मिलन (मुतकरनी): नाम लेकर पुकारने वाला मारण प्रयोग
मिलन नामक क्षेत्रीय मारण विधि पर नोट्स।
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भगतवाल क्षेत्र का क्षेत्रीय मारण: माध्यम के साथ या बिना माध्यम
सिद्ध देव सीधे कार्य करें, या शरीर से जुड़ी वस्तु चाहिए
वक्ता कहते हैं कि तंत्र और भगतवाल के क्षेत्र में अनेक क्षेत्रीय षट्कर्म प्रचलित हैं, और जब कोई तंत्र-प्रवृत्ति का व्यक्ति मारण कर्म करता है तो गुरु परंपरा के भेद से प्रक्रिया अलग-अलग होती है। कुछ परंपराओं में किसी वस्तु की आवश्यकता ही नहीं पड़ती: साधक के आराध्य सिद्ध देव इतने प्रबल होते हैं कि वे स्वयं जाकर लक्ष्य पर सीधे कार्य कर देते हैं और मारण पूर्ण हो जाता है। कुछ में माध्यम चाहिए — लक्ष्य के शरीर से जुड़ी कोई वस्तु, उसका वस्त्र, या उसके पैर के नीचे की मिट्टी के कण। उद्देश्य और तरीके भिन्न हो सकते हैं, पर लोग अपनी सामर्थ्य के अनुसार मारण पूरा करते हैं।
वक्ता आरंभ में कहते हैं कि तंत्र के क्षेत्र में, और भगतवाल के क्षेत्र में, अनेक प्रकार के क्षेत्रीय षट्कर्म होते हैं। इनमें जब कोई तंत्र-प्रवृत्ति का व्यक्ति मारण आदि कर्म करता है, तो गुरु परंपरा के भेद के अनुसार इसकी अनेक प्रक्रियाएँ होती हैं।\n\nकभी, वे कहते हैं, इस पद्धति से किसी पर ऐसा मारण किया जाता है जिसमें किसी भी वस्तु की आवश्यकता नहीं होती। तब साधक के आराध्य सिद्ध देव इतने प्रबल होते हैं कि वे बिना किसी माध्यम के स्वयं जाकर जो भी लक्ष्य हो उस पर सीधे कार्य कर देते हैं और मारण कर्म पूर्ण हो जाता है।\n\nकभी किसी माध्यम की आवश्यकता पड़ती है। वे गिनाते हैं कि क्या चाहिए: जिस व्यक्ति पर कर्म करना हो उसके शरीर से संबंधित कोई वस्तु, उसका वस्त्र, या उसके पैर के नीचे की मिट्टी के कण।\n\nउद्देश्य भिन्न-भिन्न हो सकते हैं, कारण अलग-अलग हो सकते हैं, वे कहते हैं, पर चीजों की आवश्यकता पड़ती है और तरीके अलग-अलग होते हैं। इस प्रकार लोग अपनी सामर्थ्य के अनुसार मारण कर्म को कहीं न कहीं पूरा करने का प्रयास करते हैं।
मिलान, मुठकरणी, मुठ और हांडी: उत्तर प्रदेश-बिहार की एक मारण प्रक्रिया के नाम
चुने हुए स्वरूप में प्रक्षेपित ऊर्जा लक्ष्य को बेधती है
वक्ता कहते हैं कि उत्तर प्रदेश और बिहार के भगतवाल क्षेत्र में एक मारण प्रक्रिया अलग-अलग स्थानीय नामों से चलती है: कहीं इसे मुठकरणी चलाना या मुठ चलाना कहते हैं, कहीं हंडी के द्वारा मारण कर्म। इसी का एक भेद, जो विशेष रूप से बिहार और उत्तर प्रदेश में होता है, मिलन भेजकर मारना कहलाता है। वे इसे ऐसी तंत्र-प्रक्रिया बताते हैं जिसमें भगतवाल का तांत्रिक एक शक्ति का संयोजन करके अपने लक्ष्य पर ऊर्जा का संधान और प्रक्षेपण करता है, और वह उस शक्ति को जो स्वरूप देता है, वह शक्ति उसी स्वरूप में जाकर लक्ष्य को बेधती है।
