चौखट पर पंद्रह दिन का हवन — देव श्राप और पितृ श्राप हेतु कुल शक्ति का प्रयोग
कुल शक्ति की कृपा पुनः प्राप्त करने हेतु एक हवन प्रयोग।
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कुल की अधिष्ठात्री शक्ति की कृपा हेतु हवन प्रयोग: उद्देश्य और किसे करना चाहिए
देव श्राप या पितृ श्राप से ग्रसित लोगों के लिए अग्नि प्रयोग
वक्ता एक ऐसा प्रयोग प्रस्तुत करते हैं जो अपने कुल की अधिष्ठात्री शक्ति की कृपा प्राप्ति हेतु है, और कहते हैं कि यह पूर्ण रूप से हवनात्मक प्रयोग है, अग्नि के माध्यम से किया जाने वाला। वे कहते हैं कि इसे हर उस व्यक्ति को करना चाहिए जो कुल शक्ति के श्राप से, पितृ शक्ति के श्राप से ग्रसित है, या जिसे किसी प्रकार का देव दंड मिल रहा है। कारण वे ये गिनाते हैं: पूजा-पाठ में गलती, मंदिर में जाने-अनजाने हुआ अपराध, श्री विग्रह का खंडन, मंदिर की कोई चीज़ टूटना, या भ्रमवश मंदिर में की गई चोरी; ऐसे कृत्यों से, वे कहते हैं, देवताओं का श्राप लगता है और कुल की शक्तियाँ पूरी तरह रुष्ट हो जाती हैं।
वक्ता कहते हैं कि यह प्रयोग अपने कुल की अधिष्ठात्री शक्ति की कृपा प्राप्ति हेतु है, और यह पूर्ण रूप से हवनात्मक प्रयोग है: इसका पूरा कार्य हवन की अग्नि के माध्यम से होता है। वे कहते हैं कि इसे हर उस व्यक्ति को करना चाहिए जो कहीं न कहीं कुल शक्ति के श्राप से ग्रसित है, पितृ शक्ति के श्राप से ग्रसित है, या जिस पर किसी प्रकार का देव दंड पड़ रहा है। वे स्पष्ट करते हैं कि यह कैसे होता है। पूजा-पाठ में कोई गलती हुई हो। किसी मंदिर में जाने-अनजाने अपराध हो गया हो। श्री विग्रह का खंडन हो गया हो। मंदिर की कोई चीज़ टूट गई हो। या भ्रमवश किसी ने कभी मंदिर में किसी प्रकार की चोरी कर ली हो। ऐसे कृत्यों से, वे कहते हैं, देव का श्राप लगता है, देवताओं का श्राप लगता है, और कुल की शक्तियाँ पूरी तरह रुष्ट हो जाती हैं। वे जोड़ते हैं कि वे एक बहुत सरल विधि श्रोताओं के समक्ष रख रहे हैं ताकि साधना मार्ग पर आगे बढ़ने का इच्छुक हर व्यक्ति इससे लाभ पा सके।
देव श्राप और पितृ श्राप के लक्षण
साधन तो हैं, पर उन्हें उपयोग करने की क्षमता नहीं
वक्ता कहते हैं कि देव श्राप या पितृ श्राप में दिमाग इतना चाटित और भ्रमित हो जाता है कि सारे योग्य साधन होते हुए भी व्यक्ति कुछ नहीं कर पाता: करोड़ों की प्रॉपर्टी हो पर बैठकर ठीक से खा भी न पाए, दरवाज़े पर बीस लाख की कार खड़ी हो पर उसमें पेट्रोल डालने की क्षमता भी भीतर न रहे। देव दोष की पहचान वे यह बताते हैं कि व्यक्ति बार-बार दूसरों से पूछता है कि मेरा कष्ट क्या है, उसका मूल कारण क्या है, पर उसे उत्तर मिलता ही नहीं, या मिलता है तो वह स्वीकार नहीं करता। वे जोड़ते हैं कि देवताओं का अपमान करने से भी यही वैचारिक अवस्था बनती है।
