दत्तात्रेय तर्पण और दुर्गा पाठ से मुसलमानी तंत्र का बंधन कैसे कटा — एक सत्य घटना
सवारी और मुसलमानी तंत्र के बंधन से पीड़ित एक घर की सत्य घटना, और वक्ता द्वारा बताया गया क्रम — संकट नाशन स्तोत्र, पितृ पक्ष में दत्तात्रेय तर्पण, नवरात्र में हवन सहित दुर्गा के 108 नामों का पाठ, और वाराह दंत गोमूत्र प्रयोग — तथा उनके निष्कर्ष।
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पीड़ित घर का लक्षण: हर पूजा के अंतिम चरण में सवारी आकर उसे तोड़ देती है
जो अनुष्ठान पूर्ण न हो, उसका फल नहीं मिलता
वक्ता अभी बीते शारदीय नवरात्रि की एक सत्य घटना से आरंभ करते हैं: एक साधक जो लंबे समय से साधनाएँ कर रहे थे, जिनके परिवार में वर्षों से उपद्रव मचे थे। जब भी कोई पूजा-पाठ होता, घर में किसी पर — किसी पर भी — सवारी आ जाती और खूब उत्पात मचाती, जिससे उनके जीवन में कोई पूजा कभी पूर्ण नहीं हो पाई थी। नवरात्र में, वे कहते हैं, सप्तमी-अष्टमी तक सब ठीक बीत सकता था, और फिर बिल्कुल अंतिम समय पर सवारी पूजन स्थान पर उत्पात मचा देती, कलश हिला देती, किसी से मारपीट कर किसी को घायल कर देती, या ऐसी कोई घटना घट जाती कि पूजा सही से पूर्ण न हो पाती; और जब पूरी ही न हो तो फल कहाँ से मिले।
वक्ता श्रोताओं के सामने इसी नवरात्रि का, अभी बीते शारदीय नवरात्र का, एक सत्य अनुभव रखते हैं। यह एक ऐसे साधक का निजी अनुभव है जो काफी लंबे समय से, वक्ता से संपर्क होने से पहले से, साधनाएँ करते आ रहे थे। उनके परिवार में काफी समय पहले से कुछ उपद्रव मचे हुए थे। कैसे? जब भी वे कोई पूजा-पाठ करते, घर में किसी के ऊपर — किसी के भी ऊपर — एक सवारी आ जाती, और आने के बाद काफी उत्पात मचाती। साधक का अपना कहना था कि उनके जीवन में अब तक कोई ऐसी पूजा-पाठ नहीं बीती जो अंत में जाकर बंद न हो गई हो। यदि वे नवरात्र कर रहे हैं तो सप्तमी-अष्टमी तक सब ठीक-ठाक बीत सकता था और लगता था कि हाँ, अब सब ठीक हो जाएगा। लेकिन बिल्कुल अंतिम समय में आकर वह किसी के सिर पर पूजन स्थान पर उत्पात मचा देती, कलश हिला देती, किसी से मारपीट करके किसी को घायल कर देती, या घर में ऐसी कोई घटना घट जाती कि पूजा-पाठ अंत समय में सही से पूर्ण न हो पाता। और जब पूरा ही नहीं होगा, वक्ता कहते हैं, तो फल कहाँ से प्राप्त होगा?
क्या हिंदू घर में सैयद या पीर को स्थान देकर पूजना चाहिए?