इसी मारण कर्म में, वक्ता कहते हैं, क्षेत्र के अनुसार एक प्रक्रिया देखने में आती है: उत्तर प्रदेश और बिहार के भगतवाल क्षेत्र में एक प्रक्रिया चलती है जिसे अलग-अलग क्षेत्र में अलग-अलग नाम दिए जाते हैं। कहीं लोग कहते हैं मुठकरणी चलाना या मुठ चलाना; कहीं हंडी के द्वारा किसी पर मारण कर्म।\n\nइसी का एक भेद, वे कहते हैं, विशेष रूप से बिहार के क्षेत्र और उत्तर प्रदेश के क्षेत्र में होता है, जिसे मिलन भेजकर मारना कहते हैं।\n\nवे इसे ऐसी तंत्र-प्रक्रिया बताते हैं जिसमें भगतवाल क्षेत्र से संबंधित तांत्रिक — तंत्र-प्रवृत्ति का व्यक्ति — एक शक्ति का संयोजन करके अपने लक्ष्य पर ऊर्जा का संधान और प्रक्षेपण करता है। वह उस शक्ति को जो भी स्वरूप देता है, वह शक्ति उसी स्वरूप में जाकर सामने वाले लक्ष्य को बेधती है।
मिलान इस तरह रचा जाता है कि मृत्यु का कारण कभी तंत्र न लगे
बलि-भोग और माध्यम वाला तामसिक कर्म, जो एक छलावा है
मिलान शब्द क्यों रखा गया, इस पर वक्ता कहते हैं कि संकल्प के समय जिस भी स्वरूप की व्याख्या की गई हो — और पूरी प्रक्रिया, वे जोड़ते हैं, तामसिक प्रवृत्ति की ही रहती है — साधक पहले बलि, भोग आदि देता है, और उस ऊर्जा को लक्ष्य पर प्रक्षेपित करने से पहले एक विशेष क्रिया करता है जिसमें किसी चीज को माध्यम बनाया जाता है। कर्म इस तरह किया जाता है कि लक्ष्य की मृत्यु का कारण कभी तंत्र न माना जाए: जब भी बाद में कारण की खोज हो, यह कभी न लगे कि वास्तविक कारण तंत्र की प्रक्रिया थी। एक तरह से, वे कहते हैं, यह एक छलावा है।
वक्ता यह प्रश्न उठाते हैं कि मिलन शब्द क्यों रखा गया। संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। के समय जिस भी स्वरूप की व्याख्या की गई हो, वे कहते हैं — समझाने के लिए इस तरह बोल रहे हैं — प्रक्रिया पूरी तरह तामसिक प्रवृत्ति की रहती है।\n\nबलि, भोगगृहस्थ के भोजन से पूर्व देवता के समक्ष अर्पित किया जाने वाला नैवेद्य। इत्यादि देकर, और उस ऊर्जा को सामने वाले व्यक्ति पर प्रक्षेपित करने से पहले, एक विशेष प्रकार की क्रिया की जाती है जिसमें किसी चीज को माध्यम बनाया जाता है।\n\nकर्म इस तरह किया जाता है, वे कहते हैं, कि सामने वाले की मृत्यु का कारण तंत्र न माना जाए। या यूँ समझिए: जब सामने वाले की मृत्यु होगी, तो उसके कारण की जब भी खोज होगी, यह कभी न लगे कि वास्तविक कारण तंत्र की प्रक्रिया थी। एक तरह से, वे कहते हैं, यह एक छलावा है।
मिलान का पहला चरण: परिचित आवाज में नाम लेकर पुकारा जाना
नाम औरों को भी सुनाई देता है; बाहर कोई नहीं दिखता
वक्ता कहते हैं कि हर मिलन में दो बातें बहुत सामान्य होती हैं। पहली: साध्य व्यक्ति को उसके अपने नाम से बुलाया जाता है — जब शक्ति प्रक्षेपित होती है तो वह जाकर उसके नाम से उसका आवाहन करती है। समय कोई भी हो सकता है, सुबह, दोपहर या रात, पर विशेष रूप से रात, और आवाज सदा किसी जान-पहचान वाले की होती है: उसके बच्चे की, किसी मित्र की, पुत्र, भाई या पिता की। केवल साध्य को ही नहीं, प्रायः साथ बैठे सभी को वह नाम सुनाई देता है, पर बुलाया वही एक व्यक्ति जाता है। यदि वह बुलाते ही तुरंत बाहर चला जाए तो उसके साथ घात हो सकता है — और बाहर आने पर उसे कोई दिखाई नहीं देता।