वक्ता उस अवस्था का वर्णन करते हैं जो देव श्राप और पितृ श्राप से बनती है। दिमाग, वे कहते हैं, इतना चाटित और भ्रमित हो जाता है कि सारे योग्य साधन होने के बावजूद आप कुछ नहीं कर सकते। आपके पास करोड़ों की प्रॉपर्टी हो सकती है, पर आप बैठकर ठीक से खा भी नहीं पाओगे। घर के सामने बीस लाख की कार खड़ी हो सकती है, पर उसे हिलाने के लिए उसमें पेट्रोल डालने की क्षमता भी आपके भीतर नहीं रहेगी। यह स्थिति, वे कहते हैं, देव श्राप से, पितृ श्राप से, देव और पितृ और कुल की शक्तियों के रुष्ट होने से आती है। वे कहते हैं कि प्रयोग ठीक उसी समय के लिए है: जब आपको लगे कि आप बहुत कुछ करने की कोशिश कर रहे हैं, चाहते भी हैं, पर इतने भ्रमित हो चुके हैं कि समझ ही नहीं आ रहा क्या करना है। आप किसी से बार-बार पूछते हैं: मेरा कष्ट क्या है, बताइए, मेरी परेशानी का मूल कारण क्या है। और वे कहते हैं कि आपको उत्तर मिलेगा ही नहीं, मिला भी तो आप उसे स्वीकार नहीं करेंगे, और कोई आपको समझा नहीं पाएगा कि बात क्या है। यही भ्रम, वे कहते हैं, इस बात की पहचान है कि यह देव दोष है। चाहे यह वैचारिक अवस्था के कारण हो, या आपने किसी प्रकार से देवताओं का अपमान किया हो और उससे यह वैचारिक अवस्था आपमें उत्पन्न हो गई हो, वे कहते हैं कि आप इसी अवस्था को प्राप्त हो जाओगे।
ज्ञात या अज्ञात कुलदेवी के साथ कुल प्रयोग, और कुलदेवी के साथ सदा रहने वाले कुल भैरव
भैरव एक पद है जो कुल के रक्षक को मिलता है
वक्ता कहते हैं कि व्यक्ति दो में से एक स्थिति में होगा, या तो उसे पता है कि कुलदेवी कौन हैं, या पता ही नहीं कि कुल की शक्ति कौन है, और प्रयोग दोनों ही स्थितियों में करना है। वे कहते हैं कि यह केवल कुलदेवी के लिए नहीं, बल्कि कुल के उन रक्षक देवों के लिए भी है जो भैरव के पद पर हैं। वे कहते हैं कि सौ प्रतिशत निश्चित मानें कि कुलदेवी के साथ कुल भैरव, रक्षण देव, होते हैं, आपकी जानकारी में हों या न हों, चाहे पद कोई भी हो, वीर हों, महावीर हों, हनुमान जी के स्वरूप में हों या भैरव जी के स्वरूप में। भैरव, वे कहते हैं, एक पद है जो रक्षात्मक देव को मिलता है, संभवतः कुल के किसी पहले के सिद्ध व्यक्ति को देवी की कृपा से, और कालांतर में लोग भूल जाते हैं या जानकारी ही नहीं रहती।
