चतुर्थी से चतुर्दशी — गृहस्थ के लिए संकट नाशन गणपति स्तोत्र का दस दिवसीय अनुष्ठान
सामान्य गृहस्थ के लिए दस दिन का गणपति अनुष्ठान।
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इसके बिना किसी भी अनुष्ठान या जीवन के किसी क्षेत्र में पूर्ण सफलता नहीं
वक्ता गणपति साधना को अत्यंत आवश्यक क्यों कहते हैं?
वक्ता कहते हैं कि भगवान गणपति की साधना के बिना हम किसी भी विशेष अनुष्ठान में या जीवन के किसी भी क्षेत्र में पूर्ण रूप से सफलता प्राप्त नहीं कर सकते। इसलिए गणपति साधना अत्यंत आवश्यक होती है, और तंत्र में इनके विभिन्न चरण हैं।
वक्ता कहते हैं कि भगवान गणपति (गणेश) की साधना के बिना हम किसी भी विशेष अनुष्ठानएक दीर्घ अनुष्ठान — जिसमें अपने कड़े नियम होते हैं। में या जीवन के किसी भी क्षेत्र में पूर्ण रूप से सफलता प्राप्त नहीं कर सकते हैं। इसीलिए गणपति साधना अत्यंत आवश्यक होती है। तंत्र में इनके विभिन्न चरण हैं।
अष्टविनायक और महागणपति स्वरूप के बीज मंत्र, बनाम गृहस्थ की साधना
अष्टविनायक और महागणपति स्वरूप के लिए बीज मंत्रों का चरणबद्ध विधान है; यह साधना सामान्य गृहस्थ के जीवन की कठिनाइयाँ पार करने के लिए है।
वक्ता कहते हैं कि बीज मंत्रों के द्वारा भगवान गणपति के अष्टविनायक स्वरूप और महागणपति स्वरूप की साधना का विधान बहुत ही चरणबद्ध तरीके से दिया गया है। लेकिन आज का विषय यह साधना है कि एक सामान्य साधक या सामान्य गृहस्थ व्यक्ति अपने जीवन में आने वाली हर कठिनाई को किस प्रकार पार करे।
वक्ता कहते हैं कि बीज मंत्रों के द्वारा भगवान गणपति के अष्ट विनायक स्वरूप और महागणपति स्वरूप की साधना का विधान बहुत ही चरणबद्ध तरीके से दिया गया है। लेकिन एक सामान्य साधक या सामान्य गृहस्थ व्यक्ति अपने जीवन में आने वाली हर कठिनाई को किस प्रकार से पार करे — उसी हेतु यह साधना आज का विषय है, जिसे वे सभी के समक्ष रख रहे हैं।
अन्य साधनाओं की बाधा हटाने वाली गणपति साधना
जब बहुत सारी साधनाएँ करने पर भी सफलता न मिले, तब क्या करना चाहिए?
वक्ता कहते हैं कि मान लीजिए जीवन के किसी क्षेत्र में बहुत अधिक कठिनाई आ रही है और आप बहुत सारी साधनाएँ भी कर रहे हैं, फिर भी सफलता नहीं मिल रही — तब आपको भगवान श्री गणपति की साधना अवश्य करनी चाहिए। साथ ही, यदि आप साधना के क्षेत्र में आगे बढ़ना चाहते हैं तो आपकी प्रमुख साधनाओं में या आगे जो भी साधना करें उसमें कोई कठिनाई न आए, इस हेतु भी यह साधना करनी चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि सर्वप्रथम मान लेते हैं कि जीवन के किसी भी क्षेत्र में आपको बहुत ही अधिक कठिनाई आ रही है और आप बहुत सारी साधनाओं को कर भी रहे हैं, लेकिन उसके बावजूद भी सफलता प्राप्त नहीं हो रही है। तब आपको भगवान श्री गणपति की साधना जरूर करनी चाहिए। साथ ही, यदि आप साधना के क्षेत्र में आगे बढ़ना चाहते हैं तो आपकी प्रमुख साधनाओं में — आगे आप जो भी साधना करें, उसमें कोई कठिनाई न आए — इस हेतु भी यह साधना करनी चाहिए।