स्थानीय जानकारों का "बीच का रास्ता", और वक्ता का इनकार
वक्ता कहते हैं कि परिवार जहाँ भी दिखाता-सुनाता, दो बातें सामने आतीं: उनके पितृ बंधे हैं, और घर में मुसलमानों की एक चीज है जिसे सैय्यद कहते हैं — बहुत खराब चीज — जो कहा जाता था कि पहले के समय से उनके पुश्तैनी घर में रही है और अब पुरानी हो जाने से अपना स्थान चाहती है; इसी कारण वह पूजा पूरी नहीं होने देती, और मुसलमानी चीज होने से उसे उनकी हिंदू पूजा से परेशानी भी होती है। बीच का रास्ता यह बताया गया कि उसे घर के बाहर अपनी ही जगह में कहीं स्थान दे दें और नित्य मीठे जल और बताशे से उसकी सेवा-पूजा करें। वक्ता का पक्ष है कि सनातनी संस्कृति से जुड़ा हिंदू परिवार ऐसी चीजों को न पूजे; उनके चैनल पर दो-तीन वीडियो स्पष्ट कहते हैं कि साईं, पीर, फकीर को स्थान देकर नहीं पूजना है। बहुत से साधक-भक्त, वे कहते हैं, शक्तियों से शक्तियों को हटाना जल्दी नहीं चाहते — 'कौन इतना करेगा, घर पर पूज लो' — जबकि कट्टर सनातनी जिन्हें भगवती कृपा से यह सद्बुद्धि है कि ऐसी चीजों को नहीं पूजना, हार नहीं मानते। इस परिवार ने इनकार किया, यद्यपि बड़े-बुजुर्ग बच्चों के कष्ट देखकर डगमगाने लगे थे; वे वीडियो सुनकर वे दृढ़ हुए और संपर्क करके पूछा कि क्या किया जाए।
दो निदान। जब परिवार यह बात कहीं भी दिखाता-सुनाता, वक्ता कहते हैं, तो दो चीजें उनके सामने आतीं। पहली: आपके पितृ बंधे हुए हैं। दूसरी: मुसलमानों में एक चीज होती है जिसे सैय्यद कहा जाता है — बहुत खराब चीज — और जहाँ भी दिखाते वह चीज आती और कहा जाता: पहले के समय में यह चीज आपके घर में रही (पुश्तैनी घर है उनका), पहले से घर में थी, और कालांतर में, क्योंकि वह पुरानी हो चुकी है, अब चाहती है कि उसे भी स्थान दिया जाए। इसी कारण वह आपके पूजन-पाठ को पूरा नहीं होने देती; साथ ही आप जो भी पूजा करते हैं, क्योंकि वह मुसलमानी चीज है, उसे भी परेशानी होती है। तो बीच का रास्ता यही निकलता है कि उसे भी कहीं जगह दे दीजिए, घर के बाहर अपनी ही जगह में, और नित्य मीठा जल और बताशे चढ़ाकर उसकी भी सेवा-पूजा कर दीजिए। वक्ता का पक्ष। लेकिन यह हिंदू परिवार है, सनातनी संस्कृति से जुड़ा। वे कहते हैं कि अभी भी ऐसे साधक और भक्तवाल लोग हैं जो शक्तियों से शक्तियों को हटाना जल्दी नहीं चाहते — बोलते हैं, 'कौन इतना करेगा यार, छोड़ो, पूज लो घर पे।' और जो कट्टर सनातनी हैं, जिन्हें भगवती कृपा से कम से कम यह सद्बुद्धि मिल रही है कि नहीं भाई, ऐसी चीजों को नहीं पूजना — वे हार नहीं मानते। भगवती कृपा से यह घर-परिवार ऐसा ही था: इतनी परेशानियों के बाद भी नहीं माने; बोले, नहीं, घर पे पूजना सही नहीं होगा। लेकिन घर के बड़े लोग बच्चों के कष्ट देखकर हिम्मत हारने लगे थे: आज नहीं तो कल हमारी मृत्यु हो जाएगी; हम बूढ़े हैं; हमारे रहते यह चीज शांत नहीं हो पा रही तो फिर कैसे? तो एक ही उपाय दिखता था कि इसे स्थान दे दिया जाए ताकि यह शांति से रहे और हम और हमारे बच्चे भी शांति से रहें। वक्ता के चैनल का एक वीडियो वायरल हुआ है जिसमें उन्होंने मना किया है — ऐसी चीजों को नहीं पूजना, साईं, पीर, फकीर को नहीं पूजना, हिंदू पूजेंगे तो क्या होगा। चैनल पर ऐसे दो-तीन वीडियो हैं जिनमें पूरी स्पष्टता से बताया गया है कि कैसे क्या होता है। देव योग से पूरे परिवार ने वे वीडियो सुने, और उनका विश्वास और दृढ़ हुआ: पूजा नहीं करनी है, इसे जगह नहीं देनी है। तीसरा, उन्होंने संपर्क किया: भाई, ऐसी अस्थिर अवस्था में क्या किया जाए, हमें क्या करना चाहिए?