वक्ता कहते हैं कि सबसे पहले व्यक्ति के सामने दो स्थितियाँ होंगी। या तो उसे अपनी कुलदेवी के बारे में पता है कि वे कौन हैं, या उसे पता ही नहीं कि कुल की शक्ति कौन है। दोनों ही स्थितियों में, वे कहते हैं, प्रयोग इसी तरीके से करना है। वे कहते हैं कि यह प्रयोग केवल कुलदेवी के लिए नहीं है। यह कुल के जो भी रक्षक देव हैं, जो भैरव के पद पर हैं, उनके लिए भी है। वे श्रोताओं से कहते हैं कि इसे सौ प्रतिशत निश्चित मानें: आपकी जानकारी में हो या न हो, कुलदेवी के साथ कुल भैरव, रक्षण देव होते हैं। पद चाहे कुछ भी हो, वे कहते हैं, वीर हों, महावीर हों, हनुमान जी के स्वरूप में हों या भैरव जी के स्वरूप में। भैरव, वे समझाते हैं, एक पद है जो रक्षात्मक देव को प्राप्त होता है। हो सकता है कुल के किसी पहले के सिद्ध व्यक्ति को वह पद देवी की कृपा से मिला हो, पर ऐसा रक्षक होता अवश्य है। कालांतर में, वे कहते हैं, लोग भूल जाते हैं, या जानकारी नहीं होने के कारण पता ही नहीं रहता।
कुल हवन कब आरंभ करें, किस समय करें, और कितने दिन करें
पूर्णिमा से अमावस्या, या नवरात्रि; सत्ताईस दिन सर्वोत्तम
वक्ता कहते हैं कि प्रयोग किसी भी पूर्णिमा से आरंभ करके अमावस्या तक, पंद्रह दिन, करना है, या फिर किसी भी नवरात्रि के पहले दिन से दशमी तक। इसे सूर्योदय या सूर्यास्त के समय करना है, पर वे कहते हैं कि सूर्यास्त के समय करें तो उस दिन नमक इत्यादि नहीं खाना है, इसलिए सुबह करना अच्छा है; नवरात्रि उपासना में शाम को भी कर सकते हैं। वे कहते हैं कि हो सके तो कम से कम सत्ताईस दिन करें, जो अत्यंत उत्तम है, नहीं तो पंद्रह दिन या नवरात्रि की अवधि, सुबह के समय।
कुल हवन की सामग्री: कुंड, गेहूँ का आटा, गुड़, घी, चौमुख दीपक, तेल और सिंदूर
हर वस्तु पर शुद्धता की शर्त, और क्या वर्जित है
वक्ता सामग्री गिनाते हैं। मिट्टी का एक बड़ा पात्र जिसमें हवन हो सके, या तांबे का हवन कुंड, एलुमिनियम या लोहे का नहीं, मध्यम आकार का, क्योंकि यहाँ वेदी नहीं बनाई जा सकती। गेहूँ का आटा, या तो स्वयं गेहूँ लाकर धोकर पिसवाया हुआ, या ऐसी जगह से जहाँ पूजा के लिए शुद्ध गेहूँ मिलता हो, ढाई से तीन किलो; अच्छा गुड़ ऐसी पूजा दुकान से जहाँ नमक न मिलता हो ताकि उसमें दोष न हो; और घी। रोज़ दो चौमुख दीपक दीपक, रोज़ नए, यानी पूर्णिमा से अमावस्या के लिए लगभग तीस और नवरात्रि के लिए बीस, सरसों का तेल और तिल का तेल, और कलावा की बाती। और असली नारंगी महाबीरी सिंदूर, जिसे वे कहते हैं कि बखरा सिंदूर भी कहते हैं।
