नमः शिवाय जप और सिद्ध की समाधि पर मिली स्वर्ण मुहरें — रुद्र के गणों और कृपा की सत्य घटना
सिद्ध बाबा की समाधि के पास किए गए नमः शिवाय पुरश्चरण से भूमि विवाद कैसे सुलझा, जिसमें विपक्षी को किसी अदृश्य हाथ से स्वर्ण मुहरों में भुगतान हुआ — और वक्ता इससे सिद्ध स्थान, गड़े धन के स्वप्न और क्षमा के बारे में क्या सीख निकालते हैं।
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अनुशासन सहित विशुद्ध समर्पण कल्पना से परे दैवी सहायता खींचता है
भौतिक सुख पहला लक्ष्य, फिर भी समर्पण काम करता है
वक्ता कहते हैं कि साधक की प्रथम प्राथमिकता सामान्यतः भौतिक सुख की प्राप्ति होती है: मंत्र जप, अनुष्ठान और पुरश्चरण इसी निमित्त किए जाते हैं कि सुख-सुविधाएँ मिलें और दुख-कष्ट दूर हों। फिर भी उसी लक्ष्य में जब समर्पण बहुत विशुद्ध भाव से हो जाता है और साधक अनुशासन के साथ, विधि-नियमों और निषेधों को मानते हुए देव सेवा करता है, तो दिव्य शक्तियाँ उस स्तर तक सहायता करती हैं जिसकी कल्पना न वे कर सकते हैं न श्रोता। वे कहते हैं कि यह सत्य घटना इसी से संबंधित है।
वक्ता कहते हैं कि साधक जब साधना करता है तो सामान्यतः उसकी प्रथम प्राथमिकता भौतिक सुख की प्राप्ति होती है। भौतिकता की पूर्णता के निमित्त ही, कि सुख-सुविधाएँ मिल जाएँ और दुख-कष्ट दूर हो जाएँ, मंत्र जप, अनुष्ठान, पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक। आदि किए जाते हैं; आरंभिक लक्ष्य यही होता है। लेकिन उस लक्ष्य में भी जब हमारा समर्पणजप व पूजा के संचित पुण्य को अपने इष्ट देवता को अर्पित करना — साधना के अंत में दाहिने हाथ में जल लेकर औपचारिक समर्पण सूत्र पढ़ते हुए जल अर्पित किया जाता है। बहुत विशुद्ध भाव से हो जाता है, हम अनुशासन के साथ रहते हुए, विधि-नियमों के साथ निषेधों को मानते हुए देव सेवा करते हैं, तो उन दिव्य शक्तियों द्वारा उस स्तर तक सहायता की जाती है जिसकी कल्पना, वे कहते हैं, आप और हम नहीं कर सकते। जो घटना वे सुनाते हैं, वह इसी से संबंधित है।
अपने क्षेत्र के सिद्ध स्थान की सेवा
सेवक तंत्र में महारत के बाद ही स्थान स्वीकार करता है
वक्ता कहते हैं कि वे ऐसे अनुभव लोक शक्तियों का महत्व समझाने के लिए चुनते हैं: यदि आपके क्षेत्र में कोई सिद्ध पीठ या सिद्ध क्षेत्र है जहाँ कभी कोई सेवक रहे हों और कालांतर में वहीं स्थान स्वीकार किया हो, तो उन्होंने तंत्र क्षेत्र में कोई विशेष महारत पाने के बाद ही स्थान स्वीकार किया होगा। उनकी सेवा से, या उस स्थान की शक्ति की सेवा से, निज कल्याण बहुत शीघ्र मिलता है। उनका उदाहरण ढाई-तीन सौ साल पहले के एक सिद्ध बाबा हैं जिनके पास तीन सिद्धियाँ थीं, सर्पविष, मिर्गी और अन्य रोग झाड़ा से ठीक करना, शिव के विशेष सेवक जिन्हें उनके स्थान पर समाधि दी गई और जिनकी कृपा आज भी बहुत लोग अनुभव करते हैं।
