चौखट पर पंद्रह दिन का हवन — देव श्राप और पितृ श्राप हेतु कुल शक्ति का प्रयोग
कुल शक्ति की कृपा पुनः प्राप्त करने हेतु एक हवन प्रयोग।
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कुल की अधिष्ठात्री शक्ति की कृपा हेतु हवनात्मक प्रयोग
अपने कुल की अधिष्ठात्री शक्ति की कृपा प्राप्ति हेतु एक हवनात्मक प्रयोग
वक्ता कहते हैं कि यह प्रयोग अपने कुल की अधिष्ठात्री शक्ति की कृपा प्राप्ति हेतु है, और यह पूर्ण रूप से हवनात्मक प्रयोग है — अर्थात् पूरा का पूरा अग्नि के माध्यम से किया जाने वाला।
कुल शक्ति के श्राप, पितृ श्राप या देव दंड से ग्रसित व्यक्ति
यह प्रयोग उनके लिए है जो कुल शक्ति के श्राप, पितृ श्राप या देव दंड से ग्रसित हैं
हर वह व्यक्ति जो कहीं न कहीं कुल शक्ति के श्राप से या पितृ शक्ति के श्राप से ग्रसित है, अथवा जिसे किसी प्रकार का देव दंड प्राप्त हो रहा है। वे कारण गिनाते हैं: पूजा-पाठ में कोई गलती, किसी मंदिर में जाने-अनजाने हुआ अपराध, श्री विग्रह का खंडन, मंदिर की कोई वस्तु टूट जाना, या भ्रमवश मंदिर में की गई किसी प्रकार की चोरी।
वक्ता कहते हैं कि इसे हर उस व्यक्ति को करना चाहिए जो कहीं न कहीं कुल शक्ति के श्राप से ग्रसित है, पितृ शक्ति के श्राप से ग्रसित है, अथवा जिस पर किसी प्रकार का देव दंड पड़ रहा है। वे स्पष्ट करते हैं कि उनका आशय क्या है। पूजा-पाठ में कोई गलती हुई हो सकती है। किसी मंदिर में उस व्यक्ति से जाने या अनजाने में अपराध हो गया हो सकता है। श्री विग्रह का खंडन हो गया हो सकता है। मंदिर की कोई वस्तु टूट गई हो सकती है। या भ्रमवश किसी ने कभी मंदिर में किसी प्रकार की चोरी कर ली हो सकती है। इस प्रकार के कृत्य करने से, वे कहते हैं, होता यह है कि देव का श्राप लगता है — देवताओं का श्राप लगता है।
साधनों का अभाव नहीं, बल्कि उन्हें भोगने की क्षमता का अभाव
देव श्राप व्यक्ति के साथ क्या करता है?
कुल की शक्तियाँ पूरी तरह रुष्ट हो जाती हैं और दिमाग इतना चाटित और भ्रमित हो जाता है कि सारे योग्य साधन होने के बावजूद व्यक्ति कुछ नहीं कर पाता। वे दो उदाहरण देते हैं: करोड़ों की प्रॉपर्टी होने पर भी बैठकर ठीक से खा न पाना; घर के सामने बीस लाख की कार खड़ी होने पर भी उसमें पेट्रोल डालने तक की क्षमता अपने भीतर न रहना।
वक्ता कहते हैं कि कुल की शक्तियाँ पूरी तरीके से रुष्ट हो जाती हैं, और दिमाग इतना चाटित और भ्रमित हो जाता है कि सारे योग्य साधन आपके पास होने के बावजूद भी आप कुछ नहीं कर सकते। हो सकता है, वे कहते हैं, कि आपके पास करोड़ों की प्रॉपर्टी हो, लेकिन आप बैठकर ठीक से खा भी न पाएँ। हो सकता है कि आपके घर के सामने बीस लाख की कार खड़ी हो, लेकिन उस कार को हिलाने के लिए उसमें पेट्रोल डालने की क्षमता भी आपके भीतर न रहे। यह स्थिति, वे कहते हैं, कहीं न कहीं देव शाप से और पितृ श्राप से उत्पन्न होती है — कहीं न कहीं देव और पितृ रुष्ट होते हैं, कुल की शक्तियाँ रुष्ट होती हैं।
एक जगह अटक जाना, और उत्तर का न मिलना या उससे संतुष्ट न हो पाना
कैसे पहचानें कि जो कष्ट है वह देव दोष है?
वक्ता एक सीधी कसौटी देते हैं। जब आपको लगे कि आप बहुत कुछ करने का प्रयास कर रहे हैं, चाहते भी हैं, पर इतने भ्रमित हो चुके हैं कि समझ ही नहीं आ रहा कि क्या करना है; जब आप बार-बार किसी से पूछते हैं कि मेरा कष्ट क्या है और उसका मूल कारण क्या है; जब आप एक जगह जाकर अटक जाएँ और या तो उत्तर ही न मिले, या किसी एक व्यक्ति के उत्तर से संतुष्ट न हो पाएँ — तब, वे कहते हैं, सौ प्रतिशत मान लीजिए कि यह देव दोष है, आपके ऊपर देवों का कोप है।
ऐसी कंडीशन के लिए, ऐसे समय के लिए विशेष रूप से, वक्ता कहते हैं, यह प्रयोग दिया गया है — और जब भी आपको ऐसा लगे कि हाँ, मैं कोशिश तो कर रहा हूँ, चाहता भी हूँ, लेकिन इतना अधिक भ्रमित हो चुका हूँ कि समझ ही नहीं आ रहा कि क्या करना है। आप किसी से बार-बार प्रश्न करते हैं: बताइए मुझे क्या कष्ट है, बताइए मेरी परेशानी का मूल कारण क्या है। जब भी आप जानें कि आप एक जगह जाकर अटक गए हैं, कि आपको अपने प्रश्न का उत्तर नहीं मिल पा रहा, या कि आप एक व्यक्ति के उत्तर से संतुष्ट नहीं हो पा रहे — तब, वे कहते हैं, सौ प्रतिशत मानकर चलिए कि यह देव दोष है, यानी आपके ऊपर देवों का कोप है। इतनी बात, वे कहते हैं, मान लेनी चाहिए।
देवताओं के अपमान से उत्पन्न वैचारिक अवस्था
देवताओं का अपमान भी उसी वैचारिक अवस्था को उत्पन्न कर देता है
वक्ता कहते हैं कि चाहे यह अवस्था वैचारिक अवस्था के कारण हो, या आपने देवताओं का किसी प्रकार से अपमान किया हो और उसके कारण यह वैचारिक अवस्था आपके साथ उत्पन्न हो गई हो, घटित हो गई हो — दोनों ही स्थितियों में आप इसी अवस्था को प्राप्त हो जाएँगे। और उसी अवस्था के लिए वे एक बहुत ही सरल विधि प्रस्तुत करते हैं।
चाहे यह वैचारिक अवस्था के कारण हो, वक्ता कहते हैं, या इसलिए कि आपने देवताओं का किसी प्रकार से अपमान किया हो और उसके कारण यह वैचारिक अवस्था आपके साथ उत्पन्न हो गई हो, घटित हो गई हो — तब भी आप इसी अवस्था को प्राप्त हो जाएँगे। तो इस अवस्था में हमें क्या और कैसे करना चाहिए? इसके लिए, वे कहते हैं, एक बहुत ही सरल विधि आप सभी के समक्ष प्रस्तुत है। वे आशा करते हैं कि हर वह व्यक्ति इससे लाभ प्राप्त करेगा जो साधना मार्ग पर आगे बढ़ना चाहता है।
दोनों ही स्थितियाँ, और भैरव के पद पर स्थित कुल के रक्षक देव
क्या कुलदेवी को जाने बिना भी कुल का प्रयोग किया जा सकता है?
