महाभैरव मारण समकक्ष प्रयोग — शत्रु के विरुद्ध अंतिम विकल्प का विधान, तैयारी, नियम और प्रायश्चित
जिन शत्रुओं ने परिवार के लिए कोई मार्ग न छोड़ा हो उनके विरुद्ध अंतिम-विकल्प महाभैरव प्रयोग — उसकी तैयारी, मंदिर की शर्त, दैनिक विधान, नियम-निषेध, बाद की सेवा और प्रायश्चित, जैसा वक्ता ने बताया।
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शत्रुओं के विरुद्ध उग्र प्रयोग कब उचित है
अंतिम विकल्प, केवल जब आप सत्य पक्ष में हों
वक्ता कहते हैं कि जब कोई परिवार बहुत अधिक प्रताड़ित हो, समाज, बंधु-बांधवों या किसी का सहयोग न हो, और बाहुबली उसकी जमीन-धन हड़प रहे हों और बेटी को प्रताड़ित कर रहे हों, तब उसके पास एक ही मार्ग बचता है कि किसी उग्रतम स्वरूप का सहयोग ले ताकि शत्रु को उचित दंड मिले। वे चेतावनी देते हैं कि यह स्वयं के लिए भी घातक हो सकता है, काउंटर बैक आ सकता है, इसलिए यह अंतिम विकल्प ही रहे: जब कोई सहयोग न कर पा रहा हो, मृत्यु या मृत्यु तुल्य कष्ट निकट हो, और आप सत्य हों, गलत न हों। यदि आप गलत हैं और आपके साथ गलत हो रहा है, वे कहते हैं, तो आप अपने कर्म का दंड भुगत रहे हैं।
वक्ता उस स्थिति से शुरू करते हैं जिसके लिए यह विषय है: कोई परिवार बहुत अधिक प्रताड़ित हो, उसके पास न समाज का सहयोग हो, न बंधु-बांधवों का, न कोई अन्य व्यक्ति सहयोग पहुँचा पाए। तब, वे कहते हैं, उसके पास एकमात्र मार्ग बचता है कि शीघ्र अति शीघ्र अपने शत्रुओं का समूल विनाश किया जाए। वे परिवार को बहुत कमजोर बताते हैं: सामाजिक रूप से उसके पीछे कोई सशस्त्र व्यक्ति नहीं, कोई ऐसा नहीं जो सहयोग कर पाए। वह समाज के बाहुबलियों द्वारा प्रताड़ित हो रहा है; जमीन हड़प ली गई, धन हड़प लिया गया, बेटी कहीं प्रताड़ित की जा रही है। ऐसी अवस्था में कोई क्या करेगा? एक ही मार्ग बचता है कि किसी उग्रअनुष्ठान अथवा देवता का उग्र भाव, जो सौम्य भाव के विपरीत है।तम स्वरूप का सहयोग लें जिससे उसे उचित दंड मिले। वे तुरंत चेतावनी देते हैं कि कई बार यह स्वयं के लिए भी घातक सिद्ध हो सकता है; इसके लिए तैयार रहें। जिसे काउंटर बैक कहते हैं, किसी प्रकार की विपरीत प्रतिक्रिया मिल सकती है। इसलिए यह आपके पास अंतिम विकल्प के रूप में ही होना चाहिए। तब करें जब कोई विकल्प न हो, जब कोई सहयोग न कर पा रहा हो, जब आप मृत्यु या मृत्यु तुल्य कष्ट के निकट हों: कोई कल आपकी हत्या कर सकता है, बेटी, बहन, माता के साथ गलत कर सकता है, परिवार के किसी सदस्य की हत्या हो सकती है। और आप वहाँ सत्य हों, गलत न हों। यदि आप गलत हैं और आपके साथ गलत हो रहा है, वे कहते हैं, तब तो आप अपने कर्म का दंड भुगत रहे हैं।
पूर्व कर्म कायरता का बहाना नहीं; मंत्र जाप में बैठने की मानसिक क्षमता
जिम का बल जाप का बल नहीं
वक्ता कहते हैं कि यद्यपि हमारे साथ जो कुछ होता है वह हमारे पूर्व कर्म ही हैं, फिर भी वर्तमान स्थिति में नपुंसक बनकर बँधे नहीं बैठना चाहिए; नपुंसकता के साथ या कायर बनकर जीवन नहीं जिया जा सकता। जब सामर्थ्य हो, शरीर में बल हो कि पाँच-दस घंटे, या दो-चार घंटे भी बैठकर मंत्र जप कर सकें, तो उसका उपयोग करना चाहिए। पर शरीर का बल पर्याप्त नहीं: कोई चार घंटे जिम में पसीना बहा ले या दस-बीस किलोमीटर दौड़ ले, पर एक घंटा, आधा घंटा या पंद्रह मिनट भी बैठकर जाप करने की मानसिक क्षमता भी भीतर होनी चाहिए। वह, वे कहते हैं, भगवती की कृपा से होती है और तभी जब मन को एकाग्र कर पाएँ।
