चतुर्थी से चतुर्दशी — गृहस्थ के लिए संकट नाशन गणपति स्तोत्र का दस दिवसीय अनुष्ठान
सामान्य गृहस्थ के लिए दस दिन का गणपति अनुष्ठान।
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किसी भी अनुष्ठान में सफलता की पूर्वशर्त गणपति साधना
तंत्र में चरणबद्ध विधान हैं; यह गृहस्थ के लिए
वक्ता कहते हैं कि भगवान गणेश की साधना के बिना कोई भी किसी विशेष अनुष्ठान में या जीवन के किसी भी क्षेत्र में पूर्ण सफलता नहीं पा सकता, इसलिए गणपति साधना अत्यंत आवश्यक है। तंत्र में, वे कहते हैं, इसके विभिन्न चरण हैं: बीज मंत्रों के द्वारा ashta-vinayaka और महागणपति स्वरूप की साधना का बहुत चरणबद्ध विधान दिया गया है। यहाँ वे जो साधना रख रहे हैं, वह इसके बजाय सामान्य साधक या सामान्य गृहस्थ के लिए है, ताकि वह जीवन में आने वाली हर कठिनाई पार कर सके।
वक्ता आरंभ में कहते हैं कि भगवान गणेश की साधना के बिना हम किसी भी विशेष अनुष्ठानएक दीर्घ अनुष्ठान — जिसमें अपने कड़े नियम होते हैं। में या जीवन के किसी भी क्षेत्र में पूर्ण रूप से सफलता प्राप्त नहीं कर सकते। इसलिए गणपति साधना अत्यंत आवश्यक होती है। तंत्र में, वे कहते हैं, इसके विभिन्न चरण हैं। बीज मंत्रों के द्वारा भगवान गणपति के ashta-vinayaka स्वरूप और महागणपति स्वरूप की साधना का बहुत ही चरणबद्ध विधान दिया गया है। लेकिन एक सामान्य साधक या सामान्य गृहस्थ व्यक्ति अपने जीवन में आने वाली हर कठिनाई को कैसे पार करे? उसी हेतु, वे कहते हैं, वे यह साधना सबके समक्ष रख रहे हैं।
दस दिवसीय गणपति साधना कब करें: असफल साधनाएँ, केतु, संतान, धन, विद्या और परीक्षा
साधना के कारण, और सबको क्यों करनी चाहिए
वक्ता कहते हैं कि यह गणेश साधना अवश्य करनी चाहिए जब जीवन के किसी क्षेत्र में बहुत अधिक कठिनाई आ रही हो और बहुत सी साधनाएँ करने पर भी सफलता न मिल रही हो; साथ ही जो साधना के क्षेत्र में आगे बढ़ना चाहते हैं, ताकि आगे की प्रमुख साधनाओं में कोई कठिनाई न आए; जन्म कुंडली में केतु का दुष्प्रभाव हो तब भी; और संतान उत्पत्ति से लेकर धन, विद्या प्राप्ति या प्रतियोगी परीक्षा में सफलता न मिलने पर भी। उनके हिसाब से प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन में यह साधना अवश्य करनी चाहिए।
मान लीजिए, वक्ता कहते हैं, जीवन के किसी क्षेत्र में आपको बहुत अधिक कठिनाई आ रही है, आप बहुत सारी साधनाएँ भी कर रहे हैं, फिर भी सफलता नहीं मिल रही। तब आपको भगवान श्री गणेश की साधना ज़रूर करनी चाहिए। साथ ही अगर आप साधना के क्षेत्र में आगे बढ़ना चाहते हैं, तो आगे जो भी प्रमुख साधना करें उसमें कोई कठिनाई न आए, इस हेतु भी यह साधना करनी चाहिए। जन्म कुंडली में केतु से संबंधित दुष्प्रभाव हो, वे कहते हैं, तो भी यह साधना करनी चाहिए। और संतान उत्पत्ति से लेकर धन संबंधी कोई विषय हो, विद्या प्राप्ति हो, या कोई प्रतियोगी परीक्षा दे रहे हों और उसमें सफलता न मिल रही हो, उसके लिए भी यह साधना कर सकते हैं। उनके हिसाब से प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन में यह साधना अवश्य करनी चाहिए।