मुसलमानी तंत्र से घर कैसे बाँधा जाता है: मंत्र लिखी लोहे की कीलें हर कोने में गाड़ना
बंधन के बाद छह-सात महीने में रोजी-रोटी बंद
वक्ता कहते हैं कि परिवार ने घर मुसलमानी मौलवियों को भी दिखाया-सुनाया था, जो कुछ नहीं कर पाए — बहुत होता तो दरगाह पर पूजा करवाते, पैसे लेते, घर में दस तरह की चीजें करते — और उन लोगों ने घर को मुसलमानी विद्या से बाँध भी दिया था। मुसलमानों की तंत्र विद्या में, वे बताते हैं, एक लोहे की कील आती है जिस पर उर्दू में मंत्र लिखे होते हैं; उसे अलग-अलग प्रकार से सिद्ध किया जाता है और फिर घर के हर कोने में गाड़ा जाता है, और इसी प्रकार इस घर का बंधन किया गया (उत्कीलन से गृह बंधन)। उस बंधन के बाद परिवार का अनुभव था कि छह-सात महीने होते-होते रोजी-रोटी के दो-चार पैसे आने का मार्ग भी पूरी तरह बंद हो गया और उत्पात और बढ़ गया; कोई राहत नहीं मिली, और अंत में उन लोगों ने हाथ खड़े कर दिए।
परिवार ने, वक्ता कहते हैं, मुसलमानी मुल्ले-मौलवियों को भी घर दिखाया-सुनाया था। वे लोग भी कुछ नहीं कर पाए। बहुत होता तो दरगाह पर पूजा करवाते, पैसे ले लेते, आकर घर में दस तरीके की चीजें करते। और उन लोगों ने इनके घर को मुसलमानी विद्या से बाँधा भी था। मुसलमानों की तंत्र विद्या में, वे बताते हैं, एक लोहे की कील आती है जिस पर उर्दू में मंत्र लिखे होते हैं। उसे अलग-अलग प्रकार से सिद्ध किया जाता है, और फिर घर के हर कोने में गाड़ा जाता है। उसी प्रकार इस घर का गृह बंधन किया गया, उत्कीलन से। उस बंधन के पश्चात उनका अनुभव था कि रोजी-रोटी के लिए दो-चार पैसे आने का जो भी मार्ग था वह भी छह-सात महीना होते-होते पूरी तरह बंद हो गया और उत्पात और बढ़ गया। कोई राहत नहीं मिली थी — और फिर अंत में वे लोग हाथ खड़े कर देते हैं।
संकट नाशन गणेश स्तोत्र अनुष्ठान: 40 दिन तक सुबह-शाम 108 पाठ
पूरी बात बताए जाने से पहले दी गई पहली साधना
वक्ता साफ कहते हैं कि करने वाली भगवती जगदम्बा हैं — अच्छा और बुरा दोनों वही करती हैं। जब परिवार उनके गृहस्थ तंत्र साधक परिवार से जुड़ा तो उन्होंने अपनी परेशानी बड़े सामान्य ढंग से बताई और सवारी वाली पूरी घटना नहीं बताई, इसलिए पहली साधना उन्होंने यह दी कि गणेश जी के संकट नाशन स्तोत्र का नित्य पाठ करें और दीक्षित हों तो अपने गुरु मंत्र आदि का जाप करें। साधक ने इसका काफी लंबा और तगड़ा अनुष्ठान किया — इसकी फलश्रुति में कहा गया है कि जो चाहते हो वह प्राप्त होगा: सुबह 108 और शाम 108 पाठ, छोटा स्तोत्र होने से आराम से हो जाता है, लगभग सवा महीना यानी 40 दिन। वे जोर देते हैं कि '40 दिन' वे बार-बार इसलिए बोलते हैं क्योंकि यह अनुभव की बात है, ऐसे ही नहीं बोलते।
देखिए, वक्ता कहते हैं, सीधी सी बात है: करने वाली भगवती हैं, जगदम्बा"जगत की माता" — देवी का एक नाम। हैं। अच्छा और बुरा दोनों वही करती हैं। जब परिवार यहाँ जुड़ा — उनके गृहस्थ तंत्र साधक परिवार से जुड़ा — तो उन्होंने यह बात पहले पूरी तरह नहीं बताई थी। बड़े सामान्य तरीके से बताया कि घर में इस-इस प्रकार की परेशानी है, परेशानियाँ होती हैं; सवारी वाली बात और इतना कुछ जो घर में था, वह नहीं बताया। पहली साधना जो उन्होंने बताई थी वह थी संकट नाशन गणेश स्तोत्र (संकट नाशन स्तोत्र) का नित्य पाठ, और दीक्षित हों तो अपने गुरु मंत्र आदि का जाप — क्योंकि घटना पूरी बताई नहीं गई थी। लेकिन उन्होंने