का पूर्ण अनुष्ठान है, एक दिन का पर्व नहीं: भाद्रपद कृष्ण पक्ष द्वितीया से आरंभ कर नवमी — जन्माष्टमी के अगले दिन — तक चलाएं। कवच का मूल पहले भोजपत्र पर लिखा जाता है।
श्री कृष्ण जन्माष्टमी के समय में भाद्रपद की कृष्ण पक्ष द्वितीया तिथि से आरंभ करके इस कवच का पाठ करना चाहिए… श्री कृष्ण जन्माष्टमी के अगले दिन तक यानी नवमी तिथि पर्यंत करना चाहिए। लगभग सात दिन का यह अनुष्ठान आपको करना चाहिए।
ये दो लगातार रातें — भाद्रपद कृष्ण चतुर्दशी (तारा चतुर्दशी, अघोर चतुर्दशी, भूत चौदस) और उसके बाद की अमावस्या (कौशिकी अमावस्या, अघोर अमावस्या) — तंत्र कैलेंडर की सबसे अधिक फलदायी रातें कही गई हैं, दीवाली से पहले की काली चौदस के समान। अपने महाविद्या या इष्ट की गंभीर उपासना करने वाले हर साधक को यही वह समय बताया गया है जब अनुष्ठान बैठाया जाए।
सामान्य साधकों के लिए इस महानिशा हेतु चैनल का स्थायी निर्देश स्पष्ट है: जो भी साधना, अनुष्ठान या हवन आपके अपने इष्ट से जुड़ा हो, वह घर पर ही उस रात्रि करें।
आज का विषय अत्यंत आवश्यक भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष चतुर्दशी और अमावस्या, तंत्र क्षेत्र में इसका अति विशिष्ट महत्व है।
भाद्रपद कृष्ण पक्ष चतुर्दशी को अघोर चतुर्दशी/ भुत चौदस/ तारा चतुर्दशी तो अमावस्या को कौशिकी महा अमावस्या/ अघोर अमावस्या तांत्रिक महापर्व रहता है। 22 अगस्त की महानिशा में इन दोनों तिथियों का अद्भुत संधि बेला प्रस्तुत हो रही है। अगले दिन शनिवार की शनिचरी अमावस्या है। ये मंत्र सिद्धि, योगिनी सिद्धी, मातृका शक्तियों की कृपा, लोक योगिनी कृपा, कुल देवी आदि से संबंधित सभी शक्तियों को प्रसन्न व अनुकुल करने हेतु अत्यंत दिव्य व महत्वपूर्ण काल है। इस महानिशा आप अवश्य ही घर पर संबंधित साधना अनुष्ठान हवन आदि करें।
सावन को कुछ प्रयोगों में लगाने के लिए बहुत अधिक दिव्य मास कहा गया है — उन्हें भदवारी (भाद्रपद) के लिए बचाएं। तारा चतुर्दशी व उसके बाद की अमावस्या को वह विंडो बताया गया है जहां रोके गए प्रयोग विधान वास्तव में किए जाते हैं।
सावन में प्रयोग करने से बचिए। भदवारी में प्रयोग कर लीजिएगा। भाद्रपद के महीने में तारा चतुर्दशी अमावस्या आएगी, उसमें प्रयोग विधि बहुत सारे ऐसे रहेंगे।
बंगाल, असम व पूर्वोत्तर के साधकों के लिए, भाद्रपद अमावस्या वह दिन है जब उस परंपरा का हर गंभीर तांत्रिक तारापीठ के महाश्मशान की यात्रा करता है — तारा जयंती होने के कारण नहीं (यह नहीं है), बल्कि इस तिथि पर महाश्मशान द्वारा समर्थित अनुष्ठान व पुरश्चरण के लिए।
साधना का पहला चरण — मूल मंत्र, स्तोत्र, ध्यान मंत्र — पूर्ण करने के बाद, आवरण पूजन (देवी के परिवेष्टित शक्तियों की पूजा) सीखना आरंभ करने का स्वाभाविक बिंदु इसी मास की कालिका-तारा जयंती विंडो पर तय किया गया है, मनमाने ढंग से नहीं।
जहां कुंडली में पितृ दोष स्पष्ट दिखे, वहां भाद्रपद पूर्णिमा से सर्व पितृ अमावस्या तक का पूरा सोलह दिन का विंडो सही अवधि बताई गई है, केवल अंतिम सप्ताह नहीं। एक ठोस प्रयोग: लगभग 21 किशमिश व शहद नित्य छोटे चांदी के पात्र में अर्पित करें।