मिलन में सबसे प्रमुख बात, वक्ता कहते हैं, यह है कि इसमें दो चीजें बहुत सामान्य होती हैं। पहली यह कि जब भी यह प्रक्रिया किसी पर की जाएगी तो साध्य व्यक्ति — जिस पर यह कर्म किया जा रहा है — उसे उसके नाम से बुलाया जाएगा। यानी जब शक्ति प्रक्षेपित होगी तो वह जाकर उसके नाम से उसका आवाहन करेगी।\n\nसमय कुछ भी हो सकता है: सुबह, दोपहर या रात, पर विशेष रूप से रात। और जब भी बुलाया जाएगा, बुलाने की आवाज किसी जान-पहचान के व्यक्ति की होगी — उसके बच्चे की आवाज में, किसी परिचित मित्र की आवाज में, अपने पुत्र, भाई, पिता, किसी की भी आवाज में, जब यह प्रक्षेपण होता है।\n\nऐसा नहीं कि केवल उसी व्यक्ति को सुनाई दे। बहुत बार, वे कहते हैं, यह ध्वनि साथ के सभी लोगों को सुनाई देती है। पर नाम का उच्चारण विशेष होता है: मान लीजिए किसी का नाम हरि है और हरि नाम से बुलाया जा रहा है, तो बाकी सदस्यों को भी हरि नाम सुनाई देगा, पर बुलाया हरि को ही जा रहा है। और वह व्यक्ति यदि उसी समय बुलाने वाले के पास चला गया, तो उसके साथ घात हो सकता है।\n\nजब वह व्यक्ति बाहर आएगा, वक्ता कहते हैं, तब उसे वहाँ कोई दिखाई नहीं देगा।
मिलान की पुकार पर बाहर जाने के बाद बचना किस पर निर्भर है
रक्षक देव, बंधन, कवच, पुण्य — अन्यथा 80-85 प्रतिशत हानि
वक्ता कहते हैं कि मिलन की पुकार पर बाहर निकलने वाले के साथ क्या होगा, यह प्रक्रिया से अलग विषय है और उसकी तैयारी पर निर्भर करता है: उसके रक्षक देवी-देवताओं की स्थिति, उसका घर बंधन में है या नहीं, शरीर पर कोई कवच है या नहीं, और वह साधनात्मक व्यक्ति है या साधारण। वे कहते हैं कि वहाँ आपका पुण्य, तपोबल, पूजा-पाठ और घर के देवी-देवता — सब कुछ ताक पर रख दिया जाता है। यदि पुण्य उदय हों और देवता रक्षण में सक्षम हों तो बाहर जाने के बाद भी बच सकते हैं। अन्यथा, यदि कर्म पूरी तरह किया गया हो और आप उनकी हद में बाहर आ गए हों, तो बहुत बार 80 से 85 प्रतिशत यही संभावना है कि बचना मुश्किल हो जाए — कारण चाहे कुछ भी बना दिया जाए।
बुलाया गया व्यक्ति बचेगा या नहीं, वक्ता कहते हैं, यह मिलन की प्रक्रिया से अलग प्रश्न है — प्रक्रिया तो इसी प्रकार चलती है। जिस पर प्रयोग किया गया है उसकी तैयारी क्या है, यही मायने रखता है: उसके रक्षात्मक देवी-देवता किस स्थिति में हैं, उसका घर बंधन में है या नहीं, शरीर पर कोई कवच है या नहीं, और वह साधनात्मक व्यक्ति है या साधारण इंसान।\n\nबाद में इसी पर लौटकर वे कहते हैं कि उस समय आपका पुण्य कर्म, आपका तपोबलतप और निरंतर साधना से अर्जित आध्यात्मिक शक्ति — किसी बाधा को पूर्णतः दूर करने के लिए इसे संचित नकारात्मक या तांत्रिक ऊर्जा से अधिक होना आवश्यक है।