वक्ता स्वीकार करते हैं कि हमारे साथ जो कुछ होता है वह हमारे पूर्व के कर्म ही हैं। फिर भी, वे कहते हैं, वर्तमान स्थिति में ऐसा बिल्कुल नहीं है कि नपुंसक बनकर बँधे बैठना चाहिए। नपुंसकता के साथ जीवन नहीं जिया जा सकता; कायर बनकर नहीं जीना है। जब हमारे पास सामर्थ्य है, वे कहते हैं, शरीर में बल है कि पाँच-दस घंटे, या दो-चार घंटे भी बैठकर मंत्र जप कर सकें, तो उसका उपयोग करना है। पर वे जोड़ते हैं कि शरीर में सामर्थ्य हो सकता है, लेकिन मन का सामर्थ्य होना भी बड़ा जरूरी है। आप चार घंटे जिम में पसीना बहा लें; दस-बीस किलोमीटर दौड़ लें; लेकिन एक घंटा, आधा घंटा या पंद्रह मिनट भी बैठकर मंत्र जाप करने की मानसिक क्षमता भी आपके भीतर होनी चाहिए। यह, वे कहते हैं, भगवतीदेवी का आदरसूचक संबोधन, जो इन प्रवचनों में विचाराधीन किसी भी स्वरूप के लिए प्रयुक्त होता है। की कृपा से होता है, और तभी जब आप अपने मन को उस प्रकार एकाग्र कर पाएँ।
कोई मार्ग न बचे तब सबसे तीव्र आघात करने वाली शक्ति महाभैरव
परिवार समाप्त होता लगे तब शरणागति
वक्ता कहते हैं कि इस क्षमता की आवश्यकता तब पड़ती है जब कोई मार्ग न हो और लगे कि परिवार समाप्त हो जाएगा, हम नहीं बचेंगे; तब शरणागति लेनी चाहिए। इनमें सबसे तीव्रतम आघात करने वाली शक्ति, वे कहते हैं, महाभैरव हैं। महाभैरव का प्रयोग चैनल पर पहले से है, पर उनका कोई मरण प्रयोग या दुष्ट को दंड देने का प्रयोग अब तक नहीं बताया गया।
वक्ता कहते हैं कि जाप में बैठने की मानसिक क्षमता की आवश्यकता ठीक तब पड़ती है जब आपके पास कोई मार्ग नहीं होता और लगता है कि अब हमारा परिवार समाप्त हो जाएगा, हम नहीं बच पाएँगे। तब, वे कहते हैं, आपको शरणागति लेनी चाहिए। इनमें सबसे तीव्रतम आघात करने वाली शक्ति महाभैरव हैं। महाभैरव का प्रयोग चैनल पर प्रसारित है, वे कहते हैं, लेकिन उनका कोई मरण प्रयोग या दुष्ट को दंड देने का प्रयोग अब तक नहीं बताया गया; आज वे एक सिंपल सा विधान सबके समक्ष रख रहे हैं।
द्वेष में या सत्य जाने बिना महाभैरव प्रयोग करने का उल्टा फल
केवल धर्मयुक्त; अन्यथा सौ गुना प्रताड़ना
वक्ता कहते हैं कि यह प्रयोग तभी करना है जब कोई मार्ग न हो और धर्मयुक्त रहकर ही। यदि आप जानबूझकर किसी को हानि पहुँचाने के लिए, या यह सत्य जाने बिना कि सामने वाला गलत है या सही, अंधकार में यह प्रयोग कर देते हैं, तो इसका सौ प्रतिशत विपरीत परिणाम आपको और आपके परिवार को भुगतना पड़ेगा। यदि द्वेष में आकर किया, कि इसके पास बड़ा पैसा है, बहुत दिखा रहा है, तो जो प्रताड़ना अभी झेल रहे हैं उससे सौ गुना अधिक प्रताड़ित होंगे, मर भी नहीं पाएँगे, और मानसिक विक्षिप्तता की अवस्था हो जाएगी। वे कहते हैं कि यह डराने की बात नहीं, यथार्थ है, ताकि लोगों का कल्याण हो।
एक सिंपल सा विधान रखते हुए वक्ता कहते हैं कि जब कोई मार्ग न हो तब ऐसा प्रयोग करना चाहिए, लेकिन धर्मयुक्त होकर ही। यदि आप जानबूझकर किसी को हानि पहुँचाने के लिए, या आप यह सत्य नहीं जान रहे कि सामने वाला व्यक्ति गलत है या सही, और अंधकार में यह प्रयोग कर देते हैं, तो, वे कहते हैं, इसका सौ प्रतिशत विपरीत परिणाम आपको और आपके परिवार को भुगतना पड़ेगा। यदि द्वेष में आकर यह प्रयोग कर दिया, किसी से द्वेष है कि "अरे इसके पास बड़ा पैसा है, बहुत दिखा रहा है, बहुत फोकासी में है", तो जो प्रताड़ना आप वर्तमान में झेल रहे हैं उससे सौ गुना अधिक प्रताड़ित होंगे और मर भी नहीं पाएँगे। मानसिक विक्षिप्तता की अवस्था हो जाएगी; ध्यान रखिएगा। वे कहते हैं कि यह डराने वाली बात नहीं है, यथार्थ बात है, ताकि आपका कल्याण हो और हानि न हो। यथार्थ रूप से प्रताड़ित हों और कोई मार्ग न हो, तभी अंतिम विकल्प के रूप में इसे लेकर चलना चाहिए।
महाभैरव प्रयोग की अवधि: 90 दिन का संकल्प, 41 दिन, फिर लगातार 90 तक
41 दिन में 90 प्रतिशत मामले सुलझ जाते हैं