वक्ता प्रयोग की ज़रूरतें गिनाते हैं। पहला, मिट्टी का एक बड़ा पात्र जिसमें हवन किया जा सके। हवन कुंड हो तो चलेगा, पर वह तांबे का होना चाहिए, एलुमिनियम या लोहे का नहीं। इसमें वेदी नहीं बनाई जा सकती, वे कहते हैं, इसलिए कुंड चाहिए: या तो मिट्टी का, या तांबे का, मध्यम आकार का, न बहुत छोटा न बहुत बड़ा। दूसरा, गेहूँ का आटा। या तो स्वयं गेहूँ लाकर, धोकर पिसवाएँ, या ऐसी जगह से आटा लाएँ जहाँ पूजा-पाठ के लिए शुद्ध गेहूँ मिलता हो। जिसे वे यहाँ ग्यारह दिन का प्रयोग कहते हैं उसके लिए वे कम से कम ढाई से तीन किलो गेहूँ रखने को कहते हैं। तीसरा, अच्छा गुड़ ऐसी पूजा दुकान से जहाँ नमक इत्यादि नहीं मिलता, ताकि गुड़ में कोई दोष न हो। और घी। यही तीन, वे कहते हैं, सामग्री हैं। दो दीपक लगेंगे, दोनों चौमुख, और रोज़ नए दीपक: पूर्णिमा से अमावस्या करें तो तीस दीपक लगेंगे, नवरात्रि के दस दिन में लगभग बीस। सरसों का तेल और तिल का तेल दोनों लाकर रख लें। बाती कलावे की बनेगी; चौमुख दीपक के लिए पहले से बनाकर रख लें। नारंगी रंग का महाबीरी सिंदूर भी लाएँ, जिसे बहुत जगह बखरा सिंदूर भी कहते हैं, नारंगी वाला: असली, बढ़िया सिंदूर। आगे चलकर वे रोट में थोड़ा काला तिलतिल, विशेषतः काला तिल, जो पितृ कर्म और अनेक आहुतियों का मुख्य द्रव्य है।, अग्नि के लिए गाय के गोबर के उपले या आम की लकड़ी, गंगाजलगंगा नदी का जल, अशुद्धि के संपर्क में आई अनुष्ठान वस्तुओं को शुद्ध व पुनःप्रतिष्ठित करने हेतु प्रयुक्त।, तीन-चार कुश और आम का पत्ता, दीपक के नीचे अक्षतअखंडित कच्चे चावल के दाने, संकल्प लेते समय जल व पुष्प के साथ हाथ में लिए जाते हैं। या फूल, और हो सके तो अंतिम दिन के लिए लाल मौली की बाती वाला छोटा चांदी का दीपक भी जोड़ते हैं।
घर में कुल हवन कौन कर सकता है
पहली प्राथमिकता बड़े बेटे या घर के मुखिया को
वक्ता कहते हैं कि यह प्रयोग घर का बड़ा लड़का या घर का मुखिया कर सकता है। विशेष परिस्थिति में घर की बेटी या बहू भी कर सकती है, पर वे कहते हैं कि प्रयास करें कि बड़ा लड़का या कोई भी पुत्र करे, क्योंकि वह ज़्यादा अच्छा होता है। वे कहते हैं कि इस बात का ध्यान रखें कि किसे प्राथमिकता देनी है।
वक्ता कहते हैं कि इस प्रयोग को घर का बड़ा लड़का कर सकता है, या जो घर का मुखिया हो वह कर सकता है। विशेष परिस्थिति में, वे कहते हैं, घर की बेटी भी कर सकती है, बहू भी कर सकती है। पर वे कहते हैं कि प्रयास करें कि घर का लड़का करे, बड़ा लड़का, या कोई भी पुत्र, क्योंकि तब ज़्यादा अच्छा होता है। वे दोहराते हैं कि विशेष परिस्थिति में पुत्री और बहू भी कर सकती हैं, और श्रोताओं से कहते हैं कि यह ध्यान रखें कि किसे प्राथमिकता देनी है।
कुल हवन का चौखट विधान: कुश और आम का पत्ता, पाँच टीके और मुख्य द्वार पर दो दीपक
दाहिने सरसों तेल भैरव के लिए, बाएँ तिल तेल कुलदेवी के लिए
