पितर अशुद्ध कैसे होते हैं, और उसका उपाय
पितरों की अशुद्धि के कारण और उपाय पर व्याख्या
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पितर कहाँ रहते हैं और देहरहित पितर अशुद्ध कैसे हो सकते हैं
वायवीय शरीर, चौखट पर स्थान
वक्ता कहते हैं कि जिस घर में बार-बार परेशानी आती है, वहाँ तंत्र जानने वाला प्रायः बताता है कि आपके पितृ अशुद्ध हो गए हैं, और वे पूछते हैं कि यह कैसे संभव है जब पितरों का शरीर पंच महाभूतों से बना ही नहीं है। वे समझाते हैं कि पितरों का शरीर वायवीय होता है, उनका प्रमुख स्थान घर के प्रवेश द्वार के पास कुलदेवी और कुल भैरव के साथ होता है, और परिवार का हर मांगलिक कार्य उन्हीं की कृपा से होता है। इसी अधिकार के कारण उन तक पहुँचा और उन्हें अशुद्ध किया जा सकता है — और महाविद्या की कृपा से दिव्य नेत्र पाने वाले ही इसे सही देख पाते हैं।
वक्ता एक आम अनुभव से शुरू करते हैं: घर में परेशानियाँ आती रहती हैं, लोग किसी तंत्र जानने वाले के पास जाते हैं, और वह पूछा-पूजा करके बताता है कि आपके पितृ अशुद्ध हैं, इसी कारण परेशानी है। फिर वे वह प्रश्न रखते हैं जिसका उत्तर देना है — यह अशुद्धता है क्या, और पितर अशुद्ध हो ही कैसे सकते हैं जब उनका शरीर पंच महाभूतों से बना नहीं है? वे कहते हैं कि सबसे पहले यह समझिए कि पितरों का स्थान कहाँ है। उनका प्रमुख स्थान घर के प्रवेश द्वार के पास होता है। कुल की शक्ति — भगवती कुलदेवी और कुल भैरव — वहीं होते हैं, और कुल के पितरों का स्थान भी उन्हीं के पास होता है; प्रवेश द्वार पर सबसे पहले अधिकार उन्हीं का है। वे जोड़ते हैं कि कुल में कोई बहुत अच्छा और विशिष्ट साधक हो तो भगवती की कृपा से मृत्यु के बाद उसे भी कुल भैरव का स्थान मिल जाता है। वे कहते हैं कि जो लोग तंत्र और शुद्धि के द्वारा महाविद्या की कृपा से दिव्य नेत्र प्राप्त कर लेते हैं, वही इन विषयों को सही ढंग से देख पाते हैं। अशुद्धि कैसे संभव है, इस पर: पितरों का शरीर वायवीय शरीर है, और घर-परिवार के हर मांगलिक कार्य पर उनका पूर्ण अधिकार होता है — मांगलिक कार्य उन्हीं की कृपा और आशीर्वाद से होते हैं। वे कहते हैं कि इसी स्थिति के कारण जब कोई घर में अशुद्ध और क्षुद्र शक्तियाँ घुसाना चाहता है तो निशाना पितर ही बनते हैं; इसके ठोस तरीके वे आगे कारणों के रूप में गिनाते हैं।
शत्रु द्वारा चौखट बाँधने से होने वाली पितृ अशुद्धि
द्वार कीलित या अशुद्ध, तो पितर भी अशुद्ध
