साल भर पूजा न करना कब अभिशाप बन जाता है
परिवार में मृत्यु के बाद देव पूजा के नियमों पर नोट्स।
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पहले वार्षिकी श्राद्ध तक घर में देव पूजा और पर्व नहीं
घर में मृत्यु के बाद वर्ष भर का नियम
वक्ता कहते हैं कि जब घर में किसी स्वजन की मृत्यु हो जाती है, तो एक वर्ष के नियम के अनुसार जब तक अगले वर्ष मृत्यु की वही तिथि और मास न आ जाए और पहला वार्षिकी श्राद्ध न हो जाए, तब तक घर में देवताओं का पूजन-पाठ नहीं करना चाहिए। वे कहते हैं कि इस अवधि में न नवरात्रि का पूजन होगा, न शिवरात्रि का, न दीपावली या छठ जैसा कोई पर्व। वे जोड़ते हैं कि यह विषय इसलिए उठा क्योंकि पितृ पक्ष में कई लोगों ने पूछा कि जिनके स्वजन की मृत्यु दो-तीन महीने पहले ही हुई है, वे कुछ करवा सकते हैं या अगले वर्ष तक रुकें।
वक्ता कहते हैं कि सबके सामने यह जानकारी रखना अत्यंत आवश्यक है कि जब घर में किसी स्वजन की मृत्यु हो जाती है, तो एक वर्ष तक के क्या नियम होते हैं। उन नियमों के अनुसार, वे कहते हैं, जब तक अगले वर्ष मृत्यु की वही तिथि और मास न आ जाए और जब तक पहला वार्षिकी श्राद्ध न हो जाए, तब तक घर में देवताओं का पूजन-पाठ नहीं करना चाहिए। वे गिनाते हैं कि इसमें क्या-क्या नहीं होगा: न नवरात्रि का कोई पूजन, न शिवरात्रिप्रत्येक मास आने वाली शिव की चतुर्दशी रात्रि, जो वार्षिक महाशिवरात्रि से भिन्न है। का, न कोई भी पर्व — दीपावली, छठ आदि कुछ भी नहीं। फिर स्वाभाविक प्रश्न, वे कहते हैं, यह है कि इस पूरी अवधि में क्या करना चाहिए। वे बताते हैं कि यह विषय क्यों आवश्यक हुआ: पितृ पक्ष में कई लोगों के संदेश आए कि वे पितृपक्ष में अनुष्ठान करवाना चाहते हैं लेकिन वार्षिकी अभी नहीं हुई है, या उनके स्वजन की मृत्यु दो-तीन महीने पहले या इसी वर्ष हुई है, तो अगले वर्ष तक रुकें या अभी उनके निमित्त कुछ करवा सकते हैं। वे दूसरा प्रश्न भी रखते हैं जिसका उत्तर यह चर्चा देती है: जो लोग तीन या पांच दिन में श्राद्ध निपटा देते हैं या तेरहवीं के तुरंत बाद वार्षिकी कर देते हैं, उनके लिए क्या नियम है।
तीन या पांच दिन में श्राद्ध निपटाने का कोई शास्त्रीय आधार नहीं
अपनी दुर्गति स्वयं लिखने वाला शॉर्टकट
वक्ता कहते हैं कि जो मृत्यु के बाद की विधियाँ (दस गात्र, एकादशी, मलिन षोडशी आदि) तीन या पांच दिन के भीतर पूरी कर देता है, और जो भी उससे करवाता है — चाहे किसी भी पंथ, संप्रदाय या समाज का हो — वह केवल उस परिवार की दुर्गति लिख रहा है। वे कहते हैं कि किसी वेद, शास्त्र या पौराणिक ग्रंथ में कहीं ऐसा नियम नहीं है कि श्राद्ध की सारी विधियाँ पांच दिन में पूरी करके परिवार सूतक से निवृत्त हो जाए। लोग बिजनेस या नौकरी के कारण ऐसा करते हैं, वे कहते हैं, और चाहे कितने भी अमीर हों, बुद्धि भ्रष्ट होने और सड़क पर आने में समय नहीं लगता। वे व्यंग्य में जोड़ते हैं कि अगर तीन-पांच दिन ही मानना है तो लाश जलाइए, अगले दिन नहा-धोकर काम पर जाइए और झूठ-मूठ का पिंड दान भी छोड़ दीजिए।
