मारण प्रयोग वास्तव में कैसे काम करते हैं

मारण प्रयोग की संरचना और प्रकारों पर विवेचन

13 notes, in the order they are taught. Jump to any one.

The notes
EN हिंदी
01

मारण प्रयोग: यह क्या है और इसके दो प्रकार

विष या शस्त्र की तरह मंत्र से वध

· Reviewed Sep 14, 2026 · 00:05–00:49

वक्ता कहते हैं कि जैसे किसी व्यक्ति को विष देकर या शस्त्र से आघात करके मारा जाता है, ठीक उसी तरह मंत्रों के संयोजन से की जाने वाली कुछ ऐसी क्रियाएँ हैं जिन्हें करने मात्र से जिस व्यक्ति पर लक्ष्य साधा गया है उसकी मृत्यु हो जाती है। यही मारण प्रयोग है। वे कहते हैं कि सबसे पहले यह जान लें कि मारण प्रयोग हमेशा दो प्रकार का होता है: एक जो तुरंत मार देता है, और एक जो कई दिनों तक धीरे-धीरे काम करता है।

02

तात्कालिक मारण: सिद्ध व्यक्ति अपनी सिद्ध विद्या प्रक्षेपित करता है

कुछ ही क्षणों में मृत्यु, कारण चाहे कुछ भी बने

· Reviewed Sep 14, 2026 · 00:50–01:09

वक्ता कहते हैं कि मारण प्रयोग का पहला प्रकार तब होता है जब कोई सिद्ध व्यक्ति, कोई तांत्रिक या कोई मांत्रिक जिसने कोई विद्या सिद्ध की हुई है, अपनी सिद्ध की हुई विद्या के द्वारा कोई प्रयोग प्रक्षेपित करता है। कुछ ही क्षणों के भीतर, वे कहते हैं, सामने वाले व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है, कारण चाहे कुछ भी बने। इसे वे कृत्या की सिद्धि कहते हैं: लक्ष्य बनाकर चला देने पर वह जाकर अपने लक्ष्य का भेदन कर लेती है।

03

मिलन सिद्धि और मांत्रिक सर्प: नाम पुकारकर मारने वाली शक्ति

जवाब दिया या सामने आए तो देखते ही मृत्यु

· Reviewed Sep 14, 2026 · 01:10–02:05

वक्ता उत्तर प्रदेश और बिहार के क्षेत्र की एक ग्रामीण भगतवाल प्रक्रिया बताते हैं जिसे मिलन की सिद्धि कहते हैं। जब शक्ति प्रक्षेपित की जाती है तो वह लक्ष्य के पास जाकर उसका नाम पुकारती है; अगर लक्षित व्यक्ति ने जवाब दे दिया या सामने आ गया, समय दिन हो या रात, तो देखने मात्र से उसकी मृत्यु हो जाती है। वे कहते हैं कि लगभग इसी को मांत्रिक सर्प कहा जाता है, और पुरी के शंकराचार्य, जो मिथिलांचल के हैं, अपने कुछ वीडियो में बताते हैं कि उन पर ऐसे मांत्रिक सर्प के प्रयोग किए गए हैं।

04

मुठकरणी और हाड़ी का प्रयोग

चौकी से उठाकर लक्ष्य पर भेजी जाने वाली हाड़ी

· Reviewed Sep 14, 2026 · 02:06–02:21

वक्ता कहते हैं कि मुठकरणी प्रयोग और हंडी का प्रयोग भी तात्कालिक, कृत्या प्रकार के मारण का ही अंग हैं। हाड़ी के प्रयोग में किसी शक्ति के द्वारा पहले हाड़ी को चौकी से उठाया जाता है और फिर उसे प्रक्षेपित करके लक्षित व्यक्ति पर भेजा जाता है, और उस हाड़ी के द्वारा उसकी मृत्यु संपादित कर दी जाती है।

05

क्रमिक मारण: असाध्य रोग जो इलाज से और बढ़ता है

सात दिन से तीन महीने, जितना लंबा उतना अकाट्य

· Reviewed Sep 14, 2026 · 02:22–03:32

वक्ता कहते हैं कि मारण प्रयोग का दूसरा प्रकार त्वरित नहीं मारता; लक्षित व्यक्ति पर धीरे-धीरे 7 दिन, 10 दिन, 40 दिन या तीन महीने तक का प्रयोग किया जाता है, और जितना ज़्यादा समय लगता है वह उतना ही प्रबल और अकाट्य होता जाता है। इसका मुख्य तरीका यह है कि लक्ष्य के शरीर में कोई विशेष रोग पैदा कर दिया जाता है जिसका इलाज मेडिकल साइंस से संभव नहीं होता: लक्षण दिखेंगे, दवा चलेगी, पर जितना इलाज कराया जाए वह उतना बढ़ता जाता है, और अंत में शरीर में कोई विष या घात बनकर मृत्यु हो जाती है। कहीं-कहीं लक्षण प्रयोग शुरू होते ही उभरने लगते हैं और प्रयोग के अंतिम दिन लक्ष्य की मृत्यु होती है।