दस दिवसीय गणपति साधना का समय: किसी भी पक्ष की चतुर्थी से चतुर्दशी
कोई भी महीना, कोई भी पक्ष; भाद्रपद भी उपयुक्त
वक्ता कहते हैं कि यह साधना किसी भी महीने के किसी भी पक्ष — कृष्ण या शुक्ल — की चतुर्थी तिथि से आरंभ की जाती है और चतुर्दशी तिथि को इसका समापन होता है, इस प्रकार यह दस दिन की साधना है। अगर कोई भाद्रपद महीने में करने जा रहा है, जिसमें गणेश पूजा सार्वजनिक रूप से हर जगह मनाई जाती है, तो वह भी बहुत उपयुक्त है; उस महीने में भी यह साधना की जा सकती है।
सर्वप्रथम, वक्ता कहते हैं, किसी भी महीने के किसी भी पक्ष की चतुर्थी तिथिचंद्र पंचांग की एक तिथि — कुछ प्रतिमाओं (जैसे शिवलिंग) को प्रतिदिन स्नान आवश्यक है, जबकि अन्य को केवल अपने निर्धारित साप्ताहिक दिन या तिथि पर। से इस साधना को आरंभ करेंगे। कृष्ण पक्ष हो या शुक्ल पक्ष, चतुर्थी तिथि से आरंभ होगा और चतुर्दशी तिथि को इसका समापन होगा। दस दिन की यह साधना रहेगी। अगर आप भाद्रपद महीने में करने जा रहे हैं, जिसमें गणेश पूजा सार्वजनिक रूप से हर जगह मनाई जाती है, तो वह भी बहुत उपयुक्त है, वे कहते हैं; उस महीने में भी यह साधना कर सकते हैं।
संकट नाशन गणपति स्तोत्र साधना की सामग्री: नई सफेद कॉपी, लाल पेन और स्तोत्र
चतुर्थी से पहले क्या जुटाएँ
वक्ता कहते हैं कि सबसे पहले एक सफेद कॉपी — पूरी खाली, नई — और एक लाल रंग का पेन लाना है। साथ ही संकट नाशन गणपति स्तोत्रम भी पास होना चाहिए; वे कहते हैं कि उसका पीडीएफ वीडियो के डिस्क्रिप्शन में लिंक कर देंगे, जिसे डाउनलोड करके प्रिंट आउट रख लेना है।
इसके लिए, वक्ता कहते हैं, सबसे पहले एक सफेद कॉपी लानी है: पूरी खाली, नई कॉपी। लाल रंग का पेन ले लीजिए। साथ ही संकट नाशन गणपति स्तोत्रम आपके पास होना चाहिए। वे कहते हैं कि उसका पीडीएफ वीडियो के डिस्क्रिप्शन में लिंक रहेगा; उसे डाउनलोड करके प्रिंट आउट निकलवा कर रख लीजिए।
पहले दिन का गणपति पूजन: स्नान, नए वस्त्र, जनेऊ, भोग और अर्पण
स्त्री जनेऊ चढ़ाती है, पहनाती नहीं
वक्ता कहते हैं कि चतुर्थी को गणेश जी का पंचोपचार, दशोपचार या सोलह उपचार पूजन करें, जितनी सामर्थ्य हो या जितना आता हो। मूर्ति या फोटो हो तो मूर्ति को दूध और पञ्चामृत से स्नान कराकर नए वस्त्र पहनाएँ और यज्ञोपवीत अवश्य चढ़ाएँ; जो पुरुष जनेऊ पहनते हैं वे पहना दें, पर स्त्री केवल चढ़ाएगी, पहनाएगी नहीं। फिर लड्डू या मोदक का भोग लगाएँ, भोग के बाद दूर्वा ज़रूर चढ़ाएँ, और धूप, बिल्व तथा लाल फूल चढ़ाएँ; सुगंधित दीप जलाएँ, घी का हो तो अति उत्तम।