केतु का दुष्प्रभाव, संतान, धन, विद्या और प्रतियोगिता परीक्षाएँ
जन्म कुंडली में केतु के दुष्प्रभाव के लिए, तथा संतान, धन, विद्या या प्रतियोगिता परीक्षा में सफलता न मिलने पर विहित।
वक्ता कहते हैं कि जन्म कुंडली में केतु से संबंधित दुष्प्रभाव हो तो भी यह साधना करनी चाहिए। संतान उत्पत्ति से लेकर धन संबंधित कोई विषय हो, विद्या प्राप्ति हो, या कोई प्रतियोगिता वाली परीक्षा हो जिसमें सफलता नहीं मिल रही — उसके हेतु भी यह साधना कर सकते हैं। उनके हिसाब से यह साधना प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन में अवश्य ही करनी चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि जन्म कुंडली में केतु से संबंधित दुष्प्रभाव हो तो भी यह साधना करनी चाहिए। संतान उत्पत्ति से लेकर के धन संबंधित कोई विषय हो, विद्या प्राप्ति में हो, या फिर आप कोई प्रतियोगिता वाली परीक्षा — कॉम्पिटेटिव एग्जाम — दे रहे हों और उसमें सफलता प्राप्त नहीं हो रही हो, उसके हेतु भी यह साधना आप कर सकते हैं। यह साधना, उनके हिसाब से, प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन में अवश्य ही करनी चाहिए।
किसी भी पक्ष की चतुर्थी से चतुर्दशी तक — दस दिन की साधना
दस दिन — किसी भी महीने के किसी भी पक्ष की चतुर्थी से चतुर्दशी तक।
वक्ता कहते हैं कि आप किसी भी महीने के किसी भी पक्ष की चतुर्थी तिथि से इस साधना को आरंभ करेंगे — कृष्ण पक्ष हो या शुक्ल पक्ष — और चतुर्दशी तिथि को इसका समापन होगा। यह दस दिन की साधना रहेगी। यदि आप भाद्रपद महीने में करने जा रहे हैं, जिसमें गणेश पूजा सार्वजनिक रूप से हर जगह मनाई जाती है, तो वह भी बहुत आवश्यक है और उस महीने में भी आप यह साधना कर सकते हैं।
वक्ता कहते हैं कि सर्वप्रथम आप किसी भी महीने के, किसी भी पक्ष की चतुर्थी तिथिचंद्र पंचांग की एक तिथि — कुछ प्रतिमाओं (जैसे शिवलिंग) को प्रतिदिन स्नान आवश्यक है, जबकि अन्य को केवल अपने निर्धारित साप्ताहिक दिन या तिथि पर। से इस साधना को आरंभ करेंगे। कृष्ण पक्ष हो, शुक्ल पक्ष हो — चतुर्थी तिथि से इसको आरंभ करेंगे और चतुर्दशी तिथि को इसका समापन होगा। यह दस दिन की साधना रहेगी। अगर आप भाद्रपद महीने में करने जा रहे हैं, जिसमें गणेश पूजा सार्वजनिक रूप से हर जगह मनाई जाती है, तो वह भी बहुत ही आवश्यक है; उस दिन भी और उस महीने में भी आप यह साधना कर सकते हैं।
नई सफेद कॉपी, लाल पेन और संकट नाशन गणपति स्तोत्रम
बिल्कुल नई सफेद कॉपी, लाल रंग का पेन, और संकट नाशन गणपति स्तोत्रम का प्रिंट आउट।
वक्ता कहते हैं कि इसके लिए सबसे पहले एक सफेद कॉपी लानी है — पूरी खाली, नई कॉपी। लाल रंग का पेन ले आइए। साथ ही संकट नाशन गणपति स्तोत्रम आपके पास होना चाहिए; उसका पीडीएफ बनाकर उसका लिंक वीडियो के डिस्क्रिप्शन में दिया रहेगा, उसे डाउनलोड करके प्रिंट आउट निकलवा कर रख लीजिए।