हाँ। वक्ता कहते हैं कि दो ही स्थितियाँ होती हैं — या तो आपको जानकारी है कि आपकी कुलदेवी कौन हैं, या आपको पता ही नहीं है कि कुल की शक्ति कौन है — और दोनों ही स्थितियों में यह प्रयोग करना है। यह केवल कुलदेवी के लिए भी नहीं है: यह आपके कुल के उन रक्षक देवों के लिए भी है जो भैरव के पद पर होंगे।
वक्ता कहते हैं कि सर्वप्रथम आपके सामने दो समस्याएँ होंगी: या तो आपको अपनी कुलदेवी के विषय में जानकारी होगी कि वे कौन हैं, या फिर आपको पता ही नहीं होगा कि कुल शक्ति कौन है। दोनों ही कंडीशन में, दोनों ही तरीके से यह प्रयोग करना है। और यह प्रयोग, वे कहते हैं, केवल और केवल कुलदेवी के लिए नहीं है। यह आपके कुल के जो भी रक्षक देव होंगे, जो भैरव के पद पर होंगे, उनके हेतु भी है। यह बात सौ प्रतिशत निश्चित मानिए, वे कहते हैं: आपकी जानकारी में हो या न हो, कुलदेवी के साथ कुल कुल भैरव होते हैं, रक्षक देव होते हैं, पद चाहे कुछ भी हो — चाहे वे वीर हों, महावीर हों, चाहे हनुमान जी के स्वरूप में हों या भैरव जी के स्वरूप में।
रक्षात्मक देव को प्राप्त होने वाले एक पद के रूप में भैरव
भैरव क्या हैं?
वे कहते हैं कि भैरव एक पद है, जो रक्षात्मक देव को प्राप्त होता है। हो सकता है कि आपके ही कुल का कोई पहले का सिद्ध व्यक्ति हो जिसे वह पद देवी की कृपा से प्राप्त हुआ हो; पर वे होते अवश्य हैं। कालांतर में लोग भूल जाते हैं, या जानकारी न होने के कारण पता नहीं रहता।
भैरव, वक्ता कहते हैं, एक पद है जो रक्षात्मक देव को प्राप्त होता है। हो सकता है कि आपके कुल का कोई पहले का सिद्ध व्यक्ति हो जिसे वह पद देवी की कृपा से प्राप्त हुआ हो। लेकिन वे होते हैं। कालांतर में लोग भूल जाते हैं, या जानकारी न होने के कारण उसका पता नहीं रहता।
पूर्णिमा से अमावस्या, पंद्रह दिन — या नवरात्रि की प्रतिपदा से दशमी
पूर्णिमा से अमावस्या तक, या नवरात्रि की प्रतिपदा से दशमी तक — प्रयोग कब आरंभ करें
वक्ता कहते हैं कि यह प्रयोग किसी भी पूर्णिमा के दिन से आरंभ करके अमावस्या के दिन तक करना है — अर्थात् पंद्रह दिन। या फिर किसी भी नवरात्रि के पहले दिन से लेकर दशमी तिथि तक करना है।
सूर्योदय या सूर्यास्त, और सूर्यास्त के साथ जुड़ा नमक का निषेध
सूर्योदय या सूर्यास्त — और सूर्यास्त के हवन से जुड़ा नमक का निषेध
सुबह सूर्योदय के समय, या शाम को सूर्यास्त के समय। लेकिन यदि आप सूर्यास्त के समय कर रहे हैं, वक्ता कहते हैं, तो निश्चिंत मानकर चलिए कि उस दिन आपको नमक इत्यादि नहीं खाना है। इसीलिए वे कहते हैं कि सुबह करना अच्छा रहेगा — और यदि आप नवरात्रि उपासना करते हैं तो नवरात्रि में शाम को भी कर सकते हैं।
इसे सुबह सूर्योदय के समय करना है, वक्ता कहते हैं, या फिर शाम को सूर्यास्त के समय। लेकिन यदि आप सूर्यास्त के समय कर रहे हैं, तो निश्चित और तय मानकर चलिए कि उस दिन आपको नमक इत्यादि नहीं खाना है। तो अच्छा यह रहेगा, वे कहते हैं, कि आप सुबह के समय करें; या यदि आप नवरात्रि उपासनाइष्ट देवता की निरंतर आराधना, जिसे साधक वर्षों तक नियमपूर्वक निभाता है। करते हैं, तो नवरात्रि में शाम को भी कर सकते हैं।
मिट्टी का बड़ा पात्र या तांबे का कुंड — एलुमिनियम या लोहे का नहीं
मिट्टी का बड़ा पात्र, या तांबे का कुंड — एलुमिनियम या लोहे का कभी नहीं
सबसे पहले जो चीज़ चाहिए वह है मिट्टी का एक बड़ा पात्र, जिसमें आप हवन कर सकें। यदि आपके पास हवन कुंड है तो वह चलेगा, पर कुंड तांबे का होना चाहिए — एलुमिनियम का या लोहे का नहीं। इस प्रयोग में वेदी बनाई नहीं जा सकती, इसलिए कुंड चाहिए होगा। या तो मिट्टी का कुंड ले आइए या तांबे का, मध्यम आकार का — न बहुत छोटा, न बहुत बड़ा।
सबसे पहली चीज़ जो चाहिए, वक्ता कहते हैं, वह है मिट्टी का एक बड़ा पात्र, जिसमें आप हवन कर सकें। यदि आपके पास हवन कुंड है तो वह चलेगा, लेकिन हवन कुंड तांबे का होना चाहिए: एलुमिनियम का नहीं, लोहे का नहीं। इसमें वेदी बनाई नहीं जा सकती, वे कहते हैं, इसीलिए कुंड की आवश्यकता पड़ेगी। तो या तो मिट्टी का कुंड ले आइए या तांबे का कुंड ले आइए — मध्यम आकार का, न बहुत छोटा, न बहुत बड़ा।
