साधना में वीर भाव कैसे लाएं (दत्तात्रेय तंत्र चर्चा)
सनातनी साधकों में वीर भाव जगाने पर चर्चा।
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साधना में वीर रस: साधक निष्क्रिय क्यों नहीं रह सकता
हर पूजित देवता का चरित्र वीर है
वक्ता कहते हैं कि जिस भी देव शक्ति की कोई उपासना करता है, उसका चरित्र वीर होता है — जिसमें शक्ति-सामर्थ्य न हो, उसकी कभी सेवा-पूजा नहीं होती — इसलिए जो साधक उपासना के बाद दैन्य भाव में चला जाए और जहाँ उग्रता दिखानी हो वहाँ चुप रहे, वह साधना नहीं, ढोंग कर रहा है। "जाहि विधि राखे राम" को वे ऐसी पंक्ति कहते हैं जिसे लोग चुनिंदा ढंग से, केवल व्यापक सनातनी समाज के लिए खड़े होने से बचने को, बोलते हैं। यह वीर सामर्थ्य, वे कहते हैं, हर देवता समान रूप से देते हैं — दत्तात्रेय, कृष्ण, नरसिंह, शिव — केवल भैरव स्वरूप नहीं।
वक्ता यह पूछकर आरंभ करते हैं कि श्रोता ने जिस देवता की, जिस भी स्वरूप में, उपासना की है, क्या कभी उनके चरित्र का पठन-पाठन किया है — और क्या उस देवता की लीला में कहीं कायरता का प्रदर्शन मिला है। हर देव शक्ति का, वे कहते हैं, एक वीर चरित्र होता है; शक्ति और सामर्थ्य उनके स्वभाव का हिस्सा है, और जिसमें ये न हों उसकी कभी पूजा होती ही नहीं। फिर भी बहुत से लोग किसी देवता की उपासना लेकर दिन-प्रतिदिन दैन्य भाव में चले जाते हैं। जहाँ उग्रता और क्रोध दिखाना है वहाँ चुप हो जाते हैं, स्वयं को संत कहते हैं — और वे कहते हैं कि ऐसे सनातनी होने पर धिक्कार है। "जाहि विधि राखे राम, ताहि विधि रहिए" सबके लिए नहीं है: लोग इसे केवल वहीं बोलते हैं जहाँ हुंकार भरनी थी, और जहाँ अपना मंतव्य निकलना हो वहाँ नहीं — वहाँ हो जाता है "राम क्यों चाहेंगे, अपने कर्म से पा लेंगे"। वे पूछते हैं कि लोग इतने चुनिंदा क्यों हो जाते हैं। यदि आप केवल स्वयं के लिए जीते हैं, वे कहते हैं, तो कैसे सनातनी हैं आप? अपना पेट भरा हो तो दूसरे सनातनियों के बारे में सोचने का अधिकार — और पूरी प्रकृति का ऋण — आप पर है। यदि आपके भीतर गिरते हुए लोगों को उठाने की बुद्धि और क्षमता है, और आप "हमें क्या मतलब" कहकर उनसे दूर भागते हैं, तो आप सही साधना-अनुष्ठान नहीं कर रहे; यह सब ढोंग-ढकोसला है, पाखंड है, और आप केवल अपने लिए जी रहे हैं। जितने ऋषि-मुनि और प्रचंड साधक हुए, चाहे किसी के भी उपासक रहे हों, सभी ने वीर साधनाएँ कीं। वे बात यह कहकर पूरी करते हैं कि यह सामर्थ्य भैरव स्वरूपों तक सीमित नहीं है। क्या भगवान दत्तात्रेय नहीं देते? क्या कृष्ण नहीं — क्या कृष्ण योद्धा नहीं हैं? क्या वैष्णव शक्तियों ने युद्ध नहीं किए — क्या नारायण से बड़ा कोई वीर है? क्या शिव नहीं देते? सभी देते हैं।
कवच सिद्धि और संकट में देवता की शक्ति का प्रकट होना
सिद्ध कवच संकट आने पर क्या करता है
अपने अनुभव से वक्ता कहते हैं कि जब कवच के मंत्र सिद्ध किए जाते हैं — वे काल भैरव का नाम लेते हैं — तो देवता का तत्व स्वयं साधक में प्रवेश करता है, इस हद तक कि दस लोग मिलकर उसे मार नहीं पाते। शर्त यह है कि मंत्र का पुरश्चरण उसकी विधि से, पूरी लगन और समर्पण से हो। फिर जब विपत्ति आती है — हमला, परिवार की मर्यादा पर आघात का प्रयास — तो वही तत्व दस गुना जागृत होता है; इसे वे कुण्डलिनी जागरण कहते हैं, और कहते हैं कि यही सामर्थ्य मिलता है चाहे बटुक भैरव की उपासना हो, काल भैरव की या महाकाल की।