पितृ पक्ष जब भाद्रपद मास का पूर्णिमा तिथि है, तब से लेकर के सर्व पितृ अमावस्या तिथि तक 16 दिन का जो है समय होता है, इस समय में करना चाहिए।
कौल व शाक्त-परंपरा के साधक जो मूँज (सरकंडे के रेशे) के जनेऊ से प्राप्त अंग-विद्या सिद्धियां धारण करते हैं, भाद्रपद अमावस्या को विशेष रूप से उस जनेऊ को त्यागने या किसी योग्य शिष्य को सौंपने के दिन के रूप में उपयोग करते हैं।
नई प्राप्त दुर्गा मूर्ति कब स्थापित कर सेवा-पूजा आरंभ करें — यह पूछे जाने पर सीधा उत्तर था: प्रतीक्षा करें। भाद्रपद के तुरंत बाद पितृ पक्ष आता है, इसलिए दोनों छोड़ दिए जाते हैं, और नवरात्र की प्रतिपदा को स्थापना व पूजन आरंभ करने का सही दिन बताया गया है।
जिस साधक ने सावन में 15, 27 या पूरे 30 दिन साधना की और भाद्रपद आरंभ होते ही कोई दृश्य फल न पाकर निराश हो जाता है, उसे विशेष रूप से यह निष्कर्ष निकालने से रोका गया है कि साधना असफल रही। यह तुरंत आई नकारात्मकता ही असली खतरा बताई गई है — फल का अभाव नहीं।
एक चेतावनी-भरा वृत्तांत: एक साधक को किसी स्वयंभू तांत्रिक ने कहा कि केवल तारा चतुर्दशी की एक रात्रि का सशुल्क अनुष्ठान उसे वह तत्काल सिद्धि दे देगा जो उसके अपने महीनों के प्रयास से न मिली। इस रात्रि का वास्तविक तांत्रिक महत्व ही ऐसे प्रस्तावों का आधार है — इसलिए कम नहीं, बल्कि अधिक सतर्कता की आवश्यकता है कि पूजन कौन करा रहा है।
बंधन-प्रकार के प्रयोग (चाहे शक्ति शुभ हो या अशुभ) सावन के मध्य में करने से मना किया गया है — उस समय शक्तियों का आना-जाना सबसे अधिक होता है, जिससे जिस शक्ति पर आप काम कर रहे हैं उसी का नियम टूटने का खतरा रहता है। श्रावण पूर्णिमा एक सुरक्षित तिथि है; भाद्रपद में भी एक शुभ तिथि है।
बंधन आदि की प्रक्रिया मत कीजिए इस समय… श्रावण पूर्णिमा को आप कीजिए, कोई दिक्कत नहीं है। पूर्णिमा के आगे भाद्रपद का महीना में कीजिए। भाद्रपद में भी एक शुभ तिथि है।
मास के स्थिर बिंदु, क्रम में। जहां किसी तिथि की साधना ऊपर विस्तार से दी गई है, वहां यह पैनल उसी की ओर संकेत करता है, दोहराता नहीं।
भगवती अष्टभुजा/योगमाया/सुभद्रा का जन्म — वह स्वरूप जो कंस के हाथ से उड़कर आकाश में गया, कृष्ण जन्म की भविष्यवाणी कर विंध्याचल में लीन हो गया। कृष्ण की बड़ी बहन के रूप में यही वह तिथि है जिसे भक्त देवी जयंती के रूप में मनाते हैं, भगवती विंध्यवासिनी के तंत्रोक्त पूजन सहित।
कल भाद्रपद द्वितीया के दिन भगवती विंध्यवासिनी के निमित्त सेवा पूजा अवश्य करें। श्री तंत्रोक्त देवी सुक्त का नौ पाठ। श्री दुर्गा अष्टोत्तर शतनाम का 27 पाठ अथवा पूर्ण सप्तश्ती का पाठ। 1008 नाम से बिल्वपत्र अर्चन हो तो सर्वोत्तम, श्री दुर्गा सप्तश्लोकी का पाठ आदि करें। तथा यथासंभव हवन आदि करें।
हल षष्ठी या बलराम षष्ठी के रूप में चिह्नित — ग्रामीण भगतवाल परंपराओं व कुल-पूजित शक्तियों के अखाड़ा-अनुष्ठान का दिन, लोलार्क छठ नामक शुक्ल पक्ष षष्ठी से भिन्न।