सर्वप्रथम चतुर्थी तिथि को, वक्ता कहते हैं, भगवान गणेश का पूजन कर लीजिए: पंचोपचारपूजा का मूल पंचांग क्रम — धूप, दीप, गंध, पुष्प व नैवेद्य — जो साधना की प्रारंभिक क्रियाओं के बाद देवता हेतु किया जाता है।, दशोपचार या सोलह उपचार, जितनी सामर्थ्य हो या जितना आता हो। मान लीजिए आपके पास गणपति का श्री विग्रह या फोटो है। सबसे पहले उन्हें स्नान कराइए। मूर्ति है, श्री विग्रह है, तो सामान्य तरीके से दूध और पञ्चामृतदूध, दही, घी, शहद और शक्कर से बना पंचामृत, पूजा से पहले मूर्ति को स्नान कराने हेतु प्रयुक्त होता है। से स्नान कराकर, अच्छे से नए वस्त्र पहनाकर, यज्ञोपवीतवैदिक कर्मों में दीक्षा का प्रतीक यज्ञोपवीत (जनेऊ) संस्कार — पीढ़ियों तक न होने पर, इसे पुनः आरंभ करने से पहले हर ज्ञात पीढ़ी के लिए प्रायश्चित आवश्यक है। उन्हें ज़रूर चढ़ाना चाहिए। जनेऊ चढ़ाइए; अगर आप स्वयं पहनते हैं तो उन्हें पहना दीजिए। लेकिन अगर साधक स्त्री है, वे कहते हैं, तो वह जनेऊ सिर्फ चढ़ाएगी, पहनाएगी नहीं। फिर लड्डूनैवेद्य के रूप में अर्पित गोल मिष्ठान्न, विशेषतः गणपति और हनुमान को। या मोदकगणपति को अर्पित किया जाने वाला मीठा पकवान। का भोग लगाएँ। भोग के बाद दूर्वादेवताओं — विशेषकर गणेश जी — को अर्पित की जाने वाली पवित्र घास, नए स्थान पर जाने से पूर्व देवता को औपचारिक निमंत्रण देने की सामग्री में सम्मिलित होती है। ज़रूर चढ़ाना होता है। धूपपूजन में अर्पित की जाने वाली धूप; उपचारों के क्रम में इसका धूम्र स्वयं एक अर्पण माना जाता है। और बिल्वभगवान शिव से संबद्ध पवित्र बेल वृक्ष — इसके नीचे साधना की जाती है, इसकी लकड़ी बंधन-मुक्ति अनुष्ठान में घी व तिल की आहुति के लिए हवन-सामग्री के रूप में प्रयुक्त होती है, तथा इसका त्रिदल पत्र (बिल्वपत्र) शिव को अर्पित किया जाने वाला मुख्य द्रव्य है। गणपति को चढ़ा दें, और लाल रंग के फूल। सुगंधित दीप: दीप घी का जले तो अति उत्तम है।
चतुर्थी को संकट नाशन गणपति स्तोत्र आठ बार लिखना
पहले गुरु स्मरण; संख्या फलश्रुति से
वक्ता कहते हैं कि पूजन के बाद पहले अपने गुरु का, या जिन्हें मानसिक रूप से गुरु मानते हों उनका, स्मरण करके नई कॉपी में लाल पेन से संकट नाशन गणपति स्तोत्र लिखना आरंभ करें। इसे आठ बार लिखना है, जो संख्या स्तोत्र की अपनी फलश्रुति में दी है, जिसे वे पढ़ने को कहते हैं। यह लेखन केवल एक बार, चतुर्थी को, होता है, और लिखी हुई कॉपी और पेन साधना के दौरान गणपति के पास रखे रहते हैं।
