तांत्रिक गुरु शिष्य का बंधन कैसे और क्यों करते हैं
वक्ता बताते हैं कि गुरु शिष्य की प्राप्त सिद्धियों का बंधन कैसे और क्यों करते हैं।
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गुरु द्वारा शिष्य की सिद्धियों और दिव्य दृष्टि के बंधन के लक्षण
प्राप्तियाँ कुंठित हो जाएँ और गुरु बताने से मना करें
वक्ता यह स्थिति बताते हैं: कोई व्यक्ति किसी के पास जाकर साधना सीखता है, और वही उसके गुरु हैं; उनके माध्यम से उसे सिद्धि और अन्य प्राप्तियाँ भी होती हैं, लेकिन कालांतर में उसकी दिव्यदृष्टि बंध जाती है, वह कुछ भी देखने-सुनने में असमर्थ होने लगता है, और जो कुछ उसे प्राप्त था वह धीरे-धीरे कुंठित हो जाता है। जब वह गुरु से इस बारे में पूछने या मार्गदर्शन लेने का प्रयास करता है तो वे मना कर देते हैं, या कहते हैं कि तुम्हें इन सब चीज़ों की आवश्यकता नहीं है। वक्ता कहते हैं कि यह गुरु द्वारा शिष्य को बाँध देने (बंधन) का मामला है, और यह चर्चा इसी के "कैसे" और "क्यों" पर है।
वक्ता स्थिति रखते हैं। आप किसी व्यक्ति के पास जाकर साधना सीख रहे थे; वे आपके गुरु हैं। उनसे आपने साधना सीखी और आपको सिद्धि इत्यादि की प्राप्ति भी हुई। लेकिन कालांतर में आपकी दिव्यदृष्टि बंध गई — आप किसी भी चीज़ को देखने-सुनने में असमर्थ होने लगे, और धीरे-धीरे जो भी आपको प्राप्त था वह कुंठित हो गया। जब आप इस विषय में अपने गुरु से जानने का प्रयास करते हैं, उनसे मार्गदर्शन लेने का प्रयास करते हैं, तो वे मना करते हैं; या फिर कहते हैं कि इन सभी चीज़ों की आवश्यकता तुम्हें नहीं है। वक्ता कहते हैं कि प्रश्न यह है कि यह कैसे और क्यों होता है, और सबसे बड़ी बात कि एक गुरु अपने शिष्य को कैसे बाँधते हैं (बंधन); आगे की चर्चा इन्हीं का उत्तर है।
गुरु एक विद्या सदा अपने पास रखते हैं ताकि गलत मार्ग पर गए शिष्य को बाँध सकें
दस दीं, ग्यारहवीं अपने पास रखी
वक्ता कहते हैं कि गुरु गुरु होते हैं: वे शिष्य को सभी विद्याएँ नहीं देंगे। अगर वे दस विद्याएँ दे रहे हैं तो ग्यारहवीं एक ऐसी विद्या अपने पास अवश्य रखेंगे जो जीवन में कभी काम आए — ताकि शिष्य किसी गलत मार्ग पर चले तो उसका बंधन कर सकें। गुरु ऐसी चीज़ें रखते ही हैं।
वक्ता कहते हैं: देखिए, गुरु गुरु होते हैं, वे सभी विद्याएँ आपको नहीं देंगे। अगर वे आपको दस विद्या दे रहे हैं, तो ग्यारहवीं एक ऐसी विद्या अपने पास अवश्य रखेंगे — जो कभी जीवन में काम आए, ताकि आप किसी गलत मार्ग पर चलें तो उससे आपका बंधन कर सकें। ऐसी चीज़ें गुरु रखते हैं। फिर वे इसे उस दिन के विषय से अलग करते हैं, जो एक बहुत सामान्य-सा मामला है: शिष्य सही हो, सात्विक हो, शुद्ध हो, आचरण का पवित्र हो, लेकिन उसके बाद भी गुरु उसे बाँध देते हैं।
सात्विक और शुद्ध शिष्य को भी गुरु क्यों बाँध देते हैं: धन और इनकार