वक्ता कहते हैं कि लोग बहुत सारे अनुभव भेजते हैं, पर वे लोक शक्तियों से जुड़े ये विषय चुनकर इसलिए रखते हैं ताकि इनका महत्व समझ में आए। यदि आपके क्षेत्र में कोई सिद्ध पीठ, सिद्ध क्षेत्र है जहाँ कभी कोई सेवक रहे हों और कालांतर में वहीं स्थान स्वीकार किया हो, तो उन्होंने तंत्र क्षेत्र में कोई विशेष महारत, कोई उपलब्धि पाने के बाद ही स्थान स्वीकार किया होगा। और उनकी सेवा से, या उस स्थान की शक्ति की सेवा से, निज कल्याण बहुत शीघ्रता से मिलता है। जो घटना वे सुनाते हैं वह ऐसे ही स्थान पर घटी। जहाँ साधक जप करते थे, उसी स्थान पर एक सिद्ध बाबा का समाधि स्थल भी था, जिनके बारे में प्रचलित है कि ढाई-तीन सौ साल पहले वे वहाँ रहते थे और उनके पास तीन विशेष सिद्धियाँ थीं: सर्प आदि के काटने पर विष दूर करना, मिर्गी से संबंधित कुछ विषय, और किसी भी अन्य बीमारी में झाड़ा देकर राहत देना। वे भगवान शिव के विशेष सेवक थे; शरीर पूर्ण होने पर वहीं समाधि दी गई, और आज भी बहुत लोगों का अनुभव है कि वे प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से कृपा करते हैं।
जब अपराध अपना हो: शत्रुनाशक प्रयोग की जगह प्रायश्चित और समर्पण
साधक के अपने पिता की चूक से जन्मा भूमि विवाद
वक्ता एक साधक की बात बताते हैं जिनकी भूमि पुराने कोर्ट केस में फँसी थी: रजिस्ट्री हो गई थी पर म्यूटेशन नहीं, क्योंकि साधक के अपने पिता ने तय राशि का कुछ भाग रोक लिया था, रजिस्ट्री के बाद देने का कहकर कभी दिया नहीं, जबकि सेल डीड में पूरा भुगतान दर्ज था। बेटे ने पिता का अपराध स्वीकार कर समझौते का प्रयास किया, पर बेचने वालों की अगली पीढ़ी नहीं मानी। वक्ता कहते हैं कि जब संविधान से कोई मार्ग नहीं बचता तो लोग सुप्रीम संविधान के पास जाते हैं; क्रोध में साधक ने पहले शत्रु-नाशक प्रयोग सोचा, पर मस्तिष्क ठंडा होने पर समझा कि अपराध पहले अपनी ओर से हुआ है, इसलिए प्रायश्चित्त के साथ विषय भगवान को समर्पित कर दिया, उनकी इच्छा पर छोड़कर।
वक्ता कहते हैं कि साधक की कामना बहुत सामान्य थी: भूमि का विषय। उस पर कोर्ट केस चल रहा था और रजिस्ट्री पूरी नहीं हुई थी, या यूँ कहें, जैसा श्रोता जानते होंगे, रजिस्ट्री के बाद म्यूटेशन (खारिज-दाखिल) होता है, और केस हार जाएँ तो म्यूटेशन और रजिस्ट्री दोनों निरस्त हो जाते हैं। केस बहुत पुराना था, और वे चाहते थे कि पिताजी के जीवित रहते यह निपट जाए। वास्तव में हुआ यह था, और साधक ने स्वीकार किया: पहली गलती उनके अपने पिता की ओर से थी। तय राशि, इतने लाख, में से कुछ पिता ने नहीं दिया और कहा रजिस्ट्री के बाद दे दूँगा। तब म्यूटेशन में शायद तीन या छह महीने लगते थे; वे आजकल-आजकल करते रहे, और जब लगा कि म्यूटेशन तो हो ही जाएगा, तो किसी बात पर विवाद करके पैसा नहीं दिया। भूमि काफी बड़ी थी, तो बेचने वालों ने भी केस कर दिया। लेकिन सेल डीड में रजिस्ट्री के समय यह स्वीकार कर लिया गया था कि पूरा पैसा मिल चुका है, इसलिए केस दोनों ओर से पेचीदा होकर आरोप-प्रत्यारोप में लंबा चलने लगा। बेटे को पता था कि अपराध उनकी ओर से हुआ है। नौकरी लगने और कमाने पर उन्होंने सुलझाने का बहुत प्रयत्न किया, पर विपक्षी