सत्य घटना: महाभैरव मंत्र प्रयोग से शत्रु का शमन
एक परिवार पर तांत्रिक कष्ट की सच्ची घटना पर नोट्स।
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परिवार के भीतर से किए गए तंत्र के लक्षण: दो सदस्यों को छोड़ सबको छोटी-छोटी बार-बार की बीमारियाँ
कुछ बड़ा नहीं, रिपोर्ट में कुछ नहीं, पर रुकता भी नहीं
वक्ता दिल्ली की एक सत्य घटना बताते हैं: लगभग बारह सदस्यों के संयुक्त परिवार में एक सफल व्यवसायी का पुत्र, जिसने अपना शोरूम खोला और प्रेम विवाह किया। विवाह के करीब साल-डेढ़ साल बाद, वे कहते हैं, ऐसी परेशानी शुरू हुई जो सामान्य परिवार में नहीं होती — कुछ बड़ा नहीं, पर पति-पत्नी को छोड़ हर कोई किसी न किसी रूप में परेशान था: बड़ों को बार-बार बुखार, बहुत एंज़ाइटी और चिड़चिड़ापन, तीन-चार साल के छोटे बच्चों को बार-बार पेट खराब और बुखार। फिर माताजी का शरीर हमेशा फूलने लगा और पिताजी की छाती में दर्द होने लगा, और दिल्ली के सबसे अच्छे डॉक्टरों और हर मेडिकल रिपोर्ट में कुछ नहीं निकला। वे इस पैटर्न को परिवार के ही सदस्य द्वारा किए गए अभिचार के प्रकट होने का ढंग बताते हैं।
वक्ता कहते हैं कि वे दिल्ली की एक सत्य घटना दर्शकों के सामने रख रहे हैं, उतनी ही जितनी संबंधित परिवार ने अनुमति दी है, ताकि दूसरे लोग भी अपना बचाव वैसे ही कर सकें जैसे इस परिवार ने अपने ही सदस्य द्वारा किए गए तंत्र से अपनी रक्षा की। घटना के व्यक्ति, वे बताते हैं, एक सफल व्यवसायी के पुत्र हैं। लगभग 2016–17 में उन्होंने पिता का व्यवसाय आगे बढ़ाया। उनके दो बड़े भाइयों का विवाह पहले से हो चुका था, और पूरा संयुक्त परिवार — भाई, उनकी पत्नियाँ और बाल-बच्चे — एक साथ रहता था। व्यवसाय में आने पर साल भर के भीतर उन्होंने अपना अलग शोरूम खोला और सफल भी हुए; कुल मिलाकर एक सफल व्यक्ति। उसी समय उन्हें एक युवती से प्रेम हुआ और उससे विवाह हो गया। विवाह के लगभग साल-डेढ़ साल बाद घर में परेशानी शुरू हुई — ऐसी परेशानी जो सामान्य परिवार में नहीं होती। बच्चों सहित परिवार में करीब बारह सदस्य हो गए थे। उन बारह में दो को छोड़कर सबको कुछ न कुछ परेशानी थी; जो दो बचे थे, वे यही पति-पत्नी थे। कोई बहुत बड़ी परेशानी नहीं थी: किसी को बार-बार बुखार, किसी को बहुत एंज़ाइटी और चिड़चिड़ापन, और बच्चों को — सब छोटे, तीन-चार साल के — छोटी-मोटी परेशानियाँ लगी रहतीं, कभी पेट खराब, कभी बुखार। ऐसी अवस्था बार-बार बनती रही। धीरे-धीरे, वे कहते हैं, यह बढ़ने लगा। माताजी का शरीर हमेशा फूल जाता था। शरीर फूलने पर टेस्ट करवाए जाते हैं और रिपोर्ट के अनुसार इलाज होता है, पर उनकी रिपोर्ट में ऐसा कुछ विशेष नहीं आया जिसे शरीर की परेशानी कहा जाए। पिताजी की छाती में दर्द शुरू हुआ; दिल्ली के दो-तीन सबसे अच्छे डॉक्टरों को दिखाया, पर कुछ ऐसा नहीं निकला जिसे उम्र के अनुसार कोई बीमारी कहा जा सके। सब सामान्य था, और कुल मिलाकर कोई बीमारी पकड़ में नहीं आ रही थी।
पैसा आने पर सत्संगी गुरु के एक नाम के लिए कुल देवी-देवताओं को छोड़ देने की भूल