गेहूँ का आटा, गुड़ और घी — और उन पर लगी शुद्धता की शर्तें
गेहूँ, गुड़ और घी — तीन सामग्री और उनमें से हर एक की शुद्धि की शर्त
तीन सामग्री। गेहूँ जिसे आप स्वयं लाकर, धोकर पिसवाएँ, या ऐसी जगह से आटा जहाँ पूजा-पाठ के लिए शुद्ध गेहूँ मिलता हो — कम से कम ढाई से तीन किलो गेहूँ। अच्छा गुड़ ऐसी पूजा दुकान से जहाँ नमक इत्यादि नहीं मिलता हो, ताकि गुड़ में कोई दोष न हो। और घी।
दूसरी चीज़ जो चाहिए, वक्ता कहते हैं, वह यह कि आप स्वयं गेहूँ लाकर, धोकर पिसवाएँ; या फिर ऐसी जगह से गेहूँ का आटा लाएँ जहाँ पूजा-पाठ के लिए शुद्ध गेहूँ मिलता हो। उसी जगह से आटा ले आइए। कम से कम, वे कहते हैं, चूँकि आपको ग्यारह दिन का प्रयोग करना है, कम से कम ढाई से तीन किलो गेहूँ लाकर रख लीजिए। अच्छा गुड़ ऐसी पूजा दुकान से लाइए जहाँ नमक इत्यादि नहीं मिलता हो — ताकि गुड़ में कोई दोष न हो। तो गुड़ हो गया, और घी। ये तीन सामग्री, वे कहते हैं, आपको लगेंगी।
घर का बड़ा लड़का या मुखिया, और विशेष परिस्थिति में बेटी तथा बहू
घर में कुल का हवन कौन कर सकता है?
वक्ता कहते हैं कि यह प्रयोग घर का बड़ा लड़का कर सकता है, या घर के जो मुखिया हों वे कर सकते हैं। विशेष परिस्थिति में घर की बेटी भी कर सकती है और बहू भी कर सकती है — पर वे कहते हैं कि प्रयास यही करें कि घर का लड़का करे, बड़ा लड़का या कोई भी पुत्र, क्योंकि वह ज्यादा अच्छा होता है। वे श्रोताओं से कहते हैं कि ध्यान रखें कि प्राथमिकता किसे देनी है।
यह प्रयोग, वक्ता कहते हैं, घर का बड़ा लड़का कर सकता है, या घर के जो मुखिया हों वे कर सकते हैं। विशेष परिस्थिति में घर की बेटी भी कर सकती है, और बहू भी कर सकती है। लेकिन प्रयास करें, वे कहते हैं, कि अगर घर का लड़का करे — बड़ा लड़का, या कोई भी पुत्र — तो वह ज्यादा अच्छा होता है। विशेष परिस्थिति में पुत्री और बहू भी कर सकती हैं। इस बात का ध्यान रखें, वे कहते हैं: किसको प्राथमिकता देनी है।
एक दिन पहले घर की साफ-सफाई, और दृढ़ संकल्प
पहले दिन से एक दिन पहले घर की सफाई, और मन में दृढ़ संकल्प
मान लीजिए आपने पूर्णिमा से — या नवरात्रि की प्रतिपदा से — आरंभ किया है; तो एक दिन पहले घर की अच्छे से साफ-सफाई कर लीजिए, और बिल्कुल शुद्ध मन से मन में दृढ़ संकल्प होना चाहिए। कष्ट कितना भी हो, वक्ता कहते हैं, चाहे आप पर झूठे मुकदमे लगे हों या शरीर में बहुत अधिक कष्ट हो, यह दस-पंद्रह मिनट का प्रयोग है, इससे ज्यादा का नहीं, और इसे करना ही है — दोनों ही स्थितियों में, कुलदेवी पता हो तब भी और न पता हो तब भी।
मान लेते हैं कि आपने पूर्णिमा से प्रयोग आरंभ किया है, वक्ता कहते हैं; आप इसे नवरात्रि की प्रतिपदापक्ष की प्रथम तिथि, जिससे नवरात्र के अनुष्ठान आरंभ होते हैं। भी मान सकते हैं। पहले दिन, सर्वप्रथम, एक दिन पहले घर की साफ-सफाई अच्छे से कर लीजिए, और बिल्कुल शुद्ध मन से मन में दृढ़ संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। होना चाहिए। कष्ट कितना भी हो — आप पर झूठे मुकदमे लगे हों, शरीर से बहुत अधिक कष्ट हो — यह दस या पंद्रह मिनट का प्रयोग है, इससे ज्यादा का नहीं। बहुत अधिक कष्ट हो तब भी आपको इसे करना है, और दोनों ही स्थितियों में: कुलदेवी पता हो तब भी, और कुलदेवी न पता हो तब भी।
प्रतिदिन दो नए चौमुख दीपक, सरसों और तिल का तेल, कलावे की बाती
रोज़ दो नए चौमुख दीपक, सरसों और तिल का तेल, कलावे की बाती
दो दीपक लगेंगे, दोनों चौमुख, और रोज़ नए दीपक। यदि आप पूर्णिमा से अमावस्या तक कर रहे हैं तो तीस दीपक लग जाएँगे; यदि नवरात्रि में दस दिन कर रहे हैं तो लगभग बीस दीपक लगेंगे। सरसों का तेल और तिल का तेल दोनों लाकर रख लीजिए। इनमें बाती कलावे की बनेगी — कलावे की बाती बनाकर चौमुख दीपक के लिए तैयार रख लीजिए।