वक्ता की पहली बात उन लोगों के बारे में है जो श्राद्ध की पूरी प्रक्रिया तीन या पांच दिन में निपटा देते हैं। मृत्यु के तुरंत बाद जहाँ रहते हैं वहाँ जो विधि-विधान होती है, वे कहते हैं, वह है दस गात्र, एकादशी, मलिन षोडशी आदि। यदि यह सब पांच या तीन दिन के भीतर किया जा रहा है, तो जो व्यक्ति आपसे करवा रहा है, चाहे किसी भी पंथ, संप्रदाय या समाज का हो, वह उनके शब्दों में केवल आपकी दुर्गति का "ब्रह्मवलक" लिख रहा है। वे कहते हैं कारण सीधा है: इसका कोई वैदिक या शास्त्रोक्त नियम नहीं है। शास्त्रों में कहीं भी, किसी पौराणिक ग्रंथ में भी, ऐसा विधान नहीं मिलेगा कि पांच दिन में ही श्राद्ध की सभी विधियाँ पूरी कर दी जाएँ और आप सूतक से निवृत्त हो जाएँ। लोग ऐसा इसलिए करते हैं, वे कहते हैं, कि कहीं बिजनेस या सर्विस है: तीन दिन, पांच दिन में निपटाओ, जल्दी-जल्दी खत्म करो। वे बड़े-बड़े लोगों, सेठों, बड़े पदों पर बैठे लोगों की ओर इशारा करते हैं जो यही करते हैं। जो ऐसे कृत्य कर रहे हैं, वे कहते हैं, वे केवल अपनी दुर्गति को निमंत्रण दे रहे हैं। आज वे कितने भी अमीर हों, महीने की सैलरी दस-पंद्रह लाख हो या करोड़ों कमा रहे हों, समय नहीं लगता: बुद्धि भ्रष्ट की जाती है और फिर लोग सड़क पर आ जाते हैं। वे कहते हैं कि आप अपनी दुर्गति स्वयं लिख रहे हैं, उससे गति होने वाली नहीं है। फिर वे इस छद्म कर्म को करने वालों पर व्यंग्य करते हैं: करने की आवश्यकता ही क्या है? लाश ले जाइए, श्मशान में जला दीजिए, हो गया। अगले दिन नहा-धोकर अपना काम करिए। झूठ-मूठ का पिंड दान करने की क्या ज़रूरत है? जब तीन-पांच दिन ही मान रहे हैं तो बिल्कुल मत मानिए, वह पैसा भी क्यों खर्च करना? आपका तो कहना है कि मरे हुए पितर पिंड खाएँगे क्या, तो किसी कुत्ते को या किसी आदमी को खिला दीजिए। छोड़ दीजिए, वे कहते हैं, ये बेवकूफी भरे काम मत करिए।
तेरहवीं के तुरंत बाद वार्षिकी श्राद्ध कर देने से वर्ष भर का पूजा-निषेध हट जाता है
आज के गृहस्थ के लिए एक छूट
वक्ता कहते हैं कि यदि दस गात्र, मलिन षोडशी आदि सब पूर्ण हो गए, गौरी-गणपति पूजन हो गया और तेरहवें दिन के बाद एक दिन रुककर वार्षिकी श्राद्ध की विधि कर दी गई, तो फिर साल भर देवताओं का पूजन रोकने का कोई कारण नहीं है। वे मानते हैं कि कुछ विद्वान कहेंगे कि वर्ष भर होना ही चाहिए, लेकिन कहते हैं कि आज के समय में एक साल तक सारे नियम मान पाना बहुतों के लिए संभव नहीं है, और जिस गृहस्थ के घर में वैसा परिवार या बड़े-बुजुर्ग न हों जो ये नियम निभा सकें, उसके लिए देश, काल, परिस्थिति के अनुसार इतना मान लेना ठीक है। वार्षिकी हो जाने पर, वे कहते हैं, साल भर वाले सूतक का नियम समाप्त हो जाता है।
