बंद हुए साधना अनुभव और देव श्राप से मुक्ति का उपाय
दिव्य अनुभव रुकने के कारण और उपाय पर नोट्स।
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साधना में मिलने वाले दिव्य अनुभव अचानक क्यों बंद हो जाते हैं?
रहस्य दूसरों को बताने से दोष लगता है
वक्ता कहते हैं कि साधक को जो दिव्य घटनाएँ और संकेत मिलते हैं, वे देवता, उनकी योगिनियों (योगिनी) या जिसकी भी उपासना हो रही है उनकी कृपा (कृपा) से आते हैं, और जब साधक उन रहस्यों को दूसरों को चटकारे ले-लेकर सुनाने लगता है तो वे बंद हो जाते हैं। इसे वे एक दोष (दोष) कहते हैं जो साधक अपनी ही गलती से लगा लेता है — प्रायः उस अति आत्मविश्वास के कारण जो बहुत अनुभव होने पर आ जाता है। दोष लगने के बाद अनुभव और देव कृपा तब तक रुके रहते हैं जब तक परिहार न किया जाए।
वक्ता समस्या से शुरू करते हैं: साधना में जो अनुभव हो रहे थे, वे इसलिए बंद हो गए क्योंकि साधक ने उन्हें लोगों को बता दिया। वे कहते हैं कि साधक को यह जानकारी नहीं थी कि जो अनुभव उसे मिल रहे थे, वे देव कृपा (कृपा) से — भगवती के द्वारा, उनकी योगिनियों (योगिनी) के द्वारा, या जिसकी भी वह उपासना-साधना कर रहा था उनके द्वारा — आ रहे थे। कुछ दिव्य घटनाएँ और दिव्य संकेत हो रहे थे, वे कहते हैं, लेकिन साधक की अपनी ही गलती से, जब वह उन रहस्यों को दूसरे लोगों को बताने लगा और बहुत चटकारे ले-लेकर सुनाने लगा, तो वे घटनाएँ होनी बंद हो गईं और दोष (दोष) लग गया। वे जोड़ते हैं कि जिस भी देवी-देवता की साधना हो, यह गलती प्रायः अपने आत्मबल से उपजे अति आत्मविश्वास से होती है: बहुत अनुभव होने लगते हैं, तो हम दूसरों को बताने लगते हैं। वे कहते हैं कि ऐसा कैसे और क्यों होता है, यह इसी चैनल पर अन्य वीडियो में विस्तार से बताया गया है; यह चर्चा परिहार के बारे में है — दोष कैसे हटे ताकि अनुभव और देव कृपा दोबारा आरंभ हो सके।
देवता के साथ लगे दोष के परिहार हेतु नींबू की माला का अर्पण
108 नींबू, क्षमा श्लोक और संकल्प
वक्ता कहते हैं कि ऐसा दोष लगने पर सबसे पहला काम यह है कि उस देवता की विशेष तिथि (तिथि) पर — काली (काली) या उनके किसी भी स्वरूप के लिए अमावस्या (अमावस्या) — उनके मंदिर जाकर 108 नींबू की माला बनाई जाए। प्रत्येक नींबू पर पहले अष्टगंध (अष्टगंध) से और फिर लाल सिंदूर (सिंदूर) से तिलक किया जाता है और हर नींबू पर एक बार "या देवी सर्वभूतेषु क्षमा रूपेण संस्थिता नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः" पढ़ा जाता है। फिर साधक स्वयं संकल्प (संकल्प) लेता है कि देवता प्रसन्न हों और दोष का परिहार करें, और माला स्वयं पहनाता है या पुजारी से पहनवाता है। नींबू की माला न पहना सकें तो उसी मंत्र के साथ 108 लाल पुष्पों की माला।