संकट नाशन का काफी लंबा अनुष्ठानएक दीर्घ अनुष्ठान — जिसमें अपने कड़े नियम होते हैं। किया। अच्छे से अनुष्ठान करने के बाद एक चीज हुई: संकट नाशन गणेश स्तोत्र में जो फलश्रुतिकिसी स्तोत्र या शास्त्र का समापन अंश, जिसमें उसके पाठ से प्राप्त होने वाले फलों और लाभों का वर्णन होता है। है उसमें कहा गया है कि जो आप चाहते हैं वह प्राप्त होगा। तो उन्होंने काफी तगड़ी साधना की: एक दिन में सुबह 108, शाम 108 — छोटा स्तोत्र है तो आराम से हो जाता है — और दोनों समय पाठ शुरू किया, लगभग सवा महीना यानी 40 दिन। 'मैं बार-बार बोलता हूँ,' वक्ता जोड़ते हैं; 'यह बहुत अनुभव की बात है; मैं ऐसे नहीं बोलता।'
40 दिन के स्तोत्र अनुष्ठान के बाद पितरों और कुलदेवी से स्वप्न में मार्गदर्शन
लाठी लिए एक बुजुर्ग, और श्वेत वस्त्रों में एक देवी
वक्ता कहते हैं कि 40 दिन के बाद साधक को जीवन में पहली बार ऐसी घटना हुई: शाम को गणपति स्तोत्र का पाठ करते-करते थकान से लगभग निद्रा जैसी अवस्था बन गई, कंठस्थ होने से पाठ नींद में भी चलता रहा, और उन्हें दिखा कि एक बुजुर्ग व्यक्ति लाठी लेकर खड़े हैं और बार-बार कह रहे हैं, 'जिनसे तुम बात कर रहे हो उन्हें सारी बातें बताओ — देखो हम लोगों की अवस्था क्या है; सही तरीके से जानकर करोगे तो हमें यहाँ से मुक्ति मिलेगी और तुम्हारा कार्य भी सिद्ध होगा।' साधक ने इसे टाल दिया, क्योंकि जिस चीज के बारे में बहुत सोचते हैं वही स्वप्न में आती लगती है और वे अर्ध-निद्रा में थे। उसी रात स्वप्न में एक देवी श्वेत वस्त्रों में दिखीं और बोलीं: सबसे पहले अपने कुल की देवी भगवती की सही तरीके से सेवा-पूजा करो, और उसका विधि-विधान जानकर करो। दोनों बातें सुनकर वक्ता ने कहा: जो तुम बता रहे हो, वैसे घर के बड़े-बुजुर्ग पितृ होते हैं, और देवी घर की देवी (कुलदेवी) होंगी जो यह बता रही हैं — तो घर के पितृ क्यों बंधे पड़े हैं?
40 दिन के बाद, वक्ता कहते हैं, साधक ने उन्हें बताया कि जीवन में पहली बार ऐसी घटना घटी। शाम के समय वे गणपति स्तोत्र का पाठ कर रहे थे; पाठ करते-करते, चूँकि थकान थी, लगभग निद्रा जैसी अवस्था बन गई। लगभग नींद में चले गए, लेकिन क्योंकि कंठस्थ था और लंबे समय से पाठ कर रहे थे, नींद में भी पाठ उसी तरह चलता रहा। उसी में दर्शन हुआ: कोई बुजुर्ग व्यक्ति लाठी लेकर खड़े हैं और बार-बार कह रहे हैं, 'जिनसे तुम बात कर रहे हो उनको सारी बातें बताओ। देखो, हम लोगों की अवस्था क्या है? अगर सही तरीके से जानकर इस चीज को करोगे तो हमें यहाँ से मुक्ति मिल जाएगी। तुम्हारा भी कार्य सिद्ध होगा।' वक्ता बताते हैं कि होता क्या है: जब व्यक्ति किसी चीज के बारे में बहुत सोचता है तो उसे लगता है कि वही चीज स्वप्न में आ रही है। और चूँकि साधक अर्ध-निद्रा की अवस्था में थे, जाप करते समय देखा था, तो वे लगभग समझ नहीं पाए कि यह क्या हुआ। उसी रात, जब वे सोए, पुनः स्वप्न में — इस बार जिनका दर्शन हुआ वह एक देवी थीं। देवी का स्वरूप था, लेकिन सफेद वस्त्रों में, और उन्होंने सबसे पहले यह कहा: अपने कुल की जो देवी हैं, भगवती, उनकी सही तरीके से सेवा-पूजा करो, और इसका विधि-विधान जानकर करो। उन्होंने दोनों घटनाएँ वक्ता को बताईं। वक्ता ने पूछा: आप जो बता रहे हैं — इस तरीके से तो घर के बड़े-बुजुर्ग पितृ होते हैं; और घर की देवी, कुलदेवी, होंगी जो यह बता रही होंगी। तो घर के पितृ क्यों बंधे पड़े हुए हैं?