इसमें दो दीपक लगेंगे, वक्ता कहते हैं, और दोनों चौमुख दीपक (चौमुख दीपकचार बत्तियों वाला चार-मुखी तेल का दीपक, भैरव व अन्य समान शक्तिशाली देवताओं के प्रयोग-अनुष्ठानों में जोड़े में या घर के कई स्थानों पर प्रयुक्त होता है।) रहेंगे। रोज़ नए दीपक लगेंगे। यानी कि यदि आप पूर्णिमा से अमावस्या तक कर रहे हैं तो तीस दीपक लग जाएँगे; यदि नवरात्रि में दस दिन का कर रहे हैं तो लगभग बीस दीपक लग जाएँगे। इस बात का ध्यान रखिएगा। सरसों का तेल और तिल का तेल दोनों भी लाकर रख लीजिएगा। इसमें बाती कलावालाल-पीला पवित्र धागा (जिसे मौली भी कहते हैं), जो कलाई पर बाँधा जाता है अथवा दीपक की बत्ती बनाने में प्रयुक्त होता है; यह लच्छों में आता है जिन्हें गिनकर लपेटा जाता है। की बनेगी: कलावे की बाती बनाकर चौमुख दीपक के लिए रख लीजिए।
नारंगी महाबीरी सिंदूर, और घर का मुख्य द्वार — किराए का हो या अपना
नारंगी महाबीरी सिंदूर, और घर का मुख्य द्वार — किराए का घर हो तब भी
नारंगी रंग का महाबीरी सिंदूर, जिसे बहुत जगहों पर भखरा सिंदूर भी कहते हैं — असली, बढ़िया वाला लाकर रख लीजिए। पहले दिन यह काम अपने घर के मुख्य द्वार पर होता है; और यदि आप किराए के घर में रहते हैं, वह अपना घर न हो, तो जो भी आपका मुख्य द्वार होगा — जहाँ तक का पैसा आप देते हैं, जहाँ से आपकी हद शुरू होती है।
नारंगी रंग का महाबीरी सिंदूरसिंदूर चूर्ण, यहाँ भैरव को अर्पण हेतु उल्टे त्रिकोण मंडल को बनाने में प्रयुक्त, देवी हेतु बनाए जाने वाले रोली-अष्टगंध त्रिकोण के स्थान पर। लाइए, वक्ता कहते हैं — बहुत जगहों पर नारंगी वाले को भखरा सिंदूर भी बोलते हैं। वही सिंदूर लाइए जो असली सिंदूर होता है, बढ़िया वाला, और उसे रख लीजिए। पहले दिन यह अपने घर के मुख्य द्वार पर करना है। और यदि आप किराए के घर में रहते हैं, अपना घर न होकर किराए का घर हो, तो जो भी आपका मुख्य द्वार होगा — जहाँ तक का पैसा आप देते हैं, जहाँ से आपकी अपनी हद शुरू होती है, जो आपके घर का मुख्य द्वार है — वहीं पर इसे करना है।
गंगाजल से पोंछना, और द्वार के मध्य में लटकाया गया कुश तथा आम का पत्ता
द्वार को गंगाजल से पोंछना, और आम के पत्ते में बँधा कुश द्वार के ठीक बीचोंबीच
सबसे पहले कपड़ा भिगोकर पूरे द्वार को गंगाजल से सही से पोंछ लीजिए — पहले से धो-पोंछ लिया हो तब भी पूजा के समय पुनः पोंछना है। फिर कुश लाइए, जो पूजा दुकान पर मिल जाएगा; तीन-चार कुश रहेंगे। आम के पत्ते का आगे का भाग काट लीजिए, पीछे के भाग में कम से कम तीन कुश के साथ उस पत्ते को बाँध दीजिए, उसे गंगाजल में डुबोकर अपने मुख्य द्वार के ठीक बीचोंबीच लटका दीजिए।
सबसे पहले, वक्ता कहते हैं, कोई कपड़ा भिगोकर पूरे द्वार को गंगाजलगंगा नदी का जल, अशुद्धि के संपर्क में आई अनुष्ठान वस्तुओं को शुद्ध व पुनःप्रतिष्ठित करने हेतु प्रयुक्त। से सही से पोंछ लीजिए। पहले से धो-पोंछ लिया हो, लेकिन पूजा के समय पुनः पोंछना है। कुश पूजा की दुकान पर मिल जाता है। कुश की लकड़ी (कुशपवित्र घास, जो आसन, पवित्री और मार्जन में प्रयुक्त होती है; आध्यात्मिक रूप से रोधक मानी जाती है।) लाइएगा — तीन-चार कुश रहेंगे — और आम का पत्ता। इन दोनों को मिलाकर, आम के पत्ते का आगे का भाग काट लीजिए, और उसके पीछे के भाग में कम से कम तीन कुश के साथ उस पत्ते को बाँध दीजिए। फिर उस पत्ते को गंगाजल में डुबोकर उस कुश सहित पत्ते को अपने मुख्य द्वार के ठीक बीचोंबीच लटका देना है।
बँधे पत्ते पर घी मिला सिंदूर, और चौखट पर पाँच टीके
बँधे हुए पत्ते पर घी मिला सिंदूर, और चौखट पर पाँच जगह टीका
लटकाने के पश्चात, जो नारंगी महाबीरी सिंदूर आप लाए हैं उसे घी में मिलाकर उस पर टीका कीजिए। उसके बाद मुख्य द्वार की चौखट पर कुलदेवी के नाम से पाँच जगह टीका करना है। वक्ता कहते हैं कि चौखट सबसे महत्वपूर्ण है, और कुलदेवी का वास कहाँ तथा कैसे होता है, यह वे पहले के वीडियो में बता चुके हैं।