वक्ता कहते हैं कि कवच के मंत्र सिद्ध करने पर क्या होता है, यह वे कई बार कह चुके हैं, और यह उनके अपने जीवन का, आँखों के सामने का अनुभव है: भगवान काल भैरव के मंत्रों के जप से व्यक्ति साक्षात काल भैरव के तत्व में प्रवेश करता है, और दस लोग मिलकर भी ऐसे व्यक्ति को मार नहीं पाते। दूसरे क्या कहते हैं — कि इससे बहुत उग्रता आती है — उसे वे एक ओर रखकर स्पष्ट कहते हैं कि यह होता है, लेकिन मंत्र का पुरश्चरण उसी विधि से, पूरी लगन और समर्पण के साथ होना चाहिए। यथार्थ मान लीजिए, वे कहते हैं: यदि आप किसी वीर कोटि की शक्ति की उसके स्वरूप के अनुसार सिद्धि करते हैं, पुरश्चरण कर लेते हैं, और उतना समर्पण आपके भीतर रहता है, तो विपत्ति काल में उनका तत्व आपके भीतर उपस्थित होगा ही होगा। और जब विपत्ति आती है — कोई सामने से मारने का प्रयास करे, कोई आपकी बहन-बेटियों को लूटने का प्रयास करे, किसी भी प्रकार की विपत्ति आए — तो वही तत्व पूर्ण रूप से, दस गुना अधिक जागृत हो जाता है। वही, वे कहते हैं, कुंडलिनी जागरण है। सामने दस लोग खड़े हों, लेकिन दस में से एक के भी हाथ-पैर नहीं बचेंगे; अकेले तोड़ देंगे आप। वह सामर्थ्य भैरव देते हैं — चाहे बटुक भैरव की साधना करें, काल भैरव की या महाकाल की, वे सामर्थ्य देने वाले हैं।
किसी देवता की विशिष्ट साधना में न्यास क्यों अनिवार्य है
न्यास साधक को देवमय बनाता है
वक्ता कहते हैं कि न्यास को नज़रअंदाज़ नहीं करना है। आरंभिक विषयों में, या जहाँ नाममात्र के लिए किया जा रहा हो, या ग्रहों से जुड़े कुछ विषयों में, इसे छोड़ा जा सकता है — लेकिन किसी शक्ति की विशिष्ट साधना में इसका बहुत विशिष्ट महत्व है। न्यास में बीज मंत्रों को अंगों और उंगलियों में, हृदय में, शिखा में, कंधों (कवच) में बैठाया जाता है, और मंत्र के ऋषि को मुख में। चूँकि मंत्र देवता का ही स्वरूप है, उसका न्यास करने से साधक मंत्रमय होकर देवमय हो जाता है — शरीर देवमय हो जाता है, उपासक और आराध्य में कोई भिन्नता नहीं रहती, और तभी देवता के तत्व सूक्ष्म और कारण शरीर में उपस्थित होते हैं।
न्यास की प्रक्रिया, वक्ता कहते हैं, इसी कारण से करवाई जाती है — ताकि देवता का तत्व साधक में उपस्थित हो। वे कई बार कह चुके हैं: न्यास ऐसे ही छोड़ देने, इग्नोर कर देने, जाने देने की चीज़ नहीं है। हाँ, कुछ विषयों में न्यास की आवश्यकता नहीं होती — आरंभिक चीज़ों के लिए, या जहाँ केवल नाममात्र के लिए कर रहे हों, या ग्रहों के कुछ विषयों में; वहाँ ठीक है। लेकिन जब आप किसी शक्ति की विशिष्ट साधना कर रहे होते हैं, तो न्यास की प्रक्रिया का बहुत विशिष्ट महत्व होता है। न्यास में क्या करते हैं? अलग-अलग प्रकार के न्यास में देवताओं के अलग-अलग बीज मंत्रों को अलग-अलग अंगों और उंगलियों में बैठाते हैं; हृदय में, शिखा में, कवच में — यानी दोनों कंधों पर — सब जगह देवताओं को बैठाते हैं; और मुख में उस कवच के, उस मंत्र के ऋषि को बैठाते हैं। क्यों? क्योंकि मंत्र देवता का ही स्वरूप है, और उसी मंत्र का न्यास करने पर आप मंत्रमय होकर स्वयं देवमय हो जाते हैं। आपका शरीर देवमय हो जाता है। आपके और आपके आराध्य के बीच किसी प्रकार की भिन्नता नहीं रहती: देवता की पूजा देवता होकर आप करते हैं। तभी, वे कहते हैं, उनके तत्व आपके सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर में उपस्थित होते हैं, और उससे भौतिक शरीर की प्रगति होती है।
अगली पीढ़ी को वीर रस देना: पूर्वजों का साहस और बच्चों को सिखाने योग्य स्तुतियाँ
वंश के साहस को जीवित रखना
वक्ता कहते हैं कि आज शांति से बैठकर भजन-पूजन कर पाना पूर्वजों के रक्त के उबाल और उसके बल पर उन्हें मिली देव शक्तियों की कृपा पर टिका है — और उस रक्त को गंदा नहीं होने देना है। विपत्ति की प्रतीक्षा मत कीजिए कि तब "हे राम, रक्षा करो" कहेंगे; वह भाव हर किसी के लिए नहीं है। अभी तैयारी कीजिए, और अपने बच्चों में सामर्थ्य के बीज बोइए: उन्हें केवल श्रृंगार स्तुतियाँ नहीं, जो आवश्यक हैं, बल्कि वीर रस की स्तुतियाँ भी सिखाइए — महिषासुरमर्दिनी, अयि गिरिनंदिनी, और परिवार के अपने आराध्य का ताण्डव स्तोत्र, क्योंकि हर देवता का तांडव उपलब्ध है।