साल का कुल पूजन रखा, नित्य का मूल पूजन छोड़ा
वक्ता कहते हैं कि पीड़ित परिवार वही भूल कर रहा था जो घर में पैसा आने पर वे देखते हैं: लोग अपनी परंपराएँ छोड़कर किसी प्रसिद्ध सत्संगी बाबा को पकड़ लेते हैं। वे कुलदेवी और कुल देवी-देवताओं का साल भर का पूजन तो करते थे, पर अन्य देवताओं और अन्य शक्तियों को मुख्य स्थान देकर मूल शक्तियों का नित्य पूजन छोड़ चुके थे। पूछने पर उन्होंने कहा कि वे फलाने बाबा से दीक्षा लिए हुए हैं जो केवल एक देवी-देवता का नाम जपने को कहते हैं और उसी नाम से सब हो जाता है, इसलिए घर में कीर्तन-भजन को ही महत्व दिया जाता था। वे कहते हैं कि ऐसे लोग यह मानते ही नहीं कि परिवार पर तंत्र जैसी चीज़ें हो भी सकती हैं।
वक्ता कहते हैं कि परिवार ने अपनी परेशानी के लिए पूजन-पाठ के बारे में सोचा भी था, पर एक चीज़ होती ही है: परिवार में पैसा आ जाए तो लोग अपनी परंपराएँ छोड़ देते हैं। यह गलती, वे कहते हैं, इनके यहाँ हो ही रही थी। सामान्य पूजन-पाठ ही कर रहे थे। पैसा आता है, वे कहते हैं, तो आजकल लोग अलग-अलग बाबा जी लोगों को पकड़ लेते हैं। इस परिवार ने भी एक प्रसिद्ध सत्संगसत् का संग — जिसे एकाकी प्रयास से अधिक साधक को गढ़ने वाला माना गया है।ी बाबा को पकड़ा और घर का मूल पूजन-पाठ छोड़ दिया। घर की कुलदेवी और कुल देवी-देवताओं का साल भर का पूजन उन्होंने सामान्यतः किया तो था, पर अन्य देवताओं और अन्य शक्तियों को स्थान देकर मूल शक्तियों का पूजन छोड़ दिया था। पूछने पर उन्होंने बताया: पहले होता था, पर अब हम फलाने बाबा जी से दीक्षा लिए हुए हैं, और वहाँ केवल फलाने देवी-देवता का ही नाम जपने को कहा जाता है, नाम से ही सब कुछ होना है। तो घर में इसी प्रकार की चीज़ों को — कीर्तन, भजन इत्यादि — ज़्यादा महत्व दिया जाता था। वक्ता जोड़ते हैं कि ऐसे लोगों को यह समझ ही नहीं आता कि ऐसी चीज़ें कैसे हो सकती हैं; वहाँ कोई इस प्रकार की बातों को मानता ही नहीं।
पीड़ा का स्रोत घर के भीतर पकड़ना, और अछूता रह गया सदस्य क्यों नहीं माना
बचा रह जाना ही सुराग है
वक्ता कहते हैं कि परिवार के हर सदस्य की जानकारी लेकर और पूरा घर देखकर यह साफ हुआ कि मामला घर के भीतर का है — बाहर की कोई अभिचार विद्या नहीं — और शादी-विवाह के आसपास ही किया-कराया गया है। उन्होंने उस व्यक्ति से कहा कि इसे परिवार के बड़े-बुज़ुर्गों के साथ बैठकर डिस्कस करें। उसने कहा कि उसे पहले से पता है कि क्या कहा जाता है — कि उसकी पत्नी और उसका मायका ही यह कर रहे हैं — पर बात पचती नहीं: वह उससे प्रेम करता है, किसी चीज़ की कमी नहीं रखता, और सबसे बढ़कर उसे अकेले को कोई कष्ट नहीं होता जबकि बाकी सबको होता है, इसलिए लगता है कि लोग झूठ बोल रहे हैं। फिर उसने पूछा कि इसे कैसे जाँचा जाए और परिवार को कैसे छुटकारा दिलाया जाए, क्योंकि अपराध तो अपनी ओर से भी हुआ है।