के लिए यह ईगो का विषय बन गया: आपके पिताजी ने धोखा दिया, जिसे वक्ता सत्य कहते हैं, गलती इधर से ही हुई थी। वे पिता का अपराध स्वीकार करते हुए समझौते की विनती करते रहे; पर उनकी वर्तमान पीढ़ी नहीं मानी, बोली पूरी भूमि लेंगे और दिया हुआ पैसा भी वापस नहीं करेंगे, जो काफी भारी राशि थी। वक्ता कहते हैं कि जब व्यक्ति के पास संविधान से जुड़ा कोई मार्ग नहीं बचता, तब हम सुप्रीम संविधान के पास जाते हैं, और वे भी गए। शुरू में क्रोध आया कि क्यों न कोई शत्रुशत्रु, इन प्रवचनों के व्यावहारिक अर्थ में — जो सामान्य अथवा तांत्रिक उपायों से गृहस्थ के विरुद्ध कार्य करता है।-नाशक प्रयोग करें, सिद्ध करके फिर निवेदन करें। लेकिन मस्तिष्क ठंडा हुआ तो समझ आया कि अपराध तो अपनी ओर से प्रथम हुआ है; इसलिए प्रायश्चित्तकिसी भारी कर्म — जैसे शत्रु की मृत्यु में परिणत होने वाला षट्कर्म — के कर्मभार को संतुलित करने हेतु किया जाने वाला प्रायश्चित्त अनुष्ठान। के साथ भगवान को ही समर्पित करते हैं: उनकी इच्छा होगी तो शीघ्रातिशीघ्र यह विषय भी निपट जाएगा।
यज्ञोपवीत रहित साधक के लिए पंचाक्षरी जप का क्रम
नमः बाद में, जैसा शास्त्र निर्देश देते हैं
वक्ता कहते हैं कि साधक तृतीय, वैश्य वर्ण के थे और उनका यज्ञोपवीत नहीं हुआ था, इसलिए उन्होंने शिव के पंचाक्षरी मंत्र का जप उसी प्रकार आरंभ किया जैसा शास्त्र ऐसे लोगों के लिए निर्देश देते हैं: नमः को बाद में लगाकर, उसी क्रम में जप।
साधक ने शिव जी के पंचाक्षरी मंत्र का जप लिया। वक्ता कहते हैं कि वे तृतीय, वैश्य वर्ण के साधक थे और उनका यज्ञोपवीतवैदिक कर्मों में दीक्षा का प्रतीक यज्ञोपवीत (जनेऊ) संस्कार — पीढ़ियों तक न होने पर, इसे पुनः आरंभ करने से पहले हर ज्ञात पीढ़ी के लिए प्रायश्चित आवश्यक है। नहीं हुआ था। इसलिए, जैसा शास्त्रों में निर्देशित पंचाक्षरी जप का विधान ऐसे लोगों के लिए कहता है, उन्होंने नमः को बाद में लगाकर उसी प्रकार जप आरंभ किया।
सिद्ध की समाधि के पास गृहस्थ का नमः शिवाय पुरश्चरण
नित्य अभिषेक, 251 माला, और प्रायश्चित सहित स्पष्ट संकल्प
वक्ता कहते हैं कि साधक ने पहले सामान्य जप किया, फिर पुरश्चरण आरंभ किया: प्रतिदिन भगवान शिव का उनके पूरे परिकर-परिवार सहित अभिषेक, शिव मंदिर का देहरी पूजन, शिव को स्नान, सुगंधित इत्र का लेपन, त्रिपुण्ड्र, और फिर पंचाक्षरी की कम से कम 251 माला प्रतिदिन, लगभग 25,000 जप। वे उस मंदिर में सिद्ध बाबा की समाधि के पास, छोटे गर्भगृह से दूर, शिव की ओर देखते हुए बैठते थे। उनका संकल्प बिल्कुल स्पष्ट था: भूमि विवाद शीघ्रातिशीघ्र निपटे, पिता के अपराध के लिए वे क्षमा माँगते और प्रायश्चित करते हैं, और शिव उनके कुल पर कृपा कर वह भूमि प्रदान करें। कृषक परिवार से होते हुए भी वे इसके लिए रोज़ समय निकालते थे।