कृष्ण जन्माष्टमी व काल भैरव अष्टमी संयोग से नहीं, अभिकल्पना से साथ आते हैं — दोनों को शिव पुराण की विद्येश्वर संहिता में एक ही आदिम क्षण से जोड़ा गया है। यदि पहले से नहीं किया तो इसी तिथि से पहले द्वितीया से कृष्ण कवच अनुष्ठान आरंभ करें; यह नवमी तक चलता है।
मास की दो तांत्रोक्त निर्णायक रातों में से एक। जो भी साधना, अनुष्ठान या हवन आपके अपने इष्ट से जुड़ा हो, वह इस रात घर पर ही करें — प्रवचनों में स्पष्ट कहा गया है कि सामान्य साधक को इसके लिए शक्तिपीठ या श्मशान जाने की आवश्यकता नहीं।
जोड़ी की दूसरी रात। भगवती कौशिकी के नाम पर, जिनकी भृकुटि से काली व चामुंडा प्रकट हुए बताई जाती हैं। दीवाली, होलिका व रक्षाबंधन की रात्रि के साथ सीधे उन तांत्रोक्त रात्रि-कालों में गिनी गई है — इसी कारण इस विशेष रात्रि रुद्राक्ष या विग्रह-आधारित अनुष्ठान का अनुभव अन्य रातों से भिन्न बताया गया है।
मास की सबसे प्रसिद्ध तिथि, और दस दिवसीय विनायक नवरात्र का आरंभ। नित्य तर्पण व अर्चन विधि के लिए ऊपर के गणेश-संबंधी कार्ड देखें।
इस चक्र में राधाष्टमी व बुधाष्टमी साथ पड़ते हैं। बुधाष्टमी का अपना फल सीधे बताया गया है: परिवार पर से पितृ-दोष की पकड़ से मुक्ति, और व्रत-पूजन करने वाले के माता-पिता व पितरों को नरक-यातना से राहत। यह दस दिवसीय गणपति उत्सव के भीतर ही पड़ता है, जिससे यह वर्ष विशेष रूप से सघन हो जाता है।
भाद्रपद मास ठीक वहीं समाप्त होता है जहां अगला दायित्व आरंभ होता है: यह पूर्णिमा सर्व पितृ अमावस्या तक चलने वाले सोलह दिवसीय पितृ पक्ष का पहला दिन है। विधि के लिए ऊपर का पितृ पक्ष कार्ड देखें।
चैनल के टेलीग्राम पर मास के अंत में डाली गई एक समीक्षा में आगामी भाद्रपद को सीधे "तंत्र-प्रधान" कहा गया, और साधकों को इसी विंडो में उग्र साधनाएं लेने की सलाह दी गई — उदाहरण के तौर पर चौंसठ योगिनी मातृका, कामाख्या कवच, महाभैरव।
आगामी भाद्रपद माह तंत्र प्रधान है… इस आगामी माह में उग्र साधनायें करें जैसे चौंसठ योगिनी मातृका, कामाख्या कवच, महाभैरव आदि।
आगामी भाद्रपद माह तंत्र प्रधान है। द्वितीया को देवी जयंती (श्री विंध्यवासिनी जयंती) तृतीया को श्री काशी विशालाक्षी जयंती। षष्ठी को हल षष्ठी। फिर कालिका जयंती/मोहरात्रि योगमाया जयंती/श्री कृष्ण जन्माष्टमी/भैरव अष्टमी। तदुपरांत रटंती काली/तारा चौदस। तारा अमावस्या। फिर श्री महागणपति नवरात्र आरंभ। चतुर्थी से अनंत चतुर्दशी तक। पूर्णिमा।। साधक वर्ग को तो श्वास लेने का समय नहीं। इस आगामी माह में उग्र साधनायें करें जैसे चौंसठ योगिनी मातृका, कामाख्या कवच, महाभैरव आदि।
चतुर्थी तिथि को चंद्र दर्शन एक विशेष दोष लाता है ऐसा माना गया है, और भाद्रपद की चतुर्थी का चंद्र-दर्शन दोष सबसे सीधे कहा गया है — स्यमंतक मणि कथा से जुड़ा हुआ। अनजाने में हो जाए तो उपाय यही दिया गया है कि वह कथा सुन ली जाए, दोष को यूं ही न छोड़ा जाए।
सावन में योजित रुद्राभिषेक न हो पाया हो तो भाद्रपद को विकल्प बताया गया है — शिववास समय के अनुसार जांचकर, और केवल अभिषेक न छोड़कर हवन (पांच माला पंचाक्षरी आहुति पर्याप्त) के साथ। यह संयोजन विशेष रूप से कठिन समय में सुझाया गया है, क्योंकि यह अधूरे अनुष्ठान को पूर्ण करने के साथ कठिनाई के पीछे के दोष को भी दूर करता है बताया गया है।