पूजन के बाद, वक्ता कहते हैं, सबसे पहले अपने गुरु का, अथवा जिन्हें भी आप मानसिक रूप से गुरु मानते हैं उनका, स्मरण करके संकट नाशन गणपति स्तोत्रदेवता की स्तुति का पाठ, जिसे बिना दीक्षा के भी पढ़ा जा सकता है, जबकि मंत्र के लिए दीक्षा अपेक्षित है। को लिखना आरंभ करें। यह स्तोत्र आठ बार लिखना है, जैसा इसकी फलश्रुतिकिसी स्तोत्र या शास्त्र का समापन अंश, जिसमें उसके पाठ से प्राप्त होने वाले फलों और लाभों का वर्णन होता है। में लिखा है। फलश्रुति पढ़िए, वे कहते हैं, आपको समझ में आ जाएगा। तो चतुर्थी तिथि के दिन पहले केवल आठ बार यह स्तोत्र लिखेंगे। लिखना सिर्फ पहले दिन ही है। लिखी हुई कॉपी और पेन गणपति के पास ही रख देना है।
संकट नाशन स्तोत्र के नित्य पाठ: प्रतिदिन 27 से 108, हर पाठ एक दूर्वा पर
दूर्वा कम हो तो एक पर दस-ग्यारह पाठ; विकल्प में लाल फूल
वक्ता कहते हैं कि लिखने के बाद पाठ आरंभ होता है: कम से कम 27 और संभव हो तो नित्य 108 पाठ, चतुर्थी से चतुर्दशी तक, जिससे पाठ शुद्ध भी होता है और प्रभाव भी बहुत तीव्र देता है। पास में दूर्वा रखें, संभव हो तो 108; एक दूर्वा पर एक पाठ करके उसे गणपति को समर्पित कर दें। दूर्वा कम हो तो एक दूर्वा पर दस या ग्यारह पाठ करके चढ़ाएँ, ऐसे ग्यारह दूर्वा में 108 पाठ पूरे हो जाते हैं। दूर्वा न मिले तो लाल फूल या गणपति को चढ़ने वाला कोई भी फूल चलेगा, लाल कनेर या गुड़हल हो तो अति उत्तम।
लिखने के बाद, वक्ता कहते हैं, पाठ शुरू करेंगे। कम से कम 27 पाठ; अधिक से अधिक, अगर कर सकें तो नित्य 108 पाठ करने हैं। चतुर्थी से चतुर्दशी तिथि तक यह पाठ शुद्ध भी होगा और प्रभाव भी बहुत तीव्र देगा। कैसे करना है? आपके पास दूब घास होनी चाहिए, जिसे दूर्वादेवताओं — विशेषकर गणेश जी — को अर्पित की जाने वाली पवित्र घास, नए स्थान पर जाने से पूर्व देवता को औपचारिक निमंत्रण देने की सामग्री में सम्मिलित होती है। कहा जाता है। ले आइए; संभव हो तो 108, नहीं तो दस-ग्यारह भी चलेंगी। एक दूब लेकर उस पर एक बार पाठ करें और गणपति जी को समर्पित कर दें। लिखी हुई कॉपी और पेन गणपति के पास रखे रहेंगे, और गणेश जी को दूब चढ़ाते जाना है: एक पाठ किया, एक दूब चढ़ा दी। अगर दूब कम है तो एक-एक दूब लेकर उस पर ग्यारह या दस बार पाठ करें और फिर चढ़ा दें। ऐसे ग्यारह दूब में 108 पाठ पूर्ण हो जाएँगे। अगर दूब घास बिल्कुल न मिले, वे कहते हैं, तो लाल फूल या कोई भी फूल ले लें जो गणपति को चढ़ता हो। लाल फूलों में लाल कनेर या गुड़हल का पुष्प हो तो अति उत्तम। इस प्रकार प्रत्येक दिन गणेश जी का पहले यह पाठ करेंगे।
गणपति साधना में आसन, दिशा और बाद के दिनों की छोटी दिनचर्या
लाल या पीला, पूर्व या उत्तर; स्नान की जगह गंगाजल
वक्ता कहते हैं कि आसन और वस्त्र लाल या पीले, और दिशा पूर्व या उत्तर, दोनों में से कोई भी रख सकते हैं। गणपति को रोज़ स्नान कराने की आवश्यकता नहीं: स्नान पहले दिन ही होता है, अगले दिन से उन पर गंगाजल छिड़ककर भोग लगाएँ, धूप-दीप जलाएँ और पाठ करें। आठ बार लिखना भी केवल पहले दिन का ही है।