वक्ता कहते हैं कि आरंभ में साधक सामान्य जप कर रहे थे; बाद में उन्होंने पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक। आदि आरंभ किया। उसमें विधिवत प्रतिदिन भगवान शिव का उनके पूरे परिकरों और परिवार सहित अभिषेकजल और अन्य निर्धारित द्रव्यों से देवता की प्रतिमा या प्रतीक का विधिवत स्नान कराना।, शिव मंदिर का देहरी पूजन, शिव को स्नान कराकर सुगंधित इत्र का लेपन, त्रिपुण्ड्र बनाना, और तब पंचाक्षरी का जप, कम से कम 251 माला प्रतिदिन, जैसा उन्होंने लिखा। जप का स्थान उस शिव मंदिर में एक सिद्ध बाबा का समाधि स्थल था। अच्छी जगह थी, तो वे शिव जी की श्रृंगार पूजा करके समाधि के पास जाकर, गर्भगृह से दूर हटकर, दूर से भगवान शिव को देखते हुए बैठते, क्योंकि गर्भगृह छोटा था और लोग बढ़ने पर गर्मी में समस्या होती थी। वहाँ वे प्रतिदिन लगभग 25,000 जप करते थे। उनका संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। बिल्कुल स्पष्ट था: भूमि से जुड़ा विवाद शीघ्रातिशीघ्र निपट जाए; मेरे पिताजी से जो अपराध हुआ उसके निमित्त मैं क्षमा माँगता हूँ और प्रायश्चित करता हूँ; और कृपा करके हमारे कुल पर कृपा करें और वह भूमि हमें प्रदान करें। इसी निमित्त वे प्रतिदिन इतना जप करते थे, अपना समय निकालकर; वक्ता बताते हैं कि वे भी कृषक परिवार से ही हैं।
भारी जप के दौरान गड़े धन के स्वप्न और उसे स्वयं क्यों न निकालें
आपका है तो मिलेगा; सफलता अधिकारी पर निर्भर
वक्ता कहते हैं कि जप चलते-चलते साधक को स्वप्न आने लगा कि उनकी पुश्तैनी भूमि पर कलश में स्वर्ण मुद्राएँ गड़ी हैं; बड़ा अनुष्ठान या जप करने वाले साधकों को ऐसे स्वप्न बहुत सामान्य हैं, जिनसे भूमिगत धन की जानकारी मिलती है। वर्षों पहले पूछे जाने पर कि ऐसा दिखे तो निकालने का प्रयास करें या नहीं, वक्ता का उत्तर था नहीं: निकालने से हानि हो सकती है, स्वयं यह न करें; आपका है तो आपको मिल जाएगा, फिर विधि-निषेध का पालन करके स्वीकार करें। वे जोड़ते हैं कि ऐसा निकालना सफल होगा या नहीं, यह इस पर निर्भर है कि उसका अधिकार किसका है। साधक ने छोड़ दिया, हालाँकि स्वप्न सप्ताह भर में लौटता रहा, कोई कहता कि यहाँ है और दिखाता कि कितना है, कितनी गहराई पर मिलेगा।
वक्ता कहते हैं कि साधना आगे बढ़ने पर कुछ समय बाद साधक को स्वप्न आने लगा कि उनकी अपनी पुश्तैनी भूमि पर कलश में स्वर्ण मुद्राएँ गड़ी पड़ी हैं। इसे वे बड़ा सामान्य स्वप्न कहते हैं: बहुत सारे साधक जब कोई विशेष अनुष्ठान या जप बहुत बड़ी मात्रा में करने लगते हैं तो ऐसे स्वप्न देखते हैं, और भूमिगत धन-स्रोतों की जानकारी मिलती है। यही साधक का पहला प्रश्न था जब वे वक्ता के पास आए थे, बहुत पुराना विषय; लगभग तीन साल पहले, जब चैनल एकदम नया था और धन पर एक वीडियो बना था, उन्होंने पूछा था कि ऐसा स्वप्न दिखे तो निकालना चाहिए या नहीं, प्रयास करना चाहिए या नहीं। उत्तर था: निकालने से हानि हो सकती है, स्वयं यह नहीं करना चाहिए; अगर वह आपका है तो आपको प्राप्त हो जाएगा, फिर उसके विधि-निषेध का पालन करके स्वीकार करना चाहिए। तो साधक ने छोड़ दिया कि कौन हाथ डालेगा, कुछ हो गया तो। पूरी जानकारी भी नहीं मिल रही थी; बस स्वप्न में बार-बार कोई