पितर अशुद्ध कैसे होते हैं, और उसका उपाय
इस व्याख्या में बताया गया है कि पितरों का शरीर पंचमहाभूतों से बना न होकर वायवीय होने पर भी वे अशुद्ध क्यों हो सकते हैं और घर के मांगलिक कार्यों पर अपना आशीर्वाद देना क्यों रोक देते हैं। इसमें चार कारण आते हैं: ईर्ष्यावश कोई शत्रु घर की देहरी को — जो पितरों का मुख्य स्थान है और कुलदेवी तथा कुल भैरव के साथ साझा है — श्मशानी क्रियाओं द्वारा निषिद्ध वस्तुओं का स्पर्श कराकर अपवित्र कर दे, जो प्रायः परिवार की बढ़ती समृद्धि के समय किया जाता है; कुल परंपरा छोड़ चुकी पुत्री (जैसे सनातन विधि से बाहर विवाह करने वाली) को किसी गंगा तीर्थ पर कम से कम सवा महीने का प्रायश्चित पूर्ण कराए बिना घर ले आना; ऐसी बहू, जो कुल के भोजन नियमों, घर की शुद्धता या रजस्वला संबंधी नियमों की अवहेलना करती हो; और अनजाने में लगी अशुद्धि, जैसे तीर्थ स्थल पर पड़े उतारे को अनजाने में लाँघ जाना, जो प्रायः अचानक, अकारण चर्म रोगों के रूप में प्रकट होती है। अंत में एक दिन का उपाय बताया गया है: ताँबे के लोटे में गोमूत्र और गंगाजल मिले जल को श्रीमद्भगवद्गीता के 11वें अध्याय के 11 पाठ से अभिमंत्रित करना, फिर मध्याह्न के आसपास सूर्य नारायण और तुलसी देवी का आवाहन करते हुए तुलसी के पौधे का अभिषेक करना — जिसकी जड़, तना और शिखर में भिन्न-भिन्न वर्ग की पितृ आत्माएँ (ऊट, पितर और जुझार) निवास करती हैं, जो अपना भाग पाकर शुद्ध हो जाती हैं; यद्यपि यह विधान मुख्यतः अनजाने में हुई भूलों के लिए प्रभावी बताया गया है, जान-बूझकर किए गए अपराधों के लिए नहीं।
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पितृ मलिनता क्या है और कैसे संभव
पितृ अशुद्धि क्या है, और देहरहित पितर अशुद्ध कैसे हो सकते हैं?
जब किसी घर में बार-बार परेशानियाँ आती हैं, तो तांत्रिक विद्याओं के जानकार से पूछने पर प्रायः पितृ अशुद्धि को ही कारण बताया जाता है — यद्यपि पितृ का शरीर पंचमहाभूतों (तत्त्व) से बना न होकर वायवीय, सूक्ष्म शरीर होता है, फिर भी परिवार के समस्त मांगलिक कार्यों पर उनका पूर्ण अधिकार होता है और वे अशुद्ध किए जा सकते हैं — मुख्यतः तब, जब कोई ईर्ष्या या द्वेष से प्रेरित होकर घर में नीच ऊर्जाओं का प्रवेश कराना चाहता है।
प्रायः सुनने में आता है कि पितर (पितृ) अशुद्ध हो गए हैं। जब किसी घर में कठिनाइयाँ आती हैं और तंत्र विद्या के किसी जानकार से परामर्श लिया जाता है, तो वे बताते हैं कि मूल कारण पितृ अशुद्धि है। यह अशुद्धि आखिर है क्या, और जिनका शरीर पंचमहाभूतों (तत्त्व) से बना ही नहीं है, वे पितर अशुद्ध कैसे हो सकते हैं? उनका शरीर तो वायवीय होता है। परिवार में होने वाले समस्त मांगलिक कार्यों पर पितरों का पूर्ण अधिकार होता है और शुभ कार्य उनकी कृपा तथा आशीर्वाद से ही संपन्न होते हैं — इसलिए पितर मुख्यतः तब अशुद्ध होते हैं, जब कोई व्यक्ति ईर्ष्या या द्वेष से प्रेरित होकर घर में अशुद्ध और नीच ऊर्जाओं का प्रवेश कराना चाहता है।
दूषित चौखट से पितरों की मलिनता
देहरी को बाँधने या अपवित्र करने से पितर अशुद्ध कैसे हो जाते हैं?