वक्ता कहते हैं कि इसमें करना मात्र इतना है कि 90 दिन की पूरी संख्या बना लेनी है: यह भी नहीं पता कि कल जीवित बचेंगे या नहीं, फिर भी मन में 90 दिन का दृढ़ संकल्प होना चाहिए। प्रयोग पहले 41 दिन किया जाता है, जिसमें, वे कहते हैं, 90 प्रतिशत मामला सलट जाता है, बशर्ते आप सही हों। यदि 41 दिन में काम न हो तो लगातार 90 दिन तक करते जाना है; 41 के बाद दोबारा 41 नहीं होगा, पूरा 90 दिन तक कंटिन्यू।
वक्ता कहते हैं कि इस प्रयोग में करना मात्र इतना है: 90 दिन की पूरी संख्या बना लेनी है। आपको यह भी नहीं पता, वे कहते हैं, कि कल जीवित बचेंगे या नहीं, लेकिन मन में 90 दिन का दृढ़ संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। होना चाहिए कि "90 दिन तक तो करेंगे ही करेंगे"। आगे वे छोटी अवधि बताते हैं: पहले 41 दिन तक यह करना है। 41 दिन में 90 प्रतिशत मामला सलट जाता है; आप सही होने चाहिए। दूसरा विषय, वे कहते हैं, कि जब 41 दिन में यह नहीं होता तो 90 दिन तक लगातार करते जाना है। 41 के बाद फिर दोबारा 41 नहीं होगा; पूरा 90 दिन तक कंटिन्यू।
महाभैरव प्रयोग का स्थान: ऐसा उग्र भैरव मंदिर जहाँ मदिरा चढ़ती हो
न शिव मंदिर, न सात्विक भैरव मंदिर
वक्ता कहते हैं कि सबसे पहले भैरव जी का मंदिर खोजना पड़ेगा; इसका कोई विकल्प नहीं। क्या शिव जी के मंदिर में चलेगा, इस पर वे कहते हैं नहीं। क्या बटुक भैरव का मंदिर या ऐसा मंदिर जहाँ केवल सात्विक विधि से पूजन होता हो, चलेगा, इस पर भी वे कहते हैं नहीं: यह प्रयोग जैसा है उसमें उग्र देवता ही चाहिए, कोई विकल्प नहीं। चाहिए आसपास का ऐसा भैरव क्षेत्र जहाँ उग्रात्मक, वामाचार विधि से पूजन हो और जहाँ भगवान भैरव को कारण आदि पात्र, यानी मदिरा, जरूर चढ़ता हो। वहीं यह प्रयोग होगा।
इसे कैसे करना है, इस पर वक्ता कहते हैं कि सबसे पहले आपको भैरव जी का एक मंदिर खोजना पड़ेगा। इसका कोई विकल्प नहीं है; भैरव जी के मंदिर के सिवाय कोई विकल्प नहीं। "भैया, शिव जी के मंदिर में चलेगा क्या?" इस कमेंट का उत्तर वे देते हैं: नहीं चलेगा। क्या बटुक भैरव जी का मंदिर, या ऐसा मंदिर जहाँ केवल सात्विक विधि से पूजन होता हो, चलेगा? नहीं, वहाँ नहीं कर सकते। यह प्रयोग जैसा है, वे कहते हैं, उस अनुसार उग्रअनुष्ठान अथवा देवता का उग्र भाव, जो सौम्य भाव के विपरीत है। देवता ही चाहिए, और इसमें आपके पास कोई विकल्प नहीं। चाहिए आपके आसपास कोई ऐसा भैरव जी का क्षेत्र जहाँ उग्रात्मक विधि से, वामाचार विधि आदि से पूजन होता हो, जहाँ भगवान भैरव को कारण आदि पात्र जरूर चढ़ता हो। वहीं पर आप यह प्रयोग करेंगे। कारण, वे समझाते हैं, यानी मदिरामदिरा, जो कुछ भैरव और वामाचार विधियों में अर्पित होती है और अन्य में वर्जित है।, यानी शराब जो उन्हें चढ़ती हो।
महाभैरव प्रयोग से पहले पंद्रह दिन का पंचाक्षरी जाप और हवन
प्रतिदिन 100 माला, 10 माला हवन, कोई भी पक्ष
वक्ता कहते हैं कि प्रयोग का आप पर विपरीत प्रभाव न पड़े, इसके लिए सबसे पहले प्रयोग शुरू करने से कम से कम 15 दिन पहले महादेव के पंचाक्षरी मंत्र का जप करें, प्रतिदिन 100 माला, और शिव के समक्ष यह विषय रखें कि हम महाभैरव का प्रयोग करने वाले हैं, इसलिए कोई विपरीत प्रभाव न मिले, हमारी और हमारे घर की रक्षा हो, और शत्रु को उचित दंड मिले। 14 दिन 100-100 माला के बाद 15वें दिन कम से कम 10 माला की आहुति पौष्टिक सामग्री से हवन में दें (सामग्री चैनल के वीडियो में दिखाई गई है; बाजार से खरीदनी है)। ये 15 दिन कभी भी कर सकते हैं, कृष्ण-शुक्ल पक्ष न देखें; इमरजेंसी हो तो किसी भी दिन से शुरू कर दें। दिन देखने हों तो प्रतिपदा या पंचमी से शुरू करें; सबसे अच्छा है प्रतिपदा से चतुर्दशी तक जप और अमावस्या या पूर्णिमा को हवन, किसी भी पक्ष में।