वक्ता कहते हैं कि इसके लिए आपको सबसे पहले एक सफेद कॉपी लाना है। पूरी खाली, नई कॉपी लाइए। लाल रंग का पेन ले लीजिए। साथ ही संकट नाशन स्तोत्र — संकट नाशन गणपति स्तोत्रम — आपके पास होना चाहिए। उसका पीडीएफ फॉर्मेट बनाकर उसका लिंक इसी वीडियो के डिस्क्रिप्शन में दिया गया रहेगा। उसे डाउनलोड कर लीजिए, प्रिंट आउट निकलवा कर रख लीजिए।
पंचोपचार, दशोपचार या षोडशोपचार पूजन, पंचामृत स्नान, और जनेऊ चढ़ाना
चतुर्थी को दूध और पंचामृत से स्नान तथा नए वस्त्र — और स्त्री जनेऊ चढ़ाएगी, पहनाएगी नहीं।
वक्ता कहते हैं कि चतुर्थी तिथि को भगवान गणेश का पंचोपचार, दशोपचार या 16 उपचार पूजन कर लीजिए — जितनी आपकी सामर्थ्य है या जितना आपको आता है। यदि श्री विग्रह या फोटो है तो सबसे पहले उन्हें स्नान कराइए; मूर्ति या श्री विग्रह हो तो दूध इत्यादि से, पंचामृत से स्नान कराकर नए वस्त्र पहनाकर जनेऊ अवश्य चढ़ाना चाहिए। जनेऊ चढ़ाइए — अगर आप पहनते हैं तो उन्हें पहना दीजिए; लेकिन अगर स्त्री हैं तो सिर्फ चढ़ाएंगी, जनेऊ पहनाएंगी नहीं।
वक्ता कहते हैं कि सर्वप्रथम चतुर्थी तिथि को भगवान गणेश का पंचोपचार, दशोपचार या 16 उपचार पूजन कर लीजिए — जितनी आपकी सामर्थ्य है, या जितना आपको आता है। मान लेते हैं आपके पास भगवान श्री गणपति का श्री विग्रह अथवा फोटो है, तो उनको सर्वप्रथम स्नान कराइए। सामान्य तरीके से, अगर मूर्ति है, अगर श्री विग्रह है, तो उनको दूध इत्यादि से, पंचामृत से स्नान करवा करके, अच्छे से नए वस्त्र इत्यादि पहना करके जनेऊ (यज्ञोपवीतवैदिक कर्मों में दीक्षा का प्रतीक यज्ञोपवीत (जनेऊ) संस्कार — पीढ़ियों तक न होने पर, इसे पुनः आरंभ करने से पहले हर ज्ञात पीढ़ी के लिए प्रायश्चित आवश्यक है।) जरूर उनको चढ़ाना चाहिए। जनेऊ चढ़ाइए; अगर आप पहनते हैं तो उनको पहना दीजिए। उसके पश्चात — अगर स्त्री हैं तो सिर्फ चढ़ाएंगी, जनेऊ को पहनाएंगी नहीं।
लड्डू या मोदक, दुर्वा, धूप और बेलपत्र, लाल फूल और घी का दीप
गणपति को कौन सा भोग और कौन सी सामग्री चढ़ाई जाती है?
वक्ता कहते हैं कि उनको लड्डू का या मोदक का भोग लगाएँ। भोग लगाने के पश्चात दुर्वा जरूर चढ़ाना होता है। धूप और बेलपत्र भगवान श्री गणपति को चढ़ा देना चाहिए। लाल रंग के फूल चढ़ा देने चाहिए। और सुगंध तथा दीप — दीप यदि घी का जले तो अति उत्तम है।
वक्ता कहते हैं कि उनको लड्डू का या मोदक का भोग लगाएंगे। भोग इत्यादि लगाने के पश्चात दूर्वादेवताओं — विशेषकर गणेश जी — को अर्पित की जाने वाली पवित्र घास, नए स्थान पर जाने से पूर्व देवता को औपचारिक निमंत्रण देने की सामग्री में सम्मिलित होती है। जरूर चढ़ाना होता है। धूपपूजन में अर्पित की जाने वाली धूप; उपचारों के क्रम में इसका धूम्र स्वयं एक अर्पण माना जाता है। और बेलपत्र (बिल्वबेल वृक्ष की पवित्र लकड़ी, भगवान शिव हेतु बंधन-मुक्ति अनुष्ठान में घी व तिल की आहुति के लिए हवन-सामग्री के रूप में प्रयुक्त।) भगवान श्री गणपति को चढ़ा देना चाहिए। लाल रंग के फूल चढ़ा देने चाहिए। सुगंध और दीप की बात करें तो — दीप जो होगा वह घी का जले तो अति उत्तम है।