06

लक्ष्य के शरीर से स्पर्श की हुई वस्तु के द्वारा मारण

सिद्ध रखी शक्ति, एक तिथि और व्यक्ति की कोई चीज़

· Reviewed Sep 14, 2026 · 03:33–04:20

वक्ता कहते हैं कि तांत्रिक क्षेत्र में ऐसी विधियाँ होती हैं जिनमें किसी एक शक्ति को जागृत करके, सिद्ध करके रख लिया जाता है; जब भी मारण करना हो, किसी विशेष तिथि या नक्षत्र में लक्षित व्यक्ति के शरीर का कोई अवयव लाकर रखा जाता है और उस पर प्रयोग किया जाता है, और उसकी तत्काल मृत्यु हो जाती है। इसमें न सीधे किसी ऊर्जा का प्रक्षेपण होता है, न व्यक्ति पर कोई विशिष्ट प्रयोग। बस उसके शरीर से स्पर्श की हुई कोई चीज़ काम में ली जाती है: वस्त्र, चप्पल, शरीर का मैल, बाल या नाखून।

07

वर्ष के वे समय जब मारण प्रयोग सबसे अधिक फलीभूत होते हैं

होली, दीपावली और बंगाल में तारा चतुर्दशी

· Reviewed Sep 14, 2026 · 04:21–04:28

वक्ता कहते हैं कि होली के आसपास और दीपावली के एकाध दिन के आसपास जो मृत्यु होती हैं उनमें बहुत सारी अविचारित मृत्यु होती हैं, क्योंकि यही वह समय है जब ऐसे प्रयोग सबसे अधिक फलीभूत होते हैं। वे यह भी कहते हैं कि तारा चतुर्दशी पर मारण चरम पर होता है: बंगाल के क्षेत्र में जितने मारण प्रयोग होने होते हैं उसी समय होते हैं, और बड़े-बड़े लोग, व्यापारी और बिज़नेसमैन जिनमें आपसी द्वेष है, उसी समय ये प्रयोग करवाते हैं।

08

लक्ष्य की किसी वस्तु के बिना मारण: साधक के पास पहले से क्या होना चाहिए

सिद्धियाँ, कृत्या, जागृत देवता, गुरु प्रदत्त विद्याएँ

· Reviewed Sep 14, 2026 · 04:29–05:12

वक्ता वह स्थिति लेते हैं जब लक्ष्य के शरीर से जुड़ी कोई वस्तु उपलब्ध नहीं है। तब, वे कहते हैं, मारण करने वाले व्यक्ति के पास स्वयं सिद्धि होनी चाहिए: उसने कृत्या प्रयोग आदि सिद्ध किए हों, उसके देवता जागृत हों, उसने किसी विशेष प्रकार के मंत्रों का अनुष्ठान किया हो, और गुरु प्रदत्त विद्याएँ उसके पास उपलब्ध हों। इसके साथ, किसी विशेष समय जैसे तारा चतुर्दशी में, श्मशान में मंडल और पुतला के द्वारा प्रयोग किया जाता है।

09

श्मशान के यंत्र में पुतले का निर्माण

जड़ी-बूटियाँ और कुत्ते, बिल्ली, कौवे, चमगादड़ का रक्त

· Reviewed Sep 14, 2026 · 05:13–05:44

वक्ता कहते हैं कि इस प्रक्रिया में एक विशेष प्रकार का मंडल बनाया जाता है, और इसका प्रयोग अधिकतर चिता भूमि में, श्मशान आदि क्षेत्र में किया जाता है। उस यंत्र के मध्य में जिस व्यक्ति पर प्रयोग करना है उसके नाम का एक पुतला बनता है। पुतले में कुछ विशेष अवयव होते हैं, कुछ जड़ी-बूटियाँ मिलाई जाती हैं, और कुछ तामसिक पदार्थ जैसे कुत्ते का रक्त, बिल्ली का रक्त, कौवे का रक्त, चमगादड़ का रक्त।