वक्ता की दूसरी बात उस प्रचलन के बारे में है, जिसमें वार्षिकी जल्दी कर दी जाती है। यदि दस गात्र आदि कर लिए, मलिन षोडशी आदि सब पूर्ण हो गई, गौरी-गणपति पूजन हो गया, और उसके बाद तेरहवें दिन के बाद एक दिन रुककर वार्षिकी श्राद्ध की विधि कर दी, तो, वे पूछते हैं, ऐसी स्थिति में साल भर तक देवताओं का पूजन क्यों रोकेंगे? वे आपत्ति भी स्वीकार करते हैं: कुछ लोग जो विद्वान हैं वे बोलेंगे कि नहीं, वर्ष भर होना चाहिए। लेकिन वे कहते हैं कि अभी के समय में एक साल तक पूरे नियम मान पाना बहुत सारे लोगों के लिए संभव नहीं है। यदि देश, काल, परिस्थिति के अनुसार इतना मान लिया जा रहा है, तो इसमें कोई बात नहीं है। आज के समय के अनुसार गृहस्थ के लिए, वे कहते हैं, माना जा सकता है कि एक साल तक रुक पाना बहुतों के लिए संभव नहीं है, यदि घर-परिवार वैसा न हो या घर में उतने बड़े-बुजुर्ग न हों जो इन सभी नियमों को लेकर चल सकें। और जब वार्षिकी करवा दी, वे कहते हैं, तब साल भर वाला सूतक का नियम समाप्त हो गया; ऐसा नहीं है कि फिर भी एक साल तक सूतक के नियम का पालन करना है।
पैसा बचाने को जल्दी वार्षिकी और फिर झूठा साल भर का पूजा-विराम पितृ दोष लाता है
देवताओं से छल अपने ही वंश से छल
वक्ता एक होशियारी बताते हैं जो कुछ घर करते हैं: तेरहवीं के बाद तुरंत वार्षिकी कर देते हैं और फिर घर में कह देते हैं कि अगले साल तक कोई पूजा-पाठ नहीं होगा, ताकि नवरात्रि के 15-20 हज़ार, शिवरात्रि और दीपावली का खर्च, और साल भर के घी-तेल का पैसा बच जाए। वे कहते हैं कि वही होशियारी फिर उनके लिए लिख दी जाती है। या तो हर महीने मासिक श्राद्ध करते रहिए और वार्षिकी पूरे एक वर्ष बाद ही करके सूतक से निवृत्त होइए, या यदि वार्षिकी जल्दी कर दी है तो देव पूजा फिर से शुरू कीजिए। देवी-देवताओं से ऐसा छल, वे कहते हैं, अपने जीवन और अपने बच्चों से छल है; आगे चलकर वंश परेशान होता है, ज्योतिषी कुंडली में पितृ दोष बताता है, और लोग अपने कर्म को पहचानने के बजाय उसे पाखंड कह देते हैं।
वक्ता कहते हैं कि लोग जल्दी वार्षिकी की छूट में भी अपनी होशियारी लगाते हैं। सोच, उनके शब्दों में, यह है कि साल भर पूजा-पाठ का पैसा बच जाएगा। नवरात्रि में 15-20 हज़ार का खर्च है, शिवरात्रिप्रत्येक मास आने वाली शिव की चतुर्दशी रात्रि, जो वार्षिक महाशिवरात्रि से भिन्न है। में खर्च है, दीपावली में खर्च है, तो उतना खर्च क्यों करना? इसलिए वे तेरहवीं के बाद तुरंत वार्षिकी श्राद्ध कर देते हैं और घर में यह भी कह देते हैं कि अगले साल जब तक यह तिथि, यह महीना दोबारा न आ जाए और इनकी वार्षिकी पुनः न हो, तब तक घर में कोई पूजा-पाठ नहीं होगा। घी का पैसा, तेल का पैसा, सब साल भर के लिए बच गया। बहुत होशियारी, वे कहते हैं; और फिर वही होशियारी आपके लिए भी लिख दी जाती है। वे दो ईमानदार विकल्प