वक्ता कहते हैं कि घर एक दिन पहले साफ किया जाए और प्रयोग दृढ़ संकल्प के साथ घर के मुख्य द्वार पर आरंभ हो, किराए के घर में उस द्वार पर जहाँ से अपनी हद शुरू होती है। द्वार को गंगाजल में भीगे कपड़े से पोंछा जाता है। आम के पत्ते का अगला भाग काटकर पीछे कम से कम तीन कुश के साथ बाँधते हैं, गंगाजल में डुबोकर द्वार के ठीक बीचोंबीच लटकाते हैं; उस पर घी मिला महाबीरी सिंदूर का टीका करते हैं, और चौखट पर कुलदेवी के नाम से पाँच जगह टीका करते हैं। घर से बाहर की ओर मुख करके दाहिनी ओर सरसों तेल का चौमुख दीपक दीपक कुल के रक्षक भैरव के नाम से और बाईं ओर तिल तेल का दीपक कुलदेवी के नाम से जलाते हैं, हर दीपक थोड़े अक्षत या फूल पर, कभी खाली ज़मीन पर नहीं।
वक्ता पहला दिन पूर्णिमा, या नवरात्रि प्रतिपदा, मानते हैं। सबसे पहले, वे कहते हैं, एक दिन पहले घर की अच्छे से साफ-सफाई कर लें, और बिल्कुल शुद्ध मन में दृढ़ संकल्प होना चाहिए। कष्ट जितना भी हो, झूठे मुकदमे लगे हों, शरीर से बहुत अधिक कष्ट हो, यह दस-पंद्रह मिनट का प्रयोग है, और बहुत अधिक कष्ट में भी इसे करना है, कुलदेवी पता हो या न हो। यह घर के मुख्य द्वार पर होता है। किराए के घर में रहते हैं, वे कहते हैं, तो जिस मुख्य द्वार तक का पैसा आप देते हैं, जहाँ से आपकी हद शुरू होती है, वहाँ। सबसे पहले पूरे द्वार को गंगाजल में भीगे कपड़े से ठीक से पोंछ लें; पहले से धो-पोंछ लिया हो तो भी पूजा के समय फिर से पोंछें। तीन-चार कुश लाएँ, जो पूजा दुकान पर मिल जाते हैं, और आम का पत्ता। पत्ते का अगला भाग काट लें और पीछे के भाग में कम से कम तीन कुश के साथ पत्ते को बाँध दें। उस पत्ते को गंगाजल में डुबोकर मुख्य द्वार के ठीक बीचोंबीच लटका दें। लटकाने के बाद उस पर नारंगी महाबीरी सिंदूर में घी मिलाकर टीका करें। फिर मुख्य द्वार की चौखट पर पाँच जगह कुलदेवी के नाम से टीका करें। चौखट, वे कहते हैं, सबसे महत्वपूर्ण है; कुलदेवी का वास कहाँ होता है यह वे पहले के वीडियो में बता चुके हैं। फिर, मुख घर से बाहर की ओर, यानी जैसे आप घर से बाहर निकल रहे हों, चौखट पर अपनी दाहिनी ओर सरसों तेल का चौमुख दीपक और बाईं ओर तिल तेल का चौमुख दीपक जलाएँ। हर दीपक के नीचे थोड़ा अक्षत या फूल ज़रूर रखें; दीपक खाली नहीं रखा जाता, आसन देकर रखा जाता है। दाहिने का सरसों तेल का दीपक भैरव जी के नाम से जलता है, आपके कुल के रक्षक भैरव के नाम से, और बाईं ओर का दीपक कुलदेवी के नाम से। वे दोहराते हैं कि मुख बाहर की ओर रहेगा, जैसे घर से निकल रहे हों, और श्रोताओं से कहते हैं कि इसे बार-बार ध्यान से सुन लें।
कुल प्रयोग का दैनिक हवन: रोट, तीस आहुतियाँ और उनका क्रम, और राख
नमः अनिवार्य, ओम नहीं; नाम न पता हो तो कुलदिब्बे नमः