वक्ता पहला कारण बताते हैं: जो व्यक्ति ईर्ष्या से घर में अशुद्ध और क्षुद्र शक्तियों का प्रवेश कराना चाहता है, उसे सबसे पहले चौखट का बंधन करना पड़ता है — प्रवेश द्वार को कीलित या अशुद्ध करना — और द्वार अशुद्ध होते ही 99% मामलों में पितृ अशुद्ध हो जाते हैं। अशुद्ध करने का अर्थ वे यह बताते हैं कि गौ माता से जुड़ा कोई निषिद्ध पदार्थ — उनका मांस या मृत्यु के बाद प्राप्त शरीर का कोई अंग — श्मशानी विद्या, मंत्र या तंत्र से चौखट पर फेंक दिया जाए या स्पर्श करा दिया जाए, जिसमें प्रायः भगतवाल लोग सहयोग करते हैं। इसके बाद पितर किसी मांगलिक कार्य में साथ नहीं दे पाते; घर पूजा-पाठ करता रहता है पर अचानक उत्पात शुरू हो जाता है। वे कहते हैं कि शत्रु यह तब करते हैं जब परिवार उन्नति कर रहा हो या विवाह आने वाला हो।
वक्ता कहते हैं कि पितृ अशुद्ध होने का पहला तरीका यह है कि कोई व्यक्ति ईर्ष्यावश या किसी कारण से आपके साथ धोखा करना चाहता है और आपके घर में अशुद्ध और क्षुद्र शक्तियों का प्रवेश कराने की कोशिश करता है। इसमें सफल होने के लिए, वे कहते हैं, उसे सबसे पहले चौखट का बंधन करना पड़ेगा — यानी आपके प्रवेश द्वार को कीलित या अशुद्ध करना पड़ेगा — और प्रवेश द्वार अशुद्ध होते ही 99% मामलों में पितर अशुद्ध हो जाते हैं। अशुद्ध करने का अर्थ वे उदाहरण से समझाते हैं। सनातन संस्कृति में भगवती गौ माता को साक्षात देवी का स्वरूप माना गया है। उनसे जुड़ा कोई भी निषिद्ध पदार्थ — उनका मांस, या मृत्यु के बाद प्राप्त शरीर का कोई अवयव — अगर किसी श्मशानी विद्या से चौखट पर फेंक दिया जाए, या मंत्र या उस प्रकार के तंत्र से चौखट से स्पर्श भी करा दिया जाए, तो सबसे पहले कुल के पितर अशुद्ध हो जाएँगे। इसके बाद, वे कहते हैं, पितर किसी शुभ और मांगलिक कार्य में आपका साथ देने में सक्षम नहीं रहते। यह कौन करता है, इस पर वे कहते हैं: नीच प्रकृति के लोग, जो ईर्ष्या में इतना गिर चुके हैं कि ऐसे कार्य करने में उन्हें जरा भी डर नहीं लगता, मानवता या अपने धर्म के प्रति जरा भी संवेदनशील नहीं हैं — और ऐसे जानकार और भगतवाल लोग भी होते हैं जो इस कृत्य में उनका सहयोग करते हैं। लक्षण, वे कहते हैं, यह है कि आप पहले की तरह पूजन-पाठ कर रहे हैं, फिर भी घर में एकाएक बहुत उत्पात शुरू हो जाता है। समय के बारे में: शत्रु यह तब करते हैं जब आप उन्नति की ओर बढ़ रहे हों या घर में विवाह जैसा कोई पर्व पड़ा हो — विशेषकर शादी-विवाह के समय, वे कहते हैं, ऐसे लोग यह कृत्य जरूर करते हैं।
कुल परंपरा छोड़कर गई बेटी को घर में लाने से होने वाली पितृ अशुद्धि
बाहर मिलिए; प्रवेश से पहले प्रायश्चित