देते हैं। या तो नियम के अनुसार पूरे मासिक श्राद्ध करते रहिए और वार्षिकी तुरंत मत कीजिए। जो श्राद्ध एक साल बाद होना है, वह तेरहवीं के तुरंत बाद कर दिया जाता है; वह मत कीजिए, छोड़ दीजिए। हर महीने की उस तिथि को उनका श्राद्ध करते रहिए, और जब एक वर्ष बीत जाए तब वार्षिकी करके सूतक से निवृत्त होइए। ऐसे में साल भर देवताओं का पूजन न करना चलेगा। जो नहीं चलेगा, वे कहते हैं, वह यह कि तेरहवीं के तुरंत बाद वार्षिकी भी कर दी और साल भर देवी-देवताओं की पूजा भी रोक दी। बेवकूफ किसे बना रहे हैं? देवी-देवताओं को नहीं, वे कहते हैं; आप अपने जीवन से छल कर रहे हैं। आपके बाल-बच्चे हैं, उनके साथ छल हो रहा है: उसी वंश को आगे चलकर परेशानी होती है। फिर लोग बैठकर ज्योतिषी, तांत्रिक, डॉक्टर, वकील सबको गाली देते हैं कि इसकी गलती है, उसकी गलती है, जबकि उनके अपने ही कर्म वहाँ लिखे गए हैं। वे कहते हैं कि यह बात लोग किसी को कभी नहीं बताते, और अपने गिरेबान में झाँकने को कहते हैं। ज्योतिषी कहेगा कि कुंडली के अनुसार पितृ दोष है, और लोग बोलेंगे कि सब यही पाखंड फैलाते हैं। लेकिन वह किस कारण से लगा है, वे कहते हैं, इसका विश्लेषण आप खुद कर सकते हैं। हर कोई धीरेंद्र शास्त्री नहीं है जो बता दे कि तुमने यह गलती की है; ज्योतिषी बस इतना कहेगा कि पितरों के निमित्त कुछ कार्य सही नहीं हुए। जब तक आप खुद न बताएँ कि वार्षिकी करके साल भर पूजा रोकी, या वार्षिकी की ही नहीं, या पांच दिन में निपटा दी, तब तक कोई कैसे जानेगा। वे जोड़ते हैं कि हो सकता है जो नई पीढ़ी के बच्चे अभी भुगत रहे हैं और तांत्रिकों-ज्योतिषियों के पास समाधान ढूँढ रहे हैं, उनके माता-पिता ने घर में ऐसे ही कृत्य किए हों। तब, वे कहते हैं, इस तरह की चीज़ें होती हैं।
वार्षिकी से पहले के वर्ष में मासिक पिंडदान: पंडित मिलता हो तो दान उसका विकल्प नहीं
जहाँ भी हों, महीने में एक दिन निकालें
वक्ता उस परिवार की बात करते हैं जिसने तेरहवीं के बाद वार्षिकी नहीं की, हर महीने मृत्यु तिथि पर मासिक श्राद्ध और पिंड दान का नियम उठाया है, लेकिन पिंडदान की जगह ब्राह्मणों या किसी और को मृतक के नाम पर दान देना चाहता है। वे कहते हैं कि यह तभी माना जा सकता है जब वैसा व्यक्ति उपलब्ध न हो या सचमुच समय न हो। यदि आप भारत में कहीं भी हैं और वहाँ श्राद्ध करा सकने वाला विद्वान उपलब्ध है, तो जिनका दिया यह शरीर है उनके लिए महीने में एक दिन निकालना चाहिए। वे जोड़ते हैं कि नौकरी या बिजनेस के कारण बाहर होना बहाना नहीं है: आसपास पता कीजिए, वहाँ के लोग भी मरते होंगे और उनका श्राद्ध होता होगा, वहीं कर लीजिए।