पितरों का मुख्य स्थान घर की देहरी (चौखट) है, जहाँ कुलदेवी और कुल भैरव भी विराजते हैं; किसी परिवार पर आक्रमण करने के लिए शत्रु को पहले इसी देहरी को कीलित करना, बाँधना या अपवित्र करना पड़ता है — प्रायः गौ माता से जुड़ी निषिद्ध वस्तुओं को श्मशानी क्रियाओं द्वारा देहरी से स्पर्श कराकर — और ऐसा होने पर 99% मामलों में पितर अशुद्ध हो जाते हैं; यह कार्य अधिकतर तब किया जाता है जब परिवार उन्नति कर रहा हो या विवाह जैसा कोई मांगलिक अवसर आने वाला हो।
पितरों का मुख्य स्थान घर के प्रवेश द्वार, अर्थात देहरी (चौखट) पर होता है। वहीं कुल के पितर, कुलदेवी (कुल की आधार देवी) तथा कुल भैरव के साथ निवास करते हैं — प्रायः कुल का कोई सिद्ध साधक देवी की कृपा से मृत्यु के पश्चात कुल भैरव का पद प्राप्त कर लेता है। किसी घर में अशुद्ध और नीच ऊर्जाओं का प्रवेश कराने के लिए शत्रु को पहले देहरी बाँधनी पड़ती है, अर्थात वह प्रवेश द्वार को कीलित करता है या अपवित्र करता है; और द्वार अपवित्र होते ही 99% मामलों में पितर भी अशुद्ध हो जाते हैं। सनातन संस्कृति में, जहाँ गौ माता को जगदम्बा का स्वरूप माना जाता है, अपवित्र करने का अर्थ है कि उनसे जुड़ी निषिद्ध वस्तुएँ — जैसे माँस या मृत्यु के बाद के शारीरिक अवशेष — श्मशानी विद्या (श्मशान), मंत्रों या तांत्रिक क्रियाओं के द्वारा देहरी पर डाल दी जाएँ या उससे स्पर्श करा दी जाएँ; यह कार्य प्रायः नीच प्रवृत्ति के लोग तांत्रिकों या भगतवालों (भगतवाल) की सहायता से करवाते हैं। ऐसा होने पर सबसे पहले पितर ही अशुद्ध होते हैं — नित्य पूजा-पाठ चलता रहता है, किंतु अचानक कलह और उथल-पुथल आरंभ हो जाती है। शत्रु ऐसा कार्य प्रायः तब करते हैं जब परिवार समृद्धि की ओर बढ़ रहा हो या विवाह जैसा कोई मांगलिक अवसर निश्चित हुआ हो।
पुत्री की वापसी और पूर्व आवश्यक शुद्धि
कुल परंपरा छोड़ चुकी पुत्री को घर वापस लाने से पितृ अशुद्धि कैसे होती है, और पहले कौन सा प्रायश्चित बताया गया है?
यदि दक्षिणाचार या वैष्णव विधि मानने वाले किसी सनातनी परिवार की पुत्री उस परंपरा को छोड़ देती है — जैसे उससे बाहर विवाह कर लेती है — और केवल मोहवश उसे घर वापस ले आया जाता है, तो पितर कुपित हो जाते हैं, क्योंकि उसका आध्यात्मिक रूप से दूषित आभामंडल देहरी पार कर घर के बच्चों और आगे की संतानों तक अशुद्धि पहुँचाता है; इसका विधान यह है कि उसे पहले हरिद्वार या रुद्रप्रयाग जैसे गंगा तीर्थ पर भेजकर कम से कम सवा महीने तक निर्देशित प्रायश्चित्त कराया जाए, तभी वह घर में प्रवेश करे।
दूसरा कारण तब बनता है जब परिवार का कोई सदस्य — पुत्र हो या पुत्री — ऐसे परिवेश में विवाह कर ले जो कुल की परंपराओं के सर्वथा विपरीत हो। यदि पुत्री कुल के पारंपरिक विधि-विधान त्यागकर चली जाती है, तो उसे क्षमा कर पुनः घर में ले आना गंभीर आध्यात्मिक विषमता उत्पन्न करता है। विशेष रूप से, यदि किसी सनातनी पृष्ठभूमि की स्त्री — जहाँ पारंपरिक वैष्णव या दक्षिणाचार विधि से पूजन होता है — उस परंपरा को छोड़ देती है (जैसे उससे बाहर के पुरुष से विवाह कर लेना) और बाद में सहानुभूति या मोहवश उसे वापस ले आया जाता है, तो यह पूर्णतः निश्चित है कि अशुद्धि के कारण पितर कुपित होंगे; ऐसे दूषित आभामंडल के साथ कुल की देहरी लाँघना सीधे बच्चों और आगे की संतानों को प्रभावित करता है। ऐसा कर्म करके जाने वालों को दया के वश घर में प्रवेश नहीं देना चाहिए — उनसे बाहर मिला जा सकता है। यदि वह सच में लौटना चाहती है और प्रायश्चित चाहती है, तो पहले उसे तीर्थ स्थानों पर ले जाकर विहित प्रायश्चित्तकिसी भारी कर्म — जैसे शत्रु की मृत्यु में परिणत होने वाला षट्कर्म — के कर्मभार को संतुलित करने हेतु किया जाने वाला प्रायश्चित्त अनुष्ठान। कराना चाहिए: सात दिन तक गंगा रज का ग्रहण, ऐसे स्थान पर जहाँ गंगा निर्मल हों — जैसे हरिद्वार या रुद्रप्रयाग — और योग्य पुरोहितों के निर्देशन में कम से कम सवा महीने तक विधि तथा पूजन कराने के बाद ही उसे घर लाना चाहिए।
बहू के आचरण से आने वाली मलिनता
कुल की विधि-मर्यादा के प्रति बहू की उपेक्षा से पितर अशुद्ध कैसे होते हैं?