प्रयोग का आप पर विपरीत प्रभाव न पड़े, इसके लिए वक्ता कहते हैं कि सबसे पहले महादेव के पंचाक्षरी मंत्र का जप करना है: मिनिमम, प्रयोग शुरू करने से 15 दिन पहले, प्रतिदिन 100 माला। उस जाप में शिव के समक्ष यह विषय रखें: "प्रभु, हम महाभैरव का प्रयोग करने वाले हैं, इसलिए उसमें हमें कोई तिर्यक प्रभाव, कोई विपरीत प्रभाव न मिले; हमारी सुरक्षा हो, रक्षण हो, तथा शत्रु को उचित दंड मिले; इसलिए हम आपके उस स्वरूप का भी पूजन करेंगे। हम पर कृपा करें, हमारी रक्षा करें, हमारे परिवार और घर का रक्षण करें, तथा महाभैरव को प्रसन्न करके इस कार्य को सिद्ध करने में सहयोग करें।" ऐसा करके कम से कम 14 दिन पंचाक्षरी की 100-100 माला और 15वें दिन कम से कम 10 माला की आहुति पौष्टिक सामग्री से। पौष्टिक सामग्री का वीडियो चैनल पर है, वे कहते हैं (YouTube पर "गृहस्थ तंत्र पौष्टिक सामग्री हवन सामग्री" लिखें); यह चैनल की कोई सामग्री नहीं है, बाजार से खरीदनी है, पर क्या-क्या सामग्री किस मात्रा में, यह लाइव करके दिखाया गया है। अंतिम दिन पंचाक्षरी मंत्र का 10 माला हवन पौष्टिक सामग्री से ही करना है। कब करें: 15 दिन कभी भी कर सकते हैं। इसमें कृष्ण पक्ष, शुक्ल पक्ष मत देखिए; इमरजेंसी है तो किसी भी दिन से शुरू कर दें, सब दिन उन्हीं के हैं। यदि दिन देखने ही हों तो प्रतिपदापक्ष की प्रथम तिथि, जिससे नवरात्र के अनुष्ठान आरंभ होते हैं। से या पंचमी से शुरू कर उस प्रकार 14 दिन कर सकते हैं। सबसे अच्छा, वे कहते हैं, प्रतिपदा से चतुर्दशी तक जप और अमावस्या या पूर्णिमा को हवन। किसी भी पक्ष में कर सकते हैं। उसके बाद आप ऐसा भैरव मंदिर खोजेंगे जहाँ कारण चढ़ता हो।
मंदिर में महाभैरव प्रयोग की दैनिक सामग्री
दो चार-मुख दीपक, आठ-आठ बाती; वस्त्र-दिशा-आसन का बंधन नहीं
वक्ता बताते हैं कि मंदिर में प्रतिदिन क्या ले जाना है: सरसों तेल में मीडियम साइज के चार मुख वाले दो दीपक, हर मुख में डबल बाती (दो-दो बाती आपस में मिलाकर, यानी एक दीये में आठ बाती); थोड़ा सा चमेली का तेल; बूंदी के कम से कम दो लड्डू; दो लौंग और एक इलायची; और लौंग-कपूर अलग से। जप के लिए रुद्राक्ष की माला या काले हकीक की प्राण-प्रतिष्ठित माला हो; माला कहीं से भी लें, बस ओरिजिनल हो, और प्राण प्रतिष्ठा का विधान चैनल पर लाइव दिखाया गया है। इस प्रयोग में, वे कहते हैं, वस्त्र का, दिशा का, आसन का कोई बंधन नहीं है।
उस मंदिर में, वक्ता कहते हैं, प्रतिदिन आपको सरसों तेल में मीडियम साइज के चार मुख वाले दो दीपक बनाने हैं। बाती सब में डबल-डबल रहेगी, यानी एक दीये में आठ बाती रहेगी: दो-दो बाती आपस में मिलाकर हर मुख में लगानी है। उसके सिवाय रोज थोड़ा सा चमेली का तेल लेकर जाना है। बूंदी के कम से कम दो लड्डू होने चाहिए, दो लौंग एक इलायची, और लौंग-कपूर अलग से। जप के लिए रुद्राक्षशिव पूजा के दौरान धारण की जाने वाली एक पवित्र बीज-माला । की माला या काले हकीक की प्राण-प्रतिष्ठित माला आपके पास होनी चाहिए। माला कहीं से भी लें; बस यह देख लें कि माला ओरिजिनल हो। प्राण प्रतिष्ठा करने का विधान चैनल पर दिया गया है, लाइव करके दिखाया गया है; वे कहते हैं कि देखकर माला की प्राण-प्रतिष्ठा अवश्य कर लें ताकि जो जाप करेंगे उसका पूरा फल मिले। इस प्रयोग में, वे कहते हैं, वस्त्र का कोई बंधन नहीं, दिशा का कोई बंधन नहीं, आसन का कोई बंधन नहीं है।
मंदिर में महाभैरव प्रयोग का दैनिक क्रम
मिट्टी के खप्पर में मदिरा, फिर जाप और स्तोत्र की गिनती
वक्ता कहते हैं कि प्रतिदिन कारण पात्र आपके पास होना चाहिए: मदिरा की बोतल और साथ में छोटा, मीडियम साइज का मिट्टी का खप्पर ले जाना है; उसमें पूरा मदिरा भरकर, दो लौंग और एक इलायची डालकर, भैरव जी को नैवेद्य में लगाना है। क्रम है: सबसे पहले चार मुख वाला दीपक प्रज्वलित करें और कारण पात्र अर्पण करें; फिर आसन पर बैठकर गुरु-गणेश स्मरण करके पंचाक्षरी मंत्र की एक माला, फिर महाभैरव मंत्र की कम से कम पाँच माला, पाँच बार महाभैरव स्तोत्र का पाठ, और पुनः पाँच माला मंत्र, सब भैरव जी की ओर देखते हुए। फिर लौंग-कपूर जलाकर किसी पात्र में अर्पित करें। लड्डू आदि नैवेद्य पहले ही भोग लगा लें, और जो प्रसाद मिले वह पूजन समर्पण करके उठने पर उसी स्थान पर ग्रहण करें; घर नहीं लाना है। घर आकर स्नान करके पुनः घर में पूजन करें।