इस समय, वक्ता कहते हैं, आवश्यकता आपके भीतर की कायरता या धीरुता की नहीं है। भीरु मत बनिए। वे यह नहीं कह रहे कि बिना मतलब लड़ते चलिए — लेकिन शक्तिवान बनने की प्रक्रिया में लग जाइए, आँख खोलकर देखिए कि क्या हो रहा है; बहुत समय तक आप इन सबसे बचे नहीं रह सकते। वे कहते हैं कि लोग चार घंटे की फ़िल्म पूरे डेडिकेशन से बैठकर देख लेते हैं, लेकिन उसका चौथाई — एक घंटा, आधा घंटा, पंद्रह मिनट — किसी कवच का जप करने को कहा जाए तो उन्हें मृत्यु आ जाती है। और जिन परेशानियों में वे अभी उलझे हैं — पैसा नहीं है, पितृ परेशान कर रहे हैं, देवता परेशान कर रहे हैं — वह तो कुछ है ही नहीं; जो वास्तविक विपदा आने वाली है उसके लिए वे तैयार ही नहीं हैं, और तब भगवान से अवतार माँगने से कुछ नहीं होगा, क्योंकि उनका समय बहुत बाद का है; तब तक जीवित रहने का सामर्थ्य आपके भीतर होना चाहिए। यथार्थ मान लीजिए, वे कहते हैं: आपके पूर्वजों के रक्त में सनातन का उबाल था, और उन्होंने अवश्य देव शक्तियों की कृपा प्राप्त की होगी; उसी के बल पर आज आप स्थिर बैठकर जय श्री राम कर रहे हैं, भजन-पूजन कर रहे हैं। पूर्वजों के उस रक्त को गंदा मत होने दीजिए। उस दिन की प्रतीक्षा मत कीजिए जब कोई तलवार उठाकर काटने लगे और तब आप कहें "हे राम, रक्षा करो" — वह भाव हर जगह हर किसी के काम का नहीं है। राम जी ने आपको भी बराबर का मौका दिया है। जिन उच्च कोटि के लोगों में अपने आराध्य के प्रति वह भाव जागृत हो चुका है, उनके लिए विषय अलग है — लेकिन आप-हम में अभी वह जागृत नहीं हुआ। उस भाव में पहुँचने वाले के पास किसी की निंदा या स्तुति करने, दो पैसे के लिए सोचने की फुर्सत नहीं होती; यदि वह भाव आपमें नहीं है तो आप छद्मावरण धारण किए हुए हैं, अपने आप से छल कर रहे हैं — और दूसरों को भी वैसा करने को प्रोत्साहित कर रहे हैं, किसी को साधना करते देखते ही उसे नेगेटिव करने लगते हैं। याद रखिए, वे कहते हैं: पूरे जीवन की तपस्या ही वह है जिससे आवश्यकता के समय देवताओं को आना पड़ता है। इसलिए बच्चों में अभी बीज बोइए। जिन कन्याओं और बच्चों में कुछ बोध आ गया है, उन्हें केवल श्रृंगारित स्तुतियाँ मत सिखाइए। श्रृंगार स्तुति आवश्यक है, बिल्कुल आवश्यक है — लेकिन साथ में वीर रस की स्तुतियाँ भी होनी चाहिए। महिषासुर मर्दिनी ज़रूर सिखाइए; अयि गिरिनंदिनी सिखाइए; शिव तांडव, भैरव तांडव, हनुमान तांडव सिखाइए — जो आपके आराध्य हैं उनका तांडव, क्योंकि सबके तांडव उपलब्ध हैं। अष्टकम सिखाइए।
काल भैरव अष्टकम: नित्य पाठ या केवल विपत्ति में
निश्चिंत होकर अष्टकों का पाठ करें
वक्ता उस शिक्षा को अस्वीकार करते हैं, जो कुछ लोग देते हैं, कि काल भैरव अष्टकम् का नित्य पाठ नहीं करना चाहिए, केवल विपत्ति में करना चाहिए। आपमें से कौन, वे पूछते हैं, ऐसे सुख के समय में जी रहा है — करोड़पति, रोगमुक्त, पूरे सुखी परिवार के साथ — कि कोई विपत्ति ही नहीं? निश्चिंत होकर अष्टकों का पाठ कीजिए। वे एक व्यापक नियम जोड़ते हैं: कम से कम एक वीर-प्रधान शक्ति का चयन करके उनकी सेवा-पूजा करें, और अपने ही आराध्य का वीर स्वरूप धारण करें — कृष्ण का उपासक कृष्ण के वीर स्वरूप की भी उपासना करे, केवल बाल मुकुंद में स्वयं को ऐसा न भुला दे कि उनकी वे लीलाएँ ही याद न रहें जिनमें उन्होंने शत्रुओं और दानवों का अंत किया।
कोई महाराज, वक्ता कहते हैं — पता नहीं कौन — कह गए हैं कि काल भैरव अष्टक का नित्य पाठ ही नहीं करना चाहिए, केवल विपत्ति के समय करना चाहिए। क्यों? आप किस सुख के समय में जी रहे हैं, वे पूछते हैं: कितने करोड़पति हो गए हैं, क्या शरीर में कोई कष्ट-रोग नहीं है, परिवार में सबके पास कितना सुख है? क्या आप अष्टक पाठ नहीं करेंगे? निश्चिंत होकर अष्टकों का पाठ करें। फिर वे बात को व्यापक करते हैं। जितनी भी वीर-प्रधान शक्तियाँ हैं, उनमें से किसी एक स्वरूप का अवश्य चयन करें और उनकी सेवा-पूजा करें। और अपने आराध्य का ही स्वरूप धारण करें: यदि आप केवल भगवान कृष्ण की उपासना करते हैं, तो कृष्ण के वीर स्वरूप की भी उपासना अवश्य करें। केवल उनके बाल मुकुंद स्वरूप की उपासना में स्वयं को ऐसा न भुला दें कि जिस दिन वीरता की आवश्यकता पड़े, उनकी कोई लीला ही याद न हो — उन्होंने कौन-कौन सी लीला करके कितने शत्रुओं का अंत किया, कितने दानवों का वध किया, और क्या सामर्थ्य है उनका। भूल मत जाइएगा।