लटकाने के पश्चात, वक्ता कहते हैं, जो नारंगी महाबीरी सिंदूरसिंदूर चूर्ण, यहाँ भैरव को अर्पण हेतु उल्टे त्रिकोण मंडल को बनाने में प्रयुक्त, देवी हेतु बनाए जाने वाले रोली-अष्टगंध त्रिकोण के स्थान पर। आप लाए हैं उसे घी में मिलाकर उस पर टीका कीजिए। उसके बाद उस चौखट पर — मुख्य द्वार की चौखट पर — आपको पाँच जगह टीका करना है, कुलदेवी के नाम से। कुलदेवी का वास कहाँ होता है और कैसे होता है, वे कहते हैं, यह वे पहले के वीडियो में बता चुके हैं। तो चौखट सबसे महत्वपूर्ण है।
दाहिने हाथ सरसों का तेल भैरव हेतु, बाएँ हाथ तिल का तेल कुलदेवी हेतु
दाहिनी ओर सरसों के तेल का दीपक भैरव के नाम, बाईं ओर तिल के तेल का कुलदेवी के नाम
मुख घर से बाहर की ओर रखते हुए — यानी जैसे आप घर से बाहर निकल रहे हों — आपके दाहिनी ओर वाला चौमुख दीपक सरसों के तेल का जलेगा, और चौखट के बाईं ओर वाला तिल के तेल का; दोनों चौमुख रहेंगे। हर दीपक के नीचे थोड़ा-सा अक्षत या एक फूल अवश्य रखा जाता है, क्योंकि दीपक खाली नहीं रखते, उसे आसन देकर रखा जाता है। दाहिनी ओर सरसों के तेल का दीपक भैरव जी के नाम से जलता है, आपके कुल के रक्षक भैरव के नाम से; और बाईं ओर वाला कुलदेवी के नाम से जलता है।
उसके बाद, दोनों ओर, आपका मुख घर से बाहर की ओर रखते हुए — यानी जब हम घर से बाहर निकलते हैं, तो बाहर निकलते समय जो स्थिति आपके दाहिने हाथ की ओर है — वहाँ चौमुख दीपक जलाएँगे, और वह सरसों के तेल का जलेगा। और चौखट का जो हिस्सा आपके बाईं ओर रहेगा, वहाँ आप जो दीपक जलाएँगे वह तिल के तेल का रहेगा। दोनों चौमुख रहेंगे। दीपक के नीचे थोड़ा-सा अक्षतअखंडित कच्चे चावल के दाने, संकल्प लेते समय जल व पुष्प के साथ हाथ में लिए जाते हैं। अवश्य रखेंगे, या फूल रख देंगे। दीपक को खाली नहीं रखते, वक्ता कहते हैं; उसे आसन देकर उस पर रखा जाएगा। दाहिने हाथ की ओर जो सरसों के तेल का दीपक जलाया है वह भैरव जी के नाम से जलेगा, आपके कुल के रक्षक भैरव के नाम से; और बाईं ओर जो दीपक जलाया है वह कुलदेवी के नाम से जलेगा। आपका मुख घर से बाहर की ओर है, वे दोहराते हैं — यानी आप घर से बाहर निकल रहे हैं; इस चीज़ को बार-बार सही से सुन लीजिएगा।
गाय के गोबर के उपले या आम की लकड़ी, और गेहूँ-गुड़-घी-काले तिल का रोट
अग्नि प्रज्वलित करना, और गेहूँ, गुड़, घी तथा काले तिल का रोट
इतना करने के पश्चात, मिट्टी के पात्र या हवन कुंड में गाय के गोबर के उपले से या आम की लकड़ी से अग्नि प्रज्वलित कीजिए। इससे पहले, नहा-धोकर, जो गेहूँ का आटा लाए हैं उसे लीजिए, उसमें गुड़ और घी तथा थोड़ा-सा काला तिल मिलाइए, और इतना आटा सानिए कि एक बढ़िया रोट बन जाए। घी लगाकर अच्छा-सा रोट बनाइए, फिर उसे तोड़कर चूरा कर लीजिए, और चूरे से आहुति के लिए छोटे-छोटे गोल लड्डू जैसे टुकड़े बना लीजिए।
इतना करने के पश्चात, वक्ता कहते हैं, सर्वप्रथम जो मिट्टी का पात्र आप लाए हैं या जो हवन कुंड लाकर रखा था, उसमें गाय के गोबर के उपले से या लकड़ी से — आम की लकड़ी से — अग्नि प्रज्वलित कीजिए। इससे पहले, नहा-धोकर, जो गेहूँ का आटा आप लाए हुए हैं उसे ले लीजिए। गेहूँ का आटा, गुड़ और घी — इन तीनों चीज़ों को मिलाकर उसमें थोड़ा-सा काला तिल मिलाएँगे, हल्का-सा काला तिल। आपको इतना आटा सानना है कि सानने से एक बढ़िया रोट बन जाए। घी लगाकर ही अच्छा-सा रोट बनाएँगे; और रोट बनाकर उसे तोड़कर फिर से चूरा कर लेंगे। चूरा करने के बाद उसे आहुति के लिए छोटे-छोटे गोल लड्डू जैसा बना लेंगे।
सत्ताईस आहुतियाँ और तीन अतिरिक्त — कुल तीस टुकड़े
आहुति के सत्ताईस टुकड़े और तीन अतिरिक्त — कुल तीस
सत्ताईस आहुतियाँ डालनी हैं, रोट के टुकड़ों से इसी प्रकार बनाकर: सत्ताईस टुकड़े अलग-अलग बनाकर रख लीजिए। इन सत्ताईस के सिवाय तीन टुकड़े और होने चाहिए, अलग से रखे हुए — यानी कुल मिलाकर आपके पास तीस टुकड़े होने चाहिए।
सत्ताईस आहुति डालनी हैं, वक्ता कहते हैं, रोट के टुकड़े से इसी प्रकार बनाकर। सत्ताईस टुकड़े अलग-अलग बनाकर रख लेंगे। इन सत्ताईस टुकड़ों के सिवाय तीन टुकड़े और होने चाहिए। तीन टुकड़े और इसमें अलग से रहेंगे — यानी कुल मिलाकर आपके पास तीस टुकड़े होने चाहिए।
