मारण प्रयोग वास्तव में कैसे काम करते हैं
मारण प्रयोग की संरचना और प्रकारों पर विवेचन
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मारण प्रयोग: यह क्या है और इसके दो प्रकार
विष या शस्त्र की तरह मंत्र से वध
वक्ता कहते हैं कि जैसे किसी व्यक्ति को विष देकर या शस्त्र से आघात करके मारा जाता है, ठीक उसी तरह मंत्रों के संयोजन से की जाने वाली कुछ ऐसी क्रियाएँ हैं जिन्हें करने मात्र से जिस व्यक्ति पर लक्ष्य साधा गया है उसकी मृत्यु हो जाती है। यही मारण प्रयोग है। वे कहते हैं कि सबसे पहले यह जान लें कि मारण प्रयोग हमेशा दो प्रकार का होता है: एक जो तुरंत मार देता है, और एक जो कई दिनों तक धीरे-धीरे काम करता है।
वक्ता शुरुआत में कहते हैं कि आज का विषय यह है कि तंत्र के क्षेत्र में मारण प्रयोग किस तरह होता है, इसे आखिर करते कैसे हैं, और यह कितने प्रकार का होता है। वे पहले एक तुलना देते हैं: किसी व्यक्ति को विष देकर मारा जाता है, या किसी शस्त्र से आघात करके उसका वध कर दिया जाता है। ठीक उसी तरह, वे कहते हैं, कुछ मंत्रों के संयोजन से की जाने वाली क्रियाएँ हैं, जिन्हें करने मात्र से जिस व्यक्ति पर लक्ष्य साधकर यह क्रिया की जा रही है, उसकी भी मृत्यु हो जाती है। फिर वे कहते हैं कि सबसे पहली बात यह जानकर रखिए कि मारण प्रयोग हमेशा दो प्रकार का होता है। पहला वह जिसमें कोई सिद्ध व्यक्ति प्रयोग प्रक्षेपित करता है और कुछ क्षणों में सामने वाले की मृत्यु हो जाती है। दूसरा भी मारण ही है, पर उसमें त्वरित मारण नहीं होता; लक्षित व्यक्ति पर धीरे-धीरे कुछ दिनों तक प्रयोग किया जाता है।
तात्कालिक मारण: सिद्ध व्यक्ति अपनी सिद्ध विद्या प्रक्षेपित करता है
कुछ ही क्षणों में मृत्यु, कारण चाहे कुछ भी बने
वक्ता कहते हैं कि मारण प्रयोग का पहला प्रकार तब होता है जब कोई सिद्ध व्यक्ति, कोई तांत्रिक या कोई मांत्रिक जिसने कोई विद्या सिद्ध की हुई है, अपनी सिद्ध की हुई विद्या के द्वारा कोई प्रयोग प्रक्षेपित करता है। कुछ ही क्षणों के भीतर, वे कहते हैं, सामने वाले व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है, कारण चाहे कुछ भी बने। इसे वे कृत्या की सिद्धि कहते हैं: लक्ष्य बनाकर चला देने पर वह जाकर अपने लक्ष्य का भेदन कर लेती है।
पहले प्रकार के मारण प्रयोग का वर्णन करते हुए वक्ता कहते हैं कि यह तब होता है जब कोई सिद्ध व्यक्ति, कोई तांत्रिक या कोई मांत्रिक जिसने कोई विद्या सिद्ध की हुई है, उसी सिद्ध विद्या के द्वारा कोई प्रयोग प्रक्षेपित करता है। कुछ ही क्षणों के भीतर सामने वाले व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है। वे जोड़ते हैं कि कारण कुछ भी बने; यानी मृत्यु का दिखने वाला कारण चाहे जो हो, मृत्यु प्रक्षेपण के बाद होती ही है। अपने उदाहरणों के बाद इसे समेटते हुए वे कहते हैं कि यह कृत्या की ऐसी सिद्धि है कि अगर लक्ष्य बनाकर उसे चला दिया जाए तो वह जाकर स्वयं अपने लक्ष्य का भेदन कर लेती है। मिलन सिद्धि, मुठकरणी प्रयोग और हाड़ी का प्रयोग, इन्हें वे इसी श्रेणी का अंग बताते हैं।