वक्ता का दूसरा कारण है घर के किसी बेटे या बेटी का ऐसे कुल में विवाह कर लेना जो आपकी कुल परंपरा के पूरे विपरीत हो। उनका उदाहरण: सनातन घर की बेटी, जहाँ वैष्णव या दक्षिणाचार पद्धति से पूजन होता है, किसी मुस्लिम लड़के के साथ चली जाए और बाद में परिवार तरस या मोह में उसे घर ले आए — तब, वे कहते हैं, 95% से भी ज्यादा निश्चित है कि पितृ अशुद्धता के कारण कुपित होंगे, क्योंकि वहाँ धर्म के विरुद्ध जो होता है उससे उसका चरित्र और शरीर पूरी तरह अशुद्ध हो चुका होता है, और उस आभामंडल के साथ चौखट लाँघते ही अशुद्धि बच्चों और वंशजों पर पड़ती है। उनका नियम: ऐसे व्यक्ति को घर में प्रवेश न दें; दया आए तो बाहर मिलें। अगर वह सचमुच लौटना चाहे तो पहले उसे ऐसे तीर्थ ले जाएँ जहाँ गंगा जी शुद्ध हैं — हरिद्वार, रुद्रप्रयाग — ब्राह्मणों से प्रायश्चित्त विधान कराएँ (वे गंगा जी की बालू सात दिन खिलाने का उल्लेख करते हैं), और कम से कम सवा महीने वहाँ विधि-विधान से पूजन कराने के बाद ही घर लाएँ; तब कोई दोष नहीं लगता।
वक्ता का दूसरा कारण यह है कि आपके ही घर का कोई व्यक्ति — लड़की हो या लड़का — ऐसे कुल में जाकर विवाह कर ले जो आपकी कुल परंपरा के पूरे विपरीत हो। अगर बेटी आपके कुल के विधि-विधान छोड़कर चली जाए और बाद में लौटकर रहना चाहे, और आप समाधान करके उसे घर में ले आएँ, तो दिक्कत होगी। वे बात स्पष्ट रखते हैं: सनातन घर की लड़की, जहाँ वैष्णव या दक्षिणाचार पद्धति से पूजन-पाठ होता है, किसी मुस्लिम लड़के के साथ चली गई। बाद में किसी कारण से आप उस पर तरस या मोह खाकर उसे घर में प्रवेश कराते हैं, तो — वे कहते हैं 95% कहना भी कम होगा — पूरा चांस है कि आपके पितृ अशुद्धता के कारण कुपित होंगे। उनका तर्क: जब स्त्री घर का द्वार लाँघकर उस तरह विवाह कर लेती है, तो वहाँ उसके साथ जो होता है, जो अमानवीयता और हमारे धर्म-संस्कृति के विरुद्ध कार्य होते हैं, उनसे उसका चरित्र और शरीर पूरी तरह अशुद्ध हो जाता है। उस आभामंडल के साथ जब वह आपकी चौखट लाँघेगी तो अशुद्धता आएगी और उसका पूरा प्रभाव घर के बच्चों और वंशजों पर पड़ेगा। इसलिए उनका नियम है: ऐसा कृत्य करके घर छोड़ने वालों को घर में प्रवेश नहीं देना है। तरस नहीं खाना है — गलती उनकी है, छोड़ दीजिए। अगर मानवता और दया आए तो उनसे बाहर मिलिए। अगर वह स्वयं अपराध मानकर लौटना चाहे, तो पहले घर न लाएँ; उसे तीर्थ स्थान ले जाकर विधि-विधान से शुद्धिकरण कराएँ। वे कहते हैं कि कहा जाता है कि गंगा जी की बालू सात दिन तक खिलाई जाती है, क्योंकि गंगा जी की मिट्टी में औषधीय गुण है। इसलिए जहाँ गंगा जी शुद्ध हैं — हरिद्वार, रुद्रप्रयाग — वहाँ ले जाकर ऐसे ब्राह्मणों से विचार करके पूरा विधि-विधान और प्रायश्चित्तकिसी भारी कर्म — जैसे शत्रु की मृत्यु में परिणत होने वाला षट्कर्म — के कर्मभार को संतुलित करने हेतु किया जाने वाला प्रायश्चित्त अनुष्ठान। विधान कराएँ, और संभव हो तो कम से कम सवा महीने तक वहाँ विधि-विधान से पूजन-पाठ कराएँ। तब जाकर उसे घर लाएँ, तो आपको कोई दोष नहीं लगेगा।