गणपति, कुल गुरु और हनुमान — और क्रम का नियम
पहली तीन आहुतियाँ — गणपति, कुल गुरु और हनुमान
अग्नि प्रज्वलित कीजिए, मुख घर से बाहर की ओर ही रखिए, और फटाफट कीजिए, ज्यादा देर मत लगाइए। मंत्र मन में बोलने हैं। पहली आहुति गणपति जी के नाम से, दूसरी कुल गुरु के नाम से — कुल के गुरु के नाम से, वे गुरु चाहे जहाँ भी हों, जहाँ भी वंश चल रहा हो। वक्ता एक क्रम का नियम जोड़ते हैं: यदि आपको अपने कुल गुरु पता हैं तो पहली आहुति कुल गुरु के नाम से और दूसरी गणपति जी के नाम से; यदि पता नहीं हैं तो पहली गणपति जी के नाम से और दूसरी कुल गुरु के नाम से। तीसरी आहुति हनुमान जी के नाम से।
अग्नि प्रज्वलित करेंगे, वक्ता कहते हैं। आपका मुख घर से बाहर की ओर ही रहेगा। यह फटाफट करना है; इसमें ज्यादा देर नहीं लगानी है। मंत्रों को मन में बोलना है। पहली आहुति के लिए, गणपति जी के नाम से, हाथ में रोट का वह टुकड़ा लेंगे जिसका गोला बनाया है; हो सकता है आपने छोटा तोड़ रखा हो — जरूरी नहीं कि गोला ही बने। तोड़कर आप तीस टुकड़े अलग से रख सकते हैं। वही, गणपति जी के नाम से, आहुत में डाल देंगे। पहली आहुति हो गई। दूसरी आहुति कुल गुरु के नाम से होगी — ध्यान रहे, कुल के गुरु के नाम से, वे गुरु चाहे जहाँ भी हों, जहाँ भी वंश चल रहा हो। यह दूसरी आहुति कुल गुरु के नाम से। यदि आपको अपने कुल गुरु पता हैं तो पहली आहुति कुल गुरु के नाम से और दूसरी गणपति जी के नाम से। यदि पता नहीं है तो पहली आहुति गणपति जी के नाम से और दूसरी आहुति कुल गुरु के नाम से। तीसरी आहुति हनुमान जी के नाम से। ये तीन आहुतियाँ ऐसी होंगी।
उनके नाम के आगे नमः, और ओम नहीं
शेष सत्ताईस आहुतियाँ कुलदेवी के अपने नाम से
यदि आपको अपनी कुलदेवी का नाम पता है, तो शेष सत्ताईस आहुतियाँ उनके नाम से देते जाइए, उनके नाम के आगे नमः लगाते हुए। वक्ता उदाहरण देते हैं: मान लीजिए कुलदेवी का नाम भवानी है, या कुलदेवी का नाम दुर्गा है — तो ओम लगाने की आवश्यकता नहीं है; "दुर्गाय नमः" बोलकर डालना है। स्वाहा आप बोल सकते हैं, वे जोड़ते हैं, इसमें कोई दिक्कत नहीं है।
शेष सत्ताईस आहुतियों के विषय में, वक्ता कहते हैं, यदि आपको अपनी कुलदेवी का नाम पता है, तो उन्हीं के नाम से देते जाइए, उनके नाम के आगे नमः लगाते हुए। मान लीजिए, वे कहते हैं, कि कुलदेवी का नाम भवानी है, या कुलदेवी का नाम दुर्गा है — तो ओम लगाने की आवश्यकता नहीं है। "दुर्गाय नमः" बोलकर डालना है। स्वाहादेवताओं हेतु अग्नि में दी जाने वाली आहुति के अंत में बोला जाने वाला वचन, पितरों के 'स्वधा' से भिन्न। आप बोल सकते हैं; इसमें कोई दिक्कत नहीं है।
कुलदिब्बे नमः स्वाहा — और यहाँ नमः क्यों अनिवार्य है
जब कुलदेवी का नाम पता न हो तब क्या बोला जाए
यदि आपको उनका नाम पता नहीं है, वक्ता कहते हैं, तो "कुलदिब्बे नमः" बोलकर डालते जाइए — "कुलदिब्बे नमः" बोलकर आहुति देते जाइए, "कुलदिब्बे नमः स्वाहा"। यहाँ नमः लगाना अनिवार्य है। वे कहते हैं कि यहाँ हवन की वह सामान्य पद्धति नहीं चलेगी जिसके अनुसार स्वाहा लगाने पर नमः नहीं लगाते। यहाँ केवल उसी तरीके से कीजिए जैसा वे बता रहे हैं।
यदि आपको उनका नाम पता नहीं है, वक्ता कहते हैं, तो "कुलदिब्बे नमः" बोलकर डालते जाइए। "कुलदिब्बे नमः" बोलकर उसमें आहुति देते जाइए — "कुलदिब्बे नमः स्वाहा"। नमः लगाना अवश्य आवश्यक है, वे कहते हैं। यहाँ हवन की वह पद्धति नहीं चलेगी जिसमें स्वाहा लगाने पर नमः नहीं लगाया जाता। यहाँ केवल उसी तरीके से कीजिए जैसा वे बता रहे हैं, उतना ही।
कुंड के चारों ओर तीन बार जल, और राख का संग्रह
कुंड के चारों ओर तीन बार जल घुमाना, और राख को एक जगह एकत्रित करना
यह काम पूरा कर लेने और तीसवीं आहुति डाल देने के बाद, हाथ में पानी लेकर उस कुंड के चारों ओर तीन बार घुमाकर वहाँ पानी डाल दीजिए, और जितनी देर वह जले उतनी देर उसे जलने दीजिए। जल कर जब वह राख हो जाए तो उसे हटा दीजिए — और उसी राख को एक जगह एकत्रित करते जाइए।