आसन और वस्त्र, वक्ता कहते हैं, लाल या पीला, दोनों में से कोई भी रह सकता है। दिशा पूर्व या उत्तर, दोनों में से कोई भी रख सकते हैं। प्रत्येक दिन गणपति को स्नान इत्यादि कराने की आवश्यकता नहीं है। स्नान पहले दिन ही कराएँगे। अगले दिन से सिर्फ उन पर गंगाजलगंगा नदी का जल, अशुद्धि के संपर्क में आई अनुष्ठान वस्तुओं को शुद्ध व पुनःप्रतिष्ठित करने हेतु प्रयुक्त। छिड़ककर, फिर भोग इत्यादि लगाकर, धूप-दीप जलाकर, फिर अपना पाठ करेंगे। लिखना भी, वे कहते हैं, सिर्फ पहले दिन ही है, आठ बार।
गणपति साधना का समापन हवन: घी और गुग्गुल, बारह नामों में से हर नाम से बारह आहुति
सिर्फ दो चीज़ें, और नाम स्तोत्र से
वक्ता कहते हैं कि चतुर्दशी को जब उस दिन के 108 पाठ, या नित्य 27 कर रहे थे तो 27 पाठ, पूरे हो जाएँ, तो संभव हो तो एक छोटा सा हवन ज़रूर करें। सिर्फ दो चीज़ों का प्रयोग होता है: पुरुष घी और गुग्गुल मिलाकर आहुति देता है। आहुति नाम से दी जाती है: संकट नाशन गणेश स्तोत्र में गणपति के बारह नाम हैं, और हर नाम से बारह-बारह आहुति दी जाती हैं। वे कहते हैं कि बारह नाम अलग पीडीएफ में वीडियो के लिंक में डाल देंगे। हवन के बाद पूर्णाहुति और आरती होती है।
अंतिम दिन, चतुर्दशी तिथि को, वक्ता कहते हैं, जब आप 108 पाठ पूर्ण कर लें, या नित्य 27 कर रहे थे तो 27 पाठ पूर्ण कर लें, उसके बाद संभव हो तो एक छोटा सा हवन ज़रूर करें। हवन में सिर्फ दो चीज़ों का प्रयोग करना है। पुरुष हैं तो घी और गुग्गुलसुगंधित गोंद, जो धूप रूप में जलाया जाता है अथवा घी में मिलाकर आहुति दी जाती है; रक्षा और समृद्धि के प्रयोगों में विशेष प्रयुक्त।: घी और गुग्गुल मिलाकर आहुति दीजिए। आहुति किस नाम से करनी है? संकट नाशन गणेश स्तोत्र में, वे कहते हैं, गणपति के बारह नाम दिए गए हैं। वे उन बारह नामों को अलग से लिखकर एक और पीडीएफ वीडियो के लिंक में डाल देंगे, उसे डाउनलोड कर लेना है। प्रत्येक नाम से बारह-बारह बार आहुति देनी है: गणपति, तो गणपति के नाम से बारह; संकट नाशन गणपति, गणेश, गजानन, इसी प्रकार हर नाम से बारह-बारह आहुति। हवन के बाद, वे कहते हैं, पूर्णाहुति, आरतीदेवता की प्रतिमा के समक्ष प्रज्वलित दीपक घुमाने का अनुष्ठान — दीपदान में जब दीपक बुझने लगते हैं, तब इसे किया जाता है। इत्यादि हो जाएगी।
विशेष स्थिति: गणपति साधना में महिला साधिका की हवन सामग्री
काला तिल, पंचमेवा, गुड़, मधु, चावल वाली सामग्री; जौ नहीं
वक्ता कहते हैं कि महिला साधिका पुरुषों के लिए बताई घी-गुग्गुल आहुति के बजाय, संभव हो तो हवन सामग्री से हवन करे: हवन की लकड़ी और सुगंधित धूप में काला तिल, पंचमेवा, गुड़ और थोड़ा सा मधु मिलाकर। जौ डालने की आवश्यकता नहीं, पर चावल ज़रूर डालें। इन सबको मिलाकर हवन करें, जिसके बाद पूर्णाहुति और आरती सदा की तरह होती है।