प्रतिदिन, वक्ता कहते हैं, कारण पात्र आपके पास होना चाहिए। कारण पात्र का मतलब मदिरामदिरा, जो कुछ भैरव और वामाचार विधियों में अर्पित होती है और अन्य में वर्जित है। की बोतल भी ले जानी है और साथ में मिट्टी वाला छोटा सा, मीडियम साइज का खप्परकपाल पात्र, जो कुछ अर्पणों में क्षेत्र के पीठ के नाम किया जाता है। भी। उसमें पूरा भरकर मदिरा भैरव जी को नैवेद्यपूजा के दौरान देवता को अर्पित किया जाने वाला भोग, जिसके साथ जल अर्पण व समर्पण मंत्र होते हैं। में लगानी है, दो लौंग और एक इलायची उसमें डालकर। क्रम: सबसे पहले वहाँ चार मुँह वाला दीपक प्रज्वलित करें, और जो मिट्टी का कारण पात्र ले गए हैं उसमें कारण भरकर भैरव जी को नैवेद्य अर्पण करें। तत्पश्चात अपने आसन पर बैठकर गुरु-गणेश स्मरण करके पंचाक्षरी मंत्र की एक माला जाप करें, तब महाभैरव मंत्र की कम से कम पाँच माला। पाँच बार महाभैरव स्तोत्रदेवता की स्तुति का पाठ, जिसे बिना दीक्षा के भी पढ़ा जा सकता है, जबकि मंत्र के लिए दीक्षा अपेक्षित है। का पाठ करें और पुनः पाँच माला महाभैरव मंत्र का जाप। इतना प्रतिदिन करना है, भैरव जी की ओर देखते हुए। फिर लौंग-कपूर जलाकर किसी पात्र में उन्हें अर्पित कर दें। जो नैवेद्य ले गए थे, लड्डू आदि, वह पहले ही भोगगृहस्थ के भोजन से पूर्व देवता के समक्ष अर्पित किया जाने वाला नैवेद्य। लगा लेंगे, और जो भी प्रसादअर्पण के पश्चात् देवता से लौटा हुआ अंश, जिसे त्यागा नहीं अपितु ग्रहण किया जाता है। मिलेगा, पूजन समर्पण करके जब उठेंगे तो उसी स्थान पर वह नैवेद्य ग्रहण करेंगे; घर नहीं लाना है। घर आकर स्नान आदि करके पुनः घर में पूजन करनी है।
महाभैरव प्रयोग के निषेध: मदिरा सेवन नहीं, जीव बलि नहीं, घर में नहीं, पूर्णतः दक्षिणाचारी
केवल नैवेद्य और जाप, कुछ भी तामसिक नहीं
वक्ता कहते हैं कि इस प्रयोग में किसी भी प्रकार का मदिरा सेवन आपको नहीं करना है, और किसी प्रकार की जीव बलि नहीं देनी है; केवल मदिरा का भोग लगाकर वहाँ जप आदि करना है। यह प्रयोग घर में नहीं करना है, और इसमें किसी वामाचार विधि में संलिप्त नहीं होना है: केवल उन्हें नैवेद्य लगेगा। यह पूर्ण रूप से दक्षिणाचार प्रयोग है, वे कहते हैं; केवल नैवेद्य लग रहा है, जाप हो रहा है, कोई निकृष्ट या तामसिक प्रयोग नहीं हो रहा।
वक्ता निषेध बताते हैं। इस प्रयोग में किसी भी प्रकार का मदिरामदिरा, जो कुछ भैरव और वामाचार विधियों में अर्पित होती है और अन्य में वर्जित है। सेवन आपको स्वयं नहीं करना है। किसी भी प्रकार की जीव बलि आपको नहीं देनी है। केवल मदिरा का भोगगृहस्थ के भोजन से पूर्व देवता के समक्ष अर्पित किया जाने वाला नैवेद्य। लगाकर इस प्रकार वहाँ जप आदि कर लेना है। आगे वे जोड़ते हैं: यह प्रयोग घर में नहीं करना है। इस प्रयोग में किसी प्रकार की वामाचार विधि आदि में संलिप्त नहीं होना है; केवल उन्हें नैवेद्यपूजा के दौरान देवता को अर्पित किया जाने वाला भोग, जिसके साथ जल अर्पण व समर्पण मंत्र होते हैं। लगेगा। यह पूर्ण रूप से दक्षिणाचार ही प्रयोग है, वे कहते हैं। केवल वहाँ नैवेद्य लग रहा है, जाप हो रहा है; कोई निकृष्ट प्रयोग, तामसिक प्रयोग आदि यहाँ नहीं हो रहा है।
महाभैरव प्रयोग के दौरान अनुभव और उन पर क्या करें
उग्र शक्तियाँ प्रचंडता से आती हैं; जाप और प्रार्थना से उत्तर