वक्ता कहते हैं कि सबसे पहला कार्य यह है। जिस भी देवी-देवता की साधना-उपासना हो रही थी, उनकी विशेष तिथि (तिथिचंद्र पंचांग की एक तिथि — कुछ प्रतिमाओं (जैसे शिवलिंग) को प्रतिदिन स्नान आवश्यक है, जबकि अन्य को केवल अपने निर्धारित साप्ताहिक दिन या तिथि पर।) पर जाना है। उनका उदाहरण भगवती काली (काली) या उनके किसी भी स्वरूप का है: अनुभव हो रहा था, साधक ने किसी को बता दिया, दोष लग गया और अनुभव बंद हो गया — तो अमावस्या (अमावस्या) तिथि आने पर काली मंदिर जाकर 108 नींबू की माला बनाई जाती है। प्रत्येक नींबू पर तिलक किया जाता है — पहले अष्टगंध (अष्टगंधआठ सुगंधित द्रव्यों से बना लेप, उपाय व पूजा विधियों में सिंदूर से पूर्व तिलक के रूप में लगाया जाता है।) से, फिर लाल सिंदूर (सिंदूरसिंदूर चूर्ण, यहाँ भैरव को अर्पण हेतु उल्टे त्रिकोण मंडल को बनाने में प्रयुक्त, देवी हेतु बनाए जाने वाले रोली-अष्टगंध त्रिकोण के स्थान पर।) से — और साथ में "या देवी सर्वभूतेषु क्षमा रूपेण संस्थिता नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः" मंत्र पढ़ा जाता है। वे कहते हैं कि एक-एक बार मंत्र पढ़ते जाएँ और तिलक करते जाएँ, नींबू दर नींबू। "क्षमा रूपेण" पर देवता को सीधे संबोधित किया जाता है। उसके बाद माला संकल्प (संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है।) के साथ भगवती को अर्पित की जाती है, और वे कहते हैं कि संकल्प स्वयं ही लेना है: "हे भगवती, हमसे जो भी अपराध हुआ जिसके कारण हमारी साधना में यह दोष उत्पन्न हुआ, उस दोष के परिहार हेतु और आपकी प्रसन्नता के लिए हम यह नींबू की माला समर्पित करते हैं; कृपया प्रसन्न हों और हमारी साधना में उपस्थित दोष का परिहार करें।" ऐसा बोलकर माला स्वयं पहना सकें तो पहना दें, या पुजारी-पंडित जी को देकर पहनवा दें। यदि नींबू की माला न पहना सकें, तो वे कहते हैं, 108 लाल पुष्पों की माला पहनाएँ; मंत्र वही रहेगा।
माला के बाद घी के दीपक और योगिनी भोग, देवता के अनुसार गिनती
काली के लिए तेरह, संदेह हो तो कम से कम ग्यारह
माला पहनाने के बाद, वक्ता कहते हैं, वहाँ कम से कम 13 घी के दीपक जलाए जाते हैं, हर दीपक के सामने एक लाल पुष्प और पान के पत्ते पर कुछ मीठा रखा जाता है, और दोष परिहार हेतु देवता की योगिनियों (योगिनी) से प्रार्थना की जाती है — काली (काली) के लिए 13 योगिनियाँ। भोग स्थानों की संख्या देवता के अनुसार बदलती है: दुर्गा (दुर्गा) के लिए 9, शिव (शिव) के लिए 12, गणपति (गणेश) के लिए 4, हनुमान (हनुमान) के लिए 11, बगलामुखी (बगलामुखी) के लिए 8, मातंगी (मातंगी) स्वरूप के लिए 9, भैरव (भैरव) के लिए 8। गिनती पर न जाना हो तो उस दिन मंदिर में कम से कम 11 जगह भोग और 11 दीपक।
देवता को माला पहनाने के बाद, वक्ता कहते हैं, वहाँ कम से कम 13 घी के दीपक प्रज्वलित किए जाते हैं। हर दीपक के सामने एक-एक लाल पुष्प रखा जाता है, और हर एक के सामने पान के पत्ते पर कुछ मीठा — कोई भी मिठाई — रखी जाती है। इसमें भी दोष परिहार हेतु देवता की योगिनियों (योगिनी) से प्रार्थना की जाती है; काली (काली) के लिए 13 योगिनियों की प्रार्थना होती है। उसी प्रकार, वे कहते हैं, भगवती दुर्गा (दुर्गा) के लिए 9, भगवान शिव (शिव) के लिए 12, गणपति (गणेश) के लिए 4 रहेगा। अन्य देवी-देवता — जैसे हनुमान (हनुमान) जी की साधना कर रहे थे और उसमें दोष लगा — तो 11 रहेगा। भगवती बगलामुखी (बगलामुखी) के लिए 8, जगदंबा के मातंगी (मातंगी) स्वरूप के लिए 9, और भैरव (भैरव) जी के लिए 8 जगह भोग लगेगा। इस प्रकार स्वरूप भेद के अनुसार भोग अलग-अलग होते हैं। सामान्य नियम के रूप में, वे कहते हैं, कम से कम 11 जगह भोग अवश्य लगाना है। गिनती में बिल्कुल न जाना हो तो उस दिन — देवता की तिथि को — मंदिर में कम से कम 11 जगह भोग और 11 दीपक जलाएँ।