, आपका पूजा-पाठ, आपके घर के देवी-देवता — आपका जो भी सब कुछ है — वहाँ ताक पर रख दिया जाता है। यदि आपके पुण्य उदय हैं और आपके देवी-देवता रक्षण में सक्षम हैं, तो आप बच जाएँगे; हो सकता है बाहर जाने के बाद भी कुछ न हो।\n\nनहीं तो, वे कहते हैं, बहुत बार 80 से 85 प्रतिशत संभावना यह होती है कि यदि आपको साध्य करके यह कर्म पूरी तरह कर दिया गया है और आप उनकी हद में बाहर आ गए हैं, तो आपका बचना यहाँ मुश्किल हो जाता है। कारण चाहे कुछ भी बना दिया जाए, पर चीजें इसी प्रकार होती हैं।
मिलान का दूसरा चरण: संकल्प में तय स्वरूप में घात
वृद्ध संत जिन मांत्रिक सर्पों की बात करते हैं, वही मिलान
वक्ता कहते हैं कि लक्ष्य को बुला लिए जाने पर मिलन का पहला चरण पूरा हो जाता है; दूसरा चरण घात है, यानी प्रहार। जब वह व्यक्ति बाहर आता है, तो संकल्प लेकर जिस स्वरूप में शक्ति भेजी गई थी, वही स्वरूप उसके सामने आता है। वे बताते हैं कि भारत भूमि के बहुत वयोवृद्ध संत अपने जीवन की घटनाएँ बताते समय बार-बार कहते हैं कि तंत्रोक्त मांत्रिक सर्पों से उन पर अभिचारिक कर्म किए गए — और क्षेत्रीय भाषा में जिन्हें वे मांत्रिक सर्प कहते हैं, उन्हीं को उत्तर प्रदेश-बिहार में मिलान कहा जाता है।
व्यक्ति को बुला दिए जाने पर, वक्ता कहते हैं, पहला चरण पूरा हो गया। दूसरा चरण है उस पर घात करना — प्रहार। जब वह बाहर आ जाएगा तब दूसरा चरण होगा, और वह होगा घात।\n\nयानी संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। लेकर जिस स्वरूप में शक्ति भेजी गई है, वही स्वरूप उसके समक्ष आएगा।\n\nउदाहरण में वे कहते हैं कि भारत भूमि पर आज बहुत बड़े वयोवृद्ध संत हैं जो अपनी जीवनी की घटनाएँ बताते समय बार-बार कहते हैं कि तंत्रोक्त मांत्रिक सर्पों से उन पर बार-बार अभिचारिक कर्म किए गए हैं। ये मांत्रिक सर्प, वे कहते हैं, क्षेत्रीय भाषा में उनका नाम है; उसी को हम लोग उत्तर प्रदेश-बिहार में मिलन कहते हैं।
सर्प रूप मिलान: सर्पदंश जैसी मृत्यु, पर दंश कहीं नहीं मिलता
सर्प काटे या न काटे, महत्व नहीं रखता
वक्ता कहते हैं कि यदि मिलन में सर्प की इस प्रकार की ऊर्जा का प्रयोग किया गया है तो सामने सर्प आएगा; वह काटे या न काटे, महत्व नहीं रखता। जिस पर अभिचार किया गया है, उसे मंत्रोक्त विधि से बुला लिया गया और वह घर से, अपनी हद से बाहर आ गया, तो वह ऊर्जा उस पर प्रभाव डालती है, और सर्प के डसे बिना ही उसकी मृत्यु का कारण बिल्कुल ऐसा लगता है जैसे सर्प ने काटा हो — सर्पदंश से शरीर में जो-जो केमिकल परिवर्तन होते हैं, वे सब होंगे। पर शरीर की जाँच में, वे कहते हैं, मेडिकल साइंस धोखा खा जाता है, क्योंकि सर्प ने कहाँ काटा, यह पता ही नहीं चलता। इसे साइकोलॉजिकल फेनोमेनन मानिए या जो भी मानिए, वे जोड़ते हैं; तंत्र की दृष्टि से यह क्रिया इसी प्रकार होती है।