कुल के नियम तोड़ने वाली बहू से होने वाली पितृ अशुद्धि
मांस, पूजा की उपेक्षा, रजस्वला स्पर्श
वक्ता का तीसरा कारण है घर के बेटे का ऐसी स्त्री से विवाह — जरूरी नहीं कि मुस्लिम लड़की हो, वे कहते हैं, कोई भी युवती — जो पूरी तरह कुल परंपरा के विपरीत चलती हो। उनके उदाहरण: आपके घर में मांस नहीं खाया जाता, पितृ स्थान और देवी-देवता इसका निषेध करते हैं, पर वह बिना मांस के रह नहीं सकती; झाड़ू-पोछा नहीं करेगी, पूजा समय से नहीं या करेगी ही नहीं, या शुद्धि-शौच (अशौच) का ध्यान नहीं रखेगी; बहुत आधुनिक होने से रजस्वला अवस्था को नहीं मानेगी और उसी अवस्था में पितरों का स्थान, देव प्रतिमाएँ छू लेगी या देव स्थान में चली जाएगी। इससे, वे कहते हैं, पितरों को कष्ट और अशुद्धि होती है और फिर वे परिवार को कष्ट देते हैं — और यह तब भी लागू है जब विवाह आपने स्वयं कराया हो।
वक्ता का तीसरा कारण घर के लड़के — कुल के वंशज — का ऐसी स्त्री से विवाह है जो पूरी तरह आपकी कुल परंपरा के विपरीत चलती हो। वे ज़ोर देते हैं कि जरूरी नहीं कि वह मुस्लिम लड़की हो: कोई भी स्त्री, कोई भी युवती, जिसका आचरण परिवार की परंपरा के उलट हो। उनके उदाहरण: आपके घर में मांस नहीं खाया जाता; वहाँ आपके पितृ का स्थान है, जो आपके पूर्वजों द्वारा दिया गया है; आपके देवी-देवता ऐसे पूजित हैं जहाँ किसी भी प्रकार के मांस का निषेध है — और वह बिना मांस के रह ही नहीं सकती। चाहे वह स्वयं आई हो या आपने ही अपने बेटे का विवाह उससे कराया हो, वह कुल परंपरा मानने को तैयार ही नहीं है। वह घर में झाड़ू-पोछा नहीं लगाएगी, पूजा-पाठ समय से नहीं करेगी, या करेगी ही नहीं; करेगी भी तो शुद्धता-अशुद्धता, शौच (अशौचपरिवार में जन्म या मृत्यु जैसे अवसरों पर उत्पन्न अशुद्धि की स्थिति, जिसके दौरान कुछ अनुष्ठान व पाठ वर्जित रहते हैं।) का ध्यान नहीं रखेगी। वे जोड़ते हैं कि आजकल बहुत अधिक मॉडर्न भी देखने को मिलती हैं — आधुनिक विचारों वाली, रजस्वला अवस्था को भी नहीं मानेंगी, और उसी अवस्था में पितरों-पूर्वजों के स्थान छू लेंगी, देव प्रतिमाओं को स्पर्श कर लेंगी या देव स्थानों में चली जाएँगी। इससे भी, वे कहते हैं, पितर काफी रुष्ट होते हैं, क्योंकि इससे उन्हें कष्ट होता है, अशुद्धि होती है — और अशुद्ध होने पर वे कहीं न कहीं आपको कष्ट पहुँचाएँगे। वे यह कहकर समाप्त करते हैं कि प्रमुख रूप से यही वे प्रकार हैं जिनसे कहा जाता है कि पितर अशुद्ध हो जाते हैं।
यात्रा या तीर्थ में अनजाने में लगने वाली पितृ अशुद्धि
चर्म रोग सबसे बड़ा लक्षण
