साल भर पूजा न करना कब अभिशाप बन जाता है

परिवार में मृत्यु के बाद देव पूजा के नियमों पर नोट्स।

7 notes, in the order they are taught. Jump to any one.

The notes
EN हिंदी
01

पहले वार्षिकी श्राद्ध तक घर में देव पूजा और पर्व नहीं

घर में मृत्यु के बाद वर्ष भर का नियम

· Reviewed Sep 14, 2026 · 00:05–00:41

वक्ता कहते हैं कि जब घर में किसी स्वजन की मृत्यु हो जाती है, तो एक वर्ष के नियम के अनुसार जब तक अगले वर्ष मृत्यु की वही तिथि और मास न आ जाए और पहला वार्षिकी श्राद्ध न हो जाए, तब तक घर में देवताओं का पूजन-पाठ नहीं करना चाहिए। वे कहते हैं कि इस अवधि में न नवरात्रि का पूजन होगा, न शिवरात्रि का, न दीपावली या छठ जैसा कोई पर्व। वे जोड़ते हैं कि यह विषय इसलिए उठा क्योंकि पितृ पक्ष में कई लोगों ने पूछा कि जिनके स्वजन की मृत्यु दो-तीन महीने पहले ही हुई है, वे कुछ करवा सकते हैं या अगले वर्ष तक रुकें।

02

तीन या पांच दिन में श्राद्ध निपटाने का कोई शास्त्रीय आधार नहीं

अपनी दुर्गति स्वयं लिखने वाला शॉर्टकट

· Reviewed Sep 14, 2026 · 00:42–03:01

वक्ता कहते हैं कि जो मृत्यु के बाद की विधियाँ (दस गात्र, एकादशी, मलिन षोडशी आदि) तीन या पांच दिन के भीतर पूरी कर देता है, और जो भी उससे करवाता है — चाहे किसी भी पंथ, संप्रदाय या समाज का हो — वह केवल उस परिवार की दुर्गति लिख रहा है। वे कहते हैं कि किसी वेद, शास्त्र या पौराणिक ग्रंथ में कहीं ऐसा नियम नहीं है कि श्राद्ध की सारी विधियाँ पांच दिन में पूरी करके परिवार सूतक से निवृत्त हो जाए। लोग बिजनेस या नौकरी के कारण ऐसा करते हैं, वे कहते हैं, और चाहे कितने भी अमीर हों, बुद्धि भ्रष्ट होने और सड़क पर आने में समय नहीं लगता। वे व्यंग्य में जोड़ते हैं कि अगर तीन-पांच दिन ही मानना है तो लाश जलाइए, अगले दिन नहा-धोकर काम पर जाइए और झूठ-मूठ का पिंड दान भी छोड़ दीजिए।

03

तेरहवीं के तुरंत बाद वार्षिकी श्राद्ध कर देने से वर्ष भर का पूजा-निषेध हट जाता है

आज के गृहस्थ के लिए एक छूट

· Reviewed Sep 14, 2026 · 03:02–03:58

वक्ता कहते हैं कि यदि दस गात्र, मलिन षोडशी आदि सब पूर्ण हो गए, गौरी-गणपति पूजन हो गया और तेरहवें दिन के बाद एक दिन रुककर वार्षिकी श्राद्ध की विधि कर दी गई, तो फिर साल भर देवताओं का पूजन रोकने का कोई कारण नहीं है। वे मानते हैं कि कुछ विद्वान कहेंगे कि वर्ष भर होना ही चाहिए, लेकिन कहते हैं कि आज के समय में एक साल तक सारे नियम मान पाना बहुतों के लिए संभव नहीं है, और जिस गृहस्थ के घर में वैसा परिवार या बड़े-बुजुर्ग न हों जो ये नियम निभा सकें, उसके लिए देश, काल, परिस्थिति के अनुसार इतना मान लेना ठीक है। वार्षिकी हो जाने पर, वे कहते हैं, साल भर वाले सूतक का नियम समाप्त हो जाता है।