वक्ता कहते हैं कि फिर परिवार के प्रत्येक सदस्य के विषय में जानकारी ली गई और पूरा घर देखा गया। बात यही सामने आई कि जो भी विषय चल रहा है, घर के भीतर ही है; बाहर की कोई अभिचार विद्या इत्यादि नहीं — जो है सो घर के भीतर है। जब यह उस व्यक्ति के सामने रखा गया — कि मामला आपके घर के भीतर का है, शादी-विवाह के आसपास कुछ किया-कराया गया है, परिवार और बड़े-बुज़ुर्गों के साथ बैठकर डिस्कस कीजिए — तो उसने कहा कि इसकी जानकारी उसे पहले से है, पर बात पचती नहीं। क्या जानकारी? उसने बताया कि जिससे उसका विवाह हुआ है, उसकी और उसके मायके की तरफ से ही यह सब किया जा रहा है। उसकी आपत्ति, जैसा वक्ता बताते हैं: हम जिससे प्रेम करके विवाह किए हैं और जिसे किसी चीज़ की कमी नहीं रखते, वह भला हमारे साथ ऐसा कैसे कर सकती है; और हमें कोई कष्ट नहीं होता, बाकी सबको होता है, तो लगता है शायद लोग झूठ बोल रहे हैं। उसने यह भी कहा कि वक्ता भी कहीं न कहीं उसी विषय की ओर इशारा कर रहे हैं, और पूछा: इसे कैसे जाँचा जाए, कैसे जाना जाए, और इस समस्या से कैसे छुटकारा हो — क्योंकि अपराध तो अपनी ओर से भी हुआ है। वक्ता कहते हैं कि तब पूरा विषय उसे अच्छी तरह समझाया गया, इस निर्देश के साथ कि इसे इस तरह कीजिए: अगर कुछ गड़बड़ नहीं होगी तो सब ठीक रहेगा।
पीड़ित परिवार के लिए महाभैरव अनुष्ठान कालकाजी के सरकटे भैरव स्थान पर, घर पर कभी नहीं
मार्गशीर्ष से माघ तक, स्थान पर, गुप्त रूप से
वक्ता कहते हैं कि उन्होंने उस व्यक्ति से दिल्ली के कालकाजी मंदिर मंदिर के भीतर सरकटे भैरव के स्थान पर महाभैरव अनुष्ठान करवाया, लगभग मार्गशीर्ष मास से शुरू करके माघ के महीने तक, वह वहाँ रोज़ जाकर करता था; घर पर करने से उन्होंने साफ़ मना किया था। उसने घर में किसी को नहीं बताया कि क्या कर रहा है, कैसे कर रहा है — कहता था कि ऑफिस का समय है, ऑफिस निकल जाता, पर वहीं से मंदिर चला जाता और सब वहीं करता। जब वक्ता को संतुष्टि हुई कि उसने पूरे विधि-विधान से अच्छे से कर लिया है, तभी अगला चरण आया।
वक्ता कहते हैं कि दिल्ली में कालकाजी मंदिरदिल्ली में स्थित देवी काली का एक प्रमुख मंदिर, जहाँ सरकटे भैरव का मंदिर भी स्थित है। का मंदिर है, और वहाँ सरकटे भैरव जी का स्थान है। वहीं, लगभग मार्गशीर्ष मास के समय, उन्होंने उस व्यक्ति से महाभैरव अनुष्ठानएक दीर्घ अनुष्ठान — जिसमें अपने कड़े नियम होते हैं। के लिए कहा। उसने मार्गशीर्ष से आरंभ करके माघ के महीने तक अनुष्ठान किया, लगातार वहीं जाता था और वहीं करता था। वक्ता ने घर पर करने से मना किया था — यह केवल स्थान पर ही हुआ। वे कहते हैं कि उसने घर में किसी को नहीं बताया कि क्या कर रहा है, कैसे कर रहा है। कहता था कि ऑफिस का समय है — उसका अपना ऑफिस था — और वहीं से मंदिर चला जाता और सब वहीं करता था। वक्ता कहते हैं कि जब उसने पूरे विधि-विधान से महाभैरव अनुष्ठान कर लिया और उन्हें स्वयं संतुष्टि हो गई कि हाँ, अच्छे से कर रहा है, तब यह चरण पूरा हुआ।
सावधानी: अनुष्ठान शुरू करते ही शरीर में आई दिक्कत साथ लगी चीज़ का विरोध है
शुरू करने तक बचाया गया, फिर निशाना