देवता के अनुसार प्रथम क्षमा पूजन की तिथि, और उसके बाद एक मास का नित्य जप
उस तिथि से अगले मास की उसी तिथि तक
वक्ता कहते हैं कि मंदिर में प्रथम क्षमा पूजन देवता की अपनी तिथि (तिथि) पर होता है: हनुमान (हनुमान) जी के लिए पूर्णिमा, शिव (शिव) जी के लिए प्रदोष, त्रयोदशी या पंचमी (पंचमी), बगलामुखी (बगलामुखी) के लिए शुक्ल पक्ष अष्टमी (अष्टमी), दुर्गा (दुर्गा) जी के लिए अष्टमी या नवमी (नवमी), और इसी प्रकार अन्य देवताओं के लिए। उस दिन से अगले महीने वही तिथि आने तक — काली (काली) के लिए अमावस्या (अमावस्या) से अमावस्या तक — घर में प्रतिदिन दीपक जलाकर उसी क्षमा मंत्र का 108 बार पाठ किया जाता है।
वक्ता बताते हैं कि मंदिर वाला पूजन किस दिन होता है। हनुमान (हनुमान) जी का दोष हो तो पूर्णिमा के दिन; शिव (शिव) जी का हो तो प्रदोष, त्रयोदशी या पंचमी (पंचमी) के दिन; भगवती बगलामुखी (बगलामुखी) का हो तो शुक्ल पक्ष अष्टमी (अष्टमीपक्ष की आठवीं तिथि, जो शाक्त कर्मों के लिए विशेष अनुकूल मानी जाती है।) के दिन; भगवती दुर्गा (दुर्गा) जी का हो तो अष्टमी या नवमी (नवमीपक्ष की नवीं तिथि, जिस पर नवरात्र का अनुष्ठान पूर्ण होता है।) के दिन। इसी प्रकार, वे कहते हैं, अन्य देवी-देवताओं की तिथि (तिथिचंद्र पंचांग की एक तिथि — कुछ प्रतिमाओं (जैसे शिवलिंग) को प्रतिदिन स्नान आवश्यक है, जबकि अन्य को केवल अपने निर्धारित साप्ताहिक दिन या तिथि पर।) पर जाकर क्षमा के लिए प्रथम पूजन करें। उस दिन से आरंभ करके अगली उसी तिथि तक — काली (काली) जी की हो तो अमावस्या (अमावस्या) से अमावस्या तक — अब प्रत्येक दिन घर में दीप प्रज्वलित करके भगवती के इसी मंत्र का 108 बार पाठ किया जाता है।
परिहार मास में प्रतिदिन शिव का दुग्ध अभिषेक
छोटे पीतल के पात्र में दूध-मिश्री से भी
नित्य दीपक और जप के साथ, वक्ता कहते हैं, एक काम और करना है: उसी तिथि (तिथि) से प्रतिदिन शिव (शिव) मंदिर जाकर दूध से अभिषेक (अभिषेक) करें — छोटे से पीतल के पात्र में दूध और मिश्री भरकर भी पर्याप्त है — इस संकल्प (संकल्प) के साथ कि "हे शिव, हे महादेव (महादेव), दोष के परिहार हेतु मैं आपको दूध से अभिषेक कर रहा हूँ; कृपया प्रसन्न हों और दोष का परिहार करें।" ऐसा करने से, वे कहते हैं, शीघ्र ही इस श्राप (शाप) और दोष से मुक्ति मिल जाती है। वे जोड़ते हैं कि इसके अलावा और भी विधान हैं, पर अनुभव में फँसे नए साधक को उन्हें बताना उचित नहीं होगा।