तो सर्प आया, वक्ता कहते हैं। अब सर्प कैसा होगा? यदि मिलन में सर्प की इस तरह की ऊर्जा का प्रयोग किया गया है, तो सामने सर्प तो आएगा; वह काटे या न काटे, यह महत्व नहीं रखता।\n\nपर यदि वह उस व्यक्ति के सामने आ गया जिस पर अभिचार किया गया है, और आवाहन दे दिया गया — मंत्रोक्त विधि से बुला लिया गया और वह घर से, अपनी हद से बाहर आ गया — तो वह ऊर्जा उस पर प्रभाव डालेगी। सर्प के डसे बिना ही उसकी मृत्यु का जो कारण बनेगा, वह बिल्कुल ऐसा लगेगा जैसे सर्प ने काटा हो।\n\nयानी सर्प के काटने से शरीर में जो-जो केमिकल परिवर्तन होते हैं, वे सब होंगे। पर वास्तव में जब शरीर में खोजेंगे तो मेडिकल साइंस यहाँ धोखा खा जाता है: आखिर सर्प ने काटा कहाँ? यह पता ही नहीं चल पाता।\n\nअब इसे साइकोलॉजिकल फेनोमेनन मान लीजिए, वे कहते हैं, जो भी मान लीजिए — पर तंत्र की दृष्टि से यह क्रिया इसी प्रकार होती है।
मिलान प्रायः कब भेजा जाता है: नवरात्रि, दीपावली, अमावस्या और पूर्णिमा
बड़े-बुजुर्ग और भुक्तभोगी क्या बताते हैं
वक्ता कहते हैं कि अपने बड़े-बुजुर्गों से या किसी भुक्तभोगी से पूछेंगे तो सुनेंगे कि इस क्षेत्र में जिस घर पर बार-बार मिलन भेजा जाता है, वहाँ यह विशेष रूप से नवरात्रि के समय, दीपावली के आसपास, और अमावस्या-पूर्णिमा के समय होता है: कोई जान-पहचान की आवाज घर के बाहर से किसी सदस्य को उसके नाम से आवाहन देती है — "अरे सुनो" — उसके अपने नाम से पुकारती है। यही, वे कहते हैं, पहला चरण है।
इसी विषय में, वक्ता कहते हैं, यदि आप अपने बड़े-बुजुर्गों से पूछेंगे, या जो कोई भी इसके भुक्तभोगी हैं उन्हें देखेंगे, तो वे देखते हैं कि जब मिलन भेजा जाता है — जिस घर पर इस क्षेत्र में बार-बार अभिचारिक कर्म होते हैं — तो यह इसी प्रकार होता है।\n\nखास करके नवरात्रि के समय, दीपावली के समय और उसके आसपास, और अमावस्या-पूर्णिमा के समय, कोई जान-पहचान की आवाज किसी को आवाहन दे रही होती है, बुला रही होती है — घर के बाहर से उसके नाम से बुलाया जाता है। "अरे सुनो" — उसके नाम से पुकारा जाता है; जैसे किसी को उसके नाम से बुलाते हैं, वैसे ही उस नाम से।\n\nयही, वे कहते हैं, पहला चरण है।
मिलान की सिद्धि कैसे होती है: श्मशान की हांडी और चुने नक्षत्र में पका उड़द
शूद्र जाति, विशेषकर तेली, के शव के पीछे उसकी अग्नि-हांडी के लिए
ऐसा वास्तव में होता है या नहीं, इस प्रश्न पर वक्ता कहते हैं कि हाँ, यह एक प्रक्रिया है जिसमें होता है, और फिर संक्षेप में बताते हैं कि इसे सिद्ध कैसे किया जाता है। मारण के क्रम में श्मशान की वस्तुओं का प्रयोग होता है, और यह प्रयोग लगभग उन्हीं हंडी कर्मों से जुड़ा है जो लोगों ने सुने होंगे ("हांडी उड़ाना", "हांडी चलाना")। पूरी प्रक्रिया बहुत जटिल है और सब बताई नहीं जा सकती, वे कहते हैं; पर एक