अगर आप महिला साधिका हैं, वक्ता कहते हैं, तो संभव हो तो हवन सामग्री से हवन करें: हवन की जो लकड़ी होती है, सुगंधित धूप होती है, उसमें काला तिल, पंचमेवा, गुड़ और थोड़ा सा मधु मिलाकर। जौ डालने की आवश्यकता नहीं है, वे कहते हैं। चावल ज़रूर डाल लीजिए। इन सबको मिलाकर हवन करें। हवन के बाद पूर्णाहुति, आरतीदेवता की प्रतिमा के समक्ष प्रज्वलित दीपक घुमाने का अनुष्ठान — दीपदान में जब दीपक बुझने लगते हैं, तब इसे किया जाता है। इत्यादि हो जाएगी।
गणपति साधना का समापन: लिखी कॉपी का दान और एक छोटे बालक को भोजन
कोई भी वर्ण; शास्त्र में बारह से कम, आज पाँच से आठ
वक्ता कहते हैं कि चतुर्दशी के दिन ही जिस कॉपी में आठ बार स्तोत्र लिखा था, उसे ऐसे मंदिर में ले जाएँ जहाँ गणेश जी की भी मूर्ति हो — शिव मंदिर में भी होती है — और वहाँ के ब्राह्मण को संकल्प करवाकर कुछ अन्न और दक्षिणा के साथ दान कर दें। संभव हो तो कम से कम एक छोटे बालक को अपने हाथ से भोजन या मिठाई भी खिलाएँ। बालक में वर्ण देखने की आवश्यकता नहीं; ब्राह्मण ही हो यह ज़रूरी नहीं, सदाचारी बालक हो तो बहुत अच्छा। कहा तो बारह वर्ष से कम अवस्था का बालक गया है, पर आज के समय के अनुसार पाँच, छह, सात या आठ साल तक का बच्चा अति उत्तम। इस प्रकार साधना पूर्ण होती है।
हवन के बाद, चतुर्दशी तिथि के दिन ही, वक्ता कहते हैं, जिस कॉपी में आठ बार लिखा था उसे ऐसे मंदिर में जाकर दान करना है जहाँ गणेश जी की भी मूर्ति हो। शिव मंदिर में भी होती है। वहाँ जो भी ब्राह्मणब्राह्मण वर्ण का व्यक्ति, जिसे अनेक अनुष्ठानों के अंत में भोजन अथवा दक्षिणा दी जाती है। हों, उनसे संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। करवाकर कुछ अन्न इत्यादि और दक्षिणागुरु अथवा आचार्य को दी जाने वाली भेंट, जिससे अनुष्ठान पूर्ण होता है; इसके बिना कर्म अपूर्ण माना जाता है। के साथ कॉपी उन्हें दान कर दें। संभव हो तो, वे कहते हैं, कम से कम एक छोटे बालक को भी अपने हाथ से भोजन या मिठाई खिलाइए। बच्चे में वर्ण देखने की आवश्यकता नहीं कि ब्राह्मण वर्ण का ही हो; किसी भी वर्ण के बालक को खिला सकते हैं। सदाचारी, अच्छा बालक हो तो बहुत अच्छा। ऐसे तो बारह वर्ष से कम अवस्था के बालक को कहा गया है, वे कहते हैं, लेकिन अभी के समय के अनुसार कम से कम पाँच-छह से सात-आठ साल तक के बच्चों को खिलाएँ तो अति उत्तम। इस प्रकार, वे कहते हैं, यह साधना पूर्ण होती है।
दस दिन के बाद: आजीवन आठ नित्य पाठ, हर वर्ष दोहराव, और संकल्प पूर्ति का आश्वासन
कम से कम छह महीने; एक वर्ष करने पर कोई प्रारब्ध धर्मयुक्त इच्छा नहीं रोक सकता