वक्ता कहते हैं कि मिट्टी के पात्र या कुंड में गाय के गोबर के उपले या आम की लकड़ी से अग्नि प्रज्वलित की जाती है। उससे पहले, नहा-धोकर, गेहूँ के आटे, गुड़ और घी में थोड़ा काला तिल मिलाकर घी में रोट बनाते हैं, फिर उसे तोड़कर चूरा करके तीस टुकड़े बनाते हैं: सत्ताईस कुलदेवी के लिए और तीन अलग। घर से बाहर की ओर मुख करके, फटाफट, मंत्र मन में बोलते हुए, पहली तीन आहुति गणेश, कुल गुरु और हनुमान के नाम से; कुलगुरु पता हों तो वे पहले और गणपति दूसरे, नहीं तो गणपति पहले। बाकी सत्ताईस कुलदेवी के नाम से, नाम के आगे नमः लगाकर, बिना ओम, जैसे दुर्गाय नमः, स्वाहा बोल सकते हैं; नाम न पता हो तो कुलदिब्बे नमः स्वाहा। वे कहते हैं कि यहाँ नमः अनिवार्य है और हवन की सामान्य पद्धति कि स्वाहा हो तो नमः नहीं, यहाँ नहीं चलेगी। बाद में हाथ में पानी लेकर कुंड के चारों ओर तीन बार घुमाकर वहीं डाल देते हैं, अग्नि को जलने देते हैं, और राख हटाकर एक जगह इकट्ठा करते जाते हैं।
दीपकों के बाद, वक्ता कहते हैं, जो मिट्टी का पात्र या हवन कुंड रखा है उसमें गाय के गोबर के उपले या आम की लकड़ी से अग्नि प्रज्वलित करते हैं। पर उससे पहले, नहा-धोकर, कुछ बनाना है। जो गेहूँ का आटा लाए हैं वह लें, गुड़ और घी, तीनों को मिलाएँ, और उसमें थोड़ा सा काला तिल मिलाएँ, हल्का सा। इतना आटा सानें कि एक बढ़िया रोट बन जाए, और घी में लगाकर अच्छा रोट बनाएँ। फिर रोट को तोड़कर चूरा कर लें, और चूरे से आहुति के लिए लड्डू जैसे छोटे-छोटे गोल टुकड़े बना लें। सत्ताईस आहुतियाँ डालनी हैं, इसलिए सत्ताईस अलग-अलग टुकड़े बनते हैं। इनके अलावा तीन टुकड़े और चाहिए, अलग रखे हुए: कुल तीस टुकड़े। वे जोड़ते हैं कि गोल बनना ज़रूरी नहीं; रोट तोड़कर तीस टुकड़े अलग रख सकते हैं। अग्नि प्रज्वलित करें। मुख घर से बाहर की ओर ही रहेगा। फटाफट करना है, देर नहीं लगानी, और मंत्र मन में बोलने हैं। पहली आहुति गणपति जी के नाम से: हाथ में टुकड़ा लेकर अग्नि में डाल दें। दूसरी कुल गुरु के नाम से, कुल के गुरु जहाँ भी हों, जहाँ भी वंश चल रहा हो। क्रम का नियम वे बताते हैं: कुल गुरु पता हों तो पहली आहुति कुल गुरु के नाम से और दूसरी गणपति जी के नाम से; न पता हों तो पहली गणपति जी के नाम से और दूसरी कुल गुरु के नाम से। तीसरी आहुति हनुमान जी के नाम से। ये तीन हुईं। बाकी सत्ताईस, अगर कुलदेवी का नाम पता है, तो उनके नाम से, नाम के आगे नमः लगाकर। कुलदेवी का नाम भवानी या दुर्गा हो तो ओम लगाने की ज़रूरत नहीं: दुर्गाय नमः बोलकर डालें। स्वाहा बोल सकते हैं, कोई दिक्कत नहीं। नाम न पता हो तो कुलदिब्बे नमः बोलकर डालते जाएँ, कुलदिब्बे