विशेष नक्षत्र होता है जिसे लोग देखते हैं कि कब है, और उसी नक्षत्र में जब कोई शव श्मशान जा रहा हो तो जाति देखी जाती है — यदि वह शूद्र से संबंधित जाति का हो, विशेष रूप से तेली जाति का, तो सिद्धि चाहने वाला उसके पीछे-पीछे चला जाता है। सनातन धर्म में मृत्यु पर घर से अग्नि एक हांडी में जाती है; साधक वह हांडी कैसे भी प्राप्त करता है और, उसी नक्षत्र के रहते, उसी जलती अग्नि में उड़द पकाता है (कैसे पकाएगा, यह उसका अपना तरीका है) और पका उड़द रख लेता है। यही, वक्ता कहते हैं, पहला चरण है।
वक्ता बताते हैं कि उनसे प्रश्न यह था कि इस प्रकार की चीजें वास्तव में होती हैं या नहीं; उनका उत्तर है कि यह एक प्रक्रिया है जिसमें होता है। फिर वे इस पर आते हैं कि इसे किया कैसे जाता है — जो लोग इसे सिद्ध करते हैं वे कैसे करते हैं, और आखिर यह चीज है क्या।\n\nमारण के क्रम में, वे कहते हैं, विशेष रूप से श्मशान (मसान) की वस्तुओं का प्रयोग होता है। मारण कर्म में हंडी से जुड़ी एक प्रक्रिया होती है — लोगों ने सुना होगा "हांडी उड़ाना", "हांडी चलाना" — और यह प्रयोग लगभग उसी से संबंधित है। वे सरल और संक्षेप में बता रहे हैं; पूरी प्रक्रिया काफी जटिल है और सब कुछ बताया नहीं जा सकता।\n\nएक विशेष नक्षत्रअनुष्ठानों का समय निर्धारित करने हेतु प्रयुक्त 27 चंद्र नक्षत्रों में से एक — हंडी प्राप्ति जैसी कुछ तांत्रिक प्रक्रियाएँ किसी विशेष नक्षत्र की अवधि में ही संपन्न करनी होती हैं। होता है, और लोग देखते हैं कि वह नक्षत्र कब है। उसी नक्षत्र में जब भी श्मशान घाट में कोई शव जा रहा हो, तो जाति भी देखी जाती है — किस जाति के व्यक्ति की मृत्यु हुई, किस जाति का शव है। विशेष रूप से, वे कहते हैं, यदि शूद्र से संबंधित जातियों में से किसी का शव जा रहा हो, और खासकर तेली जाति का हो, तो इस क्रिया को सिद्ध करने वाला व्यक्ति उसके पीछे-पीछे चला जाता है।\n\nसनातन धर्म'सनातन (शाश्वत) धर्म' — वैदिक-पौराणिक-तांत्रिक परंपरा का पारंपरिक नाम, जिसे आज सामान्यतः हिंदू धर्म कहा जाता है। में जब भी किसी की मृत्यु होती है, घर से अग्नि एक हांडी में जाती है। साधक उस हांडी को कैसे भी प्राप्त करने का प्रयास करता है। हांडी मिल जाए तो उसी नक्षत्र के रहते-रहते, उसी हांडी में जो अग्नि जल रही होती है उसमें उड़द पकाने का प्रयास करता है — पकाना उसी अग्नि में होता है। किस तरह पकाएगा या क्या करेगा, वह उसका अपना तरीका है। उस हांडी में उड़द पकाकर वह रख लेता है। यही, वक्ता कहते हैं, पहला चरण है।
मिलान एक निश्चित समय तक ही क्यों चलता है, और तीन असफलताओं के बाद का नियम
पका उड़द इसे चलाता है; चौथा प्रयोग किसी और के हाथ