हर बिंदु हर साधक पर लागू नहीं — कुछ आपकी वंश-परंपरा या चल रहे अनुष्ठान पर निर्भर करते हैं। जो अनुष्ठान पहले से चल रहा हो, उसका अपना नियम पहले मानें।
Every recommendation above was drawn from reliable sources. 16 sources cited on this page, in the order they first appear:
श्री गणेशाय नमः।। किसी भी कर्मकांड तंत्र कांड अनुष्ठान साधना के क्षेत्र में बिना गणपति जी के प्रसन्नता के कोई फल नहीं मिलता। स्वयं जगदंबा भी बिना गणपति पूजन के किये गये अनुष्ठान को नहीं स्वीकार करतीं। प्रत्येक माह की चतुर्थी तिथि भगवान विनायक के दिव्य स्वरूपों को समर्पित है। लेकिन भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी से चतुर्दशी का दस दिन विनायक नवरात्र है। और इस समय भगवान गणपति के विभिन्न स्वरुपों की साधना अनुष्ठान अनन्त फल देने वालें हैं। भगवान श्री गणेश के तांत्रिक स्वरुपों की पूजा उपासना व अनुष्ठान और भी विशिष्ट फल इस समय प्रदान करती है। भगवान विनायक को तर्पण अत्यंत प्रिय है अतः साधकों को गुरु उपदेश लेकर विशेष तर्पण इस दस दिन के विनायक नवरात्र में अवश्य करना चाहिए। सामान्य साधकों साधिकाओं को तीन गांठ वाले जड़रहित 12 की संख्या में दूर्वा के समूह से भगवान विनायक के संकटनाशन गणेश स्तोत्र में वर्णित बारह नामों से श्री गणेश विग्रह पर तर्पण करना चाहिए। साथ ही उनके शतनाम से दूर्वा व लाल पुष्प से अर्चन।
भाद्रपद कृष्ण पक्ष चतुर्दशी को अघोर चतुर्दशी/ भुत चौदस/ तारा चतुर्दशी तो अमावस्या को कौशिकी महा अमावस्या/ अघोर अमावस्या तांत्रिक महापर्व रहता है। 22 अगस्त की महानिशा में इन दोनों तिथियों का अद्भुत संधि बेला प्रस्तुत हो रही है। अगले दिन शनिवार की शनिचरी अमावस्या है। ये मंत्र सिद्धि, योगिनी सिद्धी, मातृका शक्तियों की कृपा, लोक योगिनी कृपा, कुल देवी आदि से संबंधित सभी शक्तियों को प्रसन्न व अनुकुल करने हेतु अत्यंत दिव्य व महत्वपूर्ण काल है। इस महानिशा आप अवश्य ही घर पर संबंधित साधना अनुष्ठान हवन आदि करें।
कल भाद्रपद द्वितीया के दिन भगवती विंध्यवासिनी के निमित्त सेवा पूजा अवश्य करें। श्री तंत्रोक्त देवी सुक्त का नौ पाठ। श्री दुर्गा अष्टोत्तर शतनाम का 27 पाठ अथवा पूर्ण सप्तश्ती का पाठ। 1008 नाम से बिल्वपत्र अर्चन हो तो सर्वोत्तम, श्री दुर्गा सप्तश्लोकी का पाठ आदि करें। तथा यथासंभव हवन आदि करें।
आगामी भाद्रपद माह तंत्र प्रधान है। द्वितीया को देवी जयंती (श्री विंध्यवासिनी जयंती) तृतीया को श्री काशी विशालाक्षी जयंती। षष्ठी को हल षष्ठी। फिर कालिका जयंती/मोहरात्रि योगमाया जयंती/श्री कृष्ण जन्माष्टमी/भैरव अष्टमी। तदुपरांत रटंती काली/तारा चौदस। तारा अमावस्या। फिर श्री महागणपति नवरात्र आरंभ। चतुर्थी से अनंत चतुर्दशी तक। पूर्णिमा।। साधक वर्ग को तो श्वास लेने का समय नहीं। इस आगामी माह में उग्र साधनायें करें जैसे चौंसठ योगिनी मातृका, कामाख्या कवच, महाभैरव आदि।