अर्थ प्रधान युग
वक्ता कहते हैं कि जब शिष्य सही, सात्विक, शुद्ध और पवित्र आचरण वाला हो और फिर भी गुरु उसे बाँध दें, तो इसके पीछे सबसे बड़ा कारण धन बनता है — यह अर्थ प्रधान युग है। वे जो स्थिति बताते हैं: शिष्य ने गुरु से सभी विद्याएँ सीख लीं लेकिन उनके कहने में नहीं चल रहा; गुरु कहते हैं "भाई, मेरा यह काम कर दो", और शिष्य मना कर देता है। वे मानते हैं कि यह बात अलग है कि गुरु परीक्षा लेने के लिए कह रहे हैं या किसी और कारण से, लेकिन कहते हैं कि ऐसा कुछ हो जाए तो गुरु बाँध देते हैं।
वक्ता कहते हैं कि जो शिष्य स्वयं सही, सात्विक, शुद्ध और पवित्र आचरण वाला हो, उसे भी गुरु के बाँध देने के पीछे सबसे बड़ा कारण धन बनता है। अर्थ प्रधान युग है। वे बताते हैं: आप अपने गुरु जी से सभी विद्याएँ सीख लिए, लेकिन उनके कहने में नहीं चल रहे हैं। अगर वे कह रहे हैं कि "भाई, तुम मेरा इस प्रकार का कार्य कर दो", आप उसे मना कर रहे हैं। होता है ना, वे कहते हैं — जिस शिष्य को गुरु सिखाते हैं, वह फिर बोलता है। यह बात अलग है, वे जोड़ते हैं, कि कोई परीक्षा लेने के लिए कह रहा है या क्या कह रहा है। लेकिन अगर इस प्रकार का कोई कृत्य हो जाए और कोई गुरु आपको बाँध दे, तो वे कहते हैं कि प्रश्न यह है कि वह किस प्रकार से किया जाता है; आगे वे यही बताते हैं।
शिष्य के मंत्रों और वचनों की जानकारी से गुरु सिद्धि को कैसे बाँध पाते हैं
सामर्थ्य हो तो केवल वचन और संकल्प से बंधन
वक्ता कहते हैं कि सबसे बड़ा विषय यह है कि गुरु को उन विद्याओं के बारे में सब पता होता है जो शिष्य ने उनके माध्यम से सिद्ध की हैं: वचन में क्या लिया, किस मंत्र से शक्ति का आवाहन किया, किस मंत्र से उनसे वचन लिया, और उस शक्ति के माध्यम से शिष्य किन-किन कार्यों को संपन्न करने में सिद्ध है। इसी कारण, वे कहते हैं, जब बंधन किया जाता है तो वह गुरु के सामर्थ्य पर निर्भर करता है: समर्थ गुरु मात्र एक वचन देकर, केवल संकल्प से ही उस शक्ति का बंधन कर सकते हैं।
वक्ता कहते हैं कि इसमें सबसे बड़ा विषय यह होता है कि गुरु को इस बात की जानकारी होती है कि जिन विद्याओं को आपने उनके माध्यम से सिद्ध किया है — वचन में क्या लिया है, किस मंत्र के द्वारा उस शक्ति का आवाहनपूजन आरंभ करने से पूर्व देवता को मूर्ति अथवा यंत्र में उपस्थित करने का आवाहन। किया है, किस मंत्र के द्वारा आपने उनसे वचन लिया है, किन-किन कार्यों को संपादित करने में आप उस शक्ति के माध्यम से सिद्ध हैं। उस शक्ति के माध्यम से आप जो कुछ संपन्न कर सकते हैं — यह सब चीज़ की जानकारी उन्हें होती है। तो जब बंधन किया जाता है, वे कहते हैं, तो यह गुरु के सामर्थ्य पर निर्भर करता है। वे मात्र एक वचन देकर, केवल संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। से ही उस शक्ति का बंधन कर सकते हैं।