मुसलमानी तंत्र का लक्षण: स्वप्न में गौ-संबंधी निषिद्ध चीजें खिलाए जाने का दिखना
केवल स्वप्न के आधार पर गौमूत्र का प्रयोग बताया गया
वक्ता कहते हैं कि साधक ने दो-तीन बार बताया था कि घर के जो लोग पीड़ित होते थे वे बार-बार स्वप्न में गौ-संबंधी निषिद्ध चीजें देखते थे — स्वप्न में कोई ऐसी चीजें खिला रहा है। इसी से उन्हें लगा कि कोई मुसलमानी तंत्र होगा, और यद्यपि परिवार अभी भी पूरी बात नहीं बता रहा था, उन्होंने कहा कि कुछ ऐसी बात हो सकती है और गोमूत्र का प्रयोग इस-इस प्रकार से करने को कहा। साधक ने उसका प्रयोग कभी किया नहीं, क्योंकि उन्हें पता था कि घर में क्या है पर वे पूरी बात नहीं बता रहे थे; स्वप्न-दर्शन के बाद ही उन्होंने पूरी बात रखी और वक्ता से एक बार देखने को कहा, और वक्ता ने पाया कि बताई गई बातें मेल खा रही हैं — 'ऐसी-ऐसी चीजें आपके पास होनी चाहिए' — जिसे साधक ने स्वीकारा, यह जोड़ते हुए कि इसका कोई तोड़ नहीं निकल रहा।
मंदिर में साधना की दो गलतियाँ: दूसरे के आसन पर बैठना और पंडित के हाथ से पुष्प समर्पण
तंत्र की प्रक्रिया में आपके जाप की ऊर्जा की बात आती है
जब पूछा गया कि साधनाएँ कितने दिन की कीं, तो साधक ने कहा कि घर पर कोई साधना पूरी नहीं हो पाती, इसलिए सब मंदिर में कीं। वक्ता कहते हैं कि वहाँ एक गलती सब करते हैं: बड़े मंदिरों में जो आसन दूसरों का पहले से रखा रहता है उसी पर बैठ जाना; बाहर साधना करने वाले को अपना आसन लेकर जाना है। साथ ही किसी भी देवी-देवता को पुष्प का समर्पण आपके हाथ से सीधे देवता के चरणों में जाना चाहिए — दूर से फेंककर करें या पास जाकर, दोनों चलेगा — समर्पण का शुद्ध भाव हो; पंडित जी से करवाएँ तो पुष्प किसी पत्ते पर रखकर दें ताकि उनके हाथ का स्पर्श पुष्प से न हो और वह वहाँ तक चला जाए। इन बातों का ध्यान न रखें तो, वे कहते हैं, कोई विशेष लाभ नहीं होता, क्योंकि तंत्र की इस प्रक्रिया में भाव से थोड़ा अधिक आपके जाप की ऊर्जा की बात आ जाती है; इन गलतियों के कारण भी साधक की चीजें प्रभावी नहीं हो रही थीं।
फिर साधक ने वक्ता को अपनी साधनाओं के विषय में बताया: मैंने इस-इस प्रकार की साधना की है और करने के बाद भी कोई राहत नहीं मिली। कितने दिन की साधना की? बोले: घर पर कोई साधना पूरी हो ही नहीं पाती; जो भी साधना की है, मंदिर पर की है। और मंदिर पर एक गलती सब करते हैं, वक्ता कहते हैं: मंदिर में दूसरों का आसन रखा रहता है — बड़े-बड़े मंदिरों में पहले से आसन रखा रहता है। उन्होंने साधक से ये सब बातें पूछीं कि वहाँ किस तरीके से साधना की। 'जितने लोग सुन रहे हैं, ध्यान दें।' बाहर कहीं भी साधना करें तो अपना आसन लेकर जाना है। लोग दूसरे के आसन पर बैठते हैं, पाठ करते हैं, समर्पण कर देते हैं। समर्पण जब भी करना है, जिस भी देवी-देवता का, हाथ में पुष्प लेकर: पुष्प पंडित जी के हाथ में न जाकर सीधे देवता के चरणों में जाना चाहिए। या तो दूर से फेंककर समर्पण करें — वह भी चलेगा — या पास जाकर करें, वह भी चलेगा। समर्पण का भाव होना चाहिए, शुद्ध भाव होना चाहिए। और अगर पंडित जी से करवाते हैं तो किसी पत्ते आदि पर रखकर, ताकि पुष्प का स्पर्श पंडित जी के हाथ से न हो और वह वहाँ तक चला जाए। इन सब बातों का ध्यान रखना चाहिए, नहीं तो कोई विशेष लाभ नहीं होगा — क्योंकि तंत्र की इस प्रक्रिया में यहाँ भाव से थोड़ा अधिक आपके जाप की ऊर्जा आदि की बात आ जाती है। इन सभी गलतियों के कारण भी, वक्ता कहते हैं, साधक की चीजें प्रभावी नहीं हो रही थीं; उन्होंने ये सभी विषय उन्हें बताए।