वक्ता कहते हैं कि आपको तीक्ष्ण अनुभव हो सकते हैं और थोड़ा मानसिक रूप से डिस्टर्ब हो सकते हैं, क्योंकि इस प्रकार की उग्र शक्तियाँ तुरंत आवागमन शुरू कर देती हैं; यदि आपका आभामंडल पहले से तैयार न हो तो थोड़ा डिस्टरबेंस हो सकता है, इसीलिए उन्होंने पहले पंचाक्षरी जप करने को कहा। जब ये शक्तियाँ आती हैं तो एकदम साएँ-फाएँ, पूरी प्रचंडता के साथ आती हैं, इसलिए घबराना नहीं है। जब ऐसा आभास होने लगे कि कोई है, कोई आ रहा है, रात्रि में कुछ हो रहा है, तो तुरंत महाभैरव मंत्र का जाप करके प्रार्थना करें कि प्रभु हमारे शत्रु का भक्षण करें, उसे उचित दंड दें, और पूरा विषय बोलें कि वह कैसे प्रताड़ित कर रहा है: बहन को, माँ को, बेटी को, जगह-जमीन को।
वक्ता चेतावनी देते हैं कि आपको तीक्ष्ण अनुभव हो सकते हैं। थोड़ा मानसिक रूप से डिस्टर्ब हो सकते हैं, क्योंकि इस प्रकार की उग्रअनुष्ठान अथवा देवता का उग्र भाव, जो सौम्य भाव के विपरीत है। शक्तियाँ तुरंत आवागमन शुरू कर देंगी। यदि आपका आभामंडल (आभा मंडल) पहले से तैयार न हो तो थोड़ा डिस्टरबेंस क्रिएट हो सकता है; इसीलिए, वे कहते हैं, उन्होंने पहले पंचाक्षरी मंत्र का जप अवश्य करने को कहा। जब इनकी शक्तियाँ आती हैं तो पूरा एकदम साएँ-फाएँ होता है, पूरी प्रचंडता के साथ आती हैं, इसलिए इससे घबराना नहीं है। जब ऐसा अनुभव होने लगे कि किसी का आभास हो रहा है, कोई आ रहा है, रात्रि आदि काल में कुछ ऐसा हो रहा है, तो तुरंत महाभैरव मंत्र का जाप करके प्रार्थना करें: "प्रभु, हमारे शत्रु का इस प्रकार भक्षण कीजिए, उसे उचित दंड दीजिए; वह हमें इस प्रकार प्रताड़ित कर रहा है।" जो भी कष्ट हो, बहन को, माँ को परेशान कर रहा हो, बेटी को या जगह-जमीन को, पूरा विषय बोलें और करते रहें।
महाभैरव प्रयोग सिद्ध होने पर भैरव की आजीवन सेवा का वचन
हर महीने अष्टमी को नैवेद्य सहित दर्शन, कोई बंधन नहीं
वक्ता कहते हैं कि यदि 41 दिन में आपका कार्य सिद्ध हो जाए तो भैरव जी से यह विषय बोल देना है: "प्रभु, हम प्रत्येक महीने की अष्टमी तिथि को, या जब हमें सुलभ हो सकेगा, एक बार आकर आपकी सेवा-पूजा करके जाएँगे।" और आपको जीवन पर्यंत उनकी सेवा करनी है ताकि उनकी कृपा बनी रहे। वे कहते हैं कि आप किसी बंधन में नहीं बँध रहे; एक दिव्य शक्ति की कृपा आपके साथ हो जाएगी, और जब भी कष्ट में पड़ेंगे यह शक्ति साथ देगी। जब भी जाएँ, उन्हें नैवेद्य चढ़ाएँ।
उसके बाद, वक्ता कहते हैं, जब आपका कार्य सिद्ध हो जाए, यदि 41 दिन में, तब भैरव जी से यह विषय बोल देना है: "प्रभु, हम प्रत्येक महीने की अष्टमीपक्ष की आठवीं तिथि, जो शाक्त कर्मों के लिए विशेष अनुकूल मानी जाती है। तिथि को, या जब हमें सुलभ हो सकेगा, एक बार आकर आपकी सेवा-पूजा करके जाएँगे।" और आपको जीवन पर्यंत उनकी सेवा करनी है, ताकि उनकी कृपा बनी रहे। आप किसी बंधन में नहीं बँध रहे, वे कहते हैं; एक दिव्य शक्ति की कृपा आपके साथ हो जाएगी। जब भी आप कष्ट में पड़ेंगे, यह शक्ति साथ देगी। और जब भी जाएँ, वे कहते हैं, उन्हें हर बार नैवेद्यपूजा के दौरान देवता को अर्पित किया जाने वाला भोग, जिसके साथ जल अर्पण व समर्पण मंत्र होते हैं। चढ़ाना है।
महाभैरव प्रयोग में भोजन और ब्रह्मचर्य
भोजन का नियम नहीं; ब्रह्मचर्य न हो तो कष्ट असली नहीं
वक्ता कहते हैं कि इस प्रयोग में खाने-पीने का कोई नियम-निषेध नहीं है। ब्रह्मचर्य पालन हो सके तो अति उत्तम है; बिना उसके सफलता की संभावना कम हो जाएगी। वे तर्क देते हैं कि जो सचमुच विपत्ति में है उसका ब्रह्मचर्य अपने आप पलता है, क्योंकि डिस्टर्ब मन अपनी स्त्री का स्पर्श भी नहीं कर पाएगा; तो यदि आप पालन नहीं कर रहे तो आपके पास कोई ओरिजिनल कष्ट नहीं है और आप भगवान को, स्वयं को और सबको ठग रहे हैं। बिना इसके, वे कहते हैं, संदेह बढ़ता जाएगा और पाँच-पाँच माला जप करने का बल भी नहीं रहेगा; हालत खराब हो जाएगी।