04

पैसा बचाने को जल्दी वार्षिकी और फिर झूठा साल भर का पूजा-विराम पितृ दोष लाता है

देवताओं से छल अपने ही वंश से छल

· Reviewed Sep 14, 2026 · 03:59–06:04

वक्ता एक होशियारी बताते हैं जो कुछ घर करते हैं: तेरहवीं के बाद तुरंत वार्षिकी कर देते हैं और फिर घर में कह देते हैं कि अगले साल तक कोई पूजा-पाठ नहीं होगा, ताकि नवरात्रि के 15-20 हज़ार, शिवरात्रि और दीपावली का खर्च, और साल भर के घी-तेल का पैसा बच जाए। वे कहते हैं कि वही होशियारी फिर उनके लिए लिख दी जाती है। या तो हर महीने मासिक श्राद्ध करते रहिए और वार्षिकी पूरे एक वर्ष बाद ही करके सूतक से निवृत्त होइए, या यदि वार्षिकी जल्दी कर दी है तो देव पूजा फिर से शुरू कीजिए। देवी-देवताओं से ऐसा छल, वे कहते हैं, अपने जीवन और अपने बच्चों से छल है; आगे चलकर वंश परेशान होता है, ज्योतिषी कुंडली में पितृ दोष बताता है, और लोग अपने कर्म को पहचानने के बजाय उसे पाखंड कह देते हैं।

05

वार्षिकी से पहले के वर्ष में मासिक पिंडदान: पंडित मिलता हो तो दान उसका विकल्प नहीं

जहाँ भी हों, महीने में एक दिन निकालें

· Reviewed Sep 14, 2026 · 06:05–07:03

वक्ता उस परिवार की बात करते हैं जिसने तेरहवीं के बाद वार्षिकी नहीं की, हर महीने मृत्यु तिथि पर मासिक श्राद्ध और पिंड दान का नियम उठाया है, लेकिन पिंडदान की जगह ब्राह्मणों या किसी और को मृतक के नाम पर दान देना चाहता है। वे कहते हैं कि यह तभी माना जा सकता है जब वैसा व्यक्ति उपलब्ध न हो या सचमुच समय न हो। यदि आप भारत में कहीं भी हैं और वहाँ श्राद्ध करा सकने वाला विद्वान उपलब्ध है, तो जिनका दिया यह शरीर है उनके लिए महीने में एक दिन निकालना चाहिए। वे जोड़ते हैं कि नौकरी या बिजनेस के कारण बाहर होना बहाना नहीं है: आसपास पता कीजिए, वहाँ के लोग भी मरते होंगे और उनका श्राद्ध होता होगा, वहीं कर लीजिए।

06

वार्षिकी से पहले के वर्ष में अनुमत पूजा: मानसिक पूजा, सूर्य अर्घ्य और तीर्थ में श्राद्ध

क्या वर्जित है और क्या खुला है

· Reviewed Sep 14, 2026 · 07:04–07:46

वक्ता कहते हैं कि जब वार्षिकी न होने के कारण वर्ष भर पूजन रुका है, तो धूप, दीप, नैवेद्य नहीं कर सकते, देवताओं को स्नान नहीं करा सकते, हवन-यज्ञ नहीं कर सकते, और पर्व-त्योहार पूर्ण रूप से नहीं मना सकते। जो कर सकते हैं वह है मानसिक पूजा (मानसोपचार पूजन), सूर्य भगवान को अर्घ्य, और तीर्थ में जाने पर मुख्य स्थान पर दर्शन न करके वहाँ अपने माता-पिता के निमित्त श्राद्ध की विधि। वे जोड़ते हैं कि वार्षिकी न हुई हो तो इसकी मनाही ही है, इसलिए अपने क्षेत्र की परंपरा के अनुसार चलें: अनुमति हो तो करें, अन्यथा पितरों के निमित्त तीर्थ दर्शन ही कर लें।

07

शोक वर्ष में गीता पाठ: कौन से अध्याय और कैसे बैठें

दिवंगत के लिए रोज़ पंद्रह मिनट

· Reviewed Sep 14, 2026 · 07:47–08:55

वक्ता कहते हैं कि शोक के वर्ष में श्रीमद्भगवद्गीता पाठ की कोई मनाही नहीं है; सबको पूरे साल भर करना चाहिए। यदि 18 अध्याय संभव न हों, तो तीसरे या सातवें अध्याय का पाठ हिंदी में माहात्म्य सहित कीजिए ताकि अर्थ समझ में आए, और फिर मन लगाकर तेरहवें अध्याय का पाठ; अधिक से अधिक 15 मिनट लगते हैं और रोज़ किया जा सकता है। पूजा स्थान पर नहीं बैठना है, थोड़ा दूर या बाहर बैठें, कुश आसन पर श्वेत वस्त्र पहनकर, आचमन कर सकते हैं, पवित्री धारण और शिखा बंधन कर सकते हैं, यज्ञोपवीत सामान्य स्थिति में ही रखें, और नारायण का स्मरण करते हुए पाठ मन ही मन उनके चरणों में दिवंगत की सद्गति के लिए समर्पित कर दें। ऐसा करने से, वे कहते हैं, वर्ष भर देवताओं और पितरों की कृपा बनी रहती है।

Indexed, not endorsed as instruction

यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।

Explore this topic