चतुर्थी को आठ बार लेखन, जैसा फलश्रुति में विहित है
चतुर्थी को स्तोत्र आठ बार लिखा जाता है — यही संख्या इसकी अपनी फलश्रुति में दी गई है।
वक्ता कहते हैं कि उसके पश्चात सर्वप्रथम अपने गुरु का स्मरण करके, अथवा जिन्हें भी आप मानसिक रूप से गुरु मानते हैं उनका स्मरण करके, संकट नाशन गणपति स्तोत्र लिखना आरंभ करेंगे। आठ बार यह स्तोत्र लिखना है, जैसा इसकी फलश्रुति में लिखा है — फलश्रुति पढ़िए, आपको समझ में आ जाएगा। तो चतुर्थी तिथि के दिन केवल आठ बार ही इसे पहले लिखेंगे।
वक्ता कहते हैं कि उसके पश्चात सर्वप्रथम अपने गुरु का स्मरण करके — अथवा जिन्हें भी आप मानसिक रूप से गुरु मानते हैं, उनका स्मरण करके — संकट नाशन स्तोत्र लिखना आरंभ करेंगे। आठ बार यह स्तोत्र आपको लिखना है, जैसा इसकी फलश्रुतिकिसी स्तोत्र या शास्त्र का समापन अंश, जिसमें उसके पाठ से प्राप्त होने वाले फलों और लाभों का वर्णन होता है। में लिखा है। इसकी फलश्रुति को पढ़िए, आपको समझ में आएगा। तो चतुर्थी तिथि के दिन यह स्तोत्र केवल आठ बार ही पहले लिखेंगे।
कम से कम 27, अधिक से अधिक 108 — चतुर्थी से चतुर्दशी तक नित्य
नित्य कम से कम 27 पाठ और अधिक से अधिक 108, चतुर्थी से चतुर्दशी तक।
वक्ता कहते हैं कि लिखने के पश्चात अब आप इसका पाठ शुरू करेंगे। कम से कम 27 पाठ; अधिक से अधिक, अगर आप कर सकें तो नित्य 108 पाठ करना है। चतुर्थी से चतुर्दशी तिथि तक यह पाठ शुद्ध भी होगा और प्रभाव भी बहुत तीव्र देगा।
वक्ता कहते हैं कि लिखने के पश्चात अब आप इसका पाठ शुरू करेंगे। कम से कम 27 पाठ; अधिक से अधिक, अगर आप कर सकें, तो नित्य 108 पाठ करना है। चतुर्थी से चतुर्दशी तिथि तक यह पाठ शुद्ध भी होगा, और प्रभाव भी बहुत तीव्र देगा।
एक दूब पर एक पाठ, या एक दूब पर दस-ग्यारह पाठ, और विकल्प में लाल कनेर या गुड़हल
प्रत्येक पाठ एक दूब पर चढ़ाया जाता है — या एक दूब पर दस-ग्यारह पाठ — और दूब न मिले तो लाल कनेर या गुड़हल से काम चलेगा।
वक्ता कहते हैं कि आपके पास दूब घास होनी चाहिए, जिसे दुर्वा कहा जाता है; संभव हो तो 108 ले लीजिए, न हो तो 10-11 भी चलेगा। एक दूब लिए, उस पर एक बार पाठ किए और गणपति जी को समर्पित कर दिए; और जो लिखा हुआ है वह कॉपी और पेन गणपति के पास ही रख देना है, तथा भगवान गणेश को दूब चढ़ाते जाना है। अगर दूब कम है तो एक-एक दूब लेकर उस पर 11 या 10 बार पाठ करके चढ़ा दीजिए — ऐसे 11 दूब में आपका 108 पाठ पूर्ण हो जाएगा। अगर दूब घास न मिले तो लाल फूल या कोई भी ऐसा फूल ले लीजिए जो गणपति को चढ़ता हो; लाल कनेर या गुड़हल का पुष्प हो तो अति उत्तम।
