तांत्रिक गुरु शिष्य का बंधन कैसे और क्यों करते हैं
वक्ता बताते हैं कि गुरु शिष्य की प्राप्त सिद्धियों का बंधन कैसे और क्यों करते हैं।
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गुरु द्वारा शिष्य की प्राप्त सिद्धियों का बंधन
गुरु से साधना सीखने के बाद शिष्य की प्राप्त सिद्धियाँ अचानक काम करना क्यों बंद कर देती हैं?
वक्ता एक ऐसी स्थिति बताते हैं जिसमें गुरु से साधना सीखकर सिद्धि और दिव्य दृष्टि (दिव्यदृष्टि) प्राप्त कर चुका शिष्य कालांतर में पाता है कि ये सब क्षमताएँ कुंठित हो गई हैं, और गुरु इस विषय में न तो कारण बताते हैं और न ही आगे कोई चर्चा करते हैं।
वक्ता एक स्थिति रखते हैं: कोई व्यक्ति किसी के पास जाकर साधना सीखता है, और इस प्रकार वह व्यक्ति उसके गुरु हो जाते हैं। उन्हीं गुरु से सीखकर शिष्य को सिद्धियों की प्राप्ति होती है और अन्य फल भी मिलते हैं (त्रिवाचा इत्यादि)। परंतु कालांतर में शिष्य की दिव्य दृष्टि (दिव्यदृष्टि) बंध जाती है — वह धीरे-धीरे उन चीज़ों को देखने-सुनने में असमर्थ होने लगता है जो पहले उसे प्राप्त थीं, और जो भी क्षमता उसे मिली थी वह कुंठित हो जाती है। वक्ता कहते हैं कि जब शिष्य इस विषय में जानने या अपने गुरु से मार्गदर्शन लेने का प्रयास करता है, तो गुरु मना कर देते हैं, या कहते हैं कि इन सभी चीज़ों की आवश्यकता तुम्हें नहीं है। वक्ता इसी को इस प्रवचन का मुख्य प्रश्न बताते हैं: यह कैसे और क्यों होता है, और एक गुरु अपने ही शिष्य का बंधन कैसे करते हैं?
सुरक्षा हेतु गुरु का एक विद्या अपने पास रखना
गुरु सदैव एक अंतिम विद्या शिष्य से क्यों रोक कर रखते हैं?
वक्ता कहते हैं कि गुरु अपनी सभी विद्याएँ शिष्य को नहीं देते — यदि दस विद्याएँ दे रहे हैं तो ग्यारहवीं एक विद्या अवश्य अपने पास रखते हैं, ताकि शिष्य कभी गलत मार्ग पर चले तो उसका बंधन कर सकें।
वक्ता कहते हैं कि गुरु, गुरु इसीलिए होते हैं कि वे अपनी सभी विद्याएँ शिष्य को नहीं देंगे। चाहे वे शिष्य को दस विद्याएँ दे रहे हों, ग्यारहवीं एक ऐसी विद्या अपने पास अवश्य रखेंगे। यह रखी हुई विद्या इसीलिए होती है कि यदि शिष्य कभी किसी गलत मार्ग पर चलने लगे, तो गुरु के पास उसका बंधन करने का साधन बना रहे। वक्ता जोड़ते हैं कि इस प्रवचन में वे जिस विषय पर बात कर रहे हैं वह एक अधिक सामान्य स्थिति है: शिष्य स्वयं सही हो, सात्विक हो, शुद्ध हो, आचरण का पवित्र हो, फिर भी गुरु उसका बंधन कर देते हैं।
सात्विक शिष्य के बंधन के पीछे धन और अवज्ञा
गुरु एक सात्विक और शुद्ध आचरण वाले शिष्य का भी बंधन क्यों कर देते हैं?