यह काम आपने पूरा कर लिया, वक्ता कहते हैं; आपने तीसवीं आहुति डाल दी। आहुतियाँ डालने के बाद, हाथ में पानी लेकर उस कुंड के चारों ओर तीन बार घुमाकर वहाँ पानी डाल देंगे, और जितनी देर तक वह जले उसे जलने देंगे। जल कर जब वह राख हो जाएगा तो उसे हटा देंगे। और उसी राख को एक जगह एकत्रित करते जाइए।
सत्ताईस दिन सर्वोत्तम, पंद्रह दिन या नवरात्रि की अवधि न्यूनतम
सत्ताईस दिन सर्वोत्तम, पंद्रह दिन या नवरात्रि न्यूनतम
वक्ता कहते हैं कि यह काम कम से कम सत्ताईस दिन तक करना चाहिए; यदि आप सत्ताईस दिन तक करते हैं तो ठीक है। नहीं तो, जैसा बताया गया: कम से कम पूर्णिमा से अमावस्या तक — यानी पंद्रह दिन — या नवरात्रि की प्रतिपदा से दशमी तिथि तक, सुबह के समय में। सत्ताईस दिन कर पाएँ तो अत्यंत ही उत्तम है; नहीं तो जितने दिन उन्होंने बताए हैं उतने ही दिन कीजिए।
यह काम, वक्ता कहते हैं, आपको कम से कम सत्ताईस दिन तक करना चाहिए। यदि आप सत्ताईस दिन तक करते हैं तो ठीक है। नहीं तो, जैसा बताया गया है: कम से कम पूर्णिमा से अमावस्या तक — यानी आप पंद्रह दिन करेंगे, पूर्णिमा से लेकर अमावस्या तक — या फिर नवरात्रि की प्रतिपदा से लेकर दशमी तिथि तक, सुबह के समय में। यदि आप सत्ताईस दिन करते हैं तो अत्यंत ही उत्तम होता है; यदि कर पाते हैं तो बहुत अच्छा है। नहीं तो जितने दिन बताए गए हैं उतने ही दिन कीजिए।
हवन की अग्नि से जलाया गया छोटा चाँदी का दीपक और पूजन स्थान
अंतिम अग्नि से प्रज्वलित एक छोटा चाँदी का दीपक, पूजन स्थान पर ले जाकर रखा हुआ
जब आप अंतिम आहुति दे दें, तो यदि आपके लिए संभव हो, एक छोटा ही सही, चाँदी का दीपक खरीद लीजिए। उसमें लाल मौली धागे से बाती बनाइए, घी डालिए, और अंतिम आहुति के पश्चात उसी अग्नि से उस दीपक को प्रज्वलित करके अपने पूजन स्थान पर ले जाकर कुलदेवी के नाम से रख दीजिए।
यह करने के पश्चात, वक्ता कहते हैं, एक चीज़ और ध्यान रखिएगा। जब आप अंतिम आहुति दे देंगे, तब, यदि आपके पास संभव हो और यदि आप कर सकें, तो एक चाँदी का दीपक खरीद लीजिएगा — छोटा ही सही, बहुत छोटा ही सही। उसमें लाल मौली धागे से बाती बनाकर, उसमें घी डालकर, और अंतिम आहुति देने के पश्चात उसी अग्नि से उस दीपक को प्रज्वलित कीजिए। उसे अपने पूजन स्थान पर ले जाकर कुलदेवी के नाम से वहाँ रख दीजिए।
द्वार का बंधन अंतिम दिन तक अछूता रहता है
द्वार पर बँधा कुश और आम का पत्ता अंतिम दिन तक बदला नहीं जाता
वक्ता कहते हैं कि आरंभ में द्वार के मध्य में जो तीन कुश और आम का पत्ता बाँधा था, उसे अंतिम दिन तक बदलना नहीं है। वे कहते हैं कि ध्यान रखें कि वह सूखकर गिर न जाए — इसलिए उसे बहुत टाइट बाँधना है। यह पूरी प्रक्रिया अंतिम दिन तक करनी है; सिर्फ इतना ही निरंतर करते रहना है।
यह पूरी चीज़, वक्ता कहते हैं, आपको अंतिम दिन तक करनी है। सिर्फ इतना ही आपको निरंतर करते रहना है। और जो शुरू में द्वार के मध्य में तीन कुशपवित्र घास, जो आसन, पवित्री और मार्जन में प्रयुक्त होती है; आध्यात्मिक रूप से रोधक मानी जाती है। और आम का पत्ता बाँधा था, उसे अंतिम दिन तक बदलना नहीं है। ध्यान रखें कि वह सूखकर गिरे नहीं, वे कहते हैं: उसे बहुत टाइट बाँधना है।
स्वप्न के माध्यम से कुलदेवी का दर्शन, और उससे मिलने वाला मार्गदर्शन
इस बीच कुलदेवी स्वप्न के माध्यम से दर्शन देती हैं
वे कहते हैं कि इतना आप कीजिए तो सौ प्रतिशत आपकी कुलदेवी इस बीच स्वप्न के माध्यम से दर्शन देंगी — किसी न किसी माध्यम से, स्वप्न में। इतना मार्गदर्शन आपको अवश्य मिल जाएगा कि हाँ, देवी हैं; और वे प्रसन्न हैं कि नहीं, यह भी आपकी समझ में आएगा, तथा आगे के लिए मार्गदर्शन भी प्राप्त होगा।
इतना आप कीजिए, वक्ता कहते हैं, और सौ प्रतिशत आपकी कुलदेवी इस बीच स्वप्न के माध्यम से, किसी न किसी माध्यम से, स्वप्न में दर्शन देंगी। इतना मार्गदर्शन आपको अवश्य प्राप्त होगा: कि हाँ, देवी हैं। वे प्रसन्न हैं कि नहीं, यह भी आपकी समझ में आएगा, और आगे के लिए मार्गदर्शन भी प्राप्त होगा।