भ्रांति: शिव तांडव या दुर्गा सप्तशती के पाठ से घर में झगड़े होते हैं
देखिए स्तुति में वास्तव में क्या कहा गया है
वक्ता इस दावे का उपहास करते हैं कि दुर्गा सप्तशती पाठ से झगड़े होने लगेंगे, या शिव ताण्डव का पाठ करने से शिव जी घर में तांडव कर जाएँगे। झगड़े बुद्धिहीनता से या गड़बड़ पाठ करने से होते हैं, पाठ से नहीं। शिव तांडव की अपनी फलश्रुति कहती है कि जो संध्या के समय इसका पाठ करता है, उसके यहाँ लक्ष्मी चिरकाल तक स्थित रहती हैं और उसे धन, धान्य, रथ, संपदा मिलती है; भैरव तांडव की पंक्ति "भज भज भूतेशम्… कष्ट हरे" कहती है कि उनका स्वरूप हर कष्ट दूर करता है। किसके ऊपर तांडव मचाएँगे वे? आपके कष्टों और शत्रुओं के ऊपर। अपनी बुद्धि लगाइए और देखिए कि स्तुति में क्या कहा गया है।
सबके पास इतनी बुद्धि नहीं है, वक्ता कहते हैं, कि समझ सकें कि सप्तशती पाठ करने से झगड़े नहीं होने लगते। ऐसे थोड़ी झगड़ा होने लगेगा। बुद्धिविहीनता के साथ करेंगे तब होगा, गड़बड़ पाठ करेंगे तब होगा। शिव तांडव का क्या अर्थ है? उसमें शिव जी तांडव कर रहे हैं — इसलिए, वे कहते हैं, शिव तांडव का पाठ मत कीजिए नहीं तो घर में तांडव हो जाएगा। वाह, वे कहते हैं। यह वह स्तोत्र है जिसकी फलश्रुति में लिखा है कि जो संध्या के समय इसका पाठ करता है, उसके यहाँ लक्ष्मी चिरकाल तक स्थित रहती हैं और उसे धन, धान्य, रथ, संपदा सब मिलता है — और ये लोग अपने से बोल देते हैं कि मत करो नहीं तो शिव जी घर में तांडव कर जाएँगे। यही "भज भज भूतेशम् प्रकट महेशम् भैरव वेशम् कष्ट हरे" के साथ: नहीं नहीं, यह तो भैरव तांडव है, इसे करेंगे तो भैरव जी तांडव कर जाएँगे — जबकि श्लोक स्वयं कह रहा है कि आपके स्वरूप से हमारे हर कष्ट दूर होते हैं। कुछ अपनी भी बुद्धि लगा लो, वे कहते हैं: देख तो लो कि स्तुति में क्या कहा जा रहा है। कैसे वे आपके घर में तांडव मचाएँगे? किसके ऊपर मचाएँगे? आपके कष्ट-विपत्तियों के ऊपर, आपके शत्रुओं के ऊपर। क्या हमारे देवताओं में बोध नहीं है कि यह हमारा भक्त विधिवत, नियम से, आचरण के साथ स्तुति कर रहा है?
कृपा से मिला धन और दूसरों की सहायता का कर्तव्य
कृपा आवश्यकता से अधिक क्यों देती है
जब देव कृपा से धन, स्त्री सुख, विद्या या पद मिलता है, तो वक्ता कहते हैं कि उसके बाद उत्पात मचाना उसका दुरुपयोग है। भगवान ने उस लखपति को, जिसका काम दस लाख में चल जाता, करोड़पति क्यों बनाया? इसलिए कि उनके भक्त के रूप में आप दस लोगों को सहयोग करें जो अपना प्रारब्ध भोग रहे हैं। यदि आप वह अतिरिक्त प्रयास कभी करते ही नहीं, तो भगवान आपको उतना क्यों दें? वे उनकी आलोचना करते हैं जिनका एकमात्र दान ग्रह-नक्षत्रों का दान है — शनि की साढ़ेसाती में सात सस्ते काले कंबल — और जो अन्यथा कभी किसी गरीब को कुछ नहीं देते।
जब आपको देव कृपा प्राप्त हो जाती है, वक्ता कहते हैं — और उससे धन, स्त्री सुख, विद्या, पद मिल जाता है — और उसके बाद आप उत्पात मचाते हैं, उसका दुरुपयोग करते हैं: भगवान ने आपको वह धन किसलिए दिया? आप लखपति थे; दस लाख में भी आपका काम चल जाता। लेकिन उन्होंने एक करोड़, दो करोड़ दिए, और वह फालतू इधर-उधर पड़ा है। वह इसलिए दिया था कि आप उनके भक्त हैं, वे आपको सामर्थ्य दे रहे हैं कि दस आदमी को पूछो — जो लोग अपना प्रारब्ध भोग रहे हैं, उन्हें जाकर सहयोग करो। आपने क्या किया? सहयोग करने की कभी सोची ही नहीं। जब आप कोई अतिरिक्त प्रयास डाल ही नहीं रहे, तो भगवान आपको उतना क्यों दें? इस पर भी विचार कीजिए। और यदि आपका उत्तर है कि यह केवल मेरे प्रारब्ध से मिला है, तो भगवान ने इतनी लीला क्यों की, क्यों दिखाया और कहा कि दुखियों की, गरीबों की सेवा करो? वे वह विकल्प बताते हैं जो उन्हें दिखता है: केवल ग्रह-नक्षत्रों का दान — शनि की साढ़ेसाती चल रही है तो सात काले कंबल दान कर दो — और उसके बाद जीवन में कभी भूलकर भी किसी गरीब को कुछ न देना। शनि का तांडव मचे तो कंबल दान होगा; सब ठीक चल रहा हो तो कंबल कौन पूछे? और वह भी पाँच-पाँच सौ का कंबल — बढ़िया मत देना, गरीब ओढ़े तो उसे त्वचा का संक्रमण हो जाए, मरे; अपने को क्या, हमने तो दे दिया।