10

लक्ष्य की जाति से मेल खाता कफ़न का वस्त्र, और श्मशान से बिना फूटी हाड़ी

ब्राह्मण लक्ष्य के लिए ब्राह्मण शव का अंतिम वस्त्र

· Reviewed Sep 14, 2026 · 05:45–06:30

वक्ता कहते हैं कि पुतले के लिए श्मशान में आए किसी शव के अंतिम वस्त्र चाहिए, जिन्हें वैतालिक या पिशाच वस्त्र कहा जाता है, और जो सही समय पर श्मशान में आई लाश से लिए जाते हैं; शव लक्ष्य की जाति का होना चाहिए: ब्राह्मण का विनाश करना है तो ब्राह्मण शव का वस्त्र, क्षत्रिय के लिए क्षत्रिय का। अगर केवल रोग या पीड़ा देनी है तो सबसे क्षुद्र जाति के व्यक्ति का वस्त्र लिया जाता है। साथ ही वह मिट्टी की हंडी भी ली जाती है जिसमें घर से अग्नि जलाकर लाई जाती है, अगर वह बिना फूटी मिल जाए।

11

पुतले की तांत्रिक प्राण प्रतिष्ठा और यंत्र के छह भागों का जागरण

वैदिक मंत्र नहीं, नाम और गोत्र

· Reviewed Sep 14, 2026 · 06:31–07:19

वक्ता कहते हैं कि यंत्र के मध्य में बने पुतला की प्राण प्रतिष्ठा की जाती है, पर उन वैदिक मंत्रों से नहीं जिनसे मंदिर की मूर्ति की प्रतिष्ठा होती है; विधियाँ तंत्रोक्त होती हैं, और उनमें बस उस व्यक्ति का नाम और गोत्र पता होना चाहिए जिस पर प्रयोग किया जा रहा है। प्रतिष्ठा पूरी होने पर यंत्र के विभिन्न हिस्सों में उनसे संबंधित विद्याओं की शक्तियों को जागृत किया जाता है। वे कहते हैं कि ऐसे छह हिस्से माने गए हैं, होते दस हैं, और प्रमुखता से लोग छह वाले ही प्रयोग करते हैं। जब वे जागृत हो जाती हैं, तब लक्ष्य के शरीर पर घात आरंभ होता है।

12

वैतालिक और पिशाचिक मंत्रों से अभिमंत्रित सुइयों से पुतले का वेधन

फ़िल्मों जैसा, पर सुई साधारण नहीं होती

· Reviewed Sep 14, 2026 · 07:20–08:07

वक्ता कहते हैं कि अंतिम चरण लगभग वैसा ही है जैसा फ़िल्मों, सीरियलों और कथा-कहानियों में दिखाया जाता है, पुतले के किसी विशेष हिस्से में पिन चुभाई गई और सामने वाला तत्काल मर गया, पर वह पिन साधारण नहीं होती। उसे कई-कई दिनों तक किसी विशेष पशु के रक्त में या किसी निकृष्ट स्थान में रखकर वैतालिक और पिशाचिक मंत्रों से जागृत, यानी उस पर अभिमंत्रण किया गया रहता है। जब वह अभिमंत्रित पिन अभिमंत्रित यंत्र के मध्य खड़े पुतला में गाड़ी जाती है, तो जिस व्यक्ति को लक्षित करके वहाँ प्रतिष्ठा की गई है उसकी असामान्य परिस्थितियों में मृत्यु हो जाती है।

13

सावधानी: मारण प्रयोग केवल जानकारी के लिए बताया गया है

जो स्वयं करे, ज़िम्मेदारी उसी की

· Reviewed Sep 14, 2026 · 08:08–09:00

वक्ता कहते हैं कि मारण प्रयोग का यह विषय रखने का एकमात्र तात्पर्य यह था कि लोगों को कुछ सीमा तक जानकारी हो कि ऐसे प्रयोग कैसे किए जाते हैं। वे कहते हैं कि उनका ऐसा कोई उद्देश्य नहीं कि कोई इस प्रकार की प्रक्रियाएँ करे, न ही वे प्रोत्साहित कर रहे हैं। जो कोई यह सुनकर स्वयं ऐसा प्रयोग करता है, उससे किसी को हानि या लाभ हो तो उसका ज़िम्मेदार वह खुद होगा; चैनल का या बताने वाले का इससे कोई लेना-देना नहीं। वे कहते हैं कि आगे के वीडियो में यह बताया जाएगा कि किसी पर मारण प्रयोग हो जाने के बाद क्या लक्षण प्रकट होते हैं और उन्हें ध्यान में रखकर उस प्रयोग को विफल करके अपने स्वजनों की रक्षा कैसे की जा सकती है।

Indexed, not endorsed as instruction

यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।

Explore this topic