वक्ता वह स्थिति लेते हैं जहाँ तेरहवीं के बाद वार्षिकी श्राद्ध नहीं हुई है, अगले साल ही होगी, और परिवार ने यह नियम भी उठा लिया है कि हर महीने की उस तिथि को श्राद्ध और पिंड दान की विधि करेंगे। वहाँ भी, वे कहते हैं, एक और शॉर्टकट आ जाता है: "हम पिंडदान आदि नहीं करेंगे, केवल ब्राह्मणब्राह्मण वर्ण का व्यक्ति, जिसे अनेक अनुष्ठानों के अंत में भोजन अथवा दक्षिणा दी जाती है।ों को दान दे देंगे या उनके नाम पर किसी को कुछ दान कर देंगे।" वे कहते हैं कि परिस्थिति के अनुसार, यदि वैसा व्यक्ति नहीं है या आपके पास समय नहीं है, तो चलिए, माना जा सकता है। लेकिन यदि आप भारत में हैं, भारत के किसी भी क्षेत्र में, और वहाँ श्राद्ध करा सकने वाले विद्वान उपलब्ध हैं, तो एक दिन का समय तो निकालिए। जिनका दिया हुआ यह शरीर है, या आपके स्वजनों में जिनकी भी मृत्यु हुई जो किसी रूप में आपके कारण बनते हैं, उनके लिए महीने में एक दिन तो निकाल ही सकते हैं। जहाँ भी हों, वे कहते हैं, ऐसा नहीं है कि बिजनेस या जॉब के कारण कहीं और हैं तो वहाँ नहीं कर सकते। आसपास पता करके करवा लीजिए। वहाँ के लोग भी होते हैं, मरते भी हैं, उनकी भी श्राद्ध विधि होती होगी; वहीं कर लीजिए।
वार्षिकी से पहले के वर्ष में अनुमत पूजा: मानसिक पूजा, सूर्य अर्घ्य और तीर्थ में श्राद्ध
क्या वर्जित है और क्या खुला है
वक्ता कहते हैं कि जब वार्षिकी न होने के कारण वर्ष भर पूजन रुका है, तो धूप, दीप, नैवेद्य नहीं कर सकते, देवताओं को स्नान नहीं करा सकते, हवन-यज्ञ नहीं कर सकते, और पर्व-त्योहार पूर्ण रूप से नहीं मना सकते। जो कर सकते हैं वह है मानसिक पूजा (मानसोपचार पूजन), सूर्य भगवान को अर्घ्य, और तीर्थ में जाने पर मुख्य स्थान पर दर्शन न करके वहाँ अपने माता-पिता के निमित्त श्राद्ध की विधि। वे जोड़ते हैं कि वार्षिकी न हुई हो तो इसकी मनाही ही है, इसलिए अपने क्षेत्र की परंपरा के अनुसार चलें: अनुमति हो तो करें, अन्यथा पितरों के निमित्त तीर्थ दर्शन ही कर लें।
वक्ता इस प्रश्न पर आते हैं कि घर में पूजा-पाठ बंद है तो पूजा-पाठ के लिए क्या करना चाहिए। यदि वार्षिकी न होने के कारण वर्ष भर पूजन रुका है, वे कहते हैं, तो धूप, दीप, नैवेद्यपूजा के दौरान देवता को अर्पित किया जाने वाला भोग, जिसके साथ जल अर्पण व समर्पण मंत्र होते हैं। आदि नहीं कर सकते, देवताओं को स्नान नहीं करा सकते, हवन-यज्ञ आदि नहीं कर सकते, और पर्व-त्योहार पूर्ण रूप से नहीं मना सकते। लेकिन, वे कहते हैं, आप मानसोपचार पूजन यानी मानसिक पूजा कर सकते हैं, मन में की जाने वाली पूजा। सूर्य भगवान को अर्घ्य दे सकते हैं। और यदि तीर्थ में जा रहे हैं, तो मुख्य स्थान पर दर्शन न करके वहाँ अपने माता-पिता के निमित्त श्राद्ध आदि की विधि तीर्थ में भी कर सकते हैं। वे तुरंत एक शर्त जोड़ते हैं: जहाँ वार्षिकी नहीं हुई है वहाँ इसकी मनाही ही है, इसलिए अपने क्षेत्र के अनुसार परंपरा का पालन करें। यदि वहाँ अनुमति हो तो करें, अन्यथा पितरों के निमित्त तीर्थ दर्शन ही कर लें।
शोक वर्ष में गीता पाठ: कौन से अध्याय और कैसे बैठें