पंद्रह दिन रुकना और पुनः पूर्णिमा से आरंभ करना
यदि कुछ न हो, तो पंद्रह दिन रुककर पुनः पूर्णिमा से आरंभ करना
यदि एक बार के प्रयोग से यह चीज़ नहीं होती, तो पंद्रह दिन रुककर पुनः पूर्णिमा से कीजिए। एक बार में हार नहीं मान लेनी है कि बस हो गया, नहीं हुआ। आपका प्रारब्ध वैसा होगा, वक्ता कहते हैं — बड़ी गलतियाँ की होंगी, बड़ा अपराध किया होगा, तो दंड भी वैसा ही मिलेगा। बहुत सारे अपराध होते हैं जिन्हें लोग बोलते नहीं। तो इसे बार-बार कीजिए। इसमें बहुत अधिक न खर्च आने वाला है, न बहुत कुछ आपका जाने वाला है — लेकिन मिलेगा बहुत कुछ।
यदि एक बार के प्रयोग से यह चीज़ नहीं होती, वक्ता कहते हैं, तो पंद्रह दिन रुककर फिर पूर्णिमा से कीजिए। एक बार में हार नहीं मान लेनी है — कि बस हो गया, नहीं हुआ। आपका प्रारब्धपूर्व कर्मों द्वारा पहले से गतिमान भाग्य का वह अंश — साधना व सत्कर्म इसकी तीव्रता को घटा सकते हैं, किंतु पूर्णतः मिटा नहीं सकते। वैसा होगा; बड़ी गलती की होगी, बड़ा अपराध किया होगा, तो दंड भी वैसा ही मिलेगा। बहुत सारे अपराध होते हैं, वे कहते हैं, और लोग उन्हें बोलते नहीं। तो इसे बार-बार कीजिए। इसमें बहुत अधिक न खर्च आने वाला है, न बहुत कुछ आपका जाने वाला है — लेकिन मिलेगा बहुत कुछ।
चौखट पर की गई पूजा को भगवती पार्वती की अंश शक्ति ग्रहण करती हैं
यदि घर में अभिचारिक प्रयोग चल रहा हो, तो क्या चौखट का भोग कोई और ले सकता है?
वक्ता स्वयं यह प्रश्न उठाते हैं: यदि घर में अभिचारिक प्रयोग हो, तंत्र-मंत्र का प्रयोग हो, तो क्या दिक्कत नहीं हो जाएगी, शक्तियाँ कोई और नहीं ले लेगा, भोग कोई और नहीं ले लेगा? निश्चिंत रहें, वे उत्तर देते हैं: चौखट पर की गई पूजा को इतनी आसानी से ले लेने की किसी की औकात नहीं होती। जहाँ आप कुलदेवी के नाम से देंगे, वहाँ भगवती पार्वती की ही अंश शक्ति उसे ग्रहण करेंगी। फल भले आपके कर्म के कारण आपको न मिले — वह अलग बात है — पर आपकी पूजा वहाँ गलत नहीं हो सकती। चौखट की पूजा, चौक यानी चौराहे की पूजा की तरह, सही चीज़ को ही जाती है; गलत चीज़ उसे जल्दी नहीं ले पाती।
वक्ता कहते हैं कि एक चीज़ और स्पष्ट कर देते हैं, क्योंकि लोगों का यह प्रश्न आ सकता है: यदि अभिचारिक प्रयोग (अभिचार) हो, घर में तंत्र-मंत्र का प्रयोग हो, फलाना-चिलाना चीज़ हो — तो हम कैसे करेंगे? इसमें तो दिक्कत हो जाएगी; शक्तियाँ कोई और ले लेगा, भोग कोई और ले लेगा। निश्चिंत रहें, वे उत्तर देते हैं। चौखट पर की गई पूजा को इतनी आसानी से ले लेने की किसी की औकात नहीं होती। तो जहाँ आप कुलदेवी के नाम से देंगे, वहाँ भगवती पार्वतीहिमालय की पुत्री और शिव की पत्नी; तंत्र का बहुत सा उपदेश उन्हीं के प्रश्नों पर कहा गया है। की ही अंश शक्ति उसे ग्रहण करेंगी। फल भले आपको आपके कर्म के कारण न मिले — वह अलग बात है — लेकिन आपकी पूजा वहाँ गलत नहीं हो सकती। चौखट की पूजा, चौक की पूजा — यानी चौराहे की पूजा, चौखट की पूजा — सही चीज़ को ही जाती है। गलत चीज़ उसे जल्दी नहीं ले पाती।
निश्चिंत होकर प्रयोग करना, और आशीर्वाद
यह प्रयोग निश्चिंत होकर करना चाहिए, और इसे करने से अत्यंत ही लाभ प्राप्त होता है
वे कहते हैं कि इसीलिए इस प्रयोग को निश्चिंत होकर करना चाहिए, और इसे करने से अत्यंत ही लाभ प्राप्त होगा। अंत में वे आशा करते हैं कि श्रोता को कुलदेवी की कृपा प्राप्त हो और भगवती प्रसन्नतापूर्वक उनके कुल में वास करें — यह जोड़ते हुए कि जब उनके परिवार का कल्याण होगा तो कहीं न कहीं उनका आशीर्वाद उन्हें भी प्राप्त होगा।
इसीलिए, वक्ता कहते हैं, इस प्रयोग को निश्चिंत होकर कीजिए। इस प्रयोग को करने से आपको अत्यंत ही लाभ प्राप्त होगा। वे आशा करते हैं कि श्रोता को कुलदेवी की कृपा प्राप्त हो, और भगवती प्रसन्नतापूर्वक उनके कुल में वास करें — क्योंकि कहीं न कहीं उनका आशीर्वाद उन्हें भी प्राप्त होगा, जब उनके परिवार का कल्याण होगा।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।