प्रयोग के दौरान रहन-सहन पर वक्ता कहते हैं कि खाने-पीने का कोई नियम-निषेध नहीं है। ब्रह्मचर्यकिसी दीर्घ अनुष्ठान के दौरान आवश्यक कठोर ब्रह्मचर्य। पालन यदि हो सके, कर पाएँ, तो अति उत्तम है। बिना ब्रह्मचर्य पालन के करेंगे तो सफलता मिलने की संभावना कम हो जाएगी। और दूसरा विषय, वे कहते हैं: जब आप कष्ट में, विपत्ति में पड़े हैं तो ब्रह्मचर्य पालन तो ऑटोमेटिक होता ही होगा। यदि आपकी मानसिक अवस्था डिस्टरबेंस में चली गई है तो आपका पुरुषत्व उस प्रकार जागृत नहीं होगा कि आप करें; और यदि ऐसा हो रहा है, आप ब्रह्मचर्य का पालन नहीं कर रहे, तब आपके पास कोई ओरिजिनल कष्ट नहीं है। फिर आप ठग रहे हैं भगवान को भी, स्वयं को भी और बाकी सबको भी। मानसिक अवस्था, वे कहते हैं, वैसी हो जाएगी कि कोई अपनी स्त्री का स्पर्श कैसे कर पाएगा; उसके ऊपर तो टेंशन रहेगा। तो, वे कहते हैं, कृपया ब्रह्मचर्य पालन करते हुए करेंगे तो अति उत्तम रहेगा। नहीं करेंगे तो संभावना कम होती जाएगी, संदेह बढ़ता जाएगा, और फिर आपके भीतर बल भी नहीं रहेगा कि पाँच-पाँच माला जप कर पाएँ। हालत खराब हो जाएगी।
महाभैरव प्रयोग सिद्ध होने पर भैरव का श्रृंगार पूजन और नींबू बलि
चार भैरवों का अग्नि-तत्व मंत्र; 18 नींबू या 108 नींबू की माला
वक्ता कहते हैं कि यह मंत्र बहुत अग्नि तत्व से संपन्न है, उग्र मंत्र है जिसमें चार-चार भैरव चलते हैं, इसलिए भैरव जी की कृपा से कार्य पूर्ण रूप से अवश्य सिद्ध होता है। जब कार्य सिद्ध हो जाए तब उनका श्रृंगार पूजन और बलि दें: बलि में नारियल बलि ही, निंबू बलि ही, कम से कम 18 नींबू या 108 नींबू की माला, उनकी पूरी सेवा-पूजा दें और उन्हें प्रसन्न रखें। भैरव जी की कृपा से, वे कहते हैं, अनेक कार्य सिद्ध होते हैं।
वक्ता कहते हैं कि यह मंत्र बहुत अग्नि तत्व से संपन्न है; उग्रअनुष्ठान अथवा देवता का उग्र भाव, जो सौम्य भाव के विपरीत है। मंत्र है, और इसमें चार-चार भैरव चलते हैं। तो आपका कार्य भैरव जी की कृपा से पूर्ण रूप से अवश्य सिद्ध होता है। जब कार्य सिद्ध हो जाए तब उनका श्रृंगार पूजन आदि देकर बलि दें। बलि में नारियल बलि ही, निंबू बलि ही: कम से कम 18 नींबुओं की बलि या 108 नींबू की माला चढ़ाकर उनकी पूरी सेवा-पूजा दें और उन्हें प्रसन्न रखें। भैरव जी की कृपा से, वे कहते हैं, अनेक कार्य सिद्ध होते हैं।
महाभैरव प्रयोग के बाद घर में पूजन: केवल बटुक भैरव स्वरूप
घर में महाभैरव या कालभैरव की स्थापना कभी नहीं
वक्ता कहते हैं कि घर में इसका पाठ-पूजा यदि करेंगे तो बाद में, शुरू में नहीं: शुरू में जब तक कारण (मदिरा) चढ़ेगा तब तक मंदिर में ही। घर में करेंगे तब चार मुँह वाला दीया जलाने की अनिवार्यता नहीं रहती; एक मुख वाला दीया भी जला सकते हैं, और बटुक भैरव स्वरूप का पूजन करेंगे। घर में, वे कहते हैं, महाभैरव या काल भैरव के स्वरूप की स्थापना नहीं करेंगे।
वक्ता कहते हैं कि घर में इसका पाठ-पूजा यदि करेंगे तो बाद में, बाद में, शुरू में नहीं। शुरू में तो जब तक कारण (मदिरामदिरा, जो कुछ भैरव और वामाचार विधियों में अर्पित होती है और अन्य में वर्जित है।) चढ़ेगा तब तक वहीं, मंदिर में। घर में जब करेंगे तब वहाँ चार मुँह वाला दीया जलाने की अनिवार्यता नहीं रहती; एक मुख वाला दीया भी जला सकते हैं, और बटुक भैरव स्वरूप का पूजन करेंगे। वहाँ, घर में, महाभैरव या काल भैरव के स्वरूप की स्थापना नहीं करेंगे।
महाभैरव प्रयोग से शत्रु के प्राण चले जाएँ तो प्रायश्चित
पांडवों का उदाहरण: परिक्रमा, तीर्थ स्नान, दान