जब विवाह कर आई स्त्री ऐसे घर में, जहाँ पितृ और देव स्थान माँसाहार का निषेध करते हैं, उससे विरत नहीं रह पाती, घर की शुद्धता तथा समय पर पूजन की उपेक्षा करती है, या अति-आधुनिक दृष्टिकोण रखते हुए रजस्वला संबंधी शुद्धि नियमों (अशौच) की अवहेलना कर उस अवस्था में पितृ स्थान को छूती है या देव गर्भगृह में प्रवेश करती है, तो पितर अत्यंत रुष्ट हो जाते हैं और उनकी पीड़ा तथा अशुद्धि परिवार तक पहुँचती है।
तीसरा कारण तब बनता है जब कुल का कोई पुरुष ऐसी स्त्री से विवाह करता है जिसकी जीवनशैली और आचरण कुल परंपराओं के सर्वथा विपरीत हो, चाहे उसकी पृष्ठभूमि कोई भी हो। यदि घर में माँसाहार का कठोर निषेध है, फिर भी वह उससे विरत नहीं रह पाती — अथवा यदि परिवार के पितृ और देव स्थान माँस का निषेध करते हैं, फिर भी वह विवाह कर आकर कुल की परंपराएँ मानने से इनकार कर देती है — तो विषमता उत्पन्न होती है। यदि वह घर की शुद्धता की उपेक्षा करती है, समय पर पूजन नहीं करती, या शुद्धता एवं अशौच (अशौचपरिवार में जन्म या मृत्यु जैसे अवसरों पर उत्पन्न अशुद्धि की स्थिति, जिसके दौरान कुछ अनुष्ठान व पाठ वर्जित रहते हैं।) के नियमों की अवहेलना करती है; अथवा अति-आधुनिक दृष्टिकोण अपनाते हुए रजस्वला संबंधी नियमों को नकारकर उस अवस्था में पितृ स्थान को स्पर्श करती है या देव गर्भगृह में प्रवेश करती है, तो पितर अत्यंत रुष्ट हो जाते हैं। इससे उन्हें कष्ट और अशुद्धि प्राप्त होती है, और उसी अनुपात में परिवार को भी कष्ट भोगना पड़ता है।
अनजाने में हुई मलिनता और उसका लक्षण
कोई परिवार अनजाने में घर में पितृ अशुद्धि कैसे ले आता है, और उसका सामान्य लक्षण क्या है?