नमः स्वाहा। नमः लगाना ज़रूरी है, वे ज़ोर देते हैं। हवन की वह पद्धति कि स्वाहा लगाते हैं तो नमः नहीं लगाते, वे कहते हैं, यहाँ नहीं चलेगी; जैसा वे बता रहे हैं वैसा ही करें। तीसवीं आहुति डल जाए तो हाथ में पानी लेकर कुंड के चारों ओर तीन बार घुमाकर वहीं डाल दें, और जितनी देर जले उसे जलने दें। जलकर राख हो जाए तो उसे हटा दें, और उसी राख को एक जगह इकट्ठा करते जाएँ।
कुल हवन का समापन: अंतिम अग्नि से जला चांदी का दीपक पूजा स्थान पर
अंतिम अग्नि को कुलदेवी के नाम से घर के भीतर ले जाना
वक्ता कहते हैं कि जब पूरे प्रयोग की अंतिम आहुति दी जाए, तो संभव हो तो एक छोटा सा चांदी का दीपक खरीद लें, उसमें लाल मौली धागे की बाती बनाएँ, घी डालें, अंतिम आहुति के बाद उसी हवन की अग्नि से उसे प्रज्वलित करें, और अपने पूजा स्थान पर ले जाकर कुलदेवी के नाम से रख दें। उस अंतिम दिन तक, वे कहते हैं, बस रोज़ का विधान लगातार करते रहना है।
वक्ता कहते हैं कि प्रयोग के अंत के लिए एक चीज़ और ध्यान रखनी है। जब आप अंतिम आहुति दें, अगर आपके लिए संभव हो, अगर आप कर सकें, तो एक छोटा सा चांदी का दीपक खरीद लें, छोटा सा ही सही। उसमें लाल मौली धागे से बाती बनाएँ, घी डालें, और अंतिम आहुति देने के बाद उसी अग्नि से उस दीपक को प्रज्वलित करें। उसे अपने पूजन स्थान पर ले जाकर कुलदेवी के नाम से रख दें। अंतिम दिन तक, वे कहते हैं, बस यही रोज़ का काम लगातार करते रहना है; और कुछ नहीं।
सावधानी: द्वार पर बंधे कुश और आम का पत्ता अंतिम दिन तक नहीं बदलना
इतना कसकर बाँधें कि सूखकर गिरे नहीं
वक्ता कहते हैं कि पहले दिन द्वार के मध्य में बाँधे गए तीन कुश और आम का पत्ता प्रयोग के अंतिम दिन तक नहीं बदलने हैं। वे कहते हैं कि इसे बहुत कसकर बाँधें ताकि यह सूखकर गिर न जाए।
वक्ता कहते हैं कि शुरू में द्वार के मध्य में जो तीन कुश और आम का पत्ता बाँधे थे, वह अंतिम दिन तक नहीं बदलना है। ध्यान रखें कि वह सूखकर गिरे नहीं, वे कहते हैं; इसके लिए उसे बहुत कसकर बाँधना है।
कुल हवन का फल: स्वप्न में कुलदेवी के दर्शन, और कुछ न हो तो प्रयोग दोहराना
पंद्रह दिन रुकें, फिर पूर्णिमा से करें, हार न मानें
वक्ता कहते हैं कि इतना कर लें तो कुलदेवी सौ प्रतिशत प्रयोग की अवधि में स्वप्न के माध्यम से दर्शन देंगी; इतना मार्गदर्शन अवश्य मिलेगा कि देवी हैं, वे प्रसन्न हैं या नहीं यह भी समझ आएगा, और आगे के लिए मार्गदर्शन भी मिलेगा। एक बार के प्रयोग से कुछ न हो तो वे कहते हैं कि पंद्रह दिन रुककर फिर पूर्णिमा से करें, और एक बार में हार न मानें: प्रारब्ध वैसा होगा, बड़ी गलतियाँ या बड़े अपराध किए होंगे, तो दंड भी वैसा ही मिलेगा, और बहुत से अपराध ऐसे होते हैं जो लोग बताते नहीं। वे कहते हैं कि इसमें न बहुत खर्च है, न बहुत कुछ जाता है, पर मिलता बहुत कुछ है।