यंत्र या दंड जैसी अभिमंत्रित तांत्रिक वस्तुएँ कभी क्यों नहीं हटाई जातीं
वस्तु में समर्पित जप और तप
उस पीठ यंत्र का उदाहरण लेकर जो कई श्रोताओं ने बनवाया था — हिंदू स्वर्णकार से, हाथ से, नक्षत्र देखकर — और फिर पूजा था, वक्ता कहते हैं कि ऐसी चीज़ें कभी हटानी नहीं हैं: उनमें केवल पैसा नहीं, आपका प्रतिदिन का जप और तप लगा है, और वही भविष्य में आपके काम आने वाली हैं। वैसे ही दत्तात्रेय याग के बाद दिया गया दंड: उस प्रकार के मंत्रों से अभिमंत्रित होने पर वह चिरकाल तक घर की रक्षा करने में पूर्ण समर्थ है। विपत्तियाँ हमारी जानकारी से कहीं अधिक बार आती हैं और ऐसी वस्तुएँ तथा हमारा पुण्य उन्हें सोख लेते हैं; वे तभी विफल होने लगती हैं जब पुण्य क्षीण हो और अभिमान आ जाए। इसलिए अभिमानरहित होकर समर्पित रहिए, और अपनी हर जागृत या प्राप्त तांत्रोक्त वस्तु का आदर करना सीखिए।
वक्ता श्रोताओं से अपने जीवन की वस्तुओं के बारे में एक और बात ध्यान में रखने को कहते हैं। उदाहरण के लिए: बहुत से लोगों ने पीठ यंत्र बनाने और स्थापित करने के वीडियो के अनुसार किसी हिंदू स्वर्णकार से नक्षत्र देखकर हाथ से बनवाया था, और फिर उसका पूजन किया था। वह आपका बहुत बड़ा प्रयास है, वे कहते हैं। उन चीज़ों को कभी हटाना नहीं है। उन पर आप केवल पैसा नहीं लगा रहे — उन पर आपका बहुत सारा जप और तप लग रहा है; प्रतिदिन का जप-तप आप उसमें समर्पित करते हैं। वे भविष्य में आपके काम आने वाली चीज़ें हैं। इसी प्रकार की किसी भी वस्तु के लिए यही बात है। पिछले साल दत्तात्रेय याग में सबको दंड गया था। वह सामान्य नहीं है: जब उस प्रकार के मंत्रों से अभिमंत्रित हो जाता है, तो चिरकाल तक घर की सुरक्षा करने में सर्वसमर्थ होता है। जब तक हम स्वयं किसी विपत्ति में नहीं पड़ते, वे कहते हैं, हमें लगता है कि विपत्ति आई ही नहीं। सत्य यह है कि विपत्तियाँ कई बार आईं, लेकिन हमारे पास न जाने कौन-से पुण्य, न जाने किस जप का प्रभाव था, कि वे हम पर प्रभाव नहीं डाल पाईं और उनका दुष्प्रभाव हम तक नहीं पहुँचा। जिस दिन हमारा पुण्य क्षीण होने लगता है — जब हम अभिमान से भर जाते हैं कि कोई हमारा कुछ नहीं उखाड़ सकता — तब उखड़ना शुरू होता है। कभी न उखड़े, इसके लिए अभिमानरहित होकर सदैव समर्पित रहिए। और आपके पास जो भी तांत्रोक्त वस्तु है — जो आपने स्वयं अनुष्ठान से जागृत की हो, या उनके माध्यम से या किसी गुरु के माध्यम से मिली हो — उसका आदर करना सीखिए; आप और वे यह देखने में समर्थ नहीं हैं कि वह कौन-सी विपत्ति अपने भीतर सोख रही है।
अभिमंत्रित काल भैरव माला के मनके टूटने पर उसकी देखभाल
टूटा मनका एक आघात सोख चुका है
काल भैरव अनुष्ठान के बाद दी गई माला में 109 मनके होते हैं। यदि एक मनका टूट जाए, वक्ता कहते हैं, तो नया मनका न लगाएँ — जितने बचे हैं उन्हें गूँथकर पहन लें; 99 मनकों से नीचे जाने तक माला आपके लिए पूर्ण है। धागा टूटे तो फिर से गूँथें, महाभैरव जप करके पुनः पहनें; जन्म-मृत्यु का सूतक, स्त्री का रजोदर्शन, या उसे धोना — किसी से दोष नहीं लगता। टूटा मनका इस बात का संकेत है कि जो आघात आप पर आना था — किसी प्रचंड प्रयोग से या किसी बुरी दशा से — वह अधिकांशतः सोख लिया गया: पैर टूटना था तो अंगूठे में मोच आ गई। यह क्षमता केवल असली माला (हड्डी की नहीं) में होती है, जो हिंदू कारीगर से पुष्य नक्षत्र जैसे नक्षत्र में गुँथी गई हो, जिसकी प्राण प्रतिष्ठा हुई हो, और जिस पर आपके 11,000–40,000 बार जपे हुए कवच का मूल पाठ 108 मनकों में एक-एक बार किया गया हो।