वक्ता पूछते हैं कि कैसे करना है? आपके पास दूब घास होनी चाहिए, जिसे दूर्वादेवताओं — विशेषकर गणेश जी — को अर्पित की जाने वाली पवित्र घास, नए स्थान पर जाने से पूर्व देवता को औपचारिक निमंत्रण देने की सामग्री में सम्मिलित होती है। कहा जाता है। वह आप ला लीजिए। अगर संभव हो तो 108 कर लीजिए; अगर संभव नहीं है तो चाहे 10-11 भी हों तो भी चलेगा। एक दूब लिए, उस पर एक बार पाठ किए और गणपति जी को समर्पित कर दिए; और जो लिखे रहेंगे, वह कॉपी गणपति के पास ही रख देना है — कॉपी और पेन — और भगवान गणेश को दूब चढ़ाते जाना है। एक पाठ किए, भगवान गणेश को चढ़ा दिए। अगर दूब कम है तो एक-एक दूब लेकर उस पर 11 बार या 10 बार पाठ किए और फिर चढ़ा दिए। ऐसे 11 दूब में आपका 108 पाठ पूर्ण हो जाएगा। अगर दूब घास नहीं मिल पा रही है तो लाल फूल, या फिर कोई भी फूल ले लीजिए जो गणपति को चढ़ता हो। लाल फूल में जो लाल कनेर या गुड़हल का पुष्प कहा जाता है, वह हो तो अति उत्तम।
लाल या पीला वस्त्र, पूर्व या उत्तर दिशा, नित्य स्नान के स्थान पर गंगाजल
आसन-वस्त्र लाल या पीला, दिशा पूर्व या उत्तर; स्नान और लेखन केवल पहले दिन, आगे गंगाजल से काम।
वक्ता कहते हैं कि आसन और वस्त्र लाल या पीला — दोनों में से कोई भी रख सकते हैं; दिशा पूर्व या उत्तर — दोनों में से कोई भी रख सकते हैं। उनको प्रत्येक दिन भोग लगाकर स्नान इत्यादि रोज कराने की आवश्यकता नहीं है — स्नान पहले दिन ही कराएंगे। अगले दिन से सिर्फ उनके ऊपर गंगाजल छिड़क कर, उसके बाद भोग लगाकर, धूप-दीप जलाकर फिर अपना पाठ करेंगे। लिखना भी सिर्फ पहले दिन ही है, आठ बार।
वक्ता कहते हैं कि इस प्रकार से आप प्रत्येक दिन भगवान गणेश का पहले यह पाठ करेंगे। आसनसाधना के दौरान प्रयुक्त पवित्र आसन, जिसे पृथ्वी-शक्ति (वसुंधरा) का साक्षात रूप माना जाता है — इसे कभी भी सामान्य प्रयोजन हेतु साझा, पद-दलित, या उपयोग नहीं करना चाहिए। और वस्त्र लाल या पीला — दोनों में से कोई भी रख सकते हैं। दिशा पूर्व या उत्तर — दोनों में से कोई भी रख सकते हैं। उनको प्रत्येक दिन भोग इत्यादि लगाकर स्नान इत्यादि रोज कराने की आवश्यकता नहीं है। स्नान इत्यादि पहले दिन ही कराएंगे। अगले दिन से सिर्फ उनके ऊपर गंगाजलगंगा नदी का जल, अशुद्धि के संपर्क में आई अनुष्ठान वस्तुओं को शुद्ध व पुनःप्रतिष्ठित करने हेतु प्रयुक्त। छिड़क करके, और उसके बाद भोग इत्यादि लगाकर, धूप-दीप जलाकर फिर अपना पाठ करेंगे। लिखना भी सिर्फ पहले दिन ही है, आठ बार।
पुरुषों के लिए घी और गुग्गल से छोटा हवन
चतुर्दशी को एक छोटा हवन समापन करता है, जिसमें पुरुष घी और गुग्गल मिलाकर आहुति देते हैं।
वक्ता कहते हैं कि अंतिम दिन, यानी चतुर्दशी तिथि के दिन, जब आप 108 पाठ पूर्ण कर लेंगे — अथवा नित्य 27 पाठ कर रहे थे तो 27 पाठ पूर्ण कर लेंगे — उसके बाद एक छोटा सा हवन, अगर आपसे संभव हो, तो जरूर करें। हवन में सिर्फ दो चीज़ का प्रयोग करना है: पुरुष हैं तो घी और गुग्गल का प्रयोग करेंगे — घी और गुग्गल मिलाकर आहुति कीजिए।
वक्ता कहते हैं कि अंतिम दिन, यानी चतुर्दशी तिथि के दिन, जब आप 108 पाठ पूर्ण कर लेंगे — अथवा नित्य अगर 27 पाठ कर रहे थे तो 27 पाठ जब पूर्ण कर लेंगे — उसके बाद एक छोटा सा हवन, अगर आपसे संभव हो, तो जरूर करें। हवन में सिर्फ दो चीज़ का प्रयोग करना है। पुरुष हैं तो घी और गुग्गल का प्रयोग करेंगे। घी और गुग्गल मिलाकर आहुति कीजिए।