अशुद्धि अनजाने में भी आ सकती है — यात्रा के दौरान परिवार के किसी सदस्य का किसी निषिद्ध वस्तु से स्पर्श हो जाना, या तीर्थ स्थल के मार्ग पर पड़े उतारे (उतारा) को अनजाने में लाँघकर घर में प्रवेश कर जाना — और यह प्रायः परिवार के सदस्यों में अचानक होने वाले गंभीर, अकारण चर्म रोगों के रूप में प्रकट होती है।
एक और विशेष कारण अनजाने में घटित होता है: यात्रा के दौरान परिवार का कोई सदस्य अनजाने में किसी निषिद्ध वस्तु का स्पर्श कर सकता है, या कोई जान-बूझकर अथवा अनजाने में उससे निषिद्ध वस्तु का स्पर्श करा सकता है। इसके अतिरिक्त तीर्थ स्थलों पर मार्गों में प्रायः नकारात्मक उतारे (उतारा) रखे होते हैं; उन्हें लाँघकर घर में प्रवेश कर जाने से अनजाने में ही पितरों तक अशुद्धि पहुँच जाती है। यह मुख्यतः परिवार के सदस्यों के शारीरिक कष्ट के रूप में प्रकट होती है, जिसका प्रमुख लक्षण है अचानक गंभीर चर्म रोगों का उभर आना।
ताम्र पात्र, गीता और तुलसी का उपाय
ताँबे के लोटे, भगवद्गीता और तुलसी अभिषेक द्वारा पितृ अशुद्धि का चरणबद्ध उपाय क्या है?
घर का कोई पुरुष सदस्य ताँबे के लोटे में जल, गोमूत्र और गंगाजल भरकर किसी रविवार या अमावस्या को उस पर श्रीमद्भगवद्गीता का 11वाँ अध्याय 11 बार पढ़ता है, फिर मध्याह्न के आसपास सूर्य नारायण और तुलसी देवी का आवाहन करते हुए उस अभिमंत्रित जल से तुलसी का अभिषेक करता है — पौधे की जड़, तना और शिखर में भिन्न-भिन्न वर्ग की पितृ आत्माएँ (ऊत, पितृ और जुझार) निवास करती हैं, जो अपना भाग पाकर शुद्ध हो जाती हैं।
यदि घर का कोई सदस्य बाहर से लौटने पर गंभीर, अकारण चर्म रोगों से ग्रस्त हो जाए, तो एक सामान्य शुद्धिकरण उपाय किया जा सकता है। घर का कोई पुरुष सदस्य ताँबे के लोटे में शुद्ध जल भरकर उसमें थोड़ा सा गोमूत्रगोमूत्र, पितृ-दोष या अनुष्ठानिक अशुद्धि के उपायों में गंगाजल के साथ शुद्धिकरण-पात्र में थोड़ी मात्रा में मिलाया जाता है। और गंगाजल मिलाता है, फिर श्रीमद्भगवद्गीता का 11वाँ अध्याय 11 बार पढ़ता है — यह एक ही दिन में, किसी भी रविवार (कृष्ण या शुक्ल पक्ष) अथवा अमावस्या को किया जाता है। अंतिम अर्पण मध्याह्न के आसपास, प्रातः 10:00 से दोपहर 12:30 के बीच किया जाता है, जबकि पाठ इससे पहले लगभग 7:00 से 8:00 बजे आरंभ कर देना चाहिए; लोटे को दोनों हाथों से पकड़ना चाहिए और ध्यान रखना चाहिए कि जल में फूँक न लगे और वह अपवित्र न हो। अभिमंत्रित हो जाने पर तुलसी के पौधे को सूर्य के सम्मुख रखकर सूर्य नारायण और तुलसी देवी से प्रार्थना की जाती है कि पितरों को, जिस भी कारण से उन्हें अशुद्धि लगी हो, भगवती तुलसी के इस अभिषेकजल और अन्य निर्धारित द्रव्यों से देवता की प्रतिमा या प्रतीक का विधिवत स्नान कराना। से मुक्ति और शुद्धि प्राप्त हो, तथा समस्त पितर पौधे के अपने-अपने भाग में उपस्थित होकर अपना अंश ग्रहण करें। पौधे के तीन भाग — जड़, तना और शिखर — भिन्न-भिन्न वर्ग की पितृ आत्माओं (ऊतगर्भ में या यज्ञोपवीत संस्कार से पूर्व मृत बालक की अतृप्त आत्मा — सामान्य प्रेत से भिन्न।, पितृ और जुझारयुद्ध जैसी हिंसक या अस्वाभाविक मृत्यु से मरे पूर्वज की आत्मा — ऊत के समान पितरों की एक पृथक श्रेणी, जिसकी पूजा उसके अपने निर्धारित भाग में की जाती है।, जो अलग-अलग भागों में निवास करती हैं) के स्थान माने जाते हैं; सूर्य नारायण, भगवान नारायण और भगवती तुलसी की कृपा से पितर पूर्णतः शुद्ध हो जाते हैं। यह एक दिन का विधान है — जान-बूझकर किए गए अपराधों में यह कम प्रभावी है, किंतु अनजाने में लगी पितृ अशुद्धि के लिए प्रभावी है।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।