वक्ता कहते हैं कि शिष्य के सही और सदाचारी होने पर भी गुरु द्वारा बंधन करने का सबसे बड़ा कारण धन बनता है — वे वर्तमान युग को अर्थ प्रधान युग बताते हैं, और शिष्य द्वारा गुरु के कहे कार्य को मना कर देने की ओर संकेत करते हैं।
वक्ता कहते हैं कि शिष्य के सही, सात्विक, शुद्ध और पवित्र आचरण वाले होने पर भी इसके पीछे का सबसे बड़ा कारण धन बनता है। वे इसे अर्थ प्रधान युग कहते हैं — ऐसा युग जिसमें धन ही प्रधान है। वे एक ठोस स्थिति बताते हैं: शिष्य ने अपने गुरु जी से सभी विद्याएँ सीख लीं, परंतु वह उनके कहने में नहीं चल रहा। यदि गुरु कहें कि तुम मेरा यह कार्य कर दो और शिष्य मना कर दे, तो यही वह अवज्ञा है जिसे लेकर बाद में गुरु कहते हैं कि शिष्य ने बात नहीं मानी। वक्ता कहते हैं कि यह बात अलग है कि गुरु ऐसा कहकर परीक्षा ले रहे हों या वास्तव में उस कार्य की अपेक्षा रख रहे हों — परंतु यदि इस प्रकार का कोई कृत्य हो जाए और गुरु उसके कारण शिष्य का बंधन कर दें, तो वह किस प्रकार होता है, यह वे आगे बताते हैं।
बंधन का आधार — शिष्य के मंत्र और वचन की जानकारी
गुरु को शिष्य की साधना के विषय में इतनी जानकारी कैसे होती है कि वे उसका बंधन कर सकें?
वक्ता कहते हैं कि जिन गुरु के माध्यम से शिष्य ने साधना की है, उन्हें पहले से ज्ञात होता है कि शिष्य ने क्या वचन लिए, किस मंत्र से शक्ति का आवाहन किया, किस मंत्र से वचन लिया, और उस शक्ति के माध्यम से वह किन-किन कार्यों को संपादित करने में सिद्ध है — यही जानकारी आगे चलकर बंधन का आधार बनती है।
वक्ता बताते हैं कि गुरु द्वारा शिष्य का बंधन कर पाने में सबसे बड़ा विषय जानकारी का है: गुरु को यह ज्ञात होता है कि शिष्य ने किन विद्याओं को उनके माध्यम से सिद्ध किया है, उस प्रक्रिया में क्या वचन लिए गए, किस मंत्र के द्वारा शक्ति का आवाहन किया गया, किस मंत्र के द्वारा शिष्य ने उनसे वचन लिया, और किन-किन कार्यों को उस शक्ति के माध्यम से शिष्य संपन्न कर सकता है। चूँकि गुरु के पास यह सारी जानकारी होती है, इसलिए जब बंधन किया जाता है तो वह पूर्णतः गुरु के सामर्थ्य पर निर्भर करता है। वक्ता कहते हैं कि कुछ गुरु मात्र एक वचन देकर और संकल्प (संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है।) से ही उस शक्ति का बंधन कर सकते हैं।
मंत्र की उपसंहार विधि से सिद्धि का उपसंहार
गुरु मंत्र-विद्या के माध्यम से ही शिष्य की सिद्धि का बंधन कैसे करते हैं?
वक्ता कहते हैं कि कुछ गुरु, संबंधित मंत्र-विद्या को जानने के कारण, उसी मंत्र की उपसंहार विधि (उपसंहार विधि) का प्रयोग करते हैं — जो प्रत्येक गुरु परंपरा में अलग-अलग होती है — और जिस देवी शक्ति को शिष्य के पास आना था, उसे वचन देकर आने से इंकार करवा देते हैं।
वक्ता कहते हैं कि कुछ गुरु ऐसे होते हैं जिन्हें जब मंत्र विद्या के विषय में पता होता है, तो उस मंत्र की उपसंहार विधि (उपसंहार विधिवह विधि जिससे प्रदान की गई विद्या अथवा सिद्धि को विधिपूर्वक वापस लिया या विलीन किया जाता है।) की भी जानकारी होती है। वे बताते हैं कि यह विधि प्रत्येक गुरु परंपरा में अलग-अलग होती है। चूँकि शिष्य उन्हीं की परंपरा का है, गुरु शिष्य के विषय में भी और उस मंत्र के विषय में भी सब कुछ जानते हैं। उसी जानकारी का प्रयोग करके वे बंधन लगा देते हैं, जिसके बाद पहले प्राप्त फल शिष्य के लिए कार्य करना बंद कर देते हैं। जिस भी देवी शक्ति को शिष्य के पास आना था, गुरु उन्हें वचन दे देंगे, और वे शिष्य के पास आने से इंकार कर देंगी — वे नहीं आएँगी।
रोक लगाने के साधन रूप में शिष्य के बाल और नाखून रखना
कुछ तंत्र साधक साधना सिखाने से पहले शिष्य के बाल और नाखून क्यों ले लेते हैं?