बंधे पितरों तक पहुँचाने के लिए पितृ पक्ष भर चौखट पर दत्तात्रेय माला मंत्र दुग्ध तर्पण
गणपति और दत्तात्रेय: बंधे पितरों तक के दो सबसे सुगम मार्ग
वक्ता कहते हैं कि इस नवरात्रि में उन्होंने साधक को दो साधनाएँ करने को कहा। पहली, पितृ पक्ष में, दत्तात्रेय माला मंत्र की साधना पूरी तर्पण विधि के साथ, क्योंकि जो पितृ बंधन में हैं उन तक कुछ भी नहीं पहुँचता — आप पितरों के निमित्त जो भी करते हैं वह पहुँच नहीं रहा। उसे पहुँचाने के दो सबसे सुगम साधन हैं भगवान गणेश का तंत्र प्रयोग और भगवान दत्तात्रेय, जो सर्वश्रेष्ठ हैं क्योंकि ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीनों शक्तियाँ उनमें विराजमान हैं। उन्होंने दत्तात्रेय तंत्रोक्त यंत्र पर दूध से तर्पण की विधि बताई, तर्पण किया दूध पीपल, बरगद और तुलसी तीनों जगह डालने को कहा — और क्योंकि मुसलमानी चीज थी, तर्पण घर की चौखट पर दीप प्रज्वलित करके करवाया; उस विधान को वे कभी और स्पष्ट करेंगे। साधक ने पितृ पक्ष के पूरे सोलह दिन, पूर्णिमा से अमावस्या तक, इसी विधि से दत्त तर्पण किया और बताया कि पहले दिन से ही काफी शांति मिली।
फिर इस नवरात्रि में, वक्ता कहते हैं, उन्होंने साधक से कहा: दो साधनाएँ कीजिए। पहली साधना: पितृ पक्ष में उनसे दत्तात्रेय माला मंत्र की साधना करवाई — पूरी तर्पणहवन व मार्जन के साथ किया जाने वाला जल आदि द्वारा देवता या पितरों को अर्पित तर्पण। विधि से, दत्तात्रेय तंत्रोक्त तंत्र। क्योंकि जो पितृ बंधन में हैं — उन तक पूजा नहीं पहुँचेगी, कुछ भी नहीं पहुँचेगा। आप पितरों के निमित्त जो भी करते हैं वह पहुँच नहीं रहा। उसे पहुँचाने के लिए दो सबसे सुगम चीजें हैं: एक, भगवान गणेश का तंत्र प्रयोग; और दूसरे, भगवान दत्तात्रेय, जो सर्वश्रेष्ठ हैं, क्योंकि ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीनों शक्तियाँ उनमें विराजमान हैं। तो उन्होंने दत्तात्रेय तंत्रोक्ततंत्र में कहा गया, जो उसी कर्म अथवा मंत्र के वेदोक्त रूप से भिन्न होता है। यंत्र पर दूध से तर्पण करने की विधि बताई, और तर्पण किए गए दूध को तीन जगह — पीपलभगवान दत्तात्रेय को समर्पित एक पवित्र वृक्ष — इसके नीचे किया गया पितृ तर्पण गृह-क्लेश उत्पन्न करने वाले अशांत पितरों को शांत करता है।, बरगदबरगद का वृक्ष, जिसके नीचे कुछ प्रयोग किए जाते हैं और जिस पर प्रेत योनि का वास माना जाता है। और तुलसी — डालने को कहा। क्योंकि मुसलमानी चीज थी, 'तर्पण हम घर की चौखट पर करवाएँगे — चौखट पर कीजिए,' दीप प्रज्वलित करके। वे कहते हैं कि उस विधान को कभी थोड़ा और स्पष्ट कर देंगे। इस प्रकार करवाने के बाद पितृ पक्ष के पूरे सोलह दिन, पूर्णिमा से अमावस्या तक, साधक ने उसी विधि से दत्त तर्पण किया। और पूरे तर्पण के दौरान, उन्होंने वक्ता को बताया, इस प्रक्रिया को करने के पहले दिन से ही काफी शांति मिली।
नवरात्र में नित्य हवन के साथ दुर्गा 108 नामों की सिद्धि, और बाद में परिणाम की जाँच
धमकी भरे स्वप्न इस बात का संकेत कि सही चीज हो रही है