वक्ता कहते हैं कि बाद में मिलन की पूरी प्रक्रिया श्मशान की हंडी में पके उड़द के दानों के प्रभाव से ही चलती है, इसीलिए यह एक निश्चित समय तक ही चलती है। यदि आप पर यह प्रयोग तीन बार कर दिया गया और तीनों बार असफल हो गया, तो चौथा वह व्यक्ति स्वयं नहीं कर सकता: चौथा प्रयोग किसी और से करवाना होगा, या फिर उसे रुकना होगा और दोबारा शुरू से करना होगा। इसमें और बहुत सी चीजें हैं, वे जोड़ते हैं, बिना गिनाए।
पहले चरण — उड़द पकाकर रख लेने — के बाद, वक्ता कहते हैं कि बाद में उसी उड़द के दानों के प्रभाव से मिलन की यह पूरी प्रक्रिया पूरी की पूरी चलती है। इसीलिए, वे कहते हैं, यह चीज एक निश्चित समय तक ही होती है।\n\nयदि आप पर यह प्रयोग तीन बार कर दिया गया और तीनों बार वह असफल हो जाता है, तो चौथा वह व्यक्ति स्वयं नहीं कर सकता। चौथा प्रयोग किसी और से करवाना होगा, या फिर उसे रुकना पड़ेगा; उसे दोबारा से करना होगा।\n\nइसमें बहुत सारी चीजें होती हैं, वक्ता कहते हैं, और बात वहीं छोड़ देते हैं।
मिलान से बचाव: रात की पुकार पर बिना "कौन हो?" पूछे कभी न जाएँ
सामान्य व्यक्ति जवाब देता है; अधनींद में निकलना ही खतरा
वक्ता कहते हैं कि जब भी आपको लगे कि आप पर अभिचारिक प्रयोग हो रहे हैं, तो यह ध्यान रखें: रात के समय कोई भी आपको बुलाए तो एक बार में सीधे नहीं जाना चाहिए। पूछना चाहिए "कौन हो?" — यदि सामान्य व्यक्ति होगा तो उधर से जवाब देगा। रात में या दोपहर में बिना पूछे कभी दरवाजा न खोलें, और आधी नींद में उठकर सीधे बाहर न चले जाएँ।
सावधानी के रूप में वक्ता कहते हैं कि जब भी किसी को लगे कि उस पर अभिचारिक प्रयोग इत्यादि हो रहे हैं, तो उसे ऐसे भी ध्यान रखना चाहिए: रात के समय जब भी कोई आपको बुलाए, तो सीधे एक बार में नहीं जाना चाहिए।\n\nपूछना चाहिए, "कौन हो?" यदि सामान्य व्यक्ति होगा तो वह उधर से जवाब देगा।\n\nबिना पूछे, वे कहते हैं, रात के समय या दोपहर के समय कभी दरवाजा नहीं खोलना चाहिए — ऐसा नहीं कि आधी नींद में हैं, उठे और सीधे चले गए।
असफल मिलान भी मृत्यु-तुल्य कष्ट दे जाता है
पूजा-पाठ मृत्यु रोक सकता है, बीमारी नहीं
वक्ता कहते हैं कि बहुत बार ऐसा भी होता है कि मिलन का प्रयोग पूरी तरह सफल न हो — क्योंकि आप पूजा-पाठ करते हैं — तो भी वह आपका शरीर खराब कर देगा, तबीयत बहुत ज्यादा बिगड़ जाएगी। कम से कम, वे कहते हैं, मरेंगे नहीं, पर मरण जैसी अवस्था जरूर हो जाएगी; मृत्यु-तुल्य कष्ट अवश्य मिलेगा। इसलिए इन सभी बातों का ध्यान रखना चाहिए।
वक्ता अंत में बताते हैं कि प्रयोग पूरी तरह न चले तो क्या होता है। बहुत बार ऐसा भी होता है, वे कहते हैं, कि यदि मिलन का यह प्रयोग पूरी तरह सफल न हो — आप पूजा-पाठ करते हैं, इसलिए पूरा नहीं लगता — तो भी यह आपका शरीर खराब कर देगा; तबीयत बहुत ज्यादा खराब हो जाएगी।\n\nकम से कम, वे कहते हैं: मरेंगे नहीं, पर मरण जैसी अवस्था जरूर हो जाएगी। मृत्यु-तुल्य कष्ट अवश्य आपको मिल जाएगा।\n\nइसलिए, वे कहते हैं, इन सभी बातों का ध्यान रखना चाहिए।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।