कहता कि यहाँ है, और दिखा देता: देखो इतना है, इतनी दूरी पर मिल जाएगा। वे हिम्मत नहीं कर पाए, और एक-दो को बताया तो वे भी भयभीत हुए कि नहीं करना चाहिए। स्वप्न एक-दो दिन, सप्ताह भर में आता रहा, यहाँ तक कि उनके लिए सामान्य हो गया, घुमा-फिराकर वही बात, भूमि से कलश निकल रहा है या कोई धन दे रहा है। बात के अंत में वक्ता सामान्य नियम जोड़ते हैं। गड़ा धन निकालने के जो केस लोग सुनते हैं, उनका प्रत्यक्ष रूप से सफल होना या न होना इस पर निर्भर करता है कि उसका अधिकारकिसी उन्नत विधि को करने से पूर्व आवश्यक पात्रता या अधिकार — इसके बिना सही ढंग से किया गया अनुष्ठान भी साधक के लिए गंभीर हानि का जोखिम रखता है। किसका है। यहाँ साधक कहीं न कहीं अधिकारी थे, पर आगे नहीं बढ़े; तो उन्हीं शक्तियों ने उनके जीवन की समस्या उसी धन से दूर की, जो वक्ता के अनुसार उनका पूर्व जन्म का भी हो सकता है।
सत्य घटना: सिद्ध की समाधि पर दिए गए स्वर्ण से निपटा भूमि विवाद
विरोधी पीछे हटा, ऐसे हाथ से भुगतान जिसका पता न चला
वक्ता कहते हैं कि विरोधी बचा हुआ पैसा आज के भूमि रेट से, लगभग ₹50 लाख (उस समय ₹5 लाख), लेकर ही केस उठाने पर अड़े थे। स्थान पर जप चलते हुए एक दिन विरोधी के पुत्र का फोन आया, मिलकर बोले कि हम केस हटा रहे हैं; रजिस्ट्री-म्यूटेशन पूरा हुआ और भूमि साधक की हो गई, जिसे उन्होंने अपने जप का फल माना। छह महीने बाद पुराने मालिक ने बताया कि उन्हें साधक के एक धनी दूर के मामा ने भुगतान किया था, जिन्होंने परिवार के धन्यवाद देने पहुँचने पर साफ़ मना कर दिया और कहा कि उन तिथियों में वे वहाँ थे ही नहीं। पुनः बुलाए जाने पर पाने वाले ने बताया कि वह व्यक्ति बस मंदिर पर ही रहता था और उसी सिद्ध की समाधि के पास, जहाँ साधक प्रतिदिन लगभग 25,000 जप करते थे, ₹50 लाख से कुछ अधिक की स्वर्ण मुहरें दीं, इस जिद के साथ कि सोना पाने वाला स्वयं ले जाए; स्वर्णकार ने सप्ताह भर में उसका पैसा दे दिया।
वक्ता कहते हैं कि उधर कोर्ट केस में कोई लाभ नहीं हो रहा था। विरोधी की जिद थी: बचा हुआ पैसा, आज की तारीख के हिसाब से लगभग ₹50 लाख, हमें दीजिए, हम पूरा केस उठा लेंगे, रजिस्ट्री पूरी हो जाएगी और म्यूटेशन करा लीजिए। उस समय के हिसाब से वह मात्र ₹5 लाख था और साधक ने वह देने को कहा, पर वे बोले धोखा आपकी ओर से हुआ, गोचर भूमि है, आज के रेट से चाहिए। बात वहीं अटकी थी: इतना पैसा आएगा कहाँ से। यह निवेदन और जप उस स्थान पर चल ही रहा था कि एक दिन विरोधी के पुत्र का फोन आया कि हम आपसे एक बार मिलना चाहते हैं। साधक मिलने गए तो उन्होंने कहा: आगे का प्रोसेस कर लीजिए, हम केस हटा रहे हैं, आप समझौता करके रजिस्ट्री करवा लीजिए। वे तैयार हो गए, यह सोचकर कि अब तक का पूरा फल मिलने वाला है, प्रभु ने सुन लिया। पूरा प्रोसेस हुआ, म्यूटेशन हुआ और भूमि उनकी हो गई। पिताजी बहुत प्रसन्न हुए; पिता की गलती को सब कुछ भगवान शिव को समर्पित करके सुधारा गया था। छह महीने बाद जिनकी वह भूमि थी, उनसे कहीं मुलाकात