अगला विधान नवरात्रि का था। वक्ता कहते हैं कि उन्होंने साधक से दुर्गा अष्टोत्तरशतनाम — 108 नामों — की सिद्धि चैनल पर दी गई सिद्धि विधि से करने को कहा, पाठ शुरू करके और हवन करके; एक चीज उन्होंने करवाई कि नित्य हवन हो। नौ दिन, नवमी पर्यंत, पूरा पाठ और हवन हुआ, और नवमी को सुबह कन्या पूजन। साधक ने कहा कि जीवन में पहली बार उन्होंने अनुष्ठान पूर्ण होते देखा: पितृ पक्ष से अब तक किसी पर कोई सवारी नहीं आई। केवल बीच-बीच में कोई बहुत तेज बोलने लगता या शरीर में अकड़न शुरू होती, पर पूरी तरह ठीक हो जाता; और बीच में बहुत से खराब स्वप्न आए, जैसे कोई धमकी दे रहा हो कि यह मत करो, जिससे विश्वास और प्रबल हुआ कि सही चीज हो रही है। नवरात्र के बाद वक्ता ने कहा — क्योंकि पहले बहुत से स्थानीय लोगों को दिखाया था — कि फिर किसी स्थानीय को दिखाकर विश्वास में लें कि चीज किस स्तर पर है; उन्होंने बताया कि घर में जो मुसलमानी चीज थी वह फिलहाल कहीं दिख नहीं रही, कहीं न कहीं हट चुकी है। जो भी हुआ, वे कहते हैं, देव योग और भगवती कृपा से हुआ।
अगला विधान नवरात्र का था। नवरात्रि में, वक्ता कहते हैं, उन्होंने साधक से कहा: दुर्गा अष्टोत्तरशतनामकिसी देवता के 108 नामों का पाठ — सहस्रनाम (1000 नाम) से छोटा, और प्रायः संगत हवन या दैनिक जप की गणना हेतु प्रयुक्त। की सिद्धि कीजिए; इसे सिद्ध करने की विधि चैनल पर दी है — उस विधि से पाठ शुरू कीजिए और हवन कीजिए। एक चीज उन्होंने करवाई: नित्य हवन। नवरात्र के नौ दिन, नवमी पर्यंत, पूरा पाठ और हवन; और नवमी को सुबह-सुबह कन्या पूजन आदि। साधक ने कहा: जीवन में पहली बार हमने देखा कि अनुष्ठान पूर्ण हुआ है। इस पूरे समय में, पितृ पक्ष से लेकर अब तक, किसी के शरीर पर कोई सवारी नहीं आई, न ऐसी कोई चीज हुई। केवल बीच-बीच में ऐसा लगता कि किसी पर आएगी — कोई थोड़ा बहुत तेज बोलना शुरू करता, या शरीर में अकड़न शुरू होती — लेकिन पूरी तरह ठीक हो जाता। बीच-बीच में बहुत सारे खराब स्वप्न आते थे, जैसे कोई लगभग धमकी दे रहा हो: इस चीज को मत करो। तो विश्वास प्रबल हो रहा था कि हम सही चीज कर रहे हैं, जिसके कारण धमकी मिल रही है ताकि हम करना छोड़ दें। नवरात्र पूर्ण होने के बाद — क्योंकि पहले बहुत से स्थानीय लोगों को दिखाया था — वक्ता ने फिर कहा: किसी स्थानीय को दिखाकर विश्वास में लीजिए कि चीजें किस स्तर पर हैं, कहाँ हैं, हैं या नहीं। तो उन्होंने जाकर अपने स्थानीय क्षेत्र के देखने-सुनने वालों को दिखाया, और उन्होंने कहा: भाई, आपके घर में जो यह मुसलमानी चीज थी — फिलहाल वह कहीं दिख नहीं रही; कहीं न कहीं हट चुकी है। यह जो भी चीज हो, वक्ता कहते हैं, देव योग से, भगवती कृपा से है। वे बताते हैं कि इससे मिलता-जुलता एक और साधक का अनुभव आया है जिनके घर में भी मुसलमानी चीज थी, आदेश हुआ तो प्रकाशित करेंगे; वर्तमान साधक मध्य प्रदेश के, शायद ग्वालियर जिले के हैं।
पहले पितरों को मुक्त करें, फिर मुसलमानी चीज को कमजोर करें: वराह-दंत गौमूत्र प्रयोग
बंधन-मुक्ति की एक विधि हर जगह नहीं चलती; मंत्र गुप्त रखा गया