संकट नाशन स्तोत्र में गणपति के बारह नाम, प्रत्येक से बारह आहुति
संकट नाशन स्तोत्र में आए गणपति के बारह नामों में से हर नाम से बारह-बारह आहुति दी जाती हैं।
वक्ता कहते हैं कि संकट नाशन गणेश स्तोत्र में गणपति के 12 नाम दिए गए हैं। उन नामों को वे अलग से लिखकर एक और पीडीएफ इसी वीडियो के लिंक में डाल देंगे, जिसे डाउनलोड कर लीजिएगा। प्रत्येक नाम से आपको 12-12 बार आहुति देना है — गणपति नाम है तो गणपति के नाम से 12; संकट नाशन गणपति हैं, गणेश हैं, गजानन हैं। तो हर नाम से 12-12 बार आप आहुति देंगे।
वक्ता पूछते हैं कि आहुति किस नाम से करना है? संकट नाशन स्तोत्र में — संकट नाशन गणेश स्तोत्र में — गणपति के 12 नाम दिए गए हैं। उसमें 12 नाम हैं। उन नामों को वे अलग से लिखकर एक और पीडीएफ इसी वीडियो के लिंक में जरूर डाल देंगे, जिसे डाउनलोड कर लीजिएगा। प्रत्येक नाम से आपको 12-12 बार आहुति देना है। गणपति नाम है तो गणपति के नाम से 12; संकट नाशन गणपति हैं, गणेश हैं, गजानन हैं। तो हर नाम से 12-12 बार आप आहुति देंगे।
काला तिल, पंचमेवा, गुड़ और मधु सहित हवन सामग्री; जौ नहीं, पर चावल अवश्य
महिला साधिका को हवन में किस सामग्री का प्रयोग करना चाहिए?
वक्ता कहते हैं कि आप महिला साधिका हैं तो संभव हो तो हवन सामग्री से करें — हवन सामग्री में हवन की जो लकड़ी होती है और सुगंधित धूप, उसमें काला तिल, पंचमेवा, गुड़ और थोड़ा सा मधु मिलाकर करेंगे। जौ डालने की आवश्यकता नहीं है। चावल जरूर डाल लीजिएगा। इन सभी को मिलाकर आप हवन करें। हवन करने के पश्चात पूर्णाहुति, आरती इत्यादि हो जाएगी।
वक्ता कहते हैं कि आप महिला हैं, आप साधिका हैं, तो आपसे संभव हो तो हवन सामग्री से करें। हवन सामग्री में — हवन की जो लकड़ी होती है और उसमें जो सुगंधित धूप होता है — उसमें काला तिल, पंचमेवापाँच मेवों व सूखे फलों (काजू, किशमिश आदि) का मिश्रण, हवन व तर्पण की सामग्री में प्रयुक्त होता है।, गुड़ और थोड़ा सा मधु मिलाएँ। इन सभी चीजों को मिलाकर के करेंगे। जौ डालने की आवश्यकता नहीं है। चावल जरूर डाल लीजिएगा। इन सभी को मिलाकर के आप हवन करें। हवन करने के पश्चात पूर्णाहुति, आरतीदेवता की प्रतिमा के समक्ष प्रज्वलित दीपक घुमाने का अनुष्ठान — दीपदान में जब दीपक बुझने लगते हैं, तब इसे किया जाता है। इत्यादि हो जाएगी।
गणेश मूर्ति वाले मंदिर में दान, और छोटे बालक को भोजन
लिखी हुई कॉपी अन्न और दक्षिणा सहित ऐसे मंदिर में दान की जाती है जहाँ गणेश जी की मूर्ति हो, और एक छोटे बालक को अपने हाथ से भोजन कराया जाता है।
वक्ता कहते हैं कि उसके बाद, चतुर्दशी तिथि के दिन ही, जो आपने आठ बार पाठ लिखा था वह कॉपी किसी ऐसे मंदिर में जाकर दान करनी है जहाँ गणेश जी की भी मूर्ति हो — शिव मंदिर में भी होती है। वहाँ जो भी ब्राह्मण होंगे उनको संकल्प करवा के, कुछ अन्न इत्यादि के साथ और दक्षिणा इत्यादि के साथ उनको दान कर देंगे। और अगर संभव हो तो कम से कम एक बालक को अपने हाथ से भोजन कराइए, अथवा छोटे बालक को मिठाई खिलाइए।