हुई, तो साधक ने पूछा: इतना लंबा केस चला, आप एकाएक कैसे मान गए, ₹50 लाख माँग रहे थे और पैसा भी नहीं लिया? वे बोले, किसने कहा कि हमने पैसा नहीं लिया? आप सक्षम नहीं थे, पर अमुक गाँव के आपके फलाने रिश्तेदार ने सारा विषय हमारे सामने रखा था। उन्होंने एक दूर के मामा का नाम लिया, साधक की नानी की बहन के बेटे, बहुत धनी परिवार, ईंट-भट्टे का कारोबार। उस व्यक्ति ने बताया कि मामा को केस की पूरी जानकारी थी, कहा कि साधक की माताजी ने कभी उनकी बहुत सहायता की थी इसलिए सहयोग कर रहे हैं, केस उठा लीजिए, कोर्ट में उनकी पूरी पहुँच थी, पैसा दिया, और कहा कि काम होने तक साधक को न बताएँ। साधक की माताजी चौंक गईं; कोई विशेष संबंध नहीं था, बस भाई दूज, रक्षाबंधन और कभी शादी-ब्याह। पूरा परिवार मामा को धन्यवाद देने और यह पूछने गया कि पैसा कैसे चुकाएँगे, तो उन्होंने पूरी तरह मना कर दिया: ऐसा कुछ किया ही नहीं, होता भी तो इतना नहीं कर सकते, और बताई गई तिथियों में वे वहाँ थे ही नहीं। तो पैसा पाने वाले को फिर बुलाकर पूछा गया कि कहाँ दिया था, और वहीं भेद खुला। उन्हें उसी स्थान पर बुलाया गया था जहाँ साधक जप करते थे, और उसी सिद्ध के समाधि स्थल के पास उन्हें स्वर्ण की मुहरें दी गईं जिनकी पूरी कीमत ₹50 लाख से कुछ ज़्यादा थी, उस देव स्थान पर जहाँ बाबा की समाधि थी और जहाँ साधक प्रतिदिन लगभग 25,000 जप करते थे। वे सोना स्वर्णकार के पास ले गए, भारी राशि होने से सप्ताह भर का समय माँगा गया, पूरा पैसा मिला, तब समझौता किया। उन्होंने कहा कि वह व्यक्ति बस मंदिर पर ही रहता था, वहीं सोने की सारी सामग्री दी और कहा कि फलाने जगह जाकर बात कीजिए, वहाँ से मिल जाएगा; उन्होंने पैसा माँगा था, पर वह इसी जिद पर था कि स्वर्ण आप ही को लेकर जाना होगा, हम नहीं ले जाएँगे।
समाधि पर मिले स्वर्ण की व्याख्या: सिद्ध, कुल शक्ति, और पूर्वजों का गड़ा धन
स्वप्न बंद हुआ, और सोना उसी स्थान से आया, शून्य से नहीं
वक्ता श्रोता से दो सूत्र डिकोड करने को कहते हैं। पहला, साधक ने गौर किया कि जिस वर्ष यह भुगतान हुआ, तब से आज तक स्वप्न में किसी ने फिर कभी नहीं कहा कि जाओ स्वर्ण ले लो, जबकि पहले यह स्वप्न बार-बार आता था। दूसरा, स्वर्ण जप के उसी स्थान पर मिला, तो संभवतः वह सिद्ध हों जिनकी समाधि के पास जप होता था, या उनके कुल की कोई कुल शक्ति; कभी पता नहीं चला। पर उस स्थान पर स्वर्ण से जुड़ी कोई वस्तु अवश्य रही होगी जिसे निकालकर दिया गया; शून्य से उत्पन्न करके नहीं। साधक ने पिता और दादी से सुना था कि पूर्वजों के पास उस स्तर की संपत्ति थी जो अपनी भूमि पर गाड़ी गई थी, और स्वप्न वाली जगह उनका पुराना घर था जो दो पीढ़ी पहले तोड़ दिया गया था; तो संभवतः जप-तप के कारण उनके पितृ, या वह सिद्ध, या शिव की कोई लीला उसी धन को निकालकर दे गई। आगे कोई खोज नहीं की गई। वक्ता इसे यथार्थ या कल्पना मानना श्रोता के विवेक पर छोड़ते हैं, पर कहते हैं कि इसमें साधक की लगन, अनुशासन और समर्पण स्पष्ट दिखता है।