मंत्र की अपनी उपसंहार विधि से शिष्य की सिद्धि का बंधन
आवाहित शक्ति को वचन दे दिया जाता है और वह आने से इनकार करती है
वक्ता कहते हैं कि कुछ गुरु ऐसे होते हैं जिन्हें मंत्र विद्या का पता होता है, तो उस मंत्र की उपसंहार विधि भी होती है, जो हर गुरु परंपरा में अलग-अलग होती है। चूँकि शिष्य उन्हीं का है, वे उसके बारे में सब जानते हैं और मंत्र के बारे में भी सब कुछ जानते हैं, और उसी का प्रयोग करके बंधन लगा देते हैं। फिर वे चीज़ें शिष्य के लिए काम नहीं करतीं: जिस देवी-शक्ति को उसके पास आना था, उन्हें वचन दे दिया जाता है और वे आने से इनकार कर देती हैं — वे नहीं आतीं। वे कहते हैं कि इस विधि के ये सभी प्रकार होते हैं।
वक्ता कहते हैं कि कुछ गुरु ऐसे होते हैं, जब उन्हें मंत्र विद्या के विषय में पता होता है, तो उस मंत्र की उपसंहार विधिवह विधि जिससे प्रदान की गई विद्या अथवा सिद्धि को विधिपूर्वक वापस लिया या विलीन किया जाता है। भी होती है। सभी गुरु परंपरा में यह अलग-अलग होती है। उस माध्यम से — चूँकि आप उनके शिष्य हैं, तो उन्हें जानकारी है; वे आपके विषय में सब जान रहे हैं और उस मंत्र के विषय में भी सब कुछ जान रहे हैं — उसका प्रयोग करके वे बंधन लगा देते हैं। फिर वे चीज़ें आपके लिए कार्य नहीं करेंगी। जिस भी देवी-शक्ति को आपके पास आना था, उन्हें वचन दे देंगे, और वे आपके पास आने से इनकार कर देंगी; वे नहीं आएँगी। ये, वे कहते हैं, इसके सभी प्रकार होते हैं।
साधना से पहले शिष्य के बाल और नाखून रखवा लेना, ताकि बाद में रोक लगाई जा सके
कुछ विशिष्ट तंत्र साधकों की रीति
वक्ता कहते हैं कि मंत्र-आधारित बंधन के सिवाय कुछ थोड़े-से विशिष्ट प्रकार के तंत्र साधक ऐसा करते हैं: जब शिष्य साधना कर रहा होता है, वे चूल यानी बाल काटकर रख लेते हैं, कुछ चुटैया कटवाकर रखवा लेते हैं, कोई दशांग भी कटवाकर रखवाते हैं — जैसे नाखून, जिनके बारे में वे कहते हैं कि पहले देने पड़ेंगे: हाथ-पैर के नाखून, सिर के बाल, ये सब अपने पास रख लेते हैं। इसका सबसे बड़ा कारण, वे कहते हैं, यह है कि कालांतर में शिष्य कोई बहुत बड़ी चीज़ सिद्ध कर ले और उनकी बात न माने तो वे रोक लगा सकें। वे कहते हैं कि यह स्पष्ट रूप से होता है; इसमें कोई दो राय नहीं।
इसके सिवाय, वक्ता कहते हैं, जो थोड़े-से विशिष्ट प्रकार के तंत्र साधक होते हैं, वे ऐसा करते हैं कि जब आप साधना कर रहे हों तो चूल काटकर यानी बाल काटकर रख लेते हैं; कुछ चुटैया काटकर रखवा लेते हैं; कोई दशांग भी कटवाकर रखाते हैं। जैसे नाखून — वे कहते हैं कि पहले आपको देना पड़ेगा। हाथ-पैर के नाखून, आपके सिर के बाल, इन सभी चीज़ों को वे अपने पास रख लेते हैं। इसके पीछे का सबसे बड़ा कारण, वे कहते हैं, यही होता है कि कालांतर में आप कोई बहुत बड़ी चीज़ सिद्ध कर लें और उनकी बातों को न मानें, तो वे रोक लगा सकें। यह चीज़, वे कहते हैं, स्पष्ट रूप से होती है; इसमें कोई दो राय नहीं है।