वक्ता कहते हैं कि उसके बाद, चतुर्दशी तिथि के दिन ही, वह कॉपी जिसमें आपने आठ बार पाठ लिखा था, किसी ऐसे मंदिर में जाकर के दान करनी है जहाँ गणेश जी की भी मूर्ति हो। शिव मंदिर में भी होती है। वहाँ पर जो भी ब्राह्मण होंगे, उनको संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। करवा के, कुछ अन्न इत्यादि के साथ और दक्षिणा इत्यादि के साथ उनको दान कर देंगे। और अगर संभव हो तो कम से कम एक बालक को भी अपने हाथ से भोजन करवाइए, अथवा छोटे बालक को मिठाई खिलाइए।
वर्ण की कोई शर्त नहीं; सदाचारी बालक, शास्त्रानुसार बारह वर्ष से कम
भोजन कराए जाने वाले बालक में वर्ण नहीं देखा जाता; शास्त्र में बारह वर्ष से कम कहा गया है, पर आज के समय के अनुसार पाँच से आठ वर्ष तक सर्वोत्तम है।
वक्ता कहते हैं कि बच्चे में वर्ण इत्यादि देखने की आवश्यकता नहीं है कि ब्राह्मण वर्ण ही हो। आप किसी भी वर्ण के बालक को खिला सकते हैं। सदाचारी, अच्छा बालक हो तो बहुत अच्छा है। ऐसे तो 12 वर्ष की अवस्था से कम अवस्था के बालक को कहा गया है, लेकिन अभी के समय के अनुसार कम से कम 5-6 साल, 7 साल, 8 साल तक के बच्चों को खिलाएंगे तो अति उत्तम है।
वक्ता कहते हैं कि बच्चे में वर्ण इत्यादि देखने की आवश्यकता नहीं है — कि ब्राह्मण वर्ण ही हो। आप किसी भी वर्ण के बालक को खिला सकते हैं। सदाचारी, अच्छा बालक हो तो बहुत अच्छा है। ऐसे तो 12 वर्ष की अवस्था से कम अवस्था के बालक को कहा गया है; लेकिन अभी का जो समय है, उस अनुसार कम से कम 5-6 साल, 7 साल, 8 साल तक के बच्चों को खिलाएंगे तो अति उत्तम है। इस प्रकार से यह साधना पूर्ण होगी।
उसके बाद नित्य आठ पाठ — न्यूनतम छह महीने, और उनके मत से आजीवन
दस दिन के बाद भी नित्य आठ पाठ चलते रहने चाहिए — कम से कम छह महीने, और वक्ता के अपने मत से आजीवन।
वक्ता कहते हैं कि उसके पश्चात यह पाठ प्रत्येक दिन कम से कम आठ बार करना है — नित्य सुबह और शाम, जब भी आपको समय मिले; दोनों समय हो तो अति उत्तम है। और इसको छोड़ना नहीं है। ऐसा नहीं है कि अब अनुष्ठान पूरा हो गया और अब हम केवल कुछ दिन पाठ करेंगे — नहीं। छह महीने तक लगातार इसका पाठ करना चाहिए। उनके अनुसार तो आजीवन करना चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि उसके पश्चात यह पाठ प्रत्येक दिन आपको कम से कम आठ बार करना है — नित्य सुबह और शाम, जब भी आपको समय मिले; दोनों समय हो तो अति उत्तम है। और इसको छोड़ना नहीं है। ऐसा नहीं है कि अब अनुष्ठान पूरा हो गया और अब हम केवल कुछ दिन पाठ करेंगे — नहीं। 6 महीने तक लगातार इसका पाठ करना चाहिए। उनके अनुसार आजीवन करना चाहिए।
हर गणेश पूजा या हर उपयुक्त महीना, मासिक दोहराव सर्वोत्तम
दस दिन का यह अनुष्ठान हर गणेश पूजा पर या किसी भी उपयुक्त महीने में दोहराया जाता है, और हर महीने दोहराना सबसे उत्तम है।