वक्ता वह बात दोहराते हैं जो उन्होंने समूह में लिखी थी: काल भैरव अनुष्ठान के बाद सबको मिली भैरव जी की माला में 109 मनके हैं। यदि एक मनका टूट जाए, तो नया मनका नहीं लगाना है; टूटने के बाद जितने मनके बचे हैं, उन्हीं को गूँथकर पहन लेना है। ऐसा करते रहिए जब तक नौ मनके न टूट जाएँ — 109 में से दस गए तो 99 — और जब तक 99 से नीचे नहीं गया, माला आपके लिए पूर्ण है। निश्चिंत होकर गले में धारण करें, उस पर महाभैरव मंत्र का जप करें और शरीर की सुरक्षा के लिए प्रयोग करें; कोई दिक्कत नहीं। और नौ मनके टूटना आसान नहीं होता: बहुत प्रचंड प्रयोग हो, या रगड़ से धागा घिस जाए, तभी। धागा टूटे तो फिर से गूँथ लीजिए, महाभैरव जप करके पहन लीजिए — कोई समस्या नहीं। मृत्यु या जन्म के सूतक में चले गए तो कोई बात नहीं; फिर से गुँथवा लीजिए। घर में पड़ी रह गई तो फिर से गुँथवा लीजिए। स्त्री — माता या बहन — पहने हो तो रजोदर्शन से उसमें कोई दोष नहीं लगता; धोकर पुनः पहन सकती हैं। धागा हर बार बदलने की आवश्यकता नहीं। जब आप पर बहुत प्रचंड प्रयोग होगा, या किसी ग्रह की महादशा-अंतर्दशा में कष्ट मिलना होगा, तो कष्ट मिलेगा ज़रूर — लेकिन यदि एक-दो मनके टूटे, तो सत्तर-अस्सी प्रतिशत कष्ट वहीं हट चुका है, और मूल का दस-बीस प्रतिशत ही आपको भुगतने को रहेगा। पैर टूटना था; उसकी जगह अंगूठे में मोच आई और मनका टूट गया। हाथ टूटना था; उसकी जगह थोड़ा-सा कट गया। बड़ा केस छोटे में निपट जाता है। कोई भी मणि या रत्न जो विधि-सम्मत, अभिमंत्रित, और आपके समग्र अनुष्ठान से जागृत किया गया हो, उसमें अपने ऊपर लेने की यह क्षमता होती है। यह आप स्वयं भी कर सकते हैं, वे कहते हैं। वे बार-बार कहते हैं: कवच का 11,000 से 40,000 जप कीजिए। फिर जो माला आप अपने लिए उचित समझें, लीजिए — असली होनी चाहिए; आजकल हड्डियों की माला भी मिल रही है, सतर्क रहें। उसे किसी हिंदू माला गूँथने वाले से सही समय पर नक्षत्र देखकर, जैसे पुष्य नक्षत्र में, गुँथवाइए। उसकी प्राण प्रतिष्ठा कीजिए — विधि चैनल पर है। फिर जो कवच आपने जपा था, उसका मूल पाठ हर मनके पर एक-एक बार, कुल 108 बार कीजिए। फिर उसका प्रभाव देखिए: कहीं भी आइए-जाइए, जब तक आप कोई अपराध न करें, किसी भी निकृष्ट शक्ति की औकात नहीं कि आपको छुए — और अपराध का दंड भी कम मिलेगा; वे आवेशित नहीं कर पाएँगे।
जिन स्वरूपों में भगवती साधकों को दर्शन देती हैं
बालिका, युवा, या वृद्धा
एक साधक के दत्तात्रेय अनुष्ठान में मिले दर्शन का अनुभव सुनाने से पहले वक्ता कहते हैं कि ऐसे दर्शन पाने वालों के अनुभव लगभग एक जैसे होते हैं: भगवती बालिका रूप में, युवा रूप में, या — अधिकतम — वृद्धा रूप में दिखती हैं। युवा रूप दुर्लभ है, अधिकतर वीर भाव वाले उन साधकों को दिखता है जो विशेष सिद्धियाँ चाहते हैं, जब भगवती बहुत प्रसन्न हों और मन बहुत शुद्ध हो। वृद्धा स्वरूप सर्वश्रेष्ठ माना गया है: वह पूर्ण, सबसे प्रचंड स्वरूप है जिसके नियंत्रण में समस्त शक्तियाँ हैं, और उसमें दर्शन मिलना इस बात का संकेत है कि साधक उच्च अवस्था प्राप्त कर रहा है।
एक साधक का अनुभव सुनाने से पहले कि दत्तात्रेय अनुष्ठान में भगवती ने उसे किस स्वरूप में दर्शन दिए, वक्ता कहते हैं कि यथार्थ में देखें तो ऐसे दर्शन पाने वाले सब लोगों में बहुत मिलती-जुलती चीज़ें मिलेंगी — लगभग सबका अनुभव एक जैसा होता है। या तो बालिका रूप में, या युवा रूप में, या वृद्धा रूप में — और अधिकतम वृद्धा रूप में ही। युवा रूप बहुत कम का विषय है। यह तब होता है जब कोई बहुत विशेष कामनाओं से भरा व्यक्ति अनुष्ठान करे, उसमें भगवती प्रसन्न हो जाएँ, और मन बहुत शुद्ध हो। अधिकतर यह वीर भाव वाले उन साधकों को दिखता है जिन्हें विशेष सिद्धियों की कामना होती है; नहीं तो या बालिका या वृद्धा। वृद्धा स्वरूप को सर्वश्रेष्ठ माना गया है, क्योंकि वह उत्तरार्ध को परिपूर्ण करने वाली हैं; वह पूर्ण स्वरूप है। उसे सबसे प्रचंड स्वरूप, पूर्ण स्वरूप मानिए, जिसके नियंत्रण में समस्त शक्तियाँ होती हैं। यदि वे उस स्वरूप में दर्शन दे रही हैं, तो इसका अर्थ है कि आप कहीं-न-कहीं उच्च अवस्था प्राप्त करने वाले साधक हैं। वे जोड़ते हैं कि ऐसे अनुभव सुनकर हममें से बहुत लोग आध्यात्मिक मार्ग की वे गलतियाँ ठीक कर लेते हैं जो अनजाने में कर रहे होते हैं — क्लिक कर जाता है कि यही गलती हमें देव कृपा से वंचित कर रही थी, और जीवन सँवर जाता है।