दिवंगत के लिए रोज़ पंद्रह मिनट
वक्ता कहते हैं कि शोक के वर्ष में श्रीमद्भगवद्गीता पाठ की कोई मनाही नहीं है; सबको पूरे साल भर करना चाहिए। यदि 18 अध्याय संभव न हों, तो तीसरे या सातवें अध्याय का पाठ हिंदी में माहात्म्य सहित कीजिए ताकि अर्थ समझ में आए, और फिर मन लगाकर तेरहवें अध्याय का पाठ; अधिक से अधिक 15 मिनट लगते हैं और रोज़ किया जा सकता है। पूजा स्थान पर नहीं बैठना है, थोड़ा दूर या बाहर बैठें, कुश आसन पर श्वेत वस्त्र पहनकर, आचमन कर सकते हैं, पवित्री धारण और शिखा बंधन कर सकते हैं, यज्ञोपवीत सामान्य स्थिति में ही रखें, और नारायण का स्मरण करते हुए पाठ मन ही मन उनके चरणों में दिवंगत की सद्गति के लिए समर्पित कर दें। ऐसा करने से, वे कहते हैं, वर्ष भर देवताओं और पितरों की कृपा बनी रहती है।
वक्ता कहते हैं कि श्रीमद्भगवद्गीता पाठ की कोई मनाही ही नहीं है, और गीता पाठ तो सभी को पूरे साल भर करना चाहिए। यदि पूरे 18 अध्यायों का पाठ नहीं कर सकते, तो तीसरे अध्याय का कर लीजिए, सातवें अध्याय का कर लीजिए, हिंदी में कीजिए, माहात्म्य सहित कीजिए ताकि समझ में आए कि क्या पाठ करने को कहा जा रहा है और माहात्म्य के अनुसार उससे क्या प्राप्त होगा; उसके बाद मन लगाकर तेरहवें अध्याय का पाठ। बहुत लगेगा तो 15 मिनट लगेंगे, वे कहते हैं, और प्रतिदिन कर सकते हैं। बैठने के बारे में: पूजन स्थान पर नहीं बैठना है। उससे थोड़ा दूर बैठिए, बाहर ही बैठिए। कुश आसन पर सफेद वस्त्र पहनकर बैठ सकते हैं और भगवान नारायण का स्मरण करते हुए पाठ कर सकते हैं। आचमनपूजा से पूर्व आत्मशुद्धि हेतु जल का अनुष्ठानिक आचमन, प्रारंभिक शुद्धिकरण क्रियाओं में से एक। कर सकते हैं, हाथ में पवित्रीकुश घास से बनी अंगूठी जो अनामिका में धारण की जाती है, पितृ कर्म तथा अनेक अनुष्ठानों में आवश्यक। धारण कर सकते हैं, शिखासिर के मध्य रखी जाने वाली केश-शिखा, जिसे कुछ कर्मों से पूर्व बाँधा जाता है। बंधन कर सकते हैं। यज्ञोपवीतवैदिक कर्मों में दीक्षा का प्रतीक यज्ञोपवीत (जनेऊ) संस्कार — पीढ़ियों तक न होने पर, इसे पुनः आरंभ करने से पहले हर ज्ञात पीढ़ी के लिए प्रायश्चित आवश्यक है। को अपसव्य करने की आवश्यकता नहीं है; सामान्य यज्ञोपवीत में ही बैठकर गीता पाठ करें। फिर, वे कहते हैं, मानसिक रूप से उसका समर्पण भगवान नारायण के श्री चरणों में उस स्वजन के निमित्त कर दें जिनका अभी वैकुंठ गमन हुआ है, कि उनकी सद्गतिदिवंगत प्राणी की शुभ गति, जो पितृ कर्म और तर्पण का उद्देश्य है। हो जाए। इस प्रकार करेंगे तो वर्ष भर देवताओं और पितरों की कृपा बनी रहेगी और आगे के लिए भी बहुत कुछ बढ़िया होगा। अंत में वे कहते हैं कि इन नियमों का पालन कीजिए, न कि पैसे या समय बचाने के बहाने खोजकर इन सबके नाम पर ढोंग-पाखंड कीजिए, और दूसरों को दोष देना बंद कीजिए।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।