वक्ता कहते हैं कि दिल्ली वाले व्यक्ति को शरीर में पहले कभी दिक्कत नहीं होती थी, पर जैसे ही उसने महाभैरव अनुष्ठान शुरू किया, शरीर में दिक्कतें शुरू हुईं और अनुष्ठान के बीच उसे बहुत परेशानी हुई। उनकी व्याख्या: जो चीज़ परिवार के साथ थी, वह उसे परेशान करने लगी, क्योंकि तब तक उसे जान-बूझकर बचाकर रखा गया था — कि इसे कुछ नहीं होना चाहिए। अनुष्ठान शुरू होते ही दिक्कत आना इसलिए साथ लगी चीज़ का विरोध है, साधना के गलत जाने का संकेत नहीं।
वक्ता कहते हैं कि महाभैरव अनुष्ठानएक दीर्घ अनुष्ठान — जिसमें अपने कड़े नियम होते हैं। के बीच उस व्यक्ति को परेशानी भी बहुत हुई। पहले उसे शरीर में कोई दिक्कत नहीं होती थी; जब उसने अनुष्ठान शुरू किया, तब शरीर में दिक्कत शुरू हुई। कारण, वे कहते हैं, यह है कि जो चीज़ परिवार के साथ थी, वह उसे परेशान करने लगी। उस समय तक उसे बचाकर रखा गया था — कि भाई, इसे कुछ नहीं होना चाहिए। जब उसने उसके विरुद्ध अनुष्ठान उठाया, तो वह बचाव नहीं रहा और वह चीज़ उसी पर पलट गई।
परिवार के भीतर के शत्रु के विरुद्ध घर का प्रयोग: पूर्व-तैयारी, कोई नाम नहीं, और गुप्त नवरात्रि के नौ दिन
संकल्प केवल ज्ञात-अज्ञात शत्रु का
वक्ता कहते हैं कि घर का चरण तभी आया जब उस व्यक्ति ने स्थान पर पूरा विधि-विधान पूरा कर लिया, कवच धारण कर लिया, और यंत्र व तर्पण सीख लिया — तीन-चार महीने की सीख — और प्रारंभिक स्तर पर लगा कि अब वह यह कार्य कर पाएगा। तब उन्होंने बताया कि घर में इसका प्रयोग कैसे करना है, एक नियम के साथ: किसी का नाम मत लीजिए। जो महाभैरव करते हैं वे जानते हैं कि उसमें नाम लेने की भी स्थिति होती है, पर यहाँ संकल्प केवल "ज्ञात-अज्ञात शत्रु" का लेना था — जो भी हो, वह अपनी स्थिति स्वयं समझे। उस व्यक्ति ने गुप्त नवरात्रि में घर पर नौ दिन का अनुष्ठान बताए गए विधान से आरंभ किया, कुछ तंत्रोक्त वस्तुओं के प्रयोग के साथ: अभिमंत्रण की हुई चीज़ें खाने में मिलानी थीं, जिसे घर के सब लोग सामान्य रूप से खाएँगे।
रक्षा प्रयोग करने वाले को कैसे पहचानता है: परिवार की बीमारियाँ एक व्यक्ति पर चली जाती हैं
सर्दी-बुखार रहता है, विशेष बीमारियाँ खिसक जाती हैं
वक्ता कहते हैं कि जैसे ही उस व्यक्ति ने साधना और घर का अनुष्ठान पूरा किया और उसकी प्रयोग विधि शुरू हुई, तीन-चार-छह महीने की मेहनत का रिजल्ट सामने आया: परिवार के सदस्यों की बीमारी धीरे-धीरे कम होती गई। सबमें कॉमन बस सर्दी, बुखार और पेट दर्द रह गया; पर जो अलग-अलग विशेष समस्याएँ थीं — शरीर फूलना, छाती में दर्द, बुखार, सिर दर्द, पेट खराब — वे सब अब उस व्यक्ति की पत्नी में दिखने लगीं, जो दो-तीन साल से पूरी तरह स्वस्थ थी। उस व्यक्ति पर भी थोड़ा असर पड़ा, वे कहते हैं, क्योंकि पति होने के नाते, साथ रहने से, कुछ तत्व, कुछ अंश उसे भी मिला था। इसी तरह, वे कहते हैं, यह चीज़ पकड़ में आई।