दत्तात्रेय जयंती अनुष्ठान का समय
पूर्णिमा की रात, या अगला दिन
dattatreya-jayanti पूर्णिमा को पड़ती है, इसलिए वक्ता सबसे कहते हैं कि दत्तात्रेय अनुष्ठान प्रमुख रूप से उसी दिन रात्रि में करें। जो रात में नहीं कर सकते, वे अगले दिन दिन के समय दत्तात्रेय से संबंधित अनुष्ठान कर सकते हैं; उसमें कोई समस्या नहीं।
भगवान दत्तात्रेय की जयंती, वक्ता कहते हैं, उस वर्ष 14 तारीख को है, और चूँकि पूर्णिमा है, रात्रिकालीन अनुष्ठान प्रमुख रूप से सभी उसी दिन करें। जो रात को नहीं कर सकते — कोई समस्या नहीं: 15 तारीख को, अगले दिन, दिन के समय में दत्तात्रेय से संबंधित अनुष्ठान कर सकते हैं।
घर में बटुक भैरव विग्रह की स्थापना: तिथियाँ और प्रथम पूजन
कुछ भी धारण या स्थापित करने से पहले प्रथम पूजन
बटुक भैरव जी का विग्रह अष्टमी, चतुर्दशी या पूर्णिमा को सिंहासन पर या लाल-पीले आसन पर स्थापित किया जा सकता है (सिंहासन पर भी लाल या पीला वस्त्र रखें)। उससे पहले, वक्ता कहते हैं, उसका प्रथम पूजन अपने हाथ से करना ही चाहिए — जैसे किसी भी विग्रह, यंत्र, माला या कवच का, चाहे वह कितनी भी विधि से आया हो: प्रथम पूजन के बिना उसकी पूर्ण कृपा नहीं आती, जैसे बिछिया पहनाए बिना कन्या का संस्कार पूर्ण नहीं होता। गो-दुग्ध और गंगाजल से स्नान कराएँ, फिर हल्के इत्र, गुलाब जल या अगर के जल से; विग्रह को पंचगव्य या पंचामृत से स्नान कराकर, पोंछकर, चंदन का लेपन, तिलक, नया वस्त्र, पुष्प, धूप-दीप-नैवेद्य, आरती और अष्टोत्तर शतनामावली से अर्चन करें। फिर नारियल या नींबू की बलि दी जा सकती है — बहू हो तो पति से फुड़वाए, गर्भवती बिल्कुल न करे।
एक श्रोता को उत्तर देते हुए वक्ता कहते हैं कि श्री बटुक भैरव जी का विग्रह अष्टमी के दिन — जो बीत चुकी थी — या चतुर्दशी या पूर्णिमा के दिन स्थापित किया जा सकता है। सिंहासन पर, या लाल अथवा पीले आसन पर स्थापित करें; सिंहासन रखें तो भी उसमें लाल या पीला वस्त्र अवश्य रखें। और पहले बटुक भैरव जी का प्रथम पूजन अवश्य करना चाहिए। यह स्मरण रखें, वे कहते हैं: कोई भी विग्रह, चाहे कितनी भी विधि से युक्त होकर आपके पास आए; कोई भी यंत्र, कोई भी माला, कितनी भी विधि से युक्त; कोई कवच जो आपके पास जाए — उसका प्रथम पूजन स्वयं अपने हाथ से करना चाहिए। वे इसकी तुलना विवाहित व्यक्ति की कन्या से करते हैं: कितनी भी सजी हो, लाखों का मेकअप हुआ हो, जब तक बिछिया नहीं पहनाई जाती, संस्कार पूर्ण नहीं होता। ठीक उसी प्रकार, जब तक आप अपने विग्रह, माला या यंत्र का प्रथम पूजन नहीं करते, उनका पूर्ण प्रभाव और पूर्ण कृपा आप पर नहीं आएगी। प्रथम पूजन के लिए: उन्हें साफ-सुथरी सुंदर पूजन की थाली में रखकर कम से कम गो-दुग्ध से स्नान कराइए, फिर गंगाजल से। फिर ऐसा सुगंधित इत्र जो आप सह सकें — इतना तेज़ नहीं कि एलर्जी हो जाए — या गुलाब जल, या अगर का जल (अगरु-चंदन का जल); उससे अभिषेक करके धूप, दीप, कपूर दिखाकर, जिनका भी कवच, माला या विग्रह हो उनसे प्रार्थना करके, फिर जो धारण करना हो धारण करें। विग्रह को विशेष रूप से पंचगव्य या पंचामृत से अच्छे से स्नान कराइए, अच्छे से पोंछकर पूरा चंदन का लेपन करके इत्र से सुगंधित कीजिए; सुंदर तिलक कीजिए, नया वस्त्र पहनाइए, स्थान पर विराजमान कराकर सुगंधित पुष्पों से श्रृंगार कीजिए, धूप-दीप-नैवेद्य अर्पित कीजिए, आरती कीजिए, और अष्टोत्तर शतनामावली से अर्चन कीजिए। तब जाकर प्रथम पूजन पूर्ण होता है। संभव हो तो बलि दे सकते हैं — नारियल या नींबू — यह ध्यान रखते हुए कि आप कौन हैं: यदि बहू हैं तो नारियल स्वयं नहीं फोड़ेंगी, पतिदेव से फुड़वाएँगी, नींबू भी उन्हीं से कटवाएँगी; गर्भवती हैं तो आपात स्थिति के बिना नारियल या नींबू बिल्कुल न काटें — हालाँकि चौथे महीने के बाद पूजन ही नहीं करना है।