गुरु सूक्ष्म शरीर को बाँधकर शिष्य की दिव्य दृष्टि को स्थायी रूप से कैसे रोकते हैं
बिना बताए बंधन, या विद्या को जीवन भर के लिए कुंठित करना
वक्ता कहते हैं कि जब गुरु को बंधन करना होता है तो या तो वे बिना बताए ही बंधन करने में समर्थ होते हैं, या दूसरा तरीका लेते हैं: विद्या को पूरी तरह कुंठित कर देना ताकि शिष्य के शरीर में वह दोबारा कभी प्रस्फुटित न हो। चूँकि दिव्यदृष्टि और दूर-श्रवण शक्ति का विकास सूक्ष्म शरीर में होता है, जो गुरु चाहते हैं कि शिष्य को इस जीवन में वे कभी दोबारा न मिलें, वे सूक्ष्म शरीर का बंधन करते हैं — किसी तंत्र से, ग्रंथ विद्या से, या अपनी किसी दूसरी विद्या से सूक्ष्म शरीर को बंधित या मलिन करके, या कोई अभिमंत्रण की हुई वस्तु या जड़ी खिलाकर। उसके बाद कोई भी ऊर्जा — यक्ष, गंधर्व, किन्नर, कोई प्रेत या उपदेव श्रेणी की शक्ति, या कोई देव शक्ति भी — कृपा नहीं कर पाती: बहुत जप करते शिष्य के सामने वे आएँगी, खड़ी भी होंगी, लेकिन गुरु द्वारा बंधित होने से वचन हटाने और दिव्य दृष्टि लौटाने में समर्थ नहीं होतीं। ऐसी स्थिति में, वे कहते हैं, सभी चीज़ों को बदलना पड़ता है; और इसके सिवाय भी बहुत-सी विधियाँ हैं।
वक्ता कहते हैं कि जब गुरु को बंधन करना होता है, तो या तो वे बिना बताए ही बंधन करने में समर्थ होते हैं, या दूसरा एक तरीका होता है: अगर उस विद्या को पूरी तरह कुंठित कर देना है, कि शिष्य के शरीर में वह विद्या दोबारा कभी प्रस्फुटित न हो — यानी दोबारा कभी उसका विकास न हो पाए। वे समझाते हैं कि यह सूक्ष्म शरीर पर क्यों किया जाता है। हमारे शरीर में जो ऊर्जा, जो क्षमता होती है, जिस शक्ति का हम आवाहन करते हैं — सबसे पहले हमारे शरीर में उस ऊर्जा, उस तत्त्व की वृद्धि होती है; तब वह शक्ति हमारी ऊर्जा के साथ, हमारे सूक्ष्म शरीर के साथ संतुलन बनाकर हमें दिव्यदृष्टि प्रदान करती है। दिव्य दृष्टि सूक्ष्म शरीर को मिलती है। सूक्ष्म ऊर्जा, सूक्ष्म शरीर, प्राण शरीर, प्राण ऊर्जा हमारे भौतिक शरीर के साथ जुड़े होते हैं; जब हम किसी दिव्य शक्ति का आवाहन करते हैं और उनके माध्यम से दिव्य दृष्टि पाते हैं, तो सूक्ष्म शरीर भौतिक शरीर और उस दिव्य ऊर्जा के बीच का माध्यम बनता है। यानी जो दिव्य दृष्टि या दूर-श्रवण शक्ति प्राप्त हुई है, उसका विकास सूक्ष्म शरीर में हुआ है। इसलिए, वे कहते हैं, अगर गुरु चाहें कि इस व्यक्ति के जीवन में इस साधना के माध्यम से वह सुनने या देखने की क्षमता कभी न मिले, तो वे सूक्ष्म शरीर का बंधन करते हैं। या तो किसी तंत्र के माध्यम से करेंगे, ग्रंथ विद्या के माध्यम से करेंगे, अथवा अपनी किसी दूसरी विद्या के द्वारा शिष्य के सूक्ष्म शरीर को बंधित कर देंगे या मलिन कर देंगे। कोई