वक्ता एक और विशेष कारण जोड़ते हैं जो अनजाने में होता है: घर का कोई सदस्य यात्रा में बिना जाने किसी निषिद्ध वस्तु को छू ले, कोई और व्यक्ति (अनजाने में या जानबूझकर) ऐसी चीज़ उसके शरीर से स्पर्श करा दे, या तीर्थ क्षेत्र में लोग जो गलत प्रकार का उतारा छोड़ जाते हैं उसे लाँघ ले — और उसी अवस्था में घर में प्रवेश कर जाए। इससे अनजाने में ही पितृ अशुद्ध हो जाते हैं, और सबसे बड़ा लक्षण, वे कहते हैं, यह है कि शरीर में त्वचा से जुड़े रोग बहुत बढ़ने लगते हैं। उनका नियम: जब भी कोई कहीं से लौटे और घर में किसी को बहुत अधिक चर्म समस्या हो जिसका कोई विशेष कारण न मिले, तो पितृ से जुड़े उपाय करने चाहिए।
मुख्य कारणों के अलावा वक्ता एक और विशेष कारण बताते हैं जो अनजाने में होता है। घर का कोई सदस्य यात्रा में कहीं गया और बिना किसी जानकारी के किसी निषिद्ध वस्तु को स्पर्श कर दिया; या किसी और व्यक्ति ने उसकी जानकारी के बिना ऐसी चीज़ों से उसके शरीर को स्पर्श करा दिया जिसमें निषिद्ध पदार्थ हो — या जानबूझकर करा दिया। या, वे कहते हैं, आप तीर्थ क्षेत्र में जाते हैं, और वहाँ बहुत बार लोग गलत प्रकार का उतारा करके छोड़ जाते हैं — अगर आपने वह सब लाँघ दिया और उसी अवस्था में घर में प्रवेश कर गए, तो अनजाने में ही पितृ को अशुद्धता की प्राप्ति हो जाती है। इसका परिणाम, वे कहते हैं, विशेष रूप से शरीर में कष्ट होता है, और सबसे बड़ा लक्षण यह है कि जब भी इस प्रकार की समस्या आपके साथ होगी, त्वचा से जुड़े रोग बहुत अधिक होने लगेंगे। इसलिए इस बात का ध्यान रखें: जब कभी आप कहीं जाएँ और वहाँ से लौटने के बाद घर में किसी को बहुत अधिक चर्म संबंधी समस्या हो रही हो और कोई विशेष कारण न मिल रहा हो, तो पितृ से संबंधित उपाय करने चाहिए।
अनजाने में लगी पितृ अशुद्धि का एक-दिवसीय उपाय: गीता पाठ और तुलसी अभिषेक
ताँबे का लोटा, ग्यारह पाठ, दोपहर
वक्ता कहते हैं कि दोषों के अनुसार उपाय अलग-अलग हैं, पर एक सामान्य उपाय बताते हैं। घर का लड़का ताँबे के लोटे में शुद्ध जल भरकर उसमें थोड़ा गोमूत्र और गंगाजल डाले, और दोनों हाथों में लोटा लेकर श्रीमद् श्रीमद्भगवद्गीता के 11वें अध्याय का 11 बार पाठ करे — किसी भी रविवार (कोई भी पक्ष) या अमावस्या को, एक ही दिन में, सुबह 10 से 12:30 के बीच समाप्त करते हुए (पाठ 7–8 बजे से शुरू कर सकते हैं), जल पर फूँके बिना और उसे जूठा किए बिना। फिर यह अभिमंत्रित जल सूर्य के सम्मुख रखे तुलसी के पौधे पर चढ़ाया जाता है, सूर्य नारायण और तुलसी जी से प्रार्थना करते हुए कि पितृ जाने-अनजाने लगी जिस भी अशुद्धि से मुक्त होकर पूर्ण शुद्ध हों, और सभी पितरों से निवेदन कि वे अंश रूप से तुलसी में उपस्थित होकर अपना भाग ग्रहण करें। वे कहते हैं कि तुलसी की जड़, तना और शीर्ष में अलग-अलग प्रकार के पितर — ऊत, पितृ और जुझार — रहते हैं, और सूर्य नारायण, भगवान नारायण और तुलसी की कृपा से पितर पूर्ण शुद्ध हो जाते हैं। यह एक-दिवसीय प्रयोग है; अनजाने में लगे दोष पर काम करता है, जानबूझकर की गई गलती पर उतना प्रभावी नहीं है।