वक्ता कहते हैं कि हर साल, जब भी गणेश पूजा आए, अथवा जो भी महीना आपको उपयुक्त लगे, उसमें 10 दिन का यह अनुष्ठान पुनः-पुनः इसी प्रकार दोहराते रहना चाहिए। अगर हर महीना आप दोहरा लें तो अत्युत्तम है।
वक्ता कहते हैं कि हर साल, जब भी गणेश पूजा आए, अथवा जो भी महीना आपको उपयुक्त लगे, उसमें 10-10 दिन का यह अनुष्ठान पुनः-पुनः ऐसे दोहराते रहना चाहिए। अगर हर महीना आप दोहरा लिए तो अत्युत्तम है।
प्रारब्ध कितना भी प्रबल हो, संकल्प पूर्ण — बशर्ते इच्छा धर्मयुक्त हो
एक वर्ष तक करने पर संकल्प की पूर्ति का वचन दिया गया है, प्रारब्ध कितना भी प्रबल क्यों न हो — बशर्ते इच्छा धर्मयुक्त हो।
वक्ता कहते हैं कि अगर आप साल भर यह कर लेते हैं तो वे लिख कर के देते हैं — संभव ही नहीं है कि जिस एक संकल्प के साथ आप इसको कर रहे हो वह पूर्ण न हो। आपके प्रारब्ध में कितनी भी प्रबल चीज़ लिखी हो, अगर गणपति कृपा कर दिए और यह अनुष्ठान आपने कर लिया तो जरूर आपको प्राप्त होगा। पर आप जो भी इच्छा करते हो वह धर्मयुक्त होनी चाहिए, धर्म के विपरीत नहीं होनी चाहिए — पुत्र प्राप्ति की कामना, संतान प्राप्ति की कामना, धन प्राप्ति, विद्या प्राप्ति, प्रतियोगिता परीक्षा में सफलता की कामना; इसको लेकर एक वर्ष तक कंटिन्यू कर दीजिए।
वक्ता कहते हैं कि अगर आप साल भर यह कर लेते हैं तो वे लिख कर के देते हैं — संभव ही नहीं है कि जिस एक संकल्प के साथ आप इसको कर रहे हो, वह पूर्ण न हो। आपके प्रारब्धपूर्व कर्मों द्वारा पहले से गतिमान भाग्य का वह अंश — साधना व सत्कर्म इसकी तीव्रता को घटा सकते हैं, किंतु पूर्णतः मिटा नहीं सकते। में कितनी भी प्रबल चीज़ लिखी हो, अगर गणपति कृपा कर दिए और इस अनुष्ठान को आपने कर लिया, तो जरूर आपको प्राप्त होगा। आप जो भी इच्छा करते हो वह धर्मयुक्त होनी चाहिए, धर्म के विपरीत नहीं होनी चाहिए। पुत्र की प्राप्ति की कामना हो, संतान प्राप्ति की कामना हो, धन प्राप्ति की कामना हो, विद्या प्राप्ति, प्रतियोगिता परीक्षा में सफलता की कामना हो — इसको लेकर के एक वर्ष तक कंटिन्यू कर दीजिए।
आरंभ से दो-तीन दिन पहले, उसी दिन नहीं
संशय साधना आरंभ करने से दो-तीन दिन पहले दूर कर लेने चाहिए, उसी दिन नहीं।
वक्ता कहते हैं कि इस बात का ध्यान रखें — अगर आज आप पूजा शुरू करने जा रहे हैं और आज ही कोई संदेश भेजते हैं, तो हो सकता है तुरंत आपको जवाब न मिले। इसलिए कोशिश करें कि दो-तीन दिन पहले अपने सभी संशयों को दूर कर लें, और उसके पश्चात ही इस साधना को आरंभ करें।
वक्ता कहते हैं कि इस वीडियो को सुनने के पश्चात अगर आपका कोई संशय हो, कोई प्रश्न हो, तो उसे साधना आरंभ करने से पहले दूर कर लें। कृपया इस बात का ध्यान रखें कि अगर आज आप पूजा शुरू करने जा रहे हैं और आज ही कोई संदेश भेजते हैं, तो हो सकता है तुरंत आपको जवाब न मिले। इसलिए कोशिश करें कि दो-तीन दिन पहले अपने सभी संशयों को दूर कर लें, और उसके पश्चात इस साधना को आप आरंभ करें।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।