वक्ता कहते हैं कि यदि किसी भी प्रकार प्राणघात हो जाए, उदाहरण के लिए यह प्रयोग करते हुए शत्रु का प्राण ही चला जाए, तो प्रायश्चित्त विधि अवश्य करें, क्योंकि कहीं न कहीं आप उसके प्राण जाने का कारण बने हैं। वे कुरुक्षेत्र का उदाहरण देते हैं: अर्जुन, भीमसेन और पांडवों ने जिन-जिन का वध किया, उसके दोष का प्रायश्चित उन्होंने बाद में किया। इसके लिए किसी तीर्थ क्षेत्र में प्रदक्षिणा करें, जैसे विंध्याचल में त्रिकोण परिक्रमा या गोवर्धन जी की परिक्रमा; तीर्थों में स्नान करें, त्रिवेणी जी में स्नान करें; और यथासामर्थ्य दान करके प्रायश्चित पूर्ण करें। भगवान की सदैव सेवा-पूजा करें और पंचाक्षरी मंत्र का जप बिल्कुल न छोड़ें: उनकी कृपा एक बार हो गई तो जीवन में मुड़कर नहीं देखना पड़ेगा, धन-धान्य से परिपूर्ण होंगे और शत्रु से मुक्त होंगे।
वक्ता कहते हैं कि यदि किसी भी प्रकार से प्राणघात हो जाता है, उदाहरण के लिए मान लीजिए आप यह प्रयोग कर रहे हैं और आपके शत्रु का प्राण ही चला गया, तब ऐसी अवस्था में प्रायश्चित्तकिसी भारी कर्म — जैसे शत्रु की मृत्यु में परिणत होने वाला षट्कर्म — के कर्मभार को संतुलित करने हेतु किया जाने वाला प्रायश्चित्त अनुष्ठान। विधि भी अवश्य करें, क्योंकि कहीं न कहीं आप उसके प्राण जाने का कारण बने हैं। यह याद रखें। थोड़ा इससे समझ लें, वे कहते हैं: युद्ध में भी, कुरुक्षेत्र में भी, जब अर्जुन ने सबका वध किया, भीमसेन ने सबका वध किया, पांडवों ने जिन-जिन का वध किया, उसके दोष का प्रायश्चित उन्होंने बाद में किया। तो यदि ऐसा हो जाए तो प्रायश्चित अवश्य करें। प्रायश्चित के निमित्त किसी तीर्थ क्षेत्र में प्रदक्षिणा करें: जैसे विंध्याचल में त्रिकोण परिक्रमा करें, गोवर्धन जी की परिक्रमा करें। तीर्थ क्षेत्रों में स्नान करें, त्रिवेणी जी में स्नान करें, दान करें। यथासामर्थ्य दान आदि करके प्रायश्चित पूर्ण करें। और भगवान की सदैव सेवा-पूजा किया करें, वे कहते हैं, और पंचाक्षरी मंत्र का जप बिल्कुल न छोड़ें। उनकी कृपा एक बार हो गई तो जीवन में कभी मुड़कर नहीं देखना पड़ेगा: धन-धान्य से परिपूर्ण होंगे, शत्रु से भी मुक्त होंगे।
महाभैरव प्रयोग दूसरों के लिए कभी नहीं करना है
दूसरों के लिए करने से दुर्गति; केवल आपात स्थिति
वक्ता चेतावनी देते हैं कि यह प्रयोग एक बार हो गया तो ऐसा नहीं कि अब आप दूसरों के लिए यह प्रयोग करना शुरू कर दें। लोगों का स्वयं का कार्य सिद्ध हो जाता है, फिर वे उसी प्रयोग को दूसरे के लिए करने लगते हैं, और फिर उनकी दुर्गति शुरू हो जाती है; रोते हैं कि पहले कार्य होता था, अब नहीं होता। जब दूसरों के लिए किया जाता है, वे कहते हैं, तो उन सबका विधान अलग होता है। यह केवल इमरजेंसी का प्रयोग है: जब आपकी प्राण हानि होने वाली हो और कानून, प्रशासन, संगठन, समाज कोई सहयोग न कर रहा हो; ऐसी विपरीत परिस्थिति में यह शरणागति लेनी चाहिए और यह प्रयोग करना चाहिए।
वक्ता सावधान करते हैं कि यह प्रयोग एक बार हो गया, तब ऐसा नहीं है कि अब आप दूसरों के लिए यह प्रयोग करना शुरू कर दें। यह ध्यान रखिएगा। लोगों का स्वयं का कार्य सिद्ध हो जाता है, उसके बाद उसी प्रयोग को दूसरे के लिए करना शुरू कर देते हैं, और फिर उनकी दुर्गति शुरू हो जाती है। फिर रोना शुरू करते हैं: पहले कार्य होता था, अब नहीं होता। जब दूसरों के लिए किया जाता है, वे कहते हैं, तो उन सबका विधान अलग होता है। तो ध्यान रखें, वे कहते हैं, यह केवल इमरजेंसी के लिए प्रयोग है: जब आपकी प्राण हानि होने वाली हो, जब कानून, प्रशासन, संगठन, समाज कोई भी सहयोग-सहायता न कर रहा हो। ऐसी विपरीत परिस्थिति में ऐसी शरणागति लेनी चाहिए और ऐसा प्रयोग करना चाहिए। वे इस आशा के साथ समाप्त करते हैं कि इस विषय से सभी दुर्गति को प्राप्त, कष्ट में पड़े जीव अपनी सहायता कर पाएँगे और अपना और अपने परिवार का रक्षण कर पाएँगे।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।