वक्ता कहते हैं कि इतना कर लें तो आपकी कुलदेवी सौ प्रतिशत इस बीच स्वप्न के माध्यम से, किसी न किसी माध्यम से स्वप्न में दर्शन देंगी। इतना मार्गदर्शन आपको ज़रूर मिल जाएगा कि हाँ, देवी हैं। वे प्रसन्न हैं या नहीं, यह भी आपको समझ में आएगा। और आगे के लिए मार्गदर्शन भी मिलेगा। एक बार के प्रयोग से यह न हो, वे कहते हैं, तो पंद्रह दिन रुककर फिर पूर्णिमा से करें। एक बार में हार नहीं माननी कि बस हो गया, नहीं हुआ। आपका प्रारब्ध वैसा होगा; बड़ी गलतियाँ, बड़े अपराध किए होंगे, तो दंड भी वैसा ही मिलेगा। बहुत सारे अपराध ऐसे होते हैं, वे कहते हैं, जो लोग बताते नहीं। इसलिए इसे बार-बार करें। इसमें न बहुत खर्च आने वाला है, वे कहते हैं, न आपका बहुत कुछ जाने वाला है, पर मिलेगा बहुत कुछ।
घर में अभिचारिक प्रयोग चल रहा हो तो क्या चौखट का भोग कोई और शक्ति ले सकती है?
चौखट की पूजा सही शक्ति तक ही जाती है
इस प्रश्न पर कि घर में अभिचार प्रयोग या तंत्र-मंत्र चल रहा हो तो यह प्रयोग कैसे करें, क्योंकि भोग कोई और शक्ति ले सकती है, वक्ता कहते हैं कि निश्चिंत रहें: चौखट पर की पूजा इतनी आसानी से लेने की किसी की औकात नहीं होती। वहाँ कुलदेवी के नाम से जो दिया जाता है, वे कहते हैं, उसे भगवती पार्वती की ही अंश शक्ति ग्रहण करती हैं। अपने कर्म के कारण फल भले न मिले, पर पूजा वहाँ गलत नहीं हो सकती। चौखट की पूजा, और चौक यानी चौराहे की पूजा, सही चीज़ तक ही जाती है; गलत चीज़ उसे जल्दी नहीं ले पाती। इसलिए वे कहते हैं कि प्रयोग निश्चिंत होकर करें।
वक्ता एक प्रश्न उठाते हैं जो लोगों से आ सकता है: अगर घर में अभिचारिक प्रयोग हो, तंत्र-मंत्र का प्रयोग हो, फलाना-ढिमका चीज़ हो, तो हम यह कैसे करेंगे? इसमें तो दिक्कत हो जाएगी, शक्तियाँ कोई और ले लेगा, भोग कोई और ले लेगा। निश्चिंत रहें, वे उत्तर देते हैं। चौखट पर की पूजा इतनी आसानी से ले लेने की किसी की औकात नहीं होती। जहाँ आप कुलदेवी के नाम से देंगे, वहाँ भगवती पार्वती की ही अंश शक्ति उसे ग्रहण करेंगी। अपने कर्म के कारण फल भले न मिले, वह अलग बात है; पर आपकी पूजा वहाँ गलत नहीं हो सकती। चौखट की पूजा, और चौक यानी चौराहे की पूजा, सही चीज़ को ही जाती है, वे कहते हैं; गलत चीज़ उसे जल्दी नहीं ले पाती। इसलिए वे श्रोताओं से कहते हैं कि यह प्रयोग निश्चिंत होकर करें, और कहते हैं कि इसे करने से अत्यंत ही लाभ मिलेगा।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।