वक्ता कहते हैं कि कुछ विशिष्ट प्रकार के तंत्र साधक साधना सिखाने से पहले शिष्य के बाल, चुटैया, अथवा हाथ-पैर के नाखून कटवाकर अपने पास रख लेते हैं, ताकि कालांतर में शिष्य कोई बड़ी सिद्धि प्राप्त करके उनकी बात न माने तो उस पर रोक लगाई जा सके।
वक्ता कहते हैं कि मंत्र के माध्यम से किए जाने वाले बंधन के अतिरिक्त, एक विशिष्ट प्रकार के तंत्र साधक यह करते हैं: जब शिष्य साधना कर रहा होता है, तो वे उसके चूल यानी बाल कटवाकर रख लेते हैं, कुछ चुटैया कटवाकर रखवा लेते हैं, और कोई-कोई दशांग भी कटवाकर रखवाते हैं। वे नाखून का उदाहरण देते हैं — हाथ-पैर के नाखून और शीश के बाल — और कहते हैं कि साधक शिष्य से कहते हैं कि पहले ये सब देना पड़ेगा, और इन सभी वस्तुओं को वे अपने पास रख लेते हैं। वक्ता कहते हैं कि इसके पीछे का सबसे बड़ा कारण यही होता है कि यदि कालांतर में शिष्य किसी बहुत बड़ी चीज़ को सिद्ध कर ले और गुरु की बातों को न माने, तो इन वस्तुओं के माध्यम से उस पर रोक लगाई जा सके। वे कहते हैं कि यह चीज़ स्पष्ट रूप से होती है, इसमें कोई दो राय नहीं है।
बंधन के दो प्रमुख मार्ग
सामर्थ्यवान गुरु शिष्य को बिना बताए ही बंधन कर सकते हैं — दूसरा मार्ग विद्या को स्थायी रूप से कुंठित कर देना है।
वक्ता कहते हैं कि समर्थ गुरु शिष्य को बिना बताए ही उसका बंधन करने में सक्षम होते हैं, और बंधन की आवश्यकता होने पर गुरु द्वारा अपनाए जाने वाले दो प्रमुख तरीकों में से यह एक है।
वक्ता कहते हैं कि पहले बताए गए तरीकों के अतिरिक्त, जब गुरु को शिष्य का बंधन करना होता है तो वे दो में से किसी एक प्रकार से करते हैं। पहला यह कि समर्थ गुरु बिना बताए ही पूरा बंधन कर देने में सक्षम होते हैं। दूसरा तरीका, जिसे वक्ता आगे बताते हैं, वह यह है कि उस विद्या को ही पूरी तरह कुंठित कर दिया जाए, ताकि वह शिष्य के शरीर में दोबारा कभी प्रस्फुटित न हो सके।
दिव्य दृष्टि और सिद्धि के विकास का माध्यम — सूक्ष्म शरीर
आवाहित शक्ति पहले शरीर के भीतर वृद्धि पाती है, और भौतिक शरीर से भिन्न सूक्ष्म शरीर ही उससे संतुलन बनाकर दिव्य दृष्टि विकसित करता है।
वक्ता बताते हैं कि जिस शक्ति का आवाहन किया जाता है, उसकी ऊर्जा सबसे पहले साधक के शरीर में वृद्धि पाती है, और भौतिक शरीर से जुड़ा हुआ किंतु उससे भिन्न सूक्ष्म शरीर ही उस ऊर्जा के साथ संतुलन बनाकर दिव्य दृष्टि अथवा अन्य सिद्धियों का विकास करता है।