वक्ता कहते हैं कि उस व्यक्ति की तीन-चार-छह महीने की मेहनत का रिजल्ट तब सामने आने लगा जब उसने साधना पूरी की, घर में एक अनुष्ठानएक दीर्घ अनुष्ठान — जिसमें अपने कड़े नियम होते हैं। पूरा किया और उसकी प्रयोग विधि शुरू हुई: परिवार के सदस्यों की बीमारी धीरे-धीरे कम होती गई। सबको कुछ न कुछ अलग-अलग प्रकार की बीमारी थी। सबमें कॉमन बस तीन-चार चीज़ें — सर्दी, बुखार, पेट दर्द। पर जो अलग-अलग समस्याएँ थीं, वे सारी की सारी उसकी पत्नी के भीतर चली गईं। जो भी था — शरीर फूलना, हार्ट में दर्द, बुखार, सिर दर्द, पेट खराब — सब कुछ अब पत्नी को होने लगा। साथ के दो-तीन साल के जीवन में वह पूरी तरह स्वस्थ रही थी; अब उसे हुआ, और थोड़ा-बहुत उस व्यक्ति को भी, क्योंकि कहीं न कहीं कुछ तत्व, कुछ अंश उसे भी प्राप्त हुआ था — पत्नी है, साथ रहा है, तो कुछ प्रभाव उस पर भी पड़ा। वक्ता कहते हैं कि यही वह बिंदु था जब यह चीज़ पकड़ में आ गई; अगली समस्या यह थी कि इससे पूरी तरह छुटकारा कैसे पाया जाए।
रक्षात्मक महाभैरव प्रयोग का लक्ष्य: तंत्र का दुरुपयोग रुके, शत्रु का नाश नहीं
बाँधो और हटाओ; दुर्बुद्धि स्वयं मिटे
वक्ता कहते हैं कि दिल्ली वाले मामले की पीड़ा उन्हीं महाभैरव प्रयोग और उन्हीं विधि-विधानों से पूरी तरह बाँधकर हटा दी गई — पूरा बंधन। पत्नी ने सामने से इसे कभी नहीं माना, पर उसी समय वह तबीयत खराब होने और मायके जाने का बहाना बनाकर घर छोड़कर चली गई और बहुत लंबे समय तक मायके में रही। वे सीख निकालते हैं: ज़रूरी नहीं कि सामने जाकर शत्रु को पूरी तरह खत्म ही किया जाए। उसके भीतर का भाव बदल जाए, क्षुद्रता खत्म हो जाए, उसकी दुर्बुद्धि मिट जाए, और जो वह तंत्र का दुष्प्रयोग कर रहा है वह बंद हो जाए — इससे बड़ी बात और क्या हो सकती है? महाभैरव की परम कृपा और इस साधना-अनुष्ठान से, वे कहते हैं, उस व्यक्ति ने अपने परिवार को बचा लिया, रक्षण कर लिया।
वक्ता कहते हैं कि जब चीज़ पकड़ में आ गई, तो प्रश्न था कि इससे पूरी तरह छुटकारा कैसे पाया जाए। उन्हीं महाभैरव प्रयोग और उन्हीं विधि-विधानों से इसका पूरा बंधन किया गया और इसे हटाया गया। पत्नी ने, वे कहते हैं, सामने से इस विषय को नहीं माना, पर उसी समय वह घर छोड़कर चली गई — यही बहाना बनाकर कि तबीयत खराब है, मायके जा रहे हैं — और बहुत लंबे समय तक मायके में रही। इससे वे यह बात निकालते हैं: ज़रूरी नहीं कि हम सामने जाकर शत्रुशत्रु, इन प्रवचनों के व्यावहारिक अर्थ में — जो सामान्य अथवा तांत्रिक उपायों से गृहस्थ के विरुद्ध कार्य करता है। को पूरी तरह खत्म ही करें। उसके भीतर का भाव बदल जाए, उसकी क्षुद्रता खत्म हो जाए, उसके भीतर की दुर्बुद्धि खत्म हो जाए, और जो वह तंत्र का दुष्प्रयोग कर रहा है वह बंद हो जाए — इससे बड़ा विषय और क्या हो सकता है? भगवान महाभैरव की परम कृपा-आशीर्वाद से और इस साधना-अनुष्ठानएक दीर्घ अनुष्ठान — जिसमें अपने कड़े नियम होते हैं। के माध्यम से, वे कहते हैं, उस व्यक्ति ने अपने परिवार को बचा लिया, उसका रक्षण कर लिया। अंत में वे आशा जताते हैं कि इस घटना से दर्शकों का मनोबल बढ़ेगा और वे भी अपने अनुष्ठान पूर्ण करेंगे।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।