वक्ता कहते हैं कि दस दिन पूरे होने पर पाठ छोड़ना नहीं है: कम से कम आठ पाठ नित्य, संभव हो तो सुबह-शाम दोनों समय, छह महीने तक लगातार, और उनके अनुसार आजीवन। दस दिन का अनुष्ठान भी हर साल जब गणेश पूजा आए या जो महीना उपयुक्त लगे उसमें दोहराना चाहिए, और हर महीने दोहरा लें तो अत्युत्तम। अगर साल भर ऐसा कर लें, तो वे लिखकर देते हैं कि जिस संकल्प से यह कर रहे हैं वह पूर्ण न हो, यह संभव ही नहीं — प्रारब्ध में कितनी भी प्रबल चीज़ लिखी हो, गणपति कृपा कर दें तो अवश्य मिलेगा। इच्छा धर्मयुक्त होनी चाहिए, धर्म के विपरीत नहीं: पुत्र, संतान, धन, विद्या, प्रतियोगी परीक्षा में सफलता, एक वर्ष तक निरंतर।
अनुष्ठान के बाद, वक्ता कहते हैं, यह पाठ प्रत्येक दिन कम से कम आठ बार करना है, नित्य सुबह और शाम जब भी समय मिले; दोनों समय हो तो अति उत्तम। और इसे छोड़ना नहीं है। ऐसा नहीं कि अनुष्ठान पूरा हो गया और अब केवल कुछ दिन पाठ करेंगे: छह महीने तक लगातार पाठ करना चाहिए, और उनके अनुसार आजीवन करना चाहिए। हर साल जब भी गणेश पूजा आए, या जो भी महीना उपयुक्त लगे, उसमें दस-दस दिन का अनुष्ठानएक दीर्घ अनुष्ठान — जिसमें अपने कड़े नियम होते हैं। पुनः पुनः दोहराते रहना चाहिए। हर महीने दोहरा लें तो अत्युत्तम है। अगर साल भर ऐसा कर लेते हैं, तो वे कहते हैं कि वे लिखकर देते हैं: संभव ही नहीं कि जिस एक संकल्प के साथ आप इसे कर रहे हैं वह पूर्ण न हो। आपके प्रारब्धपूर्व कर्मों द्वारा पहले से गतिमान भाग्य का वह अंश — साधना व सत्कर्म इसकी तीव्रता को घटा सकते हैं, किंतु पूर्णतः मिटा नहीं सकते। में कितनी भी प्रबल चीज़ लिखी हो, अगर गणपति कृपा कर दें और आपने यह अनुष्ठान कर लिया, तो ज़रूर प्राप्त होगा। आप जो भी इच्छा करते हैं वह धर्मयुक्त होनी चाहिए, धर्म के विपरीत नहीं। पुत्र प्राप्ति की कामना हो, संतान की, धन की, विद्या की, प्रतियोगी परीक्षा में सफलता की — वे कहते हैं, इसे लेकर एक वर्ष तक निरंतर कर दीजिए।
सावधानी: साधना शुरू करने से दो-तीन दिन पहले संशय दूर करें, उसी दिन नहीं
उसी दिन के प्रश्न का उत्तर समय पर न मिले
वक्ता कहते हैं कि साधना से जुड़ा कोई संशय या प्रश्न हो तो कमेंट में या उनके टेलीग्राम ग्रुप में पूछा जा सकता है, पर वे ध्यान दिलाते हैं कि जिस दिन पूजा शुरू करनी है उसी दिन भेजे संदेश का तुरंत उत्तर न भी मिले। इसलिए दो-तीन दिन पहले ही सभी संशय दूर कर लें और उसके बाद ही साधना आरंभ करें।
सुनने के बाद कोई संशय या प्रश्न हो, वक्ता कहते हैं, तो कमेंट करें या टेलीग्राम ग्रुप में जुड़कर वहाँ संशय दूर कर सकते हैं। पर वे एक बात का ध्यान रखने को कहते हैं: अगर आज आप पूजा शुरू करने जा रहे हैं और आज ही संदेश भेजते हैं, तो हो सकता है तुरंत उत्तर न मिले। इसलिए दो-तीन दिन पहले ही अपने सभी संशय दूर कर लें, वे कहते हैं, और उसके बाद साधना आरंभ करें।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।