वक्ता कहते हैं कि साधक को पहला झटका तब लगा जब उन्होंने गौर किया: जिस वर्ष वह भुगतान हुआ होगा (जिसका पता उन्हें छह महीने बाद चला), तब से लेकर आज तक स्वप्न में कभी किसी ने नहीं कहा कि अब तुम स्वर्ण ले लो, यहाँ है, चले जाओ; जबकि पहले यह स्वप्न बार-बार आता था। इसे डिकोड कीजिए, वे कहते हैं। दूसरा विषय: वह उसी स्थान पर मिला। इसका अर्थ है कि संभवतः वही हों जिनकी समाधि के पास वे जप करते थे, या उनके कुल की कोई कुल शक्ति हो; कभी पता नहीं चल पाया। लेकिन उस स्थान पर स्वर्ण से संबंधित कोई वस्तु अवश्य रही होगी जिसे निकालकर दिया गया; घर से उत्पन्न करके नहीं दिया गया। इसे जानने का कोई और विशेष प्रयास नहीं किया गया और कोई हो-हल्ला नहीं हुआ, जिसके बहुत सारे कारण बनते हैं। साधक ने एक बात यह कही कि उन्होंने भी पिताजी और दादी से सुना था कि उनके पूर्वजों के पास उस स्तर की संपत्ति थी, जो अपनी भूमि पर कहीं गाड़ी गई थी। जिस जगह का वे स्वप्न देखते थे वहाँ उनका पुराना घर था, जो बाद में तोड़कर छोड़ दिया गया, खंडहर हो गया, और परिवार दूसरी जगह नया घर बनाकर चला गया, जो स्वयं दो पीढ़ी पुराना हो चुका था। तो संभवतः कहीं न कहीं वह धन था, और उनके जप-तप के कारण उनके पितृ, या वह सिद्ध, या पता नहीं भगवान शिव की कौन सी लीला, उसी धन को निकालकर दे गई। वक्ता पूरी घटना को आश्चर्यजनक कहते हैं। साधक ने उन जगहों के वीडियो भेजे और गाँव का नाम भी बताया, पर वक्ता इन चीज़ों को अधिक प्रमोट नहीं करते, क्योंकि अंधविश्वास को बढ़ावा देना उचित नहीं। इसे कल्पना समझें या यथार्थ, वे श्रोता के विवेक पर छोड़ते हैं; लेकिन इसमें साधक की लगन, मेहनत, अनुशासन, समर्पण सब दिखता है। इस स्तर तक समर्पित होकर करने पर उस स्थान की शक्ति या जो भी दिव्य शक्ति थी, उसके द्वारा चमत्कारिक रूप से यह पूरा विषय हल किया गया।
शक्तियाँ समर्पित साधक का अपराध क्षमा करती हैं, पर दूसरे लोक से धन नहीं लातीं
हमारे लिए चमत्कार, फिर भी अपने जीवन में कारण सहित
वक्ता अनुभव के बाद साधक का अपना विशेष रिमार्क दर्ज करते हैं: जब आप साधना करते हैं और शक्तियों के प्रति उस स्तर तक समर्पित हो जाते हैं, तो आपसे कोई अपराध हुआ हो तो वे उसे क्षमा भी करती हैं। चमत्कार तो करती हैं, और हमारे लिए वह चमत्कार ही है; लेकिन ऐसा नहीं कि वह शक्ति किसी दूसरे लोक से धन लाकर दे देगी। आपके जीवन में उसे उत्पन्न करने का कोई न कोई विशेष कारण रहा होगा।
वक्ता कहते हैं कि यह अनुभव देने के बाद साधक का एक विशेष रिमार्क है: जब आप साधना करते हैं और शक्तियों के प्रति उस स्तर तक समर्पित हो जाते हैं, तो आपसे कुछ अपराध भी हुआ हो तो वे उसे क्षमा भी करती हैं। चमत्कार तो करती हैं, पर चमत्कार के पीछे हम उसे चमत्कार मान लेते हैं, और हमारे लिए वह चमत्कार ही है। लेकिन वह शक्ति ऐसा नहीं है कि किसी दूसरे लोक से धन लाकर दे देंगी। आपके जीवन में उसे उत्पन्न करने का कोई न कोई विशेष कारण रहा होगा।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।