वक्ता उस अंतर्निहित प्रक्रिया को समझाते हैं जिसे गुरु तब लक्ष्य बनाते हैं जब किसी विद्या को स्थायी रूप से कुंठित करना हो, ताकि वह शिष्य के शरीर में दोबारा कभी विकसित न हो। वे कहते हैं कि हमारे शरीर में जो ऊर्जा या क्षमता होती है, और जिस शक्ति का हम आवाहन करते हैं, उस ऊर्जा के तत्त्व की वृद्धि सबसे पहले हमारे ही शरीर में होती है। तब वह शक्ति हमारी ऊर्जा के साथ और हमारे सूक्ष्म शरीर के साथ संतुलन बनाकर हमें दिव्य दृष्टि (दिव्यदृष्टि) प्रदान करती है। दिव्य दृष्टि सूक्ष्म शरीर को मिलती है, सीधे भौतिक शरीर को नहीं। सूक्ष्म शरीर, सूक्ष्म ऊर्जा तथा प्राण शरीर/प्राण ऊर्जा हमारे भौतिक शरीर से कनेक्टेड हैं, मिले हुए हैं। जब हम किसी दिव्य शक्ति का आवाहन करते हैं और उनके माध्यम से दिव्य दृष्टि प्राप्त होती है, तो सूक्ष्म शरीर भौतिक शरीर और उस दिव्य ऊर्जा के बीच का माध्यम बनता है — अर्थात् दिव्य दृष्टि अथवा दूर श्रवण शक्ति का विकास सूक्ष्म शरीर में ही होता है।
सूक्ष्म शरीर का बंधन या मलिनीकरण
गुरु शिष्य की दिव्य दृष्टि जैसी सूक्ष्म शरीर की क्षमताओं को स्थायी रूप से कैसे रोक देते हैं?
वक्ता कहते हैं कि जो गुरु चाहते हैं कि शिष्य को दिव्य दृष्टि या दूर श्रवण शक्ति दोबारा कभी प्राप्त न हो, वे उसके सूक्ष्म शरीर का बंधन कर देते हैं या उसे मलिन कर देते हैं — किसी तंत्र के माध्यम से, ग्रंथ विद्या के माध्यम से, अथवा कोई अभिमंत्रित वस्तु या जड़ी खिलाकर — जिससे आवाहित शक्ति कृपा ही न कर पाए, भले ही वह शिष्य के समक्ष आकर खड़ी हो जाए।
वक्ता कहते हैं कि यदि गुरु यह चाहें कि इस व्यक्ति के जीवन में इस साधना के माध्यम से दूर श्रवण शक्ति या देखने की क्षमता कभी दोबारा प्राप्त न हो, तो वे बंधन के लिए सूक्ष्म शरीर को ही लक्ष्य बनाते हैं। यह वे किसी तंत्र के माध्यम से करेंगे, ग्रंथ विद्या के माध्यम से करेंगे, अथवा अपनी किसी दूसरी विद्या के द्वारा शिष्य के सूक्ष्म शरीर को बंधित कर देंगे या मलिन कर देंगे। वे एक और विधि बताते हैं: गुरु शिष्य को कोई अभिमंत्रित (अभिमंत्रण की हुई) वस्तु खिला देंगे, या कोई जड़ी खिला देंगे, जिससे वह ऊर्जा या तत्व — चाहे वह यक्ष, गंधर्व (गन्धर्ववैदिक और पौराणिक मान्यता में स्वर्गीय गायक व सेवक।), किन्नर हो, चाहे प्रेत (प्रेत) या उपदेव (उपदेवता) कैटेगरी की कोई शक्ति हो, चाहे कोई देव शक्ति ही क्यों न हो — फिर शिष्य पर कृपा ही न कर पाए। वे जोड़ते हैं कि वह शक्ति शिष्य के समक्ष आना चाहे भी — शिष्य बहुत अधिक मंत्र जप कर रहा हो और वह शक्ति निकट आ जाए, सामने प्रकट हो, सामने खड़ी भी हो जाए — परंतु चूँकि शिष्य गुरु के द्वारा बंधित है, वह शक्ति इस वचन को हटाने में समर्थ नहीं हो पाएगी और दोबारा कभी दिव्य दृष्टि प्रदान नहीं कर पाएगी। वह आएगी अवश्य, सामने खड़ी भी होगी, परंतु शिष्य में वह सामर्थ्य नहीं हो पाएगा कि वह पुनः इसे प्राप्त कर सके।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।