शुद्धता का उपाय क्या है, इस पर वक्ता कहते हैं कि दोषों के अनुसार उपाय अलग-अलग हैं, लेकिन एक सामान्य उपाय बताते हैं। घर का लड़का ताँबे के लोटे में शुद्ध जल भरे और उसमें थोड़ा सा गोमूत्रगोमूत्र, पितृ-दोष या अनुष्ठानिक अशुद्धि के उपायों में गंगाजल के साथ शुद्धिकरण-पात्र में थोड़ी मात्रा में मिलाया जाता है। और गंगाजलगंगा नदी का जल, अशुद्धि के संपर्क में आई अनुष्ठान वस्तुओं को शुद्ध व पुनःप्रतिष्ठित करने हेतु प्रयुक्त। डाले। उस पर भगवान नारायण द्वारा कही गई श्रीमद् श्रीमद्भगवद्गीता के एकादश यानी 11वें अध्याय का 11 बार पाठ करे। यह एक ही दिन करना है, किसी भी रविवार को — कृष्ण पक्ष हो या शुक्ल पक्ष, कोई दिक्कत नहीं — या चाहें तो अमावस्या तिथि को। यह कार्य दोपहर में करना है, लगभग सुबह 10:00 से 12:30 के बीच; पाठ पहले से, 7–8 बजे से शुरू कर सकते हैं, पर कम से कम 11 बार होना चाहिए। लोटा दोनों हाथों में लेकर पाठ करना है ताकि जल अभिमंत्रित हो जाए — उस पर फूँकना नहीं है, जूठा नहीं करना है। जब पात्र का जल अभिमंत्रित हो जाए, तो सूर्य के सम्मुख एक तुलसी का पौधा रखें। तुलसी जी और सूर्य नारायण से यह कहें: मेरे पितृ को जाने-अनजाने जिस भी कारण से जैसी भी अशुद्धि लगी है, उससे वे मुक्त होकर पूर्ण रूप से शुद्ध हो जाएँ और मेरे पूरे परिवार का कल्याण करें; इस हेतु मैं इस शुद्ध, पवित्र और मंत्रात्मक जल से भगवती तुलसी का अभिषेक करता हूँ और अपने सभी पितरों से निवेदन करता हूँ कि जैसे-जैसे मैं अभिषेक करूँ, वे अंश रूप से इस तुलसी में उपस्थित होकर अपना-अपना भाग ग्रहण करें और शुद्ध हो जाएँ। वे समझाते हैं कि तुलसी के तीन हिस्सों — जड़, तना और शीर्ष — में अलग-अलग प्रकार के पितरों का वास माना गया है: ऊतगर्भ में या यज्ञोपवीत संस्कार से पूर्व मृत बालक की अतृप्त आत्मा — सामान्य प्रेत से भिन्न। अलग जगह रहते हैं, पितृ अलग जगह, जुझारयुद्ध जैसी हिंसक या अस्वाभाविक मृत्यु से मरे पूर्वज की आत्मा — ऊत के समान पितरों की एक पृथक श्रेणी, जिसकी पूजा उसके अपने निर्धारित भाग में की जाती है। अलग जगह। इसलिए जब आप इस अभिमंत्रित जल से तुलसी जी का अभिषेक करेंगे, तो सूर्य नारायण, भगवान नारायण और भगवती तुलसी की कृपा से आपके पितर पूर्ण रूप से शुद्ध हो जाएँगे। अंत में वे सीमा बताते हैं: यह एक-दिवसीय प्रयोग है। जानबूझकर की गई गलती पर यह उतना प्रभावी नहीं होगा; अनजाने में कोई दोष लगा हो तो यह प्रयोग करने से पितर शुद्ध हो जाते हैं।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।