अभिमंत्रण की हुई वस्तु खिला देंगे, कोई जड़ी खिला देंगे, कि वह ऊर्जा, वह तत्व — चाहे यक्ष, गंधर्व, किन्नर इत्यादि हो, प्रेत या उपदेवप्रमुख देवताओं से निम्न श्रेणी के गौण दिव्य प्राणियों की एक श्रेणी — पितरों को इसी श्रेणी में वर्गीकृत किया जाता है। श्रेणी की कोई शक्ति हो, कोई देव शक्ति ही क्यों न हो — फिर कृपा ही नहीं कर पाएगी। या फिर, वे कहते हैं, वे शिष्य के सामने आना चाहेंगी भी: वह बहुत अधिक मंत्र जप कर रहा है, वे उसके सामने आ रही हैं — लेकिन चूँकि वह गुरु द्वारा बंधित है, वे इस वचन को हटाने में समर्थ नहीं हो पातीं और उसे दोबारा कभी दिव्य दृष्टि नहीं दे पातीं। आएँगी ज़रूर, सामने खड़ी भी होंगी, लेकिन उसमें वह सामर्थ्य नहीं होगा कि वह पुनः इस चीज़ को प्राप्त कर सके। ऐसी स्थिति में सभी चीज़ों को बदलना पड़ता है। ये सारे प्रकार हैं, वे कहते हैं, और इनके सिवाय भी बहुत-सी चीज़ें होती हैं जिनके माध्यम से गुरु शक्तियों के द्वारा अपने शिष्य पर बंधन लगा देते हैं और उसकी सिद्धियों को कुंठित कर देते हैं।
दिव्य दृष्टि का विकास सूक्ष्म शरीर में होता है, जो शरीर और आवाहित शक्ति के बीच का माध्यम है
सिद्धि वास्तव में कहाँ रहती है
वक्ता कहते हैं कि साधक जिस भी शक्ति का आवाहन करता है, सबसे पहले उसके शरीर में उस ऊर्जा, उस तत्त्व की वृद्धि होती है; फिर वह शक्ति उसकी ऊर्जा और उसके सूक्ष्म शरीर के साथ संतुलन बनाकर उसे दिव्यदृष्टि देती है। दिव्य दृष्टि सूक्ष्म शरीर को मिलती है, भौतिक शरीर को नहीं: सूक्ष्म ऊर्जा, सूक्ष्म शरीर, प्राण शरीर और प्राण ऊर्जा भौतिक शरीर से जुड़े होते हैं, और सूक्ष्म शरीर भौतिक शरीर तथा दिव्य ऊर्जा के बीच का माध्यम बनता है। इसलिए साधक को जो दिव्य दृष्टि या दूर-श्रवण शक्ति मिलती है, उसका विकास सूक्ष्म शरीर में हुआ होता है।
वक्ता इसकी प्रक्रिया समझाते हैं। हमारे शरीर में जो ऊर्जा, जो क्षमता होती है, जिस शक्ति का हम आवाहन करते हैं — सबसे पहले हमारे शरीर में उस ऊर्जा, उस तत्त्व की वृद्धि होती है। तब वह शक्ति हमारी ऊर्जा के साथ संतुलन बनाकर, हमारे सूक्ष्म शरीर के साथ संतुलन बनाकर, हमें दिव्यदृष्टि प्रदान करती है। दिव्य दृष्टि, वे कहते हैं, हमारे सूक्ष्म शरीर को मिलती है। सूक्ष्म ऊर्जा, सूक्ष्म शरीर, प्राण शरीर, प्राण ऊर्जा — ये हमारे भौतिक शरीर के साथ जुड़े हुए, मिले हुए होते हैं। जब हम किसी दिव्य शक्ति का आवाहन करते हैं और उनके माध्यम से हमें दिव्य दृष्टि की प्राप्ति होती है, तो हमारा सूक्ष्म शरीर भौतिक शरीर और उस दिव्य ऊर्जा के बीच का माध्यम बनता है। यानी उसका विकास सूक्ष्म शरीर में हुआ है: जो दिव्य दृष्टि हमें प्राप्त हुई है या दूर-श्रवण शक्ति प्राप्त हुई है, उसका विकास सूक्ष्म शरीर में हुआ है।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।