वक्ता कहते हैं कि नित्य दीपक और 108 पाठ के साथ एक काम और करना होगा। उसी तिथि (तिथिचंद्र पंचांग की एक तिथि — कुछ प्रतिमाओं (जैसे शिवलिंग) को प्रतिदिन स्नान आवश्यक है, जबकि अन्य को केवल अपने निर्धारित साप्ताहिक दिन या तिथि पर।) से प्रतिदिन शिव (शिव) जी के मंदिर जाकर कम से कम एक छोटे से पात्र में ही सही — पीतल के पात्र में — दूध भरकर, उसमें मिश्री भरकर, उससे अभिषेक (अभिषेकजल और अन्य निर्धारित द्रव्यों से देवता की प्रतिमा या प्रतीक का विधिवत स्नान कराना।) करना है। संकल्प (संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है।) वही है: "जो दोष है उसके परिहार हेतु हे शिव, हे महादेव (महादेव), मैं आपको यह दूध से अभिषेक कर रहा हूँ; कृपया प्रसन्न हों और उस दोष का परिहार करें।" वे कहते हैं कि यह वाक्य साधक स्वयं अपने लिए बोलता है — पुरुष हो या स्त्री। इस प्रकार यह पूजन करने से, वे कहते हैं, शीघ्र ही इस श्राप (शाप) से, इस दोष से मुक्ति मिल जाएगी। वे जोड़ते हैं कि इसके सिवाय अन्य विधान भी हैं, लेकिन जो नया साधक अभी अनुभव में फँसा हुआ है उसे वे सब नहीं करने चाहिए, और उन्हें बताना उचित नहीं होगा — इसलिए वे उन्हें नहीं बताते।
जीव सेवा और पूजा बिना प्रदर्शन के करनी है
हर प्रदर्शन पुण्य का क्षय करता है
वक्ता कहते हैं कि परिहार के साथ जीव सेवा (जीव सेवा) अवश्य करनी है, पर दिखाकर कभी नहीं — बोल-बोलकर नहीं, मछलियों को दाना डालने की सेल्फी, वीडियो या रील नहीं, Facebook, Instagram या WhatsApp स्टेटस नहीं, मंदिर की सेल्फी नहीं। वे कहते हैं कि प्रदर्शन से दूर रहने पर ही साधना में कुछ मिलता है, क्योंकि जितना प्रदर्शन उतना पुण्य (पुण्य) का क्षय; इसलिए जो भी करें, पूजन-पाठ, कुछ मत दिखाइए। वे कहते हैं कि चैनल पर वे जो दिखाते हैं वह सिखाने के लिए अलग से व्यवस्था करके किया जाता है और बाद में विसर्जित कर दिया जाता है, और अपनी प्रमुख पूजा वे कभी नहीं दिखाते। यह सब एक मास तक करने से, वे कहते हैं, क्षमा प्राप्त होती है।
परिहार के सिवाय, वक्ता कहते हैं, जीव सेवा (जीव सेवा) जरूर करें — पर जब करें तो उसे भी दिखाकर नहीं करना है। वे कहते हैं कि कुछ लोग नदी-तालाब में मछलियों को दाना डालने जाते हैं तो बोल-बोलकर जाते हैं, सेल्फी खींचते हैं, वीडियो और रील बनाते हैं, Facebook-Instagram पर डालते हैं, WhatsApp स्टेटस में लगाते हैं। यह नहीं करना है। मंदिर जा रहे हैं तो मंदिर की सेल्फी मत डालिए। प्रदर्शन से दूर होने पर ही, वे कहते हैं, साधना में कुछ प्राप्त होगा; जितना प्रदर्शन करेंगे उतना पुण्य (पुण्य) का क्षय होगा। पुण्य का क्षय न हो, इसके लिए प्रदर्शन करना बंद कर दें। जो भी कर रहे हों — पूजन, पाठ — मत दिखाइए। वे इस आपत्ति का उत्तर पहले ही दे देते हैं कि इस चैनल पर तो बहुत सारी चीजें करके दिखाई जाती हैं: वे कहते हैं कि जो वहाँ दिखाया जाता है वह उनकी अपनी पूजा का हिस्सा नहीं होता। दर्शकों के करने के लिए वे अलग से पूरी व्यवस्था करते हैं, करके दिखाते हैं, फिर उसका विसर्जन कर दिया जाता है; 99% चीजें दिखाने के लिए अलग से व्यवस्था करके की जाती हैं। अपनी प्रमुख पूजा वे कभी नहीं दिखाते। तो दर्शक को — जिसे वैसे भी किसी को नहीं बताना है — अपनी साधना कभी नहीं दिखानी चाहिए। ये सभी कार्य महीने भर — एक मास तक इस प्रकार स्तुति-पूजन — करने पर, वे कहते हैं, क्षमा प्राप्त होती है।
महादेव के लिए रुद्राष्टक और देवी के किसी भी स्वरूप के लिए क्षमा श्लोक
किस देवता के साथ कौन सा पाठ