भगवती के उग्र स्वरूपों की पूजा घर के भीतर नहीं होती
ऐसा स्वरूप चुनें जो घर में पूजित हो सके
भगवती की साधना के प्रश्न पर वक्ता कहते हैं कि बिल्कुल कीजिए, किसी भी स्वरूप की — लेकिन पहले देख लें कि वह स्वरूप घर में पूजित हो सकता है या नहीं। जो स्वरूप उग्र माने जाते हैं और शमशान में विराजमान हैं, जिनके ध्यान मंत्र में ही शमशान उनका पीठ बताया गया है (श्मशान काली आदि), उनका घर में सीधे-सीधे पूजन नहीं हो सकता। स्वरूप का चयन अच्छे से करके, अष्टोत्तर शतनामावली से अर्चन आरंभ करें, क्योंकि भगवती को अर्चन प्रिय है।
भगवती की साधना के बारे में पूछने वाले श्रोता से वक्ता कहते हैं: बिल्कुल भगवती की साधना कीजिए। भगवती के किसी भी स्वरूप की उपासना कर सकते हैं — बस यह ध्यान रखिए: वह स्वरूप घर में पूजित हो सकता है या नहीं? जिन स्वरूपों को लोग उग्र कहते हैं और जो शमशान में विराजमान हैं — जिनके ध्यान मंत्र में ही पीठ आ जाता है कि शमशान ही उनका पीठ है — उन सभी स्वरूपों का घर में सीधे-सीधे पूजन नहीं हो सकता। इसलिए स्वरूप का चयन अच्छे प्रकार से करके, तब अष्टोत्तर शतनामावली से अर्चन आदि से पूजन शुरू करें। भगवती को अर्चन प्रिय है, वे कहते हैं; किसी भी स्वरूप का अर्चन पहले करें।
गुरु के निर्देश के बिना विशेष मुद्राओं का प्रयोग चोरी का दोष लगाता है
गुरु आदेश के बिना कोई विधि नहीं, विशेषकर मुद्रा नहीं
सामान्य मुद्राओं के सिवा, वक्ता कहते हैं, यदि आप बिना गुरु के बताए किसी विशेष मुद्रा का प्रयोग करते हैं, तो जो दोष चोरी करने का होता है वही दोष वहाँ भी लगता है। इसलिए किसी भी प्रकार की विधि का — और विशेष रूप से मुद्रा आदि का — प्रयोग गुरु आदेश के बिना नहीं करना चाहिए।
एक श्रोता को उत्तर देते हुए वक्ता सामान्य मुद्राओं और विशेष मुद्राओं के बीच रेखा खींचते हैं। विशेष मुद्रा के लिए, यदि आप बिना गुरु के बताए उसका प्रयोग कर रहे हैं, तो कहीं-न-कहीं उसमें वही दोष लगता है जो चोरी करने का होता है — चोरी का दोष वहाँ भी लगता है। इसीलिए, वे कहते हैं, किसी भी प्रकार की विधि का प्रयोग गुरु आदेश के बिना नहीं करना चाहिए, और मुद्रा आदि का तो विशेष रूप से नहीं।
दत्तात्रेय वज्र कवच के लिए दीक्षा आवश्यक नहीं
औपचारिक दीक्षा के बिना दत्तात्रेय की कृपा
बिना दीक्षा दत्तात्रेय की कृपा कैसे पाएँ, इस प्रश्न पर वक्ता उत्तर देते हैं: वज्र कवच का पाठ कीजिए। उसमें दीक्षा की कोई अनिवार्यता नहीं है; भगवान दत्तात्रेय के वज्र कवच का पाठ करिए — सबसे श्रेष्ठ।
एक श्रोता पूछता है कि बिना दीक्षा भगवान दत्तात्रेय की कृपा कैसे प्राप्त करें। चैनल पर बहुत सारे वीडियो हैं, वक्ता उत्तर देते हैं। वज्र कवच का पाठ कीजिए; आपको तुरंत समझ में आ जाएगा। उसमें दीक्षा की कोई अनिवार्यता नहीं है। भगवान दत्तात्रेय के वज्र कवच का पाठ करिए — सबसे श्रेष्ठ।
भ्रांति: वैष्णवों को भैरव या हनुमान की पूजा नहीं करनी चाहिए
कृष्ण ने स्वयं भीम को काल भैरव के पास भेजा
क्या दोनों की पूजा कर सकते हैं, इस पर वक्ता कहते हैं कि बिना किसी संशय के दोनों की पूजा कीजिए। कुछ "महान आत्माएँ" कहती हैं कि भैरव जी की पूजा की कोई आवश्यकता नहीं; कुछ वैष्णव, यहाँ तक कि इस्कॉन के प्रसिद्ध संत, हनुमान जी की पूजा से भी मना कर देते हैं, भैरव की तो बात ही दूर — ऐसे लोगों से बचिए। यदि कृष्ण को, जो साक्षात परमेश्वर हैं, इन शक्तियों की आवश्यकता ही न थी, तो उन्होंने भीम को काल भैरव की प्रसन्नता के लिए तप करके उन्हें हस्तिनापुर लाने क्यों भेजा (दिल्ली के किलकारी भैरव); पांडवों को हनुमान, शिव, बगलामुखी और — देवी भागवत में — विंध्यवासिनी की उपासना का निर्देश क्यों दिया? फिलॉसफी अपनी जगह है, वे कहते हैं; साधनात्मक विषय अपनी जगह, और जो दोनों को मिला देते हैं वही गड़बड़ करते हैं।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।