वक्ता कहते हैं कि वे यह अनुभव इसलिए रखते हैं कि आप जो भी करते हैं उसका पूरा प्रभाव मिलता है, लेकिन थोड़ा तरीका बदलना पड़ता है। जब स्पष्ट पता चल जाए कि पितृ बंधन में हैं और मुसलमानी चीज है, तो सबसे पहला काम है पितरों को बंधन से मुक्त करना — और बंधन-मुक्ति की एक ही विधि हर जगह लागू नहीं होती: जहाँ मुसलमानी चीज हो वहाँ साथ में कुछ ऐसा भी हो कि उस चीज का प्रभाव कम हो। यहाँ दो-तीन ऐसे विधि-विधान करवाए गए, जिनमें वराह प्रयोग भी था: वराह के दंत को गौ माता के मूत्र में अभिमंत्रित किया गया, उसी दंत में कुश बाँधी गई, और विशेष मंत्र से अभिमंत्रित गोमूत्र घर में छिड़कवाया गया। वह मंत्र वे उजागर नहीं करेंगे — जिसे आवश्यकता हो उसी को दिया जाए तो उत्तम; कुछ चीजें गुप्त रहनी ही चाहिए। इन सबका प्रभाव पड़ा कि वह चीज कमजोर हुई, यद्यपि पुरानी थी; लेकिन निर्णायक बात यह थी कि घर में सभी मानसिक रूप से सबल थे, सबने साथ दिया, सबने पूजन-पाठ-हवन अच्छे से किया। कलह-क्लेश अवश्य मचा और समय शांति से नहीं बीता; वे उन्हें प्रेरित करते रहे: करो, अभी छोड़ना नहीं है। भगवती की कृपा से इस नवरात्र के बाद घर में काफी शांति है, चीजें सौम्य हो चुकी हैं, और विशेष साधनाएँ पुनः आरंभ कर दी गई हैं।
यह अनुभव वे क्यों रख रहे हैं, वक्ता कहते हैं: आप लोग जो भी करते हैं उसका पूरा प्रभाव मिलता है — लेकिन थोड़ा तरीका बदलना पड़ता है। जब चीजों को स्पष्टता से जान जाएँ — कि पितृ बंधन में बंधे हैं, और मुसलमानी चीज है — तो सबसे पहला काम है पितरों को बंधन से मुक्त करना। और बंधन-मुक्ति की एक ही विधि हर जगह लागू नहीं हो पाएगी। जहाँ मुसलमानी चीज है वहाँ साथ में कुछ ऐसा भी होना चाहिए कि उस मुसलमानी चीज का प्रभाव कम हो। यहाँ उन्होंने दो-तीन ऐसे विधि-विधान करवाए। यहाँ वराह प्रयोग भी करवाया गया: वराह के दंत को गौ माता के मूत्र में अभिमंत्रित किया गया; उसी दंत में कुशपवित्र घास, जो आसन, पवित्री और मार्जन में प्रयुक्त होती है; आध्यात्मिक रूप से रोधक मानी जाती है। बाँधी गई — वराह के दंत में कुशा बाँधकर — और गोमूत्रगोमूत्र, पितृ-दोष या अनुष्ठानिक अशुद्धि के उपायों में गंगाजल के साथ शुद्धिकरण-पात्र में थोड़ी मात्रा में मिलाया जाता है। को विशेष मंत्र से अभिमंत्रित किया गया। 'उस मंत्र को मैं उजागर नहीं करूँगा, क्योंकि जिसे आवश्यकता थी उसी को दिया जाए तो उत्तम रहेगा। कुछ चीजें गुप्त रहनी ही चाहिए।' उससे घर में छिड़कवाया। इन सबका प्रभाव पड़ा कि वह चीज कहीं न कहीं कमजोर हुई — हालाँकि चीज पुरानी थी। लेकिन घर में सभी लोग मानसिक रूप से सबल थे; सभी ने साथ दिया; सभी ने पूजन-पाठ-हवन आदि अच्छे से किया। कलह-क्लेश मचा, इसमें कोई दो राय नहीं; ऐसा नहीं कि बिल्कुल शांति से बीता। बीच में थोड़ी उठापटक चली, लेकिन पीछे मानसिक सबलता थी, बीच-बीच में बात होती रहती थी और वे प्रेरित करते रहते थे: भाई करो, अभी छोड़ना नहीं है; ठीक है, जो हो रहा है होने दो, छोड़ना नहीं है। भगवती की कृपा से इस नवरात्र के बाद अब तक का अनुभव यह है कि घर में काफी शांति है; चीजें काफी सौम्य हो चुकी हैं। और अब विशेष साधनाएँ पुनः आरंभ कर दी गई हैं। भगवान दत्तात्रेय की कृपा से, उनके तंत्रोक्त तंत्र के प्रभाव और नवरात्र की साधना के प्रभाव से उन्हें काफी लाभ प्राप्त हो चुका है। वे आशा करते हैं कि श्रोताओं को भी लाभ होगा: अपनी साधना करते हुए यदि सही प्रकार से जान लें कि ऐसी कोई चीज है, तो उस पर विजय प्राप्त कर सकते हैं।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।