यह पूछे जाने पर कि दोष भगवती का न होकर महादेव (महादेव) का हो तो क्या करें, वक्ता कहते हैं कि रुद्राष्टक (रुद्राष्टकम्) का पाठ प्रतिदिन कम से कम 27 बार करना चाहिए। भगवती के किसी भी स्वरूप के लिए परिहार "क्षमा रूपेण संस्थिता" श्लोक से किया जाता है।
वक्ता कहते हैं: मान लें कि बताया गया परिहार भगवती का था — अगर दोष हनुमान (हनुमान) जी का हो, या महादेव (महादेव) का हो तो क्या करें? महादेव के लिए, वे कहते हैं, रुद्राष्टक (रुद्राष्टकम्) का पाठ प्रतिदिन कम से कम 27 बार करना चाहिए। भगवती के किसी भी स्वरूप के लिए परिहार "क्षमा रूपेण संस्थिता" से किया जाता है — वही क्षमा श्लोक जो नींबू की माला पर और नित्य जप में प्रयुक्त होता है।
रुके हुए अनुभव लौटाने के लिए उस देवता के अपने इष्ट की पूजा
जिनकी बात वह देवता मानते हैं, उनकी शरण
वक्ता कहते हैं कि यदि अपराध हनुमान (हनुमान) या भैरव (भैरव) जैसे देवता का हुआ हो और पाठ से मिलने वाले अनुभव बंद हो गए हों, तो उस देवता के अपने इष्ट (इष्ट देवता) की — जिनके वे आराध्य हैं और जिनकी बात वे मानते हैं — प्रार्थना की जाती है। हनुमान जी के लिए श्री राम की स्तुति और उनसे दोष से मुक्त करने का निवेदन (श्री राम स्तुति, राम रक्षा स्तोत्र, 108 नाम) तथा सीताराम जी और भगवती अंजना की सेवा; गणपति (गणेश) के लिए साथ में भगवती पार्वती (पार्वती) की पूजा; भैरव जी के लिए भगवती काली (काली) की अवश्य पूजा और "क्षमा रूपेण संस्थिता", जिनके द्वारा अपराध से मुक्ति मिलती है और अनुभव पुनः आरंभ होते हैं। इसे वे सामान्य विधान कहते हैं जिससे विशेष कृपा (कृपा) फिर मिलती है — गुप्त रखकर, बिना दिखाए।
वक्ता कहते हैं कि यदि अपराध किसी अन्य स्वरूप का हुआ हो — भैरव (भैरव) जी का या हनुमान (हनुमान) जी का — तो तरीका बदलता है। हनुमान जी का कोई पाठ कर रहे थे, अनुभव हो रहे थे और अब बंद हो गए हैं, तो श्री राम जी की स्तुति करें: राम जी से निवेदन करें, "हे प्रभु श्री राम, आप इस दोष से हमें मुक्त कर दीजिए," और उनकी स्तुति करें। श्री राम स्तुति कर सकते हैं, राम जी का राम रक्षा स्तोत्र इत्यादि कर सकते हैं, उनके 108 नामों का पाठ अलग से कर सकते हैं। सीताराम जी की और भगवती अंजना की पूजा, सेवा और उपासना करने पर, वे कहते हैं, इस दोष से परिहार मिलता है। गणपति (गणेश) की साधना कर रहे थे तो साथ में भगवती पार्वती (पार्वतीहिमालय की पुत्री और शिव की पत्नी; तंत्र का बहुत सा उपदेश उन्हीं के प्रश्नों पर कहा गया है।) की भी करनी चाहिए। सिद्धांत, वे कहते हैं, यह है: उस देवता के जो इष्ट (इष्ट देवता) हों, जो आराध्य हों, या जिनकी बात वे मानते हों — भैरव जी की कर रहे हों तो भैरव जी के लिए भगवती काली (काली) की भी अवश्य करें। भगवती काली की सेवा-पूजा करके "क्षमा रूपेण संस्थिता" करने पर उनके द्वारा उस अपराध से मुक्ति मिलती है और अनुभव पुनः आरंभ हो जाते हैं। अंत में वे इसे सामान्य विधान कहते हैं: इसे करने से देवता की विशेष कृपा (कृपा) पुनः प्राप्त होती है — लेकिन गुप्त रखकर करें, दिखाना नहीं है।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।