मिलन सिद्धि और मांत्रिक सर्प: नाम पुकारकर मारने वाली शक्ति
जवाब दिया या सामने आए तो देखते ही मृत्यु
वक्ता उत्तर प्रदेश और बिहार के क्षेत्र की एक ग्रामीण भगतवाल प्रक्रिया बताते हैं जिसे मिलन की सिद्धि कहते हैं। जब शक्ति प्रक्षेपित की जाती है तो वह लक्ष्य के पास जाकर उसका नाम पुकारती है; अगर लक्षित व्यक्ति ने जवाब दे दिया या सामने आ गया, समय दिन हो या रात, तो देखने मात्र से उसकी मृत्यु हो जाती है। वे कहते हैं कि लगभग इसी को मांत्रिक सर्प कहा जाता है, और पुरी के शंकराचार्य, जो मिथिलांचल के हैं, अपने कुछ वीडियो में बताते हैं कि उन पर ऐसे मांत्रिक सर्प के प्रयोग किए गए हैं।
तात्कालिक मारण के एक और उदाहरण के रूप में वक्ता कहते हैं कि कोई व्यक्ति ऐसी सिद्धियाँ किए हुए हो सकता है जिन्हें उत्तर प्रदेश और बिहार के क्षेत्र में मिलन सिद्धि कहा जाता है। वे इसे ग्रामीण भगतवाल की प्रक्रिया बताते हैं। इसमें जब किसी शक्ति को प्रक्षेपित किया जाता है तो वह शक्ति अपने लक्ष्य के पास जाकर उसका नाम पुकारती है। अगर लक्षित व्यक्ति ने जवाब दे दिया या सामने आ गया, समय चाहे जो हो, दिन, रात, दोपहर या शाम, तो देखने मात्र से उसकी मृत्यु हो जाती है। वे श्रोताओं से कहते हैं कि पुरी के शंकराचार्य जी के कुछ वीडियो सुनिए, जिनमें वे बताते हैं कि उन पर मांत्रिक सर्पों से यह प्रयोग किए गए हैं। वक्ता कहते हैं कि लगभग इसी को मांत्रिक सर्प कहा जाता है। शंकराचार्य मिथिलांचल क्षेत्र के हैं, और उधर भी इस प्रकार की चीज़ों का प्रयोग होता है।
मुठकरणी और हाड़ी का प्रयोग
चौकी से उठाकर लक्ष्य पर भेजी जाने वाली हाड़ी
वक्ता कहते हैं कि मुठकरणी प्रयोग और हंडी का प्रयोग भी तात्कालिक, कृत्या प्रकार के मारण का ही अंग हैं। हाड़ी के प्रयोग में किसी शक्ति के द्वारा पहले हाड़ी को चौकी से उठाया जाता है और फिर उसे प्रक्षेपित करके लक्षित व्यक्ति पर भेजा जाता है, और उस हाड़ी के द्वारा उसकी मृत्यु संपादित कर दी जाती है।
कृत्या सिद्धि का वर्णन करने के तुरंत बाद वक्ता जोड़ते हैं कि मुठकरणी प्रयोग और हंडी का प्रयोग भी तात्कालिक मारण की इसी श्रेणी का एक अंग हैं। हाड़ी के प्रयोग के बारे में वे बस इतना कहते हैं: किसी शक्ति के द्वारा पहले हाड़ी को चौकी से उठाया जाता है, और फिर उसे प्रक्षेपित किया जाता है, यानी भेजा जाता है। वह जाकर लक्षित व्यक्ति के ऊपर पहुँचती है, और उस हाड़ी के द्वारा उसकी मृत्यु संपादित कर दी जाती है। मुठकरणी प्रयोग का वे और कोई ब्योरा नहीं देते।
क्रमिक मारण: असाध्य रोग जो इलाज से और बढ़ता है
सात दिन से तीन महीने, जितना लंबा उतना अकाट्य
वक्ता कहते हैं कि मारण प्रयोग का दूसरा प्रकार त्वरित नहीं मारता; लक्षित व्यक्ति पर धीरे-धीरे 7 दिन, 10 दिन, 40 दिन या तीन महीने तक का प्रयोग किया जाता है, और जितना ज़्यादा समय लगता है वह उतना ही प्रबल और अकाट्य होता जाता है। इसका मुख्य तरीका यह है कि लक्ष्य के शरीर में कोई विशेष रोग पैदा कर दिया जाता है जिसका इलाज मेडिकल साइंस से संभव नहीं होता: लक्षण दिखेंगे, दवा चलेगी, पर जितना इलाज कराया जाए वह उतना बढ़ता जाता है, और अंत में शरीर में कोई विष या घात बनकर मृत्यु हो जाती है। कहीं-कहीं लक्षण प्रयोग शुरू होते ही उभरने लगते हैं और प्रयोग के अंतिम दिन लक्ष्य की मृत्यु होती है।
वक्ता कहते हैं कि दूसरी विधि भी मारण का ही रूप है, पर उसमें त्वरित मारण नहीं किया जाता। उसमें लक्षित व्यक्ति पर धीरे-धीरे कुछ दिनों का प्रयोग किया जाता है: सात दिन, दस दिन, चालीस दिन, यहाँ तक कि तीन-तीन महीने तक। वे कहते हैं कि वह प्रयोग इतना प्रबल और इतना अकाट्य होता जाता है कि जितना ज़्यादा समय लगता है, वह उतना ही अकाट्य होगा। इस विधि से, वे कहते हैं, मुख्य रूप से यह किया जाता है कि जिस व्यक्ति को लक्ष्य बनाया गया है उसके शरीर में कोई विशेष प्रकार का रोग पैदा कर दिया जाता है, और वह रोग ऐसा होता है जिसका इलाज मेडिकल साइंस से संभव नहीं होता। रोग के लक्षण दिखाई देंगे, उस रोग की दवा चलेगी, जो कुछ होना होगा सब होगा, लेकिन वह ठीक नहीं होगा। जितना इलाज कराया जाए वह उतना बढ़ता जाता है, और अंत में उसी के कारण शरीर में कोई विष पैदा हो जाता है, या शरीर में कोई ऐसा घात होता है जिससे मृत्यु हो जाती है। वे जोड़ते हैं कि कहीं-कहीं, जब ऐसे प्रयोग संपादित किए जा रहे होते हैं, तो प्रयोग आरंभ होते ही लक्षित व्यक्ति के शरीर में लक्षण उभरने लगते हैं, और जिस दिन उस प्रयोग का अंतिम दिन होता है, उसी दिन उसकी मृत्यु हो जाती है।
लक्ष्य के शरीर से स्पर्श की हुई वस्तु के द्वारा मारण
सिद्ध रखी शक्ति, एक तिथि और व्यक्ति की कोई चीज़
वक्ता कहते हैं कि तांत्रिक क्षेत्र में ऐसी विधियाँ होती हैं जिनमें किसी एक शक्ति को जागृत करके, सिद्ध करके रख लिया जाता है; जब भी मारण करना हो, किसी विशेष तिथि या नक्षत्र में लक्षित व्यक्ति के शरीर का कोई अवयव लाकर रखा जाता है और उस पर प्रयोग किया जाता है, और उसकी तत्काल मृत्यु हो जाती है। इसमें न सीधे किसी ऊर्जा का प्रक्षेपण होता है, न व्यक्ति पर कोई विशिष्ट प्रयोग। बस उसके शरीर से स्पर्श की हुई कोई चीज़ काम में ली जाती है: वस्त्र, चप्पल, शरीर का मैल, बाल या नाखून।
वक्ता कहते हैं कि तांत्रिक क्षेत्र में कई बार ऐसी विधियाँ होती हैं कि किसी एक शक्ति को जागृत करके, सिद्ध करके रख लिया जाता है। फिर जब कभी मारण प्रयोग करना होता है, तो सीधे किसी विशेष तिथिचंद्र पंचांग की एक तिथि — कुछ प्रतिमाओं (जैसे शिवलिंग) को प्रतिदिन स्नान आवश्यक है, जबकि अन्य को केवल अपने निर्धारित साप्ताहिक दिन या तिथि पर। या नक्षत्रअनुष्ठानों का समय निर्धारित करने हेतु प्रयुक्त 27 चंद्र नक्षत्रों में से एक — हंडी प्राप्ति जैसी कुछ तांत्रिक प्रक्रियाएँ किसी विशेष नक्षत्र की अवधि में ही संपन्न करनी होती हैं। में लक्षित व्यक्ति के शरीर का कोई अवयव लाकर रखा जाता है और उसके ऊपर प्रयोग किया जाता है, और उसकी तत्काल मृत्यु हो जाती है। वे ज़ोर देकर बताते हैं कि इसमें क्या नहीं होता: न ही किसी प्रकार की ऊर्जा का सीधे प्रक्षेपण किया जाता है, न ही व्यक्ति पर वैसा कोई विशिष्ट प्रयोग। प्रयोग उसके शरीर से स्पर्श की हुई किसी चीज़ के द्वारा किया जाता है। वह वस्त्र हो सकता है, चप्पल हो सकती है, शरीर का मैल, उसके बाल या नाखून हो सकते हैं।
वर्ष के वे समय जब मारण प्रयोग सबसे अधिक फलीभूत होते हैं
होली, दीपावली और बंगाल में तारा चतुर्दशी
वक्ता कहते हैं कि होली के आसपास और दीपावली के एकाध दिन के आसपास जो मृत्यु होती हैं उनमें बहुत सारी अविचारित मृत्यु होती हैं, क्योंकि यही वह समय है जब ऐसे प्रयोग सबसे अधिक फलीभूत होते हैं। वे यह भी कहते हैं कि तारा चतुर्दशी पर मारण चरम पर होता है: बंगाल के क्षेत्र में जितने मारण प्रयोग होने होते हैं उसी समय होते हैं, और बड़े-बड़े लोग, व्यापारी और बिज़नेसमैन जिनमें आपसी द्वेष है, उसी समय ये प्रयोग करवाते हैं।
शरीर की वस्तु से होने वाले प्रयोग को समझाते हुए वक्ता श्रोताओं से कहते हैं कि देखिए, होलिका के समय, होली के आसपास, और दीपावली के एकाध दिन के आसपास जो मृत्यु होती हैं, उनमें बहुत सारी अविचारित मृत्यु होती हैं। यही वह समय है जिसमें इस प्रकार के प्रयोग बहुत अधिक फलीभूत होते हैं। आगे, सिद्धियाँ तैयार रखने वाले साधक की बात करते हुए वे कहते हैं कि ऐसा काम किसी विशेष समय में चरम पर होता है, जैसे तारा चतुर्दशी, जो उनके अनुसार अभी आने वाली है। बंगाल के क्षेत्र में जाइए, वे कहते हैं: उस समय जितने मारण प्रयोग होने वाले होते हैं, वे सब तभी होते हैं। बड़े-से-बड़े लोग, व्यापारी, बिज़नेसमैन, जिनमें आपस में द्वेष है, वे सब उसी समय "समझाने" के नाम पर ये प्रयोग करवाते हैं।
लक्ष्य की किसी वस्तु के बिना मारण: साधक के पास पहले से क्या होना चाहिए
सिद्धियाँ, कृत्या, जागृत देवता, गुरु प्रदत्त विद्याएँ
वक्ता वह स्थिति लेते हैं जब लक्ष्य के शरीर से जुड़ी कोई वस्तु उपलब्ध नहीं है। तब, वे कहते हैं, मारण करने वाले व्यक्ति के पास स्वयं सिद्धि होनी चाहिए: उसने कृत्या प्रयोग आदि सिद्ध किए हों, उसके देवता जागृत हों, उसने किसी विशेष प्रकार के मंत्रों का अनुष्ठान किया हो, और गुरु प्रदत्त विद्याएँ उसके पास उपलब्ध हों। इसके साथ, किसी विशेष समय जैसे तारा चतुर्दशी में, श्मशान में मंडल और पुतला के द्वारा प्रयोग किया जाता है।
शरीर की वस्तु से होने वाला मारण बता चुकने के बाद वक्ता कहते हैं कि एक विषय और देखते हैं। मान लीजिए जिस व्यक्ति पर मारण करना है, उसके शरीर से संबंधित कोई वस्तु करने वाले के पास नहीं है। लेकिन, वे कहते हैं, जो व्यक्ति मारण प्रयोग करने वाला है उसने सिद्धि प्राप्त की हुई है: उसने कृत्या प्रयोग आदि सिद्ध किए हुए हैं, उसके देवता जागृत हैं, उसने किसी विशेष प्रकार के मंत्रों का अनुष्ठान किया है, और गुरु प्रदत्त विद्याएँ आदि उसके पास उपलब्ध हैं। तब किसी विशेष समय में, जैसे तारा चतुर्दशी, जब यह चरम पर होता है, एक विशेष प्रकार का मंडल बनाकर, जिसके मध्य में लक्ष्य का पुतला होता है, प्रायः श्मशान में यह प्रक्रिया की जाती है। उस निर्माण का वर्णन वक्ता अलग से करते हैं।
श्मशान के यंत्र में पुतले का निर्माण
जड़ी-बूटियाँ और कुत्ते, बिल्ली, कौवे, चमगादड़ का रक्त
वक्ता कहते हैं कि इस प्रक्रिया में एक विशेष प्रकार का मंडल बनाया जाता है, और इसका प्रयोग अधिकतर चिता भूमि में, श्मशान आदि क्षेत्र में किया जाता है। उस यंत्र के मध्य में जिस व्यक्ति पर प्रयोग करना है उसके नाम का एक पुतला बनता है। पुतले में कुछ विशेष अवयव होते हैं, कुछ जड़ी-बूटियाँ मिलाई जाती हैं, और कुछ तामसिक पदार्थ जैसे कुत्ते का रक्त, बिल्ली का रक्त, कौवे का रक्त, चमगादड़ का रक्त।
वक्ता कहते हैं कि इस प्रक्रिया में एक विशेष प्रकार का मंडल बनाया जाता है। इसका प्रयोग अधिकतर चिता भूमि में ही किया जाता है; श्मशान आदि के क्षेत्र में यह प्रयोग किया जाता है। उस यंत्र के मध्य में जिस व्यक्ति पर प्रयोग किया जाना है, उसके नाम का एक पुतला बनता है। पुतले में कुछ विशेष अवयव होते हैं। कुछ जड़ी-बूटियाँ मिलाई जाती हैं। कुछ तामसिक पदार्थ होते हैं, जैसे कुत्ते का रक्त, बिल्ली का रक्त, कौवे का रक्त, चमगादड़ का रक्त, इस प्रकार की कुछ चीज़ें। बाद में, कफ़न का वस्त्र और हाड़ी इकट्ठे हो जाने पर, इन सभी सामग्रियों का मिश्रण करके यंत्र के मध्य में उससे पुतला बनाया जाता है।
लक्ष्य की जाति से मेल खाता कफ़न का वस्त्र, और श्मशान से बिना फूटी हाड़ी
ब्राह्मण लक्ष्य के लिए ब्राह्मण शव का अंतिम वस्त्र
वक्ता कहते हैं कि पुतले के लिए श्मशान में आए किसी शव के अंतिम वस्त्र चाहिए, जिन्हें वैतालिक या पिशाच वस्त्र कहा जाता है, और जो सही समय पर श्मशान में आई लाश से लिए जाते हैं; शव लक्ष्य की जाति का होना चाहिए: ब्राह्मण का विनाश करना है तो ब्राह्मण शव का वस्त्र, क्षत्रिय के लिए क्षत्रिय का। अगर केवल रोग या पीड़ा देनी है तो सबसे क्षुद्र जाति के व्यक्ति का वस्त्र लिया जाता है। साथ ही वह मिट्टी की हंडी भी ली जाती है जिसमें घर से अग्नि जलाकर लाई जाती है, अगर वह बिना फूटी मिल जाए।
वक्ता कहते हैं कि कफ़न की सामग्री श्मशान में इकट्ठी की जाती है और वह लक्ष्य की जाति से मेल खानी चाहिए। अगर ब्राह्मणब्राह्मण वर्ण का व्यक्ति, जिसे अनेक अनुष्ठानों के अंत में भोजन अथवा दक्षिणा दी जाती है। जाति के किसी व्यक्ति का विनाश करना है, तो श्मशान में कोई ब्राह्मण शव आया हो, और उसका भी समय है: उसी समय में वह लाश आनी चाहिए। उस शरीर के वैतालिक वस्त्र, जिन्हें पिशाच वस्त्र भी कहा जाता है, यानी जो अंतिम वस्त्र होते हैं, वे लिए जाते हैं और पुतले में डाले जाते हैं। अगर लक्ष्य क्षत्रिय है तो क्षत्रिय शव चाहिए होगा। वे एक छोटे उद्देश्य के लिए अलग नियम जोड़ते हैं: अगर मृत्यु नहीं, केवल रोग या पीड़ा ही देनी है, तो सबसे क्षुद्र जाति का जो व्यक्ति मिले, या जिसके विषय में जानकारी हो, उसका उपयोग होता है, और वहाँ से इस प्रकार की चीज़ें इकट्ठी की जाती हैं। इसके साथ, वे कहते हैं, वह मटकी भी ले ली जाती है जिसमें घर से अग्नि प्रज्वलित करके लाई जाती है, बशर्ते वह हंडी बिना फोड़े हुए मिल जाए।
पुतले की तांत्रिक प्राण प्रतिष्ठा और यंत्र के छह भागों का जागरण
वैदिक मंत्र नहीं, नाम और गोत्र
वक्ता कहते हैं कि यंत्र के मध्य में बने पुतला की प्राण प्रतिष्ठा की जाती है, पर उन वैदिक मंत्रों से नहीं जिनसे मंदिर की मूर्ति की प्रतिष्ठा होती है; विधियाँ तंत्रोक्त होती हैं, और उनमें बस उस व्यक्ति का नाम और गोत्र पता होना चाहिए जिस पर प्रयोग किया जा रहा है। प्रतिष्ठा पूरी होने पर यंत्र के विभिन्न हिस्सों में उनसे संबंधित विद्याओं की शक्तियों को जागृत किया जाता है। वे कहते हैं कि ऐसे छह हिस्से माने गए हैं, होते दस हैं, और प्रमुखता से लोग छह वाले ही प्रयोग करते हैं। जब वे जागृत हो जाती हैं, तब लक्ष्य के शरीर पर घात आरंभ होता है।
यंत्र के मध्य में मिश्रित सामग्रियों से पुतला बन जाने के बाद, वक्ता कहते हैं, उसमें प्राण प्रतिष्ठा की जाती है। वे कहते हैं कि ऐसा कुछ नहीं है कि जिन वैदिक मंत्रों से हम किसी मूर्ति या विग्रह में प्रतिष्ठा करते हैं, वैसी कोई विधि हो। वे तंत्रोक्ततंत्र में कहा गया, जो उसी कर्म अथवा मंत्र के वेदोक्त रूप से भिन्न होता है। विधियाँ होती हैं। बस उसमें उस व्यक्ति का नाम, गोत्रपरिवार का पितृवंशीय वंश-नाम, संकल्प के समय अपने नाम के साथ बताया जाता है। आदि पता होना चाहिए जिसके विषय में यह प्रयोग किया जा रहा है। जब वह पूरी प्रतिष्ठा विधि पूरी हो जाती है, वे कहते हैं, तब यंत्र के विभिन्न हिस्सों में इनसे संबंधित जो विद्याएँ होती हैं, उनकी शक्तियों को जागृत किया जाता है। ऐसे छह हिस्से माने गए हैं, होते दस हैं; प्रमुखता से लोग छह वाले ही प्रयोग करते हैं। जब वे शक्तियाँ जागृत हो जाती हैं, उसके बाद लक्ष्य के शरीर पर घात आरंभ होता है।
वैतालिक और पिशाचिक मंत्रों से अभिमंत्रित सुइयों से पुतले का वेधन
फ़िल्मों जैसा, पर सुई साधारण नहीं होती
वक्ता कहते हैं कि अंतिम चरण लगभग वैसा ही है जैसा फ़िल्मों, सीरियलों और कथा-कहानियों में दिखाया जाता है, पुतले के किसी विशेष हिस्से में पिन चुभाई गई और सामने वाला तत्काल मर गया, पर वह पिन साधारण नहीं होती। उसे कई-कई दिनों तक किसी विशेष पशु के रक्त में या किसी निकृष्ट स्थान में रखकर वैतालिक और पिशाचिक मंत्रों से जागृत, यानी उस पर अभिमंत्रण किया गया रहता है। जब वह अभिमंत्रित पिन अभिमंत्रित यंत्र के मध्य खड़े पुतला में गाड़ी जाती है, तो जिस व्यक्ति को लक्षित करके वहाँ प्रतिष्ठा की गई है उसकी असामान्य परिस्थितियों में मृत्यु हो जाती है।
वक्ता कहते हैं कि सामान्यतः लोग फ़िल्मों में, कुछ सीरियलों में या कथा-कहानियों में सुनते हैं कि किसी विशेष हिस्से में पिन चुभाई गई और सामने वाला व्यक्ति तत्काल मृत्यु को प्राप्त हो गया। यहाँ की क्रियाएँ, वे कहते हैं, लगभग इसी से मिलती-जुलती होती हैं। पर जो शस्त्राघात किया जा रहा है, यानी एक-एक पिन, वह पिन ऐसे ही नहीं होती। पिन को कई-कई दिनों तक किसी विशेष पशु के रक्त में या किसी निकृष्ट स्थान में रखकर वैतालिक मंत्रों और पिशाचिक मंत्रों के द्वारा जागृत किया जाता है। जागृत का अर्थ, वे समझाते हैं, कि उस पर अभिमंत्रण किया गया है। जब वही पिन अभिमंत्रित यंत्र के मध्य उपस्थित पुतला पर गाड़ी जाती है, तो जिस व्यक्ति को लक्षित किया गया है, जिसकी वहाँ प्रतिष्ठा की गई है, उसकी असामान्य परिस्थितियों में मृत्यु हो जाती है। यही, वे कहते हैं, मारण के विभिन्न प्रकार के प्रयोग हैं।
सावधानी: मारण प्रयोग केवल जानकारी के लिए बताया गया है
जो स्वयं करे, ज़िम्मेदारी उसी की
वक्ता कहते हैं कि मारण प्रयोग का यह विषय रखने का एकमात्र तात्पर्य यह था कि लोगों को कुछ सीमा तक जानकारी हो कि ऐसे प्रयोग कैसे किए जाते हैं। वे कहते हैं कि उनका ऐसा कोई उद्देश्य नहीं कि कोई इस प्रकार की प्रक्रियाएँ करे, न ही वे प्रोत्साहित कर रहे हैं। जो कोई यह सुनकर स्वयं ऐसा प्रयोग करता है, उससे किसी को हानि या लाभ हो तो उसका ज़िम्मेदार वह खुद होगा; चैनल का या बताने वाले का इससे कोई लेना-देना नहीं। वे कहते हैं कि आगे के वीडियो में यह बताया जाएगा कि किसी पर मारण प्रयोग हो जाने के बाद क्या लक्षण प्रकट होते हैं और उन्हें ध्यान में रखकर उस प्रयोग को विफल करके अपने स्वजनों की रक्षा कैसे की जा सकती है।
बात समाप्त करते हुए वक्ता कहते हैं कि यह विषय सबके सामने रखने का सिर्फ़ यह तात्पर्य था कि कुछ सीमा तक लोगों को यह जानकारी हो कि मारण प्रयोग आदि कैसे किए जाते हैं। वे कहते हैं कि उनका ऐसा कोई उद्देश्य नहीं है कि कोई इस प्रकार की प्रक्रियाएँ करे, न ही वे प्रोत्साहित कर रहे हैं, न ही ऐसा कोई विषय है। अतः, वे कहते हैं, यह सुनने के बाद अगर कोई स्वयं ऐसा प्रयोग करता है और उससे किसी को हानि या लाभ होता है, तो उसका ज़िम्मेदार वह खुद होगा। इस चैनल का, या इस चैनल पर ये बातें बताने वालों का, इससे कोई लेना-देना नहीं है। यह जानकारी सिर्फ़ इंफ़ॉर्मेशन के रूप में रखी गई थी। फिर वे कहते हैं कि आगे के वीडियो में यह भी जानेंगे कि जब किसी पर मारण प्रयोग हो जाता है तो उसके बाद क्या-क्या लक्षण प्रकट होने शुरू होते हैं, और उन लक्षणों को ध्यान में रखकर किस प्रकार उस प्रयोग को विफल करके अपने स्वजनों, अपने प्रियजनों की रक्षा की जा सकती है। इस वीडियो में